जवाबुल इश्तिहार

Published in Nur-i-Afshan July 09, 1897

By

Fateh Maseeh

जवाबुल इश्तिहार

 

मिर्ज़ा ग़ुलाम अहमद साहब क़ादियानी

 

इन दिनों मिर्ज़ा साहब ने एक इश्तेहार-उल-उनवान जैल मुश्तहर फ़रमाया है। “इश्तेहार-उल-मअ्यार-उल-अख्यार-वल-इसरार’’ इस में आपने ख़ास तौर पर मौलवी पादरी इमाद-उद्दीन साहब को, और आम तौर पर सब देसी पादरी साहब को मुखातिब किया है :-

 

मिर्ज़ा साहब की तहरीरात को देखकर ही ताज्जुब आता है, कि झूठ लिखना और अपने नाज़रीन को धोखा देना मिर्ज़ा साहब की खासियत हो गई है, और इस पर दावा मसीहाई, कि मै ख़ुदारसीदाह और मुक़र्रब ख़ुदा हूँ। मै ये हूँ मै वो हूँ, मेरी क्या बात है कम अक़्ल आदमी भी जान सकता है कि झूठा और फ़रेबी आदमी किस तरह से कोई रास्ती पेश कर सकता है। अह्लुल्लाह (अल्लाह वालों) की नज़र में इसकी क्या वुक़अत हो सकती है। वो ज़रूर इस को हिक़ारत कि नज़र से देखेंगे और ख़ुदा से दुआ करेंगे कि वो इस पर रहम फरमाए। इसकि बदआदात दूर कि जावे। और लोग इसके फरेब में न आएं, अब मिर्ज़ा साहब की ग़लत बयानी या दरोग़गोई साबित करने के लिए ज़रूरी नही है कि उनकी पिछली तहरीरात पर गौ़र करे, बल्कि इसी इश्तेहार को देख लो कि जो कुछ हमने मिर्ज़ा साहब के हक़ में लिखा है दुरुस्त है या नहीं? अव्वल वो लिखता है किताब “नसीहत-उल-मुस्लिमीन” वगैरह में मौलवी इमादुद्दीन साहब ने मोहम्मद साहब और मोहम्मदी मज़हब को गालियाँ निकाली है।” अब जाए गौ़र है कि जनाब मौलवी पादरी इमादुद्दीन साहब ने इस नाम कि कोई किताब आज तक नहीं लिखी है। अगर मिर्ज़ा साहब सच्चे है तो साबित करे कि मौलवी साहब कि कोई किताब इस नाम कि है। और मै दावे से कहता हूँ कि मिर्ज़ा साहब हरगिज़ एसा नहीं कर सकेंगे, दूसरा वो लिखते है कि जनाब मौलवी पादरी इमादुद्दीन साहब ने उस रिसाले में जो अमेरिका कि नुमाईश मज़हबी में भेजा है, लिखा है कि ‘’इस्लाम के उम्दाह उम्दाह मौलवी सब ईसाई मज़हब में दाख़िल हो गए है, और दाख़िल होते जाते है।…..अब इस्लाम पर क़ायम रहने वाले सिर्फ जाहिल और बेतमीज़ लोग बाक़ी है।”

 

मै अर्ज़ करता हूँ कि मौलवी साहब ने हरगिज़ एसा नहीं लिखा, यह मिर्ज़ा साहब का बुह्तान और महज़ झूठ है, अगर मिर्ज़ा सच्चा है तो इस बात को वो उनके रिसाले से लिख कर हमे इल्ज़ाम दे और हम दावे से कहते है कि वो हरगिज़ एसा नहीं कर सकेगा। पस ज़ाहिर है कि एसे दर व गु़लू कि बातो को कौन तोजीहा (तवज्जोह) देगा। बल्कि ज़रूर उन को लग्व और बेहूदा समझकर फैंक देगा। और त’आज्जुब नहीं कि इसी बिना पर आपने 5 हज़ार रूपए का वादा अपने इश्तेहार में कर दिया हो, कि लोग मेरी तहरीरात को तवज्जोह तो करते नहीं सो लफ्ज़ 5 हज़ार पर कोन तवज्जोह करेगा। मगर मुसलमानो में बन आवेगी उनमे पहलवान मशहूर हो जाऊँगा। चंदा मांगूंगा, आप खाऊंगा कोई रिसाला लिख दूंगा इस कि क़ीमत भी दो गुनी वसूल कर लूँगा, और किसी से नई शादी कि फ़िक्र करूँगा।

 

जनाब मिर्ज़ा साहब हक़ीक़तन आप को ब’आज़ मुसलमान अक़्ल के अंधे अच्छे मिल गए है मज़े करो। और ये शैर पढ़ा करो कि “आक़बत कि खबर ख़ुदा जाने, अब तो आराम से गुज़रती है।” मगर याद रखो के ख़ुदा के हुज़ूर जाना ही है, जिस वक़्त सब के अ’माल कि किताबे खोली जाएंगी उस वक़्त क्या जवाब दोगे? फिर आपने फरमाया है कि मेरी किताब नूरुल्हक़ के बिल्मुक़ाबिल किताब अरबी में लिखो : जनाब मिर्ज़ा साहब किसी को क्या गर्ज़ पढ़ी है कि एसी फ़िज़ूल बातों में अपना वक़्त ज़ाया करे। मिर्ज़ा साहब पर हमे तरस आता है कि कोई भी इसके इश्तेहार पर तवज्जोह न करेगा, असल में मिर्ज़ा साहब तो जनाब मौलवी पादरी इमादुद्दीन साहब को मुखा़तिब करते है और उनको मुख़ातिब करने कि यही वजह म’आलूम होती है कि किसी तरह से क़ुरआन का पीछा छुढ़ाएँ, मिर्ज़ा साहब “ऐ ख़याल अस्त व महाल अस्त व जुनू” इस वक़्त वो आप कि नूरुल्हक़ कि कुछ परवाह नहीं करते जिसको उन्होंने पकड़ा है उसको ठीकाने लगाकर फिर शायद नूरुल्हक़ को जा दबाएं तो उन्की मर्ज़ी मगर बेफाएदा। क्यूंकि क़ुरआन के सामने आप कि नूरुल्हक़ कि क्या हक़ीक़त है।

 

मिर्ज़ा साहब आप बहूत दूर न जाएं जनाब डॉक्टर क्लार्क साहब मु’अज्ज़म का जवाबी इश्तेहार तो आपको मिल ही गया होगा, पस आओ फैसला करलो यानी आप ने तो पूरे अहमदिया में यह दावा किया हुआ है कि आपको ग़ैर ज़बानों में इल्हाम होता है, जिनसे आप महज़ नावाक़ीफ हैं। मसलन अंग्रेज़ी, इब्रानी आपके कई एक इल्हाम अंग्रेज़ी ज़बान के इसमें दर्ज भी है : पस हिम्मत करो दस मिनिट तक डॉक्टर साहब मौसूफ़ के बिल्मुक़ाबिल अंग्रेज़ी में तक़रीर करो या उन ज़बानों में से एक में जिनका जनाब डॉक्टर साहब मौसूफ़ ने अपने इश्तेहार में ज़िक्र किया है। मामूली किताब का एक सफा (पेज) बिला इम्दादुन्निसानी लिखो, अब आप क्यों तवक्कुफ़ करते है डॉक्टर साहब ने आपको दस रोज़ कि मि’यार (मोहल्लत) भी दे दी है लो अब वक़्त है फिर पछताओगे।

 

मगर मिर्ज़ा साहब में बड़े ज़ोर से और दावे के साथ कहता हूँ कि आप हरगिज़ हरगिज़ डॉक्टर साहब का मुक़ाबला नहीं कर सकोगे इसको आप अपनी पेशन्गोइयों के हाशिये पर लिख छोड़ें आपको तो इल्हाम से म’आलूम हुआ, कि नूरुल्हक़ का जवाब ईसाई नहीं देंगे यानि इसके बिल्मुक़ाबिल तहरीर नहीं कर सकेंगे, और हम बगैर इल्हाम आपको खबर देते है कि आप डॉक्टर साहब का मुक़ाबला हरगिज़ नहीं कर सकोगे।

 

लो अब हिम्मत करो और हमारी पेशनगोई को झुठलाओ अगर सकते हो? बाक़ी आपने इसी इश्तेहार में लिखा है कि मौलवी मोहम्मद हुसैन साहब बटालवी ने ईसाइयों को मुबाहिसे में मदद दी थी। यह बिलकुल ग़लत है, ग़लत है, ग़लत है, आप कि ग़लतियाँ कंहा तक हम बयान करे। सब वाकिफ़ हें कि आप किस रुत्बे के शख्स हैं, हम ख़ुदा से इल्तेजा करते है कि वो आप को इस ज़लालत और गुमराही से निकाले। आमीन सुम्मा आमीन।

 

आपका खैरख्वाह – फतह मसीह अज़ फतःगढ़

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