क़ुरआनी जिहाद

Quranic Jihad

Published in Nur-i-Afshan September 19, 1889

By

Fateh Maseeh

क़ुरआनी जिहाद की निस्बत एक ईसाई की राए और उसकी तर्दीद

      अमूमन जब मोहम्मदी भाइयों से क़ुरआनी जिहाद कि बाबत गुफ्तगू होती है और उन्हें कहा जाता है कि मुबह फअ़ल शान-ए-इलाही के खि़लाफ है तो वो बेसाख्ता चिल्ला उठते हैं। कि तौरेती जिहाद और कु़रआनी जिहाद में कुछ फर्क़ नहीं हैं पस जबकि तौरेती जिहाद शाने-ए-इलाही के खि़लाफ नहीं है तो किस तरह क़ुरआनी जिहाद पर एतराज़ करते हो वगैरह।

कुछ त’आ़ज्जुब कि बात नहीं है कि मोहम्मदी अहबाब अपनी नावाकि़फी के बाई़स एसा कहेंगे मगर मुझे त’आ़ज्जुब हुआ जबकि एक मसीही त’आ़लीम याफ्ता बाबु साहब ने एसा ही फरमाया और मन्दर्जा जै़ल दलील भी पैश कि के ख़ुदा ने तो साफ़ हुक्म दिया था कि कन’आ़नी लोगों को क़त्ल करो फिर किस तरह से बनी इस्राईल ने राहिब और ब’आ़ज जब’ऊ़नी और हित्ती ओर्या को तल्वार के हवाले नहीं किया? पस उनके इस फ’अ़ल से साफ़ ज़ाहिर है कि चूँकि वोह उनके मज़्हब में शामिल हुए थे तो तलवार का लुक्मा नहीं हुए, और जिन लोगों ने इन्कार किया वो तलवार के हवाले किये गए और एसा ही क़ुरआनी जिहाद है। अब बाबु साहब और उनके हम-ख़याल दीगर साहिबों को खुसूसन और मोहम्मदी असहाब को अमूमन सतूर जै़ल कि तरफ तवज्जोह दिलाता हूँ। आप मेहरबानी करके उन अश्खा़स के हालात पर जिनको आपने सनदन (दलील के साथ) पैश किया है इन्साफ से गौर करें।

अव्वल राहिब के हाल कि बाबत कलाम इलाही में लिखा है कि जासूस उसके घर में आए और जब शहर के लोगों को म’आ़लूम हुआ कि दो शख्स जासूसी करने के लिए हमारे शहर में आए हैं और राहिब के घर में मौजूद हैं, तो शहर के लोग राहिब के घर में आए और जासूसों कि बाबत दरयाफ्त किया, तो राहिब ने जासूसों को छुपा दिया और लोगों को कहा कि दो शख्स आए तो थे मगर वो चले गए हैं, तुम उनका पीछा करो और बू’अ़दा तो उनके यानि जासूसों के पास गई और उनसे कहा कि मुझे यकीन हुआ है कि मुहय्या सरज़मीन ख़ुदा ने तुम्हे अता कि है और कि तुम्हारा रो’अ़ब (दबदबा) हम पर ग़ालिब हुआ है नीज़ उसने यह कहा कि हमने सुना है कि ख़ुदा ने तुम्हारे सामने दरया-ए-कुलज़ूम के पानी को सुखा डाला है। और तुम्हारा ख़ुदा ऊपर आस्मान का और नीचे ज़मीन का ख़ुदा है, सो अब मुझे ख़ुदावंद कि क़सम कीजिये बल्कि मेने तुम पर मेहरबानी कि है (यानि तुमको दुश्मनों के हवाले नहीं कर दिया) तुम भी मेरे बाप के घराने पर मेहरबानी करो और मेरे बाप, माँ, भाइयों, बहनों को और जो कुछ उनका है बचाओ और हमारी जानो को मौत से रिहाई दो। जासूसों ने उसे जवाब दिया कि तुम्हारी जानो के ए़वज़ हमारी जाने, बशर्ते की तू हमारा ये हाल फाश न करें और अगर तुम हमारा ये हाल फाश करोगे तो हम इस क़सम से जो तूने हमसे ली आज़ाद हो जाएंगे (यानि तुझको और तेरे बाप के खानदान को और लोगों के साथ हलाक कर डालेंगे)

अब बाबु साहब को गौर फमाना चाहिए कि राहिब ने जासूसों से नहीं कहा कि चूंकि मैं यहोवा को मानती हूँ मुझे हलाक न करना बल्कि यह कहा कि मेने तुम्हारी जानें बचाई हैं, तुम मेरी और मेरे कुन्बे कि जाने बचाओ एसा ही जासूसों ने भी नहीं कहा कि चूंकि तुम यहोवा को मानती हो इसलिए हम तुझको बचा देंगे बल्कि ये कहा कि इस मेहरबानी के ए़वज़ जो तूने हम पर कि है न सिर्फ तेरी जान बचाएंगे बल्कि तेरे खानदान कि भी जैसा तूने कहा है लेकिन अगर तू हमारा हाल फाश कर देगी, (न कि यहोवा का इन्कार) तो हम तुम सब को लोगों के साथ हालाक कर देंगे।

बाबु साहब क़ुरआन से तो तब मुताबिक़त होती अगर जासूस कहते कि यहूदी दस्तूरात को मान लो वरना हम तुमको क़त्ल करेंगे और अगर तू अपने बाप के खानदान के वास्ते सिफारिश करती है तो उनको भी ज़रूर है की यहूदी मसाइल को मान ले, और राहिब महज़ अपनी जान बचाने के लिए मूंह से इक़रार कर देती कि हाँ में यहूदी दस्तूरात और मसाइल को मानती हूँ, मगर यंहा तो एसे जबरन इक़रार का कहीं निशान तक भी नज़र नहीं था जैसा कि क़ुरआनी जिहाद में साफ़ साफ़ लिखा है कि मुसलमान हो जाओ वरना ये तल्वार है। और हज़ारों आदमी मूंह से इक़रार करके बच गए हालांकि उनके दिल मोहम्मदी मज़हब से बिलकुल मुन्तफर (अलग) थे।

शायद आप ऐतराज़ करे कि जासूसों ने किस वास्ते राहिब से क़सम खाई कि हम तुझको बचावेंगे? मेरा जवाब है कि अपनी जान बचाने के वास्ते शायद कोई कहे कि फिर अगर उन्होंने ख़ुदा कि मर्ज़ी के खि़लाफ क़सम खाकर राहिब को जिंदा रखा। तो क्यों उनको यशुअ से सज़ा नहीं मिली बल्कि यशुअ ने खुद कहा कि राहिब को बचाओ क्योंकि तुमने उससे क़सम खाई है, मेरा जवाब ये है कि इसोफट के लोग जिस अम्र के पूरा करने कि क़सम खाते थे वोह इसको ज़रूर ही पूरा करते थे ख्वाह वो मर्ज़ी ईलाही के खिलाफ ही म़आलूम हो और उसको गुनाह नहीं समझते थे चुनान्चे इफ्ताह ने क़सम खाई कि जब में फतह करके वापस आऊँ तो जो कोई मेरे सामने पहले आए मैं उसको सोख़तनी क़ुर्बानी करूँगा। और जब वापस आता था तो उसकी बेटी पहले उसको मिली उसने उसको क़ुर्बानी कर दिया।

बाबू साहब आप क्या समझते है कि इफ्ताह ने ये जायज़ किया हरगिज़ नहीं ! भला फिर उसको कोई सज़ा मिली हालांकि वो उस वक़्त बनी इस्राईल का गोया सर बना हुआ था कुछ सज़ा नहीं मिली फिर क्या उसके ईमान कि त’आ़रीफ कलामे ईलाही में नहीं लिखी, हाँ लिखी है। देखो इब्रानियों का ख़त्तुल्बाब वेसे ही जासूसों को कोई सज़ा नहीं दी गई और यशुअ ने उसको कोई संगीन गुनाह नहीं समझा। अलबत्ता आपका एक ऐतराज़ और बाक़ी है यानि यह कि इब्रानियों के ख़त के बाब में लिखा है कि ईमान से राहीब जो फाहिशा थी बेईमानो के साथ हलाक न हुई के उसने जासूसो को सलामत अपने घर उतारा अब उस आहट को देखकर हम राहिब के हाल को फिर सोचें।

ऊपर के बयान से ज़ाहिर है कि पेश्तर उससे कि राहिब कि मुलाक़ात जासूसो से हुई वो ज़िन्दा ख़ुदा पर ईमान रखती थी, इसलिए ख़ुदा के  उस वादे को सच्चा मान लिया जोकि अब्राहम से किया गया था, कि यह ज़मीन तेरी नस्ल को दूंगा। उसने इस बात का इक़रार किया कि ज़मीन और आस्मान का मालिक बनि इस्राईल का खु़दा है, न कि जिस तरह से और लोग मुख्तलिफ क़ौमों और मुल्को के मुख्तलिफ ख़ुदा मानते थे गर्ज़ उस ईमान कि बाईस जो उसमे मौजूद था उसने जासूसों से एसे तौर पर कलाम किया कि उन्होंने न सिर्फ उसी की बल्कि उसके खा़नदान कि जान बचाने कि भी क़सम खाई।

राहिब ने अपने दिली ईमान की रोशनी ही से जो तलवार के डर से सिर्फ ज़बान से होता है। (बाक़ी आइन्दा)

फ़तेह मसीह अज़ बटाला

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