अस्बाब-ए-इत्तिहाद

Eastern View of Jerusalem

Reasons of Unity

अस्बाब-ए-इत्तिहाद

By

Akbar Masih
अक्बर मसीह

Published in Nur-i-Afshan April 20, 1894

नूर-अफ्शां मत्बूआ 20 अप्रैल 1894 ई॰

मसीह ख़ुदावंद की बाबत बहुत सी ग़ैर-इंजीली रिवायत में से एक ये भी है जो मुझको बहुत प्यारी मालूम होती है याद नहीं कि इस का ज़िक्र कहाँ है कहते हैं कि रास्ते पर एक कुत्ता मरा पड़ा था राहगीर बच कर निकल जाते। और तरह तरह से उस पर अपनी नफ़रत ज़ाहिर करते थे कोई तो उसकी टेढ़ी दुम पर लतीफ़ा कहता था। कोई उसके बोचे (कटे हुए कान) कानों पर हँसता था। कोई उसकी आवाज़ पर और कोई उस के ऐन सड़क पर मरने पर कहता था, कि वो कुत्ते की मौत मरा। इस अस्ना (दौरान) में एक मर्द-ए-ख़ुदा का गुज़र हुआ। कुत्ते को देखकर और लोगों के लताइफ़ व ज़राइफ़ (ठट्ठा मज़ाक़) सुन कर बोला, देखो तो उस के दाँतों पर मोती की सी आब (चमक) है लोग देखने लगे, ये कौन शख़्स था। क्योंकि वो इतना कह कर चल दिया आख़िर किसी ने सोच कर कहा ये ज़रूर यसूअ नासरी था क्योंकि एसी हक़ीर शैय में ऐसी ख़ूबी दर्याफ़्त करना उसी का काम है, था।

आम तौर पर ये लोगों की आदत में दाख़िल हो गया है कि ऐबों पर ज़्यादा ज़ोर देते, और हुनरों (ख़ूबीयों) से चश्मपोशी (नज़र अंदाज़ी) करते हैं और यूं मुख़ालिफ़त बढ़ती है पर अगर बर-ख़िलाफ़ इसके ऐबों से चश्मपोशी की जाये। और हुनरों पर नज़र डाली जाये तो दोस्ती व मुवाफ़क़त-ए-बाहमी ज़रूर बढ़ जाये। हम अपने ईसाई भाईयों के दर्मियान भी देखते हैं कि वो सैंकड़ों फ़िर्क़ों में मुनक़सिम हैं फ़िर्क़ों में मुनक़सिम होना कोई ऐब नहीं, बल्कि तबीयत की आज़ादी व खुद मुख़तारी के लिए लाज़िमी है। हर शख़्स का फ़र्ज़ है कि अपने ज़मीर को बेलौस (ख़ालिस, बेग़र्ज़) रखे और जिस शैय को मुनासिब व हक़ और ख़ुदा की मर्ज़ी के मुवाफ़िक़ जानता है, उसको क़ुबूल करे। मगर फ़िर्क़ों में मुनक़सिम होने के लिए बाहमी मुख़ालिफ़त कोई लाज़िमी बात नहीं। हम मुख़ालिफ़ हो कर भी मुवाफ़िक़ हो सकते हैं। इख़्तिलाफ़ के साथ एक दूसरे को इत्तिफ़ाक़ का दहना हाथ दे सकते हैं हमारे इख़्तिलाफ़ बड़े हैं और बहुत ज़्यादा हैं और अहम तर हैं अगर हम हमेशा इख़्तिलाफ़ात की तरफ़ अपनी नज़र ना रखें, बल्कि ज़्यादा तर इत्तिफ़ाक़ को देखें तो आपस में हम ख़िदमत हो जाना हमारे लिए कोई मुश्किल अम्र नहीं।

हम देखते हैं कि दुनिया के फ़र्ज़न्द नूर के फ़रज़न्दों से ज़्यादा अक़्लमंद होते हैं फ़रीसी और सदूक़ी बाहम सख़्त इख़्तिलाफ़ रखते थे, मगर वो भी जब किसी मुख़ालिफ़ मुश्तर्क का सामना करते थे, तो मिल जाते और उन बातों को देखते थे जिनमें उनका इत्तिफ़ाक़ था। चुनान्चे उन्हों ने अक्सर ऐसे पहलू से मिलकर हमारे ख़ुदावंद की मुख़ालिफ़त की। अफ़्सोस कि हम साँपों से होशयारी नहीं सीखते और ऐसा नहीं कर सकते और अगर कर सकते हैं तो करते नहीं। ईसाईयों का हर फ़िर्क़ा चाहता है कि ख़ुदावंद की ख़िदमत करे। इन्जील की बशारत दे मगर अलग अलग मिल जुल कर काम नहीं करते मिलना उनका शाज़ोनादर होता है। क्या ख़ूब होता कि हम सब लोग मिल जाते और ग़ौर से देखते कि कौन से काम हैं जिनको हम सब मिलकर एक साथ कर सकते हैं उन्ही को करें “तीन लड़ी रस्सी मुश्किल से टूटती है।” मुख़्तलिफ़ मसीही फ़िर्क़ों के शरीक अक्सर समझते हैं कि हमने मसीही फ़ज़्ल का इजारा (ठेका) ले लिया है। जो लोग हमारे बीच में हैं और हमारी तरह ख़याल करते हैं वही सच्चे ईसाई हो सकते हैं। उनका मक़्सूद (इरादा) अक्सर ये होता है कि वो मसीही फ़ज़्ल और ईस्वी नेअमतों को अपने तंग फ़िर्क़े के नाम रजिस्ट्री करा लें और आम इश्तिहार दें कि अगर कोई क़िस्म का मसीही फ़ज़्ल जो हमारे यहां से हासिल ना हुआ हो कहीं मिले तो वो जाली व मसनूई है। इस में तास्सुब (बेजा हिमायत) की बू आती है। तंग ख़याली के आसार नज़र आते हैं। इस क़िस्म की रूह की मसीह ने ख़ुद मज़म्मत की है मसीह के शागिर्दों में भी किसी वक़्त ये रूह थी। उन्हों ने शिकायत अपने उस्ताद से की, “ऐ ख़ुदावंद हमने एक को देखा कि वो तेरे नाम से बद रूहों को निकालता है, मगर हमारे साथ नहीं चलता। हमने उस को मना किया मगर वो नहीं माना। तेरे नाम से बदरूहों को निकालता है। यानी तेरा नाम भी लेता है, और तेरे नाम की तासीर भी उस में मौजूद है। हत्ता कि मोअजज़े भी करता है, यानी फल लाता है, मगर हमारे साथ नहीं चलता। हमने अपना एक फ़िर्क़ा मुक़र्रर कर लिया है, और हम यूं सोचा करते हैं। और इस के इज़्हार के लिए फ़ुलां व फ़ुलां अल्फ़ाज़ मुअईन कर लिए हैं, पर वो हमारे साथ नहीं चलता। सिर्फ तेरे नाम से काम करता है। यानी हम फ़िर्क़ा वाले हैं, वो फ़िर्क़ा वाला नहीं। हमने उसे काम करने से और तेरा नाम लेने से इसलिए मना नहीं किया, कि हम तेरे नाम या उस के काम से नाराज़ हैं। बल्कि हम ये नहीं चाहते, कि तेरा नाम और तेरा काम हमारे फ़िर्क़े के बाहर लिया जाये। हम तेरे नाम और तेरे काम को पेटैंट (रजिस्ट्री शुदा) कराना चाहते हैं। पर वो कब मानता है। उस ने ग़ालिबन यही कहा होगा, कि मुझे मसीह के नाम से और उस के काम से ग़र्ज़ है, फ़िर्क़े से ग़र्ज़ नहीं। मैं बे फ़िर्क़े वाला हूँ ना मानूँगा। मसीह ने भी उस की तरफ़-दारी की, और फ़रमाया उसे मना मत करो। तुम अपने फ़िर्क़े में बने रहो। उसे जहां है बने रहने दो। पर तुम और वो हम-ख़िदमत हो जाओ। ज़रूर नहीं कि जो तुम्हारे फ़िर्क़े में नहीं, वो मेरा मुख़ालिफ़ हो। और उस की मुज़ाहमत की जाये। मसीह के इस फ़तवे पर हम लोग कुछ कम ग़ौर करते हैं। हालाँकि यही बड़ी ज़रूरी बात है। कोई सरदार काहिन बनना चाहता है, कोई लावी, कोई फ़रीसी, कोई यहूदी, कोई यूनानी, मसीह चाहता है कि सब नेक सामरी बन जाएं।

हिन्दुस्तान में बहुत से मुक़द्दसों के नामों पर गिरजों की तक़्दीस की गई है। लावियों के गिरजे बहुत हैं, काहिनों के बहुत, मगर कहीं कोई गिरजा मुक़द्दस सामरी के नाम का नज़र नहीं आता। जहां खिराजगीर (खिराज देने वाले) देस निकाले जिलावतन सामरी आकर इबादत करें।

काश के हमारे नौजवान मरे कुत्ते की दुम की कम मज़म्मत करते, और उस के दाँतों की आब को देखते। उस की बुरी आवाज़ पर कम ख़याल करते, और उस की वफ़ादारी पर ध्यान करते। और कम देखते, कि फ़ुलां शख़्स हमारे साथ नहीं चलता। और देखते कि क्योंकर वो मसीह के नाम से बदरूहों को निकालता है। लावीयाना नज़र को सामरियाना नज़र से बदल डालते। और गिरे हुए को उठाने के लिए सब मिलकर हाथ देते। जिन बातों में तुम दूसरों से मुख़्तलिफ़ हो, अगर अपने इख़्तिलाफ़ात ज़रूरी समझते हो, तो उन को पकड़े रहो। मगर बाहम हम ख़िदमत होने के लिए देखो किन बातों में तुम मुत्तफ़िक़ हो। अगर कोई इस पर ग़ौर करेगा तो इत्तिफ़ाक़ व इत्तिहाद की हज़ारों बातें पाएगा। और उस को इख़्तिलाफ़ ज़रा सा दिखाई देगा।

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