The Poetic Sections of the
Holy Scriptures
Namely,
Job, Psalms, Proverbs, Ecclesiastes, and Song of Songs
Reverend T.L. Scott, D.D.
This was organized by Reverend T.L. Scott, D.D., in 1924 for students,
seminaries, Christian teachers, preachers, and students of the Holy Scriptures.
Published by Master Ghaznfar B.A., Owner and Manager of Khurshid Press,
Gujranwala.
पाक कलाम के मंज़ूमी हिस्से
या’नी
अय्यूब, ज़बूर, अम्साल, वाइज़ और ग़ज़ल-उल-ग़ज़लात
का दीबाचा
जिल्द दुव्वम
जिसको पादरी टी॰ एल॰ स्कॉट डी॰ डी॰ ने तलबा सेमिनरी मसीही उस्तादों, मुनादों और
कलाम पाक के तालिब-ए-इल्मों के लिए 1924 ई॰ में एहतिमाम मास्टर ग़ज़नफ़र बी॰ ए॰
अलीग मालिक व मैनेजर ख़ुर्शीद प्रैस गुजरांवाला तबा शुद।
पाक कलाम का मंज़ूमी हिस्सा
बाइबल एक निहायत ही अजीब किताब है। क्योंकि ये सब दीनी व दुनियावी उलूम का सरचश्मा है। और इन्सान की रुहानी और जिस्मानी ज़िंदगी की ख़ूबी, उम्दगी और मुबारक-हाली इस पर मबनी है। चुनान्चे (2 तीमुथियुस 3:16–17) में मरक़ूम है कि, “हर एक सहीफ़ा जो कि ख़ुदा के इल्हाम से है, ता’लीम और इस्लाह और रास्तबाज़ी में तर्बियत करने के लिए फ़ाइदेमंद भी है, ताकि मर्द-ए-ख़ुदा कामिल बने और हर एक नेक काम के लिए तैयार हो जाए।” लिहाज़ा, इस किताब का ख़ास मक़्सद इन्सान की निस्बत ये है कि वो ख़ुदा को पहचाने और उसकी मर्ज़ी से वाक़िफ़ होकर उसको अपनी मर्ज़ी में पूरा करे और दूसरों में भी उसे पूरा करने की कोशिश करे। इसलिए ख़ुदावन्द मसीह ने जो कि इन्सान का नजात देने वाला और कामिल करने वाला है, बा’ज़ को रसूल और बा’ज़ को नबी और बा’ज़ को मुबश्शिर और बा’ज़ को चरवाहे और बा’ज़ को उस्ताद बना कर दे दिया है, ताकि मुक़द्दस लोग कामिल बनें और ख़िदमतगुज़ारी का काम किया जाए, और मसीह का बदन या’नी कलीसिया तरक़्क़ी पाए, जब तक हम सब के सब ख़ुदा के बेटे के ईमान और उसकी पहचान में एक न हो जाएँ और कामिल इन्सान न बनें, या’नी मसीह के पूरे अंदाज़े के क़द तक न पहुँच सकें।
जबकि ख़ुदा ने अपनी अजीब मुहब्बत के सबब से हमारी ही ख़ातिर ये सब कुछ किया, तो लाज़िम है कि हम इन सब बातों पर ख़ूब ग़ौर करें ताकि हम किसी बात में नाक़िस न रहें, बल्कि ख़ुदा की मर्ज़ी को पूरे तौर पर समझें और इस तरह उसके मक़्सद को पूरा करें।
बाब अव़्वल
पाक कलाम के नज़मी हिस्से के बयान में
सवाल नंबर 1: पाक कलाम के नज़मी हिस्से की तश्रीह करो।
जवाब: किताब-ए-मुक़द्दस के नज़मी हिस्से में पाँच किताबें पाई जाती हैं, या’नी अय्यूब, ज़बूर, अम्साल, वाइज़ और ग़ज़ल-उल-ग़ज़लात। ये पाँच किताबें, जिनको यहूदियों ने (पेंटाट्यूक), जो मूसा की पाँच किताबों की मानिंद हैं, ख़ुदा का मक़्सद इन्सान के बारे में सिलसिले-वार पेश करती हैं। यहूदी इस नज़मी हिस्से को ‘खोकमा’, या’नी दानाई का मजमू’आ भी कहते थे। और इस हिस्से में दो ख़ासियतें पाई जाती हैं:
अव्वल: वो दानाई जो इन किताबों में पाई जाती है, कामिल होने के सबब से ला-तब्दील और पायदार है। इन्सानी उलूम की तब्दीली अक्सर हुआ करती है और हो जाती भी हैं, क्योंकि वो दर-हक़ीक़त नाक़िस और ना-तमाम हैं। लेकिन वो इल्म या दानाई जो ख़ुदा की तरफ़ से है, वो इल्म हर ज़माने के लोगों के लिए मुफ़ीद और कारगर है, क्योंकि वो दाइमी है।
(याक़ूब 3:17) में इस दानाई की यूँ तारीफ़ की गई है: “मगर जो हिक्मत ऊपर से आती है, अव्वल तो वो पाक होती है, फिर मिलनसार, हलीम और तरबियत-पज़ीर, रहम और अच्छे फलों से लदी हुई, बे-तरफ़दार और बे-रिया होती है।” ख़ुदा का ख़ौफ़ इस दानाई का शुरू है। और वो ख़ुदावन्द येसू मसीह में तक्मील पाती है। जो इस दानाई के हुसूल में मसरूफ़ रहता है, वो कभी शर्मिंदा न होगा।
दुव्वम: इन किताबों की ख़ास निस्बत तौरेत और सहाइफ़-ए-अम्बिया की तरह क़ौमों से नहीं, बल्कि ये शख़्सी हैं। और उनकी ग़र्ज़ ये है कि हर एक शख़्स की ज़िंदगी ऐसी आरास्ता की जाए कि वो ख़ुदा और आदमियों के नज़दीक मक़बूल और पसंदीदा ठहरे, नीज़ कि वो मक़बूलियत में तरक़्क़ी करता जाए। लाज़िम है कि हम इन पाँच किताबों से इस मक़बूलियत में और तरक़्क़ी करता जाए। लाज़िम है कि हम इन पाँच किताबों से इस मक़बूलियत और तरक़्क़ी का तरीक़ा सीखें। और उन किताबों पर अलग-अलग ऐसा ग़ौर करें कि उनका असर हमारी ज़िंदगी पर हो, कि हम ख़ुदा और इन्सान के नज़दीक मक़बूलियत में तरक़्क़ी करते जाएँ ताकि हम कामिल इन्सान, या’नी मसीह के पूरे क़द तक, पहुँच जाएँ।
सवाल 2: इन पाँच किताबों का ख़ुलासा अलग-अलग बयान करें।
जवाब: इन पाँच (किताबों) का मक़्सद दर्याफ़्त करने और इनकी हिदायत करने और तरक़्क़ी से फ़ायदा उठाने के लिए ज़रूरी है कि बा-सिलसिला इनकी ता’लीम का मुतालआ करें, या’नी उस ता’लीम का, जो कि रूह-उल-क़ुद्स हमको सिखाना चाहता है।
अय्यूब की किताब का ख़ुलासा
ये ज़्यादा मुफ़ीद और अंसब (ज़्यादा मुनासिब) मालूम होता है कि कलाम-ए-मुक़द्दस के इस हिस्से का मुतालआ अय्यूब की किताब से शुरू किया जाए। क्योंकि ये किताब दिखाती है कि ख़ुदा कुल आलम का मुंतज़िम (इन्तिज़ाम करने वाला) है और उसकी इन्सान से एक ख़ास निस्बत है, और कि वो नेकोकारों का शामिल-ए-हाल होकर उनकी हिफ़ाज़त करता और उनके वास्ते बरकतों का बानी है। अय्यूब की किताब सिर्फ़ ख़ुदा ही का नहीं, बल्कि एक और हस्ती का भी ज़िक्र करती है, जो कि दुनिया का मुंतज़िम (इन्तिज़ाम करने वाली) होने का दावा करती है। और वो है शैतान, जो कि बनी-अल्लाह (ख़ुदा के फ़रज़न्दों) के दरमियान आकर ख़ुदावन्द के हुज़ूर हाज़िर हुआ। और ख़ुदावन्द ने उससे पूछा कि, “तू कहाँ से आया है?” तो उसने जवाब दिया कि, “मैं ज़मीन पर इधर-उधर से सैर करके आया हूँ।”
इस तरह ये किताब दुनिया के दो मुंतज़िमों (इन्तिज़ाम करने वालों) के माबैन ना-इत्तिफ़ाक़ी का ज़िक्र करती है, और चूँकि ख़ुदा अकेला क़ादिर-ए-मुतलक़ है, शैतान को उसके ज़ेरे हुकूमत रहना पड़ता है। तो भी वो हत्ता-अल-मकान (पूरी कोशिश करके) इन्सान को बिगाड़ कर उसमें ख़ुदा की निस्बत मुख़ालिफ़त पैदा करता है। ये किताब इस जंग मुक़द्दस की वजह बताती है, जिसके बा’इस इन्सानों में नाचाक़ी हो जाती है और वे अबतरी की हालत में पड़ जाते हैं। पैदाइश के तीसरे बाब में मुन्दरज है कि शैतान ने साँप की शक्ल इख़्तियार करके अपना काम दुनिया में शुरू किया, और अगरचे ख़ुदा ने उसी वक़्त उसे ज़लील कर दिया, तो भी वो अपना काम अब तक जारी रखे हुए है और क़दरे कामयाब भी है। इस किताब का ख़ास मक़्सद ये मालूम होता है कि इन्सान को ख़ुदा की निस्बत उसके फ़राइज़ से वाक़िफ़ करा दे, या’नी अगर वो ख़ुदा के मन्सूबों से रिहाई पा कर रुहानी और जिस्मानी बरकात से माला-माल किया जाएगा। लिहाज़ा, ये किताब एक शख़्स बनाम अय्यूब की ज़िंदगी हमारे सामने ला कर ये साबित करती है कि इन्सान अपनी मख़्सूस ज़िंदगी से मक़बूलियत हासिल कर सकता है, और कि वो अपनी दु’आ और शिफ़ारिश से औरों के लिए मु’आफ़ी और बरकत का बा’इस ठहर सकता है।
(2)
ज़बूर की किताब का ख़ुलासा
अय्यूब अगरचे ख़ुदा की ता’ज़ीम करता और अपने आपको वफ़ादार ज़ाहिर करता था, तो भी इस बात से नावाक़िफ़ मालूम होता है कि ख़ुदा के हुज़ूर उसकी रसाई क्योंकर हो सकती थी? चुनान्चे (अय्यूब 23:3) में पुकारता है कि, “काश कि मैं जानता हूँ कि वो मुझको कहाँ मिल सकता है, तो मैं उसकी मस्नद (तख़्त) तक जाता।” ज़बूर की किताब इस बात को हल करती और बताती है कि हमारी रसाई उसके हुज़ूर किस तरह हो सकती है? अय्यूब ने ख़याल किया कि ख़ुदा दूर है और इन्सान की हालत से नावाक़िफ़ है, लेकिन ज़बूर की किताब ख़ुदा को नज़दीक ज़ाहिर करती है, और बताती है कि ख़ुदावन्द, या’नी यहोवा, सादिक़ों की राह जानता है, पर शरीरों की राह वो नेस्त-ओ-नाबूद (बर्बाद) करता है। वो न सिर्फ़ जानता, बल्कि उस पर ज़ाहिर करता है। लेकिन ज़बूर की किताब न सिर्फ़ राह ही दिखाती है, बल्कि हमको ख़ुदा के हुज़ूर ले जा पहुँचती है, क्योंकि वो इलूहीम को यहोवा की हैसियत में पेश करके बताती है कि वो अपने घर में सुकूनत करता है, और हम भी उसके साथ सुकूनत कर सकते हैं। ये किताब सिर्फ़ यहोवा ही को पेश नहीं करती, बल्कि उसकी सिफ़ात को भी ऐसे ही तरीक़े से पेश करती है कि हम उनसे मुतास्सिर होकर न सिर्फ़ ख़ुद ही उसकी परस्तिश करते हैं, बल्कि औरों को भी इसकी तर्ग़ीब देते हैं। ये किताब न सिर्फ़ ख़ुदावन्द की हम्द के फ़राइज़ और तरीक़े सिखलाती है, बल्कि रूह-उल-क़ुद्स की तरफ़ से हम्द का एक मुक़र्रर कर्दा और सही तरीक़ा है, जिसमें किसी क़िस्म का नुक़्स मुतल्लिक़न (बिलकुल भी) नहीं पाया जाता। ये किताब हमको आवारागर्दी में नहीं छोड़ती, बल्कि राह-ए-रास्त पर लाकर हमारी रहबरी करती है।
(3)
सुलेमान की अम्साल का ख़ुलासा
अय्यूब और ज़बूर की ता’लीम के अलावा ख़ुदा की हुज़ूरी में रसाई हासिल करने के लिए एक और बात की भी ज़रूरत है, और वो ज़रूरी बात अम्साल की किताब में है कि निहायत ही लाज़िम और वाजिब है कि हमारा सुलूक अपने हम-जिंसों के साथ बिल्कुल ठीक और दुरुस्त हो। क्योंकि तावक़्त इन्सान अपने हम-जिंसों के हुक़ूक़ पूरे तौर पर अदा न करे, वो हरगिज़ ख़ुदा की रजामंदी किसी तौर पर हासिल नहीं कर सकता। चुनान्चे अम्साल की किताब का ख़ास मतलब ये मालूम होता है कि ज़ाहिर करे कि दानाई का इस्तिमाल क्योंकर किया जाए ताकि हमको वो दीनदारी हासिल हो जो कि ख़ुदा-बाप के आगे पाक और बे-ऐब है, और हमको वो ताक़त नसीब हो कि हम इस शरीर के सारे जलते तीरों को बुझा कर क़ायम रहें, और रास्त-गोई और रास्तबाज़ी की सब बातों को अमल में ला कर उस रास्ती के शहज़ादे के पैरौ (पैरोकार) हो जाएँ जिसका ज़िक्र इस किताब में है।
(4)
वाइज़ की किताब का ख़ुलासा
मह्ज़ रास्तबाज़ बनना ही इन्सान की बहबूदी और मुबारक-हाली के वास्ते काफ़ी नहीं, क्योंकि ये उस पर फ़र्ज़ है। लिहाज़ा वाइज़ की किताब यह ज़ाहिर करती है कि लाज़िम-ओ-मल्ज़ूम (ज़रूरी और लाज़मी) है कि वो दुनिया की बतालत पर दिल न लगाए, बल्कि दानाई की पैरवी करके अपने आपको दुनिया से बेदाग़ बचा रखे, और इस ग़र्ज़ के लिए चंद एक मुफ़ीद बातें पेश करती और ज़ाहिर करती है कि ख़ुदावन्द सिर्फ़ हर एक फ़े’ल (काम, अमल) को, बल्कि उसके साथ हर एक पोशीदा चीज़, ख़्वाह भली हो या बुरी, अदालत में लाएगा। सो लाज़िम है कि इन्सान न सिर्फ़ फ़े’लन (अमल) और क़ौलन (बातों) रास्त बने, बल्कि उसके दिल की हालत ठीक हो और उसमें एक फ़रमांरवा ताक़त क़ियाम पकड़े जिससे कि वो मग़्लूब हो।
(5)
ग़ज़ल-उल-ग़ज़लात का ख़ुलासा
यह किताब वो ताक़त पेश करती है और वो मुहब्बत है जो कि ब-मूजिब इस किताब के कमाल का कमरबंद है। इसकी तश्रीह पौलूस रसूल ने (1 कुरिन्थियों के तेरहवें बाब में) की है, और वो ताकीद करता है कि मुहब्बत का पीछा करो क्योंकि वो सबसे बढ़कर है। इस मुहब्बत से इन्सान ख़्वाहिशात-ए-जिस्मानी और ऐश-ओ-इशरत-ए-दुनियावी से बिल्कुल लापरवाह होकर सिर्फ़ उसी का फ़रेफ़्ता होकर उसी की ख़िदमत में मसरूफ़ रहता है, जिसने गुनाह-आलूदा इन्सान को अपना ख़ून देकर ख़रीद लिया है और मुक़द्दस बना कर ख़रीद लिया है, और उसको मुक़द्दस और बे-ऐब बना कर बाप के हुज़ूर में पहुँचा देता है। हासिल-ए-कलाम, अय्यूब की किताब एक ऐसे शख़्स का ज़िक्र करती है, जो कि शैतान का सताया हुआ है, और अगरचे वो ख़ुदा पर भरोसा रखता था और उससे मदद पाने के तरीक़े भी जानता था, तो भी उसका दिल बेचैन रहता है। ज़बूर की किताब आर्ज़ूमंद शख़्स पर ख़ुदा को ज़ाहिर करती और उसकी हुज़ूरी में रसाई हासिल करने के तरीक़े उसको बताती है, और इस तरह उसको मायूसी और बेचैनी से महफ़ूज़ रखती और उसके दिल को ख़ुशी और हम्द से भरती है। अम्साल की किताब बताती है कि जो शख़्स ख़ुदा की रजामंदी हासिल करता है, उसकी सीरत कैसी होनी चाहिए? या’नी कि उसका सुलूक अपने हम-जिंसों से नेक होना चाहिए।
वाइज़ की किताब उस शख़्स की निस्बत यह बताती है कि उसके वास्ते अशद ज़रूरी है कि वो ख़ुद को दुनिया की लुभाने वाली बातों (लालच, वरग़लाना) से महफ़ूज़ रखे और नेकी में मसरूफ़ रहे। ग़ज़ल-उल-ग़ज़लात की किताब बताती है कि ऐसे शख़्स को ख़ुदा की मुहब्बत की मजबूरी से ख़ुदा के साथ वफ़ादारी और अपने हम-जिंसों के साथ हम्दर्दी में क़ायम रहना चाहिए।
दूसरा बाबअय्यूब की किताब के बयान में
सवाल नंबर 3: अय्यूब की किताब के मुसन्निफ़ और इसकी क़दामत की निस्बत कौन से ख़यालात पेश किए जाते हैं?
जवाब: मुसन्निफ़ की निस्बत तीन ख़याल हैं:
अव्वल: कि इस किताब के वाक़ि’आत, जो कि हक़ीक़ी हैं, मूसा के अय्याम तक रिवायती तौर पर चले आए, जिनको उसने मुल्हिम (इल्हाम किया गया, वो शख़्स जिसके दिल में ग़ैब से कोई बात पड़े) होकर क़लमबंद किया, और ये ख़याल ज़्यादा मो’अतबर समझा जाता है।
दुव्वम: कि इस किताब का मुसन्निफ़ सुलेमान है और इसके वाक़ि’आत सब के सब बनावटी हैं।
सोयम: कि किसी नामालूम मुसन्निफ़ ने यहूदियों की सत्तर (70) साला असीरी (ग़ुलामी) के बाद इसको तस्नीफ़ किया। यह ख़याल हायर क्रिटिक्स (तन्क़ीद) से पेश किया जाता है और बिल्कुल बे-बुनियाद है।
इस किताब की निस्बत ज़ैल के ख़यालात पेश किए जाते हैं:
अव्वल: अय्यूब दर-हक़ीक़त बुज़ुर्गों, या’नी पैट्रिआर्क्स (आबा), के ज़माने में था, क्योंकि उसके सब वाक़ि’आत और दस्तूरात उसी ज़माने पर दलालत करते हैं। मसलन:
(अ) अय्यूब की दराज़ ज़िंदगी (अय्यूब 1:4-5, 42:16-17), आयत से मालूम होता है कि उसकी उम्र बहुत दराज़ थी। चुनान्चे, जब शैतान ने उसकी आज़माइश शुरू की, इस वक़्त उसके चार बेटे और तीन बेटियाँ थीं, जो कि अपने-अपने घरों में रहते थे। फिर उसकी आज़माइश के बाद दोबारा उसके हाँ सात बेटे और तीन बेटियाँ पैदा हुईं, जिनमें उसने अपनी जायदाद तक़्सीम की और बाद में भी एक सौ चालीस (140) बरस जीता रहा। उसने अपने बेटे और बेटों के बेटे चार पुश्तों तक देखे और बूढ़ा और उम्र-रसीदा होकर मर गया। इब्राहीम की उम्र (175) बरस और उसके बाप तारा की उम्र सिर्फ़ दो सौ पाँच (205) बरस थी। सो, अगर उम्र की दराज़ी का ख़याल किया जाए, तो अय्यूब तारा का हम-ज़माना मालूम होता है।
(ब): अय्यूब की दौलत की फ़रावानी का अंदाज़ा उसके माल-मवेशी की फ़रावानी से भी किया जाता है, जैसा कि बुज़ुर्गान-ए-सलफ़ के वक़्त दस्तूर था।
(ज): बुज़ुर्गान-ए-सलफ़ की इबादत का तरीक़ा अय्यूब के वक़्त में राइज था, मतलब कि बाप ही सारे ख़ानदान का काहिन होकर अपने घराने के लिए क़ुर्बानियाँ गुज़ारता और दु’आ माँगता था (अय्यूब 1:5)।
(द): अय्यूब के वक़्त में बुत-परस्ती भी ज़्यादा क़दीम तरीक़ों पर होती थी। (अय्यूब 31:26-28) आयत से साफ़ ज़ाहिर है कि लोग अजराम-ए-फ़लक की परस्तिश करते थे।
(र): इस किताब की क़दामत ज़माना-ए-हाल की हक़ीक़त और मालूमात से भी पाया-ए-सुबूत को पहुँचती है। इसके मो’अतरज़ीन ने कई एक बातों की बुनियाद पर दा’वे किए हैं कि यह किताब क़दीम नहीं थी, बल्कि किसी बाद के ज़माने में तस्नीफ़ हुई, क्योंकि ज़माना-ए-सलफ़ (बुज़ुर्गों का ज़माना) में इल्म-ए-हैयत को इस क़द्र तरक़्क़ी और फ़रोग़ न था जिस क़द्र कि इस किताब में दिखाया गया है। लेकिन ज़माना-ए-हाल की जुस्तजू और तहक़ीक़ ने इस एतराज़ की ख़ूब तर्दीद की है। चुनान्चे, अस्सूर की क़दीमी तख़्तियों से, जो कि इन पुराने शहरों के खंडरात से निकली हैं, साबित कर दिखाया है कि फ़िल-वाक़ेअ उस ज़माने में ऐसी ही तरक़्क़ी थी। अस्सूर की क़दीमी तख़्तियाँ तीन हज़ार क़ब्ल-अज़-मसीह की हैं। अक्सर लोग इस बात पर लिहाज़ नहीं करते कि ख़ुदा ने शुरू में ही इन्सान को कामिल पैदा किया, लेकिन बर्गश्तगी के सबब उसकी क़ाबिलियत और उसका इल्म उससे जाता रहा, यहाँ तक कि वो रफ़्ता-रफ़्ता इल्म-ओ-कमाल के लिहाज़ से ज़माना-ए-तारीकी तक जा पहुँचा।
चुनान्चे, हम जिस क़द्र ज़माना-ए-आदम या’नी इब्तिदाई ज़माने का मुतालआ करते हैं, तो मालूम होता है कि वो ज़माना दानाई और इल्म में क़ाबिल-ए-तारीफ़ था। मो’अतरज़ीन का एक और एतराज़ यह है कि क़दीम ज़माने में ऊर के लोग ऐसे जानवरों के नाम से वाक़िफ़ न थे, जिनका ज़िक्र इस किताब में हुआ है, क्योंकि वो जानवर उस वक़्त इस मुल्क में नहीं पाए जाते थे। यह एतराज़ भी इन क़दीम लौहों की वजह से ही रद्द किया गया, क्योंकि इन तख़्तियों पर इन जानवरों के अलावा दरियाई घोड़े की, जो कि मिस्र का जानवर है, तस्वीरें कुंदा हैं। सो, यह वाज़ेह है कि ऊर के लोग मिस्र से भी रिवाज व रस्म रखते थे, क्योंकि मिस्री अरबिया पेट्रिया में जाते थे कि उसकी कानों से मिस्र की मशहूर और आलीशान इमारतों के वास्ते पत्थर लाएँ, और उनमें अक्सरों ने वहाँ सुकूनत-गाह इख़्तियार कर ली। कल्दी लोग भी मिस्र में जाते थे। चुनान्चे, जब इब्राहीम कल्दी से आकर मुल्क-ए-कनआन में बूद-ओ-बाश करने लगा, तो वो फ़ौरन क़हत से तंग आकर मिस्र में गया और कुछ अर्से तक उसी जगह में मुक़ीम रहा। इससे ज़ाहिर है कि इन ममालिक में ज़रूर आपस में रस्म व रिवाज थे।
मो’अतरज़ीन का सिर्फ एक ही और एतराज़ पेश होगा, और वो यह है कि ज़माना-ए-क़दीम में डाकू न थे। लेकिन यह एतराज़ कलाम पाक से ही तर्दीद पाता है। बाइबल से मालूम होता है कि ख़ानाबदोश अक़्वाम नमरूद के ज़माने से शुरू हुईं, और नमरूद बादशाह ने ख़ुद ऐसा काम किया कि जब कि उसने अपनी हुकूमत को नैनवा तक वुसअत दी। नीज़, इब्राहीम ने लूत को लुटेरी और क़ज़्ज़ाक़ (डाकू) क़ौम से बचाया।
सवाल नंबर 4: सर-ज़मीन ऊर, या’नी अय्यूब की जाए-रिहाइश का महल-ए-वक़ूअ बताएँ और बयान करें कि उसका नाम ऊर क्यों पड़ गया?
जवाब: वो सर-ज़मीन जो कि बहर-ए-लूत और बहर-ए-कुल्जुम के दरमियान वाक़ेअ है, ऊर का एक हिस्सा थी, और अय्यूब ख़ास उस जगह मुक़ीम था। और जब ऐसो ने यह सर-ज़मीन आबाद की, उसका नाम अदूम पड़ गया और आख़िरकार अरबिया पेट्रिया के नाम से मशहूर हो गई। मालूम होता है कि वो इस सबब से ऊर कहलाई कि ऊर की नस्ल वहाँ रहती थी, लेकिन यह तहक़ीक़ मालूम नहीं कि वो ऊर कौन था। पाक कलाम में इस नाम के तीन लोग हैं:
(1) ऊर बिन आराम बिन सीम (पैदाइश 10:23)।
(2) ऊर बिन नाहोर बिन तारा था, जो कि इब्राहीम का भाई था (पैदाइश 22:20-21)।
(3) ऊर बिन दिसान, जो कि ख़ानदान ऐसो में था (पैदाइश 36:28)।
लोग अक्सर ऊर बिन नाहोर बिन तारा को इस सर-ज़मीन का आबाद करने वाला मानते हैं। लेकिन यह ख़याल कि वो भी ऊर बिन दिसान था, बग़ैर सुबूत नहीं, क्योंकि इस मुल्क की आबादी ज़्यादातर इब्राहीम की नस्ल से थी। चुनान्चे, अय्यूब के दोस्त जो कि उसके पास आए, इब्राहीम की नस्ल से मालूम पड़ते हैं। मसलन, एलीफ़ज़ तेमानी अदूमी था (यिर्मयाह 49:7, 10, और हिज़्क़ीएल 25:13, और आमोस 1:11-12, और नौहा-ए-यिर्मयाह 4:21) से मालूम होता है कि अदूमी लोग ऊर की सर-ज़मीन में रहते थे। बलदाद सूखी इब्राहीम की नस्ल से था, जो कि कतूरा से थी (पैदाइश 25:1-2)।
मुम्किन है कि नाहोर की औलाद भी इस मुल्क में आबाद हो।
सवाल नंबर 5: अय्यूब की निस्बत और अय्यूब की किताब के वाक़ि’आत की निस्बत कौन से वाक़ि’आत बयान किए जाते हैं, और किस तरह साबित है कि यह किताब फ़िल-वाक़ेअ एक तवारीख़ी किताब है?
जवाब: इस किताब की निस्बत मुफ़स्सिरीन तीन मुख़्तलिफ़ ख़यालात पेश करते हैं: कि अय्यूब एक फ़र्ज़ी शख़्स नहीं है, बल्कि हक़ीक़तन एक शख़्स था और उसकी किताब के सब वाक़ि’आत भी असली और यक़ीनी हैं।
कि अगरचे यह किताब तवारीख़ी है और इसके तमाम वाक़ि’आत हक़ीक़ी हैं, तो भी उसका बहस-ओ-मुबाहिसा उसी मौक़े पर, जिसका ज़िक्र किताब में हुआ है, इन किताबी अश्ख़ास के दरम्यान वाक़ेअ न हुआ, बल्कि किसी नबी की तरफ़ से ता’लीम व इबरत के लिए मुबाहिसे की सूरत में तस्नीफ़ हुआ।
कि अय्यूब एक फ़र्ज़ी शख़्स था और किताब के सब वाक़ि’आत बनावटी और तम्सीलें हैं। लेकिन जब इन वाक़ि’आत पर बा-नज़र-ए-अमीक़ (बारीकी से) ग़ौर किया जाता है, तो ख़्वामख़ाह यह बात ज़हन में आती है कि ये वाक़ि’आत बनावटी नहीं हैं, बल्कि एक हक़ीक़ी रास्तबाज़ और ख़ुदा-परस्त शख़्स की ज़िंदगी का अहवाल है जिस पर शैतान ने हमला किया। लिहाज़ा, मुल्हिम (जिसको इल्हाम मिला) मुसव्विर के हाथ से उन अश्ख़ास की, जिन्होंने अपनी ज़िंदगियां ख़ुदा के लिए मख़्सूस कीं और उसी की मर्ज़ी के मातहत हैं, तस्वीर है। शैतान का हमला अक्सर ऐसे ही अश्ख़ास पर होता है। अलावा अज़ीं, जब शैतान ख़ुदा के हुज़ूर हुआ, तो ख़ुदा ने उससे पूछा कि, “तूने मेरे बंदे अय्यूब के हाल पर ग़ौर किया कि ज़मीन पर उस-सा कोई शख़्स नहीं? वो कामिल और सादिक़ है, वो ख़ुदा से डरता और बदी से दूर रहता है।” मुम्किन नहीं कि ख़ुदा किसी फ़र्ज़ी शख़्स की बाबत ऐसा कहे। नीज़, शैतान ने उसकी हस्ती और दुनिया में उसकी मौजूदगी का एतराफ़ किया। हिज़्क़ीएल, जो कि मुल्हिम (इल्हाम पाने वाला) था, अय्यूब का यूँ ज़िक्र करता है कि उससे ज़ाहिर होता कि अय्यूब फ़िल-वाक़ेअ एक ज़िंदा जान और रूह का मुरक्कब था।
(हिज़्क़ीएल 14:14, 20) में चार दफ़ा आया है कि ख़ुदावन्द यहोवा ने कहा है कि, “हर-चंद ये तीन अश्ख़ास, या’नी नूह, दानिय़ेल और अय्यूब, मौजूद होते तो...” आख़िर में हमको यह मालूम दिलाया है कि ये अल्फ़ाज़ ख़ुदावन्द यहोवा के मुँह से निकले। ख़ुदा एक फ़र्ज़ी शख़्स को दो हक़ीक़ी इन्सानों के साथ नहीं मिला सकता। याक़ूब का आम ख़त (5:11) में अय्यूब की निस्बत मरक़ूम है कि, “तुमने अय्यूब के सब्र का हाल सुना है और ख़ुदावन्द की तरफ़ से जो अंजाम हुआ, वो आप जानते हो कि वो बड़ा दर्दमंद और मेहरबान है।” सो, हम इसको इन सब बातों के लिहाज़ से एक हक़ीक़ी वाक़िया और सच्ची तारीख़ तस्लीम करते हैं।
सवाल 6: अय्यूब की किताब की ख़ासियत बयान करो।
जवाब: इस किताब का ततिम्मा और दीबाचा नस्र में और दरमियानी हिस्सा, या’नी बहस-ओ-मुबाहिसा, नज़्म में है।
यह नज़मी हिस्सा, ब-लिहाज़ सलामत-ए-इबारत, दिलसोज़ी, दिलरुबाई और बुलंद-परवाज़ नए ख़यालात, दूसरी इब्रानी नज़मी किताबों पर फ़ौक़ियत रखता है। ख़ुदा ने इन बहस करने वालों को ज़बान-दानी में इस क़द्र फ़ज़ीलत बख़्शी कि उन्होंने ख़यालात को मोअस्सिर और आ’ला क़िस्म के अल्फ़ाज़ में पेश किया है, जिनसे कि ख़ुदावन्द की तारीफ़ और उसका जलाल हो।
सवाल 7: अय्यूब की किताब ख़ुदा की निस्बत क्या सिखाती है?
जवाब: यह कि कुल आलम का मुंतज़िम होकर सिर्फ़ उसकी तंज़ीम में हमेशा मुनहमिक (हमेशा किसी काम में मसरूफ़) नहीं रहता, बल्कि वो इन्सान के दिली ख़यालात व रुहानी हालत से पूरी वाक़फ़ियत हासिल करके उसको हस्ब-ए-हालत सज़ा या जज़ा देता है। (पेंटाट्यूक) से मालूम होता है कि ख़ुदा ने चंद अश्ख़ास से अहद बाँधा और बरकत अता करने का वा’दा किया। तवारीख़ी कुतुब से उस अहदी क़ौम के साथ उसका सुलूक और वादा-वफ़ाई ज़ाहिर होती है।)
कुतुब-ए-अम्बिया से मालूम होता है कि वो उस क़ौम को कैसी मुफ़ीद ता’लीम देता है और उसकी तर्बियत करता रहा। अय्यूब की किताब वाज़ेह करती है कि ख़ुदा ने एक शख़्स के साथ, जो उस अहदी क़ौम में से न था, कैसा सुलूक किया? उसको ख़ुदा ने ख़ूब आज़मा कर बरकतों से माला-माल किया। इस किताब से यह नतीजा अख़ज़ होता है कि ख़ुदा का तअल्लुक़ सिर्फ़ उस अहदी क़ौम से ही नहीं, बल्कि उसके बर्गुज़ीदा लोग हर क़ौम में मौजूद हैं और वो उनको महफ़ूज़ रखता और बरकतों से भरपूर करता है।
सवाल 8: अय्यूब की किताब के मक़ासिद बयान करो।
जवाब: मक़्सद अव्वल, यह मालूम होता है कि यह ज़ाहिर हो कि यह शैतान ख़ुदा का मुख़ालिफ़ होकर ख़ुदा के लोगों को मुसीबत में डालने और सताने में मसरूफ़ रहता है।
मक़्सद दुव्वम: ये है कि ज़ाहिर करे कि अय्यूब की मुहब्बत की निस्बत कि वो ख़ुदगर्ज़ी है। शैतान की तोहमत ग़लत है कि और बर्गज़ीदों की मुहब्बत हक़ीक़ी और बे-रिया होती है, और कि ख़ुदा अपनी ज़ात की खूबियों से इन्सान के दिल को मुसख़्ख़र और फ़रेफ़्ता कर सकता है।
मक़्सद सोयम: यह ज़ाहिर करता है कि किसी मुसीबत-ज़दा पर ऐब लगाना और उसकी मुसीबत को हमेशा उसके गुनाहों का लाज़िमी नतीजा बनाना वाजिब नहीं, बल्कि बर-अक्स उसके साथ हम्दर्दी करना और उसकी मदद करना ज़्यादा क़रीन-ए-मस्लहत है, क्योंकि हमको ठीक मालूम नहीं हो सकता कि इस मुसीबत की अस्ल वजह क्या है? ऐब-जोई और इल्ज़ाम की तर्ग़ीब हमेशा शैतान की तरफ़ से होती है।
मक़्सद चहारुम: यह सिखाता है कि हम अपने आपको जांच कर अपनी ख़ुदी को ख़त्म करें और हलीम होकर ख़ुदा के कामिल और सादिक़ बंदे बनें और नेकोकारी का शेवा इख़्तियार करके उसकी क़ुर्बत (नज़दीकी) हासिल करें।
सवाल 9: अय्यूब की वफ़ादारी की आज़माईश किस तरह हुई?
जवाब: जब ख़ुदावन्द ने शैतान की तवज्जोह अय्यूब की सदाक़त और क़ाबिलियत पर मबज़ूल की, तो शैतान ने ख़ुदावन्द से सवाल किया कि, “क्या अय्यूब हक़ीक़त में ख़ुदा-तरसी करता है? क्या तूने उसके गर्द और उसके घर के आस-पास और उसके सारे माल-असबाब को चारों तरफ़ से अहाता नहीं किया? तूने उसके हाथ के काम में बरकत बख़्शी है और उसका माल ज़मीन में बढ़ता जाता है। लेकिन अपना हाथ बढ़ाकर उसका सब कुछ छू ले, तो क्या वो तेरे मुँह पर तेरी मलामत न करेगा?” तब ख़ुदावन्द ने शैतान को इजाज़त दी कि अय्यूब को आज़माए। सो, शैतान ने अय्यूब को ऐसी बुरी हालत में फंसाया कि न उसका माल-ओ-दौलत, न दोस्त, न कोई तसल्ली देने वाला, न ख़िदमतगुज़ार, न क़द्र और न दर्जा रहा, बल्कि उसकी तहक़ीर कमीनों से की जाती थी। आख़िरकार उसने अय्यूब के जिस्म को मारा, ऐसे कि तलवे से सर तक ऐसे जलते फोड़े हुए कि वो ठीकरा लेकर अपने तईं खुजाने लगा और राख पर बैठ गया। इस मौक़े पर उसकी बीवी ने उससे कहा कि, “क्या तू अब तक अपनी दियानत पर क़ायम रहता है? ख़ुदा की मलामत कर और मर जा।” अय्यूब ने जवाब दिया कि, “तू नादान औरतों की सी बात करती है। क्या हम ख़ुदा से अच्छी चीज़ें लें और बुरी न लें?”
अय्यूब के हाल और सब्र-ओ-तहम्मुल से बख़ूबी ज़ाहिर होता है कि ऐसे ख़ादिम जिनमें मुतलक़़न ख़ुद-ग़रज़ी नहीं और ख़िदमत भी ऐसी है जिसमें वज़न का ख़याल ख़ुसूसियत नहीं रखता।
अय्यूब ने ख़ुदा को इस क़द्र प्यार किया और उसकी हुज़ूरी की इस क़द्र ख़्वाहिश रखी कि हर क़िस्म की मुसीबत कमाल-ए-सब्र से बर्दाश्त की, कि मुबादा वो ख़ुदा की हुज़ूरी से महरूम रखा जाए। अय्यूब की वफ़ादारी ख़ुदा की तरफ़ से शैतान को जवाब था।
सवाल 10: अय्यूब की किताब के बहस-ओ-मुबाहिसा का सबब और मक़्सद क्या था, और इसमें कौन सी बात तस्फ़ीया-तलब (वाज़ेह करना, रफ़ा-ए-तकरार) थी, और वह क्योंकर हल हुई?
जवाब: मालूम होता है कि जब उन वाक़ि’आत की ख़बर, जो कि अय्यूब पर गुज़रे, उसके अहबाब के कानों तक पहुँची, तो उनमें से तीन अश्ख़ास, या’नी अलीफ़ज़ तेमानी, बिलदद सूखी और ज़ोफ़र नामाती ने इत्तिफ़ाक़ किया कि उसके पास जाकर उसके साथ रोएँ और उसको तसल्ली दें। लेकिन जब वो हाज़िर हुए और उसकी हौलनाक हालत देखी, तो सात (7) रोज़ तक उसके साथ बैठे रहे और बे-ज़बान रहे। तब शैतान ने मौक़ा पाकर उनकी हम्दर्दी के इरादे को तब्दील करके उनको तर्ग़ीब दी कि अय्यूब को गुनहगार और ना-रास्त ठहराएँ और इस तरह उसकी घबराहट और मुसीबत ज़्यादा करें। चुनान्चे, वो ख़ुदा की अजीब सिफ़ात पेश करके यह बात साबित करने की कोशिश करने लगे कि ख़ुदा, क़ादिर-ए-मुतलक़, रहीम और आदिल होकर, किसी रास्तबाज़ शख़्स को ऐसी बला में मुब्तला नहीं करता, और कि अय्यूब ज़रूर, बिला-शक-ओ-शुब्हा, अज़-हद ना-रास्त और गुनहगार है, वर्ना इस हालत को न पहुँचता, और उससे बहस की कि वो तौबा करे कि शायद ख़ुदा उसको मु’आफ़ करे।
अब उनके सामने यह बात पेश हुई है कि अगर मुसीबत, बीमारी और तंगी गुनाह के नताइज थे, तो उनका और क्या सबब हो सकता है? लेकिन इसका हल उनसे न हुआ।
तब यहोवा बोला और अय्यूब को उसकी नादानी और कमज़ोरी का क़ायल करके और तौबा करवा कर उसके मलामत करने वालों की तरफ़ मुख़ातिब होकर उन्हीं को मलामत की, और उन पर रोशन कर दिया कि दर-हक़ीक़त अय्यूब इनके सब इल्ज़ामात से बरी है, और जो कुछ वक़ूअ में आता है, एक ही शख़्स के फ़ायदे या नुक़्सान में नहीं होता, बल्कि दूसरों के लिए भी और नीज़ ख़ुसूसियत के साथ ख़ुदा की ता’ज़ीम और उसके जलाल का ज़हूर उससे पेश-ए-नज़र होता है।
सवाल 11: इस किताब के वाक़ि’आत से कौन सी ता’लीम और इबरत वाली बातें निकलती हैं?
जवाब: बहस-ओ-मुबाहिसा से ज़ेर-ए-बहस उमूर का ही हल नहीं होता, बल्कि और अनवा-ओ-अक़्साम (मुख्तलिफ़ क़िस्मों) के मुफ़ीद ख़यालात भी निकल आते हैं, जिस तरह कि इस बहस से भी हुआ। मसलन:
(1) गो माली नुक़्सान जिसमें तकालीफ़ और मसाइब अक्सर औक़ात इन्सान की ग़फ़लत, ग़लतफ़हमी, शरारत या ना-रास्ती के नताइज होते हैं, जो कि इन्सान के वास्ते सज़ा और तर्बियत का मूजिब होते हैं, तो भी बाज़ औक़ात ख़ुदा अपने मक़ासिद की अंजाम-दही के लिए अपने बर्गज़ीदों को शैतान के हाथों में दे देता है कि वो उनको आज़माए ताकि वो तपाए हुए ख़ालिस सोने की मानिंद निकल आएँ, क्योंकि फ़त्हमंद ज़िंदगी मुक़ाबले पर है।
(2) वाजिब नहीं कि ख़ुदा के बर्गज़ीदों में से कोई भी मुसीबत और नुक़्सान के सबब उसकी तहक़ीर करे, बल्कि यक़ीन रखे कि सारी चीज़ें उनकी भलाई के लिए, जो ख़ुदा से मुहब्बत रखते हैं, बल्कि फ़ायदा बख़्शती हैं (रोमियों 8:28)।
(3) शैतान अक्सर मौक़ा पाकर नेक लोगों की नीयत, ख़सलत और समझ को इस क़द्र बिगाड़ देता है कि वो उनसे फ़ाइदा-बख़्श और सही बातों का बेजा इस्तिमाल करवाता है। ख़ुदा का शुक्र है कि वो अपने लोगों को सरासर शैतान के हवाले नहीं करता और शैतान के इख़्तियार को भी महदूद रखता है। नीज़, उसके सताए हुओं को बहाल करता और बरकत बख़्शता है।
(4) इस बहस से यह बात भी निकलती है कि गो तकालीफ़ इत्तिफ़ाक़ीया नहीं, बल्कि अफ़आल-ए-बद के वाजिबी नताइज होती हैं, तो भी यह वाजिब और मुनासिब नहीं कि हम मुसीबतज़दा और दुखिया अश्ख़ास के मसाइब के अस्बाब पर अंगुश्त-नुमाई (तअन-ज़नी करना, उंगली उठाना) करें और उनकी ऐब-चीनी और उयूब का चर्चा करें, क्योंकि न तो हम इन अस्बाब का यक़ीनी इल्म रख सकते हैं और न ही ख़ुदा के भेद तक पहुँच सकते हैं। ऐसी हालत में हमेशा यही अंसब (ज़्यादा मुनासिब) मालूम देता है कि हम उनके साथ हम्दर्दी करें, उनकी मदद करें और उनके लिए दु’आ और सिफ़ारिश करें।
बाब तीसरा
अय्यूब की किताब का मुतालआ
सवाल 12: अय्यूब की किताब की तक़्सीम करें।
जवाब: इस बड़ी किताब का बा-आसानी मुतालआ करने के लिए यह अच्छा होगा कि इसकी तक़्सीम करके हिस्सा-ब-हिस्सा इस पर ग़ौर किया जाए। किताब तीन, बड़े हिस्सों में मुनक़सिम हो सकती है: (हिस्सा अव्वल: तम्हीद, अबवाब 1-2, हिस्सा दुव्वम: बहस-ओ-मुबाहिसा, 3:1–42:6, हिस्सा सोयम: ततिम्मा, 42 बाब 7 आयत से आख़िर तक)।
हिस्सा अव्वल
सवाल 13: हिस्सा अव्वल की तफ़्सील करो।
जवाब: इस किताब के अबवाब अव्वल व दुव्वम में पाँच तसावीर हैं। तस्वीर अव्वल (1:1-5): यह एक मुतव्विल (दौलतमंद) ख़ानदान की, जिसमें ख़ुशहाली और फ़ारिग़-उल-बाली और ख़ातिर-ख़्वाह इंतिज़ाम है, तस्वीर है। इसमें ख़ानदानी मुहब्बत ने सब अफ़राद को एक दूसरे से ख़ूब पैवस्ता किया हुआ है। अय्यूब इस ख़ानदान का सर है, जो कि अपने बच्चों के लिए दु’आ और मुनाजात करता है कि जवानी का जोश और ग़फ़लत किसी तरह से उनको ख़ुदा से अलग और बरतरफ़ न कर दे।
तस्वीर दुव्वम (1:6-12): इसमें फ़रिश्तगान का एक हुजूम ख़ुदा के सामने हाज़िर है। शैतान भी उनके साथ आ मौजूद हुआ है और अय्यूब की वफ़ादारी पर ख़ुदावन्द से बातचीत करता है। उसकी क़ील-ओ-क़ाल (गुफ़्तगू) का यह नतीजा निकलता है कि शैतान को अय्यूब की आज़माइश की इजाज़त मिल जाती है।
तस्वीर सोयम (1:13-22): इसमें इस फ़र्ख़ुंदा-हाल व ख़ुश-हाल घराने में शैतान की कार्रवाई का नतीजा नज़र आता है, कि अब इसमें बाल-बच्चों, माल-ओ-अस्बाब, ख़ुशी और ख़ुर्रमी के बजाए बर्बादी और मेहन (बलाएँ) है। अय्यूब इस परेशान और दिगरगों (तह-ओ-बाला, उलट-पुलट) हालत में भी मुस्तक़िल वफ़ादार नज़र आता है।
तस्वीर चहारुम (2:1-6): इसमें शैतान फिर फ़रिश्तगान के दरमियान नज़र आता है। इसमें वो अपने अव्वल दावे, या’नी कि अय्यूब इस वास्ते ख़ुदा-तरसी करता है कि ख़ुदा ने उसे दुनियावी माल-ओ-दौलत से माला-माल कर रखा है, में झूठा ठहरता है, और अपनी शर (झगड़ा, ख़राबी) के बमूजब यह कह कर कि इन्सान की आदत है कि वो अपनी जान को अपने माल-ओ-दौलत से ज़्यादा अज़ीज़ रखता है, ख़ुदावन्द से अय्यूब के जिस्म पर हाथ बढ़ाने की इजाज़त हासिल करता है। लेकिन ख़ुदावन्द ने उसे ताकीद की है कि अय्यूब की जान का नुक़्सान न हो।
तस्वीर पंजुम (2:7-13): इसमें अय्यूब राख पर बैठा हुआ ठीकरे से जिस्म को खुजलाता हुआ दिखलाई देता है, क्योंकि शैतान ने उसे ऐसा मारा कि तलवे से सर तक उसे जलते हुए फोड़े हुए। उसकी बीवी उसे कहती है कि, “क्या तू अब तक अपनी दियानत पर क़ायम है? ख़ुदा को मलामत कर और मर जा।” लेकिन अय्यूब जवाब देता है कि, “तू नादान औरत की सी बात करती है। क्या हम ख़ुदा से अच्छी चीज़ें लें और बुरी चीज़ें न लें?” इसके अलावा, कुछ फ़ासले पर तीन शख़्स नज़र आते हैं, कि नज़दीक पहुँच कर और अय्यूब की हौलनाक हालत देखकर सात रोज़ तक चुप-चाप उसके पास बैठे रहे, क्योंकि शैतान ने उनको तसल्ली और हम्दर्दी से रोक रखा है। शैतान से इलोहीम या ईल नहीं, बल्कि यहोवा ही बात करता है।
हिस्सा दुव्वम
सवाल 14: हिस्सा दुव्वम की तफ़्सील बताएँ।
जवाब: इसमें बहस-ओ-मुबाहिसा की कैफ़ियत है, जो कि अय्यूब और उसके तीन दोस्तों के दरमियान वाक़ेअ हुआ। इस बहस-ओ-मुबाहिसा में तीन दौर हैं: दौर-ए-अव्वल (अबवाब 3-14), दौर-ए-दुव्वम (अबवाब 15-21), और दौर-ए-सोयम (अबवाब 22-31)।
इसके बाद इलीहू बिन बराकील बूज़ी की तक़रीर (अबवाब 32-37) में से और (अबवाब 38-41) में ख़ुदावन्द अपने आपको अय्यूब पर ज़ाहिर करता है। (42:1-6) में अय्यूब हलीमी से अपने क़ुसूरों का एतराफ़ करके मु’आफ़ी का ख़्वाहिशमंद है।
हिस्सा सोयम
सवाल 15: हिस्सा सोयम की तफ़्सील बताएँ।
जवाब: इसमें सिर्फ़ दस आयात हैं और इन दस आयात में तीन मुख़्तलिफ़ बातें हैं:
ख़ुदावन्द अय्यूब के तीन दोस्तों को धमका कर हुक्म देता है कि सोख़्तनी क़ुर्बानी पेश करें, जो कि अय्यूब की दु’आ से क़ुबूल हो, और साथ ही अय्यूब ने भी शिफ़ा पाई (अय्यूब 42:7-10)।
अय्यूब की सेहतयाबी पर उसके रिश्तेदारों और जान-पहचान वालों ने उसको अपने में शामिल करके तहाइफ़ दिए (अय्यूब 42:11)।
ख़ुदा ने अय्यूब की आख़िरी उम्र में उसको बड़ी बरकत बख़्शी (अय्यूब 42:12-17)।
चौथा बाब
पहले हिस्से का मुतालआ
सवाल 16: अय्यूब की किताब के तमहीदी हिस्से की तश्रीह करें।
जवाब: इस हिस्से में अय्यूब के पहले दो बाब, जो कि नस्री हैं, पाए जाते हैं, और उनमें पाँच ख़ास बातें पाई जाती हैं:
(1) (1:1-5): अय्यूब और उसके घराने की कैफ़ियत है। इसमें अय्यूब की दीनी और दुनियावी हालत ज़ाहिर होती है। नीज़, ये भी कि वो अपने ज़माने में अहले-मशरिक़ में सबसे ज़्यादा ख़ुदा-परस्त और आ’ला मर्तबा शख़्स था, वो कामिल और हाज़िक़ (दाना) था, और घराने का दीनी इंतिज़ाम ख़ूब करता था। इसके हक़ में मस्तूर है कि जब उसके बेटे अपनी-अपनी बारी पर मेहमान-नवाज़ी कर चुकते, तो अय्यूब उनको बुला कर पाक करता और उनके शुमार के मुताबिक़ सोख़्तनी क़ुर्बानियाँ गुज़ारता था कि अगर उन्होंने किसी बात में क़सूर किया हो तो उनकी मु’आफ़ी हो।
(2) (1:6-12): शैतान का पहली बार ज़िक्र हुआ है। वो उस वक़्त फ़रिश्तगान के हुजूम में आ मौजूद हुआ और उसकी अय्यूब की कामिलियत और सदाक़त की निस्बत ख़ुदा से गुफ़्तगू हुई। शैतान ने दा’वे किए कि अय्यूब की वफ़ादारी ख़ुदगर्ज़ी से है। सो, ख़ुदा ने उसको इजाज़त दी कि वो अय्यूब को आज़माए।
(3) (1:13-22): इसमें शैतान का अय्यूब के ख़ानदान पर अचानक हमला करने का ज़िक्र है कि उसने क़ज़्ज़ाक़ों (डाकुओं), आग और आँधी के वसीले से अय्यूब के माल-ओ-मवेशी और फ़रज़न्दों को हलाक और बर्बाद कर दिया। और जब अय्यूब को इसकी इत्तिला हुई तो उसने इन आफ़ात को ख़ुदा की तरफ़ से समझ कर सब्र से बर्दाश्त किया और कहा कि, “मैं अपनी माँ के पेट से नंगा निकल आया और फिर नंगा वहाँ जाऊँगा। ख़ुदावन्द ने दिया और ख़ुदावन्द ने ले लिया, ख़ुदावन्द का नाम मुबारक हो।”
(4) (2:1-6): इसमें ख़ुदावन्द से शैतान की दूसरी गुफ़्तगू होती है। इसमें वो अय्यूब को दोबारा आज़माना चाहता है। ख़ुदावन्द ने अय्यूब की मुकर्रर (दोबारा) तारीफ़ करके शैतान से कहा कि, “अगरचे तूने मुझे उभारा कि अय्यूब को हलाक करूँ, तो भी वो अपनी दियानत को लिए रहा।” शैतान ने जवाब दिया कि, “खाल के बदले खाल, बल्कि इन्सान अपना सारा माल अपनी जान पर निसार करेगा। लेकिन अपना हाथ बढ़ाकर उसकी हड्डी और गोश्त को छू ले, तो वो तेरे मुँह पर तेरी मलामत करेगा।” तब ख़ुदावन्द ने शैतान से कहा कि, “वो तेरे क़ाबू में है, मगर फ़क़त उसकी जान जाने न पाए।”
(5) (2:7-13): इससे मालूम होता है कि शैतान ने कैसी सख़्ती से अय्यूब को मारा और उसके दोस्तों को हम्दर्दी के बजाए ऐब-जोई पर और बीवी को मुहब्बत की बजाए मलामत करने पर मजबूर किया।
बाब पाँचवाँ
तीसरा हिस्सा: बहस-मुबाहिसा
दौर-ए-अव्वलतीसरा हिस्सा: बहस-मुबाहिसा
सवाल 17: बहस-ओ-मुबाहिसे के दौर-ए-अव्वल की तश्रीह करें।
जवाब: अय्यूब ही ने बहस-ओ-मुबाहिसे में इक़दाम (पेशक़दमी करना, क़दम बढ़ाना) किया। वजह यह थी कि अय्यूब के दोस्त सात रोज़ तक आकर, मुहर-ब-लब (ख़ामोश), उसके पास ज़मीन पर बैठे रहे और बिल्कुल कोई बातचीत न की, क्योंकि उन्होंने मालूम किया कि अय्यूब पर ग़म का बोझ बहुत ज़्यादा था। सात रोज़ के बाद अय्यूब ने मुँह खोला और अपनी पैदाइश के दिन पर लानत की और मौत को ज़िंदगी पर तरजीह देकर उसकी खूबियाँ बयान कीं और कहा कि, “वहाँ शरीर सताने से बाज़ आए और थके-माँदे चैन से हैं।” जब इस जिगर-सोज़ और जान-गुदाज़ ग़म से वह ज़िंदगी से बेज़ार हो गया तो सवाल किया कि, “ऐसे को क्यों रोशनी बख़्शी जाती है जिसकी राह छुपाई हुई है और जिसके लिए ख़ुदा ने घेरा डाल कर तंग किया है?”
इस पर एलीफ़ज़ तेमानी बोल उठा (अय्यूब 4-5 बाब) और अय्यूब को जवाब दिया कि चुनान्चे (4:1-6), वो अय्यूब की पस्त-हिम्मती की यह कह कर शिकायत करता है कि, “देख, तूने बहुतों को सिखलाया और उनको, जिनके हाथ कमज़ोर थे, ज़ोर बख़्शा। तेरी बातों ने उसको, जो गिरता था, थामा और तूने झुके हुए घुटनों को सँभाला। पर अब कि जब कि तू ख़ुद झुक पड़ा तो बेताब है, बुझने लगा है, तुझ पर पड़ी है तो तू घबराता है। क्या तू अपनी ख़ुदा-तरसी पर तकिया न करता और अपनी दीनदारी के सबब उम्मीदवार न था?” एलीफ़ज़ अपनी तक़रीर में कई दलायल लाकर यह साबित करना चाहता है कि ख़ुदा सादिक़ों को हरगिज़ नहीं सताता।
दलील अव्वल (4:7-11): ख़ुदा की सज़ा का फ़तवा रास्तबाज़ों के नहीं, बल्कि ना-रास्तों के लिए है।
दलील दुव्वम (4:12-21): अपनी एक रोया पेश करता है, जिसका मक़्सद यह है कि फ़ानी इन्सान अपने ख़ुदा के हुज़ूर सादिक़ नहीं ठहर सकता और बशर (इंसान) अपने ख़ालिक़ की मानिंद पाक नहीं है।
दलील सोयम (5:1-5): वो अय्यूब के सामने शरीर की शरारत का अंजाम पेश करता और बयान करता है कि वो, या’नी अय्यूब और उसकी औलाद, सलामती से दूर रहते हैं।
दलील चहारुम (5:6-16): वो ख़ुदा की तारीफ़ करता है, अय्यारों के मंसूबों को बातिल ठहराता है और मिस्कीनों को तलवार और ज़बरदस्त हाथों से महफ़ूज़ रखता है।
दलील पंजुम (5:17-27): ख़ुदा की तम्बीह का नेक अंजाम पेश करता और बताता है कि नेक लोग ज़मीन पर इक़बालमंद होंगे और उनकी औलाद बरकत से मामूर होगी और वो ख़ुद उम्र-रसीदा होकर गोर (क़ब्र) में उतरेगा, जिस तरह कि ग़ल्ले का अंबार अपने मौसम में जमा किया जाता है। अल-ग़र्ज़, तेमानी का मतलब यह था कि अय्यूब को उसकी गुनहगारी से क़ायल करके उसको मुस्तजिब-ए-सज़ा (जिस पर सज़ा वाजिब हो) ठहराए, ताकि वो अपनी ना-रास्तकारी से तौबा करे और ख़ुदा की तरफ़ मुतवज्जह होकर उससे मु’आफ़ी का तालिब हो। इस किताब के (6-7) बाब में अय्यूब एलीफ़ज़ तेमानी को जवाब देता है। इस जवाब में तीन ख़ास बातें हैं:
(1) (अय्यूब 6:1-13): अय्यूब अपनी सदाक़त का दावा करता और अपनी फ़र्याद का उज़्र पेश करता है, लेकिन इस बात को तस्लीम करता है कि सब मुसीबत ख़ुदावन्द की तरफ़ से है, और कहता है कि, “उसके तीर मुझमें लगे हैं और मेरा दिल उनका ज़हर पीता है। ख़ुदा की दहशतें मेरे मुक़ाबिल सफ़-आरा हैं।” सो, वो अर्ज़ करता है कि ख़ुदा फिर रहम करे और उसकी ज़िंदगी को ख़त्म करे।
(2) (अय्यूब 6:14-30): इसमें अय्यूब अपने दोस्तों को यह कह कर मलामत करता है कि, “चाहिए कि शिकस्ता-दिल पर उसके दोस्त तरस खाएँ, वर्ना वो अपने आपको ख़ुदा के तरस से महरूम रखेंगे।” और कि, “अगर मुझमें कुछ ख़ता है तो ज़ाहिर करो और मुझको सिखलाओ तो मैं चुप-चाप रहूँगा। कि मा’क़ूल बातों की तासीर क्या ही ख़ूब है, पर तुम्हारी सरज़निश किस बात पर दलालत करती है? क्या तुम बातों पर ऐब लगाने के ख़याल में हो? मायूस की बातें हवा की सी हैं।”
(3) सातवें बाब में अय्यूब अपनी मौत की आरज़ू का उज़्र पेश करता और कहता है कि जिस तरह मज़दूर साए के लिए हाँफता और उजरत वाला अपनी मज़दूरी चाहता है, इसी तरह मेरी जान फाँसी चाहती है और मौत को इन हड्डियों में रहने से बेहतर जानती है, और ख़ुदा से अर्ज़ करता है कि गोर (क़ब्र) में जाने से पहले वो उसे मु’आफ़ करे और उसकी बदकारी को मिटा दे।
बिलदद सूखी की तक़रीर:
अय्यूब की तक़रीर के बाद जवाब में बिलदद सूखी (आठवें बाब में) ख़ुदा के इंतिज़ाम को रास्त और अय्यूब को मक्कार ठहराता है, और दावा करता है कि उसकी औलाद की मौत उसकी गुनहगारी का नतीजा थी, और कहता है कि, “क्या ख़ुदा इन्साफ़ को उठाएगा या क़ादिर-ए-मुतलक़ अदालत से भागेगा? अगर तेरे फ़रज़न्दों ने उसका गुनाह किया है, इसलिए उन्हें उनके गुनाहों के बा’इस रद्द कर दिया तो यह दुरुस्त और वाजिबी था। अगर तू रास्तबाज़ और पाक-दिल है, तो भी ख़ुदा तेरे वास्ते चौंक उठेगा और तेरी सदाक़त के घर को बहाल करेगा, क्योंकि इल्लत (बीमारी) के बग़ैर सज़ा नामुमकिन है। ख़ुदा सच्चे आदमियों को रद्द और बदकिर्दारों की दस्त-गीरी नहीं कर सकता।”
अय्यूब की दूसरी तक़रीर (अय्यूब 9-10 बाब): अय्यूब तस्लीम करता है कि ख़ुदा आदिल है और उसके साथ तकरार बिल्कुल बेफ़ाइदा है, क्योंकि उसकी क़ुदरत और दानाई इन्सान के क़ियास से परे हैं। बावजूद उसके, वो कहता है कि मुसीबत और तक्लीफ़ हमेशा गुनाह का नतीजा नहीं होतीं। “लेकिन अगर मैं अपने आपको सादिक़ ठहराऊँ, तो मेरा ही मुँह मुझे गुनहगार ठहराएगा, और अगर मैं कहूँ कि मैं सच्चा हूँ, तो इससे मेरी कजरवी साबित होगी।”
फिर वो कहता है कि, “मैं अपनी ज़िंदगी की बेज़ार हालत में अपने दिल की तल्ख़ी से बोलूँगा और ख़ुदा से कहूँगा कि मुझे बतला कि तू मुझसे क्यों मुक़ाबला करता है, और अपने हाथ से बनी हुई चीज़ की क्यों हिक़ारत करता है?” और अर्ज़ करता है कि, “थोड़ी देर के लिए अपना हाथ मुझ पर से उठा ले ताकि मुझको ज़रा सा आराम हो, इससे पहले कि मैं वहाँ जाऊँ जहाँ से वापस न फिरूँगा।”
नोट: इस किताब के दीबाचे और ख़ातिमे में लफ़्ज़ 'यहोवा' आया है, जो कि बहस-ओ-मुबाहिसे में कहीं-कहीं मिलता है। नीज़, लफ़्ज़ 'इलोहीम' नहीं, बल्कि 'एल-शादाई' आया है, जिससे मालूम होता है कि इस ज़माने में लोग तौहीद में तस्लीस की मौजूदगी से नावाक़िफ़ थे। ज़ोफ़र नामाती की तक़रीर, ग्यारहवाँ बाब:
ज़ोफ़र नामाती (11:1-6) में अय्यूब को उसकी पैशन-गोई पर मलामत करता और कहता है कि, “इस तरह तू बेगुनाह नहीं ठहरता, और तू और, न तेरी लाफ़-ज़नी से कोई सुनने वाला ख़ामोश रह सकता है।” वो अपनी ख़्वाहिश ज़ाहिर करता है कि, “काश, ख़ुदा अय्यूब से बोले और उसकी बदकारी उस पर ज़ाहिर करे और उसको मालूम हो कि उसने अपने गुनाह के मुक़ाबले में बिल्कुल कम सज़ा पाई।”
(11:7-12): ज़ोफ़र नामाती अय्यूब की गुस्ताख़ी पर उसको यह कह कर मलामत करता है कि, “क्या तू अपनी तलाश से ख़ुदा का भेद पा सकता है, या क़ादिर-ए-मुतलक़ के कमाल तक पहुँच सकता है? वो तो आस्मान से ऊँचा है, तू क्या कर सकता है? वो पाताल से भी नीचे है, सो तू क्या जान सकता है? उसका अंदाज़ा ज़मीन से लंबा और समुंदर से चौड़ा है।”
(11:13-20): इसमें ज़ोफ़र अय्यूब को ताकीद करता और कहता है कि, “तू अपने दिल को दुरुस्त कर और अपने हाथ ख़ुदा की तरफ़ बढ़ा। अगर तेरे हाथ में बदी है तो उसे दूर फेंक दे और शरारत को अपने डेरे में न रहने दे, तो अलबत्ता तू अपना मुँह बेदाग़ उठाएगा, तू साबित-क़दम होगा और दहशत न खाएगा, और तेरी उम्र का दिन दोपहर के दिन से ज़्यादा रोशन होगा, तेरी ज़िल्लत का हाल सुबह सा हो जाएगा और तू ख़ातिरजमा होगा।”
अय्यूब की तीसरी तक़रीर (अय्यूब 12-14 अबवाब)
(12:1-12): अय्यूब ज़ोफ़र नामाती को जवाब देता और तानाज़नी के तौर पर कहता है कि, “सच-मुच, तुम तो एक गिरोह हो और दानाई तेरे साथ मरेगी।” फिर वो यह दावा करता है कि, “मैं अक़्लमंदी में तुमसे कम तो नहीं हूँ, और जो कुछ आपने अपनी तक़रीर में पेश किया है, वो सब मख़्लूक़ को मालूम है। हाँ, हैवानात से पूछिए तो वो तुमको सब सिखला देंगे, हवाई परिंदों से दर्याफ़्त कीजिए तो वो तुझको बतला देंगे, ज़मीन से दर्याफ़्त करो, वो तुमको ता’लीम देगी और समुंदर के मगरमच्छ तुझसे बयान करेंगे। कौन नहीं जानता कि ख़ुदावन्द के हाथ ने ये सब कुछ बनाया है, और उसी के हाथ में सब ज़िंदों की जान और सारे बशर (इंसान) का दम है।” ये तमाम बातें आम हैं, दानिश बूढ़ों के पास है, उम्र की दराज़ी की वजह से फहम (समझ) आता है।
इसके बाद अय्यूब (12:13-25) में एक दर्स ख़ुदा की क़ुदरत और हिक्मत पर देता है और कहता है कि दानाई और तवानाई उसके साथ हैं, वो साहिब-ए-मस्लिहत और साहिब-ए-फ़हम है। फ़रेब खाने वाला और फ़रेब देने वाला, दोनों उसके हाथ में हैं। वो मुशीरों को ग़ुलाम और हाकिमों को बेवक़ूफ़ बनाता है। वो बादशाहों की ज़ंजीरें खोलता और अमीरों को ग़ुलामी में लाता है। वो ज़बरदस्तों को उलट देता है, वो पोशीदा चीज़ें आश्कारा करता और मौत के साए को जलवागर करता है। अल-ग़र्ज़, उसकी दानिश सब बातों को परख लेती है और उसकी क़ुदरत सब चीज़ों पर हावी है।
(अय्यूब 13:1-13): इसमें अय्यूब अपनी एक ख़्वाहिश ज़ाहिर करता है कि उसके दोस्त अपनी दानाई को अपनी ख़ामोशी से ज़ाहिर करें, और उनके हक़ में कहता है कि वो झूटी बातों के बनाने वाले और नाकारा तबीब हैं। नीज़, वो ख़ुदा से मुख़ातिब होने और क़ादिर-ए-मुतलक़ से बहस करने की आरज़ू करता है, और दोस्तों से मुख़ातिब होकर अर्ज़ करता है कि वो चुप रहें और उससे अलग हो जाएँ। चुनान्चे, उनसे मायूस व बेज़ार होकर और तंग आकर अय्यूब (13:14-28) में बताता है कि उसका भरोसा ख़ुदा पर है, और दोस्तों से कहता है कि, “मेरे गुनाहों और क़ुसूरों का शुमार बताओ और मेरी तक्सीरें और ख़ताएँ बयान करो।” अय्यूब का भरोसा अपने ख़ुदा पर ऐसा यक़ीनी और कामिल है कि वो कहता कि, “अगर वो मुझको मार भी डाले, तो भी मैं अपना भरोसा उसी पर क़ायम रखूँगा।” चुनान्चे, वो सब दोस्तों को मलामत करता और चौदहवें बाब में ज़िंदगी की ना-पाएदारी और बे-सबाती पर एक सबक़ देता है और मौत के भेद पर ग़ौर-ओ-ख़ौज़ करके सवाल करता है कि जब इन्सान की जान निकल जाती है तो वो कहाँ जाती है, और जब आदमी मरे तो क्या वो फिर उठेगा? मौत और क़ियामत के राज़ की तहक़ीक़ सिर्फ़ ख़ुदावन्द येसू मसीह से है, जिसने मौत को मग़्लूब किया और क़ियामत का मालिक बन गया, दर्याफ़्त हो सकती है।
बहस-ओ-मुबाहिसे का दूसरा दौर
सवाल 18: इस दूसरे दौर का बयान करें।
जवाब: बहस-ओ-मुबाहिसे का दूसरा दौर अय्यूब की किताब के सात अबवाब, या’नी (15-21), में मिलता है। इसी दौर में ज़ैल की बातें क़ाबिल-ए-ग़ौर व मुतालआ हैं:
(1) (अय्यूब 15:1-16): इसमें एलीफ़ज़ तेमानी अय्यूब पर रियाकारी का इल्ज़ाम लगाता है और उसे कहता है कि, “तू बेहूदा बातें करके मुबाहिसा करता है और तेरे कलाम में फ़ायदा नहीं। तू ख़ुदा के ख़ौफ़ को बरतरफ़ करके उसके आगे दग़ा की बातें कहता है, और अगरचे तू अय्यारों की बातें करता है, तो भी तेरा मुँह तुझे गुनहगार ठहराता है और तेरे होंठ तुझ पर गवाही देते हैं।” इसके बाद तंज़ के तौर पर कहता है कि, “क्या तू पहला इन्सान है जो पैदा हुआ है? क्या तू पहाड़ों से पहले बनाया गया? तू क्या जानता है जिससे हम आगाह नहीं हैं? तुझमें कौन सी समझ है जो हम में नहीं? सफ़ैद सर और बूढ़े लोग हमारे दरमियान मौजूद हैं जो कि तेरे बाप से भी उम्र में बड़े हैं। क्या ख़ुदा की तसल्लियाँ तेरे नज़दीक हक़ीर हैं?” आख़िर में वो कहता है कि, “ख़ुदा तो अपने क़ुद्दूसियों का एतबार नहीं करता, तू घिनौने और बिगड़े हुए आदमी का क्या ज़िक्र जो कि बदी को पानी की मानिंद पी लेता है?”
(2) (15:17-35): एलीफ़ज़ तेमानी अय्यूब को रियाकार ठहरा कर उसको उन शरीरों के हालत का, जिनसे वो ख़ुद वाक़िफ़ था, तसव्वुर दिलाता और कहता है कि जैसे वो वीरान शहरों में बसते थे और उनके घर बे-चिराग़ हुए थे, वैसे ही सब रियाकारों के ख़ानदान उजड़ जाएँगे और आग रिश्वत-ख़ोरों के डेरों को जला देगी।
अय्यूब का चौथा जवाब (अय्यूब 16-17 अबवाब):
(अ) (अय्यूब 16:1-5): अय्यूब अपने दोस्तों की तक्लीफ़-देह तसल्ली पर उनको मलामत करता है और कहता है कि, “तुम मेरी सी हालत में गिरफ़्तार होते तो मैं तुम्हारे साथ ऐसा सुलूक न करता, बल्कि तुमको ज़ोर बख़्शता और अपने लबों की जुंबिश से तुम्हारे रंज को दूर करता।”
(ब) (अय्यूब 16:6-10): अय्यूब अपनी बुरी हालत पर नालां है और कहता है कि, “वो जो मुझसे कीना रखता है, मुझ पर दाँत पीसता है, मेरा दुश्मन मुझको देखकर तेज़-चश्मी करता है। वो अपना मुँह मुझ पर पसारते हैं और मेरे गाल पर थप्पड़ मारते हैं और मुझ पर एक साथ जमा हुए हैं।”
(ज) (अय्यूब 16:11-22): इसमें वो कहता है कि, “ख़ुदा ने मुझे बे-इन्साफ़ों के हवाले किया है और बे-दीनों के हाथों में डाला है कि उनके तीर-अंदाज़ों ने मुझे घेरा है। वो मेरे गुर्दों को चीर-फाड़ करता है, वो मेरा पित्त (इज़्ज़त) ज़मीन पर बहाता है।” इस पर अय्यूब एक वकील चाहता है जो उसके वास्ते ख़ुदा से बहस व हुज्जत करे, जिस तरह कि आदमी अपने दोस्त के लिए करता है, और अपनी सदाक़त का दावा करके कहता है कि, “मेरा गवाह आस्मान पर है और मेरा शाहिद आलम-ए-बाला पर।”
(द) (अय्यूब 17:1-4): इसमें अय्यूब ख़ुदा के सामने अपने दोस्तों में से वकील न चुनने पर यह उज़्र पेश करता है कि ख़ुदा ने उनको दानिश से ख़ाली रखा है।
(र) (अय्यूब 17:5-10): इसमें अय्यूब बेवफ़ाई का नतीजा पेश करता है और कहता है कि सीधे लोग उसके हाल से हैरान होंगे और नेकोकारों को रियाकारों पर रश्क आएगा। इस पर भी सादिक़ अपनी राह में साबित-क़दम रहेंगे और वो जिसका हाथ साफ़ है, तवानाई पर तवानाई पैदा करेगा।
(स) (अय्यूब 17:11-16): इसमें अय्यूब ज़िंदगी से बेज़ार होकर क़ब्र का इंतिज़ार करता है, क्योंकि उसकी उम्मीद जाती रही है, और कहता है कि, “मेरी उम्मीद पाताल के दरवाज़ों तक उतरेगी और मुझसे मिलकर ख़ाक में पड़ी रहेगी।”
बिलदद सूखी का दूसरा जवाब:
(अय्यूब 18:1-10): इसमें बिलदद सूखी शरीरों की तबाही की तरफ़ इशारा करके अय्यूब को उसकी ज़्यादा-गोई और नीज़ इस सबब से भी कि वो उनको हैवान ठहराता है, मलामत करता और बताता है कि वो अपने ग़ज़ब में अपनी जान को फाड़ता है, और कहता है कि शरीरों का चिराग़ ज़रूर बुझाया और उनका मन्सूबा गिराया जाएगा, क्योंकि वो अपने पाँव को जाल में डालता है कि उसके लिए दाम ज़मीन में छुपाया हुआ है।
(अय्यूब 18:11-21): इसमें अय्यूब को बतलाता है कि वो हर तरफ़ दहशतों से घबरा जाएगा और उसका ज़ोर भूख से जाता रहेगा। उसके भरोसे की जड़ उसके खेमे में से उखाड़ फेंकी जाएगी और उसकी यादगारी ज़मीन पर से मिटाई जाएगी। लोगों में न बेटा, न भतीजा रहेगा, और उन सब का हाल, जो ख़ुदा को नहीं पहचानते, ऐसा ही होगा।
बिलदद सूखी को अय्यूब का दूसरा जवाब
(अय्यूब 19:1-6): इसमें बिलदद सूखी को अय्यूब मलामत करता है, क्योंकि वो उसकी अज़िय्यत की हालत में उसको और भी तंग और परेशान करता और कुछ शर्म नहीं खाता। अय्यूब कहता है कि, “अगर मुझसे ख़ता हुई तो भी मेरा क़सूर मेरे ही साथ है और मेरी अज़िय्यत ख़ुदा की तरफ़ से है।” (अय्यूब 19:7-20): इसमें अय्यूब कहता है, “मेरी हालत उस सबब से ऐसी बिगड़ी हुई है कि ख़ुदा ने मेरी हुरमत उठा ली और मेरे सर पर से ताज उठा लिया है। उसने मुझको हर तरह से बर्बाद किया है, सो मैं फ़ना हो चला हूँ। दरख़्त की मानिंद उसने मेरी उम्मीद को उखाड़ा है और मुझ पर अपना ग़ज़ब भड़काया है। वो मुझको अपने दुश्मनों में शुमार करता है।” (अय्यूब 19:21-29): इसमें वो अपने दोस्तों से रहम चाहता है और अर्ज़ करता है कि यह आरज़ू है कि उसकी बातें किसी दफ़्तर में क़लम-बंद की जाएँ या किसी चट्टान पर नक़्श की जाएँ ताकि वो अबद तक क़ायम रहें। अय्यूब अपने एक अजीब यक़ीन को ज़ाहिर करता और कहता है कि, “हरचंद मेरे पोस्त के बाद यह जिस्म नेस्त किया जाएगा, लेकिन मैं अपने गोश्त में से ख़ुदा को देखूँगा। उसे मैं अपने लिए देखूँगा, मेरी ही आँखें देखेंगी, न कि बेगाने की।” अय्यूब की इस उम्मीद से मालूम होता है कि वो क़ियामत का मुतअक़्क़िद (मानने वाला) था।
ज़ोफ़र नामाती का अय्यूब को जवाब
(अय्यूब 20 बाब): ज़ोफ़र अपने जवाब में शरीरों की बदकिर्दारी का हश्र बयान करता है। चुनान्चे (अय्यूब 20:1-9), वो शरीरों की ख़ुशी और ख़ुशहाली को चंद-रोज़ा और बे-सबात ज़ाहिर करता है कि शरीरों की ख़ुशी सिर्फ़ थोड़े दिनों के लिए है और बे-दीनों की शादमानी एक लम्हे की है। शरीर ख़्वाब की मानिंद उड़ जाएगा और पाया न जाएगा। (अय्यूब 20:10-16): में वो बयान करता है कि शरीरों की शरारत उनके जिस्म में से मुसीबत-अंगेज़ होगी और उनके अंदर ज़हर-ए-क़ातिल साबित होगी। और (20:17-23) में वो कहता है कि उनको कामयाबी न होगी, क्योंकि उन्होंने मिस्कीनों को दबाया और घर, जो उनके हाथ से न बना था, ले लिया था। और (अय्यूब 20:24-29) में कि अगर वो आसूदा भी हो, तो ख़ुदा उस पर शदीद क़हर नाज़िल करेगा और आस्मान उनकी बदकारी को आश्कारा करेगा और ज़मीन उनके बरख़िलाफ़ उठेगी।
अय्यूब का जवाब ज़ोफ़र नामाती को
(अय्यूब 21:1-6): इसमें अय्यूब अपने दोस्त को कहता है कि, “मेरी फ़र्याद किसी इन्सान के सामने नहीं।” और (अय्यूब 21:7-14) में कहता है कि शरीरों को अलबत्ता बरकत मिलती है, उनकी ज़िंदगी दराज़ होती और उनके फ़रज़ंदान उनके साथ बरक़रार रहते हैं। उनके गले बढ़ते और वो ऐश-ओ-इशरत में अपनी ज़िंदगी बसर करते हैं। (अय्यूब 21:15-21): में कहता है कि गो शरीर (बेदीन) ख़ुदा को तर्क करते हैं, लेकिन कामयाबी उनके क़ब्ज़े में नहीं है, और वो भूसे की मानिंद हैं जो कि हवा से उड़ाया जाए। ख़ुदा उनकी बदकारी को उनके बच्चों के लिए जमा करता है। (अय्यूब 21:22-34): अय्यूब ज़ोफ़र की तसल्ली को इस सबब से कि इन सबके जवाबों में दग़ा है, अबस ठहराता है।
तीसरा दौर
सवाल 19: तीसरे दौर की तफ़्सील करें।
जवाब: इस हिस्से में दस, या’नी (22-31) अबवाब हैं।
बाईसवें बाब में एलीफ़ज़ तेमानी की तीसरी तक़रीर है। चुनान्चे (अय्यूब 22:1-5), में वो अय्यूब को सख़्त शरीर (बुरा) क़रार देता है और ख़ुदा के सामने मुजरिम और मुल्ज़िम ठहराता है और कहता है कि, “ख़ुदा को इन्सान से कुछ फ़ायदा नहीं पहुँच सकता और न उसकी रास्तबाज़ी से ख़ुशी हासिल होती है, क्योंकि उसकी शरारतें और बदकारियाँ बेहद हैं।” (अय्यूब 22:6-11), वो अय्यूब की ख़ताकारियों की तफ़्सील और नताइज बयान करता है कि, “ग़ालिबन उसने अपने भाई से गिरवी मांग (उधार वापस मांगा) और नंगे के कपड़े उतार लिए, थके-माँदे को पानी न पिलाया, न भूके को खाना खिलाया। ज़बरदस्ती से वो ज़मीन का मालिक बन बैठा और साहिब-ए-इज़्ज़त की तरह उसमें बसा रहा। नीज़, कहता है कि तूने बेवाओं को ख़ाली हाथ लौटा दिया होगा और यतीमों के बाज़ू तोड़े होंगे। इस सबब से तेरे चारों तरफ़ फंदे हैं और अचानक हौल तुझ पर पड़े हैं, और ऐसी तारीकी कि जिसके सबब तू देख नहीं सकता और पानी ऐसी बाढ़ लाया कि जिसने तुझको छिपा लिया है।”
(अय्यूब 22:12-20): में वो अय्यूब को ताकीद करता है कि अपनी बुरी राह से फिरे और उन शरीरों की मानिंद न हो जिन्होंने यह ख़याल किया कि ख़ुदा उनकी बदकारियों से वाक़िफ़ नहीं, और जान रख कि ख़ुदा आस्मान की बुलंदी पर है, तो भी वो इन्सान के अहवाल से आगाह और ख़ूब वाक़िफ़ है। और (अय्यूब 22:21-30) में अय्यूब को इस्लाह देता है कि, “वो ख़ुदा से आश्नाई करे तो उसकी ख़ैर होगी और वो सलामत रहेगा, और वो ख़ुदा के मुँह से उसकी शरीअत को ले और उसके कलाम को दिल में जगह दे और क़ादिर-ए-मुतलक़ की तरफ़ फिरे तो वो बहाल होगा।” और कहता है कि यह सब कुछ करने के लिए उसको बदकारी को अपने डेरे से दूर फेंकनी होगी, तब ख़ुदा उससे राज़ी होगा और वो उससे दु’आ माँगेगा तो वो सुनेगा और उसको उसके मन्सूबों में कामयाब करेगा और उसकी राहों में रोशनी चमकेगी।
(1) (अय्यूब 23-24 अबवाब): अय्यूब एलीफ़ज़ तेमानी को जवाब देता है।
(अय्यूब 23:1-9): इसमें अय्यूब एलीफ़ज़ की सलाह के बमूजब अपनी आरज़ू पेश करता है और कहता है कि, “मैं ख़ुदा को मिलना चाहता हूँ ताकि अपना मुआमला ख़ुद उसके सामने पेश करूँ और उसके जवाब का मुंतज़िर हूँ, क्योंकि मुझको यक़ीन है कि वो अपनी बड़ी क़ुदरत से मेरा मुक़ाबला न करेगा, बल्कि मुझे ताक़त बख़्शेगा।” मैं अफ़्सोस करता हूँ कि अब तक मुझको उसकी आश्नाई और शनासाई हासिल न हुई। (अय्यूब 23:10-17): “ताहम मुझको इस बात से तसल्ली है कि गो मैं ख़ुदा से ख़ूब वाक़िफ़ नहीं हूँ, पर वो मुझसे बख़ूबी वाक़िफ़ है और उसको मालूम है कि मैंने उसकी राह को हिफ़्ज़ किया है और उससे किनारा नहीं किया और उसके लबों के हुक्म से मुँह नहीं फेरा, बल्कि उनको अपनी ज़िंदगी की ज़रूरियात से ज़्यादा अज़ीज़ जानकर महफ़ूज़ रखा। तो भी जब मैं ख़ुदावन्द की क़ुदरतों को ख़याल में लाता हूँ तो मुझ पर ख़ौफ़ छा जाता है।”
चौबीसवें बाब में अय्यूब कहता है कि, “अज़-बस-कि इन्क़िलाबात क़ादिर-ए-मुतलक़ से पोशीदा नहीं, तो वो जो उसके आश्ना हैं, उसके अय्याम को नहीं देखते। ऐसे लोग भी हैं कि जो खेत के डांडों को सरकाते और ज़बरदस्ती ग़ल्लों को ले जाते हैं। वो मिस्कीनों को राह से हटा देते और ज़मीन के ग़रीब-ग़ुरबाओं के ख़ौफ़ से छुपते हैं। वो तरह-तरह के ज़ुल्म और ना-रास्ती करते हैं, तो भी रास्तबाज़ों और उनके अंजाम में कोई नुमायां फ़र्क़ मालूम नहीं होता कि क़ब्र इन दोनों को यकसाँ ले लेती है।” इन सब बातों की निस्बत वो अपनी ला-इल्मी का एतराफ़ करके अपने दोस्तों से इसका जवाब-तलब करता है।
(2) बिलदद सूखी की तीसरी तक़रीर
(3) (अय्यूब 25 बाब): इसमें बिलदद सूखी ख़ुदा की अज़मत और इन्सान की बे-क़दरी की निस्बत कहता है कि, “सल्तनत और मुहब्बत उसकी है, वो अपने ऊँचे मकानों में सुलह कराता है। पस, ख़ुदा के हुज़ूर इन्सान क्योंकर सादिक़ समझा जाए और वो जो औरत से पैदा हुआ है, क्योंकर पाक ठहरे? देख, उसकी नज़र में न चाँद की रोशनी और न सितारे पाक हैं, और इन्सान जो कि कीड़ा और आदमज़ाद है, वो क्योंकर पाक ठहर सकता है?”
(4) अय्यूब की आख़िरी तक़रीर (अय्यूब 26-31 अबवाब): इस तक़रीर में कई एक बातें हैं, मसलन:
(अ) (अय्यूब 26:1-4): में वो बिलदद सूखी की कुमक को अबस ठहराता है।
(ब) (अय्यूब 26:5-14): में वो ख़ुदा की क़ुदरत और दानिश और फैज़-ए-आम की तारीफ़ करता है।
(ज) (अय्यूब 27:1-12): में अय्यूब ख़ुदा की क़सम उठाकर बिलदद सूखी को कहता है कि, “मैं तुझे सादिक़ नहीं ठहरा सकता, क्योंकि मुझको अपनी सदाक़त क़ायम रखना ज़रूर है। रियाकारों को ख़ुदा से क्या उम्मीद हो सकती है? सो, मैं नहीं चाहता कि मेरा दिल मुझे मलामत करे।”
(द) (अय्यूब 27:13-23): में शरीर (बेदीन) की बदहाली और उसका अंजाम पेश करता और कहता है कि हर हालत में उसकी कामयाबी ला-हासिल है, क्योंकि उसको ख़ुदा और इन्सान की तरफ़ से किसी तरफ़ की मदद नहीं मिल सकती।
(र) (अय्यूब 28:1-19): में वो दुनियावी उलूम में इन्सान की लियाक़त और क़ाबिलियत की तारीफ़ करता है, ख़ासकर इस वास्ते कि ज़मीन में मदफ़ून और छिपे हुए ख़ज़ायन (ख़ज़ाने) दर्याफ़्त करके निकालता है। लेकिन फिर कहता है कि उसको मालूम नहीं कि दानाई कहाँ से मिल सकती है। वो फ़हीम (समझदार) के मकान और उसकी क़ीमत से नावाक़िफ़ है, क्योंकि वो ज़िंदों की ज़मीन से हासिल नहीं होती। गहराव कहता है कि, “दानाई मुझमें नहीं,” और समुंदर कहता है कि, “मेरे पास भी नहीं।” वो बेशक़ीमत है और सोने-चाँदी या क़ीमती पत्थरों के मुक़ाबले में ख़रीदी नहीं जा सकती।
(स) (अय्यूब 28:20-28): में अय्यूब सवाल पेश करता है, “दानाई कहाँ से आती है और फ़हीम (समझ) की जगह कहाँ है?” वो इन्सान की आँखों से पोशीदा है, फिर वो उसको कहाँ से मिल जाती है? हलाकत और मौत, दोनों कहती हैं कि, “हमने अपने कानों से उसकी शोहरत सुनी।” ख़ुदा उससे वाक़िफ़ है और उसके मुक़ाम को जानता है, क्योंकि वो ज़मीन की इंतिहा तक नज़र करता है और आस्मान के नीचे सब जगह देखता है। उसने इन्सान को कहा कि, “ख़ुदा का ख़ौफ़ दानाई है और बदी से दूर रहना ही फहीम (समझ) है।”
(श) (अय्यूब 29:1-25): में अय्यूब अपनी पहली हालत का ख़्वाहिशमंद है और कहता है कि जब ख़ुदा मेरी निगहबानी करता था, उसका चिराग़ मेरे सर पर रोशन था और मैं उसकी रोशनी में चलता था, क़ादिर-ए-मुतलक़ मेरे साथ था, मेरे बच्चे मेरे आस-पास थे, जवान और बुड्ढे मेरी ता’ज़ीम करते थे, यतीम और बेवाएँ मदद के लिए मेरे पास आती थीं, मैं ज़ालिमों और बे-इन्साफ़ों के बाज़ू तोड़ डालता था। लोग मेरी सुनते और मेरे मुंतज़िर रहते थे, मैं उनके दरमियान सरदार था और ग़मज़दा को तसल्ली देता था।
(त) (अय्यूब 30:1-15): में वो अपनी मौजूदा हालत का गुज़श्ता हालत से मुक़ाबला करता है और कहता है कि, “अब मेरी हिक़ारत उनसे की जाती है जिनके बाप-दादा अगर मेरे ग़ल्ले के कुत्तों में बिठाए जाते तो भी उसे ग़नीमत समझते। अब गो वो निहायत ही हक़ीर हैं, तो भी वो मुझसे घिन खाते हैं और मेरे मुँह पर थूकने से बाज़ नहीं आते।”
(ए) (अय्यूब 30:16-31): अय्यूब अपनी अज़िय्यत के सबब से ख़ुदा के सामने फ़र्याद करता है, और गो वो जानता है कि सब मुसीबत ख़ुदा की तरफ़ से है और उसको बहुत कम उम्मीद है कि उसकी सुनी जाएगी, तो भी कहता है कि जब आदमी गिरता है, तो ख़्वामख़ाह अपने दोनों हाथ फैलाता है कि शायद किसी न किसी तरह से सँभल जाए।
(फ़) (अय्यूब 31 बाब): में अय्यूब अपनी वफ़ादारी, दियानतदारी, फ़य्याज़ी, हम्दर्दी और मुसाफ़िर-परवरी से अपनी ज़िंदगी की सदाक़त साबित करता है और ख़ुदा को अपना गवाह क़रार देता है।
इलीहू की तक़रीर (अबवाब 32-37)
सवाल 20: इलीहू की कैफ़ियत बयान करो और उसकी तक़रीर की तफ़्सील करें।
जवाब: (अय्यूब 32:2) में ज़िक्र है कि इलीहू बिन बराकील बूज़ी का, जो राम के ख़ानदान में से था, बेटा था। बराकील का बहुत ज़िक्र नहीं, लेकिन उसका बाप नाहोर का बेटा और इब्राहीम का भतीजा था।
(अय्यूब 32:20-22): इलीहू बैठा-बैठा मुख़्तलिफ़ तक़रीरें सुनकर जोश में आ गया और अय्यूब पर इज़हार-ए-नाराज़गी की, क्योंकि वो अपने आपको ख़ुदा से ज़्यादा सादिक़ ठहराता था, और अय्यूब के दोस्तों पर इस वास्ते कि वो अय्यूब को बग़ैर किसी दलील या सबूत के ख़ताकार ठहराते थे, जबकि वो ख़ुद उसका क़ायल था।
(अय्यूब 32:1-5): में वो अपने ख़फ़ा होने के अस्बाब बयान करता है।
(अय्यूब 32:6-19): में वो कहता है कि, “बुज़ुर्गों की नाकामयाबी ने, गो मैं नौजवान हूँ, मजबूर किया कि उनका मुक़ाबला करूँ।”
(अय्यूब 33:1-11): में इलीहू अय्यूब से मुख़ातिब होकर कहता है कि, “मैं दिल की रास्ती से बोलूँगा और मारिफ़त की सही बातें कहूँगा।” और अय्यूब के इस दावे की कि, “वो पाक है और ख़ुदा उससे दुश्मनी रखता और उस पर सख़्ती करता है और उसके पाँव काठ में डालता है,” तर्दीद करता है।
(अय्यूब 33:12-33): में अय्यूब को जताता है कि उसने मुंसिफ़ी (इन्साफ़, अदल) नहीं की और कहता है कि ख़ुदा एक बार इन्सान से बोलता है, और अगर वो न सुने तो दोबारा, और बाज़-औक़ात रात के वक़्त रोया में या ख़्वाब में, वो इन्सान के कान खोलता है और उसके ज़हन में ता’लीम नक़्श करता है और उसको बचाता है। ख़ुदा इन्सान से ऐसा आली-क़द्र है कि वो हमेशा अपनी राह इन्सान पर ज़ाहिर नहीं करता, बल्कि हुक्म करता है। बा’ज़ दफ़ा ख़ुदा इन्सान को ऐसे दर्द के ज़रिए तम्बीह देता है कि वो बिस्तर पर पड़ जाता और रोटी खाने से भी आजिज़ रह जाता है और उसका गोश्त यहाँ तक सूख जाता है कि उसकी हड्डियाँ नज़र आने लगती हैं और वो क़ब्र के नज़दीक पहुँच जाता है। अगर ऐसे वक़्त में कोई पैग़म्बर या नासेह (नसीहत करने वाला) पास हो जो उसको उसके फ़राइज़ से आगाह करे, तो ख़ुदा उस पर रहम फ़रमाता है और क़ब्र में गिरने से बचाता है। वही ख़ुदा से दु’आ माँगता और ख़ुदा उस पर रहम फ़रमाता है, और आदमियों के सामने अपने गुनाहों का इक़रार भी करता है। ख़ुदावन्द इन्सान से तीन बार इस क़िस्म का सुलूक करता है ताकि वो क़ब्र से बचा रहे और ज़मीन की रोशनी से रोशन रहे। उसने अय्यूब को दोबारा ताकीद की कि वो ख़ामोश होकर उसकी सुने।
(अय्यूब 34:1-9): में वो इन अश्ख़ास की तवज्जोह अय्यूब की रास्तबाज़ी के दावे की तरफ़ लगाता है और कहता है कि हालाँकि अय्यूब शरीर के हमराह होकर शरारत करता है, तो भी वो अपने आपको सादिक़ ठहराता और ख़ुदा पर इल्ज़ाम लगाता है।
(अय्यूब 34:10-37): इलीहू उनके सामने ख़ुदा के इन्साफ़ की तारीफ़ करता और कहता है कि, “ऐसा नहीं है कि वो बे-इन्साफ़ी करे या क़ादिर-ए-मुतलक़ ऐसा करता है, बल्कि वो हर एक आदमी को उसके चाल-चलन के मुताबिक़ फल देता है। हर एक इन्सान अपने आमाल के बमूजब अज्र पाता है। ख़ुदा क़ादिर-ए-मुतलक़ है और अदालत में ख़लल नहीं डालता।” और ख़ास इन्हीं से मुख़ातिब होकर कहता है कि, “उसकी आँखें इन्सान की राहों पर लगी हैं और वो उसकी सब रविशों पर नज़र करता है। बदकार अपने आपको हरगिज़ छिपा नहीं सकता, और वो इस वास्ते कि वो उनके कामों से वाक़िफ़ है, उनको सज़ा और जज़ा देता है।” (34 बाब 29 से 37) आयत में वो कहता है कि अय्यूब को ख़ुदा ने ख़ास इस वास्ते इस हालत में मुब्तला किया कि उसको अपने मातहतों को तंग करने और उन पर ज़ुल्म करने का मौक़ा न मिले। सो, इस वास्ते वो कहता है कि मुनासिब है कि अय्यूब ख़ुदा के सामने तौबा करके इक़रार करे कि वो फिर इस तरह न करेगा।
इलीहू चाहता है कि ख़ुदा अय्यूब को आख़िर तक आज़माए।
(अय्यूब 35 बाब): में इलीहू अय्यूब से सवाल करता है कि, “क्या तूने जो कुछ कहा है, उसे वाजिब समझता है? क्या तेरी सदाक़त सच-मुच ख़ुदा की सदाक़त से बड़ी है?” और उसे मुतनब्बाह (आगाह किया) करता और कहता है कि ख़ुदा का मर्तबा इन्सान के मर्तबे से इसलिए आ’ला और आली-क़द्र है कि वो इन्सान से बहुत बड़ा और अफ़्ज़ल है, और इन्सान उसके सामने कुछ हक़ीक़त नहीं रखता। उसकी रास्तबाज़ी और बदी से ख़ुदा को कुछ नफ़ा और नुक़्सान नहीं पहुँचता। हाँ, अलबत्ता तेरी शरारत से इन्सान को ज़रूर ज़रर (नुक़्सान) और सदाक़त से नफ़ा पहुँच सकता है। तेरी दु’आ और तेरी बद-किर्दारी, ग़ुरूर और ज़ाती भरोसे की वजह से, लायक़-ए-क़बूलियत नहीं, क्योंकि ख़ुदा रियाकार और मग़रूर की दु’आ नहीं सुनता।
(अय्यूब 36:1-16): में इलीहू इन्सान के लिए ख़ुदा के हर एक सुलूक को जायज़ ठहरा कर कहता है कि वो शरीरों को जीने नहीं देता, पर मज़लूमों का इन्साफ़ करता है। वो रास्तबाज़ों से चश्म-पोशी नहीं करता, बल्कि उन्हें उनकी मुसीबतों से छुटकारा देता और उनके गुनाहों को उन पर ज़ाहिर करता और उनके कामों को खोलता है कि उनकी तर्बियत हो। वो उनको हुक्म करता है कि वो बदी और बदकारी से बाज़ आएँ, और वा’दा करता है कि अगर वो मुतवज्जह होकर मेरी बंदगी करें, तो वो अपने दिनों को ऐश और बरसों को इशरत में बसर करेंगे। लेकिन अगर वो फ़रमांबरदारी न करें, तो वो तलवार से हलाक किए जाएँगे और बेवक़ूफ़ी में मरेंगे। बे-दीनों की जान जवानी में जाती है, लेकिन वो मुसीबत के क़ैदियों को रिहाई बख़्शता है।
(अय्यूब 36:17-33): इलीहू अय्यूब को कहता है कि, “शरारत से भरा हुआ है, सो अदल-ओ-इन्साफ़ ने तुझको गिरफ़्तार किया है, और ताकीद करता है कि ख़ुदा की तम्बीह सब्र से बर्दाश्त कर, क्योंकि वो आदिल है, उसकी अदालत और दानाई में हरगिज़ नुक़्स दख़ल नहीं पाता।”
(अय्यूब 37:14-24): वो अय्यूब के सामने ख़ुदा की दानिशमंदी और हिक्मत और क़ुदरत ज़ाहिर करता और उससे इस्तिफ़सार (दर्याफ़्त) करता है कि क्या वो इसका इल्म रखता है कि इन्सान क़ादिर-ए-मुतलक़ के भेद तक नहीं पहुँच सकता, कि उसकी अदालत और क़ुदरत अज़ीम है और उसका इन्साफ़ फ़िरावाँ (बहुत ज़्यादा) है, और चाहिए कि लोग उससे डरें, क्योंकि वो उनमें से किसी पर, जो अपने दिल में अक़्लमंद हैं, पर निगाह नहीं करता और तसदि’आ (तक्लीफ़) नहीं देता।
सवाल 21: दूसरे हिस्से की चौथी बात की तश्रीह करें।
जवाब: इस चौथी बात में चार अबवाब हैं, या’नी (बाब 38-42:1-6 आयत तक)।
इन अबवाब में ख़ुदावन्द की तक़रीर ब-तफ़्सील दर्ज-ए-ज़ैल है:
(अ) (अय्यूब 38 बाब): में ख़ुदावन्द बगोले में से अय्यूब को दुनिया की पैदाइश और उसके इंतिज़ाम के सिलसिले के बारे में चंद सवालात के ज़रिए इल्म-ओ-अक़्ल में क़ासिर होने का क़ायल करता है। चुनान्चे, ख़ुदावन्द उससे सवाल करता है कि, “जब मैंने दुनिया की बुनियाद डाली तो तू कहाँ था? क्या तू उसकी पैदाइश और उसकी तंज़ीम (इंतिज़ाम) में शरीक व शामिल था? क्या तू मक़्दूर (ताक़त) रखता है कि सुबह पर, बारिश पर, समुंदर पर या बिजली पर अपना हुक्म चलाए? क्या तू जंगली जानवरों और कौए की ग़िज़ा तैयार कर सकता है, जबकि उनके बच्चे ख़ुदा के सामने चिल्लाते और ख़ुराक के मुहताज होकर भटकते फिरते हैं?”
(ब) (अय्यूब 39 बाब): में ख़ुदावन्द हिरनी, गोरख़र, गेंडे और शुतुरमुर्ग की आदात पेश करके अय्यूब से सवाल पेश करता है कि, “क्या तू उनसे वाक़िफ़ है? क्या तूने घोड़े को ऐसा ज़ोर बख़्शा है कि वो दहशत पर हँसता है और जंग में हरसां नहीं होता? क्या बाज़ तेरी होशियारी से उड़ता है? या उक़ाब तेरे ही हुक्म से बुलंदी पर परवाज़ करता और ऊँचाई पर घोंसला बनाता है?”
(ज) (अय्यूब 40:1-5): ख़ुदावन्द अय्यूब से मुख़ातिब होकर कहता है कि, “तेरा मुझसे झगड़ना और मुक़ाबला करना अबस है।” अय्यूब ने उससे क़ायल होकर कहा कि, “मैं अपने मुँह पर हाथ रखता हूँ और ख़ामोश हो रहा।”
(द) (अय्यूब 40:6-14): में गर्द-बाद में ज़ाहिर होकर अय्यूब से सवाल करता है कि, “क्या तू मेरी अदालत को बातिल ठहराना चाहता है? क्या तू मुझे मुजरिम क़रार देगा कि तू सादिक़ ठहरे? तू अपने तईं शौकत और फ़ज़ीलत से सँवार और जलाल से मलबूस हो। अपने ग़ुस्से का जोश बढ़ा और मग़रूरों को पस्त कर और शरीरों को उनके मकान में लताड़ डाल, तो मैं तेरा इक़रार करूँगा कि तेरा दाहिना हाथ तुझे रिहाई दे सकता है।”
(र) (अय्यूब 40:15-24): में ख़ुदावन्द अय्यूब की तवज्जोह दरियाई घोड़े की तरफ़ लगाता है कि वो उसकी आदात और उसके ज़ोर पर ग़ौर करे और पूछता है कि क्या वो इन्सान के क़ाबू में आ सकता है?
(स) (अय्यूब 41 बाब): में अय्यूब की तवज्जोह लिवियातान की तरफ़ मुतवज्जह करता है और उसे बताता है कि वो भी हरगिज़ इन्सान के क़ाबू में नहीं आ सकता। सो, जबकि इन्सान को जुर्अत नहीं कि उसको, जो मख़्लूक़ है, छेड़े, तो वो कौन है जो उसके ख़ालिक़ का मुक़ाबला करे?
(स) (अय्यूब 42:1-6): में अय्यूब इन सब के जवाब में कहता है कि, “मैं जानता हूँ कि तू सब कुछ कर सकता है और यह मुम्किन नहीं कि तेरा कोई इरादा अंजाम तक न पहुँचे।” इस क़ाबिलियत पर अय्यूब ने अपने क़सूर मान लिए और कहा कि, “मैंने तेरी ख़बर कानों से सुनी थी, लेकिन अब मेरी आँखें तुझे देखती हैं। सो, मैं अपने से बेज़ार हूँ, ख़ाक और राख पर बैठा हुआ तौबा करता हूँ।”
तीसरा हिस्सा: ततिम्मा
सवाल 22: अय्यूब की किताब के तीसरे हिस्से, या’नी ततिम्मे (बक़ीया), का मुख़्तसर बयान करें।
जवाब: यह अय्यूब की किताब का ततिम्मा (अय्यूब 42:7-17) है। इस हिस्से में अय्यूब की बहाली, सर्फ़राज़ी और ख़ुदावन्द की तरफ़ से उसके दोस्तों को सोख़्तनी क़ुर्बानियाँ गुज़ारने का हुक्म दिया गया, और अय्यूब को उसकी ख़ातिर क़बूलियत के वा’दे पर अपने दोस्तों के लिए दु’आ माँगने का हुक्म मिलना मुन्दरज है। अय्यूब की हालत की तब्दीली उस वक़्त हुई जब उसने अपने दोस्तों को मु’आफ़ किया और उनके लिए दु’आ माँगी। ख़ुदावन्द ने अय्यूब को उसकी आख़िरी उम्र में, या’नी आज़माइश के बाद, उसकी पहली ज़िंदगी की ब-निस्बत ज़्यादा मुतव्विल (दौलतमंद) और बा-बरकत बनाया, और वो उम्र-रसीदा होकर मर गया।
सवाल 23: अय्यूब की कुल किताब को बहस करने वालों के लिहाज़ से तक़्सीम करें।
जवाब: इस किताब में 42 अबवाब हैं, जिनमें से 1-2 तमहीदी हैं।
(20) अबवाब, या’नी (3, 6, 7, 9, 10, 12, 13, 14, 16, 17, 19, 21, 23, 24, 26, 27, 28, 29 और 30), में अय्यूब की तक़ारीर हैं। (4) अबवाब, या’नी (4, 5, 15, 22), में एलीफ़ज़ तेमानी की क़ील-ओ-क़ाल (गुफ़्तगू, बातचीत) है।
(3) अबवाब, या’नी (8, 18, 25), में बिलदद सूखी की, (2), या’नी (11, 20) अबवाब, में ज़ोफ़र नामाती की, (6), या’नी (32, 33, 34, 35, 36 और 37), में इलीहू की, और (5), या’नी (38, 39, 40, 41 और 42), में ख़ुदावन्द की तक़ारीर हैं।
नोट:
अय्यूब शैतान के सवाल का जवाब देता है। उसकी वफ़ादारी इस बात की शाहिद व सुबूत ठहरी कि वो उसकी ख़ुदगर्ज़ी के सबब से ख़ुदा से प्यार न करता था। और इस सवाल का जवाब अय्यूब के दोस्तों की तरफ़ से था कि दुनिया में दुख और मुसीबत का क्या सबब है, और कि इन्सान उनमें क्यों मुब्तला होता है? इसका जवाब ख़ुदावन्द की तरफ़ से दिया गया कि इन्सान उसका मख़्लूक़ और ख़ादिम है, सो वो उसको अपनी ख़िदमत के वास्ते तैयार करता और अपना जलाल इस वसीले से ज़ाहिर करता है। लिहाज़ा, इन्सान का फ़र्ज़-ए-कुल्ली यह है कि वो ख़ुदा से डरे और बदी से बाज़ रहे और फ़र्ज़ को पहचान कर फ़रमांबरदारी और इता’अत करे।
(तमाम शुद)
ज़बूर की किताब
बाब अव्वलतम्हीद और तवारीख़
सवाल 1: ज़बूर की किताब की तारीफ़ करें।
जवाब: ज़बूर की किताब इब्रानी के हिस्से अव्वल की सोयम किताब है और हेगियोग्राफ़ा, या’नी नविश्ता, कहलाती है। इस सबब से बाक़ी तमाम नज़मी कुतुब ज़बूर की किताब पर मुश्तमिल हैं। पुराने अहदनामे में क़ौम-ए-इस्राईल की दीनी तवारीख़ है, और ज़बूर की किताब में इस क़ौम के बानी, नजात-दहिंदा और बादशाह की तारीफ़ और कैफ़ियत है। यह इस क़ौम की ख़ास इबादती किताब है, जिसके वसीले से वो क़ौम ख़ुदा के हुज़ूर पहचानी जाती थी और यह उनके लिए ख़ुदा की तरफ़ से ख़ास रूहानी बरकात हासिल करती थी। इस किताब के मुतालआ से हमको न सिर्फ़ इस क़ौम की रूहानी बरकात का इल्म होता है, बल्कि हम ख़ुदा की भी वाक़फ़ियत हासिल करते हैं, जिसने इस क़ौम को बरकतें दीं। अलावा अज़ीं, यह भी मालूम होता है कि यह किताब सिर्फ़ इस क़ौम के लिए न थी, बल्कि ख़ुदा के कुल बर्गुज़ीदा लोगों के लिए है, जो फ़ी-ज़माना हर क़ौम व मिल्लत में से बुलाए जाते और उसके ग़ल्ले में शमूलियत पाते हैं। चुनान्चे, यह किताब हमारे पास भी है कि इसके मुतालआ और तशख़्ख़ुस से हम भी ख़ुदा के पास पहुँचने के क़ाबिल हों और रूहानी बरकात के बानी से वाक़िफ़ हों और अबदी ज़िंदगी हासिल करके रूहानी बरकतें हासिल करें।
सवाल 2: इस किताब के मुसन्निफ़ीन की कैफ़ियत बयान करें।
जवाब: ज़बूर की किताब एक ही मुसन्निफ़ से एक ही ज़माने में तस्नीफ़ नहीं हुई। इसके कई एक मुसन्निफ़ हैं जो कि इसकी तस्नीफ़ में मूसा से लेकर एज़्रा तक एक हज़ार साल तक मसरूफ़ रहे। यह किताब ब-इस्तेदाद-ए-रूह-उल-क़ुद्स कलीसिया से कलीसिया के वास्ते मुरत्तिब हुई। इस किताब में कुल (150) ज़बूर हैं, जिनमें से एक सौ ऐसे हैं जिनके मुसन्निफ़ों के नाम उनके सरनामों में मुन्दरज हैं। चुनान्चे, इनमें से (73) दाऊद के, (11) बनी-क़ोरह के, (12) आसफ़ के, दो सुलेमान के और एक मूसा का है, बाक़ी (50) ब-बा'इस-ए-गुमनाम होने के यतीम कहलाते हैं। हो सकता है कि उनमें से ज़्यादा दाऊद की तस्नीफ़ हों।
सवाल 3: बनी-इस्राईल के ज़माने में यह किताब किन नामों से मशहूर थी?
जवाब: बनी-इस्राईल के ज़माने में यह किताब इब्रानी ज़बान में ‘तहिलीम’ या ‘सफ़र तहिलीम’, या’नी तारीफ़-ओ-हम्द की किताब, कहलाती थी। इसको ‘तिफ़्लोथ’, या’नी दु’आओं की किताब भी कहते थे (ज़बूर 72 आयत)। और सेप्टुआजेंट, या’नी हफ़्तादी तर्जुमे में, ‘साल्म्स’ कहा गया है, और यह लफ़्ज़ ‘मज़मूर’ का तर्जुमा है। यहूदियों के ज़माने के बाद वैटिकन तर्जुमे में लफ़्ज़ ‘साल्म’ ही इस्तिमाल हुआ है और यूनानी ज़बान में ‘साल्टर’ कहलाई।
सवाल 4: ज़बूर की किताब की तक़्सीम करें।
जवाब: इस किताब में पाँच हिस्से हैं।
हर एक हिस्सा एक किताब है, इसलिए बा’ज़ ने इसको पेंटाट्यूक भी कहा है। ज़बूर की किताब मख़्सूस-बिल-इबादत है और हैकल की इबादत में इस्तिमाल होती थी। इसकी पाँच किताबें हस्ब-ए-ज़ैल हैं:
(अ) (ज़बूर 1-41): या’नी शुरू के 41 ज़बूर। मासिवाए (1, 2, 10, 33) ज़बूरों के, बाक़ी सब के सब दाऊद की तस्नीफ़ हैं। इसका ख़ातिमा तम्जीद, तस्लीस और दोहराई आमीन से होता है। यह किताब सुलेमान के अय्याम में हैकल की इबादत के लिए तालीफ़ हुई थी।
(ब) (ज़बूर 42-72): या’नी 31 ज़बूरों का मजमूआ। इनमें से अठारह तो दाऊद के हैं, चार गुमनाम, सात बनी-क़ोरह की तस्नीफ़, और एक आसफ़ का और एक सुलेमान का है। यह किताब भी किताब-ए-अव्वल की तरह तम्जीद, तस्लीस और दोहराई आमीन से ख़त्म होती है, और इसके इख़्तिताम पर भी आया है कि, “दाऊद बिन यिशै की दु’आएँ ख़त्म हुईं।” यह किताब सुलेमान के वक़्त में हैकल की इबादत के लिए तालीफ़ हुई।
(ज) (ज़बूर 73-89): या’नी सत्रह (17) ज़बूरों की किताब। इनमें से सिर्फ़ एक दाऊद का है, (11) आसफ़ के, (4) बनी-क़ोरह का, और (1) एतान अरूखी का है। यह भी किताब अव्वल और दुव्वम की तरह ख़त्म होती है। ग़ालिबन हिज़क़ियाह बादशाह के दिनों में, जबकि उसने यहूदियों की इस्लाह करके हैकल की इबादत फिर शुरू की, तस्नीफ़ हुई (देखो 2 तवारीख़ 29:20-30)।
(द) इसमें (17), या’नी (ज़बूर 90-106) हैं। इनमें से ज़बूर (90) तो मूसा का है, यह सबसे पुराना ज़बूर मालूम होता है। (14) ज़बूर गुमनाम हैं, (2) ज़बूर दाऊद के हैं। यह तम्जीद, तस्लीस और ‘सुम्मा आमीन’ से ख़त्म होती है। इन (40) ज़बूरों में से कई ज़बूर यहोशाफ़ात और हिज़क़ियाह बादशाह के ऐय्याम की तस्नीफ़ हैं। यह किताब असीरी (ग़ुलामी) के बाद तालीफ़ हुई और इसका ज़बूर (102) अय्याम-ए-असीरी की तस्नीफ़ है, जो कि ग़ालिबन एज़्रा का है।
(र) इसमें (44), या’नी (ज़बूर 107-150) हैं। इनमें से (28) तो गुमनाम हैं, और या’नी इनके मुसन्निफ़ीन का कुछ पता नहीं कि कौन थे और कब हुए। (15) दाऊद के और (1) सुलेमान का। यह गुमान किया जाता है कि यह किताब ग़ालिबन असीरी (गुलामी) के बाद एज़्रा के हाथ से तालीफ़ हुई। इसके ख़ातमे पर कई एक ‘हालेलू-याह’ हैं।
इस किताब ज़बूर के छह (6) हिस्से हैं
सवाल 5: मज़मून के लिहाज़ से ज़बूर की किताब की तक़्सीम व तफ़्सील करें।
जवाब: ब-लिहाज़-ए-मज़मून इस किताब के छह हिस्से हैं: (1) दु’आइया हिस्सा, (2) शुक्राना व हम्द, (3) इबादती, (4) उसूली व ता’लीमी, (5) मसीहाना, और (6) तवारीख़ी।
हिस्सा अव्वल: दु’आइया। इसकी यूँ तक़्सीम की गई है:
(अ) गुनाह की मु’आफ़ी और रहम के वास्ते दु’आ (ज़बूर 6, 25, 51, 130)। इस ज़ुमरे में ज़बूर 32, 102 नादिम (पशिमाँ, शर्मसार) ज़बूर हैं।
(ब) ग़मज़दगी की दु’आएँ, ख़ासकर उस वक़्त की जब कि ख़ुदा का परस्तार उससे महरूम रखा जाता है (ज़बूर 42, 43, 63, 84)।
(ज) मदद और रिहाई के लिए दु’आएँ, जब कि दुख, तक्लीफ़ और ख़तरे में हो (ज़बूर 4, 5, 28, 44, 55, 64, 79, 80, 83, 109, 120, 140, 141, 142)।
हिस्सा दुव्वम: शुक्राना व हम्द। इसमें दो छोटे हिस्से हैं:
(अ) शख़्सी बरकतों के वास्ते शुक्रगुज़ारी (ज़बूर 9, 18, 27, 30, 34, 40, 108, 116, 118, 138, 144, 145)।
(ब) आम कलीसियाई बरकतों के लिए शुक्रगुज़ारी (ज़बूर 46, 48, 68, 81, 85, 98, 117, 124, 126, 129, 149)।
हिस्सा सोयम: इबादती। इसमें भी दो छोटे हिस्से हैं:
(अ) ख़ुदा की सिफ़ात की तारीफ़ और बुज़ुर्गी और उसके जलाल और कामिलियत के बारे में (ज़बूर 8, 19, 24, 29, 33, 47, 50, 65, 66, 76, 93, 96, 99, 104, 111, 113, 114, 115, 134, 139, 148, 150)।
(ब) ख़ुदा की मुहाफ़िज़त और उसकी तारीफ़ (ज़बूर 23, 91, 100, 103, 107, 121, 146)।
हिस्सा चहारुम: उसूली व ता’लीमी। यह भी कई एक हिस्सों में मुनक़सिम है, मसलन:
(अ) पाक कलाम की खूबियाँ (ज़बूर 19, 119)।
(ब) फ़ानी इन्सान की बतालत (ज़बूर 39, 49, 90)।
(ज) नेक-ओ-बद अश्ख़ास के ख़साइल (ज़बूर 1, 5, 7, 10, 11, 12, 14, 15, 17, 36, 37, 52, 58, 73, 75, 92, 94, 112, 125, 127, 128, 135)।
हिस्सा पंजुम: मसीहाना। इस हिस्से में ख़ुदावन्द मसीह की आमद, ओहदे, ख़िदमत और अज़िय्यत की पेशगोई और उसकी तारीफ़ है, जो कि इन ज़बूरों में है (ज़बूर 2, 20, 21, 22, 35, 41, 45, 61, 68, 72, 87, 89, 110, 132)।
हिस्सा शशुम: तवारीख़ी। इस हिस्से में बनी-इस्राईल की तवारीख़ है। इसमें पाँच ज़बूर हैं, या’नी (ज़बूर 78, 105, 106, 135, 136)।
सवाल 6: हमें दाऊद का क्यों एहसानमंद और शुक्रगुज़ार होना चाहिए?
जवाब: हमें दाऊद के एहसानमंद और शुक्रगुज़ार इसलिए होना चाहिए कि:
(अ) उसने गाने के ज़रिए हम्द-ओ-सना को इबादत का अव्वल और ज़रूरी हिस्सा ठहराया, जिसमें सब ख़्वांदा और ना-ख़्वांदा शमूलियत कर सकते हैं।
(ब) उसके ज़रिए ख़ुदा ने हम्द-ओ-सना की किताब अता फ़रमाई, जिसके इस्तिमाल से हमको ख़ुदा तक रसाई हासिल होती है और हमको ऐसी बरकतें मिलती हैं कि जिनसे हमारी ज़िंदगी तर-ओ-ताज़ा, बहाल और फलदार बनी रहती है।
(ज) दाऊद के ज़माने तक ख़ुदा की इबादत में सना-ख़्वानी शाज़-ओ-नादिर होती थी, लेकिन दाऊद ने इसको इबादत का ज़रूरी हिस्सा क़रार दिया, जो कि आज तक जारी है। दाऊद सिर्फ़ शा’इर ही न था, बल्कि इल्म-ए-मौसीक़ी में उसको काफ़ी दस्तरस और मलिका (महारत) था। इस सिफ़ात-ओ-कमाल की किताब को दाऊद ने मुल्हिम होकर लिखा।
(द) यह ज़रूरी बात है कि हादी व पेशवा अश्ख़ास ख़ुद ख़ुदा-शनास होकर, ख़ुदा की सिफ़ात-ए-कामिला को औरों पर ज़ाहिर करने के क़ाबिल हों। दाऊद के ज़बूरों के अलावा दीगर लिखने वाले भी मुल्हिम अश्ख़ास थे, इसलिए वो औरों के रहबर होने के क़ाबिल थे।
(र) ग़ैर-मुल्हिम अश्ख़ास के गीतों में एक ख़ास नुक़्स होता है कि उनके मज़मूनों का बड़ा हिस्सा ख़ुदा नहीं होता और न हो सकता है। ज़बूरों में, जो कि इल्हामी हैं, ख़ुदा मुख़ातिब है जो कि इन्सान से कलाम करता है, इसलिए तमाम ज़बूर ब-ऐनिहि सही हैं। उनकी ता’लीम में भी किसी क़िस्म का नुक़्स नहीं। वो ख़ुदा की सब सिफ़ात सही और वाज़ेह तौर पर बयान करते हैं और उस तक रसाई हासिल करने के ज़रूरी और वाजिबी तरीक़े भी बताते हैं। सो, सिर्फ़ ज़बूर ही से ख़ुदा की इबादत मा’क़ूल और मक़्बूल हो, क्योंकि ख़ुदा, जो अपनी सिफ़ात में कमाल रखता है, इन्सान से कामिल इबादत तलब करता है, ख़्वाह अलामती हो, ख़्वाह मा’नवी।
सो, इस किताब के लिए न सिर्फ़ दाऊद की, बल्कि उससे पेश्तर ख़ुदा की शुक्रगुज़ारी बहुत ज़रूरी है।
सवाल 7: ज़बूर की किताब में किन बातों की ता’लीम है?
जवाब: ज़बूर की किताब कुल बाइबल का जमाल और ख़ुलासा है, क्योंकि ज़बूर की किताब की ग़र्ज़ व ग़ायत मसीह की कलीसिया की आरास्तगी व इस्लाह है। इसमें इल्म-ए-इलाही की कुल ता’लीम दर्ज है, ताकि वो ख़ुदा की ज़ात-ओ-सिफ़ात को सफ़ाई से ज़ाहिर करे, और इन्सान की गुनाह-आलूदगी, तंग-दस्ती, बर्गश्तगी और मुस्तौजिब-ए-सज़ा होने को बख़ूबी बयान करे, और उसकी तवज्जोह राह-ए-नजात की तरफ़ लगाए और नजात की खूबियाँ इन्सान पर अयाँ व बयान करे। इस लिहाज़ से इस किताब का मुतालआ ग़ौर और दिल से करना चाहिए।
सवाल 8: ज़बूर की किताब के नज़मी तर्जुमों की तवारीख़ बयान करो।
जवाब: (1518 ई॰) में माइल्स कवरडेल साहब ने इस किताब का तर्जुमा अंग्रेज़ी ज़बान में किया। इसके बाद थॉमस स्टर्नहोल्ड और हॉपकिंस साहिबान ने एक मंज़ूमी तर्जुमा अंग्रेज़ी में तैयार किया, और (1563 ई॰) में इंग्लिस्तान की मलिका एलिज़ाबेथ ने इस तर्जुमे को मंज़ूर फ़रमा कर इंग्लिस्तान की कलीसिया में जारी करवाया, और 35 साल के अर्से में इस तर्जुमे की छपवाई 309 दफ़ा हुई। इसके बाद टेट और ब्रैडी साहिबान ने एक और तर्जुमा किया जो कि स्टर्नहोल्ड और हॉपकिंस तर्जुमे की जगह चर्च ऑफ़ इंग्लैंड में इस्तिमाल होना शुरू हुआ। दीगर कलीसियाएँ गीतों की आमद तक स्टर्नहोल्ड और हॉपकिंस तर्जुमा ही इस्तिमाल करती रहीं। (1646 ई॰) में फ्रांसिस राउज़ साहब ने, जो कि चार्ल्स अव्वल शाह-ए-इंग्लिस्तान के अहद में पार्लियामेंट का मेंबर और बाद में क्रॉमवेल के मुशीरों में शुमार हुए, ज़बूरों का मंज़ूमी तर्जुमा किया, जो कि पहले तराजुम से बढ़कर था। चुनान्चे, वेस्टमिंस्टर असेंबली ने यह तर्जुमा कलीसिया-ए-इंग्लिस्तान के लिए मंज़ूर किया, और कुछ अर्से के बाद मुल्क स्कॉटलैंड की प्रेस्बिटेरियन कलीसिया की जनरल असेंबली ने भी यह तर्जुमा कलीसिया-ए-स्कॉटलैंड के लिए मंज़ूर किया, और अमरीका की रिफ़ॉर्म्ड और यूनाइटेड प्रेस्बिटेरियन कलीसियाओं ने भी इसको इबादत में इस्तिमाल करना शुरू किया।
(1715 ई॰) में आइज़ैक वॉट्स साहब ने एक गीत-माला ऐन ज़बूरों की मिस्ल तैयार की। चंद बरस हुए कि अमरीका की यूनाइटेड प्रेस्बिटेरियन जनरल असेंबली ने राउज़ साहब के तर्जुमे की नज़र-ए-सानी करवाई और उसे अपनी कलीसियाओं में राइज किया। अठारहवीं सदी के शुरू में वॉट्स और वेस्ली साहिबान के बनाए हुए गीत ज़बूरों की जगह, जो कि हर एक मसीही जमा’अत के लिए ख़ुदा की ख़ास बख़्शिश और रूहानी बरकात का सबब हैं, इस्तिमाल होने लगे। इससे कलीसियाओं में एक बिद’अत क़ियाम पकड़ गई, जिसका नतीजा मौजूदा ज़माने में यह नज़र आ रहा है कि हर एक मसीही फ़िर्क़ा अपनी मर्ज़ी के मुवाफ़िक़ गीत तैयार करके इबादत में इस्तिमाल करता है। मुल्क-ए-पंजाब में दाऊद के ज़बूरों का उर्दू तर्जुमा डॉक्टर एंड्रयू गॉर्डन, डॉक्टर आई॰ डी॰ शाहबाज़ और पादरी लिटमन साहिबान का तैयार किया हुआ है, जो कि कुछ अर्से तक यू॰ पी॰ कलीसिया में जारी रहा, और आजकल जो पंजाबी तर्जुमा यू॰ पी॰ कलीसिया में राइज है, वो पादरी डी॰ एस॰ लाइटोनल और डॉक्टर आई॰ डी॰ शाहबाज़ साहिबान का तैयार किया हुआ है। इसका इस्तिमाल यू॰ पी॰ जमा’अत की दूसरी मसीही जमा’अतों में भी होता है।
सवाल 9: ज़बूरों के इस्तिमाल की तवारीख़ बयान करें।
जवाब: दाऊद, यसायाह, यिर्मयाह और कुल अम्बिया ने ख़ुदा की इबादत के औक़ात पर सिर्फ़ ज़बूरों का इस्तिमाल किया करते थे। बादशाह अपनी फ़त्हमंदी की ख़ुशी पर इन ज़बूरों को गाते थे, और यहूदी लोग असीरी (गुलामी) से वापस आते हुए गाकर ख़ुदा की हम्द-ओ-सना, तारीफ़ और तम्जीद करते थे। इस तरह से वो एक दूसरे का हौसला बढ़ाते और दिलों को तक़वियत देते थे, ताकि वो दिलेर होकर अपने मालिक, ख़ुदा और क़ौम के लिए जंग करें।
हमारे ख़ुदावन्द येसू मसीह और उसके शागिर्दों ने अशा-ए-रब्बानी के मौक़े पर, जबकि मसीह सलीब के वास्ते तैयार हो रहे थे, ज़बूर गाया। पौलूस और सीलास, जबकि वो दोनों क़ैद-ख़ाने की तंग-ओ-तारीक कोठड़ी में ज़ंजीरों से जकड़े हुए और पाँव शिकंजे में थे, ज़बूर गाते हुए हम्द-ओ-सना की सदा बुलंद की और दु’आ माँगी, जिसके जवाब में एक बड़ा भूचाल आया, क़ैद-ख़ाने की न्यू (बुनियाद) हिल गई और सब दरवाज़े यक-दम खुल गए और सबकी बेड़ियाँ ख़ुद-ब-ख़ुद उतर गईं और वो रिहा किए गए। रसूली कलीसिया बराबर इन ज़बूरों को इस्तिमाल करती रही। मसीही शहीद, जबकि वो तरह-तरह की सऊबतें उठाते और ज़िंदा आग में जलाए जाते थे, तो ज़बूर गाते हुए अपनी रूहें ख़ुदा के हुज़ूर पेश करते थे। बुज़ुर्ग ऑगस्टीन ने, जब वो मसीही हुआ, तो शुक्रगुज़ारी और हम्द में ज़बूर गाया। क्रिसोस्टोम ने जिलावतनी में इन ज़बूरों से तसल्ली व तश्फ़ी पाई। बर्नार्ड, हस, जेरोम ऑफ़ प्राग ने दम-ए-नज़’अ (मौत के क़रीब हालत) ने ज़बूर गाकर तसल्ली पाई और ब-तमाम इत्मीनान जांबाहक़ हुए। मार्टिन लूथर अपने मुक़द्दमे की पेशी पर ज़बूर गाता हुआ वज्द और सरवर और दिल-जमई के साथ शहर-ए-रोम में दाख़िल हुआ। यह है मुश्त-ए-नमूना अज़ खजजवारे (ढेर में से मुट्ठी भर मिसालें) इन ज़बूरों की तासीर के मुताल्लिक़। ज़बूरों की तवारीख़ कलीसिया और कलीसिया के हर फ़र्द के दिल की तारीख़ है, जिसमें ख़ुदा की रूह सुकूनत-पज़ीर है। इस तरह उन ज़बूरों का, जो कि रूहानी ग़ज़लें हैं, इस्तिमाल मसीही जमा’अतों और हर मसीही जमा’अत के अफ़राद के वास्ते ज़रूरी, मुफ़ीद और मोअस्सर है।
बाब दुव्वम
ज़बूर की पहली किताब
सवाल 10: ज़बूर की पहली किताब की तफ़्सील व तश्रीह बयान करो।
जवाब: ज़बूर की पहली किताब में कुल 150 ज़बूरों में से पहले 41 ज़बूर हैं, उनमें से (12), या’नी (3, 4, 5, 6, 13, 16, 25, 26, 28, 31, 32, 34) दु’आइया हैं, (6), या’नी (9, 18, 27, 30, 33, 40) शुक्रगुज़ारी के हैं, (5), या’नी (8, 23, 24, 29, 33) इबादती हैं, (12), या’नी (1, 7, 10, 11, 12, 14, 15, 17, 19, 36, 37, 39) उसूली और ता’लीमी हैं, और (6), या’नी (2, 20, 21, 22, 35, 41) मसीहाना हैं।
हम ज़बूरों की तश्रीह ब-लिहाज़-ए-मज़मून नहीं, बल्कि तर्तीब से करेंगे।
(ज़बूर 1): यह ज़बूर तमहीदी समझा जाता है और ख़याल किया जाता है कि एज़्रा ने इसको तस्नीफ़ किया। बेशक, यह मसीहाना ज़बूरों में से नहीं। यह नेक व बदकार आदमी की ख़ासियत, हालत और अंजाम पेश करता है। आयात (1-3) में नेक आदमी की ख़सलत (आदत) और उसकी मुबारकबादी है। आयात (4-6) में बुरे आदमी का हाल और अंजाम-ए-बद मिलता है।
(ज़बूर 2): यह पहला मसीहाना ज़बूर समझा जाता है। इसकी तारीख़ 1044 क़ब्ल-अज़-मसीह है। आयात (1-9) में मसीह का शाहाना तक़र्रुर और दुनिया के बादशाहों का उसको तस्लीम करना और उसके ख़िलाफ़ बातिल मंसूबे बाँधना है। आयात (10-12) में इन बादशाहों को ताकीद है कि वो बेटे, या’नी मसीह को चूम लें, या’नी मसीह को क़ुबूल करें, ताकि वो बर्बाद न किए जाएँ, क्योंकि वही लोग मुबारक हैं जिनका तवक्कुल ख़ुदावन्द पर है।
(ज़बूर 3): यह ज़बूर ग़ालिबन 1023 क़ब्ल-अज़-मसीह में लिखा गया, जबकि दाऊद अबी सलोम के सामने से भागा। इसमें दाऊद ख़ुदावन्द की तवज्जोह अपने दुश्मनों की कसरत पर लगाता है और कहता है कि वो दावा करते हैं कि, “उसके लिए ख़ुदा से रिहाई नहीं,” और वो ख़ुदावन्द को यक़ीन दिलाता है कि, “ऐ ख़ुदा, मैं तुझ पर कामिल भरोसा रखता हूँ कि मैं लेट रहा और सो रहा और मैं जाग उठा, क्योंकि तू मुझको सँभालता है।”
(ज़बूर 4): यह 1023 क़ब्ल-अज़-मसीह में तस्नीफ़ हुआ। आयत अव्वल में दाऊद ख़ुदा से अर्ज़-परवाज़ है कि ख़ुदा उसकी दु’आ सुने, और आयात (2-5) में वो मुख़ालिफ़ों की फ़हमाइश (नसीहत) करके उनको ताकीद करता है कि वो काँपते रहें। आयात (6-8) में वो उनको जताता है कि इन्सान की ख़ुशहाली ख़ुदा की रजामंदी पर मौक़ूफ़ है।
(ज़बूर 5): यह 1023 क़ब्ल-अज़-मसीह में तस्नीफ़ हुआ। इसमें दाऊद ज़ाहिर करता है कि उसका तवक्कुल (भरोसा) ख़ुदावन्द पर है। चुनान्चे, आयात (1-6) में वो अपने तवक्कुल का सबब बयान करता है कि, “ख़ुदा ऐसा नहीं कि जो इन्सान की शरारत से ख़ुश हो और शरीर उसके साथ रह सके। वो झूठ बोलने वालों को नाबूद करेगा, क्योंकि वो ख़ूनी और दग़ाबाज़ से नफ़रत रखता है।” आयात (7-12) में दाऊद दु’आ करता है कि ख़ुदा रास्तबाज़ों की हिफ़ाज़त करे और यक़ीन करता है कि ख़ुदा ऐसा ही करेगा। इस पर वो अर्ज़ करता है कि ख़ुदा अपनी सदाक़त में उसकी राहबरी करे और उसके दुश्मनों के सामने उसकी राह को सीधा रखे।
(ज़बूर 6): यह ग़ालिबन 1015 क़ब्ल-अज़-मसीह लिखा गया और इसे दाऊद ने अपनी उम्र के आख़िरी हिस्से में तस्नीफ़ किया। आयात (1-7) में वो अपनी बीमारी की हालत में ख़ुदा से फ़र्याद करता है। आयात (8-10) में वो ईमान से कहता है कि, “ख़ुदावन्द ने मेरी फ़र्याद सुन ली,” और वो अपने दुश्मनों को यक़ीन से कहता है कि, “वो शर्मिंदा हों।”
(ज़बूर 7): यह ज़बूर 1023 क़ब्ल-अज़-मसीह में लिखा गया, जबकि शिमिई ने दाऊद पर लानत की, तब यह तस्नीफ़ किया गया। आयात (1-9) में अपना मुक़द्दमा ख़ुदा के सुपुर्द करता है कि, “अगर मैंने उससे, जो मुझसे मेल रखता था, बदी की हो, तो दुश्मन दरपै होकर मेरा जी ले और मेरी जान को ज़मीन पर पामाल करे और मेरी इज़्ज़त ख़ाक में मिला दे।” आयात (10-17) में मालूम होता है कि ईमान ही के वसीले उसकी रिहाई हुई और उसके दुश्मनों की बर्बादी होगी।
(ज़बूर 8): यह 1015 क़ब्ल-अज़-मसीह में लिखा गया। दाऊद इसमें कहता है कि ख़ुदा का जलाल उसकी कारीगरी और उसकी मुहब्बत से ज़ाहिर होता है। चुनान्चे, आयत अव्वल में वो कहता है कि, “ऐ ख़ुदावन्द हमारे, क्या ही बुज़ुर्ग है तेरा नाम तमाम ज़मीन पर! और तूने अपनी शौकत आस्मान पर ज़ाहिर की है।” फिर वो इन्सान के बारे में कहता है कि, “तूने उसे फ़रिश्तों से थोड़ा ही कम पैदा किया है और शान-ओ-शौकत का ताज उसके सर पर रखा और उसको अपने हाथों के कामों पर हुकूमत दी है।”
(ज़बूर 9): यह ज़बूर उस वक़्त लिखा गया जब दाऊद ने जाती जालूत को मग़्लूब किया। इसकी तारीख़-ए-तस्नीफ़ 1018 क़ब्ल-अज़-मसीह है। आयात (1-10) में दाऊद ख़ुदावन्द की सताइश करता है कि उसने उसके दुश्मनों को शिकस्त दी, और उसकी तारीफ़ में कहता है कि ख़ुदावन्द मज़लूमों के लिए मुस्तहकम मकान है और मुसीबत के वक़्त में दुश्मनों से पनाहगाह है। आयात (11-12) में वो उनको, जो सिय्योन में कुर्सी-नशीन हैं, उभारता है कि वो ख़ुदावन्द की सताइश करें और लोगों के दरमियान उसके अजायबात का ज़िक्र करें। आयात (13-20) में वो दु’आ करता है कि ख़ुदा उस पर ऐसा रहम करे कि वो सिय्योन की बेटी के दरवाज़ों पर उसकी सताइश कर सके और उसकी नजात से शादमान हो, और वो कहता है कि मिस्कीन हमेशा फ़रामोश न किए जाएँ और उसके हुज़ूर में क़ौमों की अदालत हो।
(ज़बूर 10): यह ज़बूर 9 से ख़ास निस्बत रखता है। इसमें दाऊद ख़ुदावन्द के आगे शरीरों (बेदीनों) की शिकायत करता है, इस सबब से कि वो ख़ुदा के ग़रीबों पर ज़ुल्म करते हैं। चुनान्चे, आयात (1-11) में वो ख़ुदावन्द से सवाल करता है कि वो उनको उनकी शरारत से क्यों बाज़ नहीं रखता? “वो देहात की घातों में बैठते और ख़ल्वत-ख़ानों में बे-गुनाहों को क़त्ल करते। वो अपने दिल में कहते हैं कि ख़ुदा भूल गया है और उसने छुपाया है, सो उसने हरगिज़ नहीं देखा।” आयात (12-18) में ख़ुदावन्द से अर्ज़ करता है कि वो उठे और अपना हाथ बढ़ाए और ख़ाकसारों को न भूले, नीज़ कि शरीर (बेदीन) बुरे आदमी का बाज़ू ऐसा तोड़ा जाए कि फिर उसकी शरारत ढूँढ़ने से न मिले।
(ज़बूर 11): इसमें दाऊद अपना तवक्कुल ख़ुदावन्द पर ज़ाहिर करता है और एक सवाल करता है कि उसकी जान को यह क्यों कहा जाता है कि, “यह चिड़िया सी है, अपने पहाड़ पर जाती रहे?” और कहता है कि ख़ुदावन्द अपनी मुक़द्दस हैकल में है और उसका तख़्त आस्मान पर है, उसकी आँखें देखती हैं, और उसकी पलकें बनी-आदम को आज़माती हैं। और ख़ुदावन्द जो सादिक़ है, सदाक़त तलब करता है और उसका मुँह सीधे लोगों की तरफ़ मुतवज्जेह है।
(ज़बूर 12): इसकी पहली दो आयात में दाऊद ख़ुदावन्द से मदद का मुल्तजी (इल्तिजा करने वाला) है और कहता है कि दीनदार और ख़ुदा-परस्त लोग जाते रहे और दियानतदार बनी-आदम में ग़ायब हो जाते हैं। आयात (3-8) में कि ख़ुदावन्द उठा हुआ है और उसका कलाम चौखा (खरा) कलाम है और कि वो अपने लोगों का मुहाफ़िज़ है, तसल्ली-पज़ीर होता है।
(ज़बूर 13): आयत (1-2) में दाऊद ख़ुदावन्द से मुल्तमिस है कि वो उसको न भूले ताकि दुश्मनों की सर-बुलंदी क़ायम न रहे। और आयत (3-4) में दु’आ करता है कि ख़ुदावन्द उसकी तरफ़ मुतवज्जह हो और उसको दुश्मनों से रिहाई बख़्शे। और आयत (5-6) में रिहाई पाकर ख़ुदावन्द की हम्द-ओ-सना करता है।
(ज़बूर 14): इसकी पहली दो आयात में दाऊद अहमक़ की कैफ़ियत बयान करता हुआ कहता है कि ख़ुदावन्द आस्मान पर से बनी-आदम पर निगाह करता है कि देखे कि उनमें कोई दानिशमंद और ख़ुदा का तालिब है या नहीं, और फिर कहता है कि वो सब गुमराह हुए हैं, वो एक साथ बिगड़ गए हैं, कोई नेकोकार नहीं, एक भी नहीं। आयात (4-6) में वो यह सवाल करता है, “क्या इन बदकारों को समझ नहीं जो मेरे बंदों को यूँ खा जाते हैं, जैसा कि रोटी खाते हैं, और ख़ुदावन्द का नाम नहीं लेते? सो, वो बड़े ख़तरे में हैं, क्योंकि ख़ुदा सिर्फ़ सादिक़ों की नस्ल के दरमियान है।” सातवीं आयत में वो यह आरज़ू करता है कि इस्राईल की नजात सिय्योन में से हो।
(ज़बूर 15): में दाऊद सिय्योन के बाशिंदों की सीरत और उनके चाल-चलन पर तंज़ करता है। चुनान्चे आयत पंजुम में वो ख़ुदावन्द से सवाल करता है कि, “ऐ ख़ुदावन्द, तेरे ख़ेमे में कौन रहेगा और तेरे कोह-ए-मुक़द्दस पर कौन सुकूनत करेगा?” और ख़ुद ही इसका जवाब दो हिस्सों में देता है। हिस्सा अव्वल में वो कहता है कि वो दाख़िल होगा और सुकूनत करेगा जो सीधी चाल चलता, सदाक़त के काम करता और अपने दिल से सच बोलता है, गोया यह उसकी सुबूत (मज़बूत) तारीफ़ है। फिर नफ़ी में यूँ तारीफ़ करता है कि वो जो कि अपनी ज़बान से चुग़ली नहीं करता और अपने पड़ोसी पर ऐब नहीं लगाता।
हिस्सा दुव्वम में वो दाख़िल होने वाले शख़्स की सीरत और आदत का ज़िक्र करता है, या’नी वो कि जिसकी नज़र में वो निकम्मा आदमी ज़लील व ख़्वार है, और जो कि उन्हें, जो ख़ुदावन्द से डरते हैं, इज़्ज़त देता है, और अपने आप पर क़सम खाता है और बदलता नहीं। नफ़ी में उसकी यूँ तारीफ़ करता है कि वो जो कि सूद के लिए क़र्ज़ नहीं देता और बे-गुनाहों को सताने के लिए रिश्वत नहीं लेता। आख़िर में कहता है कि जो ऐसे काम करता है, हरगिज़ न टलेगा, या’नी सलामत रहेगा।
(ज़बूर 16) दाऊद का मकताम: इसमें अपना कामिल भरोसा ख़ुदावन्द पर ज़ाहिर करता है। आयात (1-4) में वो ख़ुद को हिफ़ाज़त का मुस्तहिक़ ठहराता है, इसलिए कि उसकी जान ने यहोवा को अपना ख़ुदावन्द तस्लीम किया है और कहता है, “उसके बग़ैर मेरी भलाई मुम्किन नहीं।” वो बयान करता है कि उसने ग़ैर-माबूदों से क़द्र अलग किया है कि उनके नाम को भी अपने लबों पर नहीं लाता।
आयात (5-11) में वो दावा करता है कि, “मेरी जान को कभी जुंबिश न होगी, क्योंकि मेरी निगाह ख़ुदावन्द पर है, वो मेरे दाहिने है, सो मेरा दिल ख़ुश है और मेरी ज़बान शाद है, मेरा जिस्म उम्मीद में चैन करेगा। वो मेरी जान को क़ब्र में न रहने देगा और अपने क़ुद्दूस को सड़ने न देगा।” इन आयात में वो सिर्फ़ क़ियामत की निस्बत अपना एतिक़ाद ज़ाहिर नहीं करता, बल्कि येसू मसीह के क़ब्र से जी उठने का ज़िक्र भी करता है और कहता है कि वही उसको ज़िंदगी की राह दिखाएगा और कि वो उसके हुज़ूर में ख़ुशियों से सैर होगा, नीज़ उसके दाहिने हाथ में अबद तक इशरतें मौजूद हैं।
(ज़बूर 17): यह दाऊद की एक दु’आ है।
आयात (1-9) में दाऊद अपनी दियानतदारी पेश करके ख़ुदा की हिफ़ाज़त का मुल्तजी है, ताकि वो अपने दुश्मनों के हाथ न आए।
आयात (10-12) में वो अपने दुश्मनों की यूँ कैफ़ियत बयान करता है कि वो अपनी चर्बी में छुप गए हैं और अपने मुँह से बड़े बोल बोलते हैं, हमारे हर एक क़दम पर हमको घेर लेते हैं कि हमें ज़मीन पर गिरा दें। आयात (13-15) में यक़ीन करता है कि ख़ुदावन्द ज़रूर-ब-ज़रूर मुझको उनसे बचाएगा और मैं सदाक़त से उसका चेहरा देखूँगा और जब मैं उसकी सूरत का होकर जागूँगा, तो मैं सैर हूँगा।
(ज़बूर 18) सरदार मीर-ए-मुग़न्नी के लिए, ख़ुदा के बंदे दाऊद का ज़बूर:
इस ज़बूर की बातें दाऊद ने उस वक़्त ख़ुदावन्द से कहीं, जबकि ख़ुदावन्द ने उसे उसके तमाम दुश्मनों और साऊल के हाथ से बचाया। इसमें ख़ुदावन्द का शुक्र और उसकी तारीफ़ अपने अजीब बचाओ और मुख़्तलिफ़ नेअमतों के लिए करता है, और ख़ुदावन्द को यक़ीन दिलाता है कि, “मैं तुझको प्यार करता हूँ और मैं क़ौमों के दरमियान तेरा इक़रार करूँगा और तेरे नाम के गीत गाऊँगा।”
(ज़बूर 19): इसमें ख़ुदावन्द की तारीफ़ है। आयात (1-6) में वो कहता है कि फ़ित्रत, और ख़ास कर आस्मान, उसका जलाल ज़ाहिर करता है और फ़िज़ा उसकी दस्तकारी दिखाती है।
आयात (7-11) में बताता है कि उसका कलाम उसके फ़ज़्ल का इज़्हार करता है, और कहता है कि, “ख़ुदावन्द की तौरेत कामिल है, वो जान को बहाल करने वाली है, ख़ुदावन्द की शहादत सच्ची है, वो सादा-दिलों को ता’लीम देने वाली है। वो सोने, बल्कि कुन्दन, या’नी सोने से भी नफ़ीस है। वो शहद और छत्ते के टपकों से भी शीरीं-तर है।”
आयात (12-14) में रिहाई के लिए इस तरह अर्ज़ करता है कि, “ऐ ख़ुदावन्द, मेरी चट्टान और मेरा फ़िद्या देने वाले, मेरे दिल की सोच और मेरे मुँह की बातें तेरे हुज़ूर पसंद आएँ।”
(ज़बूर 20, 21, 22): ये तीनों मसीहाना ज़बूर हैं। (ज़बूर 20) मसीह के शाही ओहदे को ज़ाहिर करता है। इसकी पहली पाँच आयात में कलीसिया के शुरका की अपने बादशाह के लिए सिफ़ारिश पाई जाती है। मालूम होता है कि किसी मुक़ाबले की तैयारी है। यह सिफ़ारिश उस मौक़े की है जब बादशाह काहिन की हैसियत से क़ुर्बानी गुज़ारता है। आयात (6-8) में कोई बोल उठता है कि, “अब मैं चाहता हूँ कि ख़ुदावन्द अपने मसीह का छुड़ाने वाला है, क्योंकि ज़बीहा की मंज़ूरी हुई है।”
(9) आयत में कुल जमा’अत पुकारती है कि, “ऐ ख़ुदावन्द, हम पुकारें तो हमको रिहाई दे और हमारे बादशाह की सुन।” (ज़बूर 21 और 22) से एक ख़ास बरकत रखता है। (ज़बूर 20) मुक़ाबले से पहले का है और (ज़बूर 21) इसके बाद का है। (ज़बूर 20) में सिफ़ारिश है और (ज़बूर 21) में शुक्रगुज़ारी है। (ज़बूर 21:1-7): में दाऊद यह कहता है कि, “ऐ ख़ुदावन्द, तेरी तवानाई के बा’इस बादशाह ख़ुश है, तेरी नजात से क्या ही दिल-शाद है, कि बादशाह की शौकत व अज़ीम ख़ुदावन्द की नजात ही से है।” फ़त्हमंदी के मौक़े पर लोगों के दिल की जो कैफ़ियत थी, इसका यूँ बयान है कि उनको यक़ीन हुआ कि इस फ़त्हमंदी का यह सबब था कि बादशाह ने ख़ुदावन्द पर तवक्कुल रखा और हक़ त’आला की रहमत से उसको जुंबिश न हुई।
आयात (8-12) में रिआया बादशाह को यक़ीन दिलाती है कि यह फ़त्ह आइन्दा फ़त्ह का बयाना है। आयत (13) में ख़ुदावन्द की यूँ तारीफ़ करता है कि, “ऐ ख़ुदावन्द, तू अपनी क़ुव्वत से बुलंद हो! हम तेरी क़ुदरत की मदह और सना गाएँगे।”
(ज़बूर 22): पहला ज़बूर है जिसमें मसीह की सलीबी मौत की अज़िय्यत का ज़िक्र है। मसीह ने, जब वो मस्लूब हुआ था, नौ घंटे के बाद इस ज़बूर की पहली आयत इस्तिमाल की और बड़े ज़ोर से चिल्ला कर फ़रमाया कि, “एली, एली, लमा शबक्तनी?” या’नी, “ऐ मेरे ख़ुदा, ऐ मेरे ख़ुदा, तूने मुझे क्यों छोड़ दिया?” इस ज़बूर के दो हिस्से हैं।
हिस्सा अव्वल (आयात 1-21): पहली 10 आयात में दाऊद एक ख़ास बात, या’नी ख़ुदा की हुज़ूरी की ज़रूरत, महसूस करता है और सवाल करता है कि, “उसने मुझे क्यों छोड़ दिया?” और (11-21) आयत में वो दाद-ख़्वाह (फ़र्यादी) है और मुल्तमिस (इल्तिमास करने वाला) है कि ख़ुदावन्द उससे दूर न रहे, क्योंकि तंगी पहुँच रही है और मददगार नहीं।
हिस्सा दुव्वम (आयात 22-31): में वो पुख़्ता उम्मीद का ज़िक्र करता है कि सारे जहाँ को यह याद आएगा और वो ख़ुदावन्द पर रुजू करेंगे, सब क़ौमों के घराने उसके आगे सज्दा करेंगे, क्योंकि सल्तनत ख़ुदावन्द की है और क़ौमों के दरमियान वही है।
(ज़बूर 23): में एक शख़्स की दो मुख़्तलिफ़ तस्वीरें नज़र आती हैं। चुनान्चे, तस्वीर अव्वल में (आयात 1-4) में वो एक चौपान (चरवाहे) की हैसियत में दिखाया गया है। वो अपने ग़ल्ले के आगे चलता नज़र आता है, जबकि वो उसे भेड़-ख़ाने से निकालता है और उम्दा-से-उम्दा चरागाहों में ले जाकर उनकी तमाम जिस्मानी हाजात व ज़रूरियात को बहम पहुँचाता है। वो अपने ग़ल्ले की रहनुमाई और रखवाली करता है और उसे आराम देता और आसूदा करता है, और इस तरह उसकी ज़िंदगी बहाल रखता है और अपने नाम की ख़ातिर उनको अपनी राहों की तरफ़ ले चलता है।
तस्वीर दुव्वम में वो एक मेज़बान है। इसमें वो शख़्स, या’नी ख़ुदावन्द येसू, अपने शागिर्दों के साथ मेज़ पर खाना खाते दिखाई देता है, जबकि उनके गिर्दा-गिर्द दुश्मन शेरों की मानिंद बैठे हुए हैं और चाहते हैं कि उनको फाड़ डालें, लेकिन बर्गुज़ीदा लोग बड़ी दिल-जमई और इत्मीनान से खाने में मशग़ूल हैं। मेज़बान उनके लिए ख़ुराक ही मुहैया नहीं करता, बल्कि तमाम मुमकिन तरीक़ों से उनकी ख़ातिर-तवाज़ो व मुदारात करता है। चुनान्चे, एक मेहमान की शहादत है कि, “तू मेरे सर पर तेल मलता है, मेरा पियाला लबरेज़ होकर छलकता है। यक़ीनन, मेहरबानी और रहमत उम्र-भर मेरे साथ रहेंगी, और मैं ख़ुदावन्द के घर में रहूँगा।”
(ज़बूर 24): मालूम होता है कि यह ज़बूर उस वक़्त की तस्नीफ़ है, जब दाऊद शहर यरूशलेम पर क़ाबिज़ हुआ और उसे अपना दार-उल-सल्तनत मुक़र्रर किया, और उससे, या’नी यरूशलेम से, नज़र उठाकर आस्मानी यरूशलेम की तरफ़ निगाह करता है और ख़ुदावन्द को उस पर चढ़ता हुआ देखता है।
आयात (1-2) में वो कहता है कि चूँकि ख़ुदावन्द कुल ज़मीन का ख़ालिक़ है और उसकी सब मामूरी और उसके रहने वालों का मालिक है, उसको हक़ हासिल है कि वो अहले-यरूशलेम पर चढ़े।
आयात (3-6) में मसीह की रूहानी बादशाहत की हैसियत व कैफ़ियत बयान की गई है। जब दाऊद ने सवाल किया कि, “ख़ुदावन्द के पहाड़ पर कौन चढ़ सकता है और उसके मकान-ए-मुक़द्दस पर कौन खड़ा रह सकता है?” तो इसका जवाब यह मिला कि, “जिसका हाथ साफ़ है और दिल पाक है, और जिसने अपना दिल बुतलान पर नहीं लगाया और मक्र से क़सम नहीं खाई।”
आयात (7-10) में इस बादशाहत के अहलकार पुकारते हैं कि, “ऐ फाटक, अपने सर ऊँचे करो, और वो अबदी दरवाज़े ऊँचे हों कि जलाल का बादशाह दाख़िल हो।” और जब इस्तिफ़सार (दर्याफ़्त) करना होता है कि यह जलाल का बादशाह कौन है, तो जवाब देते हैं कि, “वो क़वी और क़ादिर है, वो जंग में ज़ोर-आवर और लश्करों का ख़ुदा है।”
(ज़बूर 25): यह ज़बूर एक ध्यानी, या’नी गहरी सोच की, एक दु’आ है जो कि इब्रानी हरूफ़-ए-तहज्जी के सिलसिले पर है। चुनान्चे, इब्रानी हुरूफ़-ए-तहज्जी की ता’दाद के मुताबिक़ इस ज़बूर की 22 आयात हैं, जो कि तीन हिस्सों में मुनक़सिम हैं:
हिस्सा अव्वल (1-7): में दाऊद अपना भरोसा ख़ुदावन्द पर ज़ाहिर करता है और उससे रहनुमाई, हिफ़ाज़त और मु’आफ़ी के लिए दु’आ करता है।
हिस्सा दुव्वम (आयात 8-14): में वो ख़ुदावन्द की क़ुदरत और सिफ़ात पर ग़ौर करके फिर गुनाह की मु’आफ़ी और मग़्फ़िरत के लिए दु’आ करता है। उसको यक़ीन है कि ख़ुदावन्द की राहें उनके लिए, जो उसके अहद और उसकी शहादतों को याद करते हैं, रहमत और सदाक़त हैं।
हिस्सा सोयम (आयात 15-22): में वो दावे से कहता है कि, “मेरी आँखें हमेशा ख़ुदावन्द की तरफ़ लगी रहती हैं, क्योंकि वो मेरे पाँव को फंदे से निकालेगा।” और दु’आ-गो है कि, “रास्ती और सिधाई मेरी निगहबान हों, कि मुझे तुझसे उम्मीद है।” ग़र्ज़, वो तकलीफ़ से रिहाई चाहता है।
(ज़बूर 26): यह ज़बूर 25 से कुछ निस्बत रखता है। दाऊद उसकी पहली तीन आयात में अपनी सदाक़त का दावा करके ख़ुदावन्द के सामने आरज़ू ज़ाहिर करता है कि वो उसे आज़माए, और कहता है कि, “मुझको यक़ीन है कि मेरा तवक्कुल ख़ुदावन्द पर है और कि मैं उसकी शफ़क़त को याद रखता हूँ।”
आयात (4-7) में अपने दावे के सबूत में यह दलील पेश करता है कि, “मैं बेहूदा लोगों के साथ नहीं बैठता और रियाकारों के साथ नहीं चलता, और वा’दा करता है कि मैं शरीरों के साथ न बैठूँगा और बेगुनाही में अपने हाथ धोऊँगा।”
आयात (8-12) में इब्तिदाई आयात लाकर कहता है कि, “ऐ ख़ुदावन्द, तेरी सुकूनत का घर, बल्कि वो मकान जहाँ तेरा जलाल रहता है, मुझको दिल-पसंद आया,” और दु’आ करता है कि, “ऐ ख़ुदावन्द, मेरी जान को गुनहगारों में शामिल न कर और मेरी हयात को ख़ूँरेज़ आदमियों के साथ न मिला।”
(ज़बूर 27): आयात (1-6) में दाऊद ख़ुदावन्द पर अपना फ़ख़्र ज़ाहिर करता है, “चूँकि ख़ुदावन्द मेरी रोशनी और मेरी नजात है, मैं किसी से ख़ौफ़ न खाऊँगा। अगर एक लश्कर भी मेरे ख़िलाफ़ ख़ेमा-ज़न हो, तो मेरे दिल को कुछ ख़ौफ़ न होगा। अगर मेरी मुख़ालिफ़त में जंग बरपा हो जाए, तो भी मेरा तवक्कुल ख़ुदावन्द पर साबित रहेगा, क्योंकि मुसीबत के वक़्त वो मुझको छुपाएगा, अपने डेरे के पर्दे में वो मुझको पोशीदा रखेगा और मुझको चट्टान पर चढ़ाएगा।” आयात (7-14) में वो दु’आ माँगता है कि, “ऐ ख़ुदावन्द, मुझको अपनी राह बता और अपने दुश्मनों के सबब से उस राह में, जो कि बराबर है, या’नी हमवार है, ले चल। मुझे दुश्मनों की मर्ज़ी पर मत छोड़।” आख़िर में वो अपने आपसे कहता है कि, “ख़ुदावन्द की इंतिज़ारी कर और मज़बूत रह।”
(ज़बूर 28): आयात (1-5) में दाऊद अर्ज़ करता है कि ख़ुदावन्द उसकी सुने, वर्ना वो उनकी मानिंद हो जाएगा जो गढ़े में गिरने वाले हैं। वो नहीं चाहता कि ख़ुदावन्द उसे शरीरों (बेदीनों) और बदकारों में शरीक व शामिल करे, जिनके दिलों में शर होता है और अपने हमसाए से सलामती की बातें करते हैं।
आयात (6-9) में वो ख़ुदावन्द को मुबारक कहता है, क्योंकि उसने उसकी सुनी, और कहता है, “क्योंकि ख़ुदावन्द मेरी सिपर (ढाल) और मेरा ज़ोर है, मेरा दिल निहायत शाद है, मैं गीत गाकर उसकी मदह करूँगा।” (9) आयत में अर्ज़ करता है कि, “ख़ुदावन्द अपने लोगों को नजात अता करे और अपनी मीरास को बरकत बख़्शे, उनकी रिआयत फ़रमाए और उनको हमेशा तक सर्फ़राज़ रखे।”
(ज़बूर 29): आयत (1-2) में दाऊद लोगों की तवज्जोह ख़ुदावन्द की क़ुदरत और जलाल की तरफ़ यह कह कर मातूफ़ (मोड़ता है) करता है कि, “ख़ुदावन्द की क़ुदरत और उसके जलाल पर लिहाज़ करो और हुस्न-ए-तक़द्दुस से उसे खुदावंद कहा करो।”
आयात (3-9) में वो ख़ुदावन्द की तारीफ़ करता और कहता है कि, “वो बादलों में है और ज़ोरावर और जलाली है, और वो लुबनान के देवदारों को तोड़ता है और उन्हें बछड़ों की मानिंद कुदाता है, और लुबनान और सिरयोन को जवान भैंसों की मानिंद। उसकी आवाज़ आग के शोलों को चीरती है, दश्त को लरज़ाती है, उससे हिरनियों के हमल गिरते हैं और वो जंगलों को साफ़ करता है। ख़ुदावन्द हमेशा के लिए सल्तनत के तख़्त पर बैठा है और अपने लोगों को ज़ोर बख़्शता है और उनको सलामती की बरकत देता है।”
(ज़बूर 30): दाऊद का ज़बूर जो कि घर को मख़्सूस करने के वक़्त गाया जाता है। वो इसमें ख़ुदावन्द की ता’ज़ीम करता है और इसके सरनामे से मालूम होता है कि यह ज़बूर किसी घर की मख़सूसियत के वक़्त गाया गया। मुम्किन है कि हैकल या दाऊद के शाही महल की मख़सूसियत पर गाया गया हो, लेकिन इससे यह बात ज़ाहिर नहीं है कि दाऊद ने उसको ऐसे मौक़े के लिए तस्नीफ़ किया था, बल्कि ऐसे मौक़े के लिए मख़्सूस किया गया है। दाऊद इसमें ख़ुदावन्द की ता’ज़ीम के औसाफ़ यूँ बयान करता है:
आयत अव्वल में उसकी सर्फ़राज़ी के लिए कि उसके दुश्मनों को मौक़ा नहीं मिला कि वो उस पर ख़ुशी करें, और यह गोया उसकी दु’आ के जवाब में था।
आयात (2-3) से ऐसा मालूम होता है कि उसकी बीमारी में वक़्त-ए-नज़अ ख़ुदावन्द ने उसकी शफ़ाअत की, या यह कि वो अपनी गुनहगारी और बदकिर्दारी के सबब रंज-ओ-ग़म में मुब्तला था और ख़ुदावन्द ने उसे मु’आफ़ी बख़्शी। चुनान्चे, वो चौथी आयत में सब मुक़द्दसों को तलब करता है कि ख़ुदावन्द की ता’ज़ीम करें, और कहता है कि, “उसकी क़ुद्दुसियत की यादगारी में उसका शुक्र अदा करो।”
आयात (5-12) में ख़ुदावन्द के रहम और मेहरबानी की तारीफ़ करता है।
(ज़बूर 31): दाऊद तक्लीफ़ और मुसीबत की हालत में ख़ुद को ख़ुदावन्द के सुपुर्द करता है, और उसका ईमान उसको सँभालता और ख़ुदावन्द के चेहरे की रोशनी उसको नजात बख़्शती है। इसमें तीन हिस्से हैं:
हिस्सा अव्वल (आयात 1-8): में वो अपना तवक्कुल ख़ुदावन्द पर ज़ाहिर करता है और कहता है कि, “ऐ ख़ुदावन्द, तू मेरी चट्टान और मेरा गढ़ है, अपने नाम के लिए तू मेरी रहबरी और रहनुमाई कर।”
हिस्सा दुव्वम (आयात 9-18): में वो अपनी मोहताजी पर ज़ोर देता और कहता है कि, “मेरी नौबत यहाँ तक पहुँची कि मैं उस शख़्स की मानिंद हूँ जो कि मर गया और उसे कोई याद नहीं करता। मैं टूटे हुए बासन की मानिंद हूँ,” और दु’आ करता है कि ख़ुदावन्द उसे शर्मिंदा न होने दे।
हिस्सा सोयम (आयात 19-24): में वो ख़ुदावन्द के एहसान के लिए उसकी बड़ी तारीफ़ करता है और कहता है कि, “ऐ ख़ुदावन्द, तेरा क्या ही बड़ा एहसान है जो तू अपने डरने वालों के लिए छुपाए रखता है!” और ख़ुदावन्द के सब मुक़द्दस लोगों को कहता है कि, “उससे मुहब्बत रखो कि ख़ुदावन्द दीनदारों का निगहबान है और मग़रूरों को बदला देता है।” तब उन सबको ताकीद करता है कि, “वो जो ख़ुदावन्द से उम्मीद रखते हैं, ज़ोर पकड़ें, तो वो उनके दिलों को मज़बूती बख़्शेगा।”
(ज़बूर 32): ख़याल है कि यह ज़बूर दाऊद ने उस वक़्त लिखा, जबकि उसको मालूम हुआ कि ख़ुदावन्द ने बतशेबा की निस्बत उसका गुनाह मु’आफ़ कर दिया। यह ज़बूर ‘मशकील-ए-दाऊद’ कहलाता है। ज़बूर की किताब में (13) ज़बूर इस नाम के हैं। इस लफ़्ज़ के ठीक म’अनी मालूम नहीं, बा’ज़ कहते हैं कि इसके म’अनी ‘ता’लीमी ज़बूर’ के हैं और बा’ज़ ‘ध्यानी ज़बूर’। बा’ज़ कहते हैं कि इसके म’अनी ‘अक़्लमंदी’ के हैं और बा’ज़ ख़याल करते हैं कि इसके राग बहुत ही अजीब और इल्म-ए-मौसीक़ी की रू से बहुत ही अमीक़ व आक़िलाना हैं, और यह कि यह नाम सिर्फ़ राग से ही निस्बत रखता है। यह ज़बूर नादिम ज़बूरों में से दूसरा ज़बूर है, छठा ज़बूर पहला नादिम ज़बूर है।
पहले ज़बूर से ज़ाहिर है कि उस शख़्स की मुबारकबादी कामिल है जिसने गुनाह न किया हो, और ज़बूर 32 की पहली आयात से मालूम होता है कि वो शख़्स भी, जिसने गुनाह के बाद सच्ची और असली तौबा की है, वो मुबारक है। चुनान्चे, आयत (1) में ज़िक्र है कि, “मुबारक है वो जिसका गुनाह बख़्शा गया और ख़ता ढाँपी गई।” आयत (5) में वो ख़ुदावन्द से मुख़ातिब होकर कहता है कि, “मैंने तेरे पास अपने गुनाह का इक़रार किया, मैंने अपनी बदकारी नहीं छुपाई। मैंने कहा कि अपने ख़ुदावन्द के आगे अपने गुनाह का इक़रार करूँगा, सो तूने मेरी बदज़ाती का गुनाह मु’आफ़ किया।”
आयात (8-9) में ख़ुदावन्द उससे फ़रमाता है कि, “मैं तुझे ता’लीम दूँगा,” और ताकीद करता है कि, “तू घोड़ों और खच्चरों की मानिंद न हो जिनकी राहनुमाई बाग और लगाम से की जाती है।” आयत (11) में वो सादिक़ों को ताकीद करता है कि, “ख़ुदावन्द के सबब ख़ुश हो और शादमानी करो, और तुम जो रास्त-दिल हो, ख़ुशी से चिल्लाओ।”
(ज़बूर 33): आयत (1-3) में सादिक़ तलबगार हैं कि ख़ुदावन्द की हम्द करें और बरबत को छिड़ते हुए उसकी सताइश करें और उसके लिए एक नया गीत गाएँ, क्योंकि,
(ज़बूर 33:1) आयत: “हम्द करना सीधे लोगों को ज़ेब देता है।”
(ज़बूर 33:4-5) आयात: “ख़ुदावन्द का कलाम सीधा है और उसके सब काम बा-वफ़ा हैं। वो दुनिया का ख़ालिक़ है, जो उसने कहा, वो हो गया, उसने हुक्म दिया तो सब कुछ बरपा हुआ।”
(ज़बूर 33:12-19) आयत में वो आस्मान पर से देखता और सब बनी-नू’अ इन्सान पर निगाह रखता है।
(ज़बूर 33:20-22) आयत: दाऊद सादिक़ों की रजामंदी ज़ाहिर करता है और उन सबकी तरफ़ से अर्ज़ करता है कि, “ऐ ख़ुदा, जैसा कि हमें तुझ पर तवक्कुल है, वैसे ही तेरी रहमत हम पर हो।”
(ज़बूर 34): इसके सरनामे से मालूम होता है कि दाऊद ने यह ज़बूर उस वक़्त तस्नीफ़ किया, जब अबिमलेक, या’नी कि जब दाऊद ने अपनी वज़ा’अ् बदली और अपने आपको दीवाना बनाया (1 समुएल 21:10-15)।
यह ज़बूर 25 की तरह इब्रानी हरूफ़-ए-तहज्जी पर है। आयत (1-10) में दाऊद ख़ुदावन्द की सताइश करता है औरों को भी तलब करता है कि वो उसके साथ मिलकर ख़ुदावन्द की सताइश करें और बड़ाई करें और मिलकर उसके नाम को सर्फ़राज़ करें। आयत (8) एक दावत-ए-आम का इश्तिहार देता है: “आओ, चखो कि देखो कि ख़ुदावन्द मेहरबान है! वो जिसका भरोसा उस पर है, वो मुबारक है!”
(9) आयत में वो उसके मुक़द्दसों को कहता है कि, “ख़ुदावन्द से डरो, क्योंकि जो उससे डरते हैं, उन्हें कुछ कमी नहीं।”
आयात (10-22) में एक उस्ताद की हैसियत में लड़कों को बुलाता है कि, “आओ और मेरी सुनो, मैं तुम्हें ख़ुदा-तरसी सिखाऊँगा।” और ख़ुदावन्द के ख़ौफ़ के औसाफ़ बयान करके कहता है कि, “वो जो ज़िंदगी का मुश्ताक़ है और बड़ी उम्र चाहता है, चाहिए कि अपनी ज़बान को बदी से और अपने लबों को दग़ा की बात बोलने से बाज़ रखे। फिर नसीहत करता है कि बदी से भाग, नेकी कर और सलामती को ढूँढ़ो जो ख़ुदावन्द के नज़दीक है। वो जो शिकस्ता हैं और उनको जो ख़स्ता-जान हैं, बचाता है।”
(ज़बूर 35): मालूम होता है कि यह ज़बूर उस वक़्त की तस्नीफ़ है, जब साऊल दाऊद का दुश्मन बन गया और उसको रगेदता था कि उसे जान से मारे। आयत (1-8) दाऊद ख़ुद को ख़ुदा के सुपुर्द करके अर्ज़ करता है कि ख़ुदावन्द उनसे झगड़े जो उससे, या’नी दाऊद से, झगड़ते हैं, और उनसे लड़े जो उससे लड़ते हैं। वो इस सबब से कि साऊल ख़ुदावन्द का मुक़र्रर किया हुआ था, उसे मारना न चाहता था (1 समुएल 22:5-11)।
आयात (9-10) में वो रिहाई पर ख़ुदावन्द की शुक्रगुज़ारी करता है। और (11-21) में अपनी इस्मत का दावा करके ख़ुदावन्द से अर्ज़-परदाज़ है कि उसको उन सब दुश्मनों से बचाए जो सलामती की बातें नहीं कहते, बल्कि मुल्क के सलीम-तबा' लोगों पर मिलकर मंसूबे बाँधते और मुझ पर मुँह पसारते है और कहते हैं कि, “आहा! हाहा! हमारी आँखों ने यह देखा है”, या’नी रुस्वाई।
आयात (22-28) में वो फिर अर्ज़ करता है कि ख़ुदावन्द उससे दूर न हो, बल्कि अपनी सदाक़त के मुताबिक़ उसका इन्साफ़ करे।
(ज़बूर 36) ख़ुदावन्द के बंदे दाऊद का ज़बूर: हम इन ज़बूरों को दिल-जमई व बग़ैर किसी शक-ओ-शुब्हा के इस्तिमाल कर सकते हैं, क्योंकि इनका मुसन्निफ़ ख़ुदावन्द का बंदा है। इसकी पहली 4 आयात में दाऊद ज़ाहिर करता है कि शरीरों (बेदीनों) की शरारत उनकी दहरियत (ख़ुदा को न मानने) की वजह से है। वो ख़ुदा का ख़ौफ़ अपने दिलों में नहीं रखते, सो वो बदी और बदकिर्दारी में तरक़्क़ी करते हैं।
आयात (5-9) में वो ख़ुदावन्द की माहियत (असलियत) के जलाल की तारीफ़ करता है कि उससे ख़ुदावन्द इन्सान को फ़ैज़ पहुँचाता है। और (10-12) में वो बरकत और हिफ़ाज़त के लिए दु’आ-गो है और यक़ीन से कहता है कि ख़ुदा ज़रूर बदकिर्दारों को गिरा देगा।
(ज़बूर 37): यह ज़बूर भी हरूफ़-ए-तहज्जी के सिलसिले की तरह है। इसमें ख़ासियत यह है कि इसमें अक्सर हरूफ़ दो शे’रों के शुरू में आए हैं। इस हिसाब से इसमें कुल 40 शे’र हैं, क्योंकि चंद एक हरूफ़ से सिर्फ़ एक ही शे’र शुरू हुआ है, और हर एक में ख़ास बात पेश की गई है। मसलन, (अ) का शे’र सिर्फ़ इतना मतलब बयान करता है कि, “तू शरीरों से मत कुढ़,” और (बेथ) का कि, “ख़ुदा पर तवक्कुल रख।” हर एक हर्फ़ से एक नई बात शुरू होती है। इस तरह इस ज़बूर में 22 बातें हैं और वो चार हिस्सों में मुनक़सिम है:
हिस्सा अव्वल (आयात 1-11): में यह ता’लीम है कि कुड़-कुड़ाहट को दूर रखें और ईमान में मज़्बूत रहना चाहिए।
हिस्सा दुव्वम (आयात 12-20): में बयान है कि शरीरों की फ़त्ह की ख़ुशी चंद-रोज़ा है और जल्द इख़्तिताम को पहुँचती है।
हिस्सा सोयम (आयात 21-31): में ज़िक्र है कि रास्तबाज़ों का अज्र यक़ीनी और दाइमी है।
हिस्सा चहारुम (आयात 32-40): में यह ज़ाहिर किया गया है कि नेकोकारों और शरीरों के अंजाम में बहुत फ़र्क़ है।
(ज़बूर 38): नादिम (पशेमान) ज़बूर के सिलसिले में यह तीसरा ज़बूर है। ज़बूर की किताब में सात, या’नी ज़बूर (6, 32, 38, 51, 102, 130, 143) नादिम ज़बूर हैं। दाऊद का यह ज़बूर ‘तज़कीर’, या’नी याद दिलाने के वास्ते है, और यह तीन हिस्सों में तक़्सीम है:
हिस्सा अव्वल (आयात 1-8): में दाऊद अपनी जिस्मानी तकालीफ़ और दर्दों को ख़ुदावन्द के आगे पेश करता है। आयत (8) में वो कहता है कि, “मैं बे-ताब हो गया हूँ और दिल की घबराहट से चिल्लाता हूँ।”
हिस्सा दुव्वम (आयात 9-14): दाऊद ख़ुदावन्द के आगे फ़र्याद करता है कि, “ऐ ख़ुदा, मेरे दोस्त और आश्ना मेरी तक्लीफ़ के वक़्त मुझसे अलग खड़े रहे और मेरे रिश्तेदार मुझसे दूर जा खड़े हुए।” यह ज़बूर ग़ालिबन उन दिनों की याद में है, जब दाऊद अबी सलोम से भागा था और उसकी इस हालत में उसके जानी दोस्त और रिश्तेदारों ने भी उसे छोड़ दिया।
हिस्सा सोयम (आयात 15-25): में वो ख़ुदावन्द से रिहाई की दरख़्वास्त करता है और अर्ज़ करता है कि वो उसको तर्क न करे और उससे दूर न रहे, और कहता है कि, “ऐ ख़ुदा, मेरे नजात देने वाले, मेरी मदद के लिए जल्दी कर।” दाऊद की इस वक़्त की हालत अय्यूब की हालत के बराबर है।
(ज़बूर 39): यह ज़बूर 38 से एक ख़ास निस्बत रखता है। तो इसमें मुन्दरजा-ज़ैल चार ख़ास बातें हैं:
(1) आयात (1-3): में दाऊद ज़ाहिर करता है कि उसका इरादा था कि चुप हो रहे, लेकिन जब उसने अपनी हालत शरीरों (बेदीनों) की सी देखी तो वो बे-इख़्तियार हो गया और ख़ामोशी क़ायम न रख सका।
(2) आयात (4-6): में वो दु’आ करता है कि, “ऐ ख़ुदावन्द, मुझको बता कि मेरा अंजाम क्या है और मेरी उम्र कितनी है, ताकि मैं जानूँ कि इसकी कितनी मुद्दत है?” गोया वो अपने आपको तैयार व आरास्ता करना चाहता है।
(3) आयात (7-9): में वो कहता है कि, “मेरी उम्मीद सिर्फ़ यहोवा पर ही है।” सो, वो उससे अर्ज़ करता है, “मुझको मेरे सारे गुनाहों से नजात दे और मुझको जाहिलों की तरह नंग न कर।”
(4) आयात (10-13): में वो ख़ुदावन्द की रहनुमाई का ख़्वाहिशमंद है और कहता है कि, “ऐ ख़ुदावन्द, मेरी दु’आ सुन और मेरे नाले पर कान धर, मेरे आँसू देखकर चुप न रह, क्योंकि तेरे सामने मैं परदेसी और अपने सारे बाप-दादों की मानिंद मुसाफ़िर हूँ।”
(ज़बूर 40): इसके दो हिस्से हैं:
हिस्सा अव्वल (आयात 1-11): दाऊद मुन्दरजा-ज़ैल बातें पेश करता है:
(अ) (1-3) आयत में वो कहता है कि, “मैंने सब्र से ख़ुदावन्द की इंतिज़ारी की और वो मेरी तरफ़ माइल हुआ। उसने मेरी फ़र्याद सुनी और मुझे हौलनाक गढ़े और दलदल की कीच (कीचड़) से बाहर निकाला। उसने मेरे पाँव चट्टान पर रखे और उनको साबित-क़दमी बख़्शी।”
(ब) (4-5) आयत में इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि ख़ुदावन्द पर भरोसा रखना इन्सान की मुबारकबादी का एक ख़ास सबब है।
(ज) (6-8) आयत में वो कहता है कि ख़ुदावन्द इन्सान से हदिया और ज़ब्ह तलब नहीं करता, बल्कि उसकी शख़्सियत का ख़्वाहिशमंद है।
(द) (9-11) आयत में वो कहता है कि यह बहुत ही मुनासिब है कि ख़ुदावन्द की सदाक़त और उसकी खूबियों को हम अपने में छिपा न रखें, बल्कि जमा’अत में उनकी बशारत दें।
हिस्सा दुव्वम (आयात 12-17): में वो फ़र्याद करता है कि दुश्मन मुतवातिर उसका पीछा करते और मुतवातिर उसको तंग करते हैं। सो, वो ख़ुदावन्द से मुहाफ़िज़त का ख़्वाहिशमंद है और उसका शुक्रिया अदा करता है।
(ज़बूर 41): आयात (1-3) में दाऊद ज़ाहिर करता है कि वो शख़्स मुबारक है जो मिस्कीन का फ़िक्र रखता है, ख़ुदावन्द मुसीबत के वक़्त उसको रिहाई देगा।
आयात (4-9) में दाऊद बहाली के वास्ते दु’आ करता है और दुश्मनों के ख़िलाफ़ एक शिकवा बयान करता है।
आयात (10-12) में वो अपना मुँह दुश्मनों की तरफ़ से फेर कर ख़ुदावन्द की तरफ़ मुतवज्जह होता है और उसकी रहमत चाहता है और अपनी दियानतदारी का दावा भी करता है।
आयत (13) में वो ख़ुदावन्द की तम्जीद में यह कहता है कि, “ख़ुदावन्द, इस्राईल का ख़ुदा, अज़ल से अबद तक मुबारक है। आमीन, आमीन।”
बाब सोयम
ज़बूर की दूसरी किताब ज़बूर (42-72)
सवाल 11: ज़बूर की दूसरी किताब की कैफ़ियत बयान करें।
जवाब: ज़बूर की दूसरी किताब में 31, या’नी (42-72) ज़बूर हैं। ग़ालिबन सुलेमान की हैकल की इबादत के लिए तालीफ़ हुए थे। इनमें, या’नी (42-49), बनी-क़ोरा के हैं।
(50) ज़बूर आसफ़ का है, (18), या’नी (51-65, 68-70) ज़बूर के हैं, ज़बूर (66, 67, 71) गुमनाम हैं, और (ज़बूर 72) सुलेमान का है। इस किताब की यह ख़ासियत है कि किसी नामालूम वजह से लफ़्ज़ 'इलोहीम' बजाए 'यहोवा' के ब-कसरत इस्तिमाल हुआ है। ज़बूर की पहली किताब में लफ़्ज़ 'यहोवा' 72 दफ़ा और 'इलोहीम' 15 दफ़ा इस्तिमाल हुआ है, और दूसरी किताब में लफ़्ज़ 'इलोहीम' 67 दफ़ा इस्तिमाल हुआ है और 'यहोवा' 74 बार इस्तिमाल हुआ है। मालूम होता है कि इस किताब में कई एक क़ाबिल और क़ादिर-ए-कलाम शाइरों की फ़िक्र-ए-रसाई के नताइज हैं, जिनकी मुफ़स्सल कैफ़ियत पर हत्ता-उल-मकान ग़ौर करेंगे। ऊपर ज़िक्र हुआ है कि इस किताब के 31 ज़बूरों में से 8 ज़बूर बनी-क़ोरह के हैं। अब दर्याफ़्त करना चाहिए कि ये बनी-क़ोरह कौन थे और इन ज़बूरों की ख़ास वजह और मौक़ा क्या था।
(ख़ुरूज 6:16) आयत से मालूम होता है कि बनी-लावी जेरशोन, कहात और मुरारी थे। और इस बाब की (18) आयत से यह भी ज़ाहिर है कि बनी-कहात अम्राम और इज़हार और उज्ज़ीएल थे। फिर (21) आयत से ज़ाहिर है कि बनी-इज़हार कोरह, नफ़्ग और ज़िक्री थे। चुनाँचे क़ोरह बिन कहात बिन लावी था।
(गिनती 16:1-35) में ज़िक्र है कि यह वो क़ोरह है जिसने दातान और अबीराम से मिलकर मूसा के साथ फ़ित्ना-साज़ी की थी और अजीब तरह से मारा गया। और (गिनती 26:11) से ज़ाहिर है कि क़ोरह के लड़के इस हलाकत से महफ़ूज़ रहे, चूँकि वो लावी थे और गाने-बजाने में काफ़ी दस्तरस रखते थे, दाऊद ने उन्हें हैकल की इबादत के लिए मुक़र्रर किया। चुनान्चे, (1 तवारीख़ 16 बाब) में ज़िक्र है कि जब दाऊद ने यरूशलेम में अहद के संदूक़ के लिए जगह तैयार की तो उसने लावियों के सरदारों को फ़रमाया कि अपने भाईयों में से गाने वालों को मुक़र्रर करें कि मौसीक़ी के साज़, या’नी बरबतें, सितार और मंजीरे बजाएँ और बुलंद आवाज़ से गाएँ। सो, लावियों ने हेमान बिन योएल को और उसके भाईयों में से आसफ़ बिन बरक़ियाह को और बनी-मुरारी में से एतान को मुक़र्रर किया, और उनके साथ कई एक और भी तैनात हुए और अहद के संदूक़ को ओबेद-अदोम के घर से निकाल कर यरूशलेम में ब-खु़शी चढ़ाया। और (1 तवारीख़ 25:1) से ज़ाहिर है कि दाऊद और लश्कर के सरदारों ने आसफ़ और हेमान, यदूतून के बेटों में से, बा’ज़ को इबादत के लिए तअय्युन किया कि बरबतों और सितार और झांजों से नबुव्वत करें। इस बाब की (5) आयत में हेमान बादशाह का ग़ैब-बीन बतलाया गया है और ज़िक्र है कि हेमान के बेटे ख़ुदा के मुआमलों में सींग बुलंद करने को थे।
सींग का बाजा ज़ोर से और बुलंद आवाज़ से बजाते थे, और ख़ुदा ने उसको 14 बेटे और 3 बेटियाँ दीं, और वो अपने बाप की सलाह व हिदायत के मुताबिक़ ख़ुदावन्द के घर में झाँझ, बरबत और सितार से गाने को हाज़िर थे कि ख़ुदा के घर की ख़िदमत करें, जैसा कि हेमान, यदूतून और आसफ़ को ख़ुदावन्द की तरफ़ से हुक्म होता था। (1 तवारीख़ 6:31-32) में मरक़ूम है कि ये वो हैं जिन्हें दाऊद ने, बाद इसके कि संदूक़ आरामगाह में पहुँचा, गाने वालों के गिरोहों पर मुक़र्रर किया। सो, वो ख़ेमा के मस्कन के आगे, जब तक कि यरूशलेम में सुलेमान ने ख़ुदावन्द का घर ता’मीर न किया, वो गाने की ख़िदमत करते थे और अपनी-अपनी बारी पर ख़िदमत के लिए हाज़िर होते थे। (1 तवारीख़ 6:23) में मरक़ूम है कि वो जो अपने लड़कों समेत ख़िदमतगुज़ारी करते थे, ये हैं बनी-क़हात में हेमान, सरवदी, और (1 तवारीख़ 6:43-44) से ज़ाहिर है कि आसफ़ लावी के बेटे जेरशोन से निकला और एतान मुरारी के ख़ानदान में से था। ये सब के सब लावी थे। मालूम होता है कि जब ज़रूरत पड़ी तो उन्होंने मौक़े के मुताबिक़ मुल्हिम (इल्हाम किया गया) होकर ज़बूर तस्नीफ़ किए।
सवाल 12: दूसरी किताब के बनी-क़ोरह के आठ ज़बूरों की तफ़्सील बयान करें।
जवाब: (ज़बूर 42, 43) की तर्कीब और तर्तीब से मालूम होता है कि शुरू में यह एक ही ज़बूर था। (ज़बूर 42) का सरनामा यह है कि, “सरदार मुग़न्नी के लिए बनी-क़ोरह का मशकील,” जबकि (ज़बूर 43) का बिल्कुल कोई सरनामा नहीं। यह भी मालूम होता है कि ज़बूर 43, ज़बूर 42 का तीसरा हिस्सा है। ये दोनों (ज़बूर 42:5) के इन अल्फ़ाज़ से तीनों हिस्सों में तक़्सीम होते हैं कि, “मेरे दिल, तू क्यों गिरा जाता है और तू मुझमें क्यों बे-आराम है? ख़ुदा पर भरोसा रख कि मैं आगे को भी उसकी सताइश करूँगा, कि उसका चेहरा नजात देने वाला है।” इन ज़बूरों का हिस्सा अव्वल (ज़बूर 42:1-5) में है कि जिसमें मुसन्निफ़ ख़ुदा की हुज़ूरी के लिए एक हिरनी की तरह, जो कि पानी के सोतों की प्यासी हो, प्यासा और आर्ज़ूमंद है। अब मालूम होता है कि मुसन्निफ़ गाने वालों में से था और इन दिनों यरूशलेम से दूर और हैकल की इबादत से महरूम था, और ईद के अय्याम में उस गिरोह के साथ, जो कि ख़ुशी की आवाज़ से गाता हुआ और शुक्रगुज़ारी करता हुआ ख़ुदावन्द के घर को जाता था, शरीक व शामिल न हो सका।
हिस्सा दुव्वम, या’नी आयात (6-11), में मुसन्निफ़ अपनी हालत पर ग़ौर करता और ख़ुदा से फ़र्याद करता और कहता है कि, “ऐ मेरे ख़ुदा, मेरा जी गिरा जाता है। मैं दूसरों की ज़मीन में और हरमोन में, कोह-ए-मिज़ार पर, तुझे याद करूँगा।” गो वो हैकल में इबादत न कर सका, तो भी यहीं से ख़ुदा को याद करता है।
हिस्सा सोयम, या’नी ज़बूर 43, में दु’आ करता है कि ख़ुदावन्द उसको उसके दुश्मनों से रिहाई बख़्शे ताकि वो फिर ब-दस्तूर इबादत में शरीक हो सके, और कहता है कि, “तब मैं ख़ुदा के मज़बह के पास, ख़ुदा के हुज़ूर, कमाल ख़ुशी से बरबत बजा कर सताइश करता हुआ जाऊँगा।” इस हिस्से की पाँचवीं आयत में वो अपने जी को तक़वियत देकर कहता है कि, “ऐ मेरे जी, तू क्यों गिरा जाता है और तू मुझमें क्यों बे-आराम है? ख़ुदावन्द पर तवक्कुल कर कि मैं आगे को भी उसकी सताइश करूँगा, जो मेरे चेहरे की नजात और मेरा ख़ुदा है।”
(ज़बूर 44): बनी-क़ोरह का मशकील, जो सरदार मुग़न्नी के सुपुर्द किया गया कि ख़ुदा के हुज़ूर में गाया जाए। इसमें बनी-क़ोरह बनी-इस्राईल का वकील होकर बयान करता है कि गो इस्राईल की सदाक़त और वफ़ादारी मुस्तक़िल रही, तो भी ख़ुदा ने उनको मसाइब में गिरफ़्तार किया, और वो ख़ुदा की मेहरबानी का तलबगार है।
इस ज़बूर में पाँच मुख़्तलिफ़ बातें हैं:
(1) आयात (1-3) में वो ख़ुदा को याद दिलाता है कि साबिक़ ज़माने में बाप-दादों की शहादत की वजह से उसने उसके साथ नेक सुलूक किया और इस मुल्क से क़ौमों को निकाल कर उन्हें बसाया।
(2) आयात (4-8) में वो ख़ुदा को अपना बादशाह तस्लीम करके दावा करता है कि, “उसकी मदद से मैं अपने दुश्मनों को धकेल दूँगा और उसके नाम से उनको, जो मुझ पर चढ़ते और हमला करते हैं, पामाल करूँगा।” नीज़, वो यह भी गुमान रखता है कि ख़ुदावन्द ख़ुद, बग़ैर उनकी मदद के, बचाने वाला है, और कहता है कि, “वो उनको जो हमसे कीना रखते हैं, रुस्वा करता है, कि हम अबद तक उसी की सताइश करेंगे।”
(3) आयात (9-16) में वो ख़ुदा के सामने फ़र्याद करता है कि वो गुज़श्ता की तरह उनकी मदद नहीं करता, उसने उनको तर्क कर रखा है और उनको उनके दुश्मनों के आगे भगा देगा, और मुफ़्त में बेच डाला है और हमको क़ौमों के दरमियान ज़रब-उल-मसल किया है।
(4) आयात (17-22) में इस्राईल दावे से कहते हैं कि, “हम ऐसे सुलूक के सज़ावार न थे, क्योंकि हम ख़ुदा को नहीं भूले और उसके अहद में बेवफ़ाई नहीं की, बल्कि हम ख़ुदा के लिए सारा दिन मारे जाते हैं और ज़ब्ह की हुई भेड़ों की मानिंद गिने जाते हैं।”
(5) आयात (23-26) में वो सब मिलकर अर्ज़ करते हैं कि, “ख़ुदा जागे और बेदार हो और उनको हमेशा के लिए तर्क न करे।” नीज़, वो एक सवाल भी करते हैं कि, “वो अपना मुँह क्यों छुपाता है और उस ज़ुल्म को, जो हम पर होता है, क्यों भुला देता है?” आख़िर में अर्ज़ भी करते हैं कि, “और वह अपनी रहमतों के वास्ते उनको रिहाई दे।”
(ज़बूर 45): बनी-क़ोरह का मशकील, या’नी ग़ज़ल माशूक़ों की बाबत, जो सोसनों के सुर पर गाई जाए। इसमें दूल्हा और दुल्हन की तश्बीह से मसीह और कलीसिया के मुबारक इत्तिहाद का तसव्वुर दिलाया गया है। इसकी पहली आयत तमहीदी है, इसमें मुसन्निफ़ वजह-ए-तस्नीफ़ बयान करता है। आयात (2-9) में वो बादशाह का हुस्न, इज़्ज़त, जलाल और सदाक़त ज़ाहिर करता है और उसकी शाहाना खूबियों और औसाफ़-ए-कामिला का बयान करके ताकीद करता है कि वो अपनी बुज़ुर्गवारी से सवार हो और सच्चाई, मुलायमियत और सदाक़त के वास्ते आगे बढ़े, और कहता है कि, “तेरा दाहिना हाथ तुझको मुहीब काम सिखाएगा।”
आयात (10-12) में मुसन्निफ़ दुल्हन की तरफ़ मुख़ातिब होकर ताकीद करता है कि, “ऐ बेटी, सुन, सोच और अपना कान इधर लगा, अपने लोगों और अपने बाप के घर को भूल जा।” ग़र्ज़ कि कुल्ली मख़सूसियत तलब की गई है। आयात (13-15) में वो आरास्ता दुल्हन ख़ुशी और शादमानी के साथ दूल्हे के साथ पहुँचाई जाती है और वह बादशाह के महल में दाख़िल होती है।
आयात (16-17) में मुसन्निफ़ बादशाह को कहता है कि, “तेरे बेटे तेरे बाप-दादों के क़ाइम-मक़ाम होंगे और तू उन्हें तमाम ज़मीन का सरदार मुक़र्रर करेगा, और सब लोग अबद-उल-आबाद तेरी सताइश करेंगे।” (ज़बूर 46, 47, 48) बनी-क़ोरह के ये तीन ज़बूर, जो कि बनी-इस्राईल की एक ख़ास रिहाई की यादगार और उसकी शुक्रगुज़ारी में तस्नीफ़ हुए, जो कि बा-सिलसिला हैं। (ज़बूर 46) में यह हक़ीक़त पेश है कि यरूशलेम की हिफ़ाज़त की वजह उसमें ख़ुदा की हुज़ूरी थी। (ज़बूर 47) में ख़ुदा की तारीफ़ है कि वो मुहीब है और तमाम ज़मीन के ऊपर बादशाह-ए-अज़ीम है। और (ज़बूर 48) में बयान है कि यरूशलेम की फ़ौक़ियत इस सबब से है कि यहोवा उसमें बूद-ओ-बाश करता है और कि वो शाह-ए-अज़ीम का शहर है। बा’ज़ लोग ख़याल करते हैं कि यह ज़बूर उस वक़्त तस्नीफ़ हुआ जब हिज़क़ियाह ने ख़ुदावन्द से दु’आ माँगी और शाह-ए-अस्सूर सन्हेरीब से बच गया (2 सलातीन 19:24-27)। अगर यह ख़याल दुरुस्त है, तो इन ज़बूरों की तालीफ़ का वक़्त, जैसा कि बा’ज़ मुसन्निफ़ों का गुमान है, यह ज़माना-ए-सुलेमान हो सकता है। इन तीनों ज़बूरों की तफ़्सील इस तरह है: (ज़बूर 46:1-3) में यक़ीन दिलाया गया है कि अगर ख़ुदावन्द मौजूद हो, तो ज़मीन के इन्क़िलाबात से कुछ भी ख़ौफ़ व ख़तर नहीं हो सकता।
आयात (4-7) में शहर यरूशलेम की हिफ़ाज़त का सबब यूँ बयान किया गया है कि ख़ुदा उसके बीचों-बीच है, सो उसको हरगिज़ जुंबिश न होगी, और अहले-शहर कमाल ख़ुशी और इत्मीनान से बूद-ओ-बाश करेंगे।
आयात (8-11) में ताकीद है कि ख़ुदा की कार्रवाई पर ग़ौर किया जाए, और आयत (10) में ख़ुदा फ़रमाता है कि, “थम जाओ और जानो कि मैं ख़ुदा हूँ। मैं क़ौमों में बुलंद और ज़मीन पर सर-बुलंद हूँगा।”
(ज़बूर 47): में बनी-क़ोरह सरदार मुग़न्नी की मारिफ़त सब लोगों को तलब करता है कि तालियाँ बजाएँ और कहता है कि ख़ुशी की आवाज़ से ख़ुदावन्द के हुज़ूर नारा मारो। इसकी पहली चार आयात में एक दावत-ए-आम है कि यहोवा की, जो कि कुल दुनिया का बादशाह है, सताइश करो और ख़ुशी से ललकारते हुए नज़रें चढ़ाओ। वो सब जहान का बादशाह है, सो चाहिए कि सोच-समझ कर उसकी सताइश के गीत गाएँ।
आयात (8-9) ज़ाहिर करती हैं कि दुनिया की सब अक़्वाम ख़ुदा की आलमगीर हुकूमत को तस्लीम करके इब्राहीम के ख़ुदा के लोगों के हमराह जमा हुई हैं।
(ज़बूर 48): में बनी-क़ोरह सिय्योन की ख़ुशनुमाई और जलाल की तारीफ़ करते हैं। इसकी पहली दो आयात में वो यहोवा की बुज़ुर्गी की तारीफ़ करके कहते हैं कि वो इस क़ाबिल है कि हमारे ख़ुदा के शहर में, उसके मुक़द्दस पहाड़ पर, उसकी सताइश की जाए और उसकी तारीफ़ तमाम ज़मीन पर हो।
आयात (3-8) में वो कहते हैं कि यहोवा का जलाल इस शहर में इस क़द्र मौजूद था कि दुश्मन देखकर फ़ौरन दंग हुए और घबरा कर भाग गए। आयात (9-14) में वो बयान करता है कि इस रिहाई का उन पर क्या असर होना चाहिए, या’नी यह कि वो उसकी हैकल में ख़ुदा की मेहरबानी पर ग़ौर करके उसकी अदालतों के सबब ख़ुशी करें। नीज़, चाहिए कि वो इस शहर पर ख़ूब अपना दिल लगाएँ ताकि आने वाली पुश्तों को इसकी ख़बर देने के क़ाबिल हों और बता सकें कि यह ख़ुदा अबद-उल-आबाद तक हमारा ख़ुदा है और मरते दम तक हमारी हिदायत करेगा।
(ज़बूर 49): बनी-क़ोरह का ज़बूर। पहली चार आयात में दीबाचा है, जिसमें सब उम्मतें तलब की गई हैं कि कान लगाएँ और सुनें, क्योंकि वो एक राज़ की बात पेश करना चाहते हैं, और वो राज़ यह है कि दौलत इन्सान की बहबूदी के लिए ला-हासिल है। किसी फ़ुज़ूल शख़्स को मक़्दूर (ताक़त) नहीं कि वो भाई का कफ़्फ़ारा देकर छुड़ा सके। चुनान्चे, आयात (5-13) में वो दावे से कहते हैं कि मुसीबत के अय्याम में दौलत बिल्कुल बे-सूद और बे-असर है, क्योंकि दौलतमंद भी औरों की तरह मरते हैं और अपनी दौलत औरों के लिए छोड़ जाते हैं।
आयात (14-15) में मुतव्विल (दौलतमंद), मालदार मुल्हिदीन (काफ़िर) की कैफ़ियत पेश करके उसका दीनदारों की आख़िरी हालत से मुक़ाबला करता है। ये दो आयात बहुत ही ग़ौरतलब हैं। इनमें ज़िक्र है कि बेदीन दौलतमंद भेड़ों की तरह पाताल में डाले जाते हैं और कि मौत उन्हें चराएगी, रास्त-रौ सुबह के वक़्त उन पर ग़ालिब होंगे और उनका जमाल पाताल ही में गलेगा और उनका कोई घर न रहेगा। लेकिन अपनी बाबत वो यक़ीन से कहता है कि, “ख़ुदावन्द मेरी जान पाताल से छुड़ा देगा और मुझे ले रखेगा।” आयात (16-20) में वो एक ताकीद करते हैं कि जब कोई आदमी दौलतमंद होने लगे, तो यह ख़ौफ़-ओ-हिरास का बाइस नहीं। लोग उसकी तारीफ़ करेंगे, मगर मौत के वक़्त वो कुछ हमराह न ले जाएगा, उसकी शौकत उसके पीछे क़ब्र में न उतरेगी। आख़िरी आयत में ज़िक्र है कि वो इन्सान जो हशमत वाले हैं मगर बे-समझ हैं, बिल्कुल हैवानों (जानवरों) की मानिंद हैं जो कि फ़ना होते हैं।
(ज़बूर 50): आसफ़ का ज़बूर है। चूँकि आसफ़ लावी के ख़ानदान और मशहूर माहिरीन-ए-मौसीक़ी में से था, हम उसके ज़बूर का मुतालआ बनी-क़ोरह के ज़बूरों के साथ करेंगे। ज़बूर की किताब में बनी-क़ोरह के बारह (12) ज़बूर हैं, या’नी ज़बूर (50, 73-83), ये सब ज़बूर किताब के तीसरे हिस्से में हैं। हम इन ज़बूरों के मुतालए के वक़्त आसफ़ की कैफ़ियत पर ग़ौर करते हैं।
आसफ़ के सब ज़बूर, ख़ुसूसन नबुव्वत से, तअल्लुक़ रखते हैं। उनमें मुसन्निफ़ कुल बनी-आदम से मुख़ातिब नहीं, बल्कि सिर्फ़ यहोवा के लोगों से मुख़ातिब है। ज़बूर पचास (50) में वो उन लोगों की तवज्जोह अदालत की तरफ़ लगाता है और उनको बताता है कि ख़ुदावन्द मुद्दई और क़ाज़ी है।
(1) (1-6) आयात में वो ख़ुदावन्द की अदालत के वास्ते आने का ज़िक्र करके बताता है कि जिस तरह कोह-ए-सीना पर बादल गरजते और बिजली थी, वैसे ही अदालत के लिए उसकी आमद होगी। चुनान्चे, आयात (2-4) में बयान है कि, “हमारा ख़ुदा आएगा और चुप-चाप न रहेगा, आग उसके आगे फ़ना करती जाएगी और उसके गिर्दा-गिर्द शिद्दत से तूफ़ान होगा।” इसमें वो आस्मान-ओ-ज़मीन को तलब करता है, ताकि वो अपने लोगों की अदालत करे। यह अदालत ख़ास उन्हीं की है जिनसे कि उसने अहद किया (देखो आयत 5)।
(2) आयात (7-12) में ख़ुदा क़ाज़ी की हैसियत से उनसे मुख़ातिब होता है जो कि रस्म-परस्ती से उसकी इबादत करते हैं। बहुत से लोग ऐसे हैं जो कि क़ुर्बानियाँ पेश करते और इस वहम में हैं कि चूँकि वो बपतिस्मा-याफ़्ता हैं, अगर सिर्फ़ गाहे-ब-गाहे वो इबादत में शरीक और हाज़िर हों तो बस वो ख़ुदा के लोग हैं। लेकिन ख़ुदा उन पर ज़ाहिर करता है कि वो उनकी क़ुर्बानियों का मुहताज नहीं, क्योंकि सब जानदार उसी के हैं।
सो, मुसन्निफ़ कहता है कि, “शुक्रगुज़ारी की क़ुर्बानियाँ ख़ुदा के आगे गुज़ारो और हक़-त’आला के हुज़ूर अपनी नज़रें अदा करो।” और ख़ुदा ख़ुद फ़रमाता है कि, “मुसीबत के दिन मुझसे फ़र्याद करो, मैं तुम्हें मख़्लिसी दूँगा और तुम मेरा जलाल ज़ाहिर करोगे।” ग़र्ज़ कि ख़ुदा अपने लोगों से रस्मी और ज़ाहिरी नहीं, बल्कि रूहानी परस्तिश तलब करता है। ख़ुदा रूह है, उसके परस्तारों पर लाज़िम है कि रूह और रास्ती से उसकी परस्तिश करें।
(3) आयात (16-21) में ख़ुदा रियाकारों से मुख़ातिब होकर फ़रमाता है कि, “तुम क्यों अपने मुँह से मेरे अहद का ज़िक्र करते हो, हालाँकि तर्बियत से नफ़रत रखते हो और मेरे कलाम को पीछे फेंकते हो?” वो लोग दीनी और रूहानी मुआमलात में तो बहुत कुछ ख़र्च करते थे, या’नी होंटों से ख़ुदा की बुज़ुर्गी और सताइश करने में कोई कसर न छोड़ते थे, लेकिन बदी और बे-दीनी से अपने आपको बाज़ नहीं रखते थे। सो, ख़ुदा कहता है कि, “मैं तुम्हें तम्बीह दूँगा और तुम्हारे कामों को तुम्हारी आँखों के सामने एक-एक करके दिखाऊँगा।”
सवाल 13: ज़बूर की दूसरी किताब में दाऊद के जो (18) ज़बूर हैं, उनकी तफ़्सील बयान करें।
जवाब: इस किताब के बाक़ीमांदा ज़बूर दाऊद के हैं और इनमें (18) के सरनामों से मालूम होता है कि वो सब किसी ख़ास तवारीख़ी वाक़िये से तअल्लुक़ रखते हैं। इन 18 ज़बूरों के अलावा बाक़ी ता’लीमी और नसीहत देने पर मबनी हैं। इन 18 ज़बूरों में, ज़बूर (51) नादिम ज़बूर है। याद रहे कि कुल सात, या’नी (6, 32, 38, 51, 102, 130, 143) ज़बूर नादिम हैं। यह ज़बूर दु’आइया भी हैं।
(ज़बूर 51) के सरनामे से मालूम होता है कि इस ज़बूर में पाई जाने वाली दु’आ दाऊद ने उस वक़्त माँगी, जब नातान नबी ने उसको बतशेबा के गुनाहों की निस्बत क़ाइल किया (2 समुएल 12 बाब)। ज़बूर (51) पाँच हिस्सों में मुनक़सिम (तक़्सीम) है:
हिस्सा अव्वल (1-4 आयात) में दाऊद अपने गुनाहों और गुनहगारी का इक़रार इस तरह करता है और कहता है कि, “मैं अपने गुनाहों को मान लेता हूँ और मेरी ख़ता हमेशा मेरे सामने है। मैंने तेरा गुनाह किया है और तेरे हुज़ूर बदी की है।”
हिस्सा दुव्वम (5-8 आयात) में वो अपनी सरगुज़श्त की अख़लाक़ी ना-क़ाबिलियत का उस कामिल सरिश्त से मुक़ाबला करता है जो कि ख़ुदा उससे तलब करता है, और अर्ज़ करता है कि, “ऐ ख़ुदा, मेरे बातिन में दानाई सिखला और ज़ूफ़ा से मुझको पाक कर कि मैं साफ़ हो जाऊँ, मुझको धो तो मैं बर्फ़ से ज़्यादा सफ़ैद हो जाऊँ।”
हिस्सा सोयम (9-12 आयात) में फिर वो मु’आफ़ी के वास्ते अर्ज़ करके कहता है कि, “ऐ ख़ुदा, मेरे अंदर एक पाक-दिल पैदा कर और एक मुस्तक़ीम रूह नए सिरे से मेरे बातिन में डाल दे, और मुझको अपने हुज़ूर से मत हाँक और अपनी पाक रूह मुझसे न निकाल, बल्कि मुझको अपनी आज़ाद रूह से सँभाल।”
हिस्सा चहारुम (13-17 आयात) में वो वा’दा करता है कि, “जब तू मेरी अर्ज़ के मुताबिक़ मुझसे सुलूक करेगा, तो मैं तेरी राहें ख़ताकारों को सिखलाऊँगा और गुनहगार तेरी तरफ़ रुजू करेंगे।” वो यह भी अर्ज़ करता है कि, “ऐ ख़ुदा, मुझको ख़ून के गुनाहों से रिहाई दे कि मेरी ज़बान तेरी सदाक़त के गीत बुलंद आवाज़ से गाए।”
हिस्सा पंजुम (18-19 आयात) में कुल जमा’अत से फ़रमाता है कि ख़ुदा सिय्योन के साथ भलाई करेगा और यरूशलेम की हिफ़ाज़त करेगा।
(ज़बूर 52): इस ज़बूर के सरनामे से ज़ाहिर होता है कि यह उस वक़्त की तस्नीफ़ है, जब अदूमी दोएग ने साऊल को इत्तिला दी कि दाऊद ने अख़ीमलक के पास जाकर उससे मुक़द्दस रोटी, या’नी नज़र की रोटियाँ लीं। इस ज़बूर के दो हिस्से हैं:
हिस्सा अव्वल (1-5 आयात) में बदकिर्दार को मलामत की जाती और उसके हक़ में कहा जाता है कि उसकी ज़बान ख़राबियाँ ईजाद करती है और नीज़ उस्तरे की मानिंद दग़ा-बाज़ियाँ पैदा करती है। नीज़, उसकी बदकिर्दारी का नतीजा भी मज़्कूर है कि ख़ुदा उसको अबद तक बर्बाद करेगा और वो ज़िंदगी की ज़मीन से उखाड़ दिया जाएगा।
हिस्सा दुव्वम (6-9 आयात) में दिखाया गया है कि इसका असर सादिक़ों पर क्या होगा कि वो डरेंगे और ख़ुदा के घर में हरे-भरे दरख़्त की मानिंद होंगे और ख़ुदा की रहमत पर अबद तक भरोसा रखेंगे। भरोसे की दलील दु’आ और इबादत है।
(ज़बूर 53): दाऊद का मशकील, जो कि बाँसुरियों के साथ गाया जाए। इस ज़बूर का मज़मून अहमक़ की जमा’अत और शरारत है। इसकी पहली तीन आयात में उसकी हालत का सबब यूँ बयान है कि चूँकि वो ख़ुदा का मुन्किर है और उसका तालिब नहीं, वो ख़राब हुआ है, उसका काम मकरूह है, उनमें से कोई नेकोकार नहीं।
आयात (4-5) में सवाल है कि, “क्या इन बदकारों को अक़्ल नहीं कि वो ख़ुदा के लोगों से बे-धड़क बदी करते हैं और जहाँ ख़ौफ़ का मुक़ाम नहीं, वहाँ डरते हैं?” ख़ुदा की हुज़ूरी का अदम एहसास बाइस-ए-ख़ौफ़-ओ-हिरास हैं। आयत (6) में दु’आ है कि, “इस्राईल की नजात सिय्योन ही से हो, तो उसकी शादमानी होगी।”
(ज़बूर 54): इसके सरनामे से मालूम होता है कि यह ज़बूर उस वक़्त की और उस वाक़ि’आ की यादगार है, जबकि ज़ीफ़ के लोगों ने जिबा में आकर साऊल को ख़बर दी कि दाऊद उनके हाँ छुपा हुआ है (1 समुएल 23:19)। यह ज़बूर लफ़्ज़ ‘सलाह’ से हिस्सों में मुनक़सिम है:
हिस्सा अव्वल (1-3 आयात) में दाऊद अपने दीन के दुश्मनों से रिहाई पाने के लिए दु’आ करता है कि, “ख़ुदा अपने नाम की ख़ातिर मुझको बचा और अपनी क़ुव्वत से मेरा इन्साफ़ कर।”
हिस्सा दुव्वम (4-7) में मुसन्निफ़ अपना यक़ीन ज़ाहिर करता है कि ख़ुदा ज़रूर ही उसको बचाएगा और कहता है कि, “देखो, ख़ुदा मेरा मददगार है और वो उनके दरमियान है जो मेरी जान को सँभालते हैं।”
(ज़बूर 55): इसके सरनामे से इसके मौक़ा-ए-तस्नीफ़ का कुछ पता नहीं लगता, तो भी ख़याल है कि यह उस मौक़े की यादगारी में तस्नीफ़ हुआ, जब अबी सलोम ने दाऊद से बग़ावत करके अजीलोनी अहीतोपेल को, जो दाऊद का मुशीर था, उसके शहर जिलोह में से, जब कि वो क़ुर्बानियाँ गुज़ारता था, बुलाया (2 समुएल 15:12, 31)। शायद दाऊद को अपने बेटे की मुहब्बत मजबूर करती है कि उसको बदनाम न करे। इस ज़बूर के चार हिस्से हैं:
हिस्सा अव्वल (1-8 आयात) में दाऊद ख़ुदा से अर्ज़ करता है कि उसकी दु’आ सुन ले और उसकी मिन्नत से मुँह न फेरे, और कहता है कि, “मुझ पर ज़ुल्म किया जाता है और ग़ज़ब से मुझसे कीना रखता है, और मैं मौत के हौलों (ख़ौफ़) में पड़ा हूँ। डरना और काँपना मुझ पर आ पड़ा, कँपकँपी मुझ पर ग़ालिब आई। काश कि कबूतर के से मेरे पंख होते तो मैं उड़ जाता और आराम पाता।”
हिस्सा दुव्वम (9-11 आयात) में वो ख़ुदा से अपने दुश्मनों की हलाकत के वास्ते अर्ज़ करता है और चाहता है कि उनकी ज़बानों में तफ़र्रुक़ा डाला जाए, क्योंकि इन्हीं के सबब शहर में ज़ुल्म और झगड़ा पैदा होता है।
हिस्सा सोयम (12-15 आयात) में वो दुश्मनों की कैफ़ियत बयान करता है। उनमें से एक के हक़ में वो यूँ कहता है कि, “वो मेरा हम-दर्जा आदमी है,” यह ग़ालिबन उसका बेटा अबी सलोम है। एक और की निस्बत कहता है कि, “वो मेरा रफ़ीक़ और दिली दोस्त था, हम मिलकर इख़्तिलाती (प्यार और मुहब्बत) की बातें करते थे और गिरोह के हमराह ख़ुदा के हुज़ूर जाया करते थे।” यह शख़्स ग़ालिबन अहीतोपेल, उसका मुशीर था, जिसके हक़ में दाऊद ने दु’आ भी माँगी थी कि, “ऐ ख़ुदा, मैं तुझसे मिन्नत करता हूँ कि अहीतोपेल की सलाह को हमाक़त और बतालत से बदल दे।”
(2 समुएल 15:31) आयत। वो अपने सब दुश्मनों के वास्ते मजमूई तौर पर यह मन्सूबा रखता है कि, “इन सब पर नागहां मौत आ पड़े, वो जीते-जी पाताल में उतरें, क्योंकि उनके घरों में और उनके बीच में शरारत है।”
हिस्सा चहारुम (आयात 16-23) में उसका भरोसा बहाल होता है और वो ख़ुदा की तरफ़ तवज्जोह करने से इत्मीनान पाता है। वो कहता है कि, “मैं ख़ुदा को पुकारूँगा, तो ख़ुदावन्द मुझको बचा लेगा, क्योंकि जो कोई अपना बोझ ख़ुदावन्द पर डालता है, वो ज़रूर ही सँभाला जाता है। वो सादिक़ को लग़्ज़िश खाने न देगा।”
(ज़बूर 56): इसके सरनामे से मालूम होता है कि यह उस मौक़े की तस्नीफ़ है जब फ़िलिस्तीनियों ने जात में दाऊद को पकड़ा। (ज़बूर 34, 56) दाऊद की आवारागर्दी की हालत बताते हैं, जब वो साऊल से रगेदा जा रहा था। यह ज़बूर आयात (4, 11) के इन अल्फ़ाज़ से, कि “मेरा भरोसा ख़ुदा पर है, मैं डरने का नहीं, इन्सान मेरा क्या कर सकता है,” दो हिस्सों पर मुश्तमिल है:
हिस्सा अव्वल (आयात 1-4) और हिस्सा दुव्वम (आयात 5-11) आख़िरी दो, या’नी (12-13), में ततिम्मा है। हिस्सा अव्वल में वो ख़ुदा पर अपना तवक्कुल रखने का पहला सबब बयान करता है कि ख़ुदा ने अपने लोगों की हिफ़ाज़त करने का वा’दा किया है। दाऊद को कामिल यक़ीन है कि ख़ुदा ज़रूर-ब-ज़रूर अपने क़ौल और फ़र्मूदा को पूरा करेगा। उसको इस बात का इल्म है कि ख़ुदा में सिर्फ़ इरादा ही नहीं, बल्कि वो क़ादिर-ए-मुतलक़ है, उसे कुल क़ौमों पर क़ुदरत हासिल है। इस वास्ते वो कहता है कि, “मेरा तवक्कुल ख़ुदा पर है, मैं डरने का नहीं, इन्सान मेरा क्या कर सकता है।”
हिस्सा दुव्वम में दाऊद अपने दुश्मनों की कुल कार्रवाई और उसकी तफ़्सील ख़ुदा के सामने पेश करता है और यक़ीन रखता है कि ख़ुदा उनकी तमाम हीला-साज़ियों को बातिल व बेकार करेगा। चुनान्चे, वो पुकार उठता है कि, “मेरा तवक्कुल ख़ुदा पर है, मैं डरने का नहीं, इन्सान मेरा क्या कर सकता है।” ततिम्मा (बाक़ी हिस्सा जो आख़िर में हो) में ख़ुदा की शुक्रगुज़ारी यह कह कर करता है कि, “ऐ ख़ुदा, तेरी मिन्नतें मुझ पर हैं, मैं तेरा शुक्र अदा करूँगा, क्योंकि तूने मेरी जान मौत से बचाई और मेरे पाँव फिसलने न दिए, ताकि मैं तेरे आगे ज़िंदों के नूर में चलूँ।”
(ज़बूर 57): जैसा कि इसके सरनामे से ज़ाहिर है, दाऊद ने यह ज़बूर उस वक़्त लिखा कि जब साऊल ने उसे रगेदा और वो अपनी हिफ़ाज़त के लिए मग़ारे में भाग गया, जहाँ कि उसने यह ज़बूर लिखा। वो इसमें अपना कामिल भरोसा ख़ुदा पर ज़ाहिर करता है। (ज़बूर 56) में वो अपनी निस्बत ख़याल करता और कहता है कि, “मेरा तवक्कुल ख़ुदा पर है, मैं डरने का नहीं, इन्सान मेरा क्या कर सकता है।” लेकिन इस ज़बूर में वो अपने दिल में ख़ुदा का ख़याल मुक़द्दम रखता और उसकी फ़राज़ी (बुलंदी) महसूस करके कहता है कि, “मैं तेरे परों के साए के तले पनाह लिए रहूँगा, जब तक कि ये आफ़तें टल न जाएँ।” यह ज़बूर इन अल्फ़ाज़ से कि, “तू आसमानों पर सर्फ़राज़ हो, ऐ ख़ुदा, और सारी ज़मीन पर तेरा जलाल ज़ाहिर हो,” दो हिस्सों में तक़्सीम होता है। मुसन्निफ़ चाहता है कि इलोहीम-ईल यूँ अपनी फ़ौक़ियत और आलमगीर हुकूमत ज़ाहिर करे। इसके हिस्सा अव्वल में (1-5) आयात हैं, जिनमें दाऊद ख़ुदा की रहमत के वास्ते ख़ुदा से दु’आ करता है, और अगरचे वो कहता है कि, “मेरी जान शेरों के बीच में है और मैं आतिश-मिज़ाज लोगों में रहता हूँ,” तो भी उसको यक़ीन है कि ख़ुदा उसके हर एक काम को अंजाम देगा।
हिस्सा दुव्वम (6-11 आयात) में वो ख़ुदा से मुख़ातिब होकर कहता है कि, “मेरा दिल क़ायम है, मैं लोगों के दरमियान तेरा शुक्र अदा करूँगा और उम्मतों के दरमियान तेरी मदह-सराई करूँगा। ऐ ख़ुदा, तू आसमानों पर सर्फ़राज़ हो और कुल ज़मीन पर तेरा जलाल ज़ाहिर हो।”
(ज़बूर 58): दाऊद का ज़बूर जो कि ‘अल्तशहेत’ के सुर पर गाया जाए। ‘अल्तशहेत’ के म’अनी हैं, “बर्बाद न करना।” इसके सरनामे से कुछ ज़ाहिर नहीं कि यह ज़बूर किस ख़ास वाक़िये की याद में तस्नीफ़ हुआ, मगर बा’ज़ लोगों का ख़याल है कि यह ज़बूर अबी-सलोम की मक्कारी से निस्बत रखता है, जब कि उसने कोशिश की कि यरूशलेम के बाशिंदों को वरग़लाए (2 समुएल 15:2-6)। इसमें दो-तीन ख़ास बातें हैं:
(1) आयात (1-5) में मुसन्निफ़ शरीरों (बेदीनों) की मक्कारी की ख़ासियत पेश करता है और उनके हक़ में कहता है कि उनका ज़हर साँप का ज़हर है, वो उस बहरे नाग की मानिंद हैं जो अपने कान बंद रखता है और मंत्र पढ़ने वालों की आवाज़ नहीं सुनता।
(2) आयात (6-8) में उसने शरीरों (बेदीनों) की बर्बादी के बारे में अर्ज़ किया है।
(3) आयात (9-11) में अपना यक़ीन ज़ाहिर करता है कि ख़ुदा उनको ज़रूर बर्बाद करेगा, और कहता है कि सादिक़ उनकी बर्बादी से ख़ुश होंगे और वो यक़ीन करेंगे कि एक ख़ुदा है जो ज़मीन पर इन्साफ़ करता है।
(ज़बूर 59): इसके सरनामे ही से मालूम होता है कि यह ज़बूर उस वक़्त की तस्नीफ़ है, कि जब साऊल ने दाऊद के घर पर हरकारे (क़ासिद) भेजे कि उसकी ख़बर रखें और सुबह उसे मार डालें, मगर उसकी बीवी मीकल ने खिड़की की राह से उसे निकाल दिया और वो भाग कर बच गया (1 समुएल 19:11-12)। सो, यह ज़बूर दाऊद की दु’आ है, जिसमें वो दुश्मनों से हिफ़ाज़त के वास्ते अर्ज़ करता है। इसकी तक़्सीम आयात (9, 17) की यकसाँ इबारत से दो हिस्सों में हुई है:
हिस्सा अव्वल (1-9 आयात) में दो बातें हैं:
(1) (1-5) आयात में वो ख़तरा महसूस करके बचाओ के लिए अर्ज़ करता है, क्योंकि उसको मालूम हुआ था कि उसके दुश्मन ज़ोर-आवर लोग हैं और कि वो दौड़ते हैं और ख़ुद को तैयार करते हैं और उसके दर पै होते हैं, हालाँकि वो बे-क़सूर है।
(2) आयात (6-9) में वो कहता है कि शरीर लोग बड़े इस्तिक़लाल से उसके तआक़ुब में मशग़ूल हैं, वो शाम को लौटते हैं और कुत्ते की मानिंद भौंकते हैं और शहर में हर तरफ़ फैलते हैं। बावजूद इसके, उसको कामिल यक़ीन है कि ख़ुदा उसको उनके हाथों से महफ़ूज़ रखेगा, क्योंकि वो उसकी पनाह है और वो पनाह के लिए उस पर भरोसा रखता है।
हिस्सा दुव्वम (10-17 आयात) में वो पहले अर्ज़ करता है कि ख़ुदा उन शरीरों (बेदीनों) को बिल्कुल हलाक न करे, बल्कि सिर्फ़ पस्त कर दे ताकि वह लोगों के लिए नमूना और बाइस-ए-इबरत ठहरें। (13 आयत) में वो ख़ुदा से अर्ज़ करता है कि वो उनको अपने क़हर से फ़ना करे कि वो बाक़ी न रहें और लोग ख़ुदा की हुकूमत-ए-आलमगीर देखें।
आयात (14-17) में वो कहता है कि अगरचे वो कुत्ते की मानिंद शाम को लौटें और भौंकते हुए शहर के हर तरफ़ फिरें, तो भी, “ऐ ख़ुदा, मैं तेरी सना गाऊँगा कि तू मेरा मुस्तहकम क़िला और मुसीबत के रोज़ मेरी पनाह है।”
(ज़बूर 60): इसके सरनामे से मालूम होता है कि यह ज़बूर उस वक़्त लिखा गया, जब दाऊद अराम-नहराइम और अराम-सोबा से लड़ा, और यूआब फिर नमक की वादी में बारह हज़ार अदोमियों को मार आया (2 समुएल 8:13-14, 1 सलातीन 11:15-17)।
दूसरी तवारीख़ से मालूम होता है कि जब दाऊद शुमाल में अराम-नहराइम और अराम-सोबा से जंग कर रहा था, तो जुनूब में अदोम ने यहूदाह के जुनूबी हिस्से पर लश्कर-कशी की, और जब उसकी तबाही में मशग़ूल था, तो दाऊद को अपनी फ़ौज की तक़्सीम करनी पड़ी और एक हिस्सा यूआब को देकर भेजा कि वो अदूमियों का मुक़ाबला करे। चुनान्चे, वो गया और अदूमियों को नेस्त कर दिया (1 सलातीन 11:15-17)। आयात से पेश्तर, इससे कि वो दुश्मनों पर क़ाबिज़ हुए, दाऊद ने यह ज़बूर बनाया। इस वक़्त उसे ऐसा महसूस हुआ कि गोया ख़ुदा ने उसको रद्द कर दिया है और ज़रूर फ़ौज की तक़्सीम के सबब से बर्बाद होंगे। सो, वो इस ज़बूर में फ़र्याद पेश करता है। इस ज़बूर के तीन हिस्से हैं:
हिस्सा अव्वल (1-4 आयात) में दाऊद इस वास्ते ख़ुदा से हुज्जत (तकरार करना, दलील देना) करता है कि उसके ख़याल में ख़ुदा ने उनको रद्द करके परागंदा कर दिया था। वो अर्ज़ करता है कि ख़ुदा उनकी तरफ़ फिर मुतवज्जह हो।
हिस्सा दुव्वम (5-8 आयात) में वो ख़ुदा को याद दिलाता है कि उसने इस्राईल के साथ वा’दा किया था कि वो मुल्क-ए-कनआन उनके क़ब्ज़े में कर देगा और उनको क़ौमों पर फ़त्ह बख़्शेगा, और अर्ज़ करता है कि ख़ुदा अपने वा’दे के मुताबिक़ उनसे सुलूक करे। गिलाद, दरिया-ए-यरदन के पूर्व की तरफ़, जहाँ रूबेन, जद और मनश्शे का निस्फ़ क़बीला बसाया गया था। इफ़्राइम और यहूदाह यरदन के पश्चिम की तरफ़ दलालत करते हैं। मोआब उस बर्तन की मानिंद होगा और अदोम उस ग़ुलाम की मानिंद है जिसकी तरफ़ फ़त्हमंद बादशाह अपना जूता उतार कर फेंकता है कि वो उठा ले। मतलब यह है कि अदोम ज़रूर उनके क़ब्ज़े में आएगा।
आयात (9–12) मैं वो दावे से कहता है कि रिहाई सिर्फ़ ख़ुदा की तरफ़ से हो सकती है, क्योंकि उसने उसे रद्द कर दिया था। सो बहाली भी उसकी तरफ़ से होगी। वो रिहाई, जो इंसान की तरफ़ से है, अबस है, कि सिर्फ़ ख़ुदा ही उसके दुश्मनों को पामाल कर सकता है।
(ज़बूर 61): इसके सर-नामे से इस ज़बूर की वजह तस्नीफ़ या तवारीखी मौक़ा नहीं बताया गया। तो भी ख़याल है कि ये उस वक़्त तस्नीफ़ हुआ जब दाऊद महानाइम में था, इसके बाद कि अबी सलोम शिकस्त खा कर मारा गया। और दाऊद मुन्तज़िर था कि उसकी रियाया उसे यरूशलेम ले जाकर तख़्तनशीन करे। (2 समुएल 19:11–15) आयत में दाऊद सिर्फ़ रियाया की रज़ामंदी से बहाली का ही ख़्वाहिशमंद नहीं बल्कि ये भी चाहता है कि ख़ुदा ख़ुद उसे अपने मस्कन में ले चले। इस ज़बूर के (2) हिस्से हैं।
हिस्सा अव्वल। (1–4 आयात) में मुसन्निफ़ अपना एतिमाद ख़ुदा पर ज़ाहिर करके अर्ज़-परदाज़ है कि जिस तरह अय्याम-ए-साबिक़ा में वो उसकी दुआ क़ुबूल व मंज़ूर फ़रमाता था, उसी तरह अब भी करे। और इसे उस चट्टान तक, जो उससे ऊँची है, पहुँचा दे। इससे उसका मंशा ये मालूम होता है कि ख़ुदा उसे उस जाए-ए-महफ़ूज़ तक पहुँचा दे, जहाँ कि ख़ुद अपनी ताक़त और बलबूते पर पहुँच नहीं सकता। और वो जगह ख़ुदा के साये में है।
चुनान्चे (यूहन्ना 6:44) आयत में मस्तूर है कि कोई शख़्स मेरे पास आ नहीं सकता, इस हाल में कि बाप जिसने मुझे भेजा है, उसे खींच लाए।
हिस्सा दुव्वम। (5–8 आयात) में वो अपनी गुज़श्ता दुआओं और अर्ज़ों की क़बूलियत को याद करके तसल्ली-पज़ीर होता है और यक़ीन करता है कि ख़ुदा उसकी ज़िंदगी बहुत बढ़ाएगा। वो ख़ुदा से अहद करता है कि “ऐ ख़ुदा, मैं अबद तक तेरी सना गाऊँगा और हर रोज़ अपनी नज़रें गुज़राऊँगा।” ज़िंदगी-भर की मुस्तक़िल बहाली, ज़िंदगी-भर की शुक्रगुज़ारी तलब करता है।
(ज़बूर 62): ख़याल है कि ये ज़बूर भी अबी सलोम की बग़ावत के दिनों में लिखा गया। चुनान्चे दाऊद इसके शुरू ही में कहता है कि “मेरी जान फ़क़त ख़ुदा ही की मुन्तज़िर है।” मुसन्निफ़ इंसान पर भरोसा नहीं करता, बल्कि अपनी दिलजमई और तसल्ली सिर्फ़ ख़ुदा ही में देखता और पाता है, क्योंकि वही उसकी मज़बूत चट्टान, ऊँचा बुरुज, हिफ़ाज़त, निजात और उम्मीद है। इस ज़बूर के तीन हिस्से हैं।
हिस्सा अव्वल। (1–4 आयात) में मुसन्निफ़ कहता है कि उसका भरोसा सिर्फ़ ख़ुदा पर ही है, क्योंकि वही अकेला क़ाबिल-ए-एतिमाद व लायक़-ए-एतिमाद है। इंसान मंसूबे बाँधते हैं और झूठ से ख़ुश होते हैं।
हिस्सा दुव्वम। (5–8 आयात) में वह अपनी जान को ताकीद करता है कि छुपकर फ़क़त उसी के इंतिज़ार में रह, कि मेरी उम्मीद उसी से है। वही अकेला मेरी चट्टान और मेरी रिहाई और मेरा गढ़ है। सो मुझको जुंबिश न होगी। मुसन्निफ़ औरों को भी ताकीदन कहता है कि सब लोग हर एक उस पर तवक्कुल रखें।
हिस्सा सोइम। (9–12 आयात) वह बड़े यक़ीन से कहता है कि ज़ोर सिर्फ़ ख़ुदा का है। सो लाज़िम व अंसब (ज़्यादा मुनासिब) है कि सिर्फ़ उसी पर भरोसा रखा जाये, कि आलीक़द्र अश्ख़ास झूठे हैं और ज़ुल्म और लूटपाट पर तकिया करने से कुछ हासिल नहीं होता।
(ज़बूर 63): दाऊद का ज़बूर। जब वह दश्त यहूदाह में था, जब कि वह अपने बेटे अबी सलोम की बग़ावत से भागा। तो थका-मांदा दश्त यहूदाह में मुक़ीम हुआ (2 समुएल 15:16)। (2 समुएल 15:14) में वह अपने हम-राही मुलाज़िमों से, जो यरूशलेम में थे, कहता है कि “उठो, भाग चलें, वर्ना हम अबी सलोम के हाथ से नहीं बचेंगे। जल्द चलो, ऐसा न हो कि वह अचानक हमें पकड़ ले, हम पर आफ़त लाए और तलवार की धार से शहर को ग़ारत करे।” ग़रज़ कि वह शहर में ठहरने से कुल शहर की बर्बादी और तबाही का मूजिब नहीं बनना चाहता।
चुनान्चे (2 समुएल 15:24–25) में काहिन को, जिसने ख़ुदावन्द के अहद का संदूक़ लिया हुआ था, कहता है कि “अहद का संदूक़ शहर में फिर ले जा। अगर ख़ुदा की करम की नज़र मुझ पर होगी, तो वह मुझे बचा लेगा और फिर ले आएगा और अपना आप और अपना मकान मुझको फिर दिखाएगा।” यह ज़बूर ख़ासतौर पर रुहानी ज़बूर है। इसकी रुहानियत के सबब क़दीम कलीसिया ने इसको सुबह के वास्ते इस्तेमाल किया था।
इसमें एक ही मज़मून है, यानी ख़ुदा की सोहबत के वास्ते दाऊद की ख़्वाहिशमंदी। इस लिहाज़ से इसकी तक़्सीम तो नहीं हो सकती, तो भी तफ़्सील के लिए मुसन्निफ़ की ख़्वाहिश तक़्सीम हो सकती है। पहली दो आयात में वह इलोहीम को अपना ख़ुदावन्द तस्लीम करके शख़्सी तौर पर उस से मुलाक़ात का ख़्वाहिशमंद है। और कहता है कि “मेरी जान तेरी प्यासी है और मेरा जिस्म तेरा मुश्ताक़ है।” (3–5 आयात) में वह कहता है कि “ख़ुदा की मेहरबानी ज़िंदगी से बेहतर है। सो ऐ ख़ुदा जब तक मैं जीता हूँ तुझको मुबारक कहूँगा।”
(6–7 आयात) में वह गुज़श्ता बरकतों के लिए शुक्रगुज़ारी करता और कहता है कि “मैं तेरे परों की छाँव के नीचे ख़ुशी मनाऊँगा।”
(8–11 आयात) में वह अपने यक़ीन की बुनियाद पर दावा करता है कि ख़ुदा उसको बचाएगा। उसके दुश्मन तलवार से खेत रहेंगे। बादशाह ख़ुदा से मस्रूर होगा।
(ज़बूर 64): दाऊद का ज़बूर, सरदार मुग़न्नी के लिए। इसके दो हिस्से हैं।
हिस्सा अव्वल। (1–6 आयात) में मुसन्निफ़ ख़ुदा से अर्ज़ करता है कि वह उसकी फ़रियाद सुन ले और उसकी जान को दहश्त से, जो दुश्मनों के सबब से है, बचा ले। और ख़ुदा के आगे शरिरों की पिन्हानी (पोशीदा) मश्वरत और हमला-आवरी की तहरीकों की तफ़्सील करता है।
हिस्सा दुव्वम। (7–10 आयात) में वह यक़ीन करता है कि गो शरिर ख़ुफ़िया तौर पर अपने कारोबार करते हैं, तो भी उनको कामयाबी नसीब न होगी, क्योंकि ख़ुदा उन पर एक तीर चलाएगा और वह नागहां घायल हो जाएँगे। देखने वाले भागेंगे और सब लोग डरेंगे और उसके काम बयान करेंगे। और सादिक़ ख़ुदा के सबब ख़ुश होंगे।
(ज़बूर 65): इसके सर-नामे में इसकी तस्नीफ़ की वजह या मौक़े का कोई ज़िक्र नहीं। तो भी इसकी चंद आयात से मालूम होता है कि मुसन्निफ़ की ग़रज़ यह थी कि यह ज़बूर उस वक़्त गाया जाये जब लोग फ़सल के पहले फल लाकर ख़ुदा के हुज़ूर पेश करें। चुनान्चे इन दो आयात से मालूम होता है कि लोग मस्कन में फ़राहम हुआ करते थे कि ख़ुदा के लिए नज़रें गुज़ारें। आख़िरी आयत से ज़ाहिर है कि फ़सल के शुक्राने के लिए वह फ़राहम हुआ करते थे। इसमें तीन हिस्से हैं।
हिस्सा अव्वल। (1–4 आयात) में मुसन्निफ़ ख़ुदा से मुख़ातिब होकर उसको यक़ीन दिलाता है कि सिय्योन में उसका इंतिज़ार चुपके से होता है और उसकी हम्द व सना होती है। और उसको और नज़र की जाएगी।
हिस्सा दुव्वम। (5–8 आयात) में ख़ुदा की तारीफ़ और तारीफ़ के अस्बाब बयान हैं कि वह सदाक़त से हौलनाक चीज़ों में जवाब देता है और कि वह उनका जवाब देने वाला है। और ज़मीन के सब किनारों और उन सब का, जो दरिया के बीच में हैं, भरोसा है।
हिस्सा सोइम। (9–13 आयात) में मुसन्निफ़ इस बात पर ज़ोर देता है कि चाहिए कि इस्राईल उसकी शुक्रगुज़ारी करे, क्योंकि उसने ज़मीन को सैराबी बख़्शी है और उसकी रेघारियों को ख़ूब तर किया है और मेहना (बारिश) से नरम किया है और अपने लुत्फ़ से साल को ताज बख़्शा है। यहाँ तक कि बियाबान पर, चरागाहों पर क़तरे टपकते हैं और पहाड़ियाँ हर तरफ़ ख़ुशी से घिरी हुई हैं। और चरागाहें गुलों से मुलब्बस हैं और नशेब गल्ले से ढक गए और ख़ुशी से ललकारते बल्कि गाते हैं।
(ज़बूर 66): यह एक गुमनाम ज़बूर है, क्योंकि इसका मुसन्निफ़ और मौक़ा-ए-तस्नीफ़ का कुछ पता नहीं। इसमें मुसन्निफ़ ख़ुदा के अजीब कामों के लिए, और ख़ुसूसन इस वास्ते कि उसने उसकी दुआ सुन ली, उसकी शुक्रगुज़ारी अदा करता है। ख़याल किया जाता है कि यह ज़बूर 56 की तरह ईद-ए-फ़सह के अय्याम में इस्तेमाल के लिए था। और चूँकि इसकी निस्बत ज़बूर 65 से है, ज़रूर है कि इसका मुसन्निफ़ भी दाऊद ही है। इसके दो हिस्से हैं।
हिस्सा अव्वल: इसमें मुतकल्लिम के लिए सीग़ा-ए-जमा और हिस्सा दुव्वम में सीग़ा-ए-वाहिद आया है। इन हर दो हिस्सों में कई बातें हैं। मसलन हिस्सा अव्वल:
(1) (1–4 आयात) में कुल दुनिया के बाशिंदगान तलब हुए हैं कि ख़ुदा की हम्द करें और हम्द करते हुए उसकी हश्मत ज़ाहिर करें और उसकी हुकूमत तस्लीम करें।
(2) (5–7 आयात) में उनको कहा गया है कि ख़ुदा का काम देखो, कि वह सब बनी-आदम के हक़ में मुहीब हैं। उसने समुंदर को ख़ुशकी बना डाला। उसकी सल्तनत अबदी है।
(3) (8–12 आयात) में लोगों को ताकीद है कि वे इस्राईल के ख़ुदा को मुबारक कहें, क्योंकि उसने उनको आज़माइश करके सैराब जगह में पहुँचाया।
हिस्सा दुव्वम:
(1) (13–15 आयात) में लोगों का वकील कहता है कि “मैं सोख़्तनी क़ुर्बानी के लिए तेरे घर में जाऊँगा, मैं तेरे लिए अपनी नज़रें अदा करूँगा, जो कि मैंने बिपता (तंगी, मुसीबत) के वक़्त अपने लबों से मुक़र्रर की थीं और अपने मुँह से मानी थीं।”
(2) (16–20 आयात) में वह ख़ुदातरसी की तरफ़ माइल होकर उन लोगों को कहता है कि “आओ और जानो, कि इस सबब से कि ख़ुदा ने उसकी सुनी और उसे रिहाई बख़्शी। उसका मुक़द्दमा माअक़ूल है। और वह ख़ुदा, जिसने उसकी दुआ को न फेरा और अपनी रहमत से महरूम न किया, मुबारक है।”
(ज़बूर 67): यह भी गुमनाम ज़बूरों के सिलसिले में से है और गीत या ज़बूर कहलाता है, जो कि बीन के साथ गाया जाये। इसकी निस्बत ख़याल है कि यह ईद-ए-पिन्तेकुस्त के वास्ते तस्नीफ़ हुआ था, यानी उस मौक़े के वास्ते जब लोग फ़सल के बाद इबादतगाह में फ़राहम होते थे कि ख़ुदा की शुक्रगुज़ारी करें। इसमें तीन हिस्से हैं।
हिस्सा अव्वल। (1–2 आयात) में मुसन्निफ़ काहिन के तौर पर बरकत चाहता है कि ख़ुदा की राह ज़मीन पर जानी जाये, और कहता है, “ऐ ख़ुदा, तेरी नजात सब क़ौमों पर हो।” (गिनती 6:24–26)
हिस्सा दुव्वम। (3–4 आयात) में वह अपनी ख़्वाहिश ज़ाहिर करता है कि कुल अक़्वाम ख़ुदा की इबादत में शरीक हों और उसकी बादशाहत दुनिया पर क़ियाम‑पज़ीर हो, और सब इस पर ख़ुश व ख़ुर्रम हों, क्योंकि उसकी हुकूमत रास्ती से होगी और वो ज़मीन पर उम्मतों की हिदायत फ़रमाएगा।
हिस्सा सोइम। (5–7 आयात) में मुंदरजा‑बाला बरकात और वाक़िआत की तासीर, जो कि दुनिया पर होगी, बयान की जाती है, कि ज़मीन अपना हासिल पैदा करेगी और ख़ुदा हमको बरकत देगा, और ज़मीन के किनारे उस का डर मानेंगे।
(ज़बूर 68): इसके सरनामे से मालूम होता है कि यह भी दाऊद ही का ज़बूर है, लेकिन इसमें इसकी तस्नीफ़ का मौक़ा या सबब नहीं बताया गया। इस ज़बूर से बा’ज़ का गुमान है कि मुसन्निफ़, ख़ुदा की साबिक़ा कार्रवाई पर ग़ौर करते हुए, तसल्ली‑पज़ीर हो कि वो बिलज़रूर सब अक़्वाम को मुता’अ और मुसख़्ख़र करके अपनी बादशाहत आलमगीर बनाएगा। (ज़बूर 67) मुर्शिदाना या कहानत की बरकात के कलमात से शुरू होता है। और (ज़बूर 68) के मुतलाशियान में वो अल्फ़ाज़ हैं जो कि मूसा, जब अहद का संदूक़ कूच के मौक़े पर उठाया जाता था, इस्तिमाल करता था (गिनती 10:35) में मर्क़ूम है कि “उठ, ऐ ख़ुदा, तेरे दुश्मन तितर‑बितर हों, और वो जो तुझसे कीना रखते हैं, तेरे सामने से भागें।” इसमें तीन ख़ास हिस्से हैं।
हिस्सा अव्वल। (1–6 आयात) में तम्हीद है। इसमें पहली बात ये है कि ख़ुदा की आमद उसके दुश्मनों के ख़ौफ़ और बर्बादी और अपने बर्गज़ीदों की मुबारक हाली और ख़ुशी का मूजिब है। और दूसरी बात (4–6 आयात) में इस तरह है कि ख़ुदा के लोग तलब होते हैं और ख़ुदा की आमद पर उसके गीत गाएँ और उसके नाम की तारीफ़ करें, जो कि अपने नाम ‘याह’ से सवार होकर बियाबानों से गुज़र जाता है, और उसके हुज़ूर ख़ुशी करें, और उसके रास्तों को सीधा बनाएँ। ख़ुदा के लोगों का ये ज़रूरी काम और फ़र्ज़ है कि ख़ुदा के लिए रास्ता तैयार करें, ये यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले का काम है और हमारा भी।
हिस्सा दुव्वम। (7–18 आयात) में इस्राईल के गुज़श्ता हालात का जायज़ा लिया जाता है, और उसे कामिल यक़ीन हो जाता है कि ख़ुदा ज़रूर इस क़ौम के ज़रिये अपने काम को अंजाम देगा। चुनान्चे (8–10 आयात) में वो ख़ुदा की कमाल रहमत इस में देखता है कि उसने इस्राईल को मुल्क‑ए‑मिस्र से निकाल कर, अपने आपको उन पर कोहे सीना पर ज़ाहिर फ़रमाया, और उनको शरीअत दी और मुल्क‑ए‑कनआन में पहुँचाया। और (11–14 आयात) में मुल्क‑ए‑कनआन पर उनके ग़लबा और ज़फ़रयाबी पर ग़ौर करता है, और इस में उनको ख़ुदावन्द की रहमत व बरकत से मालदार पाता है। वो ख़ुदा‑ए‑सीहोन को अपनी जाये सुकूनत के वास्ते मुंतख़ब करने पर भी सोचता भी है।
हिस्सा सोइम। (19–35 आयात) में वो गुज़श्ता बातों को छोड़कर हाल और मुस्तक़बिल के वाक़िआत दरयाफ़्त करता है। चुनान्चे (19–23 आयात) में वो इस बात से तसल्ली-पज़ीर होता है कि ख़ुदा हर हालत में अपने लोगों का शामिल-ए-हाल होता है और ज़रूर उन्हें तमाम अ’दा (बुराई) से महफ़ूज़ रखता है। (24–27 आयात) में वो अपना यक़ीन ज़ाहिर करता है कि इस्राईल यक दिल होकर ख़ुदा की हम्द-ओ-तारीफ़ करेंगे। (28–31 आयात) में वो दुआ करता है कि ख़ुदा अपनी क़ुदरत इस तरह ज़ाहिर करे कि दुश्मनों की तमाम मुख़ालिफ़त और मुख़ासमत मौक़ूफ़ कर दे। वह कामिल भरोसा रखता है और कहता है कि अक़्वाम जमा होकर ख़ुदा की तारीफ़ करेंगी। (32–35 आयात) में वह सब क़ौमों को तलब करता है कि वे ख़ुदा की तौसीफ़ में इस्राईल के हम-आवाज़ हों, ख़ुदा की हुकूमत को तस्लीम करें, और यह इकरार करें कि ख़ुदा अपनी मुक़द्दस हैकल में मुहीब है, इस्राईल का ख़ुदा वही है जो अपने लोगों को ज़ोर और ताक़त बख़्शता है, और वही मुबारक है।
(ज़बूर 69): इस ज़बूर के सर-नामे में सिर्फ़ ये आया है कि “दाऊद का ज़बूर जो कि सोसनों के सुर पर गाया जाए।” कुछ लोगों का दावा है कि यह ज़बूर दाऊद ने नहीं लिखा, बल्कि यिर्मयाह नबी ने लिखा है क्योंकि इसके मुसन्निफ़ की हालत यिर्मयाह की हालत से कुछ निस्बत रखती है, मसलन लोग बेसबब उससे कीना रखते हैं। लेकिन इसकी चंद आयात से मालूम होता है कि यह फ़िल-हक़ीक़त दाऊद का है, मसलन (आयत 30) में मुसन्निफ़ कहता है, “मैं गीत गाकर ख़ुदा के नाम की हम्द करूँगा और शुक्रगुज़ारी करके उसकी बड़ाई करूँगा।” यिर्मयाह नोहा करनेवाला था, तारीफ़ करनेवाला नहीं। यह ज़बूर ख़ासकर ख़ुदावन्द येसू मसीह की उस हालत पर दलालत करता है जब वह अकेला, बग़ैर मुनीस (दोस्त) व ग़मख़्वार, मस्लूब होने को था, न कोई तसल्ली देने वाला था, न हमदर्द, उसकी प्यासी जान को सिरका पिलाया गया। यह ज़बूर किसी गुनाह-आलूदा शख़्स से भी निस्बत रखता है, क्योंकि मुसन्निफ़ अपनी नादानी और तक़्सीरों को तस्लीम करके अर्ज़ करता है कि ख़ुदा की नजात उसे सरफ़राज़ करे, पाँचवीं आयत में वह यह दु‘आ करता है कि ख़ुदा की नजात उसे सरफ़राज़ करे। और ऐ ख़ुदा, तू मेरी नादानी से वाक़िफ़ है और मेरी तक़सीरें तुझसे छुपी नहीं। इस किताब के आख़िरी ज़बूर में, यानी (72) में, यह मसतूर है कि दाऊद की दुआएँ तमाम हुईं। और चूँकि यह ज़बूर उन ज़बूरों के सिलसिले में है, हम इसको दाऊद का ज़बूर तस्लीम करेंगे। इस ज़बूर में दो ख़ास हिस्से हैं: आयात (1–18) और (19–36)।
हिस्सा अव्वल। (1–18 आयात) की तफ़्सील ज़ेल में है। (1–6 आयात) में वह ख़ुदा से अर्ज़ करता है कि वह उसे बचा ले, क्योंकि वह ऐसी हालत में मुबतला है कि अपने आपको बचा नहीं सकता। वह कहता है: “पानी मेरी जान तक पहुँच गए हैं, मैं गहरे कीचड़ में धँस चला, यहाँ खड़े होने की जगह नहीं, मैं गहरे पानी में पड़ा हूँ, सैलाब मेरे ऊपर से गुज़र चले, मैं चिल्लाते-चिल्लाते थक गया।” दुआ ऐसे मौक़े पर कारगर होती है जब इंसान अपनी बे-कसी की हालत को महसूस करता है और सिर्फ़ ख़ुदा ही पर भरोसा रखता है।
(7–12 आयात) में वह दावा करता है कि उसकी मुसीबत और ख़तरा इस सबब से है कि वह ख़ुदा को प्यार करके उसकी ताबेदारी करता है। चुनान्चे सातवीं आयत में वह कहता है, “तेरे लिए मैं ने मलामत उठाई,” और नौवीं आयत में कहता है, “तेरे घर की ग़ैरत ने मुझको खा लिया, और उनकी मलामतें जो तुझको मलामत करते हैं मुझ पर आ पड़ीं।” (13–18 आयात) में वह जान-फ़िशानी से दुआ करता है कि ख़ुदा उसे कीचड़ से निकाले ताकि वह ग़र्क़ न हो, और उसे कीना-परवरों से महफ़ूज़ रखे।
हिस्सा दुव्वम। दूसरे हिस्से की तफ़्सील यूँ है: (19–21 आयात) में वह दावा करता है कि ख़ुदा उसकी रुस्वाई और बदनामी से वाक़िफ़ है, उसे मलामत करनेवालों ने उसके दिल को फोड़ा, और वह इसी सबब बीमारी में गिरफ़्तार हुआ। (22–28 आयात) में अर्ज़ करता है कि ख़ुदा अपना ग़ज़ब उन पर उंडेले और क़हर-ए-शदीद से उनको पकड़ ले, क्योंकि उन्होंने उसे जो तीर मारा हुआ है सताया है और उसके ज़ख़्मों की तकलीफ़-देह बातें बढ़ाई हैं। (29–36 आयात) में वह ख़ुदा की तारीफ़ इस सबब से करता है कि वह परेशान लोगों को तसल्ली देता है और मिस्कीनों की सुनता है, और यह कि वह उनको, जो कि सही हैं, ज़रूर बचाएगा।
(ज़बूर 70): इसके सर-नामे से मालूम होता है कि इसका मुसन्निफ़ दाऊद है, और कि यह “तज़्किर” (याद दिलाने) के लिए तस्नीफ़ हुआ है। यह ज़बूर (13–17) आयत से इंतिख़ाब किया गया है, कुछ अल्फ़ाज़ तब्दील हैं मगर मतलब वही है। इस ज़बूर में सिर्फ़ पाँच आयात हैं और यह दाऊद की दुआ के वास्ते है। सर-नामे में लिखा है कि “तज़्किर के वास्ते” है, तो मालूम होता है कि दाऊद ने ख़ुदा को याद करने के लिए इस ज़बूर में चालीस (40) ज़बूर में से चंद आयात लेकर उन्हें दोबारा ख़ुदा के हुज़ूर पेश किया, क्योंकि उसको अज़हद रिहाई की ज़रूरत थी। पहली आयत में वह ख़ुदा से अर्ज़ करता है कि उसकी रिहाई के वास्ते जल्द आए, और ख़ुदा की तरफ मुख़ातिब होकर अर्ज़ करता है, कि “मेरी कुमक के वास्ते जल्द आ।” (2–3) आयात में वह अपनी आरज़ू ज़ाहिर करता है कि जो उसकी जान के दर-पा हैं, वे शर्मिंदा और ख़जल किए जाएँ, फिर अपनी बे-कसी याद करके अर्ज़ करता है कि ख़ुदा उसकी तरफ़ जल्द आए, क्योंकि वह कहता है कि वही उसका चारा है और ख़ुदावंद को अपना नजात-दहिंदा समझकर उससे अर्ज़ करता है कि वह देर न करे।
(ज़बूर 71): यह ज़बूर (22, 31, 35, 40) से इंतिख़ाब किया हुआ है, जिनका मुसन्निफ़ दाऊद है। सो हम इसको भी दाऊद का ही कहेंगे, अगरचे यह बात मुमकिन है कि किसी दूसरे के हाथ से तालीफ़ हुआ हो। यह ज़बूर उस शख़्स के मुस्तक़िल ईमान को ज़ाहिर करता है, जिसने बहुत दुख और मुसीबत सह कर ख़ुदा की अजीब मोहब्बत और वफ़ादारी को खूब आज़मा कर मालूम किया कि वह क़ाबिल-ए-भरोसा है। इस ज़बूर की यह ख़ास तक़सीम नहीं है, क्योंकि हर एक आयत इसकी क़रीन आयत से पिवस्ता है और एक ही मज़मून को पेश करती है। ताहम, हमारे वास्ते इसको दो हिस्सों में तक़सीम किया गया है।
हिस्सा अव्वल। (1–13 आयात) में ख़ासकर दुआ है, हिस्सा दुव्वम (14–24 आयात) में तारीफ़ ज़्यादा है।
हिस्सा अव्वल। इसकी (1–3 आयात) (ज़बूर 31:1–3) के अल्फ़ाज़ और म’आनी से निस्बत रखती हैं। इसमें मुसन्निफ़ ख़तरे के मौक़े पर पूरे भरोसे से ख़ुदा से दुआ करता है, जिस तरह पहली आयत से ज़ाहिर है: “ऐ ख़ुदावन्द, मेरा भरोसा तुझ पर है, तू मुझ को कभी शर्मिंदा न होने दे, मेरे रहने की चट्टान हो जहाँ मैं जाया करूँ।”
(4–8 आयात) में यह कह कर अपनी इल्तिमास की वजह पेश करता है कि “ऐ ख़ुदावन्द यहोवा, तू मेरी उम्मीद है, मेरे लड़कपन से ही मेरा भरोसा तुझ पर है।” इस हिस्से की पांच से छः (5–6) आयात (ज़बूर 9–10) से मिलती हैं।
(9–13 आयात) में वह अर्ज़ करता है कि ख़ुदावन्द उसे बुढ़ापे में न फेंक दे और ज़ईफ़ी (कमज़ोरी) के वक़्त उसको तर्क न करे, न उससे दूर हो।
तफ़्सील हिस्सा दुव्वम। (14–16 आयात) में वो वादा करता है कि, “मैं हर-दम उम्मीद रखूँगा, तेरी सारी सताइश ज़्यादा करता जाऊँगा।” और आयत (17–20) में वो अपने आपको इस से मुसतहिक़-ए-हिफ़ाज़त जानता है कि ख़ुदा उसकी तुफुलियत (बचपन) से उसे तरबियत करता रहा है, वह कहता है, “मैं तेरी अजीब क़ुदरतें बयान करता रहा हूँ।”
(21–24 आयात) में वो इन अल्फ़ाज़ में दावा करता है कि “मैं बैन-बैन (मुतवस्सित, दर्मियानी) तेरी सताइश और तेरी अमानत की सताइश करूँगा”, और इस्राईल के क़ुद्दूस की तरफ़ मुख़ातिब होकर कहता है कि “मैं बरबत बजा कर तेरे गीत गाऊँगा और अपनी ज़बान से सारा दिन तेरी सदाक़त की बातें कहता रहूँगा।”
(ज़बूर 72): इस ज़बूर के सरनामे से ज़ाहिर होता है कि ये सुलेमान का है। ताहम बाज़ लोगों का दावा है कि ये दाऊद ने उस वक्त तस्नीफ़ किया जब उसने सुलेमान को बादशाह मुक़र्रर किया था। लेकिन अक्सर ये ज़बूर सुलेमान का समझा जाता है और मालूम होता है कि उसने उस वक्त तस्नीफ़ किया जब वह बादशाह होकर चाहता था कि ख़ुदा उसे ऐसी बरकत बख़्शे कि वो अपनी बादशाही के फ़राइज़ अच्छे तरीक़े से सरअंजाम दे। ये ज़बूर रास्तबाज़ी के नताइज़ को ज़ाहिर करता है। इसमें तीन हिस्से हैं।
हिस्सा अव्वल। आयात (1–7) में वह बादशाह के लिए दुआ करता है कि वह ख़ुदा की अदालतों से ख़ूब वाक़िफ़ होकर उनके मुताबिक चले, और अपने मिस्कीनों का इंसाफ करे, मुहताजों के फ़रज़ंदों को बचाए, और ज़ालिम को टुकड़े-टुकड़े करे, और कि लोग हमेशा ख़ुदा से डरते रहें।
हिस्सा दुव्वम। (8–14 आयात) में वह इस बात के लिए अर्ज़ करता है कि उसकी हुक्मरानी समुंद्र से समुंद्र तक और दरिया से इंतिहा-ए-ज़मीन तक हो, और सारे बादशाह उसके ताबे हो कर उसके हुज़ूर सज्दा करें, और सारी गिरोह उसकी बंदगी करें। चुनान्चे ये सब कुछ वक़ूअ पज़ीर हुआ।
हिस्सा सोइम। (15–17 आयात) में बादशाह के वास्ते दुआ है कि उसकी उम्र दराज़ हो। पेशगोई है कि सबा का सोना उसे दिया जाएगा और उसके हक़ में सदा दुआ की जाएगी। इस किताब के ततिम्मा यानी (18–20) आयात में ख़ुदा, की जो कि इस्राईल का है, तम्जीद है, क्योंकि वही अकेला अजीब काम करता है। उसका जलील नाम अबद तक मुबारक है। सारा जहान उसके जलाल से मामूर हो। आमीन, सुम्मा आमीन। और कहा जाता है कि दाऊद बिन यश्शै की दुआएँ तमाम हुईं।
बाब चहारुम
ज़बूर की तीसरी किताब के बयान
में (73–89 ज़बूर)
सवाल 14: इस तीसरी किताब की कैफ़ियत बयान करें।
जवाब: इसमें (17) ज़बूर हैं जिनमें से सिर्फ़ एक ही, यानी ज़बूर (86) दाऊद का है, (11) आसफ़ के हैं (73–83), चार यानी (84, 85, 87, 88) बनी क़ोरह के हैं, और (1) यानी (89) ईतान अज़राही का है। ख़याल है कि हिज़क़ियाह बादशाह ने इस किताब को तालीफ़ किया, जब उसने सलाह जारी करके हैकल की मुरम्मत करवाई और इबादत को फिर जारी किया (2 तवारीख़ 29:20–30)।
सवाल 15: आसफ़ की मुख़्तसर कैफ़ियत बयान करें।
जवाब: जब हम किसी की तस्नीफ़ात पर ग़ौर करना चाहते हैं तो हमें पहले ये मालूम होना चाहिए कि वह कौन है और क्या हैसियत रखता है।
(1) आसफ़ ने (12) ज़बूर तस्नीफ़ किए, और वे दाऊद के ज़बूरों के हमपल्ला समझे जाते हैं। पाक कलाम से हम आसफ़ की निस्बत कई बातें मालूम कर सकते हैं। मसलन (1 तवारीख़ 15:16–19) आयात से मालूम होता है कि दाऊद अहद के संदूक़ को ओबेद-एदोम के घर से निकाल कर यरूशलेम में ले जाने लगा। तो उसने लावियों को हुक्म दिया कि अपने भाइयों में से गाने वालों को मुक़र्रर करें, जो मौसीकी के साज़ यानी बरबतें, किनार और मंज़िरे छेड़ें और बुलंद आवाज़ से ख़ुशी से गाएँ। चुनान्चे लावियों ने हीमान बिन योएल को मुक़र्रर किया, और उसके भाइयों में से आसफ़ बिन बरक़ियाह को, और बनी मुरारी में से ईतान बिन क़ूशियाह को। और गानेवाले हीमान और ईतान मुक़र्रर हुए कि पीतल की झांझों से गाते बजाते रहें। और (1 तवारीख़ 16:4, 5, 7, 37) आयात से मालूम होता है कि दाऊद ने लावियों में से कुछ को मुक़र्रर किया कि वे ख़ुदावन्द के संदूक़ के आगे ख़ादिम मुक़र्रर हों और ख़ुदावन्द इस्राईल के ख़ुदा का ज़िक्र, शुक्र और हम्द करें। सो आसफ़ सरदार मुक़र्रर हुआ और वह झांझ से गाता-बजाता और सुनाता था। उस वक़्त दाऊद ने आसफ़ और उसके भाइयों के हाथ में यह गीत, जिससे वे ख़ुदावन्द का शुक्र करें, पहली दफ़ा सुपुर्द किया। यह गीत (ज़बूर 105:1–15, ज़बूर 96:1–13, ज़बूर 29:1–2, ज़बूर 98:7, ज़बूर 72:18) से बना है। और (1 तवारीख़ 16:37) आयत में ज़िक्र है कि दाऊद ने ख़ुदा के अहद के संदूक़ के आगे आसफ़ और उसके भाइयों को छोड़ा कि रोज़ाना ज़रूरी काम के मुताबिक़ हमेशा खिदमत करें।
(2) (2 तवारीख़ 29:30) में मर्क़ूम है कि हिज़क़ियाह बादशाह और अमीरों ने लावियों को हुक्म दिया कि वे ख़ुदावन्द की हम्द-ओ-सना के लिए दाऊद और आसफ़ गैब बिन के ज़बूर इस्तिमाल किया करें।
(1 तवारीख़ 25:1–7) आयात से मालूम होता है कि आसफ़, हीमान और यदूतून के बेटों में से कुछ दाऊद के लश्कर के सरदारों की तरफ़ से तैनात हुए और अपने वालिदों की हिदायत के बमूजब ख़ुदा के घर में खिदमत करें।
(2 तवारीख़ 35:15) आयत में ज़िक्र है कि जब योशिय्याह बादशाह ने ईद-ए-फ़सह मनाई तो गानेवाले, यानी बनी आसफ़ और हीमान और बादशाह के ग़ैब-बैन यानी यदूतून, हुक्म और सलाह के बमूजब अपनी जगहों पर ठहरे, और दरबान हर एक दरवाज़े पर हाज़िर थे कि उन्हें अपने-अपने मन्सबी फ़राइज़ की अदायगी लाज़िम और ज़रुरी थी। और उनके वास्ते उनके दीगर लावी भाइयों ने फ़सह तैयार की। आसफ़ के सब ज़बूर क़रीबन क़ौमी हैं, न कि शख़्सी। कुछ तवारीखी या पैग़ंबराना, जिनमें इल्तिमास, शुक्रगुज़ारी और नसीहत शामिल है।
सवाल 16: आसफ़ के ग्यारह ज़बूरों की तफ़्सील बातर्तीब करें।
जवाब: (ज़बूर 73) का मज़मून ईमान की आज़माइश और फ़त्हयाबी है। और इस मज़मून के मुताबिक़ यह ज़बूर दो हिस्सों में तक़्सीम हो सकता है।
हिस्सा अव़्वल। (114 आयात) में मुसन्निफ़ अपनी तक्लीफ़ और आज़माइश का मुफ़स्सल बयान करता है। चुनान्चे (111 आयात) में वो बयान करता है कि जब मैंने शरीरों की कामयाबी और तरक़्क़ी देखी और इस्राईल की ख़स्ता-हाली और किस्म-परसी (ऐसी हालत जिसमें कोई पुरसान-ए-हाल न हो) पर ग़ौर किया तो मैं क़रीब था कि ख़ुदा की वफ़ादारी और मुहब्बत की निस्बत अपना ईमान खो बैठा। मेरे पांव का लग़ज़िश खाना और फँसना नज़दीक-तर और मेरे क़दमों का उखड़ना क़रीब था। क्योंकि मैंने नादान मगरूरों पर, जब मैंने शरीरों (बेदीनों) की कामयाबी देखी, हसद करता था।
(13–14 आयात) में वह कहता है कि जब मैंने देखा कि शरीर हमेशा इक़बालमंद रहते हैं और अपनी दौलत फ़रावान करते हैं, तो मैं पेशमान हुआ और अपने दिल में कहा कि मैंने अबस (फ़िज़ूल) अपने दिल को साफ़ किया और बेगुनाही से अपने में, बेफ़ायदा दिन-भर बेआरामी की हालत में रहता हूँ और सुबह को तंबीह पाता हूँ। ग़रज़, मुसन्निफ़ पर यह आज़माइश आई कि वह रुहानी बरकात के मुक़ाबले में दुनियावी माल-ओ-मता पर लगाए।
हिस्सा दुव्वम। (15–28 आयात) में वह बयान करता है कि उसका ईमान किस तरह रासिख़ और बहाल रहा। चुनान्चे (15–16 आयात) में उसका ख़याल गुज़रा कि वह अगर इस्राईल को इन ख़यालात के बमूजब, जिनका इज़्हार हिस्सा अव्वल में किया है, तालीम देगा तो गोया वह ख़ुदा के गिरोह की औलाद से बेवफ़ाई करेगा, और यह उसको बहुत ही नागवार मालूम हुआ।
(17–20 आयात) में वह बयान करता है कि जब मैं ख़ुदा के मस्कन में दाख़िल हुआ तो मैंने समझ लिया कि जिस्मानी बरकात हक़ीक़ी नहीं बल्कि चंद रोज़ा और बाइस-ए-ख़तरा हैं।
(21–22 आयात) में वह कहता है कि ऐसे लोगों, यानी शरीरों से कीनावरी करना महज़ जहालत है।
(27–28 आयात) में वह अपने ईमान का इज़्हार करता है: “देखो, जो तुझसे, यानी जो ख़ुदा से, दूर हैं, फ़ना हो जाते हैं। और मेरी भलाई ख़ुदा के नज़दीक रहने से होती है। मैंने ख़ुदावन्द यहोवा पर तवक्कुल किया है ताकि मैं उसके सब कामों को शौहरत दूँ।”
(ज़बूर 74, 79): ये दोनों मज़मून और इबारत में एक-दूसरे से मुवाफ़िक़त रखते हैं। और बमूजब सरनामों के दोनों ही आसफ़ की तस्नीफ़ हैं। मौक़ा-ए-तस्नीफ़ की निस्बत बा’ज़ लोगों का ख़याल है कि ये दोनों ज़बूर यरूशलेम की बर्बादी पर तस्नीफ़ हुए, जो कि शाह नबूकदनेस्सर ने मसीह से (586 क़. म.) साल पहले की। बा’ज़ गुमान रखते हैं कि इनकी तस्नीफ़ का मौक़ा अहले-यरूशलेम की इज़ा-याबी है, जो कि क़ब्ल-अज़-मसीह (168 या 165 क़. म.) में वाक़े हुई। जब कि एंटियोकस एपिफ़नी ने हैकल को नापाक किया और यहूदियों में से हज़ारों को तलवार के घाट उतार दिया। अगर ये ज़बूर, जो कि आसफ़ के कहलाते हैं, क़ब्ल-अज़-मसीह (586 ई॰पू॰) या (170 ई॰पू॰) में तस्नीफ़ हुए, तो किसी सूरत में आसफ़ की तस्नीफ़ नहीं हो सकते। आसफ़ तो दाऊद का हम-अस्र था। अलबत्ता मुमकिन हो सकता है कि आसफ़ कैफ़ियत-ए-नबी-अज़-राह, नबुव्वत या इस्राईल के मुस्तक़बिल का बयान करता है, या मुल्हिम होकर उनकी रुहानी हालत पेश करता है। ये ज़बूर तीन हिस्सों में मुन्क़सिम है।
हिस्सा अव्वल। (1–9 आयात) में मुसन्निफ़ इसलिए कि ख़ुदा ने अपने लोगों को दरमांदगी और मुसीबत की हालत में छोड़ा है। इसलिए वह हुज्जत करता है और अर्ज़ करता है कि ख़ुदा आकर उनकी मदद फ़रमाए। चुनान्चे दूसरी आयत में वह कहता है कि “अपनी इस क़ौम को, जिसे तूने क़दीम से ख़रीदा है, और अपने मीरासी फ़िर्क़े को जिसे तूने ख़लासी बख़्शी, और कोह-ए-सीहोन को जिसमें तूने सुकूनत की, याद फ़रमा।” गोया कि अपने इस्तिहक़ाक़ (कानूनी हक़) और हुक़ूक़ का दावा करता है कि वाजिब और ज़रूरी है कि ख़ुदा अपने लोगों को रिहाई बख़्शे। सातवीं आयत में वह अपने दुश्मनों की कार्रवाई का यूँ बयान करता है: “ऐ ख़ुदा, उन्होंने तेरे मस्कन में आग लगाई है, तेरे नाम के मस्कन को ज़मीन पर गिराकर नापाक किया है।” सो इन दो बातों यानी बनी-इस्राईल की पस्ती और ज़िल्लत, और उनके दुश्मनों की कार्रवाई को पेश करके वह ख़ुदा को उभारता और मुश्तइल करता है कि वह कुछ करे। और अपनी बे-कसी का यूँ एतराफ़ करता है कि हम लाचार हैं। हमारा कोई नबी नहीं और हमारे दरमियान कोई शख़्स नहीं जो मालूम करे कि ये हालत कब तक जारी रहेगी।
हिस्सा दुव्वम। (10–17 आयात) में वह ख़ुदा को जताता है कि उसकी अज़मत और बुज़ुर्गी इस बात में है कि वह मुक्तज़ी है अपने लोगों को बचाए। और याद दिलाता है कि उसने साबिक़ ज़माने में अपने लोगों से कैसा सुलूक किया, जब उनको मुल्क-ए-मिस्र से निकालकर कनआन की सरज़मीन में पहुँचा दिया।
हिस्सा सोइम। (18–23 आयात) में वह अपने दलाईल धरकर अपने ख़ुदा से अर्ज़ करता है कि “अपनी फ़ाख़्ता की जान भेड़िये के क़ाबू में न दे, और अपने मिस्कीनों के गिरोह को हमेशा न भूल। बल्कि अपने अहद पर लिहाज़ कर और ऐसा न होने दे कि मज़लूम रुस्वा होकर उल्टा फिरे, बल्कि ऐसा हो कि मसाकीन और मुहताज तेरे नाम की सताइश करें।”
(ज़बूर 75): सरदार मुग़न्नी के लिए आसफ़ का ज़बूर, जो कि “अल-तशीत” के सुर पर गाया जाए। मालूम होता है कि (ज़बूर 75, 76) ज़बूर 74 के जवाब में हैं। चुनान्चे ज़बूर 75 की पहली तीन आयात में बनी-इस्राईल इन अल्फ़ाज़ में ख़ुदा की तारीफ़ करते हैं: “ऐ ख़ुदा, हम तेरी हम्द करते हैं, क्योंकि तेरा नाम हमसे नज़दीक-तर है और तेरे अजीब कामों की मुनादी होती है।” इसके जवाब में ख़ुदा फ़रमाता है कि जब मौक़ा होता है, मैं अदालत करता हूँ। और अगरचे सर-ज़मीन और इसके सब बाशिंदे पागल हो गए हैं, तो भी मैंने इसके सुतूनों को सँभाला है।
(4–8 आयात) में मुसन्निफ़ मगरूर मुख़ालिफ़ीन से मुख़ातिब होकर उनसे कहता है कि “घमंड न करो” और शरीरों से कहता है कि “सींग न उठाओ।” क्योंकि सरफ़राज़ी न पूरब से आती है, न पश्चिम से और न दक्खिन से, बल्कि ख़ुदा अदालत करने वाला है। वह एक को पस्त करता है, दूसरे को सरफ़राज़ करता है, यानी कि वह हर एक को उसके काम के मुताबिक़ सज़ा और जज़ा देता है।
(9–10 आयात) में वह दावे से कहता है कि “जो हुआ, अबद तक बयान करूँगा और याक़ूब के ख़ुदा की हम्द गाऊँगा।” और शरीरों के बरख़िलाफ़ होकर उनका मुक़ाबला करूँगा और सादिक़ों की मदद करूँगा।
(ज़बूर 76): यह भी आसफ़ का ज़बूर है, और इसकी इबारत से ज़ाहिर है कि यह भी दुआ का जवाब है। इसमें चार हिस्से हैं।
हिस्सा अव्वल। (1–4 आयात) में वह बयान करता है कि ख़ुदावन्द ने फिर से अपने आपको सीहोन पर ज़ाहिर किया और उसके दुश्मनों को तितर-बितर किया। चुनान्चे (ज़बूर 76) में मस्तूर है कि उसने कमानों के तीर, सिपरें और तलवारें तोड़ीं और लड़ाइयाँ मौक़ूफ़ कर दीं।
हिस्सा दुव्वम। (5–6 आयात) में ख़ुदा की फ़त्हमंदी और नुसरत की तारीफ़ है। आयात (3–6) में लिखा है कि “तेरी डपट से, ऐ याक़ूब के ख़ुदा, गाड़ियां और घोड़े नींद से मस्तगर्क़ हुए।” बा’ज़ लोग ख़याल करते हैं कि यह आयत सिन्हेरीब की अफ़्वाज की बर्बादी की तरफ़ इशारा करती है, जब कि हिज़क़ियाह नबी ने ख़ुदा से दुआ की थी। (2 सलातीन 19:35–36)
हिस्सा सोइम। आयात (7–9) में मुसन्निफ़ कहता है कि जब ख़ुदा इंतिज़ाम के लिए उठता है तो कोई उसके हुज़ूर नहीं रह सकता, कि उसका मुक़ाबला करना मुहाल मुतलक़ है।
हिस्सा चहारुम। (10–12 आयात) में बयान है कि आदमी का ग़ज़ब भी ख़ुदा की सताइश का बाइस है। इसमें मुसन्निफ़ सबको ताकीद से कहता है कि ख़ुदावन्द ख़ुदा की नज़्र में नज़्रें और उन्हें अदा करो, और सब लोग उसके हुज़ूर जिससे कि डरना चाहिए, हदिये लाएं।
(ज़बूर 77): यह दो तीन सरदार मुग़न्नी के लिए आसफ़ का ज़बूर है। इस ज़बूर के मज़मून से मालूम होता है कि मुसन्निफ़ की हालत तस्नीफ़ के वक़्त हबक़्क़ूक नबी की हालत की सी थी, जब उसने वह दुआ मांगी जो उसकी किताब के तीसरे बाब में है। अब चूँकि यह ज़बूर हबक़्क़ूक के बाब सोइम से मुवाफ़िक़त रखता है, बा’ज़ लोग ख़याल करते हैं कि आसफ़ ने हबक़्क़ूक की दुआ के मुतालए के बाद यह ज़बूर तस्नीफ़ किया। और बा’ज़ बरअक्स इसके यह गुमान रखते हैं कि हबक़्क़ूक ने इस ज़बूर को देखकर अपनी दुआ तस्नीफ़ की। मुम्किन है कि दोनों की हालत यकसाँ थी, दोनों ही ने मुल्हिम होकर अलेहदा-अलेहदा, बग़ैर एक-दूसरे से सलाह मश्वरे या एक-दूसरे की तस्नीफ़ के मुतालआ से, अपनी हालत बयान की हो। इस ज़बूर के दो हिस्से हैं।
हिस्सा अव्वल। इस हिस्से में एक मसअला पेश है, और हिस्सा दुव्वम में उसका अस्ल है।
हिस्सा अव्वल। (1–3 आयात) में अपनी घबराहट का यूँ बयान करता है कि अगरचे बिपता (मुसीबत) के रोज़ में मैंने ख़ुदावन्द की तलाश की और मेरे हाथ रात को उठे और गिरे नहीं, तो भी मेरी जान ने तसल्ली से इन्कार किया। मैं ख़ुदा को याद करता और घबराता हूँ, मैं सोचता हूँ और मेरा जी डूबता जाता है।
(4–9 आयात) में मुसन्निफ़ बनी-इस्राईल की गुज़श्ता हालत पर ग़ौर करके अपने से सवाल करता है: “क्या यह मुमकिन है कि ख़ुदा अपने लोगों को हमेशा के वास्ते तर्क करे?” (9 आयत) में सवाल है: “क्या ख़ुदा अपने रहम को भूल गया? क्या उसने अपनी रहमतों को बंद कर दिया?”
हिस्सा दुव्वम। (10-20) और (10–12 आयात) में मुसन्निफ़ दावा करता है कि “मैं ख़ुदावन्द की गुज़श्ता कार्रवाइयों पर ख़ूब ग़ौर करूँगा।” (12 आयत) में वह कहता है: “मैं तेरे सब कामों के बारे में हमेशा सोचूँगा और तेरे फ़ेअलों पर ध्यान करूँगा।”
(13–15 आयात) में वह इस्राईल के बचाव और उनकी हिफ़ाज़त याद करके कहता है कि “तूने अपने बाज़ुओं से अपने लोगों, बनी-याक़ूब और बनी-यूसुफ़ को मख़लिसी बख़्शी।”
(16–20 आयात) में मख़लिसी की निस्बत ख़ुदा की अजीब कार्रवाइयों का बयान करके कहता है: “तेरी राह समुंद्र में है और तेरा गुज़र पानियों में, तेरा नक़्श-ए-क़दम मालूम नहीं।”
(20 आयत) में वह कहता है कि “तूने गल्ले की मानिंद मूसा और हारून के ज़रिये अपने लोगों की राहनुमाई फ़रमाई।” इन सब बातों पर ग़ौर करके वह तसल्ली पाता है और उम्मीद रखता है कि ख़ुदा आइन्दा भी अपने लोगों की हिफ़ाज़त और राहनुमाई फ़रमाएगा। ख़ुदा चाहता है कि हम उसकी कुल कार्रवाइयों का बग़ौर मुतालआ करें और उसे सोचें।
(ज़बूर 78): यह ज़बूर आसफ़ का मश्क़ील है।
(ज़बूर 77): में ख़ुदा के अजीब काम इस ग़रज़ के लिए बयान हैं कि आदमी बिपता और मुसीबत के वक़्त उन पर ग़ौर करे और ईमान की तक़वियत हासिल करे। (ज़बूर 78) भी तवारीख़ के ज़रिये ख़ुदा का वह अजीब सुलूक बयान करता है जो उसने बनी-इस्राईल के साथ रवा रखा, ताकि इस्राईल इस पर ग़ौर करें और बाप-दादों की सरकशी और शरारत से इज्तिनाब करें और अपनी ज़िंदगी ख़ुदा की नेक मर्ज़ी और इरादों के मुताबिक़ बसर करें। इस ज़बूर में दाऊद के इस अहद के वक़्त तक, जब कि ख़ुदा ने इफ़्राईम और शीलोह को तर्क कर दिया और यहूदाह और यरूशलेम को दीनी और दुनियावी दार-उल-ख़िलाफ़ा के वास्ते चुना, की तारीख़ मिलती है। इस तारीख़ में सात बासिलसिला बातें मिलती हैं।
(1) (1–8 आयात) में इस ज़बूर का मक़सद पेश किया गया है कि लोग इन तवारीखी वाक़िआत से तालीम और तर्बियत हासिल करें और दूसरों को भी आरास्ता करें। चुनान्चे पहली आयत में रक़म है कि ख़ुदा अपने लोगों से मुख़ातिब होकर कहता है: “ऐ मेरे गिरोह, मेरी तालीम पर कान रख और मेरे मुँह की बातें कान लगा कर सुनो।”
(6–8 आयात) में इसका मक़सद यूँ बयान किया गया है कि आने वाली पुश्त, नीज़ वह फ़र्ज़ंद जो पैदा होंगे, सीखें और उठकर अपनी औलाद को सिखाएँ, ख़ुदा पर तवक्कुल रखें और ख़ुदा के कामों को भुला न दें, बल्कि उसके अहकाम हिफ़्ज़ करें। और अपने बाप-दादों की तरह शरीर और सरकश न हों, बल्कि जिनके दिल ख़ुदा से मानूस न रहे।
(2) (9–16 आयात) में मुसन्निफ़ बनी-इस्राईल की तारीख़ से उनकी फ़रामोशी और बेवफ़ाई ज़ाहिर करता है कि उन्होंने ख़ुदा के अहद को हिफ़्ज़ न किया, बल्कि उसकी शरीअत पर चलने से इंकार किया और उसके कामों और अजीब क़ुदरतों को भुला दिया।
(3) (17–31 आयात) में वह बयान करता है कि गो ख़ुदा ने उनकी हिफ़ाज़त की और उनके वास्ते ख़ुराक भी मुहय्या करता रहा, तो भी वे उस से किनारा करते गए और बियाबान में हक़ त’आला से बग़ावत की। यहां तक कि उसका ग़ज़ब उन पर भड़का और उनमें से तानावारों (तगड़े) लोगों का क़त्ल किया और इस्राईल के जवानों को गिरा डाला।
(4) (29–42 आयात) में दिखाया गया है कि बियाबान में ख़ुदा की धमकियों और सज़ा ने चंद रोज़ा आरास्तगी और इस्लाह और तौबा पैदा कर दी। अगर ख़ुदा अपनी बेपायाँ रहमत से मूसा की सिफ़ारिश मंज़ूर न करता तो अलबत्ता वह उनको यकलख़्त हलाक कर डालता।
(ज़बूर 78): इसकी (38 आयत) में वह रहीम है और उसने उनकी बदकारियाँ बख़्शीं और हलाक न किया। हाँ, बार-बार उसने अपने क़हर को रोका और अपने सारे ग़ज़ब को न भड़काया, क्योंकि उसने याद किया कि वे (लोग) बशर (इंसान) हैं।
(5) (40–55 आयात) में मुसन्निफ़ उन दस (10) आफ़ात में से, जो कि मिस्रियों पर उस वक़्त वाक़े हुईं जब ख़ुदा ने बनी-इस्राईल को मिस्र से बचाकर निकाला, सात (7) आफ़ात पेश करता है। यानी कि ख़ुदा ने उनको मुल्क-ए-कनआन में पहुँचाने के लिए उनके दुश्मनों को हलाक किया, ताकि ख़ुदा की रहमत और मेहरबानी के मुक़ाबले में बनी-इस्राईल की बेवफ़ाई, ग़द्दारी और नाशुक्रगुज़ारी बख़ूबी और अयाँ बयान हो जाए।
(6) (56–64 आयात) में दिखाया गया है कि मुल्क-ए-कनआन में पहुँचकर वे अज़-सरे-नव गुनाह में यहां तक मशग़ूल और मुब्तला हुए कि उसने शीलोह को, जहां अहद का संदूक़ रखा था, छोड़कर उनको उनके दुश्मनों के हाथ में छोड़ दिया।
(7) आयात (65–72) में ख़ुदा ने इस्राईल पर फिर रहम फ़रमाया और इफ़्राईम की बजाए यहूदाह और शीलोह की बजाए यरूशलेम मुंतख़ब किया। चुनान्चे लिखा है कि उसने उन्हें अपने दिल की रास्ती से छुड़ाया और अपने हाथों की चालाकी से उनकी रहनुमाई की।
(ज़बूर 79): आसफ़ का ज़बूर। (ज़बूर 79 और 74) एक ही मौक़े की तरफ़ इशारा करते हैं और एक-दूसरे से कुछ मुवाफ़िक़त भी रखते हैं। इस ज़बूर के तीन हिस्से हैं, जिनमें मुसन्निफ़ अपनी ग़म-आलूदगी और ग़म का सबब बयान करके ख़ुदा से अपने गुनाहों की मुआफ़ी और रिहाई की अर्ज़ करता है।
हिस्सा अव्वल। (1–4 आयात) में मुसन्निफ़ दुश्मनों की चढ़ाई और हमला, और हैकल की तहक़ीर व बे-हुरमती और यरूशलेम की बर्बादी इन अल्फ़ाज़ में पेश करता है कि “ख़ुदा, ग़ैर-अक़्वाम तेरी मीरास में दाख़िल हुए और तेरी मुक़द्दस हैकल को उन्होंने नापाक किया और यरूशलेम को ढेर कर दिया।”
हिस्सा दुव्वम। (5–7 आयात) में मुसन्निफ़ अर्ज़ करता है कि ख़ुदा इस्राईल पर रहमत फ़रमाए और उनकी सज़ा को मौक़ूफ़ करे, और अपना ग़ुस्सा उन अक़्वाम पर, जिन्होंने न पहचाना, और उन बादशाहों पर जिन्होंने उसका नाम न लिया, उंडेले।
हिस्सा सोइम। (9–13 आयात) में मुसन्निफ़ ख़ुदा से इमदाद चाहता है, कि और इसमें वह अपने को मदद और तआवुन का मुस्तहिक़ इक़रार नहीं देता, बल्कि कहता है कि “अपने नाम की ख़ातिर हमारे गुनाहों को ढाँप दे।” यानी ख़ुदा के जलाल की बिना पर वह अर्ज़ करता है।
नोट: तल्मूद के क़लमी नुस्ख़े बनाम (सोफ्रेम) में बताया गया है कि ज़बूर 79 माह अब (अगस्त) की नौवीं तारीख़ पर, जब हैकल की पहली और दूसरी बर्बादी यादगारी की जाती थी, (ज़बूर 137) के साथ इस्तिमाल होता था।
(ज़बूर 80): सरदार मुग़न्नी के लिए आसफ़ का ज़बूर। “सोसनिम अदूत” के सुर पर गाया जाए। इसके सरनामे से मालूम होता है कि इसका मौक़ा-ए-तस्नीफ़ ठीक तौर पर नहीं मालूम हो सकता। लेकिन मज़मून से मालूम होता है कि यह ज़बूर सल्तनत की तक़्सीम के बाद, जब यहूदाह और इफ़्राईम एक-दूसरे से अलैहदा हुए, तो तब लिखा गया। क्योंकि इसमें मुसन्निफ़ ख़ासतौर पर यूसुफ़ के घराने के लिए दुआ मांगता है। यह ज़बूर चार हिस्सों में मुनक़सिम है।
हिस्सा अव्वल। आयात (1–3 आयात) में मुसन्निफ़ यूसुफ़ के वास्ते यूँ दुआ करता है कि “ऐ इस्राईल के गड़रिए, तू यूसुफ़ को गल्ले की मानिंद ले चलता है, और तू ख़ुद करोबीम पर तख़्त-नशीन है। जलवा-गर हो, और इफ़्राईम, बिनयामीन और मनस्सी के आगे अपनी क़ुव्वत को हरकत दे और आकर हमको बचा।”
हिस्सा दुव्वम। (4–7 आयात) में वह ख़ुदा से इस्तिफ़सार करता है कि “ऐ ख़ुदावन्द, लश्करों के ख़ुदा, कब तक तेरे क़हर का धुआँ तेरे लोगों की दुआ के बरख़िलाफ़ उठता रहेगा?” मुसन्निफ़ चाहता है कि ख़ुदा की रहमत उन पर नाज़िल हो और कि वह उनको दुश्मनों के हाथों से बचाए, और कहता है कि “अगर तू अपना चेहरा रोशन करे तो हम बच जाएँगे।”
हिस्सा सोइम। (8–13 आयात) में मुसन्निफ़ क़ौम-ए-इस्राईल को ताक से तश्बीह देता है और कहता है: “ऐ ख़ुदा, तूने इसे मुल्क-ए-मिस्र से निकालकर कनआन में लगाया। यहां उसने ख़ूब जड़ पकड़कर बढ़ा और फला।” और वह अर्ज़ करता है कि “ख़ुदा, अपनी ख़ुद लगाई हुई ताक की हिफ़ाज़त और निगहबानी कर।”
हिस्सा चहारुम। (14–19 आयात) में मुसन्निफ़ फिर मिन्नत करता है कि ख़ुदा आसमान पर से निगाह करे और इस ताक की तरफ़ मुतवज्जह हो। क्योंकि वह कहता है कि “यह आग से जलाई गई और काटी गई है, और तेरे चेहरे की डपट से हलाक हुई है।” आख़िर में वादा करता है कि “ऐ ख़ुदा, अगर तू फिर हमारी तरफ़ मुतवज्जह हो तो हम तुझसे न फिरेंगे।”
(ज़बूर 81): यह ज़बूर सरदार मुग़न्नी के नाम पर आसफ़ की तरफ़ से है। इसकी तीसरी आयत से ज़ाहिर है कि वह नए चाँद की ईद के वास्ते तस्नीफ़ हुआ था। मुसन्निफ़ इस ख़्वाहिश से कि वह ईद बवजह-ए-अह्सन और कमाल ख़ुशी से मनाई जाए, इस ज़बूर से लोगों को तहरीक दिलाता है कि वे ख़ुशी से आएं और ईद में शमूलियत का इस्तिहक़ाक़ (कानूनी हक़) हासिल करें। इसमें तीन हिस्से हैं।
हिस्सा अव्वल। (1–5 आयात) में मुसन्निफ़ गाने वालों को जोश दिलाता और कहता है: “पुकारकर ख़ुदावन्द की मदह गाओ, वह हमारा ज़ोर है, याक़ूब के ख़ुदा के लिए ख़ुशी से ललकारो, सुर बाँधकर एक गीत गाओ।” फिर वह काहिनों को यह कहकर उभारता है कि “क़रनाई (सींग का बिगुल, तुरही) फूँको, ताकि सब लोगों को मालूम हो कि हमारी मुक़द्दस ईद है।” क्योंकि यह ख़ुदा की सुन्नत और शरीअत है और यह शहादत के लिए ठहराई गई है, जब कि हम ने मुल्क-ए-मिस्र से ख़ुरूज किया।
हिस्सा दुव्वम। (6–10 आयात) में मुसन्निफ़ अपने ख़ुरूज के अय्याम का तसव्वुर करके इस्राईल की रिहाई के वास्ते ख़ुदा का फतवा सुनता है, कि और वह ख़ुदा को यह कहते हुए सुनता है: “ऐ मेरे लोगों, सुनो! तुम्हारे दरमियान कोई दूसरा माबूद न हो और किसी अजनबी माबूद को सज्दा न करो। कि ख़ुदावन्द तुम्हारा ख़ुदा मैं हूँ, जो तुम्हें मिस्र की ग़ुलामी से निकाल लाया।”
हिस्सा सोइम। (11–16 आयात) में ज़ाहिर किया गया है कि इस्राईल ने उसकी आवाज़ पर कान न धरा और उसकी तालिब न हुए। और ख़ुदा यूँ ज़ाहिर करता है कि “ऐ काश मेरे लोग मेरी सुनते और इस्राईल मेरी राहों पर चलता, तो मैं जल्दी उनके दुश्मनों को मग़्लूब करता और उनके बंधनों पर अपना हाथ फेरता।”
(ज़बूर 82): इस ज़बूर में आसफ़ एक मुक़द्दसा की तस्वीर खींचता है, जिसमें ख़ुदा क़ाज़ियों का क़ाज़ी होकर इस्राईली हाकिमों का, जिन्हें वह इलोहीम कहता है, मुक़द्दमा करता है। वह उन पर इल्ज़ाम लगाता है कि वे इंसाफ़ छोड़कर तरफ़दारी करते हैं और उनको याद दिलाता है कि लोगों के सामने वे ख़ुदा की तरफ़ से नुमाइंदे हैं। सो चाहिए कि उनके फ़ैसले ख़ुदा की तरफ़ से समझे जाएँ। चुनान्चे पहली चार आयात में वह लोगों को दिखाता है कि वह अपनी जमाअत में खड़ा होकर हाकिमों की बे-इंसाफ़ी के लिए उनकी फ़रमाइश करता है।
(5–7 आयात) तक वह लोगों को बताता है कि ऐसी तरफ़दारी से ज़मीन की सारी बुनियादें जुंबिश खाएँगी। और वह उनको ताकीद करता है कि वे मिस्कीनों और यतीमों का इंसाफ़ करें, दिलगीर और हाजतमंदों की दिलजुई और हाजतरवाई करें और मुहताज और मिस्कीन को रिहाई दें। वह हाकिमों की अदालत और उनके इंसाफ़ से बेज़ार होकर ख़ुदा को पुकारता है: “ऐ ख़ुदा, उठ! तू खूद आ और ज़मीन की अदालत कर, क्योंकि तू कुल उम्मतों का मालिक है।”
(ज़बूर 83): आसफ़ का ज़बूर। इसमें यरूशलेम के हाकिमों की फ़रमाइश के बाद मुसन्निफ़ ग़ैर-अक़्वाम की तरफ़ मुतवज्जह होता है और अर्ज़ करता है कि ख़ुदा उनका फ़ैसला करे, क्योंकि वे इस्राईल को बर्बाद करना चाहते हैं। इसमें दो हिस्से हैं।
हिस्सा अव्वल। (1–8) आयात में ख़ुदा से अर्ज़ करता है कि “ऐ ख़ुदा, चुप न रह, ख़ामोशी इख़्तियार न कर और चैन न ले। देख, तेरे दुश्मन धूम मचाते हैं। उन्होंने, जो तुझसे कीना और अदावत रखते हैं, सर उठाया है। वे आपस में मन्सूबा बाँधकर कहते हैं कि आओ, उनको उखाड़ डालें कि वे आइन्दा क़ौम न रहें और इस्राईल के नाम का फिर ज़िक्र तक न हो। उन्होंने अपने दिल में मशविरा किया है और तेरी मुख़ालिफ़त में अहद बाँधा है।”
हिस्सा दुव्वम। (9–18) आयात में मुसन्निफ़ अर्ज़ करता है कि “ऐ ख़ुदा, उनको गर्दबाद की मानिंद कर और हवा के सामने भूसे की मानिंद बना। जिस तरह आग जंगल को जलाती है और शोला पहाड़ों को झुलसा देता है, उसी तरह अपनी आंधी से तू उनका पीछा कर और अपने तूफ़ान से उनको परेशान कर। ऐसा कर कि वे जानें कि तू ही अकेला है जिसका नाम यहोवा है और तू सारी ज़मीन पर बुलंद-ओ-बाला है।” यह आसफ़ का आख़िरी ज़बूर है।
(ज़बूर 84): बनी क़ोरह का ज़बूर है। बा’ज़ मुअर्रिख़ीन मिस्र कहते हैं कि यह ज़बूर बनी क़ोरह की तस्नीफ़ात में नहीं बल्कि बनी क़ोरह के लिए है। यह इबारत और तर्कीब में (42–43) ज़बूरों से मिलता-जुलता है, लेकिन कुछ फ़र्क़ भी है। और वह यह है कि ज़बूर (42–43) में मुसन्निफ़ इस बात से मग़्मूम (ग़मज़दा) और आरिजुदा खातिर है कि वह हैकल की इबादत में शरीक नहीं हो सकता। लेकिन इस ज़बूर में वह ख़ुशी का इज़हार करता और कहता है कि हम शरीक हो सकते और होते हैं। जुमला मुफस्सिरीन इसकी तस्नीफ़ के वक़्त की निस्बत मुत्तफ़िक़-उल-राए नहीं हैं। चुनान्चे बा’ज़ ख़याल करते हैं कि यह ज़बूर तामीर-ए-हैकल से भी पहले लिखा गया और बा’ज़ यह कि यह ज़बूर ज़माना-ए-दाऊद के बाद तस्नीफ़ हुआ। बिशप स्कॉट साहब ज़बूर की किताब की निस्बत फ़रमाते हैं कि “इसकी रुहानी मामूरी क़ैद-ए-वक़्त से बाला-ओ-बरतर है और हर ज़माने के वास्ते रुहानी ज़िंदगी का गीत है। इसकी तस्नीफ़ और मौक़े की दर्याफ़्त की कुछ बहुत अहमियत नहीं रखती।” यह ज़बूर लफ़्ज़ “सलाह” से, जो चौथी और आठवीं आयत के आख़िर में है, तीन हिस्सों में मुनक़सिम है, जिनकी तफ़्सील दर्ज है।
(हिस्सा अव्वल) (1–4) आयात में मुसन्निफ़ ख़ुदावन्द के मस्कन की तारीफ़ करता और उनकी निस्बत अपने इश्तियाक़ का यूँ बयान करता है कि “ख़ुदावन्द, तेरे मस्कन दिलकश हैं। मेरी रूह ख़ुदावन्द की बारगाहों के लिए आरज़ूमंद, बल्कि गुदाज़ होती है। मेरा मन और मेरा तन ज़िंदा ख़ुदा के लिए ललकारता है।” मुबारक वे ही हैं जो तेरे घर में सुकूनपज़ीर हैं। मुसन्निफ़ उन चिड़ियों की, जिन्होंने ख़ुदा के मस्कन में आशियानों के लिए जगह पाई है कि अपने बच्चे वहाँ बाहिफ़ाज़त रखें, तारीफ़ करता और उनको मुबारक कहता है।
(हिस्सा दुव्वम) (5–8) आयात में मुसन्निफ़ कहता है कि मुबारक वह है जिसमें इलाही क़ुव्वत मौजूद है और जिसके दिल में तेरी राहें हैं, कि वह सब मुश्किलात पर ग़ालिब आकर ख़ुदा के हुज़ूर में रसाई पाएँ। जहाँ वे अपनी दुआएँ पेश कर सकते हैं। वे क़ुव्वत से क़ुव्वत तरक़्क़ी करते चले जाते हैं और ख़ुदा के आगे सीहोन में पहुँचत जाते हैं।
(हिस्सा सोइम) (9–12) आयात में ख़ुदा की हुज़ूरी की मुबारकहाली की तारीफ़ व तौसीफ़ करता और कहता है कि “एक दिन जो तेरी बारगाहों में गुज़रे, वह हज़ार से बेहतर है। मेरे लिए ख़ुदा के घर की दरबानी, शरारत के ख़ेमों में रहने से बेहतर है।” क्योंकि ख़ुदावन्द एक आफ़्ताब है और उन लोगों से, जो सीधी चाल चलते हैं, कोई अच्छी चीज़ दरेग़ न करेगा।
(ज़बूर 85): बनी क़ोरह का ज़बूर है। इसके मज़मून से मालूम होता है कि क़ौम-ए-इस्राईल असीरी से मुख़लिस होकर मुल्क-ए-कनआन में आ गई थी और बावजूद ख़ुदा की बेहद रहमत के, उनकी हालत में कोई नुमायां तब्दीली और तरक़्क़ी के आसार न थे। और इस हालत का सबब ख़ुद उनमें ही था। अगर यह असीरी बाबिल वाली असीरी थी तो एज्रा और नहमियाह ने उनकी इस हालत का सबब बयान फ़रमाया है और कहा है कि इस्राईल असीरी से तो लौट आए थे, लेकिन ख़ुदा की तरफ़ न लौटे थे। बहरहाल, मज़मून इस ज़बूर के दो हिस्सों में है।
(हिस्सा अव्वल) (1–7) आयात में मुसन्निफ़ बनी-इस्राईल पर ख़ुदा की रहमतों और मेहरबानियों को देखता और उनका एतराफ़ करता है और उनके वास्ते ख़ुदा की तारीफ़ करता है। और आख़िर में ख़ुदा से दुआ करता है कि “ऐ ख़ुदा, हम को फिरा और अपने क़हर को हम पर से दफ़ा कर और जला और अपनी रहमत दिखा और नजात बख़्श।” यह दुआ वह कुल इस्राईल के लिए गुज़ारनता है। ख़ुदा अपने लोगों को नजात बख़्शता है और चाहता है कि वे भी अपनी नजात में काम किए जाएं। क्योंकि बुज़दिली और पस्त-हिम्मती मूजिब बरकत नहीं है।
(हिस्सा दुव्वम) इस हिस्से में मुसन्निफ़ कहता है कि “मैं सुनूँगा कि ख़ुदा क्या फ़रमाता है।” मुसन्निफ़ को कामिल यक़ीन है कि ख़ुदा अपने बंदों और पाक लोगों को सलामती की बातें ज़रूर कहता है और चाहता है कि वे फिर जहालत की तरफ़ मुराजअत (रुजू) न करें। सलामती की राहें मौजूद हैं, अगर हम उसके सब लोग उनमें चलें, तो ख़ुदा जो कुछ बेहतर और ख़ूब है, ज़रूर देगा। क्योंकि जिस्मानी बरकात अख़लाक़ी और रुहानी कामिलियत पर मुन्हसिर हैं। आख़िर में मर्क़ूम है कि सदाक़त उसके आगे-आगे चलेगी और सादिक़ों के वास्ते एक राह बनाएगी।
(ज़बूर 86): दाऊद की नमाज़। ज़बूर की तीसरी किताब में दाऊद का यही एक ज़बूर है। जैसा कि अक्सर होता है, हस्ब-ए-ज़रूरत दूसरे ज़बूरों और पाक-नविशतों के मुक़ामात-ए-मुख़्तलिफ़ से मुन्तख़ब किया गया है। इसके तीन हिस्से हैं।
(हिस्सा अव्वल) (1–5) आयात में कई एक अर्ज़ें (दरख़्वास्तें) हैं और उनमें अस्बाब भी, जो कि उनकी मंज़ूरी को ज़रूरी और लाज़िमी ठहराते हैं, बयान हैं। मसलन, (आयत अव्वल) में अर्ज़ है कि “ऐ ख़ुदावन्द, अपना कान झुका और मेरी सुन, क्योंकि मैं परेशान और मिस्कीन हूँ।”
(हिस्सा दुव्वम) (6–10) आयात में वह ख़ुदा की सिफ़ात में अपनी दुआओं और अर्ज़ों की क़बूलियत का सबूत और इम्कान पाता है। मसलन, सातवीं आयत में वह कहता है कि “अपनी बिपता (मुसीबत) के रोज़ तुझे पुकारूँगा, तो तू मेरी सुनेगा।” ग़रज़ कि वह ख़ुदा में हमदर्दी और तरसी की सिफ़ात देखता है और उनको मुनाजातों की क़बूलियत का काफ़ी बहाना पाता है।
(हिस्सा सोइम) (11–17) आयात में वह ख़ुदा की शफ़क़त और रहमत पर तकिया करके अर्ज़ करता है कि उस को ऐसी बरकत अता करे कि उसके दुश्मन मालूम करें कि वह ज़रूर ख़ुदा की हिफ़ाज़त में है। चुनान्चे (17 आयत) में मज़्कूर है कि “मुझे भलाई का कोई निशान दिखला, ताकि जो मुझसे कीना रखते हैं, वे देखें और शर्मिंदा हों, क्योंकि तूने ऐ ख़ुदावन्द मेरी मदद की और मुझको तसल्ली दी।”
(ज़बूर 87):बनी क़ोरह का ज़बूर। यह ज़बूर सब ज़बूरों से निराला है और अजीब मालूम होता है। इस वास्ते कि इसमें दिखलाया गया है कि इस्राईल के जानी दुश्मन मिस्र और बाबिल ख़ुदा की बादशाहत में दाख़िल होंगे। बनी-इस्राईल को बताकीद हुक्म हुआ था कि वे दीगर अक़्वाम यानी ग़ैर-लोगों से अलग रहें और उनके साथ बिल्कुल मेल-जोल न करें। जैसा कि मसीह कलीसिया को हुक्म हुआ है कि “निकल आओ, जुदा रहो और नापाक को न छुओ” (2 कुरिन्थियों 6:17)। इस ज़बूर से साफ़-साफ़ ज़ाहिर है कि किसी न किसी रोज़ सब अक़्वाम इस्राईल में शामिल होंगी। सिर्फ़ ज़ाहिरी तौर पर नहीं बल्कि इसमें पैदा होंगी, यानी नई पैदाइश के ज़रिये इसमें शामिल व शरीक होंगी और इस्तिहक़ाक़ (कानूनी हक़) व बरकत में मुसावी (बराबर) हुक़ूक़ रखेंगी। नीज़ यह कि यरूशलेम गोया तमाम लोगों की माँ है। (ग़लतियों 4:26) में यूँ लिखा है कि “ऊपर का यरूशलेम आज़ाद है और वही हम सबकी माँ है।” ख़याल किया जाता है कि यह ज़बूर हिज़क़ियाह के अय्याम में तस्नीफ़ हुआ, क्योंकि यसायाह नबी की कई एक पेशगोइयाँ इसके मज़मून से और उनका तर्ज़-ए-बयान इसकी इबारत से मुताबिक़त रखता है। मसलन (यसायाह 20:20–22) में मिस्र की निस्बत पेशगोई है। इस ज़बूर में मिस्र को ‘राहिब’ कहा गया है। “याद करो, तुम पहले ग़ैर-क़ौम वाले थे, ऐसे कि वे जो तुमको मख़्तून कहते हैं, यानी जिनका जिस्मानी खतना हाथ से हुआ है, तुमको न-मख़्तून कहते थे। और यह भी कि तुम उस वक़्त मसीह से जुदा, इस्राईल की जम्हूरी सल्तनत से अलग, वादे के अहदों से बाहर, नाउम्मीद और दुनिया में ख़ुदा से जुदा थे। सो अब तुम बेगाने और मुसाफ़िर नहीं, बल्कि मुक़द्दसों के साथ और ख़ुदा के घराने के हो, और रसूलों और नबियों की नींव पर (खड़े हो), जहां येसू मसीह ख़ुद कोने के सिरे का पत्थर है। वादे की तरह उठाए गए हो।” इस ज़बूर में ततिम्मा के अलावा दो ख़ास हिस्से हैं।
(हिस्सा अव्वल) (1–3) आयात में ज़िक्र है कि यरूशलेम यानी सीहोन ख़ुदा का शहर है। उसने उसकी बुनियाद मुक़द्दस पहाड़ पर डाली है और जलाल वाले वादों का वारिस है। जैसे कि तीसरी आयत में मज़्कूर है कि “ऐ ख़ुदा के शहर, तेरे बाबत जलाल वाली बातें कही गई हैं।”
(हिस्सा दुव्वम) (4–6) आयात में ख़ुदा इस बात का इश्तिहार देता है कि “मैं मिस्र यानी राहिब और बाबिल को, जो यहूदियों के पुराने दुश्मन थे, मज़्कूर करूँगा कि वे मेरे पहचानने वालों में शामिल हैं। देख, फ़लस्ती, सूर और कूश समेत वहाँ पैदा हुए।” और सीहोन की बाबत कहा जाएगा कि “फ़लाँ फ़लाँ इसमें पैदा हुआ।” और हक़ त’आला आप उसको क़ियाम बख़्शेगा। और ख़ुदावन्द क़ौमों का नाम लिखेगा, तो गिनकर कहेगा कि “यह शख़्स वहाँ पैदा था।”
ततिम्मा (आख़िरी बक़िया) सातवीं आयत में मज़्कूर है कि “गाने वाले भी होंगे: मेरे सब चश्मे तुझमें मौजूद हैं।” यह इंज़ीली ज़बूर है।
(ज़बूर 88): सरदार मुग़न्नी के लिए क़ोरह का ज़बूर या एक गीत, जो कि महलत पर गाया जाए।
हीमान अज़राही का मशकील।
चूँकि इस ज़बूर में उम्मीद का नाम तक नहीं, यह सब ज़बूरों से ज़्यादा ग़म-आलूदा और अंदोहनाक (रंज से भरा हुआ) समझा गया है। कुछ मुफस्सिरीन ख़याल करते हैं कि यह ज़बूर उस वक़्त लिखा गया जब इस्राईल असीरी (गुलामी) में थे। और बा’ज़ गुमान रखते हैं कि इसमें मुसन्निफ़ ख़ुद को अय्यूब की सी हालत में तसव्वुर करके अपनी मायूसी को अय्यूब ही के अल्फ़ाज़ में बयान करता है। यह ज़बूर उस शख़्स का मर्सिया (रोना) है, जिसके मुतअल्लिक़ रुहानी तनवीर नहीं है। और वह अपनी गुनाह-आलूदगी से नावाक़िफ़ होकर ख़ुदा की रसाई की कोशिश करता है। इस ज़बूर की तफ़्सील इस तरह है।
(1) (1–8) आयात में मुसन्निफ़ अपनी अबतर हालत ख़ुदा के सामने इस मक़सद से पेश करता है कि ख़ुदा उस पर तरस खाए। और वह कहता है कि “मैंने दिन-रात ख़ुदावन्द के आगे फ़रियाद की, लेकिन बजाय मदद और रहमत के, उसने मुझे अस्फ़ल (निहायत नीचे) में, अंधेरे मकानों और गहराइयों में डाला। और उसने मेरी जान-पहचान को मुझसे दूर किया।” इस ज़बूर से मालूम होता है कि मुसन्निफ़ अपनी अबतरी के अस्बाब ख़ुद में नहीं देखता और न देखने की कोशिश करता है, बल्कि ख़ुदा को इसका सबब गर्दानता है।
(2) (9–12) आयात में वो अपनी ज़िंदगी से बेज़ार होकर ख़ुदा से सवाल करता है कि क्या तू मर्दों के लिए अजीब काम करेगा? क्या मुर्दे उठेंगे और तेरी सताइश करेंगे? क्या गुर (क़ब्र) में तेरी रहमत और हलाकत में तेरी सच्चाई का ज़िक्र होगा? क्या तेरे अजाइबात अंधेरे में और तेरी सदाक़त फ़रामोशी की सरज़मीन में मालूम होगी।
(3) (13–18) आयात में मुसन्निफ़ कहता है कि ऐ ख़ुदा मैं तेरे आगे चिल्लाता और दुहाई देता हूँ। मेरी दुआ सुबह को तेरे हुज़ूर पहुँचेगी। और इस्तिफ़सार करता है कि क्या सबब है कि ख़ुदा ने उस को तर्क कर दिया? और क़हर से उस को ऐसा घेरा कि उस को ज़रा भी आराम नहीं और न ही कुछ तसल्ली है। बग़ैर सच्ची तौबा के मु’आफ़ी मुहाल है और मसीह जुदा और दूर रहकर नजात की ख़ुशी से महरूम रहा है।
(ज़बूर 89): ईतान अज़राही का मशकील
गुमान है कि ये ज़बूर इस सत्तर (70) साला असीरी के अय्याम में तस्नीफ़ हुआ कि जब यहूदियों का दार-उल-सल्तनत तबाह व बर्बाद हो गया। और सब के सब बमए बादशाह के असीर व मुकय्यद (क़ैदी) हो गए और जिला-वतन किए गए। इस ज़बूर में वो सब अपनी बड़ी हिक्मत से ब-चश्म-ए-ग़ौर नज़र करते हुए ख़ुदावन्द का वो वा’दा याद करते हैं जो उसने दाऊद से बाँधा था, जब वो ख़ुदावन्द के लिए एक हैकल की तामीर की कोशिश में था (2 समुएल 7:15–16)। ख़ुदा के घराने की निस्बत कहता है कि मेरी रहमत इस से हरगिज़ जुदा न होगी। बल्कि तेरा घर और तेरी सल्तनत हमेशा सामने मौजूद और क़ायम रहेंगे। तेरा तख़्त हमेशा साबित रहेगा। वा’दा तो ये था लेकिन हालत दिगरगूँ (उलट) थी। कि बादशाह बमूजब सारी रियाया असीर (क़ैदी) था। यरूशलेम बमय बादशाह के तख़्त और हैकल के तह-ओ-बाला किया गया। क्या ख़ुदा क़ादिर और वफ़ादार नहीं? फिर ये हालत-ए-ज़ार क्योंकर है।
मुसन्निफ़ इस ज़बूर में ख़ुदावन्द की तारीफ़ करता और कामिल भरोसा रखता है और कहता है कि ख़ुदावन्द क़ाबिल-ए-एतबार है। और इसके सबूत ज़ैल के दलाईल पेश करता है।
(1) (1–4) आयात में वो ख़ुदावन्द का वा’दा दोहराता है कि अपने बरगुज़ीदा से एक अहद किया है। “मैं ने अपने मुँह से दाऊद से क़सम खाई है कि मैं तेरी नस्ल को अबद तक क़ायम रखूँगा और तेरे तख़्त को पुश्त दर पुश्त क़ियाम बख़्शूँगा।”
(2) (5–7) आयात में ख़ुदा की वा’दा-वफ़ाई के सबूत में वो कहता है कि आसमान ख़ुदावन्द के अज़ीम कामों की सताइश करें। और मुक़द्दस लोगों की जमाअत उसकी वफ़ादारी की। वो आसमान पर नबी-अल्लाह में बेनज़ीर (बेमिस्ल) है और क़ुद्दूसों की मजलिस में निहायत मुहीब है।
(3) (8–18) आयात में दिखाया गया है कि ख़ुदावन्द दुनिया का मुंतज़िम है। और अपनी क़ुदरत और हुस्न-ए-इंतिज़ाम से दुनिया को क़ायम रखता है। लोग इस सबब से ख़ुशी मनाते हैं कि अदालत और सदाक़त उसके तख़्त की बुनियाद है। और रहमत और सच्चाई उसके आगे-आगे चलते हैं। सो ख़ुदावन्द क़ाबिल-ए-भरोसा है और उसकी वफ़ादारी में कोई कलाम नहीं।
(4) (15–18) आयात में मुसन्निफ़ कहता है कि वह मुबारक है जो इबादत की क़रनाई आवाज़ का शनासाँ (पहचानने वाला) है, कि वह ख़ुदावन्द के चेहरे के नूर में ख़िरामाँ होगा।
(5) (19–37) आयात में ख़ुदावन्द कहता है कि मैंने दाऊद से अहद किया। सो मैं इसमें वफ़ादार रहूँगा और इस अहद पर कारबन्द रहूँगा। लेकिन अगर उसके फ़र्ज़न्द मेरी शरीअत को तर्क कर देंगे और मेरे अहकाम पर न चलेंगे, तो मैं छड़ी से उनके गुनाहों की और कोड़ों से उनको उनकी बदी की सज़ा दूँगा। मैं अपने अहद को न तोड़ूँगा और इस सुख़न (कलाम, बात) को जो मेरे मुँह से निकल गया, उस को न बदलूँगा। उसकी नस्ल ता अबद क़ायम रहेगी और उसका तख़्त मेरे आगे सूरज की मानिंद होगा। वह चाँद की मानिंद आसमान पर सच्चे गवाह की मानिंद अबद तक क़ायम रहेगा।
(6) (38–45) आयात में मुसन्निफ़ ख़ुदा से फ़रियाद करके उसको जताता है कि उसने उस अहद को, जो उसने अपने बंदे दाऊद से किया था, बातिल किया और कहता है कि तूने उसके ताज को ज़मीन पर फेंक कर उसे नापाक किया है।
(7) (42–51) आयात में वह ख़ुदावन्द से मिन्नत करता है कि वह उन पर रहम करे। पेश्तर इस से कि वह इस दुनिया से मादूम (नापैद, ख़त्म) हो जाएँ। और कहता है कि तू अगर उनको न बचाए तो तेरी पहली मुदारात और मेहरबानियाँ किस हिसाब व शुमार में होंगी। अल-ग़र्ज़ इस ज़बूर का मक़्सद ये ज़ाहिर करता है कि ख़ुदा की कार्रवाई उसके वा’दों के बमूजब पहलू-ब-पहलू है। ख़ुदावन्द की मेहरबानी और उसकी वफ़ादारी इस ज़बूर की ख़ूबी है। और ये अल्फ़ाज़ और मुनाजात बारहा इस ज़बूर में आए हैं। मुहब्बत ने ख़ुदावन्द को मजबूर किया है कि वह दाऊद के घराने से अहद बाँधे और वफ़ादारी उसको वा’दा-वफ़ाई पर मजबूर करती है। इस ज़बूर में मसीह की निस्बत कोई वा’दा नहीं, तो भी ये बातें उसकी आमद पर दलालत करती हैं। इस जगह ज़बूर की तीसरी किताब तम्जीद, तस्लीस और दुहराई आइनों से ख़त्म होती है।
किताब चहारुम (ज़बूर 90–106)
सवाल 17: ज़बूर की चौथी किताब की कैफ़ियत बयान करें।
जवाब: इस किताब में सत्रह (17) या’नी (90–106) ज़बूर हैं। पहला या’नी (ज़बूर 90) मूसा का है। सब ज़बूरों से क़दीमी है। (14) ज़बूर गुमनाम (महरूम-उल-मुसन्निफ़) हैं। (2) ज़बूर या’नी (101, 103) ज़बूर दाऊद के हैं। इस किताब के अक्सर ज़बूर यहोसाफ़ात और हिज़कियाह बादशाहों के ज़माने की तस्नीफ़ात हैं। और मा’लूम होता है कि ये किताब असीरी (गुलामी) के बाद तालीफ़ हुई क्योंकि (ज़बूर 102) असीरी के अय्याम का है। और ग़ालिबन एज़्रा की तस्नीफ़ है।
सवाल 18: चौथी किताब के ज़बूरों की तफ़्सील करें
जवाब: (ज़बूर 90) सब ज़बूरों से क़दीम और मज़्मून के लिहाज़ से सबसे आ’ला और क़ाबिल। मुसन्निफ़ की बुलंद परदाज़ी (ख़ुद-सताई, आ’ला ख़याली) का नतीजा है। इस में ख़ुदा की बे-पायानी और अज़लियत और इन्सान के ज़ईफ़-उल-बयान (जिसकी बुनियाद कमज़ोर हो) की बे-सबाती दिखाई गई है। इस के सरनामे से ज़ाहिर है कि ये ज़बूर मूसा की नमाज़ है। जो कि उमूमन मसीही मुर्दों के दफ़न के मौक़े पर पढ़ी जाती है। और इन्सानी ज़िंदगी की बे-सबाती दिखाई जाती है। ये ज़बूर दो हिस्सों में मुनक़सिम है।
(हिस्सा अव़्वल) (1–12) आयात में ख़ुदा की ला-फ़ानी के सबूत और इन्सान का फ़ानी होना पेश है।
(हिस्सा दुव्वम) (13–17) आयत में इन्सान की बे-सबाती की वजह बयान की है।
हिस्सा अव़्वल की (1–6) आयात में ख़ुदा की अज़लियत और बे-पायानी (बेहद) की निस्बत ये आया है कि पेश्तर इस के पहाड़ पैदा हुए। और ज़मीन और दुनिया को तूने बनाया। अज़ल से अबद तक तू ही ख़ुदा है। इन्सान की बे-सबाती की निस्बत ज़िक्र है कि तू उन्हें यूं ले जाता है कि जैसे सेलाब। वो गोया नींद हैं। वो फ़ज्र की उस घास की मानिंद हैं जो उगती है और सुबह को तर-ओ-ताज़ा होती और लहलहाती है। और शाम को जब कि वो काटी जाती है, बिल्कुल सूख जाती है।
आयात (7–12) में इंसान की बे-सबाती का सबब ये बताया गया है कि वह अपने गुनाह ही से ख़ुदावन्द का क़हर अपने ऊपर लाया। और उसकी गुनहगारी की वजह से उसकी ज़िंदगी के बरस सत्तर (70) बरस ठहराए गए। जो कि अगर क़ुव्वत हो तो अस्सी (80) तक पहुँच सकते हैं। लेकिन ये सब दिन सरासर तवानाई, मेहनत और मशक्क़त हैं। क्योंकि हम जल्द जाते रहते हैं और उड़ जाते हैं। (12) आयत में अर्ज़ है कि “ऐ ख़ुदा हमें अपनी उम्र के दिन गिनना सिखा ताकि हम दाना-दिल हासिल करें।”
(हिस्सा दुव्वम) इस हिस्से में मुसन्निफ़ अर्ज़ करता है कि “ऐ ख़ुदा अपने बंदों की तरफ़ फिर मुतवज्जह हो। और हमको सवेरे अपनी रहमत से सैर कर, ताकि हम अपनी उम्र-भर ख़ुशनूद और ख़ुशवक़्त रहें। और हमारे हाथों का काम हम पर फिर क़ायम हो। हाँ, तू हमारे हाथों के काम को फिर क़ायम कर।” इस से ये मुराद है कि चाहिए कि जब तक दिन है, हम ख़ुदावन्द के काम में मशग़ूल व मसरूफ़ रहें। क्योंकि रात आनी है जिसमें कोई काम नहीं कर सकते। हाँ, हमारे काम के क़ायम होने पर हमारी रूहानी ज़िंदगी की ख़ुशवक़्ती और ख़ुशहाली मौक़ूफ़ व मुन्हसिर है।
(ज़बूर 91): ज़बूरों की इब्रानी किताब में गुमनाम है, लेकिन सेप्टुआजिन्ट या’नी तर्जुमा हफ़्तादी में दाऊद से मंसूब है। ये ज़बूर उस शख़्स की हालत को पेश करता है जो कि ख़ुदा त’आला के पर्दे तले रहता है। और ज़ाहिर करता है कि ऐसे शख़्स की सब बरकात उसकी इस हालत से पैदा होती हैं और उसी पर इन्हिसार रखती हैं। ये ज़बूर ख़ुदावन्द येसू मसीह पर भी दलालत रखता है। शैतान ने इस ज़बूर के बारे में इक़्तिबास किया कि जब उसने मसीह को हैकल के कंगूरे पर खड़ा किया और कहा कि “अगर तू ख़ुदा का बेटा है तो अपने तईं यहाँ से गिरा दे, क्योंकि लिखा है कि वह तेरे वास्ते फ़रिश्तों को फ़रमाएगा कि वे तेरी ख़बरदारी करें और तुझको अपने हाथों पर उठा लें, कि मुबादा तेरे पाँव को पत्थर से ठेस लगे।” (लूका 4:9–11)
इस ज़बूर की तक़्सीम नहीं की गई। इसके बारे मुतर्ज़िम डेलश का ख़याल है कि इसमें तीन मुतकल्लिमीन हैं। और गाने के वास्ते इसको ऐसी तर्तीब दी है कि वे तीनों इसको हिस्सा-बह-हिस्सा इबादत के वक़्त हैकल में गाएं। इस तरह कि पहला मुतकल्लिम पहली आयत और दूसरा मुतकल्लिम दूसरी आयत इसके जवाब में गाता है। फिर दूसरी बार मुतकल्लिम अव्वल (3–8) आयत गाता है और दूसरा (9) नौवीं आयत का पहला मिसरा गाता है। फिर तीसरी बार मुतकल्लिम अव्वल (9) नौवीं आयत के बक़ीया से शुरू करके (13) तेरहवीं के आख़िर तक गाता है। और तीसरा मुतकल्लिम (14–16) आयतें गाता है।
मुतर्ज़िम के अक्सर तराजुम मुतफ़र्रिक़ हैं। मसलन आयत अव्वल और दुव्वम का तर्जुमा इस तरह है कि “वह जो ख़ुदा त’आला के पर्दे तले सुकूनत करता है और क़ादिर-ए-मुतलक़ के साए में रहता है, वह यहोवा के बारे में ये कहता है कि वह मेरी पनाह और मेरा गढ़ है, मेरा ख़ुदा जिस पर मेरा तवक्कुल है।” और बक़ीया आयात में यहोवा की हिफ़ाज़त की तफ़्सील है कि तुझे सय्याद के पंजे और मोहलिक वबा से बचाएगा।
आयात (10–11) में मर्क़ूम है कि “कोई वबा तुझ पर न आएगी और कोई आफ़त तेरे खे़मे के पास न पहुँचेगी। वह तेरे लिए अपने फ़रिश्तों को हुक्म करेगा कि वे तेरी सब राहों में तेरी निगहबानी करें। ऐसा कि वे तुझे अपने हाथों पर उठा लेंगे, ऐसा न हो कि तेरे पाँव को पत्थर से ठेस लगे।” मसीह के सब लोग उसके साथ मीरास में शरीक व शामिल हैं। वह उनको महफ़ूज़ रखता है।
(ज़बूर 92): सब्त के दिन का एक ज़बूर या गीत। तल्मूद से मालूम होता है कि यह ज़बूर सब्त की सुबह हैकल में इबादत के वक़्त गाया जाता था। जब कि पहला बर्रा गुज़ारने (क़ुर्बानी) के वक़्त हैकल में उस पर मै उंडेली जाती थी। इस ज़बूर से लेकर (ज़बूर 99) तक हैकल की इबादत में शामिल हैं जो कि बरोज़ सब्त इस्तिमाल होते थे। इसकी तफ़्सील यूं है कि:
(हिस्सा अव्वल) पहली पाँच आयात में ख़ुदावन्द के अज़ीम कामों के सबब उसकी सताइश की गई है और मुसन्निफ़ इस से ख़ुश-वक़्त है।
(हिस्सा दुव्वम) आयात (6–9) में मुसन्निफ़ शरीरों (बेदीनों) और बद-किरदारों की हालत पर रोशनी डालता है और कहता है कि वे सब फ़ना होंगे।
(हिस्सा सोइम) आयात (10–15) में सादिक़ों की ख़ुश-वक़्ती और ख़ुशहाली का बयान है कि वे खजूर के दरख़्तों की मानिंद लहलहाएँगे और लुबनान के देवदारों की तरह बढ़ेंगे। और वे जो ख़ुदावन्द के घर में लगाए गए हैं, हमारे ख़ुदावन्द की दरगाहों में फूलेंगे। वे बुढ़ापे में भी मेवा देंगे और शादाब व तरोताज़ा होंगे। और ज़ाहिर करेंगे कि ख़ुदावन्द सीधा है। उसमें नारास्ती नहीं, वही मेरी चट्टान है।
(ज़बूर 93): यह भी ज़बूर (99) की तरह यहूदियों के सिलसिला-ए-नमाज़ में शामिल था और हफ़्ते के छठे रोज़ इस्तिमाल होता था। इसमें यहोवा बादशाह की तारीफ़ की गई है। चुनान्चे आयत अव्वल में आया है कि “यहोवा बादशाहत करता है। उसने ख़ुद को शौकत की ख़िलअत से मुलब्बस किया है और अपनी कमर क़ुव्वत से कस ली है। इस सबब से जहाँ क़ायम रहता है।” इस से ज़ाहिर है कि यहोवा अज़ल ही से बादशाह है और अबद तक बादशाह रहेगा। उसने जहान को क़ायम रखा है और वह टलता नहीं। हिस्सा दुव्वम में लिखा है कि “तेरा तख़्त क़दीम से मुस्तहकम है, और तू अज़ल से है।”
आयात (3–4) में लिखा है कि यहोवा नदियों के जोश व ख़रोश और समुद्र के तलातुम से भी क़वी-तर है। (5) आयत में ये आया है कि तेरी शहादतें यक़ीनी हैं। ऐ ख़ुदावन्द, क़ुद्दूसी तेरे घर को ज़ेब है।
(ज़बूर 94): हफ़्तादी तर्जुमे में ये ज़बूर दाऊद से मंसूब है और ये भी बताया गया है कि इसका इस्तिमाल हफ़्ते के रोज़ पर होता था। इस ज़बूर का मक़सद यहोवा की हुकूमत की सदाक़त दिखाना है। चुनान्चे इसकी तम्हीद पहली दो आयात में मुसन्निफ़ यहोवा की तरफ़ मुख़ातिब हो कर कहता है कि “ऐ यहोवा के इंतिक़ामों के ख़ुदा, जलवा-गर हो। ऐ जहान के मुंसिफ़, ख़ुद को बुलंद कर और मुतकब्बिरों को बदला दे।”
आयात (3–7) में मुसन्निफ़ अपनी मज़कूर-उल-सदर अर्ज़ के अस्बाब बयान करता है कि शरीर शादियाना बजाते और डकारते हैं और गुस्ताख़ी बातें बोलते हैं और सब बद-किरदार लाफ़-ज़नी करते हैं। वे ख़ुदावन्द के लोगों को पेश डालते और तेरी मीरास को दुख पहुँचाते हैं। वे बेवा और पड़ोसी को जान से मारते और यतीम को क़त्ल करते हैं और कहते हैं कि ख़ुदावन्द न देखेगा और ख़ुदा ख़याल नहीं करेगा।
आयात (8–11) में वह कहता है कि उनके ऐसे कामों का मक़सद ख़ुदावन्द की तहक़ीर व तकफ़ीर है कि समझ बैठे हैं कि वह इंसान से नावाक़िफ़ है और उसको जानता, समझता और पहचानता नहीं है।
आयात (12–15) में वह उन लोगों की, जो ख़ुदावन्द से ता’लीम पाए हुए हैं, मुबारक-हाली और फ़ारिग़ुलबाल (ख़ुश-हाल) का बयान करता है कि अदालत ज़रूर सदाक़त की तरफ़ फेरेगी और वे जो सब रास्त-दिल हैं, ख़ुदावन्द के पीछे हो लेंगे।
आयात (16–19) में मुसन्निफ़ कहता है कि मैं अपने तजुर्बे से ख़ुदावन्द को सादिक़ पाता हूँ।
आयात (20–30) में (23) आयत में मुसन्निफ़ यक़ीन-ए-कामिल रखता है कि ख़ुदा ज़रूर शरीरों (बेदीनों) की बदकारी उन पर डालेगा और उन्हीं की बुराई में उनको फ़ना करेगा। हाँ, ख़ुदावन्द हमारा ख़ुदा उनको फ़ना करेगा।
(ज़बूर 95): ये भी हैकल की इबादत के सिलसिले में शामिल है। ख़याल किया जाता है कि ये ज़बूर किसी ख़ास ईद के वास्ते हुआ था। हफ़्ता-दी तर्जुमे में ये ज़बूर दाऊद का ज़बूर कहा गया है। पौलूस अपने इब्रानियों के नाम ख़त के तीसरे बाब में, जहाँ वह ख़ास दिन के ठहराए जाने का ज़िक्र करता है, इस ज़बूर की सातवीं और आठवीं आयत से इक्तिबास लेकर कहता है कि ख़ुदा इतनी मुद्दत के बाद दाऊद की मारिफ़त फ़रमाता है कि “अगर आज के दिन तुम उसकी आवाज़ सुनो तो अपने दिलों को सख़्त न करो।” सो ये ज़बूर अगर दाऊद का है तो हो सकता है कि इसके सिलसिले के सब ज़बूर बग़ैर शक व शुब्हा दाऊद ही की तस्नीफ़ात हों। ये ज़बूर दावत का कहलाता है और इसमें दो हिस्से हैं।
(हिस्सा अव्वल) आयात (1–7) में एक ख़ुशी की दावत मिलती है कि “आओ हम ख़ुदावन्द की मदह-सराई करें। अपनी नजात की चट्टान को ख़ुश हो कर ललकारें वग़ैरह।” क्योंकि ख़ुदावन्द बड़ा और क़ादिर ख़ुदा है। वह बड़ा बादशाह है और सब मा’बूदों पर मुक़द्दम है। आओ हम सज्दा करें और झुकें और अपने ख़ुदावन्द के हुज़ूर ज़ानूए अज्ज़-ओ-नियाज़ (सज्दा-रेज़) हों। वह हमारा ख़ुदा है और हम उसकी चरागाह की भेड़ें हैं।
(हिस्सा दुव्वम) आयात (9–11) में एक मोअस्सर नसीहत के बाद ताकीद है कि “अगर आज के दिन तुम उसकी आवाज़ सुनो तो अपने दिलों को सख़्त मत करो, जिस तरह तुम्हारे बाप-दादा ने आज़माइश के वक़्त मरीबा में किया।” जिनकी निस्बत मैंने ग़ुस्से में क़सम खाई कि “वो मेरी आरामगाह में दाख़िल न होंगे।” (इब्रानियों 4:1) में पौलूस उस ज़माने के इब्रानी लोगों को ताकीदन कहता है कि जब कि उसके आराम में दाख़िल होने का वा’दा बाक़ी है तो चाहिए कि हम डरें, ता ऐसा न हो कि हम में से कोई पीछे रह जाए।
(ज़बूर 96): इस ज़बूर की तहरीर अव्वल (1 तवारीख़ 16 बाब) में पाई जाती है और वह उस मौक़े की तहरीर है कि जब दाऊद अहद का संदूक़ ओबैद अदूम के घर से निकाल कर यरूशलेम में ले आया। सो हम इसको दाऊद का ज़बूर कहेंगे। कुछ मुफस्सिरीन का यह ख़याल है कि यह ज़बूर असीरी के बाद तस्नीफ़ हुआ। इसके चार हिस्से हैं।
(हिस्सा अव्वल) आयत (1–3) में बताया गया है कि यहोवा की तारीफ़ कुल आलम पर हर जगह और हर वक़्त होनी चाहिए और इसकी बशारत भी ज़रूरी ठहराई गई है। तीसरी आयत में मज़कूर है कि “उम्मतों के दरमियान उसका जलाल और सारी क़ौमों के दरमियान उसकी अजीब क़ुदरतें बयान करो।”
(हिस्सा दुव्वम) आयात (4–6) में बयान है कि सिर्फ़ यहोवा ही तारीफ़ व सताइश के लायक़ है। क्योंकि उम्मतों के सब मा’बूद हीच हैं, मगर आसमानों को बनाने वाला ख़ुदावन्द है। अज़मत और हश्मत उसके आगे हैं और तवानाई और जमाल उसके मुक़द्दस मकान में।
(हिस्सा सोइम) आयात (7–9) में मुसन्निफ़ लोगों को ताकीद करता है कि ख़ुदावन्द को जानो। और कहता है कि “ऐ लोगों के घरानों, ख़ुदावन्द की हश्मत और क़ुव्वत को जानो। और उसके नाम के लायक़ उसकी बुज़ुर्गी करो। हदिया लाओ और उसकी बारगाहों में आओ और हुस्न-ए-तक़द्दुस के सज्दा करो।”
(हिस्सा चहारुम) आयात (10–13) में मुसन्निफ़ चाहता है कि “क़ौमों के दरमियान मुनादी की जाए कि यहोवा सल्तनत करता है। और उस से जहान क़ायम है और जुंबिश नहीं खाता। और कि आसमान और ज़मीन पर की सब मौजूदात ख़ुशी करें और शादियाना बजाएँ और समुद्र और उसकी मामूरी भी शोर-गुल करे।”
(ज़बूर 97): इस ज़बूर का मज़मून ये है कि यहोवा सदाक़त के साथ आलमगीर बादशाह है। मुसन्निफ़ इसमें अपनी आरज़ू ज़ाहिर करता है कि चूँकि यहोवा अपनी बादशाहत में आया हुआ है, लोग ख़ुशी से मुनादी करें कि यहोवा बादशाह है। इस ज़बूर में चार हिस्से हैं।
(हिस्सा अव्वल) (1–3) आयात में मर्क़ूम है कि ख़ुदावन्द सल्तनत करता है कि ज़मीन ख़ुशी करे, छोटे-बड़े जज़ाइर शाद हों वग़ैरह।
(हिस्सा दुव्वम) आयात (4–6) में इसकी हुकूमत के नताइज बयान हैं। चुनान्चे लिखा है कि “आसमान उसकी सदाक़त की मुनादी करते हैं और सब उम्मतें उसका जलाल देखती हैं।”
(हिस्सा सोइम) (7–9) में कहा गया है कि वो सब जो बुत पूजते हैं और मूर्तियों पर फूलते हैं, वो शर्मिंदा हों। लिखा है कि सीहोन ने सुना और मगन हुआ और यहूदाह की बस्तियाँ यहोवा की अदालतों से ख़ुश-वक़्त हुईं क्योंकि वो सब मा’बूदों से कहीं आ’ला और बरतर है।”
(हिस्सा चहारुम) (10–12) में रास्तबाज़ों को नसीहत है कि वो बदी से इज्तिनाब करें और मुक़द्दसों की जानों की निगहबानी करें और उनको शरीरों के हाथों से छुड़ाएँ। क्योंकि नूर सादिक़ों के लिए बोया गया है और ख़ुशी उनके लिए जिनके दिल सीधे हैं। आख़िर में ताकीद है कि ख़ुदावन्द में ख़ुश रहो और उसकी कुद्दूसी को याद करके ख़ुशी करो।
(ज़बूर 98): ये ज़बूर नम्बर (96) और यसायाह नबी की किताब से मुवाफ़िक़त रखता है। कुछ गुमान रखते हैं कि ये ज़बूर यसायाह की किताब में मुंतख़ब किया गया है और इसके बर-अक्स कि यसायाह ने अपनी किताब में इस ज़बूर में से इंतिख़ाब किया हुआ है। इसका मज़मून यहोवा की फ़त्हमंदी है, जो न सिर्फ़ यहूदियों से बल्कि सब उम्मतों से निस्बत रखती है। इसके उन्वान में लफ़्ज़ सिर्फ़ “मज़मूर” ही आया है। इसके दो हिस्से हैं।
(हिस्सा अव्वल) आयात (1–3) में गाने वाले तलब हैं कि ख़ुदावन्द का उसके अजाइबात के सबब से एक नया गीत गाएँ। इन अजाइबात में ज़ेल की बातें हैं।
(अ) उसके दहने हाथ और मुक़द्दस बाज़ुओं ने उसको फ़त्ह बख़्शी है।
(ब) उसने अपनी नजात ज़ाहिर की और अपनी सदाक़त उम्मतों को खोल कर दिखाई।
(ज) उसने इस्राईल के घराने की निस्बत अपनी रहमत और अमानत को याद फ़रमाया और ज़मीन के सब किनारों ने हमारे ख़ुदावन्द की नजात देखी।
(हिस्सा दुव्वम) (4–9) आयात में ज़मीन, समुद्र और नदियाँ मद’ऊ हैं कि ख़ुदावन्द बादशाह के आगे ख़ुशियाँ मनाएँ। क्योंकि वह ज़मीन की अदालत को आता है। वह सदाक़त से दुनिया की और रास्ती से उम्मतों की अदालत करेगा।
(ज़बूर 99): ये ज़बूर शाहाना ज़बूरों के सिलसिले का आख़िरी ज़बूर है। इसमें यहोवा बादशाह की हैसियत में पेश किया गया है और उसकी बड़ी तारीफ़ की गई है। इस सिलसिले का पहला ज़बूर (93) है जिसमें ऐलान किया है कि यहोवा सल्तनत करता है कि वह शौकत की ख़िलअत (वह पोशाक जो बादशाह की तरफ़ से बतौर इज़्ज़त-अफ़ज़ाई मिले) पहने है और तख़्त क़दीम से मुस्तहकम है। (ज़बूर 94) इस सिलसिले में नहीं। (ज़बूर 95) इस बादशाह की फ़ज़ीलत और फ़ौक़ियत को इन अल्फ़ाज़ में ज़ाहिर करता है कि “यहोवा बड़ा बुज़ुर्ग ख़ुदा है और अज़ीमुश्शान बादशाह है, जो सब मा’बूदों पर मुक़द्दम है।” (ज़बूर 96) में एक फ़रमान है कि “क़ौमों के दरमियान कहो कि यहोवा सल्तनत करता है और उस से जहान क़ायम है और जुंबिश नहीं खाता। वह सदाक़त से लोगों का इन्साफ़ करेगा।” अगर यहोवा का तख़्त गिराना कहीं मुम्किन होता तो दुनिया दोज़ख़ बन जाती। (ज़बूर 97) में बयान है कि “यहोवा सल्तनत करता है, सो ख़ुशी करे और ख़ुर्द-ओ-क़लान जज़ाइर शाद हों।” (ज़बूर 98) में आया है कि “नरसिंगे और करनाई फूँकते हुए यहोवा बादशाह के आगे ख़ुशी ललकारें।”
(ज़बूर 99): में बताया गया है कि यहोवा सल्तनत करता है, उम्मतें काँपें। वह करोबीम के ऊपर तख़्तनशीन है, सो ज़मीन लरज़े। ये सब ज़बूर बताते हैं कि दुनिया में एक इलाही हुकूमत क़ायम की गई है, जिसके बग़ैर दुनिया मुस्तक़िल नहीं रह सकती। नीज़ ज़ाहिर करते हैं कि ज़मीन में इत्मीनान, सिलसिले में, कमाल ख़ुशी और ख़ुर्मी मौजूद होगी। बा’ज़ मुफस्सिरीन (ज़बूर 100) को भी इसी सिलसिले में शामिल करते हैं। इस सिलसिले में सात ज़बूर हैं जिनमें से हर एक हफ़्ते के सात दिनों में से एक दिन इस्तिमाल होता था। सिलसिले के इख़्तिताम पर बुज़ुर्ग, मुहीब और आदिल बादशाह की शुक्रगुज़ारी अदा की गई है। इसकी तफ़्सील इस तरह से है। आयत अव्वल में बताया है कि...
(1) यहोवा सल्तनत करता है, सो उम्मतें काँपती हैं।
(2) आयात (2–4) में इस ताकीद की वजूहात बयान हैं। अव्वल: उसका नाम बुज़ुर्ग और मुहीब है। दुव्वम: उसकी तवानाई अदल (इन्साफ) को चाहती है और सदाक़त को क़ायम करती है।
(3) आयात (5–9) में ताकीद है कि तुम यहोवा हमारे ख़ुदा को बुज़ुर्ग जानो और उसके पाँव की कुर्सी के पास सज्दा करो, और हमारा ख़ुदा क़ुद्दूस है।
(ज़बूर 100): यह एक शुक्रगुज़ारी का ज़बूर है। मुफस्सिरीन का फ़ैसला है कि यह ज़बूर शुक्राने में सब ज़बूरों से अव्वल और बरतर है। और चूँकि इसका सरासर एक ही मज़्मून है कि कुल ज़मीन शुक्रगुज़ारी करे, इसकी तक़्सीम नहीं की गई।
इसकी पहली दो आयात में मुसन्निफ़ की तरफ़ से कुल सर-ज़मीन मद’ऊ व मतलूब है कि यहोवा के वास्ते ख़ुशी का नारा मारें, ख़ुशी से उसकी तारीफ़ करें और गाते हुए उसके हुज़ूर में हाज़िर हों।
आयात (3–5) में मुसन्निफ़ उस निस्बत को जो हमारे और ख़ुदा के माबैन है और जिसकी वजह से उसकी शुक्रगुज़ारी हम पर लाज़िम है, बयान करता है, और वो ये है कि वह हमारा ख़ल्क़ करने वाला है, और हम उसके लोग और उसकी चरागाह की भेड़ें हैं। सो वाजिब और लाज़िम है कि उसके दरवाज़ों में शुक्र करते हुए और हम्द करते हुए उसकी बारगाहों में दाख़िल हों, उसका एहसान मानेँ और उसके नाम को मुबारक कहें। क्योंकि यहोवा भला है, और उसकी रहमत अबदी है, और उसकी वफ़ादारी पुश्त-दर-पुश्त है।
(ज़बूर 101): सरनामे में यह ज़बूर दाऊद से मन्सूब है, और ख़याल किया जाता है कि इस से पेश्तर कि अहद का संदूक़ औबेदा-दोम के घर से निकाला जाए, यह ज़बूर तस्नीफ़ हुआ। यह ज़बूर एक शाहवार (बादशाहों के लायक़, निहायत उम्दा नफ़ीस चीज़) आइना माना गया है, जो कि एक आदिल और रास्त बादशाह की सीरत और खूबियों का इन्किशाफ़ करता है। इसकी पहली आयत शाह का मीलान व रुजहान ख़ुदा की तरफ़ दिखाती है और इसमें वह कहता है कि “मैं रहमत और अदालत के गीत गाऊँगा”, और यही बातें सलातीन की आरास्तगी के लिए ज़रूरी हैं।
आयात (2–6) में वह अपनी निस्बत एक इरादे को तस्मीम (मज़बूती) देता है कि “मैं कामिल राह में दानिशमंदी से चलूँ, और अपने घर में कामिल दिल से टहलता फिरूँगा।” और यहोवा की हुज़ूरी और बारगाह-ए-आलिया के लिए अपनी ख़्वाहिश का इज़्हार करता है कि “मैं अपनी आँखों के रूबरू कोई बद-चीज़ न रखूँगा, और कज-रौ लोगों के काम से मुतनफ़्फिर और मुज्तनिब रहूँगा यहाँ तक कि उनसे हरगिज़ वास्ता या ता’ल्लुक़ न रखूँगा, और शरीर (बेदीन) से आश्नाई न करूँगा।”
आयात (5–8) में वह नदिमा और सिह्न-दीद (बुज़ुर्ग) ममलकत की निस्बत कहता है कि “मेरी आँखें मुल्क के ईमानदारों पर हैं कि वे मेरे साथ रहें, क्योंकि जो कामिल राह पर चलता है, वही मेरी ख़िदमत करेगा। लेकिन दग़ाबाज़ मेरे घर में न रहने पाएगा, और दरोग़-गो मेरी नज़र तले न ठहरेगा। मैं मुल्क से सब शरीरों को सवेरे (जल्दी) ही फ़ना कर दूँगा और ख़ुदावन्द के शहर से सब बद-किरदारों को काट डालूँगा।”
(ज़बूर 102): “एक मुसीबतज़दा की बहालत-ए-मजबूरी अपनी बदहाली ख़ुदावन्द से बयान करता है” नमाज़ है। गुमान है कि यह ज़बूर उस वक़्त तस्नीफ़ हुआ जब यहूदियों की असीरी (गुलामी) ख़त्म होने वाली थी। इसकी पहली आयत में नमाज़ी अपना शख़्सी हाल ख़ुदावन्द से बयान करता है और अर्ज़ करता है कि ख़ुदा उसकी सुने, और कहता है कि “ऐ ख़ुदा, अपना मुँह मुझसे न छिपा, मेरा दिल खेती की मानिंद मारा पड़ा है और वो सूख गया है, मैं रोटी खाना भी भूल जाता हूँ, बल्कि मैं रोटी की जगह ख़ाक फाँकता हूँ और अपने पानी में आँसू मिलाता हूँ। तेरे ग़ज़ब और क़हर के सबब से तूने मुझको बरपा किया और फिर गिरा दिया।” ग्यारहवीं आयत के आख़िरी हिस्से में और दीगर आयात से भी मालूम होता है कि फ़रियाद क़ौमी है और ये नमाज़ असीरों (गुलामों) की है।
आयात (12–22) में ख़ुदावन्द की बरक़रारी की तारीफ़ कि तू उठेगा और सीहोन पर रहमत करेगा कि इस पर रहमत करने का वक़्त है। हाँ इस पर रहमत करने का वक़्त आ चुका है, उसने अपने मुक़द्दस मस्कन पर से निगाह की। ख़ुदावन्द ख़ुदा ने आसमान पर से ज़मीन पर नज़र की कि क़ैदी का कराहना सुने। आयात (23–28) में नमाज़ी कहता है कि राह में उसने ज़ोर घटा दिया और मेरी उम्र को कोताह किया। तब मैंने कहा, “ऐ मेरे ख़ुदा, मेरी नीम-गुज़श्ता उम्र में मुझको न उठा ले, जब कि तेरे बरस पुश्त-दर-पुश्त हैं।”
इस्राईल की क़ौमी ज़िंदगी (490) साल थी। और असीरी के वक़्त से रिहाई पाने के वक़्त (490) साल और बढ़ाई गई थी, ताकि वे अपने आप को आरास्ता करें और अपनी इस्लाह करें।
आख़िर में फिर ख़ुदावन्द की तारीफ़ है कि “तूने क़दीम से ज़मीन की बुनियाद डाली। आसमान भी तेरे हाथ की सनअत हैं। वे नेस्त हो जाएँगे, फिर तू बाक़ी रहेगा। हाँ, वे सब पोशाक की मानिंद पुराने हो जाएँगे। पर तू वही है और तेरे बरसों की इंतिहा न होगी। तेरे बंदों के फ़र्ज़न्द बसे रहेंगे और उनकी नस्ल तेरे हुज़ूर क़ायम रहेगी।”
(ज़बूर 103): ये दाऊद का ज़बूर है। इसमें तीन हिस्से हैं।
(हिस्सा अव्वल) आयात (1–5) में तम्हीद है जिसमें मुसन्निफ़ ख़ुदावन्द की ख़ास रहमतों पर ग़ौर करके अपने में एहसानमंदी पैदा करता है। चुनान्चे (1–2) आयत में वह कहता है कि “मेरी जान, और सब जो मुझमें है, वह सब ख़ुदावन्द के क़ुद्दूस नाम को मुबारक कह और उसकी नेअमतों को फ़रामोश न कर।” आयात (3–5) में इन नेअमतों की तफ़्सील है।
(हिस्सा दुव्वम) आयात (6–18) में यहोवा की सदाक़त, इंसाफ़ और रहमत की तारीफ़ की गई है। मुसन्निफ़ एतराफ़ करता है कि उसने हमसे नेक सुलूक किया है, कि उसने हमारे गुनाहों के मुताबिक़ हमसे सुलूक नहीं किया और हमारी बदकारियों के मुताबिक़ हमें बदला नहीं दिया। बल्कि जिस तरह आसमान ज़मीन के ऊपर बुलंद है, ख़ुदावन्द की रहमत उन पर है जो उससे डरते हैं। और जिस तरह बाप बेटों पर तरस खाता है, उसी तरह ख़ुदावन्द उन पर जो उससे डरते हैं, तरस खाता है इस शर्त पर कि वे उसके अहद को हिफ़्ज़ करें और उसके अहकाम याद करके उन पर अमल पैरा हों।
(हिस्सा सोइम) आयात (19–22) में मुसन्निफ़ यहोवा की बादशाहत पर अपनी कमाल ख़ुशी ज़ाहिर करता है और कहता है कि “यहोवा ने आसमानों पर अपना तख़्त क़ायम किया है और उसकी बादशाहत सब पर मुसल्लत है। और सब फ़रिश्तगान और उनको जो कि ज़ोर में सबक़त ले जाते हैं और अपने लश्कर और ख़िदमत-गुज़ारों को कहता है कि उसको मुबारक कहो। और आख़िर में अपनी ख़ुद-कलामी करता हुआ ख़ुद को मश्वरा देता है कि “तू भी यहोवा को मुबारक कह।”
(ज़बूर 104): बानर साहब कहते हैं कि:
“इस ज़बूर का मक़सद ये दिखाना है कि ज़मीन की पैदाइश और उसकी सारी ताज़गी और बहाली से यहोवा का जलाल ज़ाहिर होता है।”
जान केल्विन साहब कहते हैं कि:
“ये ज़बूर यहोवा की ख़ास बरक़ात और रुहानी ज़िंदगी की तरफ़ कलीसिया का ख़याल नहीं लगाता, बल्कि यहोवा की बे-पाया दानाई, क़ुदरत और ख़ैरअंदेशी को ज़ाहिर करता है कि वह क़ुदरत की ख़ुशनुमाई से इंसान की ज़िंदगी को ख़ुशी और खुर्रमी से भरपूर करता है।” इसमें तीन ख़ास बातें हैं:
अव्वल: फ़ितरत की बहाली और यहोवा की मौजूदगी और उसकी क़ुदरत के ज़हूर की मुहताज है।
दुव्वम: यहोवा बहैसियत पैदा करने वाला हमेशा मसरूफ़ लगा रहता है। वह अपने काम में कभी सुस्ती, कोताही या इल्तिवा नहीं करता, बल्कि इंतिज़ाम में मसरूफ़ रहता है ताकि सब काम बा-रौनक रहें और उसमें जुंबिश न हो।
सोइम। पैदाइश की किताब से कैफ़ियत तख़्लीक़ अयाँ है। और इस ज़बूर में पैदाइश की निस्बत यहोवा की ख़ैरअंदेशी है। और उसके बारौनक रहने और ताज़गी पाने का ज़िक्र है, जिसके लिए सब मख़लूक़ात को हमेशा उसकी सताइश करनी लाज़िम व मल्ज़ूम है। इस ज़बूर की कोई ख़ास तक़्सीम नहीं। मुसन्निफ़ इसकी अव्वल आयत में अपनी जान को उकसाता है कि यहोवा को मुबारक कह, “वो मेरा ख़ुदा है और वो निहायत ही बुज़ुर्ग है और हश्मत और जलाल का लिबास पहने है।”
आयात (2–4) में यहोवा नूर में मल्बूस नज़र आता है, जिससे ये मुराद है कि सबसे पहले उसने रोशनी बनाई।
आयात (5–9) में वो ज़मीन और पानी को एक दूसरे से जुदा करता है।
आयात (10–18) में बयान है कि यहोवा चश्मों को जारी करके उनमें नदियाँ रवां करता है, जो पहाड़ों में बहती हैं, ताकि वो मैदान के चौपायों को पानी दें और दरख़्तों को उगाएँ कि परिंदे उन पर बसेरा करें और नग़्मा-ख्वानी से इंसान को ख़ुश और मसरूर करें। यहोवा पहाड़ों को सेराब करता है कि ज़मीन से आसूदा हों। चौपायों के लिए घास और इंसान के लिए सब्ज़ी उगाए। उसने ऊँचे पहाड़ बकरों के लिए और चट्टानों को जंगली ख़रगोशों के लिए बनाया।
आयात (19–24) में चाँद व सूरज का ज़िक्र है कि यहोवा ने मुतअद्दिद औक़ात के लिए बनाया है। यहाँ तक कि आफ़्ताब अपने ग़ुरूब की जगह जानता है। वह अंधेरा करता है तो रात हो जाती है और सब जंगली हैवान सैर करते हैं। जब कुल बनी-नू’-आदम अपने घरों में उनसे महफ़ूज़ रहते हैं। वो आफ़्ताब के तुलूअ पर जमा होते और अपनी मांदों में छिप जाते हैं, लेटे रहते हैं और इंसान से अमन और महफ़ूज़ हैं।
आयात (25–31) में समुद्र और इसमें रहनेवालों का ज़िक्र है। इसमें बेशुमार छोटे-बड़े जानवर रहते हैं। इस पर जहाज़ भी रवां हैं। समुद्र के सब जानदार यहोवा की तरफ़ अपनी नज़र उठाते हैं और उनको वक़्त पर ख़ुराक बहम पहुँचाता है। इस जगह मुसन्निफ़ यहोवा से मुख़ातिब होकर कहता है कि “तू जब मुँह फेर लेता है तो वो हैरान होते हैं और जब तू उनका दम वापस फेर लेता है तो वो मर जाते और अपनी मिट्टी में मिल जाते हैं।” ख़ुदावन्द का जलाल अबदी है और ख़ुदावन्द अपनी सनअतों से ख़ुश है।
आयात (32–35) में वो बयान करता है कि यहोवा ज़मीन पर निगाह करता है तो वो सरासर काँप जाती है, यानी मुतज़लज़ल होती है। वह पहाड़ों को छूता है और उनसे धुआँ उठता है, यानी कि आतिशफ़िशाँ पहाड़ बनाता है। आख़िर में मुसन्निफ़ कहता है कि “जब तक मैं ज़िंदा रहूँगा ख़ुदावन्द के गीत गाऊँगा।” और एक ख़्वाहिश ज़ाहिर करता है कि गुनहगार ज़मीन पर से फ़ना हों और शरीर भी बाक़ी न रहें। इसके बाद मुसन्निफ़ अपनी जान से यूँ सुख़न-तराज़ी करता है कि “ऐ मेरी जान, ख़ुदावन्द को मुबारक कह और उसकी सताइश कर।” हालेलूयाह! ये लफ़्ज़ इस ज़बूर में पहली दफ़ा शामिल है और (ज़बूर 105) के इख़्तिताम पर भी आया है।
(ज़बूर 105): इसका मज़मून (ज़बूर 78, 106) की तरह है। बनी-इस्राईल की क़ौमियत के शुरू में यहोवा के अजीब कामों का ज़िक्र है। लेकिन इसका मक़सद उनके मक़ासिद से मुख़्तलिफ़ और मुतफ़र्रिक़ है। ज़बूर एक तालीमी मक़सद रखता है। (ज़बूर 106) इस्राईल के तौबा-आमेज़ इक़रार का बयान करता है। लेकिन (ज़बूर 105) की (1–15), (1 तवारीख़ 16:8–22) का इंतिख़ाब वो बातें हैं जो दाऊद ने आसफ़ को उस वक़्त कहीं जब अहद का संदूक़ यरूशलेम में पहुँचाया गया। चुनान्चे ये सबसे अव्वल ज़बूर है जो यहोवा की शुक्रगुज़ारी से होता है और ज़ाहिर करता है कि यहोवा का शाही फ़ज़्ल सब पर है जिसको वो चाहता है बरगुज़ीदा करता है और जिसे चाहता है छोड़ देता और रद्द कर देता है। ये दोनों काम उसके फ़ज़्ल का ज़हूर हैं।
तवारीखी ज़बूर में यहोवा अपनी मुहब्बत और फ़ज़्ल बनी-इस्राईल के सब वाक़िआत में ज़ाहिर करता है। इस ज़बूर के छह हिस्से हैं।
(हिस्सा अव्वल) (1–2) आयात में तम्हीद है और इसमें मुसन्निफ़ इब्राहीम की नस्ल और याक़ूब को ताकीद करता है कि यहोवा का शुक्र करें और लोगों के दरमियान उसका ज़िक्र करें। उसकी कारगुज़ारी का बयान करें और उसके मुक़द्दस नाम पर फ़ख़्र करें।
(हिस्सा दुव्वम) (7–11) आयात में ज़ाहिर किया गया है कि यहोवा ने अब तक अपने अहद को, यानी उस सुख़न (कलाम, बात) को जो उसने हज़ार पुश्तों के लिए फ़रमाया है, याद रखा। और उसने याक़ूब के लिए एक शरीअत और इस्राईल के लिए एक अबदी अहद ठहराया और वादा किया कि मैं मुल्क-ए-कनआन की सरज़मीन तुझको देता हूँ। ये तेरा मौरूसी हिस्सा है।
(हिस्सा सोइम) (12–15) आयात में दिखाया गया है कि यहोवा ने बनी-इस्राईल पर, इस से पेश्तर कि वो क़ौम बने, जब वो निहायत ही कमज़ोर, छोटा और कमसिन था, फ़ज़्ल किया और उसको सँभाला और उसके साथ मुल्क-ए-कनआन का वादा फ़रमाया।
(हिस्सा चहारुम) (16–24) आयात में मुसन्निफ़ यूसुफ़ का हाल बयान करके दिखाता है कि यहोवा ने उस पर किस क़दर फ़ज़्ल किया।
(हिस्सा पंजुम) (25–36) आयात में बनी-इस्राईल की ग़ुलामी और उनके साथ यहोवा के अजीब काम और उसका फ़ज़्ल व करम दिखाया गया है।
(हिस्सा शशुम) (37–45) आयात में मुसन्निफ़ बनी-इस्राईल की रिहाई की तारीफ़ करता और कहता है कि वो ख़ुद को ख़ुशी के साथ और अपने बरगुज़ीदों को शादियानों के साथ निकाल लाया और उन्हें क़ौमों की ज़मीन दी, ताकि वो उसके हुक़ूक़ को हिफ़्ज़ करें और उसकी शर्तों को याद रखें। इसके इख़्तिताम पर लफ़्ज़ हालेलूयाह है।
(ज़बूर 106): ये ज़बूर हालेलूयाह ज़बूरों के सिलसिले का अव्वल ज़बूर है। इस सिलसिले में कुल ग्यारह (11), यानी ज़बूर (106, 111, 112, 113, 117, 135, 146, 147, 148, 149, 150) ज़बूर हैं।
इसमें भी इस्राईल की तारीख़ मिलती है और उनकी गर्दनकशी, गुनाह आलूदगी, नाशुक्रगुज़ारी, तम्बीह और सरज़निश और आख़िरकार उनकी असीरी (गुलामी) का ज़िक्र बड़ी ख़ुसूसियत से मिलता है। और इसके साथ उनकी तौबा-ताइब भी है। वो इक़रार करते हैं कि उनके गुनाहों ही की वजह से वे इस अबतर हालत में पहुँचे।
इस ज़बूर का मक़सद ये दिखाना है कि यहोवा की अजीब बर्दाश्त उसके जलाल का बाइस है। चुनान्चे आयत अव्वल, जो कि तमहीदी है, यहोवा की तारीफ़ है कि वो भला है। उसके मुतला’अ में लफ़्ज़ हालेलूयाह है, जिसके मा’नी हैं कि “यहोवा की सताइश करो।” चौथी और पाँचवीं आयत में मुसन्निफ़ अर्ज़ करता है कि “यहोवा तेरी ख़ास मेहरबानी मुझ पर हो, ताकि मैं तेरे बरगुज़ीदा लोगों की भलाई देखूँ और तेरी क़ौम की ख़ुश-वक़्ती से ख़ुश होऊँ और तेरी मीरास पर फख्र करूँ।”
आयात (6–33) में मुसन्निफ़ बनी-इस्राईल का गुनाह, शरारत, गर्दनकशी और नादानी का बयान करता और कहता है कि हमारे बाप-दादा मुल्क-ए-मिस्र में अजीब क़ुदरतों को न समझे, उन्होंने तेरी रहमतों की कस्रत को याद न किया, बल्कि दरिया-ए-यर्दन और दरिया-ए-क़ुलज़ुम पर बग़ावत की। लेकिन यहोवा ने अपने नाम के लिए उन्हें बचाया ताकि अपनी क़ुदरत ज़ाहिर करे। तब उसने उन्हें दरिया-ए-क़ुलज़ुम उबूर कराया और मिस्रियों को हलाक किया। और उनके जंगल में हिर्स करने, और ख़ैमागाह में मूसा और यहोवा के मुक़द्दस मर्द हारून पर हसद करने, और हूरीब में बछड़ा बनाने, नजात देने वाले ख़ुदा को भुला देने, और मूसा की सिफ़ारिश और उन सबके नताइज की तरफ़ इशारा करता है। लिखा है कि उन्होंने इस दिल-पज़ीर की तहक़ीर की और यहोवा ने उनके दरमियान वबा भेजी। और उन्होंने मूसा को मरीबा के पानी पर ग़ुस्सा दिलाया और मूसा उनकी वजह से गुनहगार ठहरा, क्योंकि उन्होंने उसकी रूह को दिक़ किया, ऐसा कि वो अपने लबों से नामुनासिब बोला।
आयात (24–44) में ज़िक्र है कि जब वो मुल्क-ए-कनआन में पहुँचे तो उन्होंने उन अक़्वाम को, जिनकी बाबत ख़ुदा ने उनको हुक्म दिया था कि उनको बिल्कुल ख़ारिज कर दो, उन्होंने न मारा बल्कि ग़ैर-उम्मतों से मेल किया और उनके काम सीखे और उनके बुतों की परस्तिश की और अपने बेटे और बेटियाँ शैतान के लिए क़ुर्बान किए। तब ख़ुदा ने अपने ग़ुस्से में उनको ग़ैर-अक़्वाम के क़ब्ज़े में कर दिया और वो मग़लूब व ज़ेरो-दस्त होकर क़ुरआन के मुति’अ् व ताबे हुए। लेकिन ख़ुदावन्द ने रहम करके उनको दुश्मनों के हाथों से छुड़ाया और उनका ऐसा इंतिज़ाम किया कि उन्होंने जो उनको असीर (क़ैदी) करके ले गए थे, उन पर तरस खाया और उनसे नेक बर्ताव किया। सो मुसन्निफ़ आख़िरी आयत में कहता है कि ख़ुदावन्द इस्राईल का ख़ुदा अबद तक मुबारक हो। इस पर सब लोग एक ज़बान होकर बोले: “आमीन, हालेलूयाह।” इस तरह ज़बूर की चौथी किताब मुकम्मल हुई।
किताब पंजुम (ज़बूर 107–150)
सवाल 19: ज़बूर की पाँचवीं किताब की कैफ़ियत बयान करें।
जवाब: पाँचवीं किताब में (44) यानी (ज़बूर 107–150) ज़बूर हैं। जिनमें गुमनाम यानी महरूम-उल-मुसन्निफ़ हैं, (15) दाऊद के और (1) सुलेमान का है। ये किताब ग़ालिबन एज़्रा फ़क़ीह के हाथ से असीरी के बाद तालीफ़ हुई और कई एक हालेलूयाह से ख़त्म हुई है।
सवाल 20: इस किताब के ज़बूरों की तफ़्सील करें।
जवाब: (ज़बूर 107) कुछ मुफस्सिरीन इसको तवारीखी (ज़बूर 106) का जवाब मानते हैं, लेकिन वो हैरान हैं कि ये ज़बूर पाँचवीं किताब में है। और कुछ कहते हैं कि ये ज़बूर तवारीखी नहीं है, बल्कि कई एक ऐसे वाक़ि’आत पेश करता है जो कि अमली तौर पर सरीहन और ज़ाहिरी तौर पर इंसानी ज़िंदगी में अक्सर आते हैं। इसका ख़ास मक़सद ये बताना है कि यहोवा दु’आ का जवाब देता है कि अव्वल इस सबब से कि लोग यानी उसके लोग तंगी में उसको पुकारते हैं,
और दुव्वम इस सबब से कि वो भला है। उसकी रहमत अबदी है और उसकी निगाह हमेशा इंसान पर लगी है। और इस सबब से भी बनी-आदम बरकात-ए-जिस्मानी के लिए उससे अर्ज़ कर सकते हैं और वो अर्ज़ों का जवाब भी ज़रूर देता है। इन तमाम बातों की बिना पर उसकी शुक्रगुज़ारी की जाए।
इस ज़बूर में तम्हीद के अलावा (6) ख़ास हिस्से भी हैं जिनमें से हर एक हिस्सा एक ख़ास वाक़ि’आ पेश करता है। इसकी तम्हीद पहली तीन आयात में है, जिनमें मुसन्निफ़ रिहाई-याफ़्ता लोगों से शुक्रगुज़ारी लाज़िमी बताता है।
इन छः हिस्सों में हर दो हिस्सों के माबैन अल्फ़ाज़ “सताइश करें” आते हैं और एक-दूसरे से जुदा करते हैं।
(हिस्सा अव्वल) (4–9) आयात उन लोगों का ज़िक्र है जो ब्याबान में भटकते फिरते थे। और जब भूख और प्यास से तंग आकर उन्होंने ख़ुदावन्द को पुकारा तो उसने उन्हें रिहाई बख़्शी।
(हिस्सा दुव्वम) (10–16) आयात में दिखाया गया है कि उनको, जो तारीकी और मौत के साये की वादी में बैठे थे और मुसीबत और लोहे से जकड़े हुए थे, रिहाई मिली। चूँकि उन लोगों ने ख़ुदा के हुक़्म से बग़ावत की और हक़ त’आला की मस्लिहत (भलाई) की तहक़ीर की। उसने उनके दिलों को मशक़्क़त से आज़िज़ किया और वो गिर पड़े और उनका कोई मददगार नहीं था। ऐसी हालत में जब उन्होंने ख़ुदावन्द को पुकारा तो उसने उनको तमाम मसाइब से रिहाई बख़्शी।
(हिस्सा सोइम) (17–27) आयात में एक बड़ी हौसला-अफ़ज़ा और दिल-पसंद बात है कि अगर कोई अपनी कजरवी, बदचाल और बदकिरदारियों के सबब मुसीबत में मुब्तला हो जाए, यहां तक कि मौत के दरवाज़ों के नज़्दीक पहुँच जाए, तो भी अगर ऐसी हालत में वो दु’आ करे तो ख़ुदावन्द अपना कलाम भेजता और ख़लासी बख़्शता है।
(हिस्सा चहारुम) (23–32) आयात में उन लोगों का बयान है जो जहाज़ों में समुंदर की सैर करते हैं, कि जब तूफ़ानी हवा उठती है और उनकी जानें परेशान होती और पिघल जाती हैं, लेकिन जब वो यहोवा को पुकारते हैं तो वो उनको ख़लासी बख़्शता है। उनके वास्ते मुनासिब है कि जब वो आबादी में सलामती से जाएं तो लोगों के मजमें में ऐसे वाक़ि’आत और ग़ैबाना हाथ से अपने बचने का ज़िक्र करें और यहोवा की सताइश शख़्सी तौर पर और बुज़ुर्गों की जमाअत में भी करें।
(हिस्सा पंजुम) (33–41) आयात में बयान हुआ है कि यहोवा नहरों को सहरा और पानी के चश्मों को सूखी ज़मीन कर देता है और जीद ज़मीन को शोर बना देता है। और ये उन लोगों की शरारत का नतीजा होता है जो वहां बसते हैं। साथ ही उसका रहम भी बेपायाँ है कि ब्याबान को झील और ख़ुश्क ज़मीन को चश्मा बनाता है और वहीं भूकों को बसाता है कि वो अपने रहने के वास्ते शहर तैयार करें।
आयात (40–41) में कि वो इंसान की हैसियत व क़द्र में भी तमीज़ व तफ़रीक करता है। यानी कि वो अमीरों को ज़लील और रुस्वा करता और ख़ाकसारों को उनकी आजिज़ी में से उठाता है। और इन सब बातों से ख़ुदावन्द का इंतिज़ाम ज़ाहिर होता है। और ये इंसान से ख़ुदावन्द की शुक्रगुज़ारी तलब करता है।
(हिस्सा शशुम) आयात (42–43) से मुसन्निफ़ दिखाता है कि मुतज़क्किरा तज़ुर्बातों का नतीजा सादिक़ों और बदकिरदारों पर क्या होता है। वो कहता है कि सादिक़ मसरूर होंगे, लेकिन बदकारों का मुँह बंद हो जाएगा। दाना-दिल और साहिब-ए-तमीज़ इन बातों पर ग़ौर व फ़िक्र करके ख़ुदावन्द की रहमतों को ख़ूब समझ सकता है।
(ज़बूर 108): ये एक इंतिख़ाबी ज़बूर है। इसकी पाँच आयात (ज़बूर 57:7–11) और (ज़बूर 60:5–12) का तख़ातुब हैं। इसके सरनामे से ज़ाहिर है कि ये दाऊद का गीत और ज़बूर है। लेकिन ये मालूम नहीं कि ये क्यों तीन ज़बूरों से इंतिख़ाब किया हुआ है। इसका मक़सद यहोवा की अज़ीम रहमतों और अमानतदारी के वास्ते उसकी तारीफ़ और सताइश करना है। चूँकि इसकी तफ़्सील (ज़बूर 57 और 60) में हिस्सा-ब-हिस्सा हो चुकी है, इस पर अलैहदा ग़ौर करना चंदाँ ज़रूरी नहीं।
(ज़बूर 109): सरदार मुग़न्नी के लिए दाऊद का ज़बूर। इस ज़बूर से एक सिलसिला शुरू होता है जो कि चार यानी (ज़बूर 109–112) ज़बूरों पर मुश्तमिल है। इस कुल सिलसिले में मसीह पेश हुआ है। इस ज़बूर में उसकी अज़ीयत का ज़िक्र है। क़दीम आबा ने उस को “इस्करियोती का ज़बूर” कहा था। क्योंकि पतरस ने (आमाल 1:16–20) में इस को यहूदाह इस्करियोती से मंसूब किया। अगर हम यहूदियों की अलामत समझ सकें तो ये भी सफ़ाई से समझ में आ जाएगा कि वो फ़त्वा, जो मसीह के काम को रोकना और उसे तख़्त से गिराना चाहता था, लगाया गया। यहूदियों की क़ौम पर मजमूई तौर पर आइद होता है। इस ज़बूर का नक़्शा इस तरह है कि आयात (1–5) में मसीह उस शख़्स की मानिंद बोलता है जो दुश्मनों से मसहूर है। आयात (6 से 20) में ऐसी हालत में उसकी नज़र दुश्मनों पर पड़ जाती है और वो उन पर फ़त्वा देता है कि जो फ़त्वा यहूदाह इस्करियोती पर लगाया गया था। एन उस फतवे की मानिंद है जो की उस बाप की तरफ से हो चुका कि लख्ते-जिगर तीस रुपयों पर फ़रोख़्त हो जाएगा।
ये ज़बूर “लानत-कुनां ज़बूरों” में शामिल है। इसमें ऐसा मालूम होता है कि इसकी आयात एक बेवफ़ा बीवी की तरफ़ इशारा करती है, जिसका ज़िक्र (गिनती 5 बाब 21 से 24) आयात में इस तरह हुआ है कि वो लानत उसकी अंतड़ियों में दाख़िल होकर उसको पीड़ा देती है। नीज़ (मत्ती 26 बाब 24 आयत) पर दलालत करता है जिसमें मस्तूर है कि “अफ़्सोस है उस पर जिसकी वजह से बनी-आदम गिरफ़्तार किया जाता है। अगर वह शख़्स पैदा ही न होता तो उसके लिए ये अच्छा था।” ज़बूर दरअस्ल रास्ती की फ़रियाद है जब वो रास्ती सर से तंग आती है और उस पर फ़त्वा लगाती है, फ़रियाद है। ये ज़बूर मसीहा की दु’आएं और शुक्रगुज़ारी है इस बात पर कि यहूदाह इस्करियोती और उसके हम-जिंस आदमियों की अदालत की गई है और की जाएगी।
(ज़बूर 110): ये दाऊद का ज़बूर है। इस में दाऊद मसीह को ख़ुदा के दहने हाथ बैठा हुआ दिखाता है। जो कि इस बात का मुंतज़िर है कि कब उसके सब दुश्मन उसके पांव की चौकी बन जाएं। ख़ुदावन्द मसीह ने ख़ुद जब फ़रीसी जमा थे, ये ज़बूर इस्तिमाल किया। जब उसने इस से इस्तिफ़सार (बातचीत) किया कि मसीह के हक़ में तुम्हारा क्या ख़याल है? वो किस का बेटा है? तो वो बोले कि दाऊद का। इस पर मसीह ने फ़रमाया कि फिर दाऊद रूह की हिदायत से क्यों उसे ख़ुदावन्द कहता है? जब वो कहता है कि “ख़ुदावन्द ने मेरे ख़ुदावन्द से कहा कि मेरी दाहिनी तरफ़ बैठ, जब तक मैं तेरे दुश्मनों को तेरे पांव की चौकी ना बनाऊँ।” सो पस जब दाऊद उसे ख़ुदावन्द कहता है तो वो उसका बेटा क्योंकर ठहरा। देखो (मत्ती 22 बाब 41 से 45 आयत, और मर्क़ुस 15 बाब 35 से 37 आयत)। पौलूस ने (इब्रानियों के नाम 1 बाब उस की 13 आयत) में इसी ज़बूर से इक़्तिबास लिया और मसीह को फ़रिश्तों पर फ़ौक़ियत दी और उनसे बुज़ुर्गतर ठहराया। नीज़ जब पतरस ने (आमाल 2 बाब 24 आयत) में मसीह को ख़ुदावन्द साबित करना चाहा तो इस ज़बूर की आयात अव्वल को लिया जिसमें लिखा है कि “ख़ुदावन्द ने मेरे ख़ुदावन्द से कहा कि तू मेरे दहने हाथ बैठ।” फिर जब पौलूस (इब्रानियों के नाम 10 बाब उस की 12 से 13 आयत) में ज़ाहिर करता है कि मसीह ने अपने काम को बवजह-ए-अह्सन अंजाम दिया, वो कहता है कि वो या’नी मसीह ख़ुदा के दहने जा बैठा। और उस वक़्त से मुंतज़िर है कि उसके दुश्मन उसके पांव की चौकी बनें। इस की तफ़्सील आयत-ब-आयत करेंगे।
पहली आयत से यहोवा की तरफ़ से मसीह की सर्फ़राज़ी की जाती है कि वह ख़ुदा के दहने हाथ बैठे। दूसरी आयत में यहोवा उस से वा’दा फ़रमाता है कि उसके सब दुश्मन उसके ताबे-फ़र्मान किए जाएँगे। तीसरी आयत में मसीह को एक वा’दा मिलता है कि उसके लोग बेशुमार होंगे, और उसके रोज़ हुस्न-ए-तक़द्दुस के साथ आप से मुस्तइद होंगे। चौथी में लिखा है कि वह मुल्क सिदक़ के तौर पर अबद तक का काहिन है।
आयात (5, 6 और 7) में अदालत दिखाई गई है, जिसमें मसीह की कामयाबी अज़-ख़ुद नज़र आ रही है।
(ज़बूर 111), (ज़बूर 112): हरूफ़-ए-तहज्जी के ज़बूर हैं, और तरकीब में यकसाँ हैं। हरूफ़-ए-तहज्जी के लिहाज़ से उनका हर एक शे’अर, बल्कि हर एक मिसरा, तर्तीबवार हरूफ़-ए-तहज्जी से शुरू होता है। इब्रानी हरूफ़-ए-तहज्जी के लिहाज़ इनमें बाईस बाईस अश’आर हैं। ये दोनों हल्लेलुयाह के ज़बूर हैं।
आयात (1 से 8) में हर एक शे’अर के दो मिसरे हैं, और आयात (9 ता 10) में हर एक शे’अर तीन-तीन मिसरों का है। (ज़बूर 111) में ख़ुदावन्द की सिफ़ात-ए-आलिया और उसके कुल काम की तारीफ़ है, और (ज़बूर 112) में उसके लोगों की तारीफ़ है और बयान है कि वे कई एक बातें ख़ुदा के मुशाबेह हैं। मसलन (ज़बूर 111:3) में लिखा है कि उसका काम जाह व जलाल है, और उसकी सदाक़त अबद तक क़ायम है। इसी तरह (ज़बूर 112:3) में भी आया है कि उनके घरों में माल व दौलत होगी और उनकी सदाक़त अबद तक क़ायम है। (ज़बूर 111:1) में यहोवा की तारीफ़ करने की जगह बताई गई है कि उसकी तारीफ़ सादिक़ों की महफ़िल में होनी चाहिए। (ज़बूर 111:2) में इसका मज़्मून यह है कि यहोवा के काम बड़े और अज़मत वाले हैं, और जो उनका इश्तियाक़ रखते हैं, उनकी तफ़्तीश करते हैं। (ज़बूर 111:3 से 9) में यहोवा के अजीब-अजीब कामों की तफ़्सील की गई है। (ज़बूर 111:4) में लिखा है कि उसने अपने अजीब कामों की यादगारी रखी, वह रहीम और मेहरबान है। (ज़बूर 111:5) में आया है कि वह अपने डरने वालों को खाना देता है और अपने अहद को अबद तक याद रखता है। (ज़बूर 111:6) में लिखा है कि उसने कामों का ज़ोर अपने लोगों को दिखाया कि उन्हें क़ौमों की मीरास बख़्शे। (ज़बूर 111:7) बताती है कि उसके हाथ के काम हक़ और अदालत हैं, और उसके कुल अहकाम यक़ीनी हैं।
(ज़बूर 111:8) में बयान है कि उसके अहकाम अबद तक क़ायम रहते हैं। और (ज़बूर 111:9) में आया है कि उसने अपने लोगों के वास्ते मख़लिसी भेजी है, और उसका नाम क़ुद्दूस व मुहीब है। (ज़बूर 111:10) में मुसन्निफ़ कहता है कि ख़ुदावन्द का ख़ौफ़ दानाई का शुरू है। (अय्यूब 28:28, अम्साल 1:7) इस ज़बूर में ये नादिर हक़ीक़त है कि ख़ुदावन्द का ख़ौफ़ दानाई का शुरू है, सादिक़ों की महफ़िल में गाया जाता है।
(ज़बूर 112): इसमें यहोवा के लोगों की तारीफ़ है, और यह भी हालेलूयाह का ज़बूर है। ये ज़बूर अस्ल में (ज़बूर 111:10) की कि ख़ुदावन्द का ख़ौफ़ दानाई का शुरू है। चुनान्चे पहली आयत में आया है कि वह आदमी जो कि ख़ुदावन्द से ख़ौफ़ रखता है और उसके फ़र्मान से निहायत मसरूर है, मुबारक है। और न सिर्फ़ वही, बल्कि उसकी नस्ल भी इस मुबारकबादी में शामिल और हिस्सेदार है। इस वास्ते दूसरी आयत में लिखा है कि उसकी नस्ल ज़मीन पर ज़ोरावर होगी और सादिक़ों की औलाद मुबारक होगी। (ज़बूर 112:3) में ऐसे शख़्स के घर की आसूदगी ज़ाहिर की गई है, कि उसमें माल व दौलत होगी और उसकी सदाक़त क़ायम रहेगी। चौथी आयत कहती है कि रास्त-क़ार, मेहरबान, दर्दमंद और सादिक़ हैं, और उनके लिए तारीकी में नूर चमकता है। पांचवीं आयत में ये है कि नेक आदमी अपना काम वक़ूफ़-ए-इम्तियाज़ से अंजाम देता है, और वह औरों पर मेहरबान हो सकता है और क़र्ज़ भी देता है। तो (ज़बूर 112:6 से 8) में ज़िक्र है कि उस को हरगिज़ जुंबिश ना होगी, बल्कि सादिक़ की यादगारी अबद तक होगी। और इस सबब से कि उसका तवक्कुल ख़ुदावन्द पर है, वह बुरी ख़बरों से हरासां नहीं होता, बल्कि उसका दिल बरक़रार रहता है। और अगरचे वह बिखराता और कंगालों को देता है, तो भी उसकी सदाक़त अबद तक क़ायम रहती है। उसका सींग जलाल के साथ सर्फ़राज़ होगा। (ज़बूर 112:10) इसका नतीजा और असर जो कि शरीरों पर होता है, कि वह देखेगा और कुढ़ेगा, अपने दाँत पीसेगा और पागल हो जाएगा, और शरीरों की तमन्ना फ़ना हो जाएगी।
(ज़बूर 113): सिलसिला हलेल का शुरू है। इस में कुल छः या’नी (ज़बूर 113–118) ज़बूर हैं। ये ज़बूर ईद-ए-फ़सह, पैंतिकोस्त और ईद-ए-ख़य्याम के अय्याम में इस्तिमाल होते थे। इन मौकों के अलावा नए चाँद और मख़सूसियत की ईदों में, ईद-ए-फ़सह के मौक़े पर भी इस्तिमाल किए जाते थे। (ज़बूर 113, 114) ईद के शुरू में गाए जाते थे, और (ज़बूर 115–118) फ़सह की ज़ियाफ़त के ख़त्म होने पर। इस गीत का मज़कूर (मत्ती 26:30, मर्क़ुस 14:26) में मिलता है। इस में दो हिस्से हैं।
(हिस्सा अव्वल) में पहली तीन आयात हैं। शुरू में लफ़्ज़ “हालेलूयाह” है, और इसके बाद यहोवा के सब बंदों को कहा जाता है कि यहोवा के नाम की सताइश करो, और एक दु’आ है कि यहोवा का नाम इस दम से लेकर आख़िर तक मुबारक हो।
(हिस्सा दुव्वम) (4 से 9) में यहोवा की सिफ़ात पेश की गई हैं, जिनके सबब उसकी सताइश लाज़िम है। मसलन:
(1) यहोवा कुल उम्मतों पर बुलंदो-बाला है, और उसका जलाल आसमानों पर है।
(2) वो बेमिसाल है, और कोई दूसरा उसकी मानिंद नहीं, और उसे बदल नहीं सकता।
(3) वो अपने तईं पस्त करता है, और कि आसमान और ज़मीन पर निगाह करके।
(4) वो मसाकीन को ज़मीन से उठाता है, और मुहताज को मज़बला पर से ऊँचा करता है।
(5) और इसमें उसका इंतिहा-ए-मंशा यह होता है कि उनको अमीरों, बल्कि अपने ही लोगों के अमीरों के साथ बिठाए।
(6) वो बाँझ औरत को घर में बसाता है, ऐसा कि वो ख़ुशी से बच्चों की माँ होती है। ये ज़बूर “हालेलूयाह” से ख़त्म होता है। (ज़बूर 114) ये ज़बूर फ़सह की ज़ियाफ़त पर गाया जाता था, ताकि इस्राईल का मुल्क-ए-मिस्र से निकलने का वाक़ि’आ उनको ख़ूब याद रहे। इस में उनके मिस्र से निकलने के वाक़ि’आत मुख़्तसरन पाए जाते हैं, लेकिन उनके मिस्र से निकलने के वास्ते उनके लिए समुंद्र में ख़ुश्क रास्ता बनने, और कनआन में दाख़िल होने के लिए यर्दन का उनके लिए रास्ता खुलने का अहवाल ख़ुसूसियत के साथ मिलता है। चुनान्चे समुंद्र और दरियाओं से इस्तिफ़सार है कि, “ऐ समुंद्र, तुझे क्या हुआ कि तू भागा? और ऐ यर्दन, तुझे क्या हुआ कि तू उल्टे पैर निकला? और क्या हुआ ऐ पहाड़ों, कि तुम मेंड़ों की तरह छलांगें मारते हो, और ऐ टीलो, कि तुम भेड़ के बच्चों की तरह कूदते हो?” “ऐ ज़मीन, तू यहोवा के हुज़ूर, ऐ याक़ूब के यहोवा के हुज़ूर, थरथरा, जो पत्थर को पानी का हौज़ और चकमाक़ के पत्थर को पानी का चश्मा बनाता है।”
(ज़बूर 115): ये ज़बूर फ़सह खाने के बाद सबसे पहले गाया जाता था। इसकी अव्वल आठ आयात में कुल जमा’अत अपनी नालायक़ी का इक़रार करके यहोवा की तारीफ़ करती है, और यहोवा जो अनदेखा है, ख़ुदा है। उम्मतों के दीदनी मा’बूदों के साथ मुक़ाबला करके उसकी क़ुदरत और दीगर मा’बूदों की बे-कसी दिखाई गई है।
आयात (9 से 11) में गाने वाले इस्राईल, और हारून के घराने, और यहोवा के डरने वालों को ताकीद करते हैं कि वो यहोवा पर तवक्कुल रखें, कि वही उनका मददगार और उनकी सिपर है।
आयात (12 से 15) में सरदार काहिन उनको ये कह कर यक़ीन दिलाता है कि यहोवा जिसने हमको याद किया वही हमको बरकत भी देगा। वो इस्राईल के घराने और हारून के घराने को बरकत देगा। सो तुम यहोवा की तरफ़ से, जिसने आसमान व ज़मीन को पैदा किया, मुबारक हो।
आयात (16 से 18) में जमाअत कह कर कहती है कि आसमान यहोवा के हैं, और उसने ज़मीन बनी-आदम को अता की है। सो हम इस वक़्त से लेकर अबद तक यहोवा को मुबारक कहेंगे। “हालेलूयाह।”
(ज़बूर 116): इसके मौक़ा-ए-तस्नीफ़ का कुछ पता नहीं, लेकिन चूँकि सिलसिला हलेल में है और ईद पर गाया जाता था, इसका ता’ल्लुक़ ईद से है। ये ज़बूर ख़ुसूसियत से शख़्सी है क्योंकि सिवाय पाँचवीं और उन्नीसवीं आयत के, इसकी हर एक आयत के अल्फ़ाज़ में “मुझे” या “मेरा” इस्तिमाल हुआ है। इस में चार हिस्से हैं।
(हिस्सा अव्वल) पहली चार आयात में मुसन्निफ़ ये दावा करता है कि मैं मुहब्बत रखता हूँ या प्यार करता हूँ। इब्रानी ज़बान में इस फ़े’ल (काम, अमल) के साथ कोई मफ़’ऊल (जिस पर काम किया जाये) नहीं आया। मुसन्निफ़ का सिर्फ़ ये दावा है कि मुझमें मुहब्बत है। इस मुहब्बत के रखने का ये सबब बयान करता है कि ख़ुदा ने मेरी आवाज़ और मिन्नतें सुनी हैं। इस बयान से मा’लूम होता है कि वो तकलीफ़ में था और रिहाई पाई। और चूँकि उसकी अर्ज़ मक़्बूल हो गई, वो कहता है कि मैं जब तक ज़िंदा रहूँगा, उसका नाम लिए जाऊँगा। तीसरी आयत में वो अपनी शिद्दत का यूँ बयान करता है कि मौत के दुखों ने मुझको घेरा और क़ब्र के दर्दों ने मुझको पकड़ा। मैं दुख और ग़म में गिरफ़्तार हुआ। फिर वो कहता है कि मैंने ख़ुदावन्द का नाम लिया और अर्ज़ की: “ऐ ख़ुदावन्द, मुझ पर रहम कर और मेरी जान बचा।”
(हिस्सा दुव्वम) आयात (5 से 9) में वो अपनी रिहाई का इज़हार-ए-शुक्रगुज़ारी और ख़ुदावन्द की शुक्रगुज़ारी करता है, और वा’दा करता है कि मैं ख़ुदावन्द के आगे ज़िंदगी में चलूँगा।
(हिस्सा सोइम) आयात (10 से 14) में अपनी अर्ज़ और शुक्रगुज़ारी के अस्बाब बयान करता है कि चुनान्चे उसकी अर्ज़ की वजह ये है कि वो इन्सान पर भरोसा नहीं रख सकता, बल्कि सिर्फ़ ख़ुदावन्द ही पर। और शुक्रगुज़ारी का सबब ये है कि उसने ईमान से अर्ज़ की और ख़ुदावन्द ने उसे जवाब दिया। इस पर वो कहता है कि मैं नजात का पियाला उठाऊँगा और ख़ुदा का नाम पुकारूँगा।
(हिस्सा चहारुम) आयात (15 से 19) में मुसन्निफ़ फिर अपने शुक्रिया की अदायगी की वजह बयान करता है कि यहोवा ने उसके बंधन खोले। आख़िर में वो “हालेलूयाह” पुकारता है।
(ज़बूर 117): ये ज़बूर सबसे छोटा है। एक मुसन्निफ़ ने इसकी निस्बत कहा कि इसकी ज़ख़ामत बहुत छोटी है, लेकिन वो बहुत बेश-बहा और क़ीमती अश्या से पुर है। इस में सब क़ौमों को दा’वत मिली है कि वो ख़ुदावन्द की हम्द करें। दा’वत का इश्तिहार देने वाला कहता है कि वो इस वास्ते ख़ुदावन्द की हम्द करें कि उसकी रहमत हम पर ग़ालिब हुई है। और हमको मा’लूम हो गया है कि ख़ुदावन्द की रहमत कुल उम्मतों के लिए है, ना कि सिर्फ़ हमारे लिए। (ख़त बनाम रोमियों 15:11) वो इसके लिए “हालेलूयाह” पुकारता है।
(ज़बूर 118): ऐसा मा’लूम पड़ता है कि ये ज़बूर किसी ईद के लिए तस्नीफ़ हुआ था और हैकल की इबादत में गाया जाता था। ख़ुदावन्द येसू मसीह और उसके शागिर्दों ने ये ज़बूर उस वक़्त गाया जब वो गतसमनी बाग़ में जाने को तैयार थे। जनाब मार्टिन लूथर ने अपने दफ़्तर की दीवार पर इस ज़बूर की बाबत लिखा था कि “ज़बूर या’नी (ज़बूर 118) मेरा है।” या’नी ये वो ज़बूर है जिसे मैं प्यार करता हूँ। बग़ैर इस ज़बूर के बादशाह और शहनशाह, बावजूद अपनी सारी दानाई और दूर-अंदेशी के, मेरी मदद न कर सकते थे। बा’ज़ मुफ़स्सिरीन का ख़याल है कि ये ज़बूर उस ईद-ए-ख़य्याम के लिए तस्नीफ़ हुआ था, जिसका ज़िक्र (नहमियाह 8:14-18) आयत में है कि ये ज़बूर इस ईद में पहली बार गाया गया था। इस तरह ये ज़बूर (444 क़ब्ल अज़ मसीह) ठहरता है। लेकिन बा’ज़ ये गुमान करते हैं कि यहूदाह मक़बीज़ के अय्याम की तस्नीफ़ है। अक्सर मुसन्निफ़ों ने इसे दो हिस्सों में तक़्सीम किया है कि हिस्सा अव्वल आयात (1 से 16) और हिस्सा दुव्वम (17 से 19)। ईवलिड ने इसकी यूं तक़्सीम की है कि आयात (1 से 4) गाने वाले गाते थे, (5 से 23) तक सरदार मुग़न्नी गाता था।
(24 से 25) फिर गाने वाले गाते थे। (26 से 27) काहिन गाते थे। (28) सरदार मुग़न्नी और (29) फिर गाने वाले। लेकिन इस पर ये एतराज़ आता है कि काहिन लोग गाते नहीं थे, सिर्फ़ लावी ही गाते थे। लिहाज़ा इसकी तक़्सीम लावियों और जमा’अत के माबैन ही होनी चाहिए। डेलश साहब का ख़याल है कि इसमें दो हिस्से हैं: हिस्सा अव्वल (1 से 19) और हिस्सा दुव्वम (20 से 29)। हिस्सा अव्वल काहिन और लावी हैकल को जाते वक़्त गाते, और हिस्सा दुव्वम वो लावी जो हैकल के दरवाज़े पर खड़े रहते थे और काहिनों और लावियों के दूसरे फ़रीक़ के आने पर उनका इस्तिक़बाल करते थे। अठाईसवीं आयत दूसरा फ़रीक़ गाता था और उनत्तीसवीं आयत दोनों फ़रीक़ मिलकर गाते थे। इसकी तश्रीह इस तरह से है कि पहली चार आयात में शुक्रगुज़ारी की वजूहात बयान की हैं।
(5 से 9) आयात में ये बयान है कि यहोवा पर तवक्कुल रखना इन्सान पर भरोसा रखने से कहीं बेहतर है। (10 से 14) में मुसन्निफ़ इस वास्ते यहोवा की मदह (तारीफ़) करता है कि वो हमेशा उसके हमराह है, और उसका नाम लेने से उसको कामिल यक़ीन हो जाता है कि यहोवा उसके दुश्मनों को नाबूद करेगा। क्योंकि वो कहता है कि वही मेरी क़ुव्वत, फ़ख़्र और नजात है। आयात (15 से 21) में वो बयान करता है कि यहोवा ही से सादिक़ों के ख़ेमों में ख़ुशी और नजात की आवाज़ है, और कहता है कि वो ज़िंदा रहेगा और यहोवा का शुक्रिया अदा करेगा। आयात (22 से 29) में ये आया है कि “मुबारक वो है जो यहोवा के नाम से आता है।” यहोवा के घर से ये आवाज़ आती है कि “हम तुझे बरकत देंगे।” एक मुफ़स्सिर ने कहा है कि इस ज़बूर से ये अयाँ किया गया है कि मसीह के ख़ून से ख़रीदे हुए उसके जंग-ओ-जदल (लड़ाई, फसाद), फ़त्हमंदी और जलाल में उसके साथ शरीक होते हैं।
(ज़बूर 119) यह ज़बूर सब से बड़ा है। इसमें इब्रानी हुरूफ़-ए-तहज्जी के शुमार से बाईस हिस्से हैं। हर एक हिस्से में आठ-आठ आयात हैं और हर आयत एक ही हर्फ़ से शुरू होती है। मसलन: हिस्सा अव्वल की हर आयत इब्रानी हुरूफ़-ए-तहज्जी के अव्वल हर्फ़ या’नी अलिफ़ से शुरू होती है, और हिस्सा दुव्वम में हर्फ़ सानी या’नी ब से व-अला-हाज़ल-क़ियास (इसी क़यास पर)। इसमें 176 आयात या अश’आर हैं। हर एक आयत में, सिवाए आयात (84, 22) के ख़ुदा के कलाम या शरी’अत का ज़िक्र हुआ है। और ज़ैल के एक और दर्जन अल्फ़ाज़ ख़ुदा की मर्ज़ी या शरी’अत के इज़्हार के लिए खुसूसियत के इस्तिमाल हुए हैं: शरी’अत1, शहादत2, राह3, हुक्म4, क़वायद5, अनफ़ाल6, कलाम7, हुक़ूक़8, अदालत9, फ़राइज़10, सदाक़त11 और नाम12। बोनर साहब इस ज़बूर की निस्बत फ़रमाते हैं:
“ये मसीही मुसाफ़िर का ज़बूर है, जो कि रुहानी ज़िंदगी के शुरू से आख़िर तक यहोवा की शरी’अत की रहनुमाई में चलता है, यहां तक कि मुक़द्दस शहर में पहुंच जाता है।”
इसकी तफ़्सील इस तरह से है:
(अ) (1 से 8) में नौज़ाद आदमी नए सफ़र की तैयारी के मौक़े पर मा’लूम करता है कि ख़ुदावन्द की शरी’अत पर चलने वाला कामिल रफ़्तार हो।
(बेथ) (9 से 16) में चुनान्चे वो सफ़र शुरू करता है और कहता है कि जवान अपनी राह किस तरह साफ़ रख सकता है। जवाब मिलता है कि ख़ुदा के कलाम के मुवाफ़िक़ अपनी राह पर ख़ूब निगाह करने से।
(गेमल) (17 से 24) वो ख़ुदावन्द के एहसान का मुहताज है ताकि वो ज़िंदा रहे।
(दालथ) (25 से 32) में उसे मुश्किलात नज़र आती हैं और उसके ज़ौक़-ओ-इश्तियाक़ में तकस्सुर वाक़ि’अ होता है। वो अर्ज़ करता है कि ख़ुदावन्द अपने क़ौल के मुताबिक़ उसे जलावे।
(हे) (33 से 40) में तर-ओ-ताज़ा होकर फिर ख़ुदावन्द से अर्ज़ करता है कि वो उसे अपने हुक़ूक़ की राह बतलाए और वा’दा करता है कि मैं आख़िर तक उन्हें याद रखूँगा।
(वाव) (41 से 48) में तक्लीफ़ व मुसीबत में मुब्तला होकर दु’आ करता है कि ख़ुदावन्द अपने क़ौल के बमूजब अपनी रहमतों और नजात से उसे पहरा-अंदोज़ फ़रमाए।
(ज़ैन) (49 से 56) में वो घबराहट और परेशानी की हालत में ख़ुदावन्द से अर्ज़ करता है कि “अपने बंदे की ख़ातिर अपने क़ौल को, जिसका तूने मुझको उम्मीदवार किया, याद कर, कि ये मेरे वास्ते दुख में तसल्ली हो गई।”
(ख़ीथ) (57 से 64) में वो ख़ुदावन्द को अपना बख़रा जानता और आगे बढ़ता है कि उसके चेहरे की तवज्जोह ढूंढे।
(तीथ) (65 से 72) वो ख़ुदा की ख़ुश-सुलूकी की बुनियाद पर चाहता है कि ख़ुदावन्द उसे अच्छा इम्तियाज़ और दानिश सिखलाए।
(योद) (73 से 80) में वो ख़ुदावन्द को अपना पैदा-कनिंदा और आरास्ता करने वाला जानकर उस से फ़हम के लिए अर्ज़ करता है ताकि वो उसके अहकाम सीखे।
(क़ाफ़) (81 से 88) में वो सताए जाने की वजह से ख़ुदावन्द से लिपटा रहता है और कहता है कि “ऐ ख़ुदावन्द, मेरी जान तेरी नजात के शौक़ में ग़श खाती है। मैं तेरे क़ौल पर एतिमाद रखता हूँ।”
(लामद) (89 से 96) में वो ख़ुदावन्द की तारीफ़ और शुक्रिया कर के “अगर तेरी शरी’अत मेरी ख़ुशी का बा’इस न होती, तो मैं अपनी मुसीबत में हलाक हो जाता।”
(मीम) (97 से 104) में वो ख़ुदावन्द का शुक्रिया अदा करता है और कहता है कि “चूँकि मैं तेरी शरी’अत का शैदा हूँ, मैं अपने तमाम आ’दाद पर दानिशमंदी में फ़ाइक़ हूँ।”
(नून) (105 से 112) में वो ख़ुदावन्द की शरी’अत को निहायत फ़ाइदेबख्श देखकर कहता है कि “तेरा कलाम मेरे पांव के लिए चिराग़ और मेरी राह की रोशनी है।” और वा’दा करता है कि मैं तेरी सदाक़त के अल्फाज़ों को हिफ़्ज़ कर रखूँगा।
(सामक) (113 से 120) में चूँकि वो ख़ुदावन्द की शरी’अत से ख़ास उन्स (मुहब्बत) रखता है, तमाम बदकारों को अपने से दूर रखता है।
(ऐन) (121 से 128) में अर्ज़ करता है कि “ऐ ख़ुदावन्द, मुझको ज़ालिमों से महफ़ूज़ और मामून रख।” क्योंकि वो ख़ुद भी अदालत को पेश-ए-नज़र रखता है।
(पे) (129 से 136) ख़ुदावन्द की शहादतों को याद करके कहता है कि “तेरे कलाम का मुकाशफ़ा रोशनी बख़्शता है और सब सादा लोगों को फ़हम अता करता है।”
(सादे) (137 से 144) अपने जज़्बात-ए-ग़ैरत का यूं इज़्हार करता है कि मेरी ग़ैरत मुझे इसलिए खा गई कि मेरे दुश्मनों ने तेरी बातों को फ़रामोश किया है।
(क़ौफ़) (145 से 152) में वो ख़ुदावन्द पर भरोसा रखता है और कहता है कि “चूँकि मेरा भरोसा तुझ पर है, मैं तेरे हुक़ूक़ हिफ़्ज़ करूँगा और तुझसे अर्ज़ भी करूँगा।”
(रेश) (153 से 160) में इस सबब से कि उसने शरी’अत को फ़रामोश न किया, मुसीबत में ख़ुदावन्द की मेहरबानी और तरस का मुहताज व तालिब है और कहता है कि “ऐ ख़ुदा, मुझको अपनी रहमत के मुताबिक़ ज़िंदगी बख़्श।”
(शीन) (161 से 168) में कहता है कि उनको, जो तेरी शरी’अत रखते हैं, बड़ा चैन है और किसी तरह से ठोकर नहीं लगती।
(ताव) (169 से 176) में कहता है कि “जब तू मुझे हुक़ूक़ सिखाएगा, मेरे लबों से तेरी सताइश निकलेगी और मेरी ज़बान तेरे कलाम का चर्चा करती रहेगी कि तेरे सब काम सदाक़त हैं।” बा’ज़ मुफ़स्सिरीन का गुमान है कि ये ज़बूर मसीह ख़ुदावन्द की कमाल कामिलियत पर दलालत करता है कि जिस तरह इब्रानी हुरूफ़-ए-तहज्जी के अव्वल व आख़िर हुरूफ़ में सारे हुरूफ़ मौजूद हैं, उसी तरह मसीह में उलूहियत और इन्सानियत की कमालियत मौजूद है। चुनान्चे (मुकाशफ़ा 1:8) में मसीह ख़ुद यूनानी हुरूफ़ के अव्वल व आख़िर लेकर अपनी निस्बत कहता है कि “मैं अल्फ़ा और ओमेगा, अव्वल और आख़िर, जो है, और जो आने वाला है, क़ादिर-ए-मुतलक़ हूँ।”
(ज़बूर 120): म’अलात, या’नी चढ़ने का ज़बूर है। इस ज़बूर से ज़बूरों का नया सिलसिला शुरू होता है, जो उस वक़्त इस्तिमाल होते थे जब बनी-इस्राईल क़ाफ़िलों में सालाना ईदों के लिए यरूशलेम को जाते थे। इस सिलसिले में 15 (ज़बूर), या’नी (120 से 134) ज़बूर हैं। बा’ज़ मुफ़स्सिरीन का ख़याल है कि उन अय्याम में ये 15 ज़बूर एक छोटी किताब में मुजल्लद (जिल्द-बंद) थे, ताकि लोग उसे हमराह रख सकें और उसको गाते हुए बख़ूबी सफ़र तय करें। और कि एज़्रा फ़क़ीह ने उनको असीरी के बाद मौजूदा सूरत में तालीफ़ किया था। ये सब ज़बूर, सिवाए (ज़बूर 132) के, छोटे-छोटे हैं और ऐसे दिल-चस्प हैं कि बाआसानी अज़बर (ज़बानी याद) हो सकते हैं। मुल्क-ए-स्पेन के एक मुफ़स्सिर ने इन ज़बूरों की निस्बत कहा:
“ये 15 ज़बूर दूसरे ज़बूरों की निस्बत ऐसे हैं कि जैसे बाग़-ए-अदन दूसरी ज़मीन की निस्बत ज़्यादा सरसब्ज़ व शादाब और ख़ुशनुमा था।” जातरी लोग, या’नी इस्राईल, यरूशलेम को जाते हुए सफ़र के मौक़े पर रवानगी में (ज़बूर 120) गाया करते थे, क्योंकि वो ख़्वाहिशमंद थे कि उनका सफ़र बाबरकत और नेक अंजाम हो। और वो इस बात पर अफ़्सोस करते थे कि उनकी सुकूनत उन लोगों के दरमियान थी जिनसे वो रुहानी इमदाद हासिल नहीं कर सकते थे। ऐसी हालत में वो यहोवा को पुकारते थे और वो उनको जवाब देता था। तब वो रवाना होते थे और हर एक शख़्सी तौर पर अर्ज़ करता था कि “ऐ ख़ुदा, मेरी ज़बान को झूटे होंटों और दग़ाबाज़ ज़बान से रिहाई दे।”
और ख़ुद भी ऐसी ज़बान से मुख़ातिब हो कर उसे मलामत करता था। और इस बात पर कि मस्कन में सुकूनत-पज़ीर था और क़ेदार के ख़ेमों के पास रहता था, जो कि जंग-जू थे, अफ़्सोस भी करता था। अल-ग़र्ज़ वो इस सफ़र में कामिल ख़ुशी व मसर्रत और मस्कन की बरकात के हुसूल के लिए ज़ाहिरी और बातिनी सफ़ाई चाहता था।
(ज़बूर 121): इस में जातरी सफ़र के दौरान कहता है कि “मैं पहाड़ों की तरफ़ आँखें उठाता हूँ।” या’नी चलता हुआ अपनी आँखें पहाड़ों की तरफ़ उठाता हूँ, जिन पर शहर यरूशलेम आबाद है, जिसमें ख़ुदावन्द का मस्कन है। यहां यहोवा सुकूनत करता है। जातरी बाएं या दाएं सिम्त नहीं बल्कि सीधा अपने सामने यहोवा की तरफ़ देखता है, क्योंकि उसकी कुमक उसी की तरफ़ से आती है। वही इस्राईल का मुहाफ़िज़ है, जो हरगिज़ न ऊँघेगा न सोएगा। सो रात को या दिन को उसे कोई ज़रर न पहुँचेगा।
चुनान्चे (6 से 8) आयात में लिखा है कि दिन को आफ़्ताब से और रात को माहताब से कुछ ज़रर (नुक़्सान) नहीं पहुँचेगा। और ख़ुदावन्द हर एक बुराई से तेरी जान को महफ़ूज़ रखेगा, और इस वक़्त से लेकर अबद तक तेरी आमदो-रफ़्त में तेरा निगेहबान होगा।
(ज़बूर 122): इस में जातरी इज़हार-ए-मसर्रत करता है कि इस क़ाफ़िले ने, जो यरूशलेम को जा रहा था, उसे मद’ऊ किया कि वो भी उनके हमराह जाए। चुनान्चे आयत (1) में कहता है कि “जब वो मुझे कहते थे कि आओ, ख़ुदावन्द के घर जाएं, तो मैं ख़ुश हुआ।” मा’लूम होता है कि जातरी यहोवा के घर की बरकात से ख़ूब वाक़िफ़ व आगाह है, क्योंकि वो इस से पहले भी वहां गया था। इस वास्ते वो यरूशलेम की तारीफ़ में कहता है कि वो उस शहर की मानिंद है जो ख़ूब बाहम पैवस्ता है और जिसमें फ़िर्क़े, और याह के फ़िर्क़े, इस्राईल की शहादत को चढ़ जाते हैं कि यहोवा के नाम की सताइश करें। यरूशलेम सिर्फ़-ए-इबादत का ही मर्कज़ नहीं था बल्कि उसमें अदालत के तख़्त, दाऊद के ख़ानदान के तख़्त, रखे हुए थे। आख़िर में वो यरूशलेम की सलामती के लिए दु’आ-ए-ख़ैर करता है कि “मैं ख़ुदावन्द अपने ख़ुदा के घर तेरी तरफ़ से ख़ैरीयत का तालिब हूँ।”
(ज़बूर 123): किसी मुफ़स्सिर ने कहा कि (ज़बूर 120) का नफ़्स-ए-मज़्मून ग़म में उम्मीद है। (ज़बूर 121) का मुसाफ़िरत में ईमान। (ज़बूर 122) का मुहब्बत और ख़ुशी। और (ज़बूर 123) का रहमत की इंतिज़ारी है।
चुनान्चे इसकी दूसरी आयत में आया है कि जिस तरह ग़ुलामों की आँखें अपने आक़ाओं के हाथों की तरफ़ और लौंडियों की आँखें अपनी बीबियों के हाथों की तरफ़ लगी रहती हैं जब तक कि वो हम पर रहम न फरमाए, तीसरी और चौथी आयात में जातरी ख़ुदावन्द से अर्ज़-पर्दाज़ है कि वो उन सब पर, या’नी क़ौम-ए-इस्राईल पर, रहमत फरमाए क्योंकि वो तहक़ीर और तज़हीक से ख़ूब सैर हो गए हैं।
(ज़बूर 124): इसका मज़्मून है कि “यहोवा इस्राईल का कामिल मददगार।” आयात (1 से 5) में जातरी कहता है कि “इस्राईल कहे कि अगर यहोवा की तवज्जोह हमारी तरफ़ न होती तो दुश्मन हमको निगल जाते। हम ग़र्क़ाब, (पानी में डूबा हुआ) हो जाते, और उमड़ते हुए पानी हमारी जान पर से गुज़र जाते।” मा’लूम होता है कि मुल्क-ए-मिस्र की ग़ुलामी से आज़ाद होने का वो वाक़ि’आ उनकी आँखों के सामने है।
आयात (6 से 8) में वो यहोवा को इस वास्ते मुबारक कहता है कि उसने इस्राईल को छुटकारा दिया है और कहता है कि उसने हमारी जान को चिड़िया की तरह सय्याद के जाल से छुड़ाया, कि जाल टूट गया और हम निकल भागे। यहोवा की गुज़श्ता बरकात और नेमतों पर ग़ौर करना अज़-बस मुफ़ीद है।
(ज़बूर 125): ये ज़बूर यहोवा पर तवक्कुल व एतिमाद करने वालों का इस्तिक़लाल और सलामती-ए-यरूशलेम की तश्बीह से ज़ाहिर करता है। चुनान्चे पहली दो आयात में ज़िक्र है कि जिनका तवक्कुल यहोवा पर है, वो कोह-ए-सीहोन की मानिंद मुस्तक़िल रहते हैं, या’नी जिस तरह वो पहाड़ों से घिरा हुआ है और दुश्मन से महफ़ूज़ है, उसी तरह वो भी जो यहोवा पर तवक्कुल रखते हैं उसकी पनाह में हर तरह से महफ़ूज़ व मा’मूर रहते हैं। आख़िर में मुसन्निफ़ जात्रियों से अर्ज़ करता है कि भले लोगों और वो जो सीधे दिल हैं, भलाई करो। और जो टेढ़ी राह पर भटक जाते हैं, उन्हें बदकारों के साथ रवाना करो। इस्राईल की निस्बत वो कहता है कि “इस पर सलामती हो।”
(ज़बूर 126): इस ज़बूर में असीर (गुलाम) अपनी आज़ादी व रिहाई पर इज़हार-ए-मसर्रत करते हैं। उनकी हालत ऐन पतरस की उस मौक़े की हालत की सी है, जब फ़रिश्ता उसे क़ैद से बाहर लाया और वो इस वहम में था कि ख़्व़ाब देख रहा है। रिहाई-याफ़्ता लोग यहोवा जिसने उनसे ऐसा बड़ा सुलूक किया, शुक्रगुज़ारी करते और कहते हैं कि ग़ैर-अक़्वाम के दरमियान चर्चा होता है कि यहोवा ने उनसे इस अम्र का बड़ा नेक सुलूक किया। और अर्ज़ करते हैं कि यहोवा बाक़ी-मांदा तमाम असीरों (गुलामों) को भी फिर लाए। आख़िर में मुसन्निफ़ कहता है कि जो आँसुओं से बोता है, वो ख़ुशी से गाता हुआ फ़स्ल काटेगा और ख़ुशी से पोलियाँ उठाए हुए घर आएगा।
(ज़बूर 127): सुलेमान का ज़बूर, म’अलात।
बा’ज़ मुफ़स्सिर कहते हैं कि ये ज़बूर सुलेमान की तस्नीफ़ नहीं है। गो सर-नामे में इसके नाम की वज़ह से नामज़द है। इस में कुछ मुहावरात व इस्तिलाहात हैं, जो कि अम्साल की किताब के मुहावरात व इस्तिलाहात से ऐन मुताबिक़त रखते हैं, मसलन (अम्साल 22:22 और 24:7) आयत।
नीज़ ये ज़बूर (अम्साल 10:22) की तफ़्सील है, जिसमें लिखा है कि “ख़ुदावन्द की बरकत ही दौलत बख़्शती है और उस पर कुछ मशक़्क़त नहीं ठहराता” की तफ्सील है। इस तरह गुमान गुज़रता है कि ये सुलेमान की अलैहदा तस्नीफ़ नहीं बल्कि उसकी तस्नीफ़ात में से लिया हुआ है। इसका लुब्बे-लुबाब ये मा’लूम होता है कि कामयाबी की हर एक सूरत ख़ुदावन्द की तरफ़ से है। चुनान्चे उसके मुतला’अ में ये आया है कि “जब ख़ुदावन्द ही घर न बनाए, तो बनाने वाले की मेहनत अबस है। और अगर ख़ुदावन्द ही शहर का निगहबान न हो, तो पासबान की बेदारी अबस है।” हासिलात सख़्त मेहनत पर मौक़ूफ़ नहीं हैं। और फ़र्ज़न्द ख़ुदावन्द करीम की तरफ़ से मीरास हैं। वो मर्द मुबारक है जिसने अपने घर को इससे भर लिया। क्योंकि वो दुश्मनों के मुक़ाबले में पेशमान नहीं होगा। जैसा कि इसकी चौथी आयत में लिखा है कि “बच्चे तीरों की तरह हैं जो कि एक पहलवान के हाथ हों।”
(ज़बूर 128): ये ज़बूर बख़सूसियत ख़ानदानी है। इसमें एक ख़ानदान की तस्वीर मिलती है, जिसमें सब अफ़राद ख़ुदावन्द का ख़ौफ़ रखते और उसकी राहों पर चलते हैं। इस कुंबे की निस्बत लिखा है कि वो अपने हाथों की कमाई खाएगा। और इसमें ख़ावंद की जोरू उस ताक की मानिंद होगी जो मेवे से भरपूर और बावर हो, और घर के इर्द-गिर्द फैली हो। और उसके बच्चे ज़ैतून के पौधों की मानिंद उसके मेज़ के इर्द-गिर्द होंगे। मुसन्निफ़ की तरफ़ से दु’आ है कि ख़ुदावन्द उसे सीहोन की तरफ़ से बरकत दे। और उसकी निस्बत पेशगोई के तौर पर कहता है कि “तू यरूशलेम की कामयाबी और अपने बच्चों के बच्चे देखेगा।”
(ज़बूर 129): इसमें इस्राईल अपने गुज़श्ता अहवाल का जायज़ा ले कर अपने दुश्मनों की बद-सुलूकी याद करता है। और इसके मुतला’अ में कहता है, “मेरी जवानी से उन्होंने बारहा मुझको सताया और दुख दिया। हलवाहों ने मेरी पीठ पर हल जोता और लघारियां लंबी कीं।” और ख़ुदावन्द की तारीफ़ में कहता है कि वो सादिक़ है और उसने शरीरों की रस्सियाँ काट डालीं। वो चाहता है कि जो सब सीहोन से बुग़्ज़ रखते हैं, शर्मिंदा हों और उलटे फिरें। और छत की घास की मानिंद हों, जो पेश्तर इसके कि उखाड़ी जाए, ख़ुश्क हो जाती है और जिससे काटने वाला अपनी मुट्ठी नहीं भरता और न पोलीयाँ बाँधने वाला अपने दामन को। आख़िर में, या’नी मक़ता’अ् में, इस्राईल कहता है कि “हम ख़ुदावन्द का नाम लेकर यरूशलेम के लिए दु’आ करते हैं।”
(ज़बूर 130): एक दफ़ा किसी ने मार्टिन लूथर से सवाल किया कि ज़बूरों में सबसे आ’ला कौन सा ज़बूर है। लूथर ने जवाब दिया कि “सालीमी पालीनी”, या’नी कि पौलूस के ज़बूर। और जब सवाल हुआ कि वो कौन से हैं, तो उसने कहा कि (ज़बूर 32, 51, 130, 143) पौलूस के हैं। क्योंकि इनमें ये ता’लीम है कि गुनाहों का इज़ाला और तलाफ़ी शरी’अत या आमाल के सालेह पर नहीं बल्कि ईमान पर मबनी है। और नादिर व सहीह और तसल्ली-बख़्श ता’लीम ख़ुसूसियत के साथ पौलूस की है। उसने सिखाया कि हम फ़ज़्ल ही से बचेंगे, नजात सवाब और कार-ए-ख़ैर पर नहीं बल्कि फ़ज़्ल और सिर्फ़ फ़ज़्ल ही पर मौक़ूफ़ है। बा’ज़ लोग ख़ुद मानते हैं कि तीर्थ और हज में सवाब है, लेकिन इस्राईली जातरी जो कि यरूशलेम की तरफ़ सफ़र करता है, इस बात का क़त’ई मुन्किर है और कहता है कि “ऐ ख़ुदावन्द, मैं गहराईयों में से तुझे पुकारता हूँ।” क्योंकि इज़ाला-ए-ज़ुनूब (गुनाह की मु’आफ़ी) तुझ ही से हो सकता है। इस ज़बूर में दो हिस्से हैं।
(हिस्सा अव्वल) (1 से 4) में वो शख़्स, जो कि अपनी गुनाह-आलूदगी मा’लूम करता है, मुल्तमिस है और ज़ारी से पुकारता है कि: “ऐ ख़ुदावन्द, मेरी आवाज़ सुन और मेरी मिन्नत की आवाज़ पर कान मुतवज्जह कर।” अगर तू गुनाह का हिसाब ले, तो कौन खड़ा रहेगा? सो वो फ़ज़्ल का मुहताज और तालिब है और कहता है कि “ऐ ख़ुदावन्द, तेरे पास मग़्फ़िरत है ताकि लोग तेरा ख़ौफ़ रखें।”
(हिस्सा दुव्वम) (5 से 8) आयत में वो कहता है कि मैं ख़ुदावन्द का मुंतज़िर हूँ और मेरी जान उसकी इंतिज़ारी करती है। मुझे उसके कलाम का भरोसा है। और मेरी जान पासबानों से भी ज़्यादा, जो सुबह के मुंतज़िर होते हैं, ख़ुदावन्द का इंतिज़ार करती है। वो इस्राईल को मज़ीद ताकीद करता है कि वो ख़ुदावन्द पर तवक्कुल करें। क्योंकि रहमत उसके पास है और उसके पास कस्रत से मख़लिसी है। सो वही इस्राईल को रिहाई देगा।
(ज़बूर 131): दाऊद का ज़बूर, म’अलात। ये बच्चों का ज़बूर है। मसीह ने शागिर्दों से फ़रमाया था कि “मैं तुमसे सच कहता हूँ कि अगर तुम लोग तौबा न करो और छोटे बच्चों की मानिंद न बनो, तो तुम आसमान की बादशाहत में हरगिज़ दाख़िल न होगे।” (मत्ती 18:3)
इस ज़बूर में मुतअद्दिद ख़वास का बयान है, जो कि बच्चों में ख़ुसूसियत से पाए जाते हैं और उन के वास्ते मूजिब-ए-बरकत होते हैं। मसलन, फ़िरोतनी। बच्चों की फ़िरोतनी में बुलंद-पायगी का ख़याल मक़्सूद होता है। इस ज़बूर के मुतला’अ में, या’नी आयत अव्वल में लिखा है कि “ऐ ख़ुदावन्द, मेरा दिल मगरूर नहीं और मेरी नज़र बुलंद नहीं। मैं दक़ीक़ (गहरे, पोशीदा) मु’आमलात और उनमें, जो मेरे लिए अजूबा हैं, दख़ल नहीं करता।” बच्चों में ऐन इता’अत और फ़रमांबर्दारी होती है। ये सिफ़त अक्सर मुसीबत से पैदा होती है। चुनान्चे ख़ुदावन्द मसीह ने अज़िय्यत से ही सीखी। देखो (इब्रानियों 5:8) में लिखा है कि “अगरचे वो बेटा था, तो भी उसने उन दुखों से, जो उसने उठाए, फ़रमांबर्दारी सीखी।” मुसन्निफ़ इस ज़बूर में कहता है कि “मैं उस बच्चे की मानिंद हूँ जिसका दूध छुड़ाया गया हो। मैंने अपने जी को ठंडा किया, तो उसे इक़रार हुआ, जिस तरह कि दूध छुड़ाए हुए बच्चे को होता है, जो अपनी माँ के पास होता है।” मक़ता’अ् (ज़बूर का आख़िरी शे’अर) में क़ौम इस्राईल को हिदायत है कि इस दम से अबद तक ख़ुदावन्द पर तवक्कुल करे।
(ज़बूर 132): ये ज़बूर सिलसिला-ए-म’अलात में सबसे लंबा ज़बूर है। इसका मक़्सद तस्नीफ़ यहोवा को उसके सीहोन को बरकत देने के वा’दे की याद दिलाना है और इस्राईल का क़ाबिल-ए-बरकत होना दिखलाना है। इसमें दो हिस्से हैं।
(हिस्सा अव्वल) आयात (1 से 10) में इस्राईल ख़ुद को बरकत का मुस्तहिक़ समझता है।
(हिस्सा दुव्वम) आयत (11 से 18) में यहोवा की तरफ़ से इसका जवाब है। हिस्सा अव्वल में दो ख़ास बातें हैं।
(1) (1 से 5) आयत में दाऊद का, जो कि इस्राईल का बादशाह था, मिन्नत मानने का बयान है, जिसमें यहोवा के साथ उसकी वफ़ादारी ज़ाहिर की गई है। दाऊद ने चाहा कि वो यहोवा के लिए घर बनाए। चुनान्चे इन आयात में कहता है कि “यक़ीनन मैं रहने के डेरे में न जाऊँगा और पलंग के बिछौने पर न चढ़ूँगा, जब तक कि यहोवा के लिए एक मकान और याक़ूब के क़ादिर-ए-मुतलक़ के लिए एक मस्कन न बनाऊँ।”
(2) आयात (6 से 10) आयत में अहद के संदूक़ के लिए इस्राईल का तफ़क्कुर दिखाया गया है। वो कहते हैं कि “देखो, हमने उसकी ख़बर एफ़राता में सुनी, हमने उसको ब्याबान के मैदानों में पाया।” इस पर यहोवा को दा’वत दी गई है कि: “उठा ले यहोवा, तू और तेरे अहद का संदूक़ अपनी आरामगाह में दाख़िल हों। तेरे काहिन सदाक़त से मुलब्बस हों और तेरे मुक़द्दस लोग ख़ुशी से ललकारें।” फिर दु’आ है कि: “ऐ ख़ुदावन्द, अपने दाऊद की ख़ातिर अपने चेहरे को न फेर।”
(हिस्सा दुव्वम) की आयात 11 और 12 में यहोवा इस्राईल को वा’दा-वफ़ाई याद दिलाने को कहता है कि “मैंने सच्चाई से दाऊद के लिए क़सम खाई है। सो बेवफ़ाई न करूँगा। मैं तेरे पेट के फल में से किसी को तेरे तख़्त पर बिठाऊँगा। और अगर तेरे लड़के मेरे अहद को और मेरी शहादत को हिफ़्ज़ करें, तो उनके लड़के भी अबद तक तेरे तख़्त पर बैठे चले जाएँगे।”
आयात (13 से 18) में ज़िक्र है कि यहोवा ने सीहोन को पसंद किया और उसे चुन लिया कि वो उसके लिए मस्कन हो। और कहा कि: “मेरे चैन का ये अबदी मकान है। मैं इसमें बसूँगा क्योंकि मैं इस पर राग़िब हूँ। इसके अस्बाब-ए-माल में बहुत बरकत दूँगा, इसके मिस्कीनों को रोटी से सैर करूँगा। और इसके काहिनों को नजात का लिबास पहनाऊँगा और इसके मुक़द्दस लोग ख़ुशी से ललकारेंगे। वहाँ मैं ऐसा करूँगा कि दाऊद के लिए एक सींग फूट निकलेगा। मैंने अपने ममसूह के लिए एक चिराग़ तैयार कर रखा है। और ख़जालत को इसके दुश्मन का लिबास करूँगा, लेकिन इसके सर पर इसका ताज चमकता रहेगा।”
(ज़बूर 133): दाऊद का ज़बूर, म’अलात।
इस ज़बूर में उन लोगों की तारीफ़ है जो यरूशलेम में जमा होकर मुहब्बत के बूद-बाश करते हैं। जातरी इस नज़ारे को देखकर बहुत ख़ुश होता है और इस यगानगत की तारीफ़ में कहता है कि “देखो, क्या ख़ूब और सुहानी बात है कि भाई एक साथ बूद-बाश करें।” ये सब लोग मुख़्तलिफ़ ममालिक और मुल्क-ए-कनआन के मुख़्तलिफ़ हिस्सों से आए थे। ऐसी जमा’अत की एक तस्वीर (आमाल 2:9–11) में है, कि यहाँ इन अक़्वाम और ममालिक के नाम कि जिन में से वह दर्ज हैं। या’नी कि पारथी, मादी, एलामी, मिसोपोटामिया, कप्पदूकिया, पंतुस, एशिया, फ़िरूगिया, पम्फूलिया, मिस्र और लुबिया के हिस्से के बाशिंदे, करीनी, और रूमी मुसाफ़िर, और यहूदी मुरीद और अरब, सब के सब मुहब्बत और इत्मीनान के साथ रहते हैं। जातरी यरूशलेम में पहुंचकर और ये सब कुछ देखकर इस हालत को इत्र और हरमोन की ओस से तश्बीह देकर कहता है कि: “ये उस अमंग मिले इत्र की मानिंद है कि जो कि सर पर डाला जाए और बा-किरदार पर ही नहीं बल्कि हारून की डाढ़ी से होकर उसके पैराहन के गिरेबान तक पहुंचे।” इस से ये सब अहलियान-ए-यरूशलेम का यहोवा की ख़िदमत के लिए मख़्सूस होना मुराद है। फिर ज़िक्र है कि जिस तरह कोह-ए-हर्मोन की ओस ज़मीन को शादाब और ज़रख़ेज़ बनाती है, उसी तरह मसीही मुहब्बत मसीही जमा’अत की यकजहती और कामयाबी का बा’इस है। क्योंकि ऐसी मुहब्बत वाली जगह की निस्बत ख़ुदावन्द ने बरकत और हयात-ए-अबदी का हुक्म फ़रमाया है।
(ज़बूर 134): ये म’अलाती सिलसिले का आख़िरी ज़बूर है। मा’लूम होता है कि सब जातरी यरूशलेम से मु’अर्राज’अत (बुलंदी) के मौक़े पर ख़िदमत-गुज़ारों को, जो रात को ख़ुदावन्द के हुज़ूर ख़िदमत में खड़े रहते थे, ताकीद करते हैं कि “ऐ यहोवा के सब बंदों, जो रात को यहोवा के घर में खड़े रहते हो, यहोवा को मुबारक कहो।” चाहिए कि वो, जो हमेशा यहोवा के घर में रहते हैं, इस इस्तिहक़ाक़ (कानूनी हक़) के लिए यहोवा की शुक्रगुज़ारी करें। इस ताकीद के जवाब में वो लोग कहते हैं कि “यहोवा, जो आसमान और ज़मीन का ख़ालिक़ है, तुझे सीहोन में से बरकत बख़्शे।”
(ज़बूर 135): ये हालेलूयाह का ज़बूर है। इसमें ख़ास तौर पर यहोवा की तारीफ़ और सताइश की गई है और उन सबको, जो उसके घर और उसकी बारग़ाहों में खड़े रहते हैं, ताकीद है कि यहोवा की सताइश करें। और इसकी कई एक वजूहात बयान हैं। मसलन:
(1) (1 से 3) आयात में यहोवा अपनी ज़ात ही से तारीफ़ के लायक़ और मुस्तहिक़ है। वो नेक है और उसकी तारीफ़ करना पसंद है।
(2) (4 से 12) आयात में उसका शाहाना इख़्तियार दिखाया गया है। और बयान है कि यहोवा ने याक़ूब को अपने लिए चुन लिया और इस्राईल को अपने ख़ास खज़ाने के लिए मुंतख़ब किया है। वो बुज़ुर्ग है और जो कुछ उसने चाहा, सो आसमान, ज़मीन, दरियाओं और गहराओं में किया। उसने मिस्र के पहलौठों को मारा। फ़िरऔन और उसके सब ख़िदमत-गुज़ारों पर अजीब व ग़रीब काम दिखलाए। उसने बड़ी-बड़ी क़ौमों को मारा और ज़बरदस्त, या’नी अमोरियों के बादशाह सीहोन और बसान के शाह ऊज और मुल्क-ए-कनआन की सब ममलिकतों को क़त्ल किया। और उनकी ज़मीन अपने लोगों को मीरास में दी।
आयात (13 और 14) में यहोवा की तारीफ़ है कि वो अबदी है और उसका ज़िक्र पुश्त दर पुश्त रहेगा। क्योंकि वो अपने लोगों का इन्साफ़ करेगा और अपने बंदों की हालत की वजह से पछताएगा।
आयात (15 से 18) में ग़ैर-अक़्वाम के बुतों की कैफ़ियत बयान की गई है कि उनके बनाने वाले भी उन्हीं की मानिंद हैं, और हर एक जिनका उन पर भरोसा है, ऐसा ही है। इस्राईल, हारून और लावी के घरानों को और उन सबको जो यहोवा से डरते हैं, ताकीद है कि यहोवा को मुबारक कहें। आख़िर में ये बताया गया है कि यहोवा सीहोन में मुबारक है, वो यरूशलेम में बस्ता है। हालेलूयाह।
(ज़बूर 135, 136): ज़बूर में यहोवा के लोगों की निस्बत एक ख़्वाहिश है कि वो यहोवा की सताइश करें। और (ज़बूर 136) में ख़्वाहिश है कि उसके लोग उसकी शुक्रगुज़ारी करें। और इसके कई एक सबब बताए गए हैं।
(1) यहोवा भला है और उसकी रहमत अबदी है, और इलाहों का इलूहीम है, और उसकी शफ़क़त अबद तक है (1 से 3)।
(2) वही अकेला बड़े अज़ीम काम करता है (आयत 4)।
(3) उसने निहायत ख़ुश-उस्लूबी और कामिलियत के साथ कायनात ख़ल्क़ की, और ये काम दानाई से हुआ है (आयत 5 से 9)।
(4) उसने इस्राईल को ग़ुलामी से रिहाई दी और क़वी हाथ और बढ़ाए हुए बाज़ुओं से छुड़ाया (आयत 10 से 15)।
(5) उसने अजीब तरीक़े से उनकी परवरिश फ़रमाई, ब्याबान में उनकी रहनुमाई की, और नामवर सलातीन जान से मारे, और उनकी सरज़मीन मीरास में बनी-इस्राईल को दी (आयत 16 से 22)।
(6) उसने उनकी रांदा (धुत्कारा हुआ, ख़ारिज) और पस्ती में उसको याद फ़रमाया और दुश्मनों से रिहाई दी (आयत 23 से 24)।
(7) वो जानदारों को भूल नहीं जाता, बल्कि उनमें से हर एक का रोज़ी-रसां है (आयत 25)।
(8) वो आसमानों का ख़ुदा सबसे आ’ला और क़वी है, और इस सब पर मुसल्लत है। सो उसकी शुक्रगुज़ारी ज़रूरी है (आयत 26)।
(ज़बूर 137): ये ज़बूर इस्राईली असीरों (क़ैदियों) का है, जब वो असीर होकर मुल्क बाबेल में पहुंचाए गए थे। उस वक़्त उनके असीर करने वालों ने उनसे कहा कि वो सीहोन के गीतों में से कोई एक गाएँ। इस ज़बूर में उनकी एक अजीब तस्वीर है कि हम उनको बाबेल की नदियों के किनारे बैठे देखते हैं। वो मग़्मूम (ग़मज़दा) हैं और सीहोन, अपने मुल्क की याद में रोते हैं। उनकी बरबतें और मौसीक़ी के साज़ बेद के दरख़्तों से लटक रहे हैं। ये मा’लूम नहीं कि मुल्क के चार दरियाओं या’नी इफ़रात, दजला, ओलाई और ख़ैबोर, जिनका ज़िक्र बाइबल में हुआ है, में से किस दरिया पर वो बैठे हुए थे। वो मग़्मूम नज़र आते हैं और अपने सताने वालों को, जो चाहते थे कि वो ख़ुशी मनाएँ, जवाब देते हैं कि “हम यहोवा के गीत ग़ैर-मुल्क में क्योंकर गाएँ?” ऐसा मा’लूम होता है कि उन्हें हर हालत में ख़ुश रहना बिल्कुल नहीं सीखा। वो अदोम की मुख़ालिफ़त याद करते और उन पर लानत करते हैं, क्योंकि वो यरूशलेम की बर्बादी पर राज़ी थे। अबदियाह नबी की किताब में उनकी मुख़ालिफ़त की ख़ूब तफ़्सील है। चुनान्चे (अबदियाह 1:10) में लिखा है कि “उस क़त्ल के बा’इस और उस ज़ुल्म के सबब, जो तू ने अपने भाई याक़ूब पर किया है, तू ख़जालत से मुलब्बस होगा और अबद तक नेस्त रहेगा।”
आयात (5 और 6) आयत में वो सब यरूशलेम से अपनी मुहब्बत ज़ाहिर करते हैं, और उनमें हर एक ये कहता है कि “ऐ यरूशलेम, अगर मैं तुझे भूल जाऊँ, तो ऐसा हो कि मेरा दहिना हाथ अपना हुनर भूल जाए। और अगर मैं तुझे याद न रखूँ और अपनी अज़ीज़-तर ख़ुशी से ज़्यादा न जानूँ, तो मेरी ज़बान मेरे तालू से चिमट जाए।” (7 से 9) आयत में वो अदोम और बाबेल की बदसुलूकी के बा’इस उन पर लानत करते हैं और चाहते हैं कि ख़ुदा ख़ुद उनसे इंतिक़ाम ले।
(ज़बूर 138): ये दाऊद का ज़बूर है। इस से आठ ज़बूरों का एक सिलसिला शुरू होता है, जो (ज़बूर 138 से 145) तक बासिलसिला यक-बाद-दीगरे आते हैं। इसका नफ़्स-ए-मज़्मून (2 समुएल 7:28) आयात का वा’दा है, जो यहोवा ने दाऊद से फ़रमाया कि नजात देने वाला उसकी नस्ल से पैदा होगा। इस वा’दे के बिना पर सज़ा भी जो कि साँप को मिली, जबकि उसने हव्वा को बहकाया और ख़ुदा ने उस पर लानत की कि औरत की नस्ल उसे कुचलेगी। इस ज़बूर की चाबी दुसरे समुएल के 7 वें बाब में है। इसमें तीन हिस्से हैं।
हिस्सा अव्वल। (1 से 3) आयात में क़ाबिल मुसन्निफ़ ख़ुदा से मुख़ातिब हो कर कहता है कि मैं अपने सारे दिल से तेरी सताइश करूँगा। इलाहों के आगे तेरी रहमत और सच्चाई के सबब तेरी सना-ख़्वानी करूँगा। क्योंकि इस एक वा’दे से तू ने अपने नाम को अपने सब अजीब और क़ुदरत वाले कामों से ज़्यादा इज़्ज़त और जलाल बख्शा है।
बेशक ख़ुदावन्द ने बनी-इस्राईल को मिस्र की ग़ुलामी से रिहाई बख़्शी और अपने नाम को इज़्ज़त दी। लेकिन उस के बेटे के तजस्सुम से उस को ज़्यादा इज़्ज़त मिली जब कि उसने उस के वसीले से अपने सब बर्गुज़ीदा लोगों को रिहाई बख़्शी।
हिस्सा दुव्वम। (4 से 6) आयात में मुसन्निफ़ कहता है कि किसी बादशाह ने इस से पेश्तर ऐसी ख़ुशख़बरी नहीं पाई थी। कि जब ये वा’दा पूरा होगा तो सारी दुनिया के लोग फ़राहम होंगे कि यहोवा की सताइश करें। चुनान्चे वो कहता है कि “ऐ ख़ुदावन्द, ज़मीन के सब बादशाह तेरे मुँह का कलाम सुनेंगे और तेरी सताइश करेंगे।” यहां वो ख़ुदा की राहों में गाते हैं कि “ख़ुदावन्द का जलाल बड़ा है। वह बुलंद है और पस्त पर तवज्जोह करता और मगरूरों को दूर से पहचानता है।”
हिस्सा सोइम। आयात (7 से 8) में मुसन्निफ़ अर्ज़ करता है कि यहोवा उस के लिए उस के काम को अंजाम दे, या’नी कि यहोवा उसे बचाए और उसे तर्क न करे। मुसन्निफ़ इस अजीब वा’दे के लिए ख़ुदावन्द की सताइश करता है।
(ज़बूर 139): दाऊद का ज़बूर। इस में यहोवा की चंद सिफ़ात बयान हुई हैं। मुसन्निफ़ दिखाता है कि यहोवा हमा-दान है, हर जगह हाज़िर है और क़ादिर-ए-मुतलक़ है। मुसन्निफ़ महसूस करता है कि यहोवा ने सरासर घेर लिया है, या’नी कि वो उस के ऊपर, नीचे, बाहर और भीतर है। और कि वो बग़ैर यहोवा के मुतलक़न कुछ नहीं कर सकता। उस की फ़े’ल (काम, अमल) मुख्तारी भी क़ायम और बहाल रहती और यहोवा बतौर एक मालिक रहीम के उस पर हुकूमत करता है। इस ज़बूर में चार हिस्से हैं।
हिस्सा अव्वल। आयात (1 से 6) में मुसन्निफ़ यहोवा की हमादानी और उस के अलीम-ए-कुल होने का बयान करता है। क्योंकि वो मा’लूम करता है कि यहोवा ने उस को बख़ूबी पहचान लिया है। सो वो कहता है कि “तू ऐ यहोवा, तू मुझको जानता और पहचानता है। तू मेरा उठना और बैठना जानता है। तू मेरे अंदेशे को दूर से, या’नी पेश्तर इस से कि वो मेरे दिल में आए, दर्याफ़्त कर लेता है। इस तरह यहोवा की सिफ़ात का बयान है। छठी आयत में वो कहता है कि ऐसा इर्फ़ान मेरे लिए एक अजूबा है। वो बुलंद है और मैं उस तक पहुँच नहीं सकता।
हिस्सा दुव्वम। आयात (7 से 13) में मुसन्निफ़ यहोवा के हर जगह पर होने का ज़िक्र करता और कहता है कि वो हर कहीं मौजूद है। और तस्लीम करता है कि वो किसी तरह भी उस से भाग नहीं सकता। और कहता है कि अगरचे मैं आस्मान पर चढ़ जाऊँ, तो ऐ यहोवा, तू वहां है। अगर मैं अपना बिस्तर पाताल में बिछाऊँगा, तो देख, तू वहां भी है। अगर सुबह के पंख लगा कर समुंदर की इंतिहा में जाऊँ, तो वहां भी तेरा हाथ मुझे ले चलेगा और तेरा हाथ मुझे सँभालेगा। कि तारीकी मुझे छुपा न सकेगी। क्योंकि यहोवा की हुज़ूरी के सामने तारीकी ठहर नहीं सकती, उस की तजल्ली के सामने वो काफ़ूर हो जाती है।
हिस्सा सोइम। (13 से 18) आयात में मुसन्निफ़ कहता है कि यहोवा का अलीम-ए-कुल और हर जगह हाज़िर होना उस की क़ुद्रत-ए-मुतलक़ पर मुन्हसिर है, कि वो इंसान से इस सबब से वाक़फ़ियत रखता है कि उसने इस को ख़ल्क़ किया। बदन की वजह से वो यहोवा की सताइश करता और कहता है कि “ऐ यहोवा, तेरी आँखों ने मेरे बे-तर्तीब माद्दे को देखा और तेरे सब दफ़्तर में ये सब चीज़ें लिखी हुई हैं। और उनके दिनों का हाल भी उसी वक़्त जब कि इनमें से कोई भी तहरीर नहीं हुआ कि वो कब वजूद में आएँगी।
हिस्सा चहारुम। आयात (19 से 24) आयात में मुसन्निफ़ इस वजह से कि वो यहोवा की सिफ़ात से वाक़िफ़ है, यहोवा के सब दुश्मनों से कीना रखता है। और इस ख़याल से कि शायद इस में भी कुछ कसर हो, पुकार कर कहता है कि “ऐ यहोवा, मुझको जांच और मेरे दिल को जान, और मुझ को आज़मा और मेरे अंदेशों को पहचान। देख कि मुझ में कोई दर्द-अंगेज़ आदत है कि नहीं। और मुझ को जवाबदेह राह में चला।
(ज़बूर 140): दाऊद का ज़बूर, सरदार मुग़न्नी के लिए।
इस में एक रास्तबाज़ शख़्स को शरीरों (बेदीनों) में घीरा हुआ देखते हैं। वो कामिल इत्मीनान में है और शरीरों (बेदीनों) की रुस्वाई और अपने बचाव का मुंतज़िर है। उस के तवक्कुल और इत्मीनान की वजह उसका तवक्कुल है, जो कि वो यहोवा पर रखता है। इस में चार हिस्से हैं क्योंकि लफ़्ज़ “सलाह” से एक-दूसरे से जुदा हुए हैं। लफ़्ज़ “सलाह” (ज़बूर 89) में इस्तिमाल हुआ है और इसके बाद इस ज़बूर में है। चुनान्चे इन पचास ज़बूरों में जो कि (89 और 140) के दरमियान हैं, ये लफ़्ज़ नहीं आता। इसकी कोई ख़ास वजह मा’लूम नहीं। क़रीबन कुल (40 ज़बूरों) में ये लफ़्ज़ है।
हिस्सा अव्वल। आयात (1 से 3) में मुसन्निफ़ यहोवा से दु’आ-गो है कि उसे इन शरीरों (बेदीनों) से रिहाई दे जिनसे वो घिरा हुआ है, क्योंकि साँपों की मानिंद वो अपनी ज़बानें तेज़ करते हैं और उनके होंटों के तले अफ़ई का ज़हर है। (सलाह)
हिस्सा दुव्वम। आयात (4 से 6) में मुसन्निफ़ रिहाई के वास्ते ये कह कर दु’आ करता है कि मगरूरों ने छुपकर मेरे लिए फंदे और रस्सियाँ तैयार की हैं। उन्होंने रहगुज़र में जाल बिछाया है। उन्होंने मेरे लिए दाम लगाए हैं। (सलाह)
हिस्सा सोइम। आयात (6 से 8) में मुसन्निफ़ ख़ुदावन्द को अपना शख़्सी नजात-दहिंदा तस्लीम करके उस से अर्ज़ करता है कि वो शरीर के मक़सद को पूरा न करे बल्कि उसके बुरे मंसूबों को अंजाम तक पहुँचने न दे। ताकि वो सर न उठाए। (सलाह)
हिस्सा चहारुम। आयात (9 से 13) में वो अर्ज़ करता है कि ऐ ख़ुदा, जिन्होंने मुझे चारों तरफ़ से घेर रखा है, उनसे ऐसा कर कि इनके होंटों की ज़िनाकारी उन्हीं के सर पर आ पड़े। और वो यहोवा की तरफ़ मुख़ातिब होकर अपने यक़ीन का दावा करता है कि वो मज़लूमों का इंसाफ़ करेगा और मिस्कीनों का बदला लेगा। और कहता है कि तब सादिक़ लोग फ़िल-हक़ीक़त तेरा नाम लेकर शुक्रगुज़ारी करेंगे और रास्तबाज़ सुकूनत करेंगे।
(ज़बूर 141): दाऊद का ज़बूर। इस ज़बूर की निस्बत मुफ़स्सिरीन कहते हैं कि इसका मतलब सफ़ाई के साथ अयाँ नहीं है। तो भी मुसन्निफ़ की दु’आ का मक़सद ये मा’लूम होता है कि हर तरह के बुरे काम से बचा जाए और ख़ुद को ख़ुदा की बादशाहत में इस्तिमाल किया जाए। ये ज़बूर तीन हिस्सों में मुनक़सिम है।
हिस्सा अव्वल। आयात (1 से 4) में मुसन्निफ़ दु’आ करता है कि उसकी दु’आ बख़ूर की तरह ख़ुदा के हुज़ूर पहुँचाई जाए। और कहता है कि मेरे हाथों का उठाना शाम की क़ुर्बानी की मानिंद हो। और अर्ज़ करता है कि वो अपने होंटों से क़सूर न करे। और इस ग़र्ज़ से वो ख़ुदावन्द से ये दु’आ करता है कि ऐ ख़ुदावन्द, मेरे मुँह पर निगहबान बिठा, मेरे होंटों के दराज़ों की दरबानी कर। मेरे दिल को किसी बुरी बात की तरफ़ माइल न होने दे कि वो बदकारों में शामिल होकर बदकारी न करे।
हिस्सा दुव्वम। आयात (5 से 6) में वो कहता है कि अगर सादिक़ मुझको मारे तो वो मेहरबानी है। और अगर वो मुझको तम्बीह दे तो मेरे लिए सर का रोग़न है। अगर वो दोबारा भी करे तो मेरा सर इस से इंकार न करेगा बल्कि जब कि वो मुसीबत में गिरफ़्तार हो तो मैं उसके लिए दु’आ माँगूँगा।
हिस्सा सोइम। आयात (7 से 8) में वो दावा करता है कि अगरचे दुश्मन हम पर ग़ालिब भी आएं, तो भी मेरी आँखें तेरी तरफ़ लगी रहेंगी। मेरा तवक्कुल तुझ पर है। तू मुझको उस जाल से बचा जो उन्होंने मेरे लिए बिछाया और बदकारों के जालों से भी।
(ज़बूर 142): मुश्किल-ए-दाऊद। उस मौक़े की दु’आ है जब वो मग़ारा में था। (1 समुएल 22 बाब 1 आयत और 24) से मा’लूम होता है कि वो दो दफ़ा ग़ारों में पनाहगीर हुआ। पहली बार अदुल्लाम में और दूसरी दफ़ा ऐन-गदी के ग़ार में। इस ज़बूर से ये मा’लूम नहीं होता कि इस वक़्त वो किस मग़ारा में था। सिर्फ़ इतना मा’लूम है कि मग़ारे में उसने दु’आ मांगी और साऊल के हाथ से अजीब ढंग से बच गया। वो पौलूस और सीलास की मानिंद था, जिन्होंने क़ैद में गीत गाए और क़ैदख़ाने के दरवाज़े उनके लिए खुल गए। इस ज़बूर में कोई ख़ास हिस्सा नहीं। दाऊद तंगी और ख़तरे में पड़कर दु’आ करता है और बचाया जाता है। उसने दु’आ मांगने से पेश्तर अपनी तरफ़ से कोशिश की मगर कामयाब न हो पाया। चुनान्चे इसकी (4 और 5) आयात में मर्क़ूम है कि “मैंने अपने दहने हाथ पर निगाह की और देखा मगर कोई न पाया जो मुझको पहचानता हो। मुझे कहीं पनाह न मिली। कोई मेरी जान का हाल पूछता नहीं। तब मैं ख़ुदावन्द के हुज़ूर चिल्लाया और उस से कहा कि तू मेरी पनाहगाह है। मेरी रूह को क़ैद से रिहाई बख़्श ताकि तेरे नाम की सताइश हो। तब सादिक़ लोग मेरे आस-पास जमा होंगे जब तू मुझ पर एहसान करेगा।”
(ज़बूर 143): ये ज़बूर भी दाऊद का है। ये नादिमी ज़बूरों का आख़िरी ज़बूर है। और क़दीम नुस्ख़ों में ये बताया गया है कि इसकी तस्नीफ़ उस वक़्त हुई जब दाऊद अबी सलोम की बग़ावत के अय्याम में यरूशलेम से भागा। इस ज़बूर में मुसन्निफ़ हिफ़ाज़त, रहनुमाई और मु’आफ़ी के लिए यहोवा से मुल्तमिस है। उसको यक़ीन है कि गुनाह के सबब उस पर ये मुसीबत आई और वो शर्मिंदा होकर कहता है कि यहोवा उसको रास्ती में ले चले। इस ज़बूर में दो हिस्से हैं।
हिस्सा अव्वल। आयात (1 से 6) ये हिस्सा ख़ासकर फ़र्यादी है। आयात (1 से 2) में मुसन्निफ़ यहोवा की तवज्जोह अपनी तरफ़ खींचना चाहता है। इस वास्ते नहीं कि वो उसको अदालत में लाए, बल्कि वो उस पर रहमत करे। चुनान्चे वो कहता है कि अपने बंदे को अपने साथ अदालत में न ला, क्योंकि कोई इंसान जीती जान तेरे हुज़ूर खड़ा नहीं रह सकता।
आयात (3 से 6) में वो दुश्मन की शिकायत करके कहता है कि वो मेरी जान के पीछे पड़ा है, कि उसने मेरी ज़िंदगी को ख़ाक पर पामाल किया। उसने मुझको उसकी मानिंद जो मुद्दत से मर गया हो, तारीकी में बिठाया है। इसलिए मेरा जी उदास हो गया है। और मैं अपने हाथ तेरी तरफ़ बढ़ाता हूँ, क्योंकि मेरी रूह ख़ुश्क ज़मीन की मानिंद तेरी प्यासी है। (सलाह)
हिस्सा दुव्वम। आयात (7 से 12) में मुसन्निफ़ अपनी इल्तिमास पेश करता है और कहता है कि “ऐ यहोवा, जल्द मेरी सुन कि मेरी रूह तमाम होने पर है। मुझसे मुँह न मोड़, नहीं तो मैं उनकी मानिंद हो जाऊँगा जो गढ़े में गिरते हैं। सुबह के वक़्त अपनी शफ़क़त की आवाज़ सुना, क्योंकि मेरा तवक्कुल तुझ पर है। और अपनी राह, कि जिसमें चलूँ, मुझे बता क्योंकि मैं अपनी रूह को तेरी तरफ़ उठाता हूँ।
आख़िरी आयत में वो दुश्मन से रिहाई पाने के वास्ते फिर दु’आ करता है कि “मुझको अपनी मर्ज़ी की राह दिखला दे और कहता है कि तेरी नेक रूह मुझको रास्ती के मुल्क में ले चले। इस सबब से मैं तेरा बंदा हूँ। उन सबको जो मेरे जी को दुख देते हैं, नाबूद कर।
(ज़बूर 144): इस ज़बूर का मक़्सद ये मा’लूम होता है कि यहोवा की तारीफ़ की जाए। इस सबब से उसने बादशाह को इस क़ाबिल किया कि वो अपने सब दुश्मनों को मग़्लूब करे और रियाया के अमन व ईमान का बा’इस हो। ये ज़बूर दो हिस्सों में मुनक़सिम है।
हिस्सा अव्वल। आयात (1 से 11) ये हिस्सा और ज़बूरों से मुंतख़ब हुआ है। आयत अव्वल में मुसन्निफ़ यहोवा को, जो उसकी चट्टान है, मुबारक कहता है क्योंकि वो कहता है कि उसने मेरे हाथों को जंग करना सिखाया और उंगलियों को लड़ना सिखाया है। फिर अपनी ज़ाती नाक़ाबिलियत का ख़याल करके और यहोवा की तरफ़ मुख़ातिब होकर कहता है कि “ऐ यहोवा, इंसान क्या है कि तू उसे याद फ़रमाए? और आदमज़ाद कौन है जो तू उसे कुछ शुमार करे?”
आयात (5 से 11) में वो अपने दुश्मनों की बर्बादी और अपनी रिहाई के लिए यहोवा से मुल्तमिस है।
हिस्सा दुव्वम। आयात (12 से 15) में वो अपने दुश्मनों की बर्बादी के नताइज बयान करता है कि रियाया ख़ुश व ख़ुर्रम होगी। और हमारे बेटे अपनी जवानी में पौदों की मानिंद और हमारी बेटियाँ ज़ाविया की घड़ियों की मानिंद होंगी जो कि महल के अंदाज़ से ख़ुश-तराश हों। और कि हमारे मस्कन माला-माल होंगे। और गाय, बैल और भेड़-बकरियाँ बकस्रत होंगी। और हमारे बाज़ारों में किसी तरह की नालिश न होगी। और आख़िर में वो कहता है कि मुबारक है वो गिरोह जिसका ये हाल है। मुबारक है वो गिरोह जिसका ख़ुदावन्द हो।
(ज़बूर 145): दाऊद का सना-ख़्वानी का ज़बूर। ये हुरूफ़-ए-तहज्जी का आख़िरी ज़बूर है। (ज़बूर 9, 10, 25, 34, 37, में वह 111, 112, 119, 145) हुरूफ़-ए-तहज्जी के ज़बूर हैं। (ज़बूर 145) तहलील या’नी सना या हम्द का गीत कहलाता है। इब्रानी ज़बान में ज़बूर की किताब “तहलीम” या’नी सना की किताब कहलाती है। यहूदियों ने इस ज़बूर की बहुत क़द्र की। इस की निस्बत तल्मूद में मज़्कूर है कि अगर कोई दाऊद की तहलीम तीन मर्तबा रोज़ सुनाए तो उसको रोज़ तेयक़्क़ुन (यक़ीन) हो सकता है कि वो ख़ुदा की बादशाहत का फ़र्ज़न्द है। इसलिए इस ज़बूर की क़द्र सिर्फ़ तहज्जी ज़बूर होने की वजह से नहीं बल्कि इस वास्ते है कि इस में ज़ाहिर किया गया है कि ख़ुदा की परवरदिगारी में कुल मख़्लूक़ शामिल है।
तहज्जी ज़बूर होने के बावजूद इस ज़बूर में कुल (21) आयात हैं। सिर्फ़ नौ किसी वजह से हज़फ़ हैं। ये ज़बूर ख़ास-उल-ख़ास तारीफ़ाना है और सताइश के ज़बूरों के सिलसिले का शुरू है जो कि (ज़बूर 150) पर ख़त्म होता है। इस में यहोवा की सताइश उसकी शाहाना हैसियत और उसकी हुकूमत के सबब से की जाती है। इस में कोई ख़ास हिस्सा नहीं बल्कि इसमें चार ख़ास बातें पेश की गई हैं जिनके सबब उसकी सना-ख़्वानी होती है।
(1 से 6) आयात में यहोवा की ज़ाती ख़ूबियाँ पेश हैं। चुनान्चे आयात (3 से 4) में ज़िक्र है कि यहोवा बुज़ुर्ग है और निहायत सताइश के लायक़ है। और उसकी बुज़ुर्गी तहक़ीक़ से बाला-ए-तर है। और लिखा है कि हर एक पुश्त दूसरी पुश्त से तेरे कामों की सताइश करेगी और तेरी क़ुदरतों का बयान करेगी।
आयात (7 से 10) में यहोवा के एहसान और रहमत की तारीफ़ है। चुनान्चे आठवीं आयत में आया है कि यहोवा मेहरबान और रहीम है, ग़ुस्सा करने में धीमा और शफ़क़त में बढ़कर है। आयत दस में लिखा है कि तेरी सारी दस्तकारियाँ तेरी सना-ख़्वानी करती हैं और तेरे मुक़द्दस लोग तुझको मुबारकबाद कहते हैं।
आयात (11 से 13) में उसकी सल्तनत की निस्बत कहा गया है कि तेरे मुक़द्दस लोग तेरी सल्तनत का बयान करते और तेरी क़ुदरत का चर्चा करते हैं ताकि आदमज़ाद पर तेरी क़ुदरत और तेरी सल्तनत की जलील शौकत ज़ाहिर हो। तेरी बादशाहत अबदी है और तेरी हुकूमत पुश्त दर पुश्त क़ायम रहती है।
आयात (14 से 21) में यहोवा की परवरदिगारी और उसकी सदाक़त का बयान है। चुनान्चे पंद्रहवीं आयत में लिखा है कि सबकी आँखें तुझ पर लगी हैं, तू उन्हें वक़्त पर रोज़ी देता है।
(आयत 17) में लिखा है कि यहोवा अपनी सब राहों में सादिक़ और सब कामों में रहीम है। (21) आयत में मुसन्निफ़ कहता है कि मेरा मुँह यहोवा की सताइश का मज़्मून कहेगा। हाँ, हर एक बशर (इंसान) उसके मुक़द्दस नाम को मुबारक कहा करे।
(ज़बूर 146): ये हालेलूयाह का ज़बूर है और दीगर ज़बूरों की मानिंद शुरू और ख़त्म होता है। इस से हालेलूयाह का आख़िरी सिलसिला शुरू होता है जिसमें ज़बूर की किताब के आख़िरी पाँच ज़बूर हैं। इस ज़बूर का मक़्सद ये मा’लूम होता है कि इंसान की बहबूदी यहोवा पर यक़ीन रखने से है। इसके मज़्मून में मुतफ़र्रिक़ हिस्से नहीं हैं। इसमें सिर्फ़ यहोवा की तारीफ़ है। मुसन्निफ़ इसकी एक और दो आयात में अपना ही ज़िक्र करता है और अपनी जान से कहता है कि यहोवा की तारीफ़ कर। और दावा करता है कि जब तक मैं जीता हूँ तब तक मैं यहोवा की सताइश करूँगा और जब तक मौजूद हूँ उसकी सना-ख़्वानी करूँगा।
आयात (3 से 5) में वो कहता है कि अमीरों पर और आदमज़ादों पर तवक्कुल न करो, क्योंकि उनमें नजात देने की ताक़त नहीं है। जिस वक़्त उनका दम निकल जाता है तो वो अपनी मिट्टी में फिर जाते हैं और उसी दिन उनके मंसूबे फ़ना हो जाते हैं। और कहता है कि मुबारक है वो जिसकी कुमक याक़ूब का ख़ुदा है और जिसका तवक्कुल यहोवा उसके ख़ुदा पर है। आयात (6 से 9) में वो नौ वजूहात पेश करता है जिनके बा’इस यहोवा ही पर तवक्कुल और भरोसा रखना ज़रूरी है।
वो पैदा-कनिंदा (पैदा करने वाला) है और हमेशा अपनी सच्चाई को बरक़रार रखता है।
वो मुन्सिफ और दर्दमंद है। वो मज़लूमों का इन्साफ़ करता है और भूकों को रोटी देता है।
वो असीरों (क़ैदियों) को छुड़ाता है।
वो ख़ैरअंदेश है।
वो अँधों की आँखें खोल देता है।
यहोवा उनको जो ख़मदार या पस्त हो गए हैं, सीधा खड़ा करता है।
वो सादिक़ों को अज़ीज़ रखता है।
वो परदेसियों का निगहबान है और यतीमों और बेवाओं को सँभालता है।
यहोवा अबद तक सल्तनत करेगा। हाँ, तेरा ख़ुदा, ऐ सीहोन, पुश्त दर पुश्त। हालेलूयाह।
(ज़बूर 147): ये ज़बूर भी हालेलूयाह से शुरू और ख़त्म होता है। बा’ज़ मुफ़स्सिरीन कहते हैं कि ये ज़बूर बमए (ज़बूर 148, 149 और 150) के उस वक़्त तस्नीफ़ हुआ जब यरूशलेम की शहरपनाह तैयार हो गई। और तक़्दीस के वक़्त लावियों को उनकी सब जगहों से ढूँढते थे कि उन्हें यरूशलेम लाएँ। ख़ुशी और शुक्रगुज़ारी करें और सरोद, तबले और बरबत से शहरपनाह की तक़्दीस करें। गाने वालों के बेटे हर कहीं से यरूशलेम में फ़राहम हुए थे। (नहमियाह 11:37)
इस ज़बूर में यहोवा की सताइश के लिए तीन बुलाहटें हैं।
आयात (1 से 6) में कहा गया है कि यहोवा की सताइश करो, कि हमारे ख़ुदा की सना-ख़्वानी करना भला है। इस वास्ते कि वो हर दिल-अज़ीज़ है और उसकी सताइश करना शाइस्ता है। यहोवा यरूशलेम को ता’मीर करता है। वो इस्राईल के बिछड़े हुओं को जमा करता है। वो शिकस्ता-दिलों का इलाज करता है वग़ैरह-वग़ैरह।
आयात (7 से 11) में ये कि उसकी सताइश इसलिए की जाए कि वो फ़ायदा-ए-आम को मद्देनज़र रखकर आस्मान पर बदलियों का पर्दा डालता है, जो ज़मीन के लिए पानी तैयार करता है, जो पहाड़ों पर घास उगाता है, जो बहाईम और कव्वों के बच्चों को भी जो चिल्लाते हैं रोज़ी मुहय्या करता है।
आयात (12 से 20) में यरूशलेम को दा’वत दी गई है कि वो यहोवा की सताइश करे। उनसे मुख़ातिब होकर कहता है कि “ऐ यरूशलेम, उसने तेरे दरवाज़ों के बैंडों को मज़बूती बख़्शी और तुझमें तेरे बच्चों को बरकत बख्शी। और वो तेरे एतराफ़ में अमन बख़्शता और तुझको सुथरे से सुथरे गेहूँ से आसूदा करता है। वो अपना कलाम याक़ूब पर और अपने हुक़ूक़ और अदालतें इस्राईल पर ज़ाहिर करता है। उसने किसी क़ौम से ऐसा सुलूक नहीं किया और ना कोई इस से आगाह हुआ। हालेलूयाह।
(ज़बूर 148): ये भी हालेलूयाह का ज़बूर है। इसमें सारी मख़्लूक़ात, या’नी आसमान और ज़मीन, तलब किए जाते हैं कि यहोवा की सताइश करें। न सिर्फ़ जानदार बल्कि बे-जान अशियाऐं भी मद’ऊ हैं कि वो इस हम्द-ओ-सना में शरीक हों। ये बातें ज़ाहिर करती हैं कि मुसन्निफ़ का दिल सना से भरा हुआ है और वो ख़्वाहिशमंद है कि यहोवा की सताइश की जाये। वो वक़्त आता है कि जब सारी मौजूदात इंसान के साथ मिलकर नजात की ख़ुशी में शरीक होंगी, जिस तरह कि वो आदमज़ाद की बर्गश्तगी पर उसकी लानत में शरीक हुईं।
हिस्सा अव्वल। आयात (1 से 6) में आसमान तलब हैं कि यहोवा की सताइश करें: फ़रिश्तगान, सूरज, चाँद, सितारे और आसमानों का आसमान और पानी जो आसमानों के ऊपर है, सब के सब तलब किए गए हैं कि यहोवा की सताइश करें। इसलिए कि वो सब के सब उसी से ख़ल्क़ किए गए हैं और इनका क़ायम रहना उसी पर मुन्हसीर है।
हिस्सा दुव्वम। आयात (7 से 12) में सब कुछ जो ज़मीन पर है और समुद्र में है, या’नी आग, ओले, बर्फ़, बुख़ारात, हवा, पहाड़, टीले, फलदार दरख़्त, सब देवदार, सब जानवर, कीड़े-मकोड़े, परदार चिड़ियाँ, सब लोग, बादशाह, शहज़ादे, क़ाज़ी, जवान मर्द और कुँवारियाँ, सब के सब तलब किए गए हैं कि यहोवा के नाम की सताइश करें।
हिस्सा सोइम। आयात (13 से 14) में इसकी सताइश के अस्बाब बयान किए गए हैं। लिखा है कि वो यहोवा के नाम की सताइश करें क्योंकि उसका नाम अकेला आलीशान है। उसका जलाल ज़मीन और आसमान के ऊपर फैला है। और वही अपने लोगों के सींग को बुलंद करता है, यानी उसके पाक लोगों, बनी-इस्राईल या’नी उस क़ौम की जो उसके नज़दीक हैं, शौकत है। हालेलूयाह।
(ज़बूर 149): इस ज़बूर में यहोवा की बुलाहट है कि लोग उसकी सताइश करें और उसके लिए एक नया गीत गाएँ ताकि उसकी रूह लोगों को पाक करे। इस्राईल अपने ख़ालिक़ से शादमान हुए और बनी सीहोन अपने बादशाह की वजह से ख़ुशी करें। कलीसिया की तारीख़ से मा’लूम होता है कि ये ज़बूर आम म’अनों में समझा गया। कलीसिया ने इस ज़बूर को मसीही लोगों को जंग के वास्ते मुतहर्रिक करने के लिए इस्तिमाल किया। चुनान्चे..... केसपर शियोपियस (CASPER SCIOPIUS) ने इस ज़बूर के ज़रिये रोमन कैथोलिक कलीसिया को लूथर के अय्याम में तरग़ीब दी कि प्रोटैस्टैंट लोगों से लड़ाई करें, क्योंकि कलीसिया मुस्तहिक़ है कि सब क़ौमों पर हुक्मरानी करे। चुनान्चे छः (6) साला जंग छिड़ गई। नीज़ उन्हीं दिनों में थॉमस मंज़र (THOMAS MUNZAR) ने बैपटिस्ट लोगों को उभारा कि वो रोमन कैथोलिक और दीगर मसीही कलीसियाओं से लड़ाई करें और अपने फ़िर्क़े को क़ायम करें। और इसका नतीजा ज़मींदारों का जंग कहलाया। पौलूस ने ख़ूब कहा है कि “हम जिस्म में चलते हैं, हम जिस्म के तौर पर नहीं लड़ते। इसलिए कि हमारी लड़ाई के हथियार जिस्मानी नहीं।” (2 कुरिन्थियों 10:3–4)
इस ज़बूर में सारी कलीसिया तलब की गई है कि ख़ुशी करे और यहोवा के नाम की सताइश करते हुए नाचें और तबले और बरबत से उसकी सना-ख़्वानी करें। क्योंकि ख़ुदावन्द अपने लोगों से ख़ुश होता है। वो सीहोन को नजात की राह बख़्शता है। जिस्मानी जंगजू मसीही इन आख़िरी आयात को अपनी सनद समझकर उसे जिस्मानी हथियार से लड़ने का ख़याल करते और पौलूस की हिदायत का ख़याल नहीं रखते। इसलिए कि वो उनकी मर्ज़ी के मुवाफ़िक़ नहीं है। ख़ुदा की बादशाहत खाना-पीना नहीं, बल्कि रास्ती, सलामती और रूह-उल-क़ुद्स से ख़ुश-वक़्ती है। हालेलूयाह।
(ज़बूर 150): ये ज़बूर हालेलूयाह से शुरू होता है और हालेलूयाह से ही ख़त्म होता है। इसमें हर एक सांस लेने वाली चीज़ से तलब किया गया है कि ख़ुदावन्द की सताइश करे। इसकी आयत अव्वल में बताया गया है कि उसकी सताइश कहाँ की जाये, या’नी उसके मुक़द्दस में और उसकी क़ुदरत की फ़िज़ा में। दूसरी आयत में उसकी सताइश करने की वजह यूं बयान की गई है कि उसकी क़ुदरतों और उसकी बुज़ुर्गी के सबब उसकी सताइश करो।
आयात (3 से 6) में ज़िक्र है कि किस तरह उसकी सताइश की जाये: या’नी कि क़रनाई फूँकते हुए, बरबत छेड़ते हुए, तबला बजाते और नाचते हुए, तारों वाले साज़ और बांसुरियां बजाते हुए, बुलंद आवाज़ वाली झाँझ बजा कर। हर एक चीज़ जो सांस लेती है, यहोवा की सताइश करे। हालेलूयाह। किसी मुफ़स्सिर ने कहा कि इस ज़बूर में दस क़िस्म के बाजों के नाम हैं और उन दस अक़्साम (मुख्तलिफ़ क़िस्मों) में तमाम क़ौमों के साज़ शामिल हैं। या’नी कि हर एक क़ौम बजाती हुई गाने वालों के गिरोह में शरीक होगी। और वो सब हमनवा और हम-आहंग होंगे। और ये इसमें बारह (12) दफ़ा कहा गया है कि “यहोवा की सताइश करो” जिस से मुराद है कि इस्राईल के बारह (12) फ़िर्क़ों को अलग-अलग ताकीद की गई है। ख़ुदा करे कि हम भी गाने-बजाने वाले गिरोह में शामिल हों। आमीन सुम्मा आमीन।
तमत/तमाम शुद
(ख़ुर्शीद प्रैस, गुज़रांवाला में बाएहतमाम मास्टर ग़ज़नफ़र अली छपा)
अम्साल की किताब
सवाल 1: अम्साल की किताब के मुसन्निफ़ का नाम और अहवाल बयान करें।
जवाब: अम्साल (1 बाब 1 आयत) में लिखा है कि दाऊद के बेटे, बनी-इस्राईल के बादशाह सुलेमान की अम्साल। गोया अम्साल सुलेमान के नाम से कहलाती है। तो भी ये उसकी तब’अ आज़ाद तस्नीफ़ नहीं है, बल्कि उसने मुल्हिम होकर ख़ुदा से दानाई हासिल की। अलबत्ता वो दानाई के सबब तमाम दुनिया में शहर-आफ़ाक़ (मशहूर) हुआ। लेकिन सलातीन के तीसरे बाब से ये मा’लूम होता है कि ये दानिश उसकी मसा’ई (कोशिशों) का नतीजा न थी, बल्कि ख़ुदादाद बरकत थी। चुनान्चे (सलातीन 3 बाब 7 से 14 आयत) में सुलेमान की ये दु’आ है कि:
“ऐ ख़ुदावन्द ख़ुदा, तूने अपने बंदे को मेरे बाप-दादा की जगह बादशाह किया। मगर मैं हनूज़ लड़का हूँ, बाहर जाने और फिर आने का तौर नहीं जानता। और तेरा बंदा तेरे बंदों के बीच है जिन्हें तूने चुन लिया, वो लोग बहुत और ग़ैर-आबिद हैं। कस्रत के बा’इस उनका शुमार नहीं हो सकता। सो तू अपने बंदे को ऐसा समझने वाला दिल अता कर कि मैं लोगों की अदालत करने में नेक व बद में इम्तियाज़ कर सकूँ। क्योंकि तेरी इतनी भारी क़ौम का इन्साफ़ कौन कर सकता है?”
चुनान्चे ये बात ख़ुदावन्द को पसंद आई कि सुलेमान ने ये चीज़ मांगी। और ख़ुदावन्द ने उससे कहा:
“चूँकि तूने ये चीज़ मांगी और उम्र की दराज़ी ना चाही, और ना अपने लिए दौलत का सवाल किया, और ना अपने दुश्मनों के नाबूद होने की दु’आ चाही, बल्कि अपने लिए अक़्ल मांगी ताकि अदालत में ख़बरदार हो। सो देख, मैंने तेरी बातों के मुताबिक़ अमल किया है। देख, मैंने एक आक़िल और समझदार दिल तुझको दिया है, ऐसा कि तेरा मिस्ल तुझसे आगे ना हुआ और ना तेरे बाद होगा। और मैंने तुझको और कुछ भी दिया है जो तूने नहीं मांगा, या’नी दौलत और इज़्ज़त ऐसी कि बादशाहों में से तमाम उम्र कोई तुझसा ना होगा। अगर तू मेरी राहों पर चलेगा और मेरे क़वानीन हिफ़्ज़ करेगा जिस तरह कि तेरा बाप-दादा चलते रहे, तो मैं तेरी उम्र दराज़ करूँगा।”
(1 सलातीन 4 बाब 29 से 34) आयात में आया है कि ख़ुदा ने उसे दानिश और ख़िर्द बेहद अता की और दिल की वुसअत भी अता की, ऐसी जैसी कि समुंदर की रेतजो कि समुन्द्र के किनारे पर हो। और सुलेमान की दानिश कुल अहले-मशरिक़ और मिस्र की सारी दानिश से कहीं ज़्यादा थी। इसलिए कि वो सब आदमियों से, या’नी अज़राही ईतान, और हीमान और कल्कोल और दरदा से जो बनी-मुहव्वल थे, ज़्यादा दाना था। और गुर्दो-पेश की हर एक क़ौम में उसका नाम पहला था। उसने तीन हज़ार अम्साल कहीं और उसके गीत एक हज़ार पाँच थे। उसने दरख़्तों की कैफ़ियत बयान की, सर्व के दरख़्त से जो लुबनान में था, उस ज़ोफ़े तक जो दीवारों पर उगता है। और परिंदों, चौपायों, रेंगने वालों और मछलियों का हाल बयान किया। और सब लोगों और बादशाहों तक उसकी दानिश की शौहरत पहुंची, ताकि उसकी हिकमत सुनने को आएं। इससे मा’लूम होता है कि सुलेमान दानिश में बेमिस्ल था। लिहाज़ा उसकी अम्साल क़ाबिल-ए-ग़ौर व मुताल’आ हैं।
सवाल 2: अम्साल की किताब की तारीफ़ करें
जवाब: अम्साल दर-हक़ीक़त इब्रानी दानाई या’नी कमाल का मजमू’आ है। क्योंकि इस में हर नू’अ् की दीनी व दुनियावी अख़लाक़ी व बज़मी की मुफ़ीद ता’लीम मौजूद है। जो कि हर सीग़ा और हर उम्र के लोगों के लिए यकसाँ मुफ़ीद है, ख़्वाह वो उम्र-रसीदा हों या कमसिन, दौलतमंद हों या मुफ़्लिस, हाकिम हों या मह्कूम। सब के सब इस किताब से फ़हमीदा (अक़्ल व फ़हम) और राहनुमाई हासिल करते हैं। ये सिर्फ सुलेमान के कुल गीत और अम्साल ही नहीं हैं, बल्कि वही जो कुछ कि इन्सान के अख़लाक़, सीरत, फ़राइज़ और बर्ताव से ता’अल्लुक़ रखता है, या’नी कि उस की तस्नीफ़ात का इंतिख़ाब है। चुनान्चे (अम्साल 25 बाब 1) आयत में लिखा है कि ये भी सुलेमान की अम्साल हैं, जिनकी नक़्ल शाह यहूदाह हिज़क़ियाह के लोगों ने की थी। इस से ये बात भी अयाँ है कि ज़बूर की किताब की तरह ये भी मुख़्तलिफ़ मुरव्वजा ज़बानों में तर्जुमा और तालीफ़ हुई। ख़याल है कि ये किताब सुलेमान की आख़िरी ज़िंदगी में तस्नीफ़ हुई और कि कई एक अश्ख़ास ने उस की तस्नीफ़ात में से लेकर इसे किताब की सूरत में मुरत्तिब व मुजल्लद किया। ये किताब शाह ख़ूरस से चार सौ साठ साल और सिकंदर-ए-आज़म से छः सौ साठ (660) साल पहले लिखी गई। मुल्क-ए-यूनान में कई एक हकीम, मसलन सुक़रात, अफ़लातून और अरस्तू हुए हैं, जिन्हों ने अपने इल्म की वजह से बहुत शौहरत पाई मगर सुलेमान इन सब पर बहुत फ़ौक़ियत रखता है।
सवाल 3: सुलेमान की अम्साल की ख़ुसूसियात बयान करें।
जवाब: मिस्ल एक छोटा और मुख़्तसर जुम्ला है, जिसका मफ़्हूम व मतलब ज़बान और अल्फ़ाज़ की वज़ाहत में अयाँ होता है, और फ़हम व तफ़हीम के वास्ते इन्सानी फ़िक्र व इदराक का मुतक़ाज़ी (तक़ाज़ा करने वाला) होता है। वो सबक़-आमोज़ और मोअस्सर होता है। सुलेमान की अम्साल में दो ख़ासियतें हैं:
हिस्सा अव्वल: अम्साल का मुसन्निफ़ ख़ुदा को सब उलूम का मंबा तस्लीम करता और कहता है कि इन्सान को दानिश ख़ुदा-शनासी से हासिल होती है। नीज़ कि इन्सान का सब से अव्वल काम ये है कि वो ख़ुदा को पहचाने। जैसे कि (अम्साल 9 बाब 10) आयत में आया है कि “ख़ुदावन्द का ख़ौफ़ दानाई का शुरू है और क़ुद्दूस की पहचान फ़हमीदा है।” ख़ुदा उलूम से पहचाना नहीं जाता, बल्कि दानिशमंद बनने के लिए ख़ुदा की पहचान ज़रूरी है। ख़ुदा मह्ज़ ज़िंदगी ही का सरचश्मा नहीं, वो ज़िंदगी को सब खूबियों से मुज़य्यन व मुरत्तिब करता है।
हिस्सा दुव्वम: सुलेमान ये भी बयान करता है कि इबादत, जो कि ख़ुदा की मंज़ूर-ए-नज़र हो, उसमें इन्सानी फ़राइज़ की अदायगी भी है। या’नी कि इन्सान उसी वक़्त ख़ुदा की इबादत कर सकता है जब कि पहले वो एक-दूसरे के फ़राइज़ बाहमी अदा करे। क्योंकि हर नू’अ की नापाकी और रास्ती ख़ुदा के सामने नफ़रत-अंगेज़ है। सो वो इन्सान जो बदी की पैरवी करता है, वो ख़ुदा के हुज़ूर जाने के क़ाबिल नहीं और उस की दु’आ भी मक़बूलियत-पज़ीर नहीं होती। सुलेमान इन अल्फ़ाज़ में ये बात ज़ाहिर करता है कि इल्म-ए-अख़्लाक़ में इल्म-ए-इलाही भी शामिल है, और वो एक-दूसरे से अलग नहीं हो सकते। क्योंकि ये अम्र मुहाल है कि हम ख़ुदा से प्यार करें और उस की मख़्लूक़ से दुश्मनी और बदसुलूकी करें। अक्सर उलमा-ए-दुनिया इल्म-ए-इलाही को दीगर उलूम से अलग करते हैं, लेकिन सुलेमान ये ज़ाहिर करता है कि सब उलूम एक ही चश्मे से निकलते हैं, लिहाज़ा वो एक ही हैं।
चुनान्चे दुनियावी उलूम इसलिए नाक़िस हैं कि वो असली नहीं हैं, बल्कि तमाम व कमाल नक़्ली हैं। लिहाज़ा वो पायदार भी नहीं। वो इल्म जो ख़ुदा की तरफ़ से है, असली है और वही हमारी ज़िंदगी में जुज़्व-ए-लाज़िमी और जुज़्व-ए-ला-युन्फ़क़ (वो हिस्सा जो जुदा ना हो सके) बन जाता है। और इस से जुदा नहीं हो सकता, बल्कि उस को ज़ेबाश (सजावट) देता है।
सवाल 4: इस किताब का ख़ास मक़्सद क्या है।
जवाब: उसका मक़्सद (अम्साल 4 बाब 1 से 4) आयत में मज़्कूर है कि दानाई और तादीब सीखने को, और तमीज़ की बातें समझने को। अक़्ल की तर्बियत पाने को, सदाक़त, अदालत और सारी रास्ती बूझने को। सादा लोगों को होशियारी, देने के लिए और जवान को दानिश और इम्तियाज़ सीखने के लिए, इसका मुताल’आ निहायत ज़रूरी है। इन्सान सिर्फ़ ख़ुदा के फ़राइज़ को अदा करे, बल्कि अपने हम-जिंस के हुक़ूक़ भी। चुनान्चे इस किताब का ख़ास मक़्सद ये है कि हर एक इन्सान अपनी ज़िंदगी ऐसे तौर पर बसर करे कि वो उसके लिए बरकत का सबब हो, और दूसरे लोगों का फ़ायदा भी इससे निकले। ख़ुदा के हुक़ूक़ इन्सानी फ़राइज़ से जुदा नहीं हैं, बल्कि बाहम व लाज़िम व मलज़ूम हैं।
सवाल 5: अम्साल किन ख़ास लोगों को हिदायत करती है?
जवाब: अम्साल की किताब दर्ज़-ज़ेल लोगों को ख़ास हिदायत करती है। ये सादा-लौह, दानिशमंदों और नादानों को यकसाँ हिदायत करती है। सुलेमान का ख़ास मंशा ये है कि सादा लोग और दानिशमंद इन्सान भी आरास्ता और इस्लाह-याफ़्ता हो जाएं, और अक़्लमंदी में तरक़्क़ी करते हुए अपनी ज़िंदगी ख़ुदा की मर्ज़ी की बजा-आवरी में सर्फ़ करें। नीज़ ये कि जवान अपनी जवानी के दिनों को उन क़ौमों से बचाए रखें, जिनमें पिछली ज़िंदगी कमज़ोरी और तबाही वाक़ेअ होती है बचाए रखे। मसलन: वो अपने आपको शराबख़ोरी, बुरी सोहबत, नापाकी, दारोग़-गोई और चोरी से बचाए रखे, और ग़ौर व फ़िक्र से अपनी राह की ख़बर-गीरी करे। सुलेमान ताकीद करता है कि वो ऐसी बातों से इज्तिनाब करे और ख़ुदा का ख़ौफ़ रखते हुए हम-जिंस इन्सान से प्यार करे। पाक-दामनी, फ़िरोतनी, सब्र व इन्किसारी इख़्तियार करे और मेहनत से अपना गुज़ारा करे। सुलेमान इस किताब में दानाई और सदाक़त पर बहुत ज़ोर देता है। और कहता है कि ज़बान की बड़ी ख़बरदारी करनी चाहीए। चूँकि सादिक़ की ज़बान चौखी चांदी है और शरीरों (बेदीनों) का दिल कम क़ीमत है। सदाक़तों के होंट बहुतों को खिलाते हैं, मगर जाहिल लोग बे-दानिशी से मरते हैं। चुनान्चे (अम्साल 10 बाब 20 से 21 और 21 आयत) में लिखा है कि वो जो अपने मुँह और ज़बान की निगहबानी करता है, वो अपनी जान को दिक़ दीवारों से बचाता है। दिल की हिफ़ाज़त की निस्बत ये आया है कि अपने दिल की बड़ी हिफ़ाज़त कर।
क्योंकि ज़िंदगानी के अय्याम इसी के सबब से हैं। (अम्साल 4 बाब 23 आयत)
नोट: ये किताब मसीहियों के लिए अज़बस मुफ़ीद और मौज़ूं है। इसका मुताल’आ ग़ौर व फ़िक्र से करना चाहिए, ताकि रहनुमाई और दानिश हासिल हो। इन अम्साल की दिलचस्पी नज़्म की मौज़ूं इबारत से दो-बाला हो गई है। अगर इसका तर्जुमा उर्दू में भी नज़्म ही में हो, तो ज़्यादा दिलचस्प और मुफ़ीद होगा।
सवाल 6: सुलेमान ने जवानों के लिए कौन-सी बातें पेश की हैं जो उनके लिए लाज़िमी हैं?
जवाब: (1) वालिदैन की फ़रमांबर्दारी। (अम्साल 1 बाब 8) आयत में कहता है कि “ऐ मेरे बेटे, अपने बाप की बात का शुन्वा (सुनने वाला) हो और अपनी माँ की ताकीद को तर्क मत कर।” और (अम्साल 4 बाब 10) आयत में वो कहता है कि “ऐ मेरे बेटे, मेरी सुन और मेरी बातें मान, तो तेरी उम्र के बरस बहुत होंगे।” ये आयत पाँचवें हुक्म पर दलालत करती है। (अम्साल 6 बाब 20 से 23 आयत) में आया है कि “ऐ मेरे बेटे, बाप के हुक्म को हिफ़्ज़ कर और अपनी माँ की ताकीद को मत छोड़। उन्हें हमेशा अपने दिल में बाँध रख और उन्हें अपनी गर्दन पर बाँध। जब तू कहीं जाएगा तो वो तेरी रहबर होगी, और जब तू सोएगा तो वो तेरी निगहबानी करेगी, और जब तू जागेगा तो वो तुझसे बातें करेगी, कि हुक्म चिराग़ है और ताकीद नूर है, और तर्बियत की मलामत ज़िंदगी की राह है।”
(2) सदाक़त इसलिए ज़रूरी है कि सादिक़ लोग ख़ुदा की हिफ़ाज़त में रहते हैं। चुनान्चे (अम्साल 10 बाब 3) आयत में आया है कि “ख़ुदावन्द सादिक़ों की जान भूक से हलाक ना होने देगा।” और (अम्साल 10 बाब 2, 7 और 11) आयात में लिखा है कि “सादिक़ के सर पर बरकतें हैं, और सादिक़ का ज़िक्र भी बरकत के लिए होगा, कि सादिक़ का मुँह ज़िंदगानी का चशमा है।” (अम्साल 10 बाब 30) आयत में यूं फ़रमाता है कि “सादिक़ फल जो है सहर ज़िन्दगी का दरख़्त है और जो नेकी से दिलों को मो लेता और फ़रेफ़्ता करता है, दाना है।”
(3) चुस्ती। (अम्साल 10 बाब 4 आयत) में सुलेमान कहता है कि “वो जो ढीले हाथों से काम करता है, कंगाल हो जाएगा, पर मेहनती का हाथ दौलत पैदा करता है।” और (अम्साल 12 बाब 24) आयत में कहता है कि “मेहनती आदमी का हाथ हुक्मरान होगा, मगर सुस्त आदमी ख़राजगुज़ार रहेगा।” फिर (अम्साल 18 बाब 9) आयत में कहता है कि “वो जो सुस्ती करता है, फ़ुज़ूलखर्च का भाई है।” और (अम्साल 6 बाब 6 से 8) आयात में कहता है कि “ऐ काहिल आदमी, चींटी के पास जा, उसकी राहें देख और दानाई हासिल कर। उसका कोई सरदार या हाकिम नहीं, पर इसके बावजूद भी वो खुरोश और दरूँ में ख़ुराक जमा करती है।”
(4) ख़ुशअख़्लाक़ी, ज़िनाकारी, हर तरह की नापाकी, बद-दियानती, बेवफ़ाई, दग़ाबाज़ी, फ़रेब, चोरी और दुरोग़-गोई से वो मुजतनिब (इज्तिनाब करने वाला, परहेज़ बरतने वाला) हो, क्योंकि ये सारी बातें ख़ुदावन्द के हुज़ूर में नफ़रत-अंगेज़ हैं, और आदमी को मुज्तनिब लानती बनाती हैं।
(5) रास्त-रवी। (अम्साल 6 बाब 16 से 19) आयात में सुलेमान फ़रमाता है कि “ख़ुदावन्द को छः चीज़ों से नफ़रत है, सात हैं जिनसे उसकी जान को नफ़रत है कि ऊंची आँखें, झूटी ज़बान, बेगुनाह का ख़ून बहाने वाले हाथ, दिल जो बुरे मंसूबे बाँधता है, पांव जो जल्द बुराई के लिए दौड़ते हैं, झूटा गवाह जो झूट बोलता है, और वो जो भाईयों के दरमियान झगड़ा बरपा करता है।”
सवाल 7: अम्साल की किताब की तक़्सीम करें और हिस्सों की तफ़्सील करो।
जवाब: अम्साल की किताब में पाँच हिस्से हैं।
हिस्सा अव्वल: (पहले 9 अबवाब) में है। इस में तीन ख़ास बातें हैं।
(बाब 1 आयात 1 से 6) में किताब का दीबाचा है, जिसमें मुसन्निफ़ का नाम, ओहदा और उसकी तस्नीफ़ात के फ़वाइद दर्ज हैं।
(बाब अव्वल की सातवीं आयत के अख़ीर तक) इलाही दानाई की तरफ़ से एक उम्दा और दिल-चस्प वाइज़ है। जिसमें बाप अपने बेटे को ख़ुदा की अख़्लाक़ी हुकूमत की निस्बत ता’लीम देता है। शुरू में बाप बेटे की तवज्जोह मुन्दर्जा-जेल अल्फ़ाज़ के ज़रीये मबज़ूल करवाता है कि “ख़ुदावन्द का ख़ौफ़ दानाई का शुरू है, और कि अहमक़ दानाई और तादीब को हक़ीर जानता है।” फिर ख़ुद उस से मुख़ातिब हो कर कहता है कि “ऐ मेरे बेटे, बाप की तर्बियत का शुन्वा (सुनने वाला) हो और अपनी माँ की ताकीद को तर्क ना कर, कि वो तेरे सर के लिए रौनक का ताज और गर्दन के लिए तौक़ है।” फिर इस हिक्मत के उसूल समझा कर कहता है कि ख़ुदा का तख़्त हुकूमत इन्सानी दिल है, जिससे वो अपनी बादशाहत दुनिया में मुस्तहकम, पायदार और मुस्तक़िल रखता है, जो कि फैलते-फैलते आलमगीर हो जाएगी।
(अबवाब 8 और 9) में दानाई मुजस्सम होती और जगह-जगह खड़ी हो कर सब बनी-आदम की तवज्जोह अपनी खूबियों की तरफ़ मुतवज्जह कराती है। ता’लीम देती और ताकीद करती है कि वो उसकी तरफ़ मुतवज्जह हो कर उसकी पैरवी करें। बा’ज़ लोग गुमान रखते हैं कि ये मुजस्सम दानाई मसीह है, और बा’ज़ कहते हैं कि ख़ुदावन्द येसू मसीह ना सिर्फ मुजस्सम दानाई है बल्कि उलूहियत का सारा कमाल उसमें मुजस्सम था। ख़ैर, हम ये बात तस्लीम कर सकते हैं कि मसीह ख़ुदावन्द दानाई ही मुजस्सम था, क्योंकि (1 कुरिन्थियों 1 बाब 24 से 30) आयात में मर्क़ूम है कि “उनके लिए जो बुलाए गए हैं, मसीह ख़ुदा की क़ुद्रत और हिक्मत है।” यानी वो हमारे लिए ख़ुदा की तरफ़ से हिक्मत और रास्तबाज़ी और पाकीज़गी और ख़लासी है। ये दानाई फ़िल-हक़ीक़त इलाही है, क्योंकि वो उनको, जो उसकी तलाश करते हैं, बरकत बख़्शती है।” चुनान्चे (अम्साल 8 बाब 34 से 35) में आया है कि “सआदतमंद है वो इन्सान जो मेरी सुनता है, और जो हर रोज़ मेरे आस्तानों पर राह देखता है और मेरे दरवाज़ों की चौखटों पर इंतिज़ार करता रहता है। क्योंकि जो मुझको पाता है, वो ज़िंदगी पाता है और वो ख़ुदावन्द की तरफ़ से फ़ज़्ल हासिल करेगा।”
हिस्सा दुव्वम। इसमें दस या’नी (10 से 19 अबवाब) हैं, जिनमें सुलेमान की अम्साल शुरू होती हैं। और अख़ीर में शरीर की हमाक़त और दानाई की खूबियां बयान हैं। हिस्सा दुव्वम व सोइम में अख़लाक़ी उसूलों के अमल और दरआमद का तरीक़ा बयान हुआ है, जिनका ज़िक्र हिस्सा अव्वल में हो चुका है। अम्साल बताती हैं कि इन्सान अपने रोज़मर्रा कारोबार में तवानाई इस्तिमाल कर सकता है, कि उसका काम उसके लिए और उसके हम-जिंस भाईयों के लिए कारआमद और मुफ़ीद साबित हो। (अम्साल 10 बाब 1 से 2) आयात में कहता है कि “दानिशमंद बेटा बाप को ख़ुश करता है, मगर अहमक़ अपनी माँ के वास्ते बा’इस-ए-ग़म है। शरारत के खज़ाने कुछ फ़ायदा नहीं पहुंचाते, मगर सदाक़त मौत से रिहाई बख़्शती है।” नारास्ती ना सिर्फ इस ज़िंदगी में नुक़्सानदेह है, बल्कि हमको ख़ुदा के हुज़ूर भी नामक़्बूल ठहराती है। चुनान्चे ग्याहरवे (11) बाब में लिखा है कि “मक्र के तराज़ू से ख़ुदावन्द को नफ़रत है, लेकिन पूरे तराज़ू से वो ख़ुश होता है। क़हर के दिन दौलत से कुछ काम नहीं निकलता, पर सदाक़त मौत से रिहाई देती है। जिस तरह रास्तबाज़ी ज़िंदगी बख़्शती है, इस तरह वो जो बदी का पीछा करता है, अपनी मौत को पहुंचता है। जिनके दिलों में बुराई है उनसे ख़ुदावन्द को नफ़रत है, मगर जिनकी रवीशें सीधी हैं, उनसे वो ख़ुश है।” और लिखा है कि “देख, सादिक़ को ज़मीन पर बदला दिया जाएगा, तो कितना ज़्यादा शरीर और गुनेहगार को।” रास्त-गोई की निस्बत सुलेमान कहता है कि “वो जो सच बोलता है सदाक़त आश्कारा करता है, पर झूटा गवाह दग़ा देता है। सच्चे होंट हमेशा क़ायम रहेंगे, मगर झूटी ज़बान सिर्फ़ एक दम भर की (थोड़ी देर) है। झूटे लबों से ख़ुदावन्द को नफ़रत है, पर वो जो रास्ती से काम रखते हैं उनसे वो ख़ुश है।”
हिस्सा सोइम। इसमें पाँच या’नी (20 से 24 अबवाब) हैं। ये इबरत और ता’लीम के वास्ते हैं, और इन्सान को नुक़्सानदेह बातों से रोकते और ताकीद करते हैं कि वो इन बातों की तहसील (हासिल करने) में मसरूफ़ रहे जो कि फ़ाइदेमंद और बरकत का बा’इस हैं। मसलन (अम्साल 20 बाब पहली आयत) में है कि “मै (शराब) मस्ख़रा बनाती है, और मस्त करने वाली हर एक चीज़ ग़ज़ब आलूदा करती है, वो जो उनका फ़रेब खाता है, दानिशमंद नहीं।” (20:17) में लिखा है कि “दग़ा की रोटी आदमी को मीठी लगती है, पर अंजाम-कार का मुँह कंकरों से पुर किया जाता है।” (21:6) में फिर आया है कि “दारोग़-गोई से ख़ज़ाना जमा करना उन लोगों की जो मौत ढूंढते हैं, उड़ाई हुई बतालत है।” (23:23) में नसीहत है कि “सच्चाई को मोल ले और इसे ना बेच, इसी तरह हिक्मत और तर्बियत और ख़िर्द को भी।” (23:26) में लिखा है कि “ऐ मेरे बेटे, अपना दिल मुझको दे, और तेरी आँखें मेरी राहों से ख़ुश हों।” (21: 27) में शरीरों (बेदीनों) की क़ुर्बानी की निस्बत ज़िक्र है कि “वो नफ़रत है, ख़ुसूसन कि जब वो बद-नियती से लाई जाती है।” (21:30) में लिखा है कि “कोई हिक्मत, कोई फ़हमीदा, कोई मश्वरत नहीं जो ख़ुदावन्द के मुक़ाबिल पेश आए।” दूसरे और तीसरे हिस्सों में तक़रीबन (400) मिसालें हैं, जो कि हर क़िस्म की नारास्ती के अंजाम-ए-बद और रास्ती के नेक अंजाम पेश करती हैं।
हिस्सा चहारुम। इसमें पाँच या’नी (25 से 29) अबवाब हैं, जिनमें अम्साल का वो मजमू’आ है जिसकी नक़्ल शाह यहूदाह हिज़क़ियाह के लोगों ने की थी। (25:1) में साफ़ लिखा है कि “इसमें 130 से ज़्यादा अम्साल हैं, जो कि तालीमी और नसीहत वाली हैं।” ये हिस्सा सुलेमान की वफ़ात के दो सौ (200) साल बाद तालीफ़ हुआ। मा’लूम होता है कि जब हिज़क़ियाह ने हैकल आरास्ता करके यहूदाह में मज़्हबी बेदारी और इस्लाह जारी की (2 सलातीन 18 बाब 3 से 7 आयात, और 2 सलातीन 19 बाब 3 आयात), तो उस वक़्त उसने इन आयात के फ़वाइद व मुहासिन देखकर इनमें से कई एक की नक़्ल करवाई, ताकि वो उसके लोगों में मशहूर और राइज हों और उनसे राहनुमाई पाएं।
इस हिस्से में कई एक मुफ़ीद और सबक़ आमोज़ बातें हैं, जो इन्सान को बज़्मी फ़राइज़ और आदाब की ता’लीम देती हैं। मसलन हमसाया से सुलूक की बाबत आया है कि “अपने हमसाए के साथ अपने दावे का चर्चा कर, मगर राज़ की बात कभी उस पर फ़ाश ना कर, ता ना हो कि जो कोई उसे सुने तुझे रुस्वा ना करे, और किसी तरह से तेरी रुस्वाई मिटाने से ना मिटे।” “अपने हमसाए के घर जाने से अपने पांव अक्सर रोके रख, ताकि वो तुझसे कहीं दिक़ ना हो जाये और तुझसे नफ़रत ना करने लगे।” “वो आदमी जो अपने हमसाए पर झूटी गवाही देता है, एक गो-पाल, एक तेज़ तीर और एक तेज़ तलवार है।” “जिस तरह शुमाली हवा मीना (बरसात) लाती है, उस तरह चुग़ली-ख़ोरी तुर्श-रवी पैदा करती है।” झूटी ज़बान की निस्बत आया है कि “वो उनसे कीना रखती है, जिनको उसने रंजीदा किया हो।” (और नतीजा) “और ख़तरनाक तबाही है।”
हिस्सा पंजुम। इस हिस्से में दो या’नी (30 और 31 अबवाब) हैं, जिनमें दो नामा’लूम अश्ख़ास या’नी याक़ा के बेटे अजूर और लेमोएल बादशाह का ज़िक्र है। इनकी निस्बत ना तो पाक-कलाम में और ना ही मौजूदा तारीख़ में कोई ज़िक्र है। बा’ज़ लोग ख़याल करते हैं कि इनसे सुलेमान ही मुराद है। (30:1) से मा’लूम होता है कि ज़रूर कोई मुल्हिम शख़्स था और उसने अपनी निस्बत ये कहा कि “आदमी की दानिश मुझमें नहीं, मैंने दुनियावी हिक्मत नहीं सीखी।” ग़र्ज़ कि वो मुक़द्दसों का इल्म रखता था। लेमोएल की बाबत (31:1) में यूं लिखा है कि “लेमोएल बादशाह की बातें, वो इल्हामी कलाम जो उसकी माँ ने उसको सिखलाया।” तीसवें बाब में वो नसाएह (नसीहतें, नेक मश्वरे) हैं जो कि अजूर ने अपने दो शागिर्दों इत्तील और उकाल को दीं। इकत्तिसवें (31 बाब) में वो नसीहत-आमेज़ कलाम है जो कि लेमोएल की माँ ने उसको सिखलाया।
सवाल 8: इस किताब से हमको क्या ख़ास ता’लीम मिलती है?
जवाब: अव्वल। ख़ुदा का ख़ौफ़ रखें, क्योंकि ख़ुदा का ख़ौफ़ दानिश की इब्तिदा है।
हिस्सा दुव्वम। वालिदैन की इता’अत करें, क्योंकि हालात का ततावुल (दस्त-दराज़ी, सितम, ग़ुरूर) इस पर असर रखता है। नीज़ अख़्लाक़ी तौर पर भी ये ज़रूरी और लाज़िम व लज़ूम है।
हिस्सा सोइम। हिक्मत और मा’रिफ़त पर दिल लगाया जाये, क्योंकि दानाई ल’अलों से भी बेहतर है, और सारी चीज़ें जिनकी तमन्ना की जाती है, इसके बराबर नहीं।
हिस्सा चहारुम। ज़िंदगी की ग़नाएत (नग़मा, मौसीक़ी) को मद्दे-नज़र रखें, ताकि हमारी ज़िंदगी से ख़ुदा के मक़ासिद बवजह-ए-अह्सन अंजाम पाएँ।
हिस्सा पंजुम। दिल की बड़ी से बड़ी ख़बरदारी करें, क्योंकि ज़िंदगानी के अंजाम इस से हैं।
हिस्सा शशुम। मुँह की हिफ़ाज़त की जाये, क्योंकि वो जो अपने मुँह की निगहबानी करता है, वो अपनी जान की निगहबानी करता है।
हिस्सा हफ़्तुम। इन्सान रास्तबाज़ और सादिक़ व अल-क़ूल हो, क्योंकि शरीर (बेदीन) की आक़िबत (अंजाम) नेक ना होगी। शरीर का चिराग़ बुझाया जाएगा। मक्र की तराज़ू से ख़ुदावन्द को नफ़रत है, मगर जो रास्ती के काम करते हैं उनसे वो ख़ुश है।
हिस्सा हश्तुम। शराबखोरी से परहेज़ किया जाये, क्योंकि अंजाम-कार वो साँप की तरह काटती है और बिच्छू की तरह डंक मारती है।
हिस्सा नहुम। वालिदैन के फ़राइज़ की अदायगी अशद ज़रूरी है, क्योंकि वो जो अपने माँ-बाप को लूटता है और कहता है कि ये गुनाह नहीं, वो ग़ारत-गर का साथी है।
हिस्सा दहुम। औलाद की तर्बियत की जाये, क्योंकि ये लाज़िम और अंसब (ज़्यादा मुनासिब) है कि लड़के की इस राह में जिसमें उसको चलना है, सवेरे या’नी बचपन में तर्बियत पाए। क्योंकि जब वो बूढ़ा हो जाएगा तो इस राह से बाज़ ना आएगा। वो जो छड़ी को बाज़ रखता है, बेटे से कीना रखता है, मगर वो जो इससे प्यार करता है, वो उसे सवेरे उसकी तादीब करता है।
हिस्सा ग्यारहवाँ। बुरे आदमी की सोहबत से परहेज़ करें, क्योंकि वो शरारत की रोटी खाता है और अंधेरे की मै पीता है।
हिस्सा बारहवाँ। अपनी ज़िंदगी ख़ुदा के लिए मख़्सूस करें, क्योंकि ज़िंदगी उसी की तरफ़ से है और उसी से बहाल रहती है। सो चाहिये कि इसकी ख़िदमत में ही बसर की जाये। क्योंकि सादिक़ों की रविश उस चमकने वाले नय्यर की मानिंद है, जो पूरे दिन तक रोशन होता चला जाता है। वो जो ख़ुदावन्द के तालिब हैं, कुछ जानते हैं।
वाइज़ की किताब
सवाल 9: वाइज़ की किताब की तारीफ़ करें।
जवाब: इब्रानी ज़बान में उसे “कोहेलथ” कहते हैं, जो कि “कोहेल” से मुश्तक़ मुअन्नस इस्म-ए-फ़ाइल है। इसके म’अनी हैं “मजमा-ए-आम में वाइज़ करनेवाला।” इसके ये म’अनी भी हैं, या’नी “फ़राहम करना, या दलील से किसी बात को बुलाना, पाया तक्मील तक पहुँचाना।” चूँकि ये लफ़्ज़ मुअन्नस है, इसलिए बा’ज़ लोगों ने ख़याल किया कि इस से मुराद “मुजस्सम दानाई” है।
वाइज़ की किताब सुलेमान ने ख़ुदा से बर्गश्ता होने और तौबा-ताइब करने के बाद तस्नीफ़ की। बर्गश्तगी की हालत में उसने ख़ुद-सरी से रुहानी तजल्ली और बरकत से ख़ुद को महरूम रखा। इसी हालत में वो इस किताब के (1 बाब 16–18 आयत) में लिखता है कि: “मैंने ये बात अपने दिल में कही कि देख, मैंने बड़ी तरक़्क़ी की, बल्कि उन सभों से जो कि मुझसे पहले यरूशलेम में थे, ज़्यादा हिक्मत पाई। मेरा दिल हिक्मत और दानिश में बड़ा काररवां हुआ। पर जब मैंने हिक्मत के जानने और हमाक़त और जहालत के समझने पर दिल लगाया तो पता चला कि ये सब हवा पर चलना है। क्योंकि इसमें बहुत दिक़्क़त है, और जिस का इर्फ़ान फ़रावाँ होता है, उसका दुख भी ज़्यादा होता है।”
सो जब उसको मा’लूम हुआ कि उसकी ज़िंदगी हक़ीक़ी आराम व सुकून और ख़ुशहाली से मर्हूम है, तो पशेमान (शर्मिंदा) हो कर उसने तौबा की और अपनी बुरी हालत की कैफ़ियत दूसरों की इबरत और तर्बियत के लिए क़लम-बंद की। चाहिये कि ऐसे तजुर्बे से हम होश में आएं और अपनी ज़िंदगी को आरास्ता करें।
इस किताब में “यहोवा” कहीं नहीं आया, क्योंकि उसने अपनी ज़िंदगी में कुछ काम ना करने दिया। और उस की ज़िंदगी में येसू मसीह अज़ तौबा बिल्कुल कुछ हिस्सा ना रखता था। फ़िल-वाक़े’अ् ऐसी ज़िंदगी एक बड़ी बुतलान है। (अम्साल 2 बाब 4 से 9 आयत) सुलेमान अपनी ख़ुदगर्ज़ी इन अल्फ़ाज़ में बयान करता है कि “मैंने बड़े-बड़े काम किए, अपने लिए इमारतें बनाईं, ताकिस्तान लगाए, बाग़ीचे और बाग़ तैयार किए, दरख़्त लगाए, तालाब बनाए कि उनमें दरख़्तों का ज़ख़ीरा सींचूँ। मैंने ग़ुलाम और लौंडियाँ मोल लीं, और मेरे ख़ानाज़ाद मेरे घर में पैदा हुए। मैं बहुत से गाय-बैल और भेड़-बकरियों के गल्लों का मालिक था। ऐसा कि मैं उन सबसे जो मुझसे पहले यरूशलेम में थे, ज़्यादा मालदार था। मैंने सोना, रुपया और बादशाहों को दस्तावेज़ों का ख़ूब ख़ज़ाना अपने लिए जमा किया। मैंने गाने वालें और गाने वालियाँ रखे, और बनी-आदम के अस्बाब-ए-ऐश, और बेगमात और हरमैन फ़राहम कीं। सो मैं बुज़ुर्ग हुआ और सब के सब की बांसबत जो मुझसे पहले यरूशलेम में थे, ज़्यादा तरक़्क़ी की।”
अल-ग़र्ज़ सुलेमान ने ये सब कुछ अपने ही नफ़्स के लिए किया, और मुल्क की ख़ुशहाली, फ़ारिग़ुलबाली और ख़ुदा के जलाल व शान के लायक़ कुछ ना किया। ख़ुदगर्ज़ शख़्स सिर्फ अपना ही ख़याल रखता है। ख़ुदा से दूर होकर इन्सान ज़रूर ख़ुदगर्ज़ और नफ़्स-परस्त हो जाता है। सुलेमान की ख़ुदगर्ज़ी (1 सलातीन 7 बाब 1 से 7 आयत) में भी ख़ूब मज़्कूर है।
सवाल 10: वाइज़ की किताब का ख़ास मक़्सद क्या है?
जवाब: इसका ख़ास मक़्सद ये मा’लूम होता है कि इन्सान को ऐसा बनाया जाये कि ज़िंदगी की मेहनत व मशक़्क़त सिर्फ इस हाल में बरकत का बा’इस हो सकती है कि जब इन्सान रास्त-रवी और रास्तबाज़ी इख़्तियार करे और उस पर क़ायम रहे। ये किताब साफ़ बता देती है कि अगर इन्सान अपनी ज़िंदगी मजलिसी, अख़्लाक़ी और दीनी फ़राइज़ की अदायगी में सर्फ ना करे, तो वो बड़ी बुतलान और या’नी बुतलानों की बुतलान हो कर रह जाती है।
अय्यूब की किताब एक शख़्स पेश करती है जो कि दीनदारी और इक़बालमंदी के लिए मशहूर था। शैतान ने ख़ुदा के हुज़ूर उसकी वफ़ादारी पर शुब्हा किया, और ख़ुदा ने उसको इजाज़त दी कि वो उसकी आज़माइश करे। चुनान्चे शैतान ने उसे हर तरह की मुम्किना मुसीबत में मुब्तला किया। यहां तक कि वो मुसीबत में मुब्तला होकर अपनी दीनदारी और वफ़ादारी से और ख़ातिर-जमई हासिल करता रहा। और पिघलाया और गलाया जाकर कुन्दन की तरह ख़ालिस और निर्मल निकल आया।
वाइज़ की किताब भी एक शख़्स का बयान करती है, जो कि दीनी व दुनियावी बरकात से माला-माल और इक़बालमंद और मशहूर था, जो कि ऐश-परस्ती और दुनियावी और लाहासिल लह्वो-ल’इब में पड़कर दीनदारी और वफ़ादारी में क़ायम ना रहा। और अपनी ज़िंदगी के हासिलात से बेज़ार होकर पुकारता है कि “बुतलानों का बुतलान, सब कुछ बातिल है।”
चुनान्चे वाइज़ की किताब ये ज़ाहिर करती है कि हक़ीक़ी ख़ुशहाली, इक़बालमंदी और शौहरत व दीनदारी और ख़ुदा-परस्ती पर मबनी है। (12 बाब 13 आयत) इसका हासिल-ए-कलाम इस तरह है कि “ख़ुदा से डर और उसके हुक्मों को मान, क्योंकि यही इन्सान का फ़र्ज़-ए-अव्वलीन है।”
सवाल 11: वाइज़ की किताब की तक़्सीम करें।
जवाब: इस किताब में कुल बारह अबवाब हैं, जो कि दो बराबर हिस्सों में मुनक़सिम हैं। हिस्सा अव्वल में हिक्मत, दानाई और ऐश व इशरत की बतालत पर एक आलिमाना है और अमीक़ तहक़ीक़ी नज़र डाली गई है। और नतीजा यूं बयान है कि इनसे दायमी ख़ुशी और हक़ीक़ी राहत मुतलक़न हासिल नहीं होती और कि वो “बुतलानों का बुतलान” है। हिस्सा दुव्वम में आस्मानी, या’नी रुहानी दानाई पेश की गई है। और इसकी निस्बत बताया गया है कि वो मुस्तक़िल और मुफ़ीद है और इन्सान की बेहतरी व बहबूदी का इन्हिसार इसी पर है।
सवाल 12: इस किताब में किन बातों की ता’लीम है?
जवाब: (1) हर एक ने’अमत, ज़ाती हो या मंसूबी, ख़ुदा की तरफ़ से है। (2 बाब 24) आयत में मुसन्निफ़ कहता है कि “इन्सान के लिए अच्छा है कि वो खाए, पीए और अपनी सारी मेहनत के दरमियान ख़ुश हो, अपना जी बहलाए। कुछ बेहतर नहीं। ये भी मैंने देखा कि ये ख़ुदा के हाथ का दिया हुआ है।”
(2) हर एक काम के लिए ख़ुदा की तरफ़ से एक ख़ास मौक़ा होता है। चुनान्चे (8 बाब 6 आयत) में लिखा है कि “इसलिए हर काम का एक वक़्त और एक वाजिबी तौर है।” और (3 बाब 1 से 3) आयात में वो कहता है कि: “हर एक चीज़ का एक ख़ास मौसम, और हर एक काम का, जो आस्मान के नीचे है, एक वक़्त है।” वग़ैरह। सो चाहिये कि इन्सान वक़्त को ग़नीमत जाने और मौक़े की क़द्र करे और उसे हाथ से जाने न दे।
(3) ख़ुदा की इबादत संजीदगी से की जाये। जिस तरह कि (5 बाब 1 से 8) आयात में आया है कि “जब तू ख़ुदा के घर को जाता है तो अपने क़दम होशियारी से रख, और सुनने पर आमादा रह, ना कि अहमक़ों के से ज़बिहे गुज़राने पर। वो नहीं जानते कि वो ज़ुबूनी (ख़राबी) का काम करते हैं। अपने मुँह से बोलने में जल्दी न करो, और अपने दिल को रोक कि वो शताबी (जल्दी) से ख़ुदा के हुज़ूर कुछ न कहे। क्योंकि ख़ुदा आस्मान पर है और तू ज़मीन पर। सो तू अपनी बातें थोड़ी कर।”
(4) मुँह की ख़बरदारी अशद ज़रूरी है। (10 बाब 12 से 13) आयात में मर्क़ूम है कि: “दानिशमंद के मुँह की बातें लतीफ़ हैं, पर अहमक़ के होंट उसी को निगल जाते हैं। उसके मुँह की बातों की इब्तिदा अहमक़ी है और उसकी बातों की इंतिहा फ़ासिद बातें उगलती हैं।”
(5) जवानी के अय्याम में ख़ालिक़ की याद ज़रूरी है। चुनान्चे (12 बाब 1 आयत) में ताकीद है कि “अपनी जवानी में अपने ख़ालिक़ को याद कर, जब कि हनूज़ बुरे दिन नहीं आए, और वो बरस नज़्दीक न आएँ, जिनमें तू कहेगा कि उनसे मुझको कुछ ख़ुशी नहीं।”
(6) अदालत का दिन यक़ीनी है। जैसे कि (12 बाब 14 आयत) में मज़्कूर है कि “ख़ुदा हर फ़े’ल (काम, अमल) को, हर एक पोशीदा चीज़ के साथ, ख़्वाह भली हो, ख़्वाह बुरी, अदालत में लाएगा।”
सवाल 13: वाइज़ की किताब को समझने के लिए किन बातों का ख़ास ख़याल रखना चाहिये?
जवाब: मुसन्निफ़ की हालत का। मुसन्निफ़ अपनी वो हालत पेश करता है कि जब कि उसने ख़ुदा को छोड़कर कोशिश की कि इल्म, दौलत, मर्तबा और शौहरत के ज़रीये ख़ुश-वक़्ती, व राहत और सुकून-ए-क़ल्ब (दिल) हासिल करे। इस वक़्त उसने इल्म व अक़्ल फ़ैलसूफ़ी और नफ़्स पर एतिमाद किया और सब जिस्मानी ख़्वाहिशों को पाला और आज़माया, और मा’लूम किया कि ये सब “बुतलान” (बातिल) है। आख़िरकार उसने फिर ख़ुदा की तरफ़ रुजू किया और उसे अपना शामिल-ए-हाल किया। और दिल में सुकून व इत्मीनान और ख़ुश-वक़्ती हासिल की।
सवाल 14: हमें इस किताब से किन ख़ास बातों की नसीहत मिलती है?
जवाब: (1) हम ख़ुदा को अपनी ज़िंदगी से हरगिज़ जुदा न करें, बल्कि हर बात व इरादे में उसको शामिल व शरीक करें और उसकी रहनुमाई में ज़िंदगी बसर करें।
(2) सिवाए ख़ुदा के और कोई हस्ती नहीं जिससे इन्सान के दिल की ख़्वाहिशात पूरी हों और कामिल ख़ुशी व सलामती हासिल हो सके।
(3) हम ख़ुदा का ख़ौफ़ रखें और उसके अहकाम मानें, क्योंकि इन्सान का फ़र्ज़-ए-अव्वलीन यही है।
ग़ज़ल-उल-ग़ज़लात
सवाल 15: इस किताब की तारीफ़ करें।
जवाब: ये किताब सुलेमान की तसानीफ़ में से एक है, या’नी उसके एक हज़ार पाँच गीतों में से एक है। इब्रानी में इसका नाम “शेअर हा-शारीम” है, या’नी गीतों का गीत, या सबसे उम्दा गीत। सुलेमान का ये सबसे उम्दा गीत उस इत्तिहाद पर दलालत करता है जो मसीह और कलीसिया, या’नी बर्गुज़ीदों की जमाअत, के दरमियान है। चुनान्चे बाइबल के मोअल्लिफ़ों ने इसको इल्हामी जान कर पाक नविश्तों में मुरत्तिब किया। पहली सदी ईस्वी में एक यहूदी बनाम अकेबा ने इसकी निस्बत कहा कि किसी इस्राईली ने कभी इसके इल्हाम पर शुब्हा नहीं किया। नीज़ उसने कहा कि दुनिया के सब अय्याम में से वो दिन सबसे मुबारक है जिस रोज़ ये गीत लिखा है। इसी सदी में अक़्विला ने इसका तर्जुमा इब्रानी से यूनानी में किया।
सवाल 16: इस किताब की तफ़्सील के बारे में मुफ़स्सिरीन का क्या ख़याल है?
जवाब: मुफ़स्सिरीन ने इसको तीन तरह से समझा है।
हिस्सा अव्वल: बतौर तम्सील। यानी इसको तम्सीली समझते हैं और कहते हैं कि ये मसीह और कलीसिया की बाहमी मुहब्बत पर दलालत करती है, ख़ासकर उस निस्बत पर जो क़ौम इस्राईल और ख़ुदावन्द येसू मसीह के दरमियान है। और बाहमी इख़्लास व वफ़ा की मुक़तज़ी है। नीज़ वो कहते हैं कि दूल्हा और दूल्हन का इत्तिहाद सच्चा और रासिख़ है, और अगर मुम्किन हो तो एक-दूसरे के लिए जान देने और फ़िदा होने को तैयार होते हैं।
हिस्सा दुव्वम: मुफ़स्सिरीन इसको अलामती भी समझते हैं और ये क़िस्सा बयान करते हैं कि सुलेमान बादशाह ने कहीं एक दोशीज़ा बनाम सुलूमीत को देखा, जो निहायत ख़ूश-मंज़र, और शकील और नस्वानी ख़ुसूसियत से मुज़य्यन थी। तो वो उस पर हज़ार जान से फ़रेफ़्ता हो गया और महल में ले जाकर चाहा कि उसको बेगमात में शामिल करे, मगर उसकी निस्बत पहले ही एक बाग़बान से हो चुकी थी। और उस बाग़बान और इस जमीला में ग़ायत दर्जे का त’अश्शुक़ (इश्क़) व प्यार था। तो जब सुलेमान ने अपनी ख़्वाहिश इस लड़की पर ज़ाहिर की तो उसने तामिल से (सख़्ती) से इन्कार कर दिया और अपनी मुहब्बत में क़ायम और मुहब्बत के साथ वफ़ादार रही। जब सुलेमान ने इस लड़की की वफ़ा और उसके ईसार पर ग़ौर किया, तो मैं तो खुदा को अज़ीज़ रखता था, वह मुझ पर मेहरबान था यहाँ तक की उसने मुझे बादशाह बना दिया। और हर नू’अ की ज़रूरियात व बरकात से माला-माल किया, मगर अफ़सोस कि मेरी वफादारी, और मुहब्बत कहाँ गई? मैंने उसको छोड़ा और औरत की पैरवी में बूतों की परस्तिश की। गरज़ कि वह सख्त नादिम हुआ और फिर ख़ुदा की तरफ़ फिराम, और मु’आफी मांगी। और अज़ सर-ए-नव ख़ुदा पर भरोसा और एतमाद रखने लगा और ये किताब इस्राईल की तर्बियत और हिदायत के लिए लिखी गई।
सोइम। मुफ़स्सिरीन इसे बतौर ड्रामा या नाटक के समझते हैं। और इसकी यूं तक़्सीम करते हैं कि हिस्सा अव्वल में पहले चार बाब और हिस्सा दुव्वम में पाँच से आठ अबवाब रखते हैं। और किताब का मक़्सद ये बयान करते हैं कि यहूदी क़ौम कस्रत-ए-इज़्दवाजी (ज़्यादा बीवियां) को छोड़कर ख़ानदानी ज़िंदगी का लुत्फ़ उठाए, इसे मुक़र्रर (दोबारा) बहाल करे और इसका लुत्फ़ उठाए। नीज़ वो कहते हैं कि पहले चार अबवाब में सुलूमीत की मुहब्बत की आज़माईश की जाती है।
इस तरह कि महल की बेगमात उसके सामने सुलेमान के वस्फ़ और खूबियां बयान करके चाहती थीं कि उसको दाम (जाल) में फंसा दें। मगर उसने उनकी क़ील व क़ाल (बातचीत) और उनकी गुफ़्त व शनीद से तंग आकर कहा कि मैं अपने वालिदैन के हाँ (पास) जाना चाहती हूँ ताकि उनकी ख़िदमत करूँ। इतने में सुलेमान आया और चिकनी-चुपड़ी बातों, यानी उसकी ख़ूबसूरती और ख़ुशनुमाई की तारीफ़ बा-मुबालग़ा करके, उसके सामने इज़्ज़त और दौलत के वा’दे का जाल फैलाया। और चाहा कि वो किसी तरह महल में रहने पर राज़ी हो जाये। मगर उसने न माना। सो वो न मानी और वालिदैन की इज़्ज़त, नामूस और बाग़बान की मुहब्बत में वफ़ादार ठहरी। और सुलेमान से मुँह मोड़ा और उसकी दौलत व हश्मत पर क़ना’अत (जितना मिल जाए, उस पर सब्र करना) की लात मारी।
अबवाब पाँच से आठ में बताया गया है कि सच्ची और बावफ़ा मुहब्बत लालच या शय-ए-मुबादला से कम या मह्व नहीं हो सकती। दौलत व इज़्ज़त जैसी नापायदार बातें उसको मग़्लूब व मुती’अ नहीं कर सकतीं। बल्कि वो सब मसाइब व मुश्किलात और तमाम आज़माईशों से कहीं आ’ला और ब’ईद-अज़-तसख़ीर होती है, और सब पर ग़ालिब रहती है, और दाइमी व मुस्तक़िल होती है।
सवाल 17: इस किताब के मुद्द’आ-ए-तस्नीफ़ की निस्बत क्या ख़याल किया जाता है?
जवाब: ये किताब ख़ुदा की दाइमी मुहब्बत, जो उसको अपने बर्गज़ीदों से है, और वफ़ादारी और इख़्लास, जो कि बर्गज़ीदों को उससे होता है, ज़ाहिर करती है। या बा-अल्फ़ाज़ इन्जील यूं कहिए कि दूल्हा का त’अश्शुक़ (इश्क़) दूल्हन यानी कलीसिया के लिए, और दूल्हन का सोज़-ओ-गुदाज़ दूल्हा यानी मसीह येसू के लिए ज़ाहिर करती है। पैंटीट्यूक यानी मूसा की पाँच किताबें साफ़ व सरीह तौर पर बताती हैं कि क़ौम इस्राईल ने ख़ुद को ख़ुदा के लिए मख़्सूस किया।
मगर बाहमी अहद पर क़ायम न रही, बल्कि बुतों की तरफ़ माइल हो गई और ख़ुदा को छोड़ दिया। और ये किताब ब-ताकीद बताती है कि बर्गज़ीदों पर लाज़िम है कि ख़ुदा और हर्फ़-ए-ख़ुदाई को चाहें, उसी से मुहब्बत रखें और उसकी पैरवी करें। आमीन।