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Janab Allama Sultan Muhammad Paul Sahab (1884–1960)

इल्तिमास

      जिस मेहनत और जाँ-फ़िशानी से मैंने इस किताब को मुरत्तिब किया है, उसको मैं जानता हूँ और मेरा दिल। इस किताब की तदवीन में मैंने एक सौ दस (110) अरबी किताबों से और 70 लातीनी और अंग्रेज़ी किताबों से इस्तिफ़ादा किया है। क़ुर्आन शरीफ़ और उसकी ज़ख़ीम तफ़्सीरें और अहादीस और उनकी ज़ख़ीम जिल्दें इनके अलावा हैं।

      इस किताब का मुतालआ न सिर्फ़ मसीहियों के लिए अज़-बस मुफ़ीद है, जिनको अरबिस्तान की कलीसियाओं के क़वाइफ़ से कैफ़ हासिल हो सकता है, बल्कि मुसलमानों के लिए भी कुछ कम फ़ायदाबख़्श नहीं। जहाँ मसीही इस बात से लुत्फ़-अंदोज़ होंगे कि मसीहियत ने किस तरह अरबिस्तान के तूल व अर्ज़ पर क़ब्ज़ा कर लिया था, वहाँ मुसलमान इस अम्र से शादमान होंगे कि अगरचे अरबिस्तान की कलीसियाएं मिटा दी गईं, लेकिन आज तक मसीहियत के नुमायाँ असरात इस्लाम की रग-ओ-रेशा में सायर-ओ-दायर हैं। अगर इन असरात को इस्लाम से अलैहदा कर लिया जाये, तो यक़ीनन इस्लाम एक लाशा-ए-बेजान होकर रहेगा।

      जिन-जिन लातीनी और अंग्रेज़ी किताबों के इक़्तिबासात मतन में आ गए हैं, उनकी मुकम्मल फ़ेहरिस्त अस्मा-ए-मुसन्निफ़ीन इस किताब के आख़िर में इज़ाफ़ा कर दी गई है। अरबी किताबों की फ़ेहरिस्त इसलिए नहीं दी गई, कि इन किताबों में हर एक का नाम मए सफ़हात मुकम्मल सूरत में किताब के मतन में मौजूद है, और इस क़द्र मशहूर-ओ-मारूफ़ हैं जिनकी अलैहदा फ़ेहरिस्त की मुतलक़ ज़रूरत नहीं।

सुल्तान


अरबिस्तान की हदूद-ए-अर्बा और आबादी

      अरबिस्तान अपनी जाये-वक़ूअ के लिहाज़ से एक ऐसी महफ़ूज़ जगह पर वाक़ेअ है, जिसके रेगिस्तानी मैदानों और बे-आब-ओ-गियाह सहराओं की वजह से हमेशा फ़ातिह अक़्वाम की दस्त-बुर्द (हमले) से महफ़ूज़ व मामून रहा है।

      जज़ीरा-ए-अरब मुरब्बा-ए-मुस्ततील है और एशिया के गोशा जुनूब मग़रिबी में वाक़ेअ है। इसके मग़रिब में बहर-ए-अह्मर व सहरा-ए-तीह ता नहर-ए-स्वेज़ वाक़ेअ हैं, और मशरिक़ में ख़लीज-ए-फ़ारस और बहर-ए-हिंद व ओमान इसके जुनूब में, और दरिया-ए-फ़ुरात और सहरा का वो सिलसिला जो दरिया-ए-फ़ुरात और शुमाल के दर्मियान वाक़ेअ है, इसके शुमाल में वाक़ेअ है।

      इसकी मसाहत 11,00,000 (ग्यारह लाख) मील मुरब्बा या 31,56,558 (इकत्तीस लाख छप्पन हज़ार पाँच सौ अट्ठावन) किलोमीटर मुरब्बा या 1,26,000 (एक लाख छब्बीस हज़ार) फ़र्सख़ मुरब्बा है।

      इसकी आबादी साठ लाख सत्तर लाख की है।

      आजकल इसको आठ हिस्सों में तक़्सीम करते हैं।

       (1) अल-हिजाज़: बहर-ए-अह्मर के साहिल पर तूर-ए-सीना के जुनूब-मशरिक़ में वाक़ेअ है। चूँकि ये तिहामा और नज्द के दर्मियान बतौर-ए-हद फ़ासिल के वाक़ेअ है, इसलिए इसको हिजाज़ कहते हैं। मक्का मुकर्रमा और मदीना मुनव्वरा हिजाज़ में दाख़िल हैं।

       (2) यमन: ये हिजाज़ के जुनूब में वाक़ेअ है। इसके शुमाल में बिलाद-ए-अरीज़ वाक़ेअ हैं। इसमें मोख़ा, हदीदा और अदन बंदरगाह तिजारत के लिए मशहूर हैं। मदीना, सन्आ और अदन भी यमन ही में वाक़ेअ हैं। इसलिए इसको यमन कहते हैं कि का’बा की जानिब यमीन (रास्त) पर वाक़ेअ है।

       (3) हज़रमौत: यमन के मशरिक़ और बहर-ए-हिंद के साहिल पर वाक़ेअ है। यहाँ से ऊद, जो एक निहायत ही ख़ुशबूदार शैय है, बरामद होती है।

       (4) महरा: हज़रमौत की जानिब मशरिक़ वाक़ेअ है।

       (5) ओमान: जानिब-ए-शुमाल से ख़लीज फ़ारस से और जानिब मशरिक़ और जुनूब से बहर-ए-हिंद से मुत्तसिल (मिला हुआ, नज़दीक) है। इसकी आबादी बहुत कम है। जज़ाइर-ए-बहरीन इसको ख़लीज-ए-फ़ारस से मिलाते हैं। और इस के:

       (6) हिस्सा-ए-साहिल: किनारे-किनारे से नहर-ए-फ़ुरात तक फैला हुआ है। यहाँ के बाशिंदे मोती निकाला करते हैं।

       (7) नज्द: ये जज़ीरा-ए-अरब के वस्त में हिजाज़, हसा' (Al-Ahsa) और सहरा-ए-शाम व यमामा के दर्मियान वाक़ेअ है। इसके शुमाल में शाम और मशरिक़ में इराक़ और मग़रिब में हिजाज़ और जुनूब में यमामा वाक़ेअ हैं। ये क़ित़'आ बिलाद-ए-अरब में बेहतरीन क़ित़’आ है। चूँकि ये बुलंदी पर वाक़ेअ है, इसलिए इसको नज्द कहते हैं। नज्द के घोड़े, जिनको अल-कुहैल कहते हैं, तमाम दुनिया में मशहूर हैं और क़र्न-ए-शैतान की बरामदगी की पेशीनगोई भी यहीं से है।

       (8) इक़्लीम-ए-अह्क़ाफ़: ये बिलाद-ए-अरब की पस्त ज़मीन में वाक़ेअ है और बिलाद-ए-ओमान के जुनूब-ग़रिबी में। क़दीम ज़माने में जबाबिरह यहीं रहते थे जिनको बनू आद कहते थे। एक शदीद आंधी की वजह से ये क़ौम हलाक हो गई।

      ज़माना-ए-क़दीम में अरब को छह हिस्सों में तक़्सीम करते थे।

      अल-हिजाज़, यमन, नज्द, तिहामा, अल-अहसा, यमामा।

       यमामा: यमन और नज्द के दर्मियान इस तरह वाक़ेअ है कि इसके मशरिक़ में अल-अहसा और मग़रिब में अल-हिजाज़ वाक़ेअ हैं। इसके शहरों में यमामा और हजर मशहूर थे। यमामा को उरूज़ भी कहते थे, क्योंकि नज्द व यमन के दर्मियान हाइल था।

       तिहामा: ये जुनूब में यमन और शुमाल में हिजाज़ के दर्मियान वाक़ेअ है। इसको हिजाज़ में शुमार करते हैं।

       अल-अहसा: ख़लीज-ए-ओमान के साहिल पर बोस्रा तक फैला हुआ है। इसका दूसरा नाम बहरैन है। इसके शहरों में अल-अहसा और क़तीफ़ मशहूर हैं।


मसीहियत के फ़ुयूज़ अरबिस्तान में
हिस्सा अव्वल
अरब के मज़ाहिब मसीहियत से पहले

      अरब जाहिलियत की तारीख़ी उमूर में से किसी अम्र पर बहस करना इस क़द्र मुश्किल और पेचीदा नहीं, जिस क़द्र कि अरब के मज़ाहिब पर बहस करना मुश्किल है। अरबिस्तान के अहवाल और वाक़ियात को ज़ब्त-ए-तहरीर में लाने के लिए ज़्यादातर मुसलमान मुअर्रिख़ीन की किताबों की तरफ़ रुजू करना पड़ता है, लेकिन अफ़सोस है कि अहले-इस्लाम की जितनी तालीफ़ात ज़माना की दस्त-बुर्द से बच कर हम तक पहुँची हैं, अगर इन सब का इस्तिफ़ादा किया जाये, तो अदयान-ए-अरब के मुताल्लिक़ जिस क़द्र मवाद हमें मिल जाएँगे, उनका मजमूआ चंद सतरों से ज़्यादा न होगा।

      इब्ने कल्बी ने अरबिस्तान के अस्नाम (बुतों) के मुताल्लिक़ एक किताब लिखी थी जो ज़ाए हो चुकी है, लेकिन ख़ुश-क़िस्मती से इसका एक बड़ा हिस्सा मोअजम-उल-बुलदान-ए-याक़ूत और दीगर लुगात की किताबों में महफ़ूज़ है। इसी तरह साहिब-ए-कश्फ़-उज़-ज़ुनून (5:44) ने इमाम जाहिज़ की एक किताब का ज़िक्र किया है, जो अरबिस्तान के बुतों के मुताल्लिक़ थी, लेकिन ये किताब भी मफ़्क़ूद है। मशहूर मुस्तश्रिक़ क्रेमर और अल्लामा वेलहौज़न ने इस किताब के चंद इक़्तिबासात का, जो उन को मिल सके, हवाला तो दिया है, लेकिन उनसे एक मुहक़्क़िक़ की तश्फ़ी नहीं हो सकती, क्योंकि इन मनक़ूलात में इस क़द्र तनाक़ुस और इख़्तिलाफ़ है कि सही वाक़िये और ग़लत वाक़िये में इम्तियाज़ करना बहुत ही मुश्किल है। शायद इन सबसे ज़्यादा और मुफ़स्सिल बयान अस्नाम-ए-अरब के मुताल्लिक़ शहरस्तानी ने अपनी किताब अल-मिलल-वन-निहल में और याक़ूत ने अपनी किताब में किया है, जिसकी इबारत अज़-क़रार ज़ैल है।

      “وکانت ادیان العرب مختلفہ بالمحاورات لاھد المللد وانتقال الی البدان والانتجاعات فکانت قریش وعامتہ ولد معدبن عدنان علی بعض دین ابراہیم یجھون للسیات ویقمون المناسکہ ویقریون الضیف ویعظمون الاشہر الحرم وینکرون الفواحش والتقاطع التظالم ویعا قبون علی الجرائم فلمہ یذالواعلی ذالکہ ماکانوالاة وکان آخر من قام بولایة البیلت الحرام من ولد معد ثعلبة بن ایاد بن نزار بن معد فلما خرجت یا ودیعت خزاعة حجابة اللیت فغیر ا مکان علیہ الا مرفی المناسک حتی کا نویقیضون من عرفات قبل الغروب ومن جمع بعدان تظلم الشمس وخرج عمر دین لحی رسام لحی ربیعة بن حارثہ بن عمر وبن عامر الی ارض الشام وبھام قوم من العالقة یعبدو الاصنام فقال لھم ماھذہ الاوثان التی اراکمہ تعبدون قالوا۔ ھذه اصنام نعبد ہانستنصر ھا فلستصر ونستسقی لبھا فنسقی فقال الاتعطونی منھا صنما فاسیر بہ الی ارض العرب عندبیت الله الذی تعذالیہ العرب فاعطورہ صنما یقال لہ ھبل فقدم با مکتہ فوضعہ عنداالکعبہ فکان الطائف اناطاف بدایا فقبلہ وختم بہ نصبواعلی الصفا صنما یقال لہ مجاور الریح علی المروہ صنما یقال لہ معصم الطیر فکانت العرب انا جھت البیت فرات تلکہ الاصنام سلت قریشاً وخزاعة فیقولون نعبد ھنا لتقر بنا الی الله زلفی ، فلما رات العربہ ذالک اتخات اصنا ما ً فجعلت کل قبیلة لھا صنماً یصلون لہ تقربا الی الله فیما یقولون فکان ِکلب بن ویرة واحیا ً قضا عة ود منصوباً بدومة الجبذکہ بجرش وکا لمحیر وھمدان نسر منصوباً بصنعار وکان لکنانة سراع وکان لفطفاں العزی وکان لھند(یمن) وجیلة وخشعم ذوالحلصة وکان لطی الفلس منصوباً بالحبس وکان لربیعة وایا ء ذوالکعبات بسدا دامن ارض العراق ۔ وکان لثفیف ارکات منصوباً بالطائف وکان للاوس والخرزج مناة ۔ منصوباً بفدکہ مما یلی ساحل البحر ، وکان فدت ،صنمہ بقال لہ سعد وکان اقوم من عذرة صنمہ بقال لہ شمس وکان لکازد صنمہ یقال لہ ۔ رئام۔

      यानी मुख़्तलिफ़ क़ौमों की मुजाविरत में रहने और तलाश-ए-मु’आश के लिए मुख़्तलिफ़ बिलाद में जाने की वजह से अरब मुख़्तलिफ़ मज़ाहिब के पैरौ हो गए थे। क़ुरैश और मुइद बिन अदनान की औलाद उमूमन् मज़हब-ए-इब्राहीमी की बा’ज़ बातों को मानती थी। ये लोग हज भी करते थे और इसकी रसूमात को भी बजा लाते थे, मेहमान-नवाज़ थे और मुतबर्रिक महीनों का एहतिराम भी किया करते थे, बुरी बातों और कुश्त-ओ-ख़ून और ज़ुल्म करने से इन्कार करते थे और मुजरिमों को सज़ा दिया करते थे। जब तक ये लोग मुतवल्ली रहे, उस वक़्त तक इसी हालत पर क़ायम रहे।

      इनमें से सबसे आख़िरी शख़्स जो मुइद की औलाद में से ख़ाना-ए-ख़ुदा का मुतवल्ली हुआ, वो सालिह बिन अयाद बिन नज़ार बिन मुइद था। अयाद के इख़राज के बाद तौलियत बनी ख़ुज़ाआ के हाथ आ गई, तो उन्होंने मनासिक-ए-हज में तब्दीलियाँ कीं। ये लोग ग़ुरूब-ए-आफ़्ताब से पहले अर्फ़ात से उतरते थे और मुज़दलिफ़ा से तुलू-ए-आफ़्ताब के बाद। जब अ़म्र बिन लुहई मुल्क-ए-शाम के सफ़र को रवाना हुए, उस वक़्त मुल्क-ए-शाम में अमालिक़ा रहते थे, जो कि बुतों की परस्तिश करते थे। अ़म्र बिन लुहई ने उन लोगों से पूछा कि, “इन बुतों की परस्तिश की क्या वजह है?” तो उन्होंने कहा कि, “हम इन बुतों की इसलिए परस्तिश करते हैं कि जब हम इनसे फ़त्हमंदी चाहते हैं, तो फ़त्हमंद हो जाते हैं और जब इनसे बारिश की दरख़्वास्त करते हैं, तो सेराब हो जाते हैं।”

      तब अ़म्र ने उनसे कहा, “क्या तुम इनमें से एक बुत मुझको न दोगे? जिसको मैं अरबिस्तान ले जाऊँ और उसको बैत-उल्लाह के क़रीब नसब कर दूँ, जिसकी ज़ियारत के लिए कुल अरब आते हैं।” पस उन्होंने उसको एक बुत दिया, जिसका नाम हुबल था। इसको मक्का ले आया और ख़ाना-ए-का’बा के नज़दीक नसब किया। मक्का में ये सबसे पहला था जो नसब किया गया था। इसके बाद असाफ़ और नाइला का’बा के कोनों में इस तरह रख दिए गए कि ख़ाना-ए-का’बा का तवाफ़ करने वाला शख़्स असाफ़ से तवाफ़ करना शुरू करता था और बोसा देकर इसी पर तवाफ़ ख़त्म करता था। सफ़ा पर एक बुत नसब कर दिया गया था, जिसका नाम “मुताम-उत-तैर” था। सफ़ा पर एक बुत नसब कर दिया गया था। जिसका नाम “मुत़'अम-उत़-त़ैर” था।

      जब अरब के लोग हज करने आए तो उन बुतों को देखकर क़ुरैश और ख़ुज़ा’अ के लोगों से पूछने लगे, तो उन्होंने इसके जवाब में कहा कि, “हम इनकी परस्तिश करते हैं ताकि इनके वसीले से ख़ुदा की क़ुर्बत (नज़दीकी) हासिल करें।” जब अरबों ने ये सुना तो हर एक ने अपने क़बीले के लिए एक बुत बनाया, जिसकी वो परस्तिश कर लिया करते थे। पस बनी कल्ब और बनी क़ुज़ा'अ का ख़ास मा’बूद 'वद्द' था, जिसको उन्होंने दूमत-उल-जन्दल में जरश में रखा था। और श़ना'अ में 'नस्र' था, जिसकी परस्तिश हिमयर और हमदान वाले करते थे। बनी किनाना का मा’बूद 'सुवाअ' था और ग़त्फ़ान का मा’बूद ‘उज़्ज़ा’ था। और हिन्द (यमन), जिज़ल और ख़शअम का मा’बूद 'ज़ुल-ख़लसा' था और मिली (तय्या) का मा’बूद 'फ़लस' था जो जबल (पहाड़) में नसब किया गया था। रबीअ औसाया का मा’बूद इराक़ में 'ज़ुल-क़आबात' था और सक़ीफ़ का मा’बूद 'लात' था जो ताइफ़ में रखा हुआ था। और औस और ख़ज़रज का मा’बूद 'मनात' था जो फ़दक के मुक़ाबले साहिल-ए-बहरी पर नसब था। दौस का एक ख़ास बुत था जिसका नाम 'स’अद' था। क़ौम-ए-उज़्रह का एक ख़ास बुत था जिसका नाम 'शम्स' था। और अज़द का एक बुत था जिसका नाम ‘रि'आम’ था। (जिल्द 1, सफ़ा 294-296, मत्बूआ लंदन)

      अल्लामा शहरस्तानी लिखता है:

      فیعبد ون الاصنام التی ھی الوسائل وڈا سواغا یغوث و یعوق ونسلی اوکان ود لکلب وھوبددمتہ الجندکہ ورسواع لھزیل رکا یحرجون الیہ ویخرون لہ ویغوث لمذحج ولقبائل من الیمن ویعوق لھمدن ونسری الدی الکلاع بارض حمیر واما الا فکانت لثقیف بالطاف را لعذی تقریش وجیع بنی کناتة وقوم من بنی سلیمہ ومناة الاو الخررج رغسا وھبل اعظم آمنا مھا عندھم وکان علی ظہر الکعبة واساف ونا ئلہ علی الصفا والمروة وضعھا عمر وبن لحی وکان یذبح علیھا تجاء الکعبة وزعموا الھما کانا من جرھم اساف بن عمرز ونائلة بن سھل فضجدافی الکعبة فمسخا حجرین ویتل لایل کانا صنمیں جاء لھما عمر وبن لحی فوصغھما علی الصفا وکان لبنی ملکان من کنانة صنم یقال لہ سعد ۔

       तर्जुमा: पस अरब वद, सुवा’अ, यग़ूस, य’ऊक़ और नस्र की अपने वसाइल समझ कर परस्तिश करते थे और इसलिए क़ुर्बानी करते थे। 'वद्द' बनी कलब का बुत था दूमत-उल-जन्दल में, और 'सुवा’अ' हुज़ैल का बुत था जिसका हज करते थे और उसके लिए क़ुर्बानी करते थे। 'यग़ूस' मजदहिज और यमन के बा’ज़ क़बीलों का बुत था, और 'यऊक़' हमदान का बुत था और 'नस्र' ज़ुल-क़ला’अ का बुत था हिमयर में, और 'अल-लात' सक़ीफ़ का बुत था ताइफ़ में, और ‘उज़्ज़ा’ क़ुरैश और तमाम बनी किनाना और बनी सुलैम की क़ौम का बुत था, और 'मनात' औस, ख़ज़रज और ग़स्सान का बुत था।

       और हुबल उनके तमाम बुतों से बहुत बड़ा बुत था जो का’बा की छत पर नसब था और असाफ़ व नाइला सफ़ा और मर्वा पर नसब थे, जिनको अ़म्र बिन लुहई ने नसब किया था और उन पर क़ुर्बानी ज़ब्ह की जाती थी। बा’ज़ों का ख़याल है कि ये बनी जुरहुम के दो शख़्स थे, जिनका नाम असाफ़ बिन अ़म्र व नाइला बिन्त सुहैल था; उन्होंने का’बा में गुनाह किया था जिसकी वजह से... बा’ज़ कहते हैं कि नहीं, बल्कि ये दो बुत थे जिनको अ़म्र बिन लुहई ने सफ़ा में रख दिया था। किनाना के बनी मलिकान का एक और बुत था जिसको स’अद कहते थे।

       (अल-मिलल वल-निहल लि-इब्न हज़्म सफ़ा 109 व सफ़ा 110 बर-हाशिया जुज़्व चहारुम)

       अगर हम इन असनाम-ए-मज़्कूरा-ए-बाला के साथ इन असनाम को भी शामिल करें जिनका ज़िक्र बा'ज़ दीगर तारीख़ों और शुरू़ह (तफ्सीरों) और मुआजिम (Lexicons) में वारिद है। मसलन रुज़़ा, मुनाफ़, अलबद, सईरा और क़सिया तो उनकी ता'दाद क़रीबन 30 तक पहुँच जाएगी। लेकिन अगर इनमें से हर एक की सिफ़ात, ख़्वास और उनकी जाए-ए-इशाअ'त और इबादत और तरीक़-ए-परस्तिश से बहस की जाए तो किताबों में बाहम इस क़दर इख़्तिलाफ़ और तनाक़ुस (Contradiction) है कि उनमें से एक पर भी बमुश्किल एतिमाद किया जा सकेगा। हालाँकि इनमें से बहुत से असनाम ऐसे हैं जिनकी परस्तिश जज़ीरा-ए-अरब में नहीं होती थी। मसलन वद्द, सुवा'अ, यग़ूस, य’ऊक़ और नस्र जिनके मुताअल्लिक़ ये कहा जाता है कि क़ौम-ए-नूह के असनाम (बुत) मसलन सूरह नूह 23 में लिखा है कि:

      وَقَالُوا لَا تَذَرُنَّ آلِهَتَكُمْ وَلَا تَذَرُنَّ وَدًّا وَلَا سُوَاعًا وَلَا يَغُوثَ وَيَعُوقَ وَنَسْرًا

       तर्जुमा: और जिन्होंने कहा कि तुम अपने मा'बूदों को हरगिज़ न छोड़ना और वद्द को और सुवा'अ को और यग़ूस और य’ऊक़ को और नस्र को न छोड़ना।

       इमाम फ़ख़रुद्दीन राज़ी लिखते हैं कि:

      ھذه الاصنام الخمسہ کانت اکبر اصنا مھم ثمہ انھا انتقلت عن قوم نوح الی العرب فکان ود لکلب وسواع لھمدان ویغوث لمذحج ویعوق المرادونسر لحیر ولذالکہ سمت العرب بعبد ودعبد یغوث

       यानी ये पाँच बुत क़ौम-ए-नूह के बड़े बुतों में से थे जो क़ौम-ए-नूह से अरब में पहुँच गए। बनी कलब का बुत वद्द और हमदान के लोगों का सुवा'अ और नदहिज का यग़ूस और मुराद का य’ऊक़ और हिमयर का नस्र था। यही वजह है कि अरब अब्दु वद्द और अबूद यग़ूस नाम रखते थे।

       लेकिन जब हम इब्ने इस्हाक़ और इब्ने हिशाम के इस बयान को पढ़ते हैं कि ख़ाना-ए-का'बा के अंदर साल के दिनों की ता'दाद पर 360 बुत थे तो हमें बेहद हैरत होती है। यूरोप के मुतशर्रिक़ीन ने बेहद कोशिश की कि इब्ने इस्हाक़ और इब्ने हिशाम की ता'दाद को किसी न किसी तरह से पूरी कर दें।

       चुनाँचे उन्होंने गुज़िश्ता ज़माने के मशहूर अश्ख़ास के अस्मा (नामों) की तफ़्तीश की जिनके नाम के साथ लफ़्ज़ 'अब्द' आया है। मसलन अब्द-उल-असद, अब्द-तैम, अब्द-उल- हारिस, अब्द-उद-दार, अब्द-अ'म्र, अब्द-अल-मलिक और अब्द-अल-मुत्त़लिब और अब्द-वद्द और अब्द-यग़ूस वग़ैरा ज़ालिक कि इस क़िस्म के नामों में मुज़ाफ़-इलैह किसी न किसी बुत या देवता का नाम है।

       नाम जिनके अव्वल में लफ़्ज़ 'इम्र-उ' है। मसलन इम्र-उल-क़ैस व इम्र-उल-लात और नीज़ वो नाम जिनके आख़िर में लफ़्ज़ 'ईल' है मसलन शुराहील व ख़ैलील व शमुईल इस क़िस्म में किसी न किसी बुत या देवता पर दलालत करते हैं।

       बिल-फ़र्ज़ अगर ये ख़याल सही भी हो तब भी हम उनके ख़्वास और तर्ज़-ए-परस्तिश और उनके अमकिना और अज़मिना (Places and Times) से हम-चूँ-अव्वल नावाक़िफ़ हैं यानी हम ये नहीं कह सकते हैं कि ये तबईन (बुतैन) कब और क्योंकर और कहाँ पैदा हुए। और किस तरह उनकी परस्तिश होती थी और उनके मनासिक (Rituals) क्या थे।

       मोअर्रिखीन-ए-इस्लाम की रिवायात में बा'ज़ बातें ऐसी भी हैं जिनको अक़्ल-ए-सलीम सही तस्लीम नहीं कर सकती है। मसलन उनका ये बयान कि सब से अव्वल जिस शख़्स ने मुल्क-ए-शाम से बुत ला कर का'बा के क़रीब नसब किया था वो अ'म्र-बिन-लुहई बनी-ख़ुज़ा'अ का सरदार था। हमारे पास कसरत के साथ ऐसे शवाहिद (Evidences) मौजूद हैं जिनसे इस बयान की तर्दीद होती है। जिनको हम आइंदा ज़िक्र करेंगे। नीज़ बहुत सी ऐसी और बातें हैं जिनके क़ुबूल करने में बेहद एहतियात की ज़रूरत है। क्योंकि अरब के मोअर्रिख़ीन ने अपनी तारीख़ी रिवायात को बा'द-अज़-इस्लाम एक तवील ज़माने के बा'द लिखा है जो ज़बानी रिवायत के लिहाज़ से उनकी असली सूरत बहुत कुछ मुन्सख़ हो गई है।

       अरब एक मुद्दत-ए-मदीद से असनाम-परस्तिश और शिर्क-परवरी के आदी थे। अरब जैसी जाहिल क़ौम को फ़ित़रत की गूँ-ना-गूँ ताक़तें और आसमान के नूरानी और अज़ीम-उश-शान सय्यारे और सितारे निहायत आसानी से अपनी परस्तिश और ता'ज़ीम की तरफ़ मा'इल कर सकते थे। इसके अलावा अरब के लोग जज़ीरा-ए-अरब में दाख़िल होने से क़ब्ल कलदानी (Chaldean) अक़्वाम की मुजावरत में रह कर उनसे नुजूम-परस्तिश (Star worship) सीख चुके थे।

       इसमें तो कोई शक नहीं कि अहले-यमन स़ाबिई) मज़हब के पैरो थे। जो कवाकिब (Stars) और सय्यारात-ए-सब'आ (Seven Planets) की परस्तिश करते थे। अल्लामा शहरुस्तानी अपनी किताब 'अल-मिलल वल-निहल' में लिखते हैं कि:

      امابیوت الاصنام التی کاتت للعرب والھند فہی البیوت السبعة المعروفتہ المبینة ۔لی السبع الکواکب”

      यानी अरब और यमन के बुत-ख़ाने वो सात बुत-ख़ाने थे जिनको उन्होंने सब'आ सय्यारे के नाम पर बनाया था। (सफ़ा 103 बर-हाशिया अल-मिलल वल-निहल इब्न इब्न हज़्म)

       सर सय्यद मरह़ूम लिखते हैं कि: “बाशिंदगान-ए-अरब की एक ता'दाद-ए-कसीर बुत-परस्त थी। मगर वहाँ एक क़ौम फ़िर्क़ा मौस़ूम स़ाबई भी था जो सवाबित और सय्यारों की परस्तिश करता था। उन्होंने बेशुमार हयाकिल (Temples) यानी सितारों की परस्तिश के मा'बद तमाम मुल्क में ता'मीर किए थे और इन को इन मुक़द्दस सितारों की परस्तिश के वास्ते मख़्स़ूस किया था। इस वजह से ये यसरिब (मदीना) के लोग 'अलल-उमूम ये ए'तक़ाद रखते थे कि अजराम-ए-फ़लकी इंसान की क़िस्मत पर फ़र्दन-फ़र्दन और नीज़ ये ह़ैयत-ए-मजमूई नेक या बद असर रखते हैं। दर-बाक़ी मख़्लूक़ात पर भी मुअस्स़िर हैं और बिल-ख़ुसूस उनका ये ए'तक़ाद था कि मेंह (बरसात) का बरसना या इमसाक-ए-बारां का होना इन्हीं अजराम-ए-फ़लकी की नेक या बद तासीर पर बिल्कुल मुनहसिर है।” (ख़ुत़बात-ए-अहमदिया सफ़ा 130)

      आफ़्ताब की परस्तिश: आफ़्ताब (सूरज) की परस्तिश जज़ीरा-ए-अरब की तमाम अतराफ़ में राइज थी। मुख़्तलिफ़ अतराफ़ में मुख़्तलिफ़ नामों से इसकी परस्तिश होती थी। चूँकि आफ़्ताब अपने ख़ानदान में सब से बड़ा है, इसलिए इसकी परस्तिश भी बाक़ी सय्यारों की परस्तिश पर फ़ौक़ियत (Superiority) रखती थी। तारीख़ हमें बताती है कि हुज़ूर मसीह की पैदाइश से सात सौ (700) साल क़ब्ल तक इसकी परस्तिश निहायत तुज़ुक़-ओ-अहतशाम के साथ राइज थी। बाबिल (Babylon) के कुतबों में तग़तफ़़लार (Tiglath-Pileser} का एक कतबा मिला है, जिसका ज़िक्र कुनिंदा है (A. Layard Inscription p. 12)।

      हेरोरदतस (Herodotus) इसी तारीख़ की (किताब 3, फ़स्ल 8) में इसकी तसरीह करता है कि अरब ओरोत़ाल्त़ (Orotalt) की परस्तिश करते थे। ये लफ़्ज़ 'ओर' (रोशनी) और 'त़ा'अल' (ताल) से मुरक्कब है जिसके म'अनी 'नूर-ए-मुत’आल' या 'नूर-ए-आ'ला' हैं जिससे मुराद आफ़्ताब है। जिसकी दलील ये है कि हैरवरुदतस लफ़्ज़ ओरोत़ाल्त़ के बाद लिखता है कि “ओरोत़ाल्त़ व यूनीसियस या बक़ूस (Bacchus) है” जो यूनानियों के नज़दीक आफ़्ताब देवता है। इसी तरह इस्त्राबोन (Strabo xvi, 74) और मोअर्रिख अरियान (Arrian vii, 20) इसकी ताईद करते हैं। इनकी तरह ओरिजनोस (Origen) भी तीसरी सदी ईस्वी में कलुस (Celsus) के रद्द में लिखता है कि नब़ती (Nabataean) लोग आफ़्ताब की ख़ास तौर पर परस्तिश किया करते थे (Origenes Contra Celsum v. 37)। और उनके पाए-तख़्त सलअ' {हजर, Petra) में आफ़्ताब की ता'ज़ीम के लिए बहुत बड़ा मा'बद बना हुआ था।

      मौलवी सय्यद सुलेमान साहब अपनी किताब अ़रज़़-उल-क़ुरआन में लिखते हैं कि:

“हमज़ा इसफ़हानी अल-मुत़वफ़्फ़ा 370 हि॰ ने एक हिमयरी कुतबे का ज़िक्र किया है जिसकी इबारत ये थी “ब-नाम-ए-ख़ुदा शम्मर युरअश (शम्मर युहर'इश) (शाह-ए-हिमयर) ने आफ़्ताब देबी (देवी) के लिए ये बनाया।” (सफ़ा 35)

      यही मुसन्निफ़ इसी किताब में एक और जगह लिखते हैं कि:

“जुनूबी अरब (यमन व हज़़र-मौत) और शुमाली अरब (वादी-ए-क़ुरा, अहूरां, दबार ब शाम) में क़दीम अरबी हुकूमतों के नुक़ू़श थे। क़ुसूर-ए-शाही म'आबिद-ए-दीनी और आम मक़ाबिर की मुनहदिमा इमारतें अब तक बाक़ी हैं। जुनूबी अरब में हज़़र-मौत में इस क़िस्म की इमारतें हैं जिनमें से अदन के पास एक अंग्रेज़ सय्याह ने “ह़ुस्न-ए-ग़ुराब” का निशान दिया है। शुमाल-ए-अरब में तदमुर के खंडर हैं। जिनमें नाज़ुक व बुलंद सुतून अब तक ईस़्तादा हैं। मा'बद-ए-शम्स का निशान बाक़ी है।” (सफ़ा 51)

      आफ़्ताब का दूसरा मा'बूदाना नाम ज़ु-अश-शरा था जिसके म’अनी स़ाहिब-ए-रोशनी या ख़ुदा-ए-मुनीर के हैं। इन कुतबों में जो उ़यून-ए-मूसा और मदाइन-ए-स़ालेह और तूर-ए-सीना से दस्तयाब हुए हैं ये नाम कसरत के साथ आया है। इस्त्राबोन के बयान से साफ़ ज़ाहिर है कि ज़ु-अश-शरा आफ़्ताब था। चुनाँचे वो लिखता है कि नब़ती आफ़्ताब की परस्तिश करते थे और सालाना ब-तारीख़ 25 के (25 दिसंबर) इसकी ईद होती थी।

      सर सय्यद मरह़ूम स़ाबिई फ़िर्क़े के मुताअल्लिक़ लिखते हैं कि:

“मगर जो बुराई कि आहिस्ता-आहिस्ता उनके मज़हब में फैल गई थी वो ये थी कि सितारों की परस्तिश करने लगे थे। उन्होंने सात हयाकिल यानी मा'बद सब'आ सय्यारों के लिए बनाए थे। और जिस सितारे का जो मा'बद था उसी मा'बद में उस सितारे की परस्तिश करते थे। हर्रान के मा'बद में सब लोग ब-नीयत-ए-हज जमा हुआ करते थे। ख़ाना-ए-का'बा की भी बड़ी ता'ज़ीम करते थे। उनका सब से बड़ा मज़हबी त्यौहार उस रोज़ हुआ करता था जबकि आफ़्ताब बुर्ज-ए-हमल में जो मौसम-ए-बहार का अव्वल बुर्ज है दाख़िल होता था। और छोटे-छोटे त्यौहार उस वक़्त होते थे जबकि पाँच सय्यारे यानी ज़ुहल, मुश्तरी, मरीख़, ज़ुहरा, अ़तारुद बा'ज़ बुर्जों में यके-बाद-दिगरे दाख़िल हुआ करते थे।” (ख़ुत़बात-ए-अहमदिया सफ़ा 130)

      क्लेमंस सूरी इस क़द्र और इज़ाफ़ा करता है कि: नबती काले पत्थर का, ज़ुश-शरा (आफ़्ताब) का एक मुकअ़ब बुत बनाते थे; जिसकी बुलंदी चार फ़ुट और अर्ज़ दो फ़ुट की होती थी। (Maximus Tyrius, viii, 8) और नामों के साथ भी आफ़्ताब बहुत मशहूर था, मसलन: ज़ुश-शरा, अश्-शारिक़, अल-मुहर्रिक़, अल-अजीज़ वग़ैर ज़ालिक। लोग ब-तौर-ए-तबर्रुक आफ़्ताब की ग़ुलामी में अपने आपको मन्सूब करते थे, मसलन: अब्दु-शम्स, अब्दुल-मुहर्रिक़, अब्दुश-शारिक़ वग़ैरह।


1 क्योंकि ख़ाना-ए-का'बा को ज़ुह़ल का मा'बद समझते थे।

      चाँद की परस्तिश: नबती, कनाना, हिमयरी और साबिई, सितारों के साथ चाँद की भी परस्तिश करते थे। (Bergman)

       अल-लात की परस्तिश: अरब के मशहूर तरीन मा'बूदों में से अल-लात था जिसका ज़िक्र क़दीम यूनानियों और रोमियों और अरबों की तवारीख़ में मिलता है (मुआजिम-उल-बुलदान लि-याक़ूत 4:336, 337)। ये एक सफ़ेद पत्थर का टुकड़ा था जिसकी शक्ल मुरब्बा (Square) थी, सक़ीफ़ ताएफ़ में इसकी परस्तिश करते थे। इसके लिए एक ख़ास मा'बद बना हुआ था। जिसका त़वाफ़ करते थे और हज अदा करते थे। और इसके लिए ख़ास ख़ादिम या काहिन मुक़र्रर थे।

       लेकिन ज़माना-ए-ह़ाज़ि़रा के मोअर्रिखीन का अलल-उमूम ये ख़याल है कि अल-लात ज़ुहरा (Venus) है। चुनाँचे हैरवरुदतस अपनी तारीख़ में (किताब 1, फ़स्ल 131) लिखता है कि अरब आसमानी ज़ुहरा की परस्तिश करते थे। जिसको वो अलीता (Alitta) कहते हैं। और इसी किताब की एक दूसरी जगह में (किताब 3, फ़स्ल 3) इसका सही तलफ़्फ़ुज़ बतलाता है कि अल-लात इसकी परस्तिश ताएफ़ के साथ मख़्स़ूस न थी। जैसे अरब के मोअर्रिखीन ख़याल करते हैं बल्कि जज़ीरा-ए-अरब के अक्सर अतराफ़ में इसकी परस्तिश होती थी।

       क्योंकि अब चंद ऐसे कुतबे बरामद हुए हैं जिनसे साबित होता है कि बिलाद-ए-नबत हजर में और सलहद में और बोस्रा (Bosra) में इसकी परस्तिश होती थी। जहाँ इसकी हैय़कल बनी हुई थी। हत्ता हौरान की अतराफ़ और तदमुर में भी इसकी परस्तिश होती थी। इन अतराफ़ में इसके ऐसे अलक़ाब थे जिनसे इसकी अ़ज़मत और इज़्ज़़त ज़ाहिर होती थी। मसलन अल-लात अल-उ़ज़़मा (The Great Al-Lat) और उम्म-उल-इलाह (Mother of Gods) जिस जगह में इसकी परस्तिश होती थी। उसको उसी जगह की तरफ़ मन्स़ूब करते थे और यूँ कहते थे कि लात सलहदा और लात हबरान वग़ैरा।

       अल-लात की परस्तिश की कसरत और इसकी शौहरत का अंदाज़ा इससे हो सकता है कि इस नाम से सैकड़ों नाम मुरक्कब हो गए, मसलन: 'हब-लात', 'तैम अल-लात' और 'ज़ैद अल-लात' वग़ैर ज़ालिक।

      चुनाँचे ज़ुहरा शाम को आफ़्ताब के ग़ुरूब के बाद और सुबह को आफ़्ताब के तुलूअ से क़ब्ल ज़ाहिर होता है; लिहाज़ा परस्तारान-ए-ज़ुहरा ने इन्हीं औक़ात-ए-तुलूअ के एतबार से इसके दो नाम रखे हैं। जब ये शाम को तुलूअ होता है तो इसको 'अश्तर' कहते हैं (जो सितारा या अश्तर या अस्तारते के मुसावी है), और जब ये सुबह को तुलूअ होता है तो इसको 'अल-अज़ीज़' कहते हैं, जिसके मानी “ख़ुदा-ए-बुलंद मुक़ाम” के हैं और इसको 'कौकब-उल-हुस्न' भी कहते हैं। चुनाँचे इस्हाक़ अंताकी ने, जो छठी सदी के अवाइल का मुअर्रिख़ है, ब-तसरीह लिखा है कि 'कौकब-उल-हुस्न' ज़ुहरा ही है। (मरामी-ए-इस्हाक़ अंतकी, सफ़ा 247)

      अल्लामा शैख़ो ने इस्हाक़ अंताकी की असली इबारत को भी नक़्ल किया है, जो सुर्यानी हुरूफ़ में है। ('अल-नसरानिया व आदाबुहा बैन अरब-अल-जाहिलिया', अज़ क़िस्म-ए-अव्वल, सफ़ा 142) में इसकी अरबी का तर्जुमा हदिया-ए-नाज़िरीन करता हूँ:

“ज़ुहरा के लिए अरब लोग क़ुर्बानियाँ गुज़ारते थे, ताकि उनकी औरतों को ख़ूबसूरती मिल जाए। लेकिन बावजूद इसके, उनकी औरतें और औरतों की तरह बा’ज़ ख़ूबसूरत हैं और बा’ज़ बदसूरत। जब से अरब की औरतें आफ़्ताब-ए-सदाक़त (यानी हुज़ूर मसीह) की परस्तार बन गई हैं, तब से उन्होंने ज़ुहरा की बातिल परस्तिश को तर्क कर दिया है। और मर्द व औरत, दोनों आफ़्ताब-ए-सदाक़त के आगे ख़ुज़ू और ख़ुशू के साथ अपने सरों को ख़म करते हैं। वो औरतें जिन्होंने ज़ुहरा के मा’बद में परवरिश पाई थी, अब वो हमारे साथ ईसा मसीह की परस्तारी में शरीक हैं।”

      प्रोकोप्युस (Procopius), जो कि छठी सदी का मुअर्रिख़ है, लिखता है कि:

“जब ग़स्सान के बादशाह हारिस का बेटा मंज़र, शाह-ए-हीरा के हाथ गिरफ़्तार हुआ, तो उसको ज़ुहरा के लिए बतौर क़ुर्बानी के ज़ब्ह किया गया।”

      बुज़ुर्ग नीलूस (Saint Nilus), जो कि क़ुस्तुनतुनिया के अशराफ़ में से एक शरीफ़ था, अपने लड़के का वाक़िया लिखता है कि:

“जब अरब और बादिया-नशीनों ने इसको गिरफ़्तार किया, तो इसको अपने ख़ुदा 'अल-उज़्ज़ा' के लिए (जो ज़ुहरा है और ब-वक़्त-ए-सुबह तुलूअ होता है) क़ुर्बानी के तौर पर ज़ब्ह करना चाहा। लेकिन नींद उन पर ऐसी ग़ालिब आ गई कि मेरा लड़का उनके हाथ से बच निकला। ये 410 ई॰ का वाक़िया है। सुर्यानी की तवारीख़ में मज़्कूर है कि हीरा के एक बादशाह ने कई मसीही कुँवारी लड़कियों को 'अल-उज़्ज़ा' पर ज़ब्ह किया।”

अरब के लोग कसरत के साथ 'उज़्ज़ा' की ग़ुलामी पर अपने नाम रखते थे और 'अब्दुल-उज़्ज़ा' कहलाते थे। अल्लामा दुसो (Dussaud) लिखते हैं कि: 'मनात' भी ‘उज़्ज़ा’ का नाम था; ‘उज़्ज़ा’ की सतवत ज़ाहिर करने के लिए इसको 'मनात' कहते थे। (अल-अरब फ़ी-श-शाम क़ब्ल-उल-इस्लाम, सफ़ा 221)

       लेकिन मुअर्रिख़ याक़ूत लिखता है कि “ये एक बुत था, जिसको अ़म्र बिन लुहई ने लाकर नसब किया था (4:652); और एक और जगह लिखता है कि 'अल-लात', 'मनात' से माख़ूज़ है। (4:337) इब्ने कलबी से बयान करता है कि 'मनात' पत्थर का एक टुकड़ा था (4:652)। ये तमाम बयानात 'अल-उज़्ज़ा' और 'अल-लात' पर सादिक़ आते हैं। जिस तरह कि लोग अपना नाम 'अब्दुल-उज़्ज़ा' रखते थे, इसी तरह 'अब्द-मनात' भी रखते थे। 'मनात' की परस्तिश क़ौम-ए-हुज़ैल में ख़ूसूसियत के साथ जारी थी, जो कि मक्का के आस-पास और मदीना में रहती थी। 'औस' और 'ग़स्सान' के क़बीले भी ईसाई होने से पहले उसकी परस्तिश करते थे। (याक़ूत, 4:652)

       ज़ुहरा के नामों में से एक नाम 'कबर' (Kubar) भी था (Pococke); इसी को मुअर्रिख़ केद्रेनोस (Kedrenos) 'कुबार' कहता है। (तारीख़-ए-नियाकिया)

       अरब-ए-जाहिलियत बुतों की ज़नाशोई के क़ायल थे। मसलन: आफ़्ताब का शौहर उनके नज़दीक 'बाअल' था, जिसकी परस्तिश जज़ीरा-नुमा-ए-सीना में भी होती थी; और अक्सर उससे 'आफ़्ताब' ही मुराद लेते थे। 'अल-उज़्ज़ा' का शौहर 'उज़ैर' था, जिसका ज़िक्र उन कुतबों में कसरत के साथ आया है जो 'अल-रहा' और 'हौरान' से बरामद हुए हैं; और 'अल-लात' का शौहर 'अल्लाह' था, जिसका ज़िक्र भी बरामद-शुदा कुतबों में आया है।

       इसी तरह अरब-ए-जाहिलियत ज़ुहल, शारा, दबरान, जौज़ा, जब्बार और सुरैया की भी परस्तिश करते थे। चुनाँचे इन नामों से इसका सबूत मिलता है जो अरब रखते थे, मसलन: 'अब्दुल-जब्बार', 'अब्दुस-सुरैया' और 'अब्दुन्-नज्म' वग़ैरह।

       अल्लामा शिबली मर्हूम 'सीरत-उन-नबी' में लिखते हैं कि:

“क़बीला ए हिम्यर, जो यमन में रहता था, आफ़्ताब परस्त था। किनाना चाँद को पूजते थे। क़बीला ए बनी तमीम ‘दबरान’ की इबादत करता था। इसी तरह क़ैस ‘शिअ़रा’ की, क़बीला ए असद ‘अतारिद’ की और लख़म व जुज़ाम ‘मुशतरी’ की परस्तिश करते थे।” (सीरत उन नबी, हिस्सा अव्वल, मुजल्लद अव्वल, सफ़ा 114)

       हैवान-परस्ती: इसके अलावा अरब में हैवान-परस्ती और नबात-परस्ती भी राइज थी। इन हैवानात में से जिनको अरब पूजते थे, एक 'नस्र' (गिद्ध) था, जिसका ज़िक्र सूरह नूह में 'वद्द', 'सुवाअ' और 'यग़ूस' के साथ हुआ है। आरामी भी इसकी परस्तिश करते थे। दूसरा 'औफ़' था, जो एक शिकारी परिंदे का नाम है; नीज़ शेर के नामों में से भी एक नाम 'औफ़' है। अरब के लोग इसके साथ भी नाम रखते थे, मसलन: 'अब्द-औफ़'।

       बा’ज़ मुअर्रिख़ीन का ख़याल है कि, जिसके साथ जिस हैवान का नाम बतौर 'इल्म' के मुस्तअमल है, ये उसकी इस बात की दलील है कि वो क़बीला उस हैवान को पूजता था; मसलन: 'असद' (शेर), 'फ़ह्द' (चीता) और 'कलब' (कुत्ता)।


अरब के मज़हबी मुक़ामात


       अरब के अस्नाम (बुत) और मा’बूदों के ज़िक्र करने के बाद मुनासिब मालूम होता है कि, साबिक़ा इख़्तिसार के साथ हम उन मुक़ामों का भी ज़िक्र करें जहाँ वो अपनी मज़हबी रसूमात बजा लाते थे और बुतों की परस्तिश करते थे।

       अरब के ख़ाना-ब-दोश (बदवी) क़बीलों के लिए ये ग़ैर-मुम्किन था कि वो अदा-ए-इबादत के लिए या मज़हबी रसूमात के इजरा के लिए कोई ख़ास जगह मुअ़य्यन करते; बल्कि इसकी ज़रूरत भी न थी। क्योंकि उनके मज़हबी फ़राइज़ और वज़ाइफ़ निहायत बे-तकल्लुफ़ और बहुत ही सादे होते थे। जहाँ कहीं वो क़ियाम करते थे, वहीं वो निहायत सहूलत के साथ अपनी इबादत इसी तरह अदा करते थे कि अजराम-ए-समावी की तरफ़ निहायत ख़ुज़ू-ओ-ख़ुशू के साथ नज़र उठा कर देखते थे और अपने ख़ुदाओं को याद करते थे; और कभी-कभी अपनी इबादतों को सज्दा करने और दुआ करने से तक़वियत पहुँचाते थे।

       जब किसी के लड़का पैदा होता था, या कोई मरता था, या किसी की शादी हो जाती थी, तब वो नज़र-ओ-नियाज़ भी दिया करते थे। मवालिद-ए-तबीअ़ की परस्तिश, ज़ज्र-उत-तैर , सानेहा और बारिहा से तफ़ाउल व तशाउम उनकी बदवी तबीअत के ऐन मुवाफ़िक़ और पसंदीदा दस्तूर-उल-अमल था। बाप अपने ख़ानदान में और शैख़ अपने क़बीले में काहिन के क़ाइम-मक़ाम समझे जाते थे और मज़हबी मुशाअ़िर इन्हीं की ज़ेर-ए-निगरानी अदा होते थे।

       लेकिन मस्कन-गुज़ीं और ख़ास गिरोह-ए-अक़्वाम जो तमद्दुन में तरक़्क़ी कर चुकी थीं (मसलन: हिमयरी व नबती और दौलत-ए-हीरा, किन्दा और ग़स्सान), इस क़िस्म की सीधी-सादी इबादतों और रस्मों पर इक्तिफ़ा नहीं करती थीं, बल्कि वो निहायत तुज़ुक-ओ-एहतशाम के साथ इबादत करते थे; या तो एक ख़ास जगह इबादत के लिए मख़्सूस करते थे जिसको बेश-क़ीमत पर्दों, ज़र-निगार कपड़ों और कमयाब खालों से आरास्ता करते थे (गोया कि बनी-इस्राईल के अहद के ख़ेमे की नक़्ल उतारते थे), या एक निहायत आलीशान इमारत में (जो इसी मक़सद के लिए बनवाई जाती थी) इबादत करते थे। इन इबादतगाहों में बा’ज़ निहायत ख़ूबसूरत और लाइक़-ए-दीद होती थीं, मसलन: 'ग़ुमदान' और नबत के बा’ज़ हयाकल, जिनके आसार अब तक देखने वालों की निगाहों को अपनी तरफ़ खींच लेते हैं।

       मशहूर यूनानी मुअर्रिख़ दियोदोरस (Diodorus Siculus, Bibliotheca Historica, III, 45) सैय्याह अक़रीतशी अगाथार्ख़िदीस (Agatharchides of Cnidus) से नक़्ल करता है कि उसने (मसीह से लगभग डेढ़–दो सौ वर्ष पूर्व) अरब के जज़ीरे में समुंदर के सवाहिल पर तीन हेकालों की ज़ियारत की। अक्सर उन हेकलों को ‘मस्जिद’ कहा जाता था। मुसलमानों का ये ख़याल कि मस्जिद हमारी ईजाद है, ग़लत है; क्योंकि हाल में नबत से बरामद कुतबों पर कसरत के साथ लफ़्ज़ ‘मस्जिद’ कुंदा पाया गया है।

       अरब के एक और क़िस्म के इबादतख़ाने भी थे, जिनको वो 'क’बात' कहते थे। लफ़्ज़ 'क’बात' का उन मकानों पर इतलाक़ होता था जिनकी शक्ल मुक’अब बनी हुई होती थी, और इस क़िस्म के मकानों में अरब ख़ूसूसियत के साथ अपने बुतों की परस्तिश करते थे। जज़ीरा-ए-अरब के शुमाल में बनी आयाद का एक मा’बद था, जिसका नाम 'ज़ुल-क’बात' था। इसी तरह नज़रान में एक मा’बद था जिसका नाम 'का’बा-ए-नज़रान' था और यमन में एक मा’बद था जिसका नाम 'का’बा-ए-यमनिया' था; जिसमें बनी ख़स’अम अपने बुत 'ज़ुल-ख़लसा' की और बुतों के साथ परस्तिश करते थे।


2 चिड़ियों को उड़ा कर देखते थे। अगर वो दाहनी तरफ़ से निकल जाती थी तो इसको नेक-शगुनी समझ कर स़ानिह़ कहते थे और अगर बाईं तरफ़ से निकल जाती थी तो इसको बद-शगुनी समझ कर बारिह़ कहते थे। (मिन्हु)
3 का’बा की जमा (मिन्हु)

      लेकिन इन तमाम क’बात में से हिजाज़ का का’बा (जो मक्का में है) निहायत मशहूर था। जिस शख़्स ने सबसे अव्वल इसका ज़िक्र तारीख़ के औराक़ में किया है, वो दियोदोरस यूनानी है जो मसीह से सौ साल क़ब्ल का मुअर्रिख़ था। चुनाँचे वो लिखता है कि:

      “अरब के उन अतराफ़ में, जो बहर-ए-कुलज़ुम के मुत्तसिल (नज़दीक) हैं, एक हैकल है जिसकी ताज़ीम कुल अरब करते हैं।” (iii, 211)

      क’बात की कसरत की ये हालत थी कि मुअर्रिख़ बलंदियूस, दूसरी सदी ईस्वी में, सिर्फ़ शहर-ए-सबा में (जो यमन का पाएतख़्त था) साठ का’अबे बतलाता है और तमनह (बनी गत्फ़ान के मशहूर शहर) में पैंसठ बतलाता है।

      अरब अपने मुआबिद (बुतों) के लिए ज़मीन का एक ख़ास टुकड़ा बतौर 'हरम' मु’अय्यन करते थे, जिसका ये मक़सद होता था कि किसी शख़्स को ये इख़्तियार हासिल नहीं था कि इस हद में कोई ऐसा काम करे जिससे इस मा’बद की बे-हुरमती मुतसव्वर हो। इन हरमों में मक्का का हरम बहुत ही मशहूर था और है। इसी तरह उन मुआबिद के लिए ख़ास-ख़ास ख़िदमतगार मुक़र्रर होते थे, जिनको काहिन, ‘अर्राफ़ या मुतवल्ली कहते थे। और बा’ज़ इन मुआबिद को अपने नाम के 'जुज़्व-ए-ला-यन्फ़क' के तौर पर इस्तेमाल करते थे, मसलन: 'अब्दुल-का’बा', 'अब्दुल-दार' वग़ैर ज़ालिक।

       अक्सर उन मुआबिद को तसावीर से आरास्ता करते थे और उसकी दीवारों को नक़्श-ओ-निगार से पैरास्ता करते थे। क़िस्म-क़िस्म के बुतों की तमासील खड़ी करते थे। उन तमासील में से बा’ज़ को संग-ए-मरमर और संग-ए-मूसा से बनाते थे; और बा’ज़ अक़ीक़ से, और बा’ज़ को दीगर बेश-क़ीमत पत्थरों से और बा’ज़ को मामूली चट्टानों से बनाते थे। चुनाँचे 'साअद', जो बनी किनाना का एक बुत था, एक मामूली चट्टान से बना हुआ था, जिसके मुताल्लिक़ एक शायर कहता है कि:

اتینا الی سعد لیجمع شملنا
فشتنا سعد فلانحن من سعد
وھل سعد الا صخرة بتنوفة
من الارض لا تدعو لفی ولارشد

यानी: “हम 'साअद' के पास इस ग़र्ज़ से आए थे ताकि हमारे मुंतशिर उज्ज़ा को जमा कर दे, लेकिन 'साअद' ने उल्टा हमें मुंतशिर कर दिया। इसलिए हम 'साअद' के मानने वाले नहीं हैं। 'साअद' क्या है? वो एक बेडौल चट्टान है जो एक बे-आब-ओ-गियाह दश्त में नसब है; न तो ये किसी को गुमराह कर सकता है और न रहनुमाई कर सकता है।”

       और बा’ज़ बुतों को ख़ास-ख़ास शक्लों में बनाते थे और उनके हाथों में ऐसी चीज़ें थमा देते थे जिनसे उनके मआख़िज़-ओ-ख़वास ज़ाहिर हो जाएँ। मसलन: 'वद' और 'हुबल' के हाथों में कमान और तीर होते थे; और आफ़्ताब के बुत के हाथ में सुर्ख़ रंग का एक बेश-क़ीमत पत्थर होता था और माहताब का बुत बछड़े की सूरत पर होता था और उसके हाथ में एक बेश-क़ीमत पत्थर होता था।

       अरब इन बुतों की मुख़्तलिफ़ तौर पर परस्तिश करते थे। बा’ज़ों की परस्तिश हज के तौर पर तन्हा या जमाअत के साथ करते थे। अव्वल ग़ुस्ल या वुज़ू करके इस बुत के चारों तरफ़ चंद बार तवाफ़ करते थे, फिर इस बुत को बोसा देते थे और ख़ास-ख़ास 'तलबियाह' के ज़रिए उनकी क़राबत हासिल करना चाहते थे।

       मुनासिब मालूम होता है कि बा’ज़ बुतों के 'तलबियाह' हदिया-ए-नाज़िरीन किए जाएँ।

       'ज़ुल-कफ़ैन' का तलबियाह (जो क़बीला-ए-दौस का बुत था):

“لبیکہ النھم لبیکہ لبیکہ ان جرھما عبادک الناس طرف وھم تلاک ونحن اولیٰ منھم بولاک”

      तर्जुमा: “ऐ ख़ुदा, हम तेरी फ़रमांबरदारी के लिए तेरे दर पर खड़े हैं। हक़ीक़त में तेरे बंदे 'जुरहुम' ही हैं, क़दीम से तेरे बंदे हैं; और बाक़ी लोग तो आज ही से तेरे बंदे हुए हैं। इसलिए बाक़ी इंसानों की बनिस्बत हम तेरी दोस्ती के ज़्यादा मुस्तहिक़ हैं।”

      नस्र का तलबियाह:لبیکہ اللھم لبیک لاننا عبید وکلنا میسرة وانت ربنا الحمید

      तर्जुमा: “ऐ ख़ुदा, हम तेरी फ़रमांबरदारी के लिए तेरे दर पर खड़े हैं; क्योंकि हम तेरे नाचीज़ बंदे हैं और तू हमारा क़ाबिल-ए-तारीफ़ रब है।”

      आफ़्ताब का तलबियाह: لبیک اللھم لبیک مانھار نا نجرہ ازلامہ وحرة قرہ۔ لانتقی شیاً ولا نصرہ۔ حجاً لرب مستیقمہ یرہً۔

       तर्जुमा: “ऐ ख़ुदा, हम तेरी फ़रमांबरदारी के लिए तेरे दर पर खड़े हैं। हम अपने दिन को उसकी शुआओं के फैलने और उसकी गर्मी और सर्दी के साथ बसर न कर सकेंगे। न तो हम किसी से डरेंगे और न किसी को ज़रर पहुँचाएंगे; ये हमारा हज है उस रब के लिए जिसकी नेकी सब पर बराह-ए-रास्त शामिल है।”

       अरब की मज़हबी रस्मों में ये रस्म भी थी कि, वो अपने बुतों के ऊपर शराब, तेल और दूध छिड़क दिया करते थे और उनके आगे ख़ुराक रख दिया करते थे, जिसको हवा के परिंदे खा लिया करते थे। इसलिए इस क़िस्म के बुतों को वो 'मुत’अम-उत-तैर' (यानी परिंदों को खिलाने वाला) कहते थे।

       इसी तरह बुतों के आगे अपने बच्चों की पेशानी या सर के बाल मुंडवाते थे और कुँवारी लड़कियाँ उनके चारों तरफ़ नाचती थीं। चुनाँचे इमरुल-क़ैस कहता है कि:

فعن لنا سرب کان نعاجہ
عذاریٰ دوارفی ملاء مذیل

       तर्जुमा: “हमारे आगे एक ऐसा गल्ला आ निकला जिसकी गाएं ख़ूबसूरती में उन दोशीज़ा लड़कियों की तरह थीं, जो लंबी चादर ओढ़े हुए 'दिवार' के चारों तरफ़ नाचती हैं।”

       अरब निहायत एहतमाम के साथ अपने बुतों के आगे इंसानी क़ुर्बानी गुज़ारते थे और ये समझते थे कि, इंसानी क़ुर्बानी की वजह से उनके ख़ुदाओं का ग़ज़ब दूर हो जाता है और उनकी ज़्यादा क़ुर्बत हासिल होती है। चुनाँचे बर्फीर्योज़, जो दूसरी सदी ईस्वी में एक बुत-परस्त फ़िलासफ़र था, लिखता है कि:

“दूमत-उल-जन्दल के लोग हर साल अपने बुत के आगे एक इंसान को बतौर क़ुर्बानी के ज़ब्ह किया करते और उसकी लाश को मज़ब’अ के क़रीब दफ़नाते हैं।” (Porphyry, De Abstinentia, ii, 56)

      प्रोकोप्युसस यूनानी बयान करता है कि, मंज़र ने 'अल-उज़्ज़ा' के सामने ग़स्सान के बादशाह के लड़के को (जो उसके हाथ में गिरफ़्तार हुआ था) चार सौ राहबा औरतों के साथ जो इराक़ की ख़ानक़ाहों में उज़्लत-गुज़ीं थीं, ज़ब्ह किया। नीलूस (Nilus), जो पाँचवीं सदी का मुअर्रिख़ है, इसको किसी क़दर तफ़्सील के साथ बयान करता है कि, किसी तरह एक बार अरब के बादिया-नशीं लोगों ने तूर-ए-सीना पर हमला किया और वहाँ के राहिबों को क़त्ल किया। वो उसके लड़के तावदोलस को गिरफ़्तार करके ले गए और सुबह के सितारे यानी 'अल-’अज़ीज़' के आगे उसको ज़ब्ह करना चाहा। इसी ज़िम्न में उनकी इंसानी क़ुर्बानियों के मुताल्लिक़ ज़िक्र करते हुए वो लिखता है कि:

“इन कमीनों (वहशियों) का कोई मज़हब नहीं है, बजुज़ इसके कि सुबह के सितारे ('अल-उज़्ज़ा') के आगे सज्दा करते हैं और उसकी बेहद ताज़ीम करते हैं। अपने क़ैदियों में से जिनको वो लड़ाइयों में गिरफ़्तार कर लेते हैं, उनमें से सबसे बेहतर शख़्स को उसके आगे ज़ब्ह करते हैं। इस काम के लिए वो ख़ूबसूरत नौजवानों को तर्जीह देते हैं; क़ुर्बानी के पत्थरों और चट्टानों की क़ुर्बानगाह बनाते हैं और सुबह का इंतिज़ार करते हैं। जब सुबह का सितारा ज़ाहिर हो जाता है, तब अपनी क़ुर्बानी को शमशीरों (तलवारों) से टुकड़े-टुकड़े कर देते हैं और उसका ख़ून पी लेते हैं। अगर उनके हाथ में कोई क़ैदी गिरफ़्तार न हो सके, तो वो एक ख़ालिस सफ़ेद ऊँटनी को क़ुर्बानी के तौर पर इस तरह ज़ब्ह करते हैं कि उसको बिठा देते हैं और तीन बार उसके चारों तरफ़ चक्कर लगाते हैं। तब उनके काहिन (अगर वो हों, वरना उनका सरदार) निहायत शान-ओ-शौकत के साथ आगे बढ़कर, जबकि और लोग गीतों में मशग़ूल होते हैं, अपनी शमशीर से उसकी शाह-रग पर वार करता है और सबसे अव्वल वो ख़ुद उसका ख़ून पी लेता है। इसके बाद बाक़ी लोग उस पर हमला करके उसकी बोटी-बोटी कर देते हैं और आफ़्ताब निकलने से पेशतर, बहुत जल्द-जल्द उसकी हड्डी, खाल और सब कुछ कच्चा खा लेते हैं।” (आमाल-ए-आबा-ए-यूनान, Migne, p G.G.L xix 611)

      इसके बाद यही मुअर्रिख़ उस वाक़िये का बयान करता है जो उसके लड़के के साथ उस वक़्त हुआ, जबकि वो नौजवान लड़का अपने बाप से अलैहदा कोह-ए-तूर पर एक गोशा-ए-तन्हाई में उज़्लत-नशीं था। अरबों ने उस पर हमला किया और उसको एक ख़ूबसूरत नौजवान देखकर गिरफ़्तार करके ले गए ताकि उसको 'अल-उज़्ज़ा' के लिए क़ुर्बानी गुज़ारें। वो अपने लड़के की ज़बानी (जब वो छूट कर वापस आ गया था) यूँ बयान करता है कि:

“जब ये लोग मुझको ले गए ताकि मुझको सितारा-ए-सुबह के लिए क़ुर्बानी गुज़ारें, तो उन्होंने आइंदा सुबह के लिए उन तमाम ज़रूरतों को फ़राहम किया जिनकी मेरी क़ुर्बानी के लिए ज़रूरत थी। उन्होंने एक क़ुर्बानगाह बनाई और शमशीर, छिड़कने का तेल, प्याला और ख़ुशबूदार जलाने के लिए अस्बाब मुहैया किए। अगरचे मैं मुँह के बल ज़मीन पर पड़ा हुआ था, लेकिन मेरी रूह आसमान की तरफ़ उड़ रही थी और मैं ख़ुदा से रिक़्क़त के साथ दुआ कर रहा था कि मुझको इन ज़ालिमों के हाथ से रिहा कर दे। ये वहशी लोग इस ख़ुशी की ज़ियाफ़त में रात भर इस क़दर शराब और कबाब ठूँसते रहे कि सुबह होते-होते सब के सब मौत की नींद सो गए। ये उस वक़्त जागे जबकि आफ़्ताब तुलूअ हो चुका था और मेरी क़ुर्बानी का वक़्त गुज़र चुका था। जब उन्होंने ये देखा तो मुझको पास के गाँव में ले गए (जिसमें बाज़ार लगता था), ताकि अगर कोई शख़्स मेरा ख़ून-बहा दे तो मुझको उनकी आँखों के सामने क़त्ल न करें। चुनाँचे एक शख़्स को मुझ पर रहम आया और ख़ून-बहा देकर मुझको आज़ाद किया। ये सब कुछ उस गाँव के बिशप साहब की बदौलत हुआ, जिसके तुफ़ैल से आज मैं अपने वालिद के पास पहुँचा हूँ।”

      अरब-ए-जाहिलियत में और भी मज़ाहिब जारी थे, मसलन: मजूसियत, साबिइयत, यहूदियत वग़ैरह। हम चूँकि इस बहस को सिर्फ़ मसीहियत तक महदूद रखना चाहते हैं, लिहाज़ा बाक़ी मज़ाहिब से क़त-ए-नज़र करके आइंदा मसीहियत के आग़ाज़ का ज़िक्र करेंगे।

अरबिस्तान में मसीहियत का आग़ाज़


      तवारीख़ी (Historical) शवाहिद के अलावा, जिनको हम आगे चल कर पेश करेंगे, ख़ुद अनाजील-ए-मुक़द्दसा और मुक़द्दस हवारियों के बा’ज़ रसाइल इस अम्र की गवाही दे रहे हैं कि मसीहियत के आफ़्ताब के तुलूअ होते ही उसकी नूरानी शुआएं अरब के ज़ुल्मत-कदे में परतौ-अफ़गन हो गई थीं। दुनिया के दीगर ममालिक पर सिर्फ़ अरबिस्तान को ये शर्फ़ हासिल है कि सबसे अव्वल उसके बाशिंदों में से चंद अश्ख़ास ने (जिनको कुतुब-ए-मुक़द्दसा में 'मजूसी' कहा गया है) मसीहियत को क़ुबूल किया। चुनाँचे मत्ती की इंजील में लिखा है कि:

“जब येसू, हेरोदेस बादशाह के ज़माने में यहूदिया के बैत-अल-लहम में पैदा हुआ, तो देखो कई मजूसी पूरब से यरूशलेम में ये कहते हुए आए कि यहूदियों का बादशाह जो पैदा हुआ है वो कहाँ है? और उस घर में पहुँच कर बच्चे को उसकी माँ मरियम के पास देखा और उसके आगे गिर कर सज्दा किया और अपने डिब्बे खोल कर सोना, लोबान और मुर उसको नज़र किया।” (मत्ती, 2:1-12)

      इस सवाल के जवाब में कि मजूसियों के अरबी होने का क्या सबूत है, हमारे पास चंद ऐसी क़तई दलीलें मौजूद हैं जिनसे साफ़ साबित है कि ये मजूसी दर-हक़ीक़त अरबी थे। पहली दलील ये है कि दूसरी सदी ईस्वी से लेकर पाँचवीं सदी ईस्वी तक तमाम बड़े-बड़े मुफ़स्सिरीन और मुअर्रिख़ीन-ए-कलीसिया इन मजूसियों को अरबी समझते थे। मसलन: बुज़ुर्ग योस्तीनोस दूसरी सदी में अपने मशहूर मुबाहिसे में, जो त्रिफ़ो के साथ हुआ था; मशहूर मुतकल्लिम बुज़ुर्ग तरतुलियान तीसरी सदी के आग़ाज़ में अपनी दो मशहूर किताबों में जो यहूदियों की तर्दीद में (फ़ 9) और मार्कियों के रद्द में लिखी थीं; और बुज़ुर्ग क़ब्रियानुस तीसरी सदी में 'कौकब-अल-मजूसी' के मेमरा में; और बुज़ुर्ग एबिफ़ानियुस (Epiphanius) चौथी सदी में अपनी किताब 'दस्तूर-उल-ईमान' की शरह में; और बुज़ुर्ग यूहन्ना फ़म-अज़-ज़हब इसी चौथी सदी में मत्ती की इंजील की शरह में उन मजूसियों को, जो ख़ुदावंद की ताज़ीम करने आए थे, अरबी समझते थे।

       इसी तरह इन बुज़ुर्गों ने यशायाह नबी की इस पेशीनगोई से कि: “ऊँटों की क़तारें और मिद्यान और ऐफ़ा की साँडनियाँ तेरे गिर्द बेशुमार होंगी; वो सब जो सबा के हैं आएंगे, वो सोना और लोबान लाएंगे और ख़ुदावंद की तारीफ़ों की बशारतें सुनाएंगे।” (यशायाह 60:6) ये इस्तिदलाल किया है कि ज़रूर ये मजूसी अरबी थे।

       (2) इन मजूसियों के नज़राने से भी यही साबित होता है कि वो अरबी थे, क्योंकि सोना, लोबान और मुर अरबिस्तान के सिवाए अजम के किसी और मुल्क में नहीं है। (Strab L xvi) हज़रत दाऊद फ़र्माते हैं कि: “और सबा का सोना उसे दिया जाएगा।” (ज़बूर, 72:15) लोबान और मुर तो अरबिस्तान के सिवाए और कहीं पैदा ही नहीं होते। (नीज़ देखो: पैदाइश, 37:25)

       (3) मजूसियों का ये कहना कि: “क्योंकि पूरब में इसका सितारा देखकर हम इसे सज्दा करने आए हैं,” साफ़ ज़ाहिर करता है कि वो अरब से आए थे; क्योंकि अरबिस्तान ही फ़िलिस्तीन के पूरब यानी मशरिक़ में वाक़ेअ है। चुनाँचे कुतुब-ए-मुक़द्दसा में अरबों का दूसरा नाम 'बनी मशरिक़' है, यानी पूरब के बेटे।


4 मीमर एक सुरियानी उल अस्ल लफ़्ज़ है, जिसके म’अनी वाइज़ाना व नासिहाना तफ़्सीर के हैं। (मन्ह)

      अब इस सवाल का जवाब कि: “अगर वो अरबी थे तो उनको मजूसी क्यों कहा गया?” ये है कि कुतुब-ए-मुक़द्दसा में 'मजूस' का इतलाक़ कसरत के साथ हुकमा-ए-मशरिक़ यानी अरब पर हुआ है। यूनान के बड़े-बड़े मुअर्रिख़ीन का इस पर इत्तिफ़ाक़ है कि हकीम फ़ीसाग़ोरस (Pythagoras) जज़ीरा-ए-अरब में गया ताकि अरबों से फ़ल्सफ़ा सीखे। हकीम ब्लीनियूस ने तो साफ़-साफ़ कह दिया है कि अरबिस्तान ही मजूसियों का मुल्क है। हकीम ब्लीनियूस की तारीख़-ए-तबई (Plin. Hist. Nat. :xxv 5)

       इस अम्र पर कि अहले-अरब ख़ुदावंद की पैरवी और आप पर ईमान लाने में बाक़ी अक़्वाम-ए-आलम पर सबक़त ले गए थे, इंजील-ए-मुक़द्दस में एक और दलील है। वो ये कि जहाँ मुक़द्दस मत्ती (4:24-25) और मुक़द्दस मर्क़ुस (3:7-8) और मुक़द्दस लूक़ा (6:17) ने उन लोगों का ज़िक्र किया है जिनको ख़ुदावंद ने अपने कलाम-ए-मुअजिज़ा इल्तियाम में सुनाया था।

       वहाँ ख़ासतौर पर अहले-रूम और मावरा-ए-यरदन का ज़िक्र किया है, जहाँ कसरत के साथ अरब के मुख़्तलिफ़ क़बीले आबाद थे। पस ये बात अक़्ल में नहीं आती कि ख़ुदावंद के मोअजिज़े यहाँ बे-असर रह गए हों और लोग आप पर कसरत के साथ ईमान न लाए हों। इसके अलावा वो बहुत अर्सा गुज़रने नहीं पाया था कि ईद-ए-नुज़ूल (Pentecost) के वक़्त ख़ुदा ने अहले-अरब को एक और बेश-क़ीमत मौक़ा इनायत किया।

       चुनाँचे मुक़द्दस लूक़ा ने ख़ासतौर पर अहले-अरब का ज़िक्र उन लोगों के साथ किया है, जो हुज़ूर के हवारियों के मोअजिज़ाना कलाम को सुनकर हुज़ूर पर ईमान लाए। (आमाल-ए-रसूल, 2:11) इन अरबों ने अपने मुल्क में जाकर ज़रूर उस अज़ीम-उश-शान मोअजिज़े का ज़िक्र किया होगा और मसीहियत की तब्लीग़ में कोई कसर उठा न रखी होगी। चुनाँचे इन्हीं ईमानदार मसीही अरबों की कोशिश और तब्लीग़ की वजह से अरब में बहुत जल्द मसीहियत फलती-फूलती, दिन-दूनी रात-चौगुनी तरक़्क़ी करती रही; यहाँ तक कि जब मुक़द्दस पौलूस मसीही हुए, तो और मुल्कों में जाने की बजाए सीधे अरबिस्तान की तरफ़ रवाना हुए और वहीं तीन साल तक मुक़ीम रहे।

       चुनाँचे मुक़द्दस पौलूस फ़र्माते हैं कि: “जब उसकी मर्ज़ी हुई कि अपने बेटे को मुझ पर ज़ाहिर करे, ताकि मैं ग़ैर-क़ौमों में इसकी ख़ुशख़बरी दूँ, तो न मैंने गोश्त और ख़ून से सलाह ली और न यरूशलेम में उसके पास गया जो मुझसे पहले रसूल थे; बल्कि फ़ौरन अरब को चला गया... फिर तीन बरस के बाद मैं कैफ़ा (Cephas) से मुलाक़ात करने को यरूशलेम गया।” (ख़त-ए-अहले-ग़लतियों, 1:15-18)

       मुक़द्दस पौलूस जैसे रसूल का अरब में जाना न सिर्फ़ इस बात की दलील है कि वहाँ अरब कसरत के साथ आबाद थे, बल्कि मुक़द्दस पौलूस की तब्लीग़ी सरगर्मी और इन्हिमाक और शख़्फ़ को मद्दे-नज़र रखकर बिला-ख़ौफ़ ये कह सकते हैं कि आपके तुफ़ैल से अरब के गोशे-गोशे और क़बीले-क़बीले में मसीहियत फैल गई होगी।

       क़रीबन 50 ई॰ में हुज़ूर मसीह के हवारी माअमूरा-ए-आम की अतराफ़ में मसीहियत की तब्लीग़-ओ-तब्शीर की ग़र्ज़ से (जिसके लिए हुज़ूर ने उनको हुक्म दिया था) फैल गए। दुनिया के दीगर हिस्सों के बिल-मुक़ाबिल चूँकि अरबिस्तान मर्कज़-ए-मसीहियत के बिल्कुल क़रीब वाक़ेअ था, इसलिए अरबिस्तान की तरफ़ रसूलों की तवज्जोह ज़्यादा माइल रही और उनकी बशारत से अरबिस्तान को बहुत ज़्यादा फ़ायदा पहुँचा। चुनाँचे क़दीम मुअर्रिख़ीन ने इस अम्र को मुत्तफ़िक़न बयान किया है कि रसूलों में से बा’ज़ ने अरबिस्तान के मुख़्तलिफ़ जिहात में अरबिस्तान के मुतअद्दिद बड़े-बड़े क़बाइल को मसीहियत में शामिल कर लिया था। अल्लामा यूसुफ़ सिमन अस्सेमानी ने मक्तबा-ए-शर्फ़िया की जिल्द सोयम की क़िस्म-ए-सानी में (Bibl. Orient. III, i, 1-30) कसरत के साथ यूनानी, सुर्यानी और अरबी के मुअर्रिख़ीन के ऐसे शवाहिद नक़्ल किए हैं, जो इस बात को साबित करते हैं कि हुज़ूर के रसूलों ने अरबिस्तान की मुख़्तलिफ़ अतराफ़ में जाकर मसीहियत की तब्लीग़ की, जिसकी वजह से अरब की मुख़्तलिफ़ अक़्वाम और क़बीले मसीहियत की आग़ोश में आ गए। ख़ास बादिया-ए-शाम, तूर-ए-सीना, यमन, हिजाज़ और इराक़ में मसीहियत को बेहद कामयाबी हासिल हुई। जिन रसूलों ने अरबिस्तान में तब्लीग़ का काम किया, उनके नाम अज़-क़रार ज़ेल हैं:

      मत्ती, बरतलमाई, तोमा, तदी, तिमोन।

       ख़ुद मुसलमान मुअर्रिख़ीन ने भी इसकी तस्दीक़ की है; मसलन मुलाहिज़ा हो: अल्लामा तबरी की तारीख़ की जिल्द अव्वल के सफ़ा 737-738 तक, और अबुल-फ़िदा की तारीख़ की जिल्द अव्वल के सफ़ा 127, और मिक़रीज़ी की 'अल-ख़ितत' की जिल्द दोयम के सफ़ा 483। हुज़ूर के रसूलों के अलावा रसूलों के शागिर्द भी अरबिस्तान में मसीहियत की तब्लीग़ करने में मशग़ूल थे। चुनाँचे मुअर्रिख़ीन के दरमियान फ़िलिप्पुस शम्मास (Philip the Deacon) और तिमोन को ख़ासतौर पर मुबल्लिग़ीन-ए-अरब के नाम से मशहूर हैं।

       70 ई॰ में हुज़ूर की वो पेशीनगोई, जो यरूशलेम की बर्बादी के मुताल्लिक़ थी (लूक़ा, 21:5-28), पूरी हुई। यरूशलेम बर्बाद हो गया; हज़ारहा यहूदी निहायत बे-दर्दी के साथ क़त्ल कर दिए गए। जो ज़िंदा बच गए उनको गिरफ़्तार करके क़ैद कर दिया गया। लेकिन उनमें से जो मसीही हो गए थे, वो हुज़ूर के इर्शाद के मुताबिक़ इस जाँ-कनी और रूह-फ़र्सा वाक़िये से क़ब्ल ही यरूशलेम ख़ाली करके निकल चुके थे और यरदन को पार करके अरबिस्तान में आकर आबाद हो गए। चुनाँचे ओसाबियुस (Eusebius) मुअर्रिख़ लिखता है कि मसीहियों ने उन इलाक़ों में सुकूनत इख़्तियार की और उनके हम-जिंस बिशप उनकी निगरानी करते थे। (Migne: Patrologia Graeca Patralogie Datime xx 221, तारीख़-ए-कलीसिया अज़ में)

       हमारे ज़माने के मुतजस्सिसीन आसार ए क़दीमा ने निहायत कसरत के साथ अरबिस्तान के मुख़्तलिफ़ अतराफ़ में ऐसे कुतबे बरामद किए हैं जिनसे साबित होता है कि एक मुद्दत-ए-मदीद और अर्सा-ए-दराज़ से मसीही निहायत कसरत के साथ अरब में आबाद हुए थे। उन बरामद-आसार में से क़ाबिल-ए-ज़िक्र अनाजील-ए-अरबा और तौरेत के सहीफ़े और नमाज़ की किताब और रूहानी गीतों की किताब हैं। ये किताबें फ़लस्तीनी यानी आरामी ज़बान में हैं। इन तवारीख़ी शवाहिद से ये नतीजा निहायत सेहत के साथ अख़ज़ किया जा सकता है; वो ये है कि मसीहियत पहली सदी ईस्वी में अरबिस्तान के मुख़्तलिफ़ अतराफ़ में निहायत कसरत के साथ फैल गई थी।

       चुनाँचे इस्तीनुस शहीद, जो नॉबलस (Nablus) के रहने वाले थे, दूसरी सदी के वस्त में अपने इस मुबाहिसे में जो त्रिफ़ो (Trypho) यहूदी के साथ हुआ था लिखते हैं कि:

“इंसानों में कोई ऐसी क़ौम बाक़ी नहीं है ख़्वाह वो यूनानी हो या बरबरी या वो जिस नाम से पुकारी जाती हो, हत्ता कि ‘उर्यात’ और वो लोग जो ख़ेमों में रह कर मवाशी चराते फिरते हैं और वो लोग जो बादिया-नशीं हैं और किसी ख़ास घर में सुकूनत नहीं करते, जिसमें से लोग कसरत के साथ मसीही न हुए हों और मसीह के नाम पर नज़र-ओ-नियाज़ देते हों और ख़ुदा की इबादत न करते हों।” (Migne, Patrologia Graeca, VI, Col. 750, तारीख़ ए कलीसियाई अज़ मीन)।

      ईरीनादुस उन अक़्वाम के साथ जो मसीही हुए थे, अरबों को भी बनाम 'अहले-मशरिक़' शुमार करता है। चुनाँचे वो लिखता है कि:

“आज मसीही ईमान तमाम दुनिया में फैल चुका है। अगरचे उनकी ज़बानें अलैहदा-अलैहदा हैं, लेकिन उनकी रूह और उनके दिल एक ही हैं; ख़्वाह वो जुर्मानिया (Germania) के रहने वाले हों या आरिया या क़ल्तिया के रहने वाले हों या मशरिक़ के; ख़्वाह वो मिस्र के रहने वाले हों या लीबिया के या दुनिया के दर्मियानी ममालिक के रहने वाले हों; उन सब का एक ही ईमान और एक ही एतिकाद है, जिसको हम आफ़्ताब के साथ तश्बीह दे सकते हैं कि उसकी शुआएं सारी दुनिया को मुनव्वर कर रही हैं, लेकिन वो ख़ुद एक ही है।” (Migne, Patrologia Graeca, VII, p. 554, तारीख़ ए कलीसियाई अज़ मीन)

      तरतुलियान (Tertullian) तीसरी सदी के आग़ाज़ में अपनी किताब 'यहूदियों की तर्दीद' के फ़स्ल-ए-हफ़्तुम में लिखते हैं कि सिर्फ़ वही अक़्वाम मसीही नहीं हुईं जो रोमियों के मातहत हैं, बल्कि सरमानिया, दाक़िया, जर्मानिया, साक़ीशिया, अरबिया और मजहूल-उल-इस्म अक़्वाम, जो मुख़्तलिफ़ अतराफ़ और मुतफ़र्रिक़ जज़ाइर में रहती थीं, कसरत के साथ मसीही हुए हैं।

       हम इसी मज़मून में कहीं लिख चुके हैं कि ज़माना-ए-जाहिलियत में यमन और उसके अतराफ़ का दूसरा नाम 'हिंद' था, जो शुअरा ए जाहिलियत के अशआर में कसरत के साथ मज़्कूर है। नीज़ क़दीम मुअर्रिख़ीन की किताबों में भी 'हिंद' का इतलाक़ अरब के इसी हिस्से पर हुआ है। (आमाल-उल-मुक़द्दसीन, जिल्द दहुम, (आमाल उल मुक़द्दसीन, जिल्द दहुम, माह ए तिश्रीन अव्वल, सफ़्हा 670)। इसी 'हिंद' की तरफ़ इशारा करते हुए बुज़ुर्ग यूहन्ना फ़म-उज़-ज़हब 'यहूदियों की तर्दीद' में लिखते हैं कि:

“ज़रा ग़ौर तो करो कि किस सुर‘अत के साथ मसीही कलीसिया दुनिया में फैल रही है। ये सब कुछ ख़ुदा के फ़ज़्ल से है कि मुख़्तलिफ़ अक़्वाम अपने मज़हब और आबाई तालीम तर्क करके ख़ुदा की इबादत के लिए गिरजे तामीर करा रहे हैं। इन अक़्वाम में से बा’ज़ तो रूमी सल्तनत के मातहत हैं, मसलन: साक़ीशियन, अहले-अरब व अहले-हिंद (यमन); और बा’ज़ इसके बाहर जज़ाइर-ए-बर्तानिया और अक़्सा-ए-आलम तक फैली हुई हैं।” (Migne: Patralogie Grecque, xxi, 500, तारीख़ ए कलीसियाई अज़ मीन)

अरबिस्तान में मसीहियत का आग़ाज़

      नूबियुस तीसरी सदी मसीही में उन बुत-परस्त अक़्वाम का ज़िक्र करता है, जो मसीही मुबल्लिग़ों की तब्लीग़ के असर से बुत-परस्ती से ताइब होकर मसीही हो गई थीं। चुनाँचे वो लिखता है कि:

“इन अजीब बातों को देखो जो हुज़ूर मसीह के ज़हूर की वजह से दुनिया के रब‘ ए मस्कून में वाक़ेअ हुई हैं; हत्ता कि आज एक क़ौम भी ऐसी नहीं मिलेगी जिसमें बुत-परस्ती बदस्तूर बाक़ी रही हो। उनकी कीना-तोज़ तबीअत मुहब्बताना तबीअत से तब्दील हो गई है; उनकी अक़्ल मसीही ईमान की ताबे हो गई है। वो अक़्वाम जिनकी तबाइअ बाहम मुतबाइन और जिनकी फ़ित्रत बाहम मुख़ालिफ़ थीं, आज बाहम मुत्तहिद और मुत्तफ़िक़ हैं। इन अक़्वाम में क़ाबिल-ए-ज़िक्र हिंदी, चीनी, फ़ारसी, माद्दी और वो लोग हैं जो अरब के ममालिक में रहते हैं और मिस्री और एशिया के मुख़्तलिफ़ हिस्सों के रहने वाले और सुर्यानी और 10000 दर हर जज़ीरा और इक़लीम के शामिल हैं।” (किताब 2, फ़स्ल 5, 12)

      मुअर्रिख़ सोज़मान चौथी सदी ईस्वी में लिखता है कि: अरब के बा’ज़ मुख़्तलिफ़ शहरों और क़स्बों में बिशप मुक़र्रर हैं। (Migne, Patrologia Graeca, 67, 1476, तारीख़-ए-कलीसिया अज़-मीन)

       इसी तरह तादोरीतुस पाँचवीं सदी में अपनी किताब 'दवाए ए गुमराहाँ-यूनान' में लिखता है कि न सिर्फ़ वो लोग, जो कि रूमी क़वानीन के मातहत हैं मसीह पर ईमान लाए हैं; मसलन हब्श जो कि तयबा में ख़ेमों में रहते हैं और इस़्माईली क़बाइल; बल्कि और लोग भी मसीह पर ईमान ला चुके हैं, मसलन सरमायतह और हिंदी और अजमी और चीनी और बर्तानवी और जरमानी। (Migne, Patrologia Graeca, 88, p. 1037)

       इसी तरह अपनी एक दूसरी किताब में, जिसका नाम तारीख़-उर-रुहबान' है, इसी बयान को मुकर्रर रखता है। (Migne, Patrologia Graeca, 82, p. 1471, तारीख़-ए-कलीसिया अज़-मीन)

       यहाँ तो हमने आम तौर पर कुल अरबिस्तान का ज़िक्र किया है; आइंदा अरबिस्तान के हर हिस्से का जुदागाना तौर पर ज़िक्र करेंगे।

अरब-ए-शाम में मसीहियत


      अगर आप अरबिस्तान के नक़्शे में बहर-ए-शाम को ज़ेर-ए-नज़र रखकर शुमाली साहिल में त्राबुलुस और जनूबी साहिल में अक्का को आग़ाज़-ए-सफ़र करके इन दोनों शहरों में से ब-ख़त-ए-मुतवाज़ी मशरिक़ की तरफ़ हरकत करें, तो त्राबुलुस से दो मंज़िलों के बाद और अक्का से तीन-चार मंज़िलों के बाद एक ऐसे वसीअ सहरा में आप पहुँचेंगे कि अगर आप तदमुर की तरफ़ निगाह करें तो जहाँ तक आपकी निगाह पहुँचेगी वहाँ सहरा ही सहरा दिखाई देगा; और फ़ुरात आपके शुमाल में होगा। और अगर शाम की तरफ़ निगाह करें तो लज्जा और सफ़ा की पहाड़ियाँ हौरान के पहाड़ों तक और बल्क़ा के मैदान आपके जनूब में होंगे। इन तमाम वसीअ अतराफ़ को, जिनकी लम्बाई कम-ओ-बेश चार सौ किलोमीटर और चौड़ाई भी इसी क़दर है, सहरा या बादिया-ए-शाम कहते हैं।

       ये सहरा या रेगिस्तानी मैदान जैसा कि अब खाली और सुनसान पड़ा हुआ है, क़दीम ज़माने में ऐसा न था। रूमी सल्तनत के तसल्लुत के बाद से मसीहियत के इब्तिदाई सालों तक ये ख़ित्ता निहायत सर-सब्ज़ व शादाब था। इसमें बड़े आबाद शहर और मुस्तहकम और मज़बूत क़िले थे; आबपाशी के लिए बड़ी-बड़ी नहरें खुदवाई गई थीं और बरसात के पानी के जमा करने के लिए बड़े-बड़े तालाब थे। यहाँ खंडरात और आसार-ए-बाक़िया अब तक अपनी शान-ओ-शौकत पर ब-ज़बान-ए-हाल गवाही दे रहे हैं।

       इसके रहने वाले मुख़्तलिफ़ अनासिर के थे। बा’ज़ रूमी-उल-अस्ल थे जो इसको आबाद करने के लिए आए थे, बिल-ख़ुसूस वो रूमी सिपाही जो पेंशन लेने के बाद यहाँ आकर बसते थे; बा’ज़ यूनानी थे जो कि सिकंदर और सुलूकिया के ज़माने के पसमंदा थे; बा’ज़ फ़िनीक़ी थे जो तिजारत की ग़र्ज़ से यहाँ आए हुए थे।

       चूँकि ये ख़ित्ता अहले-अरब के मन्शा व ख़्वाहिश के ऐन मुताबिक़ था, इसलिए अरब भी आकर इसमें आबाद होने लगे। शहर के बसने वाले अपनी ज़राअत और क़नाअत में मशग़ूल हो गए और बादिया-नशीन अपने मवेशियों को इसके सर-सब्ज़ व शादाब जंगलों में चराते फिरते थे। यहाँ तक कि अरबों को यहाँ ग़लबा हासिल हुआ और इस तमाम सहरा-ए-शाम में जितनी क़ौमें आबाद थीं, उनमें से हर एक का जुदागाना मज़हब था। यूनानी और रूमी मुश्तरी, ज़हल, अतारुद और ज़ोहरा की परस्तिश करते थे, जिस तरह कि उनके आबा-ओ-अजदाद और अहले-वतन एथेनी और रोम में करते थे। फ़िनीक़ी तमूज़, अशारत और बाअल की परस्तिश करते थे; और नबती लात, शम्स और यतै’अ की परस्तिश करते थे। लेकिन रफ़्ता-रफ़्ता ये मुख़्तलिफ़ अक़्वाम बाहम मिल-जुल कर एक दूसरे के मा’बूदों की परस्तिश में शरीक हो गए।

       हुज़ूर मसीह के आसमान पर सऊद फ़रमाने की थोड़ी मुद्दत के बाद अरबिस्तान के पश्चिमी गोशे शाम की तरफ़ से मसीही मज़हब अरब में दाख़िल हुआ। यूनानी और सुर्यानी मुअर्रिख़ीन और उनके बाद मुसलमान मुअर्रिख़ीन की शहादत से साबित है कि मसीही मज़हब अव्वल-अव्वल हौरान के पाए-तख़्त यानी बोस्रा में दाख़िल हुआ।

       जब मसीही मज़हब यहाँ पहुँच गया, तो बग़ैर इसके कि उन बुत-परस्तों की किसी रस्म-ओ-रिवाज में शरीक हो या उनके बुत-परस्ताना अक़ाइद से मुतास्सिर हो, इन मुशरिकाना ख़यालात और इबादात की बराबर मुख़ालफ़त करता रहा और इन बुत-परस्तों को सिरात-ए-मुस्तक़ीम पर चलने की हिदायात फ़रमाता रहा।

       दोरतादुस उस सूरी, जिनके मुताल्लिक़ ख़याल किया जाता है कि वो हुज़ूर मसीह के उन सत्तर शागिर्दों में से थे जिनको ख़ुदावंद ने तब्लीग़ के लिए भेजा था (लूक़ा, 10), अपने जद्दे-अव्वल में लिखते हैं कि तीमून जो उन सात डीकनों (Deacons) में से था जिनका ज़िक्र आमाल (6:5) में है, बोस्रा (Bosra) में तब्लीग़ की ग़र्ज़ से गया और वहाँ का प्रिस्बिटर (Presbyter) मुक़र्रर हुआ।

      अल्लामा सम'आनी ने मकतबा-अल-शर्क़ (जिल्द 4, सफ़ा 20) में ज़बरदस्त दलाइल से ये साबित किया है कि एक नहीं बल्कि कई एक रसूल अरबिस्तान में गए और उनको पूरी कामयाबी हासिल हुई; ख़ासकर सहरा-ए-शाम और हौरान में तो उनको बेहद कामयाबी हासिल हुई। मुसलमान मुअर्रिख़ीन में से अल्लामा मक़रीज़ी 'किताब-अल-ख़ितत वल-आसार' में मुक़द्दस मत्ती के मुताल्लिक़ लिखता है कि“انہ سارا لی فلسطین وصور وصیدا وبصری”(जिल्द 2, सफ़ा 483), यानी फ़िलिस्तीन और सूर और सैदा और बोस्रा (Bosra) की तरफ़ रवाना हुआ।

      अल्लामा इब्ने ख़ल्दून अपनी तारीख़ में लिखता है कि:“ ان برتلمادس بعث الی ارض العرب الحجاز (2:150),” यानी बर्तलमाई मुल्क-ए-अरब और हिजाज़ की तरफ़ भेजे गए थे। तदमुर के मुताल्लिक़ सुलेमान बोस्रा का बिशप अपनी एक सुर्यानी किताब में लिखता है कि याक़ूब हलफ़ले के बेटे ने तदमुर में मुनादी की। (Budge: Book of the Bee, p. 106)

      मुअर्रिख़ीन-ए-अरब हमें ये बतलाते हैं कि सबसे अव्वल जिस क़बीला-ए-अरब ने मुल्क-ए-शाम में रूमी सल्तनत की ज़ेर-ए-निगरानी हुकूमत की वो क़बीला ए क़ुज़ाअ़ था, जो यमन के रहने वाले थे। इसके बाद क़बीला-ए-सलीह ग़ालिब आकर हाकिम बन गया; और इन दोनों के बाद क़बीला-ए-ग़स्सान शाम में आँहज़रत के ज़हूर तक बराबर हाकिम रहा; और ये तीनों क़बीले ईसाई हो गए थे।

      चुनाँचे याक़ूबी अपनी तारीख़ में लिखता है कि:

      ان قضاعة اول من قد م الشام من العرب فصارت لی ملوک الروم فملکو ھمہ فکان اول الملک لتنوح بن مالک بن فھمہ ۔قد خلوا فی دین التصل نیة فملکہ ملک الروم علی من ببلامہ الشام من العرب

      (तारीख़-ए-याक़ूबी, मतबूआ लंदन, जिल्द 1, सफ़ा 234)

      यानी: अरबी क़बीलों में से सबसे पहला क़बीला जिसने रोमियों की तरफ़ से शाम पर हुकूमत की वो क़ुज़ाअ़ था। तनूख़ बिन मालिक बिन फ़हम सबसे पहला बादशाह था। ये सब ईसाई हो गए थे।

      मसऊदी 'मुरूज-उज़-ज़हब' में लिखते हैं कि: “وردت سلیح الشام قتعلب علی تنوخ وتنصرت فملکنا اردم علی العرب الذین بالشام” यानी: सलीह शाम में दाख़िल हुआ और तनूख़ पर ग़ालिब आ गया और ईसाई हो गया; तब रोम की तरफ़ से शामी अरबों का अमीर मुक़र्रर हो गया। (मतबूआ पेरिस, 3:216)।

ग़स्सान का ईसाई होना

      मुअर्रिख़ याक़ूबी, सलीह के ईसाई होने के ज़िक्र करने के बाद लिखता है कि: “وتنصرتغسان مملکة من قبل صاحب الروم” यानी ग़स्सान ईसाई हो गया और साहिब-ए-रूम की तरफ़ से शाम का अमीर मुक़र्रर हुआ। (जि॰ 1 स॰ 233)

      फ़िरोज़ाबादी अपने 'क़ामूस' के दीबाचे में लिखता है कि: “ان کثیراً من ملوں الحیرة والیمن تنصر واواما ملوکہ غسان فکا نوا کلھمہ نصاریٰ” यानी हीरह और यमन के बादशाहों में से बहुत से मुलूक ईसाई थे। लेकिन ग़स्सान के तमाम बादशाह ईसाई थे; इसी तरह इब्ने ख़ल्दून ने भी मुलूक-ए-ग़स्सान के ईसाई होने का ज़िक्र किया है। (2: 271) जिसको ब-ख़ौफ़-ए-तवालत छोड़ देते हैं।

      ग़स्सान एक यमनी क़बीला था जो सद्द-ए-मआरिब के टूटने और सैल-ए-अज़्म के बाद यमन से निकलकर शाम में आकर बसा था। रफ़्ता-रफ़्ता उसने तमाम मुल्क को फ़तह किया और कुज़ाआ और सलीह की तरह मसीहियत के आग़ोश में आ गया। चुनाँचे मुअर्रिख़ीन-ए-अरब उनके मसीही होने पर यक-ज़बान और मुत्तफ़िक़ हैं।

      हमज़ा असफ़हानी तारीख़-उल-मुलूक वल-अम्बिया' में लिखता है कि शाहान-ए-ग़स्सान का दूसरा बादशाह, अम्र बिन जफ़ना ने शाम में मुतअद्दद गिरजे बनाए थे और उनमें बा’ज़ का नाम यूँ बताता है: “منھا دیر ھند ودیر حالی ودیرا یوب” (स॰ 117), यानी: “उनमें से एक हिंद का गिरजा और हाली का गिरजा और अय्यूब का गिरजा था।” फिर इसी किताब के सफ़ह 118 में ऐहम बिन हारिस बिन हैयला के मुताल्लिक़, जो मुन्ज़िर ग़स्सानी अकबर का भाई था, लिखता है कि: “وبنی دیر فخم ودیرا النبوہ” यानी: “उसने फ़ख़्म का गिरजा और अन-नुबूवह का गिरजा बनाया था।”

      दरहक़ीक़त अरब के मुअर्रिख़ों में एक भी ऐसा मुअर्रिख़ नहीं है जो उनकी मसीहियत से इख़्तिलाफ़ रखता हो। चुनाँचे मसऊदी 'मुरूज-उज़-ज़हब' (मतबूआ मिस्र) की जिल्द अव्वल, सफ़ह 206 में, और 'किताब-अत-तन्बीह वल-इशराफ़' (मतबूआ लंदन) के सफ़ह 265 में, और इब्ने रुस्तह अपनी किताब 'अल-आलाक़ अन-नफ़ीसा' (मतबूआ लंदन) के 217 में, और अबुल फ़िदा अपनी तारीख़ की जिल्द अव्वल, सफ़ह 76 में (अन-नवैरी Rasmussen 72)। ये सब उनकी मसीहियत की ताईद करते हैं।

      याक़ूबी अपनी तारीख़ की जिल्द 1 के सफ़हा 298 में लिखता है कि “واما من تنصر من احیاء العرب فقوم من قریش ومن الیمین طی وبھرا ء و سلح وتنوخ غسان ولخم” यानी अरब के क़बीलों में से जिन्होंने मसीहियत इख़्तियार की थी क़ुरैश का एक क़बीला था और यमन में से तै और बहरा और सलीह और तनूख़ और ग़स्सान और लख़म थे।

      इमाम स्यूती 'मुज़हिर' में किताब 'अल-अल्फाज़ वल-हुरूफ़' से नक़्ल करते हुए लिखते हैं कि किन-किन क़बीलों की ज़बान क़ाबिल-ए-सनद नहीं। “ولا من قضاعة وغسان وایا د لمحاورتھم اھد الشام واکثر ھمہ نصاریٰ یقرون بالعیرانیة” यानी क़ुज़ाआ और ग़स्सान और इयाद की ज़बान भी क़ाबिल-ए-सनद नहीं है। क्योंकि ये लोग अहले-शाम की मुजावरत में रहते और उनमें से अक्सर ईसाई हैं जो इबरानी पढ़ते हैं।

      अल्लामा शिब्ली लिखते हैं:

“ईसाई रऊसा-ए-अरब में सबसे ज़्यादा ताक़तवर और पुर-ज़ोर ग़स्सानी थे। जो रोमियों के हाथ में कठपुतली की तरह काम करते थे। बहरा, वाईल, बक्र, लख़म, हुज़ाम और आमिला वग़ैरह अरब क़बाइल उनके मातहत थे। उनके अलावा दूमत-उल-जन्दल, ऐला, जरहा, अरह, तबाला और जुरैश वग़ैरह के छोटे-छोटे ईसाई और यहूदी रईस थे। ग़स्सानियों के हमलों की इब्तिदा जिस तरह हुई वो ऊपर गुज़र चुका है। हारिस बिन उमैर जो शाह-ए-बोस्रा के दरबार में दावत-ए-इस्लाम का ख़त लेकर गए थे, उनको ग़स्सानियों ने रास्ते में क़त्ल कर दिया। आँहज़रत ﷺ ने 3000 मुसलमानों का एक दस्ता तादीब-ओ-इन्तिक़ाम के लिए रवाना फ़रमाया। ग़स्सानी 1 लाख का टिड्डी दल लेकर मैदान में आए और ख़बर थी कि रूमी भी इसी क़दर फ़ौज लिए हुए मौक़े से क़रीब 'मवाब' में पड़े हैं। ताहम मुट्ठी भर मुसलमान आदमियों के इस जंगल से न डरे और कुछ अज़ीज़ जानें खोकर फ़ौज को मैदान-ए-जंग से हटा लाए। इस जंग का नाम 'ग़ज़वा-ए-मूतह' है।”

      इसके बाद 9 हिजरी में ग़ज़वा-ए-तबूक पेश आया। दम-ब-दम ख़बरें आती रहती थीं कि रूमी-आवरी के लिए ईसाई अरबों की एक फ़ौज-ए-गिराँ तर्तीब दे रहे हैं और एक साल की पेशगी तनख़्वाह भी फ़ौज को तक़्सीम कर चुके हैं। ये भी ख़बर थी कि ग़स्सानी फ़ौज की आरास्तगी में मसरूफ़ हैं और घोड़ों की नाल-बन्दी करा रहे हैं। इस बिना पर आँहज़रत ﷺ ने तीस हज़ार (30,000) सहाबा के साथ पेश-क़दमी फ़रमाई और बीस दिन तक दुश्मनों की आमद का इन्तज़ार करते रहे। लेकिन कोई मुक़ाबिल न आया। ताहम इस पेश-क़दमी का ये फ़ायदा हुआ कि ग़स्सानियों के अलावा तमाम रऊसा ने रोमियों को छोड़कर इस्लाम की हिमायत क़बूल कर ली। (सीरत-उन-नबी हिस्सा अव्वल, जिल्द दोम सफ़हा 1009)

      मुअरिर्ख़ीन-ए-अरब के अलावा अरबिस्तान के माया-नाज़ और बे-मिस्ल शायर नाबग़ा ज़ैबाई (ज़ुबयानी) ग़स्सानी बादशाहों को ईसाई-उल-मज़हब बतलाता है। चुनाँचे वो अपने एक मशहूर क़सीदे में अम्र बिन अल-हारिस अल-असग़र की तारीफ़ में कहता है कि:

محلتھم ذات آلا لہ ودیننھم                    قوم فما یرجون غیر العواقب

رقاق النطال طیب حجزا تھم                   یحیون بالریحان یوم السبا سب

      यानी उनका मस्कन बैत-उल-मुक़द्दस और मुल्क-ए-शाम है और उनका मज़हब पायदार है। उनकी कोई और उम्मीद नहीं बजुज़ इसके कि उनका अंजाम ब-ख़ैर हो। वो शाहाना ज़िन्दगी बसर करते हैं और पाक-दामन हैं और ईद-ए-सबासिब (पाम सन्डे) में एक दूसरे को रैहान का तोहफ़ा पेश करते हैं। (क़सीदा बा-इया)

      हम कहीं लिख चुके हैं कि अरबिस्तान के मज़ाहिब के मुतअल्लिक़ सिर्फ़ मुअर्रिख़ीन-ए-अरब पर इक्तिफ़ा नहीं किया जा सकता है। क्योंकि जो कुछ लिखते हैं बर-सबील-ए-तज़्किरा और निहायत इख़्तिसार और परागंदा तौर पर लिखते हैं। इसलिए अरब के मुअर्रिख़ीन के साथ-साथ अलल-ख़ुसूस मसीही मज़हब के मुतअल्लिक़ यूनानी, रूमी और सुरयानी मुअर्रिख़ीन की तहारीर को भी ज़ेर-ए-नज़र रखना चाहिए। लिहाज़ा मैं ग़स्सान की मसीहियत के मुतअल्लिक़ अब इस क़िस्म की तवारीख़ के इक़्तिबास पेश करूँगा।

      ओसाबियुस क़ैसरी (Eusebius of Caesarea) अपनी तारीख़-ए-कलीसिया' (क॰ 6, फ़॰ 19) में लिखता है कि तीसरी (3rd) सदी ईसवी के आग़ाज़ में बोस्रा पाया-ए-तख़्त हौरान में मसीहियत कसरत के साथ रायज हो चुकी थी और मज़बूती के साथ जम चुकी थी। और ओरीजानूस के मुतअल्लिक़ जो इसकन्दरिया (Alexandria) का मशहूर उस्ताद और फ़िलासफ़र था, लिखता है कि तीन बार उसने बोस्रा का सफ़र किया। पहली बार बोस्रा के रूमी गवर्नर ने जिसका नाम जालियूस (Julius) था, 217 ई॰ को उनको मसीहियत की तालीम देने के लिए बुलाया। चुनाँचे वो अरब गया और उनको मसीहियत की तालीम और बपतिस्मा देने के बाद इसकन्दरिया लौट आया।

      यही मुअर्रिख़ फिर अपनी तारीख़-ए-कलीसिया (क॰ 6, फ़॰ 33) में लिखता है कि दूसरी बार ओरीजानूस ने फिर बोस्रा का सफ़र किया। क्योंकि हैरतूस बोस्रा का बिशप, जो अपने ज़माने के तमाम अरब के बिशपों में एक मशहूर और मुम्ताज़ बिशप था, अपनी फ़सीह और बलीग़ किताबों और रिसालों में चंद ऐसे ख़यालात का इज़हार किया था जो कुतुब-ए-मुक़द्दसा की रू से उलूहियत-ए-मसीह के मुनाफ़ी थे। इसलिए उनमें और उसके हम-अस्र बिशपों में इख़्तिलाफ़ पैदा हुआ। इस इख़्तिलाफ़ के दूर करने के लिए वहाँ के बिशपों ने ओरीजानूस को हौरान में आने की दावत दी। चुनाँचे ओरीजानूस वहाँ गया और बैरुलूस के शक़ूक और एतराज़ात को रफ़ा किया। जब हेरोदेस ने तमाम बिशपों के जलसा-ए-आम में अपने सही ईमान का इक़रार किया, तब ओरीजानूस वहाँ गया और बैरुलूस के शक़ूक और एतराज़ात को रफ़ा किया। जब हैरुलूस ने तमाम बिशपों के जलसा-ए-आम में अपने सही ईमान का इक़रार किया, तब ओरीजानूस वापस इसकन्दरिया आ गया।

      तीसरी बार फिर ओरीजानूस बादिया-ए-शाम में गया। क्योंकि वहाँ के लोगों में ये ग़लत तालीम फैल गई थी कि मौत के बाद जिस्म के साथ रूह भी फ़ना हो जाती है, लेकिन क़यामत के दिन ख़ुदा जिस्म के साथ रूह को फिर ज़िंदा कर देता है। जब ओरीजानूस को इसका इल्म हुआ तो फ़ी-उल-फ़ौर अरब की तरफ़ रवाना हुआ और वहाँ के एतराफ़-ओ-अकनाफ़ के चौदह (14) बिशप जमा हो गए। जिनके सामने ओरीजानूस ने कुतुब-ए-मुक़द्दसा की सही तालीम पेश की और वो अपनी ग़लती से बा’ज़ आ गया। तब ओरीजानूस फिर इसकन्दरिया को ये लौट आया। (तारीख़-ए-ओसाबियुस क॰ 6, फ़॰ 37)

       इस बयान को पढ़कर आप अंदाज़ा कर सकते हैं कि हौरान के अतराफ़ और बादिया-ए-शाम में किस कसरत के साथ ईसाई थे जिन्होंने दोबारा जलसा-ए-आम किया और एक बार तो उनके चौदह बिशप मौजूद थे। अगर आप हर एक बिशप के इलाक़े का हिसाब लगाएँ तो आपको यक़ीन हो जाएगा कि बादिया-ए-शाम अपने माहौल के साथ सब के सब मसीही हो गए थे।

      अरबिस्तान में मसीहियत के इर्तिक़ा-ओ-इल्तिआ का अंदाज़ा इससे हो सकता है कि मसीहियों का सबसे पहला बादशाह या रूमी क़ैसर अरबी था। हमारी मुराद उस क़ैसर से है जिसका नाम फ़ीलबूस (Philip the Arab) और अरबी-उल-अस्ल-वल-नस्ल था।

      244 ई॰ ता 249 ई॰ तक रूमी सल्तनत पर हुक्मराँ रहा। फ़ीलबूस बोस्रा का रहने वाला था। शुरू में रूमी फ़ौज के अदना सिपाहियों में दाख़िल हुआ। रफ़्ता-रफ़्ता तमाम फ़ौजी मनाज़िल को तय करता हुआ सिपह-सालार हुआ और इसके बाद वज़ीर-ए-हर्ब बना। अहले-फ़ारस के साथ लड़ने के लिए क़ैसर ग़रदियान सुवम के साथ रवाना हुआ। रास्ते में फ़ौज ने क़ैसर को मार डाला और फ़ीलबूस अरबी को अपना क़ैसर तस्लीम किया।

      फ़ीलबूस मज़हब के एतबार से ईसाई था। चुनाँचे तारीखी कुतबों से जो हाल ही में बरामद हुए हैं, जिनमें उसके सिक्के भी शामिल हैं, और अल्लामा ओरीजानूस के ख़ुतूत से जो उसका हम-अस्र था, ये बात साबित है। बा’ज़ मुअर्रिख़ीन का ये ख़याल है कि क़ैसर ग़रदियान सुवम इसी के ईमा से मारा गया। लेकिन दीगर तमाम मुअर्रिख़ीन इसके बर-ख़िलाफ़ हैं। ख़ुद मसीहियों के दिल में इसके मुतअल्लिक़ ये ख़याल पैदा हुआ था कि सल्तनत की तमअ (लालच) इसके दिल में ज़रूर पैदा हुई होगी, वरना वो अपने आग़ा की मदाफ़िअत (हिफ़ाज़त) करता और क़ातिलों को उनकी कैफ़र-ए-किरदार (सज़ा) तक पहुँचा देता।

      यही वजह है कि जब फ़ीलबूस शाहाना शान-ओ-शौकत के साथ रोमा की तरफ़ जाता हुआ अंताकिया पहुँचा और ईद-ए-फ़सह में अशा-ए-रब्बानी में शरीक होना चाहा, तो अंताकिया का बिशप बाबीलास ने उनको ये कह कर अशा-ए-रब्बानी से रोक दिया कि जब तक तुम अपने गुनाहों का इक़रार कर के तौबा न करोगे, उस वक़्त तक अशा-ए-रब्बानी में शरीक न हो सकोगे। चुनाँचे उसने ऐसा ही किया (तारीख़-ए-ओसाबियुस क़ैसरी क॰ 6, फ़॰ 34; तारीख़-ए-मुख़्तसर-उल-अव्वल अज़ इब्ने इब्री, सफ़हा 126; व तारीख़-ए-इसकन्दरी)

       तमाम रूमी मुअर्रिख़ीन इस पर मुत्तफ़िक़ हैं कि फ़ीलबूस अरबी की सल्तनत का ज़माना निहायत ख़ैर-ओ-बरकत का ज़माना था। इसके अहद-ए-सल्तनत में जिस क़दर तरक़्क़ी रूमी सल्तनत को नसीब हुई, उस क़दर तरक़्क़ी दीगर रूमी सलातीन के सद-साला ज़माने में भी न हुई थी। उसने हौरान में “ग़ुमान” को आबाद किया और उसका नाम अपने नाम पर (Philippopolis) रखा। मसीहियों को इसके अहद में बहुत आराम मिला और ख़ूब फैल गए, यहाँ तक कि इसके एक बुत-परस्त जनरल ने जिसका नाम दक़ियूस था, धोके से इसको और इसके बेटे को क़त्ल किया और ख़ुद क़ैसर बन बैठा।

       ओसाबियुस अपनी तारीख़ (क॰ 6, फ़॰ 39) में लिखता है कि दक़ियूस ने मसीहियों पर बहुत ज़ुल्म किया और उनका ख़ून बे-दरेग़ बहाया, महज़ फ़ीलबूस से बुग़्ज़ रखने की वजह से। और ज़ीयूस (औरोशियस) जो पाँचवीं सदी मसीही का मुअर्रिख़ है अपनी तारीख़ (क॰ 7, फ़॰ 21) में लिखता है कि दक़ियूस ने फ़ीलबूस और उसके बेटे को सिर्फ़ मसीही होने की वजह से क़त्ल किया। फिर यही मुअर्रिख़ लिखता है कि “फ़ीलबूस मज़हब के एतबार से तमाम दीगर क़ैसरों से गोए-सबक़त ले गया था।” (Paul Orosius, Hist. VII, C. T)

      नीज़ बोलन्दियों ने 'आमाल-ए-मुक़द्दसीन' (Acts SS. Ian. II. c. 17, 621) में बहुत से ऐसे शवाहिद जमा किए हैं जिनसे साबित होता है कि फ़ीलबूस एक पक्का ईमानदार मसीही बादशाह था। क्या अरबिस्तान के लिए फ़ख़्र कुछ कम है कि रोम के मसीही क़ैसरों में सबसे पहला क़ैसर अरबी था और इसके बाद क़ुस्तुनतुनीन (Constantine) मसीही हो गया।


5 Noon Alexandrioon.

      ऊपर के शवाहिद चौथी सदी मसीही के क़ब्ल के हैं। जब मसीही मज़हब सद-साला मसाइब और ईज़ा-रसानी (सताव) से उस सोने की तरह जो तपाने के बाद कुन्दन होकर निकलता आता है, मुज़फ़्फ़र और मन्सूर निकल आया और उसको आज़ादी मिल गई तो बादिया-ए-अरब में उसकी तरक़्क़ी दुगनी और इज़्ज़त चौगुनी हो गई। हमारे इस बयान की तस्दीक़ हौरान, सफ़ा, अल-लजा, जौलान और यलक़ा की उन कलीसियाओं और गिरजों से होती है जिनके आसार को मुतजस्सिसीन (Archaeologists) आसार-ए-क़दीमा ने दरयाफ़्त किया है। इन मुतजस्सिसीन में वाडिंगटन, वदी-व-दुकवी, द-तश्तीन और दुस्सो बहुत मशहूर हैं, जिन्होंने इन दरयाफ़्त शुदा आसार में से सैंकड़ों लातीनी और यूनानी कुतबे ऐसे मिले हैं जिनमें सदहा ऐसे मक़ामात के नाम मुन्दरज हैं जहाँ बड़े-बड़े गिरजे बने हुए थे या बड़े-बड़े बिशप रहते थे या बड़े-बड़े ज़ी-वजाहत मसीही रहते थे।

       इन कुतबों में से बा’ज़ पर ख़ास मसीही अलामतें मक्तूब हैं मसलन 'हिस्सा-ए-मसीह' के इस्म-ए-मुबारक का पहला हर्फ़ और लंगर, खजूर की डाली और मछली और बा’ज़ पर मसीही मज़हब के ख़ास मज़हबी जुमले मक्तूब हैं। मसलन “ख़ुदा एक है”, “मसीह ग़ालिब हुआ”, “मसीह कामिल ख़ुदा है।” उन्हीं कुतबों में एक अरबी कुतबा अरबी रस्म-उल-ख़त में हुर्रां में दस्तयाब हुआ है जिसकी तारीख़ 463 बोस्रा मुताबिक़ 568 ई॰ है और इस्लाम से पचास साल पहले का है। इस कुतबे में एक मश्हद का ज़िक्र है जो हज़रत यूहन्ना (यहया) बपतिस्मा देने वाले की यादगारी में अरब के एक सरदार ने जिसका नाम शराहिल था बनवाया था। (Ph. Le Bas & Waddington, Inscriptions Grecques et Latines, III, p. 568)

मसीहियत की तरक़्क़ी ज़ाहिदों की वजह से हुई।


      इन शवाहिद के अलावा इन बिशपों के जद्द-ए-अव्वल से भी इसकी ताईद होती है जो मुख़्तलिफ़ जलसा-हाए-आम में शरीक होते रहे हैं कि बादिया-ए-शाम में मसीही मज़हब पूरे तौर से क़ाबिज़ हो गया था। ख़ासकर नैकिया (Nicaea), क़ुस्तुंतुनिया (Constantinople), इफ़िसुस और खल्कीदोइया की मजालिस-ए-आम में कसरत के साथ ऐसे बिशपों के पते मिलते हैं जो बादिया-ए-शाम से आए हुए थे और इन मजालिस के फ़ैसलों पर उनके दस्तख़त मौजूद हैं। बा’ज़ों का नाम तो ख़ालिस अरबी है, मसलन हारिस और बा’ज़ों का नाम अरबी से मनक़ूल है, मसलन वूडोस, जिसकी अरबी 'अब्दुल्लाह' है और सियोडोरस, जिसकी अरबी 'वहबल्लाह' है। इन बिशपों में से बा’ज़ शहरों के बिशप थे जो बादिया-ए-शाम के आबाद शहरों और बस्तियों पर हुक्मराँ थे और बा’ज़ ख़ैमा-नशीनों के बिशप थे जो उनके साथ एक मुक़ाम से दूसरे मुक़ाम में ब-तलाश-ए-आब-ओ-गियाह मुंतक़िल होते रहते हैं। इस क़िस्म के बिशपों के दस्तख़त के साथ तवाक़ी (Documents) पर 'असाक़िफ़त-उल-ख़ियाम' लिखा हुआ है।

      अरबों के बिशपों में बड़े-बड़े मशहूर आलिम और साहिब-ए-करामात वली-अल्लाह गुज़रे हैं। चुनाँचे इन आलिमों में से एक फ़ाज़िल बनाम तितुस थे जो बोस्रा के रईस-उल-असाक़िफ़ा थे। उन्होंने बहुत सी किताबें लिखी हैं जिनमें निहायत मशहूर किताब वो है जो मानी बिदअत की तर्दीद में लिखी गई है। ये किताब एक मुद्दत तक मफ़क़ूद थी, लेकिन ख़ुश-क़िस्मती से हमारे ज़माने के मुतशरिक़ीन ने इस किताब को ढूँढ निकाला। चूँकि ये किताब सुरयानी (Syriac) ज़बान में है इसलिए अस्ल के साथ इसका तर्जुमा भी शाए कर दिया गया है। ये फ़ाज़िल यूलियानुस जैसे ज़ालिम क़ैसर के अहद में थे, लेकिन उसके ज़ुल्म से वो बे-ख़ौफ़ होकर मज़हबी ख़िदमत में मशग़ूल रहते थे।

       इनके बाद पांचवीं सदी ईसवी में एक और फ़ाज़िल इनका क़ायम-मक़ाम हुआ। जिनका नाम अंतीफ़ातर था। ये भी बहुत सी किताबों का माहिर था।

       यूनानी मुअर्रिख़ीन मसलन सोज़ोमान (382 क) वरूफ़ीनूस (क॰ 2, फ़॰ 61) दिसादोरीतस (क॰ 4, फ़॰ 2) वसावफ़ान 329 ई॰ की तारीख़ों में दीगर मुअर्रिख़ीन जो चौथी सदी से लेकर छठी सदी के आख़िर तक थे। सब के सब इस पर मुत्तफ़िक़ हैं कि अरबिस्तान में मसीही मज़हब इन ज़ाहिद और तारिक़-उद-दुनिया और उज़्लत-नशीन राहिबों और नासिकों के तुफ़ैल से बढ़ा और फला-फूला जो अरबिस्तान के सहराओं और सुनसान रेगिस्तानों में आकर ख़ुदा की इबादत और रियाज़त में मशग़ूल हो गए थे। ये आरिफ़ान और आशिक़ान-ए-इलाही साहिब-ए-करामात और मुस्तजाब-उद-दअवात (जिनकी दुआ क़बूल हो) थे जिनकी करामात मुख़्तलिफ़ सूरतों में ज़ाहिर होती थीं मसलन बीमारों को शिफ़ा देना। इमराज़-ए-ख़बीसा को रफ़ा करना। रूहानी और जिस्मानी बरकतों का फ़ैज़ान करना। ये ऐसी बातें थीं जिनको देखकर ख़ुद-ब-ख़ुद लोग एतराफ़-ओ-अकनाफ़ से आकर उनसे बपतिस्मा लेने की इस्तिदआ करते थे।

      मुअर्रिख़ सोज़ोमान अपनी तारीख़ (Sozomene, H.E. VI, C. 38) में अरब-अश-शाम की निस्बत लिखता है कि “वालेंस 364 ई॰ ता 371 ई॰ के ज़माने से पेशतर बहुत कसरत के साथ अहले-अरब (जिसको वो 'शरक़ीन' लिखता है) इन ज़ाहिदों और रहबानों के वसीले से मसीही हो गए थे जो अरबिस्तान की मुख़्तलिफ़ अतराफ़ में उज़्लत-नशीन हो गए थे। और जो साहिब-ए-मो’जिज़ात और करामात थे।” इसके बाद सोज़ोमान ग़स्सानियों के एक बहुत बड़े क़बीले के मसीही होने का ज़िक्र करता है कि एक आरिफ़-बिल्लाह मसीही की दुआ की वजह से ख़ुदा ने उनके एक सरदार ज़जअम (ज़ोकोमोस) को फ़रज़न्द-ए-नरीना (बेटा) अता किया। इसलिए वो सरदार अपने कुल क़बीले के साथ मसीही हो गया।

       फिर यही मुअर्रिख एक मलका-ए-अरब के मसीही होने की कैफ़ियत लिखता है जिसका नाम नादिया (माविया) था। और जिसने रोमियों के साथ लड़कर उनको शिकस्त दी। और मिस्र की सरहद तक उनके मक़्बूज़ा ममालिक पर क़ब्ज़ा कर लिया। रोमियों ने उनके साथ सुलह करनी चाही तो उसने इस शर्त पर सुलह करना मंज़ूर किया कि उस मशहूर ज़ाहिद-ओ-ख़ुदा-शनास शख़्स को जिनका नाम मूसा और साहिब-ए-मो’जिज़ात हैं मेरी ममलकत में भेज दो। चुनाँचे ये आरिफ़-बिल्लाह वहाँ गए और इनके तुफ़ैल से कसरत से लोग मसीही हो गए। झाओ-दूरीतस (थियाडोरीटस) अपनी तारीख़ (क॰ 4, फ़॰ 30) में लिखता है कि “ये मलका बहुत ही ईमानदार मसीहिया थी। जिसकी लड़की की शादी एक रूमी जनरल के साथ जिसका नाम विक्टर था हुई।”

      सोज़ोमान लिखता है कि “जब ग़लत (गोथ) लोग क़ुस्तुंतुनिया पर हमला करने वाले थे तो रोम के बादशाह ने अरबों के एक फ़िर्क़े से मदद ली जो मादिया (माविया) का मातहत था। (H.E. VI. C. 1)”

       बिला-अरब (विलाद-ए-अरब) में मसीहियों की कसरत का अंदाज़ा ओसाबियुस क़ैसरी (क॰ 8, फ़॰ 31) के इस क़ौल से हो सकता है कि “दिओ-ग़लत-बानूस (दियूक्लितियानुस) के ऐम-ए-सल्तनत में इस कसरत के साथ अरब के मसीही शहीद हुए जिनका शुमार नहीं हो सकता है।” आज तक रोमन कैथोलिक गिरजों में बहुत से अरब के मसीही शुहदा (Martyrs) की यादगारी इबादत उनकी मुक़र्ररा तवारीख़ में अदा की जाती है।

      तारीख़-ए-कलीसिया के पढ़ने से मालूम होता है कि बादिया-ए-अरब की एतराफ़-ओ-अकनाफ़ में मुस्तइद उसक़ुफ़ी इलाक़े क़ायम हो चुके थे। चुनाँचे बोस्रा (Bostra) का बिशप तन्हा बीस और बरिवायत-ए-दीगर तैंतीस बिशपों पर निगराँ था। (Rene Dascaud'), p. 77)

       अल-मुख़्तसर, दलाइल-ए-माफ़ौक़ से साबित है कि बादिया-ए-शाम में मसीही मज़हब ने कामिल नुफ़ूज़ (Influence) और इक़्तिदार (Power) हासिल कर लिया था। मसीहियत का नुफ़ूज़ और इक़्तिदार ज़ुहूर-ए-इस्लाम तक बराबर जारी और सारी रहा और मसीहियों की कसरत का ये आलम था कि जब अरब के मसीही रूमी झंडे के नीचे मुसलमानों के हमलों की मुदाफ़िअत (Defense) करने की ग़रज़ से जमा हो गए थे तो उनकी फ़ौज की तादाद एक लाख से ज़्यादा थी। (इलियास अल-नसीबीनी अल-मुअर्रिख, सफ़हा 109)

       अल्लामा शिब्ली लिखते हैं कि “रोमियों ने और हुदूद-ए-शाम के ईसाई अरबों ने इस्लाम के इस्तीसाल का बीड़ा उठाया। ईसाई रऊसा-ए-अरब में सबसे ज़्यादा ताक़तवर और पुर-ज़ोर ग़स्सानी थे जो रोमियों के हाथ में कठपुतली की तरह काम करते थे। बहरा, वाइल, बक्र, लख़्म, जुज़ाम और आमिला वग़ैरह अरब क़बाइल उनके मातहत थे। इनके अलावा दूमत-उल-जन्दल, ऐला, जरबा, औरम, तबाला और जोश वग़ैरह के छोटे-छोटे ईसाई और यहूदी रईस थे।

       ग़स्सानियों के हमले की इब्तिदा जिस तरह हुई वो ऊपर गुज़र चुका है। हारिस बिन उमैर जो शाह-ए-बोस्रा के दरबार में दावत-ए-इस्लाम का ख़त लेकर गए थे, उनको ग़स्सानियों ने रास्ते में क़त्ल कर दिया। आँ-हज़रत ﷺ ने तीन हज़ार मुसलमानों का एक दस्ता तादीब-ओ-इन्तिक़ाम के लिए रवाना फ़रमाया। ग़स्सानी एक लाख का टिड्डी-दल लेकर मैदान में आए। और ख़बर थी कि रूमी इसी क़दर फ़ौज लिए हुए मौक़े से क़रीब मुआब में पड़े हैं। (सीरत-उन-नबी, हिस्सा अव्वल, मुजल्लिद दोयम, सफ़हा 9)

       मुख़्तसर ये कि मुख़्तलिफ़ तवारीख़ के इक़्तिज़ा से बिला किसी शाइबा-ए-रैब (बगैर शक के) साबित होता है कि बादिया-ए-शाम ईसाइयों का घर बन चुका था। उनकी कसरत की ये कैफ़ियत थी कि आनन-फ़ानन लाखों की तादाद में फ़ौज मैदान-ए-कारज़ार में भेज सकते थे।

अरब अल-ग़ौर, सुलैत और बल्क़ा में मसीहियत


       जिस इलाक़े में दरिया-ए-यर्दन बहता है, उस इलाक़े को ग़ौर कहते हैं। दरिया-ए-यर्दन अपने मुआविन बानियास के एतबार से हरमों के पहाड़ों से निकल कर जुनूब की तरफ़ बहता हुआ हूला की झील को बना कर गलील की झील में गिरता है। फिर गलील की झील को चीरता हुआ नशीब की तरफ़ अपने मशरिक़-ओ-मग़रिब में ऊँचे-ऊँचे किनारे बनाता हुआ इस क़दर नीचे हो जाता है कि 300 मीटर बहर-ए-शाम के नीचे होता हुआ बिल-आख़िर बहर-ए-लूत में गिरता है।

       यर्दन के मशरिक़ में बहुत वसीअ बिलाद आबाद हैं। जिनमें अज्लूल (अज्लून), जिलआद और बनू के सरी-फ़लक पहाड़ खड़े हैं। ये सिलसिला हयाल मवाब (जबाल-ए-मवाब) तक चला जाता है, जिनमें वसीअ सरसब्ज़ वादी और ख़ुशनुमा व ज़र्ख़ेज़ कश्त-ज़ार (खेत) वाक़ेअ हैं। जिनमें सुलैत और बलआम और मवाब के सहरा बहुत ही मशहूर हैं। समारी मवाब (सहारी-ए-मवाब) शुमाल में बादिया-ए-शाम से और जुनूब में करक व एतराफ़-ए-नबत और जज़ीरा-नुमा सीना से मिलते हैं। इसी इलाक़े में अम्मूनी, मवाबी और मिदयानी अक़्वाम (कौमों) अरबों के बाद जब ईज़ा-रसानी (सताव) रसूलों पर शुरू हुई (अमाल 8:1) तो बहुत से मसीही इस इलाक़े में आकर पनाह-गुज़ीन हुए और जब हुज़ूर मसीह की पेशीनगोई के मुताबिक़ रोमियों ने यरूशलेम को सतह-ए-ज़मीन के साथ बराबर कर दिया और बे-हिसाब यहूदियों को क़त्ल कर डाला तो मसीही अपने मुन्जी के हुक्म के मुताबिक़ यरूशलेम से निकले और उनमें से एक मुअतद-ब-हिस्सा (बड़ा हिस्सा) इसी एतराफ़ में आकर मुक़ीम हुआ। (ओसाबियुस मुअर्रिख)

      मसीहियों के आने से अरबिस्तान का ये हिस्सा भी मसीहियत की ज़िया-पाशियों से मुस्तय्यिर (मुस्तनीर) हुआ। चुनाँचे उनके संजा-अम्मा (ज़जअम) के मसीही होने का हाल जो ग़स्सानियों से बहुत पहले इस ख़ित्ते पर हुक्मरान थे, तवारीख़ के औराक़ में आज तक महफ़ूज़ है। इन बादशाहों में से एक का नाम दाऊद था, जो हबूला अल-मअरूफ़ लशक़ का बेटा था और उसका मक़ाम नादब में था। (इब्ने ख़ल्दून 2:153) इस शख़्स ने शाम में एक ख़ानक़ाह अपने नाम पर (दैर-ए-दाऊद) बनवाई थी। (1. इश्क़ाक़ इब्ने दुरीद)

       चौथी सदी ईसवी में जब मसीहियों को तकलीफ़ और ईज़ा देने का सिलसिला बंद हो गया और उनको किसी क़दर इत्मीनान नसीब हुआ तो उन्होंने इस ख़ित्ते को दो शहरों की अयालत में तक़्सीम किया। एक हिस्से का नाम फ़िलिस्तीन-सानिया रखा, जिसका हाकिम-नशीन शहर बासां (बिसान) था। और दूसरे हिस्से का नाम फ़िलिस्तीन-सालिसा रखा जिसका हाकिम-नशीन शहर सिलअ (पतरा) था। इस्लाम से क़ब्ल इस इलाक़े में चालीस से ज़्यादा बिशपी इलाक़े थे जिनके बिशपों के नाम आज तक महफ़ूज़ हैं। इससे इस बात का अंदाज़ा बख़ूबी हो सकता है कि अल-यर्दन में किस कसरत से मसीही आबाद थे।


6 इब्ने-ख़ल्दून अपनी किताब 'अल-इश्तियाक़ के सफ़हा 319 (मतबूआ ब्रक) में लिखता है कि “संजा-अम्मा ग़स्सानियों से पहले शाम का बादशाह था।”

      अरबिस्तान में मसीहियत की कामयाबी का सेहरा उन ख़ुदा-शनास उज़्लत-गुज़ीं और फ़रिश्ता-सीरत मसीही दरवेशों और सय्याहों के सर था जिन्होंने दुनिया व माफ़ैहा (दुनिया और जो कुछ इसमें है) से बे-नियाज़ होकर अरबिस्तान के शोला-ख़ेज़ रेगिस्तान व ताबनाक कोहस्तानी इलाक़ों को बारगाह-ए-इलाही के लिए अपना मस्कन बनाया था। और जिनकी मो’जिज़ा-नुमा ज़िन्दगियों ने अरब के रहने वालों के दिलों को मुसख़्ख़र कर लिया था। चुनाँचे हीरोतीमुस बुज़ुर्ग हिलाज़्युन के हालात बयान करता हुआ लिखता है कि:

“ये जलील-उल-मर्तबा व बुलन्द-पाया बुज़ुर्ग ग़ज़्ज़ा की एतराफ़ के किसी गोशा तन्हाई में इबादत-ए-इलाही में मुस्तग़रिक़ रहा करते थे। एक दफ़ा आप अपने एक शागिर्द की इयादत के लिए ख़लसा आ गए। ख़लसा और उसके माहौल के अहाली सब के सब बुत-परस्त और ख़ास कर ज़ोहरा के परस्तार थे। इत्तिफ़ाक़ से वो दिन ज़ोहरा की ईद का दिन था। आपकी आमद की ख़बर आनन-फ़ानन सब में फैल गई। और चूँकि इन एतराफ़ में आपके मो’जिज़ात बे-हद मशहूर हो चुके थे और सैंकड़ों आपकी दुआओं से फ़ैज़-याब हो चुके थे। इसलिए जोक़-दर-जोक़ आकर इल्तिमास करने लगे कि आप हमारे पास क़याम इख़्तियार करें। आपने उनसे कहा इस शर्त पर मैं यहाँ क़याम करूँगा कि तुम बुत-परस्ती को छोड़ कर मसीह पर ईमान लाओ। चुनाँचे बुत-परस्तों ने इस शर्त को क़बूल किया और मसीही हो गए। सबसे पहले जिन्होंने मसीहियत का इक़रार किया वो उनके काहिन और पुरोहित थे। और उसी वक़्त एक अज़ीम-उश-शान गिरजा की बुनियाद रखी गई।” (Migne P.L. XXXIII Col 42)

      इस वक़्त ख़लसा के एतराफ़ में कसरत के साथ मसीहियत के आसार पाए जाते हैं। इनके बहुत से बिशपों के नाम आज तक महफ़ूज़ हैं, जिनमें से एक का नाम अब्दुल्लाह है।

       इन्हीं एतराफ़ में एक अरबी फ़िर्क़ा बसता था, जो नबत (Nabataeans) या नबीत के नाम से मशहूर था। इसी फ़िर्क़े ने एक अज़ीम-उश-शान सल्तनत की बुनियाद डाली थी जो बहुत दूर-दूर तक पहुँच गई थी। इसका पाया-ए-तख़्त (Capital) पतरा (Petra) था, जिसको इब्रानी और अरबी में सिलअ और अर-रक़ीम कहते थे। इस शहर के आसार-ए-बाक़िया अब बाक़ी हैं, जिनको देखकर इस शहर की अज़मत और अबहत का किसी (क़दर) अंदाज़ा हो सकता है।

       हज़रत मसीह से पाँच सौ साल क़ब्ल इसी फ़िर्क़े का ज़ुहूर हुआ। रफ़्ता-रफ़्ता इसने यहाँ तक तरक़्क़ी की कि हज़रत मसीह से दो सौ साल क़ब्ल इनकी सल्तनत मुस्तक़िल और मुस्तहकम बन गई। इनके बादशाहों में से बड़े-बड़े मशहूर बादशाह गुज़रे हैं, जिनके कारनामे आज तक तारीख़ के सफ़हात में महफ़ूज़ हैं। इनके सबसे पहले बादशाह का नाम “अल-हारिस अल-अव्वल” था। इनकी सल्तनत दूसरी सदी ईसवी के पहले अशरे तक क़ायम थी। इसके बाद रूमी सल्तनत ने इसको फ़तह किया और एक रूमी गवर्नर की मातहती में सल्तनत-ए-रूम में दाख़िल किया। इनके सबसे आख़िरी बादशाह का नाम मलिकोस था जो लफ़्ज़ 'मलिक' का बिगाड़ है।

      इस इलाक़े में और ख़ास कर इसके पाया-ए-तख़्त (अर-रक़ीम) में मसीहियत की कसरत का अंदाज़ा इससे हो सकता है कि मुक़द्दस पौलूस जब मसीही हुए तो अक्सर मुअर्रिख़ीन के नज़दीक अरबिस्तान के इसी इलाक़े में तीन साल तक आकर रहे। नीज़ मुक़द्दस पौलूस जैसे मुबल्लिग़ रसूल का तीन साल अर-रक़ीम में रहना क्या बे-असर रहा होगा? नहीं और हरगिज़ नहीं बल्कि मुक़द्दस पौलूस की सुहबत के असर से निहायत कसरत के साथ लोग मसीही हुए होंगे। रफ़्ता-रफ़्ता तमाम नबती एतराफ़ में मसीहियत यहाँ तक फैल गई कि इस्लाम के ज़ुहूर से क़ब्ल ये फ़िर्क़ा कुल का कुल मसीही हो गया था। और इस्लाम के बाद इनकी मसीहियत यहाँ तक मशहूर हो गई थी कि नबती मसीहियत का मुतरादिफ़ समझा जाता था। मसलन साहिब-ए-मक़ामात-ए-बदी ने अपने निसाब उल जमाल लि फ़त्हि अबी अल फ़त्ह अल इस्कंदरि को मक़ाम-ए-क़ज़्वीनिया में ब-म’अना-ए-मसीही ज़ाहिर किया है।

      चुनाँचे अबू अल-फ़तह अल-इस्कंदरी का जब ये शेअर सुनता है कि:

ان الک امنت فکمہ لیلة حجدت فیھا وعبد ت تصلیب
تو اس سے سوال کرتاہے کہ " اّ نت من اولہ النبیط


7 अगर्चे अब मैं मुसलमान हो गया हूँ, लेकिन इस से क़ब्ल कई रातें गुज़र चुकी हैं, जिनमें इस्लाम से इन्कार करता था और सलीब की इबादत करता था।

       नवाहि-ए-ग़ौर में दरिया-ए-यर्दन के दोनों किनारों में कसरत के साथ गिरजे और खानक़ाह बनी हुई थीं, जिनमें से क़रीबन बीस निहायत मशहूर-ओ-मारूफ़ थे। जिनमें से अक्सर के निशानात का इंक़शाफ़ मदरसा-ए-सलाहिया के फ़ाज़िल प्रिंसिपल पादरी आर॰ पी॰ जे॰ एल॰ फ़दरलीन साहब ने हाल ही में किया है जिनके तारीख़ी वाक़िआत और कवाइफ़ को निहायत तफ़सील-ओ-तशरीह के साथ “मजल्ला अल-अर्ज़-उल-मुक़द्दसा” बाबत 1902 व 1907 ई॰ में बयान किया है।

       इन खानक़ाहों में अरब के मसीही आकर उज़्लत-गुज़ीं (गोशा नशीं) बनकर ख़ुदा की इबादत में रात-दिन मशग़ूल रहते थे। इन अरब उज़्लत-नशीनों में यरूशलेम के रईस-असाक़िसा बुज़ुर्ग ईलिया बहुत ही मशहूर हैं जो ख़ालिस अरबी थे। ये बुज़ुर्ग अपने मुल्क से निकल कर दैर-ए-नतरून में जाकर गोशा-नशीं हुए जो मिस्र में थी। फिर वहाँ से निकल कर दरिया-ए-यर्दन के दहने किनारे पर दैर-ए-सापसास में मशग़ूल-ब-इबादत हुए और यहीं से यरूशलेम के पत्रियर्क (Patriarch) मुंतख़ब हुए और 513 ई॰ में ऐला में वासिल-ब-हक़ हुए।

       इन बुज़ुर्गों में से जिन्होंने अरबिस्तान को अपनी तब्लीग़ की जौलाँ-गाह या ब-इबादत-ए-दीगर रज़्म-गाह बनाया था बुज़ुर्ग अफ़ीतिमूस निहायत मशहूर बुज़ुर्ग गुज़रे जिनको महज़ तब्लीग़ और रूहानी एजाज़ की वजह से कवकब-ए-यरीता-अल-अर्दन का ख़िताब मिला था। ये बुज़ुर्ग आया पाँचवीं सदी के ऐन वस्त में इस बा-बरकत ख़िदमत के लिए इलाही इंतिख़ाब से मुंतख़ब हुए थे। कीरिलस जो एक मशहूर मुअर्रिख़ और ख़ुदा-परस्त राहिब और उनका हम-अस्र था। इस वाक़िये को किसी क़दर तफ़सील के साथ बयान करता है जिसको फ़ादर पीटर्स ने बोलंदियों की जमाअत से (अल-मशरिक़ 12:344-353) उस अरबी क़दीम नुस्ख़े से नक़ल करता हुआ रिवायत करता है जो आज तक अल-मशरिक़ के कुतुब-ख़ाना बेरूत में मौजूद है।

      जिसका ख़ुलासा ये है कि एक बुत-परस्त शख़्स को जो कि यूनानी असल था और अस्पा-बा (सिपह-बद) के ख़िताब से मशहूर था, अर्दशिर ने फ़ारस की सरहद में हाकिम मुक़र्रर किया। जब उसके अहद में मसीहियों पर ईज़ा-रसानी और तकलीफ़-देही शुरू हुई, तो मसीही ईरान की सरज़मीन से निकल कर रूमी इलाक़े में आकर बसने लगे। बा-वजूद इसके कि अर्दशिर ने सिपह-बद को हुक्म दिया था कि मसीही रूमी इलाक़े में घुसने न पाएँ तो भी इस सिपह-बद ने उनको रूमी इलाक़े में दाख़िल होने से न रोका। इस पर आतिश-परस्तों ने अर्दशिर के पास जाकर सिपह-बद के बर-ख़िलाफ़ शिकायत की। जब सिपह-बद को इसका इल्म हुआ तो ये भी वहाँ से भाग कर रूमी इलाक़े में दाख़िल हुआ। वहाँ के गवर्नर अनातोलियस ने इसकी बहुत ख़ातिर-मदारत की और इन अरबी इलाक़े पर उसको हाकिम मुक़र्रर किया और जो रूमी सल्तनत के मातहत था।


8 क्या तू नबतियों में से है।

       इस सिपह-बेद का एक लड़का था, जिसका नाम तराबून था और फ़ालिज-ज़दा था। इसके मुआलजा करने में जो कुछ इसके वालिद के इमकान में था, सब ख़र्च कर चुका; लेकिन बे-फ़ायदा। इसके ज़्यादा तज़रीह (तज़र्रुअ) और इब्तिहाल की वजह से इन पर इल्हाम हुआ कि वो बुज़ुर्ग अफ़ीतिमूस की तरफ़ रुजू करे। चुनाँचे ये उनकी ख़िदमत में हाज़िर हुआ। बुज़ुर्ग अफ़ीतिमूस ने इस लड़के के लिए दुआ की, जिसकी वजह से वो बिल्कुल सेहत-याब हुआ। इस मो’जिज़े को देख कर इसका वालिद यानी सिपह-बेद मसीही हुआ और उसका मसीही नाम पतरस रखा गया।

       इसके बाद इसके तमाम घर वाले और मुतअल्लिक़ीन भी मसीही हुए और उनके असर से अरबों की एक बहुत बड़ी तादाद मसीही हुई। और बुज़ुर्ग अफ़ीतिमूस बराबर उनकी तालीम-ओ-तब्लीग़ में कोशाँ रहे। फिर इन अरबों के असर से और बहुत से अरब मसीही होते रहे। जब इस बुज़ुर्ग ने देखा कि अरब कसरत से मसीही हो रहे हैं, तब उन्होंने अपनी ख़ानक़ाह के क़रीब ही एक टुकड़ा ज़मीन इनको देकर कहा, “तुम इसको अपने लिए आबाद करो।” और एक कुआँ और एक गिरजा और उनके सरदार के लिए एक मकान बनवाकर दिया। इसके बाद बुज़ुर्ग अफ़ीतिमूस के साथ पतर-यार्क (Patriarch) (रईस-उल-असाक़िफ़ा) मुत्तफ़िक़ होकर पतरस को इन अरबों का बिशप मुक़र्रर किया और अब अरब और कसरत के साथ मसीही होने लगे और इस नई आबादी में बसने लगे। छठी सदी मसीही के आख़िर तक इनके बिशपों के तक़र्रुर का ज़िक्र मिलता है।

       इसी तरह मजमा-उल-जमामे (Noblie Collect Occi III 728) में ज़िक्र है कि रईस-उल-असाक़िफ़ा युलीनास 430 ई॰ में अरब के मुख़्तलिफ़ इलाक़जात के लिए बहुत से बिशप मुक़र्रर किए, जो इस पर दलील है कि अरब फ़िलिस्तीन में कसरत के साथ मसीही फैले हुए थे। इससे क़ब्ल 363 ई॰ अंताकिया के मजलिस-ए-आम में एक बिशप का नाम दस्तख़त के तौर पर सब्त है, जिसका नाम तातीमूस है। और अपना दस्तख़त यूँ सब्त किया है कि “तावतीमूस अरब का बिशप”, ग़ालिबन नवाहि-ए-तदमुर का बिशप होगा जहाँ मसीहियत को ख़ातिर-ख़्वाह कामयाबी हासिल हुई थी। ये कामयाबी सिर्फ़ इसके बड़े-बड़े शहरों में महदूद न थी; मसलन तदमुर, क़र्यतैन, हवारैन में बल्कि ख़ुद तदमुर के बादिया में मसीही मज़हब आम तौर पर फैल चुका था।

तूर-ए-सीना और नजब में मसीहियत


      खलीज-ए-अक़बा और खलीज-ए-सुवेर (सुएज़) के दरम्यान जो मख़रूत-नुमा मुसल्लस टुकड़ा है, इसी टुकड़े को जज़ीरा-नुमा सीना कहते हैं और इसके जुनूबी हिस्से को अल-नजब या अल-नजलीब कहते हैं। इसी जज़ीरे में बादिया-ए-तीह और बरिया-ए-फ़ारान वाक़ेअ है। इसके पहाड़ों में हबल (जबल), अज़न्दल, हबल (जबल) सराबीत अल-ख़ादिम, हबल (जबल) अल-तीह और ख़ुसूसन तूर-ए-सीना, हौरेब और हबल (जबल) मूसा और हबल (जबल) सरबाल और हबल (जबल) कातरीन बहुत ही मशहूर हैं। बनी इसराईल के ज़माने में इस क़ित्ते (ख़ित्ते) के शुमाली हिस्से में अदूमी, अमालिकी और मिदयानी फ़िरक़े बसते थे। इसके बाद अरब के दोनों फ़िर्क़े यानी इस्माईल और नबती ने आकर इस ख़ित्ते पर क़ब्ज़ा किया और तक़्सीम करने के बाद इसमें ब-तौर-ए-ख़ानाबदोशों के बसने लगे।

      ख़ुदावन्द के सऊद फ़रमाने के बाद ही रसूलों ने इस ख़ित्ते को इसकी अज़ीमुश्शान और मज़हबी रिवायात की बिना पर अपना मज़रा’अ बनाया। चुनाँचे मुक़द्दस बरतलमई के मुतअल्लिक़ ये आम रिवायात है कि “उन्होंने बिलाद अल-अरब और नबत को शागिर्द बनाया।” बिलाद अल-अरब से मुराद इस जज़ीरे के जुनूबी हिस्से और ख़ास कर यही अतराफ़ हैं। मक़रीज़ी अपनी तारीख़ में क़िब्त के मुतअल्लिक़ लिखते हैं कि:

ان متیاس سار ابی الابا لشراة فبشر فیھا بالمسیح

      यानी “मत्तियास (ये वो रसूल हैं जिनको यहूदाह इस्करयूती के एवज़ में चुन लिया गया था) ने बिलाद अल-शरात में जाकर मसीहियत की बशारत दी।”


9 नजब के म’अनी ही जुनूब के हैं।

10 पहाड़ से (जबल); लेकिन ख़ितत वल-आसार मतबुआ मिस्र में (2:483) बशरात के एवज़ में “अल-शर्क़” है जो मेरी दानिस्त में सहव-ए-किताबत है (मिन्हु)।

       पहली सदी मसीही से मसीहियों का आना यहाँ शुरू हुआ था; बा’ज़ तो महज़ तनस्सुक और ज़ुहद की वजह से यहाँ आकर रहते थे, और बा’ज़ वो लोग थे जो बुत-परस्तों की ईज़ा और तकालीफ़ से बचने की ख़ातिर यहाँ मुक़ीम होते थे।

       बुज़ुर्ग युनीसियुस जो कि इसकिन्दरिया के बिशप थे, अपने इसी मक़तूब में जो बुज़ुर्ग फ़लबियूस अंताकिया के बिशप को लिखा था, उन मसाइब व तकालीफ़ का ज़िक्र करते हैं जो मिस्र के मसीहियों पर मुशरिकों और बुत-परस्तों और ख़ास कर क़ैसर दक़ियूस के हाथों पहुँची थीं। चुनाँचे वो लिखते हैं कि:

“नीलूस का बिशप कसीर-उत-तादाद मसीहियों के साथ अरब के पहाड़ों की तरफ़ हिजरत कर गया। उनमें से बा’ज़ तो रास्ते ही में फ़ौत हुए और बा’ज़ को अरबों ने पकड़ कर क़ैद में रखा, इस उम्मीद पर कि मसीही उनका ज़र-ए-फ़िदया अदा करें; और बा’ज़ जो बच कर निकल गए वो ज़ाहिदाना ज़िंदगी बसर कर रहे हैं।” (अल-आमाल अल-आबा अल-लातीनी अज़-मीन व-तारीख़ ईसाबियूस अल-क़ैसरी (क॰ 6 फ़॰ 41, 42)

       और बोलन्दियों ने आमाल-ए-मुक़द्दसीन और दीगर मोअर्रिख़ीन-ए-कलीसिया ने ये साबित कर दिया है कि मसीही ज़ुह्हाद और आशिक़ान-ए-इलाही क़ैसर दियुक़ल्तियानूस के ज़माना-ए-सल्तनत से क़ब्ल जज़ीरा-नुमा-ए-सीना और मावरा-ए-बहर-ए-क़ुलज़ुम में तमाम दुनिया व मा-फ़ीहा से बे-नियाज़ होकर इबादत-ए-इलाही में मश्ग़ूल हो गए थे।

       बुज़ुर्ग ग़लाक़ीतून और उनकी अहलिया अपीसाम की शहादत के मुतअल्लिक़ मजमुआ-ए-मेताफरास्तस में लिखा है कि:

“ये दोनों शहर-ए-हिम्स में पैदा हुए थे। शादी के बाद दोनों ने अहद कर लिया कि हम तारिक-उद-दुनिया बन कर इबादत-ए-इलाही में अपनी बाक़ी-मान्दा उम्र को सर्फ़ करेंगे।” चुनाँचे दोनों जज़ीरा-नुमा-ए-सीना की तरफ़ रवाना हुए। जब वहाँ पहुँच गए तो उनकी मुलाक़ात दस ऐसे ज़ाहिदों के साथ हुई जो सरासर फ़रिशता-सीरत थे। इन दोनों ने उनसे आदाब-ए-तरीक़त व क़वानीन-ए-मआरफ़त सीखे थे। इन दोनों ने उनसे आदाब-ए-तरीक़त व क़वानीन सीख लिए। ग़लाक़ीतून मर्दों के साथ और इतीयाम औरतों के साथ रह कर ख़ुदा की इबादत में मह्व रहा करते थे। जब इनकी शोहरत दूर-दूर तक फैल गई तो वाली-ए-रोमान ने इनको बुलवा कर 250 ई॰ में दोनों को शहीद कर डाला। (Migne P.G. CXVI Col. 162 (आमाल-उल-आबा-उल-यूनानी अज़ में)

       अगरचे इन ख़ुदा के बन्दों को जो जज़ीरा-नुमा सीना में आकर ज़ाहिदाना ज़िंदगी गुज़ारते थे, उन बुत-परस्तों और मुशरिकीन से जो इस जज़ीरे की अतराफ़ रहते थे बे-हद तकालीफ़ और अज़ियतें पहुँचती थीं, लेकिन साथ ही उनकी मलकूती सीरत और मासूमाना ज़िंदगी के असर से तूर-ए-सीना की तमाम जवानिब में मसीहियत फैल गई। चुनाँचे दियुक़ल्तियानूस के अहद-ए-सल्तनत में एक और बुज़ुर्ग ने जिनका नाम करियून था आकर यहाँ निहायत ज़ोर-शोर से तब्लीग़ का काम किया। और एक बहुत बड़ी जमाअत ने उनकी बशारत और मो’जिज़ात की वजह से मसीह मज़हब को क़बूल किया। और ख़ुद मुशरिकीन और बुत-परस्तों के हाथों शहीद हुए। (Mai Spicily Romanun iv 230-221 Actn 88 111 Ienv, 701)

       अगर आप जज़ीरा-नुमा सीना में चले जाएँ तो जबल मूसा में आपको एक क़दीम ख़ानक़ाह के खण्डरात मिलेंगे। ये खण्डरात उस मशहूर ख़ानक़ाह के आसार-ए-बाक़िया हैं जिसका नाम दैर-अर्बईन था जो उन चालीस शहीदों की यादगारी में बनाई गई थी जो बुत-परस्तों के हाथों शहीद हुए थे। रोमन कैथोलिक चर्च में आज तक उनकी यादगारी इबादत 28 क॰ 1 में मनाई जाती है।

       क़ुस्तुनतीन (Constantine) के मसीही होने की वजह से तूर-ए-सीना और उसके मुलहक़ा अतराफ़ में मसीहियत ज़्यादा मुस्तहकम हो गई। हेला (हेलना) ने तूर-ए-सीना में एक आलीशान गिरजा इन अजीब और मो’जिज़ा-नुमा वाक़िआत की यादगार में बनवाया जो हज़रत मूसा के तवस्सुत से बनी इसराईल में वाक़ेअ हुए थे। लिहाज़ा तारिक-उद-दुनिया दरवेशों की तादाद इन अतराफ़ में रोज़-ब-रोज़ बढ़ती गई। ग़ज़ा और उसकी मशरिक़ी व जुनूबी अतराफ़ में बुज़ुर्ग हीलारियून (Hilarion) के (जिनका जिक्र गुज़र चुका है) मो’जिज़ात का बहुत बड़ा असर था जिनको देख कर कसरत के साथ अरब मसीही हो रहे थे। उनकी सई-ए-मश्कूर के तुफ़ैल ग़ज़ा के बियाबान और ऐन-ए-क़ादिस के नवाही में बहुत सी ख़ानक़ाहें और गिरजे बन चुके थे।

       जब बुज़ुर्ग हीलारियून (Hilarion) के मो’जिज़ात और उनकी दुआओं के क़बूल होने का हर तरफ़ चर्चा होने लगा तो इन अतराफ़ के बाशिन्दे जोक़-दर-जोक़ उनकी ख़िदमत में हाज़िर होते थे। क़हत-साली के अय्याम में उनसे पानी बरसने के लिए दरख़्वास्त करते थे। अपने बीमारों के लिए इस्तदुआ करते थे। आपकी दुआ के तुफ़ैल से अल-अरीश (Rhinocolure) की एक नाबीना औरत की आँखें बीना हो गईं। ऐला के शैख़ जिनका नाम ओरियून था जो एक ख़तरनाक मर्ज़ में मुब्तला था और ख़ुद भी ईसाई थे, उनकी दुआ से बिल्कुल तन्दरुस्त हो गया। (Ibid 37)

       सोज़ोमान अपनी तारीख़-ए-कलीसिया (क॰ 5 फ़॰ 15) में लिखता है कि उनकी दुआ से उनका दादा अलाफ़ियाँ एक ख़तरनाक बीमारी से सेहतयाब हुआ, जिसके बाद वो ख़ुदा-परस्ती और परहेज़गारी में बहुत ही मशहूर हुआ और बहुत सी ख़ानक़ाहें और गिरजे बनाए।

       इसी चौथी सदी में शाह क़ुन्तुन्तसियुस अलारयूसी ने बहुत से बिशपों और फ़ाज़िलों को एतराफ़-ए-सीना और नबत में जिलावतन कर दिया, जिनमें अदजाँ और परतू जाँ बहुत ही मशहूर थे। उनको अल-रहा से अरबिस्तान की तरफ़ जिलावतन कर दिया, जिनकी यादगारी इबादत आज तक रूमी चर्चों में (5 आबार) को होती है। बुज़ुर्ग हीलारियून की सवानिह-उमरी में दो और बुज़ुर्गों का बयान है, जिनका नाम अकनतीस और फ़ेलून था। उनको ग़ज़ा के अतराफ़ में जिलावतन कर दिया गया। इम्ब्रआतूर अनतास ने मुक़द्दस एलियाह को जो येरूशलेम के रईस-उल-असाक़फ़ा और अरबी-उल-अस्ल थे, ऐला की तरफ़ जिलावतन कर दिया। इसी तरह ऐला के बिशप साहब जिलावतन कर दिए गए, जिनका दस्तख़त मजमा’अ-ए-ख़लीक़दोनिया 451 ई॰ में सब्त है और ख़ालिस अरबी थे और ग़ौस के नाम से मशहूर थे।

       अल-मुख़्तसर इन हालात और वाक़िआत की वजह से जज़ीरा-नुमा सीना में चारों तरफ़ से मसीही क़बाइल जमा हो गए और कसरत के साथ ख़ानक़ाहें और गिरजे बनते गए। इन ख़ानक़ाहों में फ़ारान में फ़ारान की ख़ानक़ाह बहुत ही मशहूर हुई।

      रूमी सल्तनत के अहद में फ़ारान एक मशहूर बसई (बस्ती) थी जो रफ़्ता-रफ़्ता एक बहुत बड़ा शहर बन गया था। लेकिन अब इसकी आबादी सौ-डेढ़ सौ नफ़ूस से ज़्यादा नहीं, और फ़ीरान कहलाने लगा। मौक़े के एतबार से ये निहायत एक सरसब्ज़ शादाब जगह है, जिसमें तरह-तरह के फलदार दरख़्त ख़ुसूसन खजूर के दरख़्त कसरत के साथ हैं और साफ़ और शफ़्फ़ाफ़ पानी के चश्मे हर तरफ़ जारी हैं। मसीहियों ने फ़ारान में अपने मज़हब की ख़ूब सरगर्मी से तब्लीग़ की थी हत्ता कि चौथी सदी तक तमाम फ़ारान मसीही बन गया था और अस्फ़क़ी इलाक़ों में तक़्सीम हो गया था। इसका अमीर भी ईसाई था जिसका नाम ओबदियान या अब्दान था। चौथी सदी के आख़िर में सलविया ब-ग़रज़ ज़ियारत अराज़ी-ए-मुक़द्दसा जब निकली थीं तो ख़ास तौर से फ़ारान की ज़ियारत की। इसी तरह बुज़ुर्ग अनतोनीनूस ने 580 ई॰ में इसकी ज़ियारत की। ग़रज़ कि सातवीं सदी ईसवी तक एक ख़ास इज़्ज़त-ओ-मन्ज़िलत का मालिक बन गया था। आज तक फ़ारान के वीरानों में गिरजों के खण्डरात मसीहियों के क़ब्रिस्तान जिसमें मसीही अलामात ब-कसरत पड़ी हुई हैं मसीहियों के तरक़्क़ी के ज़माने की याद दिला रही हैं।

       इस इलाक़े की मशहूर ख़ानक़ाहों में से दैरारीस एक बहुत मशहूर ख़ानक़ाह थी जो कि तौर के क़रीब में थी जिसमें चारों तरफ़ से जो लोग उज़्लत-गुज़ीं और तारिक-उद-दुनिया बन गए थे आकर बसते थे। जब इस ख़ानक़ाह की शोहरत बहुत होने लगी तो 37 ई॰ (373 ई.) में बुत-परस्तों के एक फ़िर्क़े ने जो बिलामीस (Blemmyes) के नाम से मशहूर और सवाहिल-ए-मिस्र में रहता था, बहर-ए-क़ुलज़ुम को उबूर किया और यहाँ के दरवेशों को क़त्ल करके और माल-ओ-अस्बाब लूट कर वापस लौट गया। जब फ़ारान के ईसाइयों को इसकी ख़बर हुई तो फ़ारान के बिशप और उसका अमीर ओबैद दैरे-रीस पहुँच गए और शहीदों की लाशों को जमा करके निहायत इज़्ज़त-ए-एहतराम के साथ दफ़्न किए। इसी तरह 390 ई॰ में अरब के बुत-परस्तों ने इन राहिबों को क़त्ल किया और लूट लिया जो जबल-ए-सीना में मश्ग़ूल-ए-इबादत थे। (Migne P.G. LXXIX, Col 678-700, आमाल-उल-आबा-उल-यूनानी अज़-मीन)

       जब मसीही आबिदों ने देखा कि इन ज़ालिमों के हाथों चैन नसीब नहीं होता, तो ख़ानक़ाहों को क़िलों की सूरत में तबदील किया और जब यूस्तनियान का ज़माना आ गया तो उसने बड़े-बड़े गिरजे और मुस्तहकम क़िले बनवाए और उनकी ख़िदमत और निगहदाश्त के लिए अरबों को मुक़र्रर किया जो मसीही हो गए थे।

       इन्हीं रहबानों में बड़े-बड़े आलिम और फ़लास्फ़र भी थे। मसलन अनस्तास अल-सीनवी छठी सदी और बुज़ुर्ग यूहन्ना रईस तूर-ए-सीना अल-मा’रूफ़ ब-सलमी।

       इसके थोड़े दिनों के बाद मुसलमानों ने जज़ीरा-नुमा सीना पर क़ब्ज़ा किया। बयान किया जाता है कि तूर की ख़ानक़ाह में आँ-हज़रत का एक फ़रमान महफ़ूज़ था, जिसमें ईसाइयों को अमान दिया गया था। ये फ़रमान सुल्तान सलीम अव्वल के अहद तक मसीहियों के पास था। लेकिन सुल्तान सलीम ने ये फ़रमान उनसे ले कर क़ुस्तुनतुनिया में रखा। (मशरिक़ 12:609, 679)


11 इस बुज़ुर्ग ने एक मशहूर किताब लिखी थी, जिसका नाम सल्लम उल कमाल था। इसी किताब के नाम की वजह से लोग आपको सल्लमी कहते थे। ये बुज़ुर्ग पोप ग्रेगोरी का हम अस्र था।

फ़ैनिक़ियों में मसीहियत

       इन बिलाद में से जो जज़ीरा-नुमा सीना के साथ मुल्हक़ हैं, एक वसीअ क़िता-ए-फ़िलिस्तीन की जुनूब व मशरिक़ी सरहद पर वाक़ेअ है जो निहायत सर-सब्ज़ और नख़्ल-आवर है। यूनानी मोअर्रिख़ीन इस क़िते’अ को फ़ैनिक़ियों के नाम से ज़िक्र करते हैं। फ़ैनिक़ियों के म’अनी नख़लिस्तान के हैं। बा’ज़ मोअर्रिख़ीन का ख़याल है कि फ़ैनीक़ा वादी-ए-फ़ारान में वाक़ेअ है। बा’ज़ ये कहते हैं कि वहाँ एक क़िता’अ ज़मीन है जिसको नख़ला कहते हैं। ग़ालिबन मोअर्रिख़ीन-ए-यूनान की मुराद यही क़िता’अ है। छठी सदी में अरबों के फिर्क़ों में से जुज़ाम और लख़म जिनके अमीरों में से एक नाम अबाकरब था आकर यहाँ मुक़ीम हुए। मोअर्रिख कु़रोबियस अल-ग़ज़ी बयान करता है कि अबाकरब ने रोम के बादशाहों यूस्तबान को अपनी हुकूमत पेश की। बादशाह ने उसका शुक्रिया अदा किया और अबाकरब को उन तमाम अरब क़बाइल पर हाकिम मुक़र्रर किया जो उसकी विलायत के अतराफ़ में रहते थे। चुनाँचे एतराफ़-ए-मुल्हक़ा के तमाम अरब क़बाइल इसके मातहत हो गए। (Procopius De Bello Persico 1.19)

       बयान-ए-बाला के पढ़ने से इसमें कोई शक बाक़ी नहीं रहता है कि ये अमीर ईसाई था और अगर ये ईसाई न होता तो यूस्तनियान जैसे मसीही बादशाह एक ग़ैर-मज़हब वाले शख़्स को इन इलाक़ों का हरगिज़ हाकिम न बनाता जिनमें ईसाई ही ईसाई बसते थे।

       यूरोपियन मुकतिशफ़ीन (Explorers) के इंकशाफ़ात-ए-जदीदा से और उन सैयाहीन की तहक़ीक़ात से जो बिलाद-ए-मुआब और औरदम (एदोम) और नबत (Nabataea) की सियाहत कर चुके हैं, ये अम्र पाया-ए-तहक़ीक़ को पहुँच जाता है कि इन तमाम अतराफ़ में एक सिरे से दूसरे सिरे तक मसीही अरब आबाद थे। चुनाँचे आसार-ए-क़दीमा के मशहूर मुक़क़्क़िक़ और सैयाह डॉक्टर लुईस ने उन तमाम मसीही आसार और अलामात को जो उनके क़स्र-उल-मू फ़र (क़स्र-अल-मुवक्क़र) (2) और अल-उवैर (3) और उम्म (4) अल-रसास (Umm ar-Rasas) में मिली हैं अपनी मशहूर किताब में जो चन्द जिल्दों में है बिल-तफ़सील बयान किया है, बल्कि मुख़्तलिफ़ अतराफ़ में मुतअद्दद गिरजों की अलामतें आज तक मौजूद हैं, जिनमें ज़ैल के गिरजे बहुत मशहूर हैं: अब्द, अल-उवर जा, फ़ार फ़ेनास, हस्बान, कसीफ़ा, मकार, अल-मही।


12 Moab.I a Musail,Arabia 194 Ibid 111 58
13 Ibid ,I, 109
14 Doe Gustap Dalman

       इसी तरह एक और सैयाह ने जिसका नाम वलमान है, 1908 ई॰ में इन अतराफ़ की सियाहत की और सिर्फ़ नबत के अतराफ़ में इनको को बीस ऐसे आसार मिले, जो मसीहियों के गुज़श्ता शान-ओ-शौकत याद दिला रहे थे।

       दो और आलिमों ने यानी ब्रूनो और दोनाज़ुसकी ने अरब के आसार-ए-क़दीमा पर तीन सख़ीम जिल्दें लिखी हैं जिनमें मसीहियों के आसार-ए-क़दीमा इस कसरत से बतलाए गए हैं जिनको अफ़सोस है कि हम अदम-ए-गुंजाइश की वजह से नक़्ल नहीं कर सकते हैं।

       दलाईल-ए-माफ़ौक़ से ये बात रोज़-ए-रौशन की तरह साबित होती है कि तूर-ए-सीना और इसके मुल्हक़ा अतराफ़ में छठी सदी ईसवी तक मसीहियत को उमूमियत हासिल हो चुकी थी। चुनाँचे मशहूर मुस्तशरिक़ डोज़ी (Dozy) अपनी तारीख़-ए-इस्लाम के मुक़द्दमे में लिखता है कि क़रीबन तमाम जज़ीरा-नुमा सीना में मसीही मज़हब फैल गया था, जिसमें कसरत के साथ गिरजे और ख़ानक़ाहें बन चुकी थीं और शाम के अरबों का मज़हब मसीहियत था।

यमन में मसीहियत


       यमन अरबिस्तान के जुनूब में साहिल-ए-बहर हिन्द पर वाक़ेअ है जो अपनी तहज़ीब, तमद्दुन, तमव्वुल, हज़ारात और ख़ज़रात में अपनी मिस्ल आप ही था। कुतबों और दीगर मोअर्रिख़ीन के बयानात से साबित होता है कि इस्लाम से क़ब्ल अरब के इस ख़ित्ते में कम-ओ-बेश चार बड़ी मशहूर सल्तनतें गुज़री हैं: मईनी (Minaean), सबाई (Sabaean), हिमयरी (Himyarite), हज़र-मौती (Hadramite)।

       मईनी (Minaean): सल्तनत के सदर मुक़ामात क़र्न और मईन थे। ग़ालिबन हुज़ूर मसीह से आठ सौ बरस पहले।

       सबाई (Sabaean): इसका पाए-तख़्त मारिब था। हुज़ूर मसीह से एक सौ पन्द्रह बरस क़ब्ल तक इस सल्तनत का पता चलता है। बा’ज़ मुक़क़्क़िक़ीन का ख़याल है कि सबाई सल्तनत और मईनी सल्तनत हम-अस्र थीं।


15 Doe Gustap Dalman

       हिमयरी (Himyarite): क़रीबन 115 क़ब्ल मसीह में हिमयर ने सबाई सल्तनत पर क़ब्ज़ा कर लिया। कुतबों से साबित है कि हिमयर में छब्बीस बादशाह गुज़रे हैं। हिमयर के बा’ज़ कुतबों में सन व साल भी कुन्दा है।

       इसी ज़माने के क़रीब मसीही हबशियों ने यमन में हुकूमत क़ायम करनी शुरू की और एक ज़माने में हिमयरियों को शिकस्त देकर अपनी मुस्तक़िल हुकूमत क़ायम कर ली और इस अहद का एक कुतबा जो आज-कल हाथ आया है, उस पर ये अल्फ़ाज़ कुन्दा हैं कि:

“रहमान, मसीह और रूह-उल-क़ुदुस की क़ुदरत व फ़ज़्ल से इस यादगारी पत्थर पर अबरह ने कुतबा लिखा जो कि बादशाह-ए-हबश अराहमिस ज़बी-माँ का नाइब-उल-हुकूमत है।” (सीरत-उन-नबी जिल्द-ए-अव्वल)

       इन सल्तनतों के अज़ीमुश्शान क़िलों और इमारतों के आसार अब तक कुछ न कुछ बाक़ी हैं जिनके नाम हैं: ग़मदान, बलअम, नाअत, सिरवाह, सलमीन, ज़फ़ार, हकर, सन्हर, शिबाम, ग़ैमान, नबून, रयाम, बराक़िश, रौशाँ, अरबाब-ए-हिन्द, हनीदा, इमरान, नजीर। (इक्लील-ए-हमदानी)

       अहले-यमन की ज़बान हिमयरी थी और उनका ख़ास ख़त था, जिसको मसनद कहते हैं। हाल के मुहक़्क़िक़ीन-ए-आसार-ए-क़दीमा ने सैकड़ों ऐसे कुतबात बरामद किए हैं जिनसे न सिर्फ़ उनके ज़माना-ए-साबिक़ा की तारीख़ मालूम होती है, बल्कि ये भी साबित होता है कि उनका मज़हब साइबी (Sabaean) था। अजराम-ए-समावी और सैयारात-ए-हफ़्तगाना की परस्तिश करते थे। मौलवी सुलेमान साहब नदवी अर्ज़-उल-क़ुर्आन में लिखते हैं कि:

“मुसलमानों ने इब्तिदाई सदियों में (2 या 3) यमन की एक इमारत का कुतबा पढ़ा था, जो जुनूबी (हिमयरी) ज़बान में था। उसमें ये इबारत मनक़ूश थी: بسمہ الله بذامانباہ شمر برعش سیدة الشمس यानी “शमिर बरइश ने सूरज देवी के लिए ये बनाया।” (सफ़ा 272)

       यमन पर पहली सदी ईसवी के अवाइल में हिमयरी बादशाहों की हुकूमत थी। इन कुतबों में से जो हाल में दस्तयाब हुए हैं मालूम होता है कि ये सलातीन “मुलूक सबा व ज़ी-यैदान” के लक़ब से मुल्क़्क़ब थे। और जब हिमयरी मलूक ने 300 के क़रीब हज़र-मौत पर क़ब्ज़ा कर लिया तो अपने अलक़ाब में ये जुमला इज़ाफ़ा कर दिया कि “मुलूक हज़र-मौत व यमानात” (Encyclopaedia de L Islam p. 883)

       मशरिक़ और मग़रिब के तमाम मुतक़द्दिमीन मुअर्रख़ीन इस पर मुत्तफ़िक़ हैं कि मसीहियत के ऐन अवाइल में मसीही मुबल्लिग़ीन की निगाहें यमन पर पड़ रही थीं, हत्ता कि बा'ज़ मसीही मुअर्रख़ीन का ये ख़याल है कि वो तीन मजूसी जिनके मुतअल्लिक़ हम बहस कर चुके हैं कि वो अरबी-उल-अस्ल थे, यमन ही के रहने वाले थे, और हुज़ूर मसीह की ज़ियारत से वापस आकर मुक़द्दस तोमा के हाथ से जबकि वो अदन से हिन्दुस्तान को जा रहे थे बपतिस्मा लिया और बिल-आख़िर शन’आ में शहीद हुए। (Migne P.LXXI.230)

       बहुत से मुअर्रख़ीन का ये भी ख़याल है कि यमन में सब से अव्वल मुक़द्दस मत्ती ने मसीहियत की तब्लीग़ की। और ओरीजानूस ने अपनी किताब “तर्दीद-उल-मज़ाहिब” में और मशहूर मुअर्रिख सुक़रात (क॰ 1 फ़॰ 15) में और रूफ़ीनूस ने अपनी तारीख़ (क॰ 1 फ़॰ 9) में और बुज़ुर्ग हीरोनीमूस अपनी किताब “तारीख़-ए-मुअर्रख़ीन-ए-कलीसिया” में, वनीक़ीफ़ोरूस अपनी तारीख़ (क॰ 2 फ़॰ 4) में इसी ख़याल की ताईद और तौसीक़ करते हैं कि मुक़द्दस मत्ती ने हबश की अतराफ़ में मसीहियत की तब्लीग़ की और ज़माना-ए-हाल के मुअर्रख़ीन का इस पर इत्तेफ़ाक़ है कि हबश से मुराद यमन है क्योंकि मुतक़द्दिमीन के वक़्त हबश का इत़लाक़ यमन पर होता था। हीरोदोतस और अस्ट्राबों (क॰ 1 स॰ 51 मतबुआ ऑक्सफ़ोर्ड) इस ख़याल की तस्दीक़ करते हैं कि दर-हक़ीक़त क़ुदमा मुअर्रख़ीन के नज़दीक हबश का इत़लाक़ यमन पर होता था, लेकिन दीगर मुअर्रख़ीन इसके बर-ख़िलाफ़ ये कहते हैं कि हबश से मुराद वो हबश होता है जो अफ़्रीक़ा में है न कि वो हबश जो अरब-उल-यमन में है।

      हम मुक़द्दस बर्तिलमाऊस का ज़िक्र कर चुके हैं कि पहले आपने ही अरब में मसीहियत की दावत पहुँचाई, लेकिन ओरीजानूस और औसाबियस क़ैसरी तारीख़-ए-कलीसिया (क॰ 1 फ़॰ 10) में और सुक़रात जो क़दीम मुअर्रख़ीन में से हैं, बिल-इत्तेफ़ाक़ कहते हैं कि मुक़द्दस बर्तिलमाऊस ने यमन में भी जिसको वो हिन्द-उल-क़रीबा कहते हैं मसीहियत का पैग़ाम पहुँचाया। बा’ज़ कहते हैं कि मुक़द्दस बर्तिलमाऊस ने नबी सबा में और जो मीनादन मुल्क-ए-बासील की तरफ़ मंसूब है, उसमें लिखा है कि अरब-ए-सईदह (यमन) के हुनूद में तब्लीग़ का काम किया।


16 हम लिख चुके हैं कि क़दीम मुअर्रख़ीन को यमन का नाम मालूम न था, इसलिए वो यमन को हिन्द “हिन्द-ए-क़रीबा” के नामों से याद करते हैं, चुनाँचे मोअर्रिख़ फ़ीलुस्तरजियूस (क॰ 2 फ़॰ 6) में और तादफ़ानूस तारीख़-ए-आलम (6064) में और ताऊफ़ील्दक़तूस (क॰ 2) में हिमयरियों को “हनूद” कहते हैं। (मिन्हु)

       बाज़ दीगर मुअर्रख़ीन जैसा कि हम बयान कर चुके हैं कि कहते हैं कि क़ब्ल इसके कि मुक़द्दस तोमा हिन्दुस्तान की तरफ़ रवाना हों, अरबिस्तान में बशारत का काम किया, बुज़ुर्ग ग्रेगोरियुस तरितरी अपने रसूलों के मीमरह (Memra) में से और तादूरीतस अपनी अनाजील की किताब (क॰ 9) में और बा’ज़ सुर्यानी मुअर्रख़ीन ने यही राय दी है।

       मसीहियत का पहली सदी ईसवी में यमन में दाख़िल होने की एक ज़बरदस्त तारीख़ी दलील ये है कि औसाबियस क़ैसरी (क॰ 5 फ़॰ 10) और हीरोनीमूस में उलमा-ए-इस्कंदरिया में से एक आलिम का जिनका नाम पन्तानूस फ़लास्फ़र था, बुत-परस्ती को छोड़ कर मसीही मज़हब इख़्तियार किया। वमतरियूस इस्कंदरिया का बिशप था, इस्कंदरिया के मदरसे में इसको प्रोफ़ेसर मुक़र्रर किया जहाँ उनकी बहुत शोहरत और मज़हबी तालीम की तारीफ़ हुई। ओरीजानूस जैसे आला मुअल्लिम इन्हीं के शागिर्द थे। अल-मुख़्तसर पन्तानूस (Pantaenus) ने 183 ई॰ में प्रोफ़ेसरी से इस्तिफ़ा दे दिया और हिन्द की तरफ़ रवाना हुआ ताकि वहाँ मसीहियत की तब्लीग़ करे। तमाम मुअर्रख़ीन को इस पर इत्तेफ़ाक़ है कि जिस हिन्द का यहाँ ज़िक्र है उससे मुराद बिलाद-ए-यमन है।

       औसाबियुस इसी सिलसिले में लिखता है कि जब पन्तानूस इन अतराफ़ में पहुँच गया और लोगों को मसीहियत की दावत देने लगा, तो वहां के लोगों ने उसको एक इंजील दिखाई जो इबरानी ज़बान में थी, और ये मुक़द्दस मत्ती की इंजील थी जिसको मुक़द्दस बर्तिलमाऊस अपने साथ ले कर आए थे और यहीं छोड़ गए थे। इस बयान से साफ़ तौर पर हमारी राय की तस्दीक़ होती है कि रसूली ज़माने से यमन में मसीहियत की मुनादी शुरू हुई थी।

       औसाबियुस के बयान से ये भी मालूम होता है कि पन्तानूस को अच्छी कामयाबी हासिल हुई थी, चुनाँचे वो लिखता है कि “जब प्रोफ़ेसर साहब अपने वतन में लौट आए तो अपनी कामयाबी पर बहुत ख़ुश थे और बहुत से वा'इज़ीन को वहाँ के मसीहियों की इम्दाद के लिए भेजते रहे।”


17 (2) Hieron (Jerome) de Vir ILLnstr. c69

       मुसलमान मुअर्रख़ीन में से तबरी, इब्ने हिशाम और मसऊदी के बयानात से मालूम होता है कि तीसरी सदी ईसवी के दरमियानी हिस्सों में यमन में इस कसरत से मसीही थे कि न सिर्फ़ आम मसीहियों और यहूदियों में मुनाज़ा'अत व मुख़ासमत (Conflict) का बाज़ार गर्म रहा बल्कि उनके बादशाहों में भी म’अरका-ए-कारज़ार (Battlefield) गर्म रहा। मौलवी सुलेमान साहब अपनी अर्ज़-उल-क़ुर्आन में इन दोनों की मज़हबी मुनाज़ा'आत के मुतअल्लिक़ लिखते हैं कि:

       हमने पहले बयान किया है कि तबाबि'अ से पहले सबा के तमाम तबक़े सितारा-परस्त थे, सब से बड़ा देवता उनका “शम्स” और “अल-मक़ह” था। अल-मक़ह हिमयरी में चाँद को कहते हैं। इसकी मज़ीद तफ़सील दूसरे हिस्से में आएगी यहाँ सिलसिला-ए-बयान के लिए इतना कह देना काफ़ी है कि अव्वलन कवाकिब-परस्ती उनका मज़हब था।

       320 ई॰ में यमन के मुक़ाबिल अफ़्रीक़ी सवाहिल पर मिस्री रोमियों के असर से ईसाइय्यत ने पर-ओ-बाल पैदा किए। शामी रूमी के ज़रिये से यमन के अतराफ़ में शहर नजरान ने बपतिस्मा क़बूल किया। इन गिर्द-ओ-पेश के असर से तबाबि'अ-ए-यमन भी महफ़ूज़ न रहे।

       सितारा-परस्ती ने तो शिकस्त खाई, गो सितारों के हैकल (Temples) अब भी वीरान थे, ता-हम अब “शम्स”, अल-मक़ह और “ग़शा” के पहलू-ब-पहलू रहमान का नाम भी आने लगा, जो क़ब्ल-अज़-इस्लाम यहूद व नसाारा के साथ मख़सूस था।

       यहूदियत व नसरानियत इन अतराफ़ में दो ही मुहज़्ज़ब और साहिब-ए-इलहाम मज़हब थे, और बाहम मैदान में बराबर के हरीफ़ भी थे। गुज़िश्ता अबवाब में मालूम हो चुका है कि रोमियों और हबशियों के साथ सबा के हिमयर को किस क़दर सियासी कशमकश थी, इस बिना पर तबाबि'अ-ए-हिमयर ईसाइय्यत से ज़्यादा यहूदियत को तर्जीह देते थे। अब्द-कुलील बरिवायत-ए-अरब भी ईसाई था। और एक कुतबा से भी इसका ईसाई होना ज़ाहिर होता है। बक़िया तबाबि'अ कम-तर सितारा-परस्त और अक्सर यहूदी थे। तारीख़-ए-तबरी में है कि सब से पहले असअद अबू-करिब ने यहूदियत क़बूल की। मज़हब-ए-शाही ने आम रिआया में भी फ़रोग़ पाया। और इस तरह ईसाइय्यत और यहूदियत ने यमन में टक्कर खाई।

      (अर्ज़-उल-क़ुर्आन सफ़ा 299, 300)

       गुज़श्ता सदी के वस्त में एक हिमयरी क़तबा बरामद हुआ था (ISI 6) जिसमें अ़ब्द-कुलाल और उसकी बीवी उबाली और इसके बेटे हनी और ह़ालल के नाम कुंदा थे। ये कुतबा इस दैर की यादगारी में लगाया गया जिसका नाम “यरस” था और जिसको अल-रहमान की ख़ुशनूदी के लिए बनवाया था। उसकी बुनियाद माह-ए-ज़ी ख़रफ़ 573 हिमयरी मुताबिक़ 458 ईस्वी में रखी गई थी। “अल-रहमान” के ज़िक्र से साफ़ अयाँ है कि वो मसीही था, क्योंकि अल-रहमान ख़ास मसीहियों का मुस्त’अमला लफ़्ज़ था।

       यूनानियों की तवारीख़ में यमन में मसीहियत के नफ़ूज़ का ज़िक्र कसरत के साथ मिलता है। मोअर्रिख़ फ़ीलुस्तुरजियूस ने जो फ़िर्क़ा-ए-आरियूसी का एक ज़बरदस्त मोअर्रिख़ था, 12 जिल्दों में फ़िर्क़ा-ए-आरियूसी के कार-हा-ए-नायाँ के मुताअल्लिक़, जो 300 ईस्वी से 425 ईस्वी से वाबस्ता थे, एक तारीख़ लिखी जो बद-क़िस्मती से अब दस्तयाब नहीं हो सकती है, लेकिन इसके इन्ही सफ़्ह़ों का एक मुख़्तस़र सा इक़्तिबास जिसको क़ुस्तुनतुनिया के रईस असाक़िफ़ा फ़ूतियूस ने नक़्ल किया था और अपने कुतुब-ख़ाने में रखा था, मौजूद है।

      (Migne, Patrologia Graeca LXV, Col 449, 687).

      इसमें लिखा हुआ है कि शाह कुस्तन्तीनुस आज़म के बेटे ने, जो कि फ़िर्क़ा-ए-आरियूसी का बहुत ही हमदर्द और ख़ैर-ख़्वाह था, 356 ईस्वी में रूम से हिमयरी बादशाह के पास यमन में एक वफ़द भेजा जिसका रईस ताओफ़ीलुस अल-हिंदी था जो जज़ीरा-ए-सैलान का बाशिंदा था। ये वफ़द यमन में पहुँच कर बादशाह के दरबार में ह़ाज़ि़र हुआ और श़ाहनशाह-ए-रूम की तरफ़ से जो तहाइफ़ भेजे गए थे पेश किए। इनको देख कर बादशाह बहुत ख़ुश और इसके साथ बहुत इज़्ज़़त व एह़तिराम से पेश आया। बादशाह ने इनको तब्लीग़ की इजाज़त दी। यहूदियों के साथ इनका ख़ूब मुबाहसा होता रहा। यहाँ तक कि ये हर मुक़ाम पर यहूदियों पर ग़ालिब आ गए। तब ख़ुद बादशाह मसीही हो गया और इनको गिरजे बनवाने का मौक़ा मिल गया। चुनाँचे इन्होंने तीन बड़े गिरजे बनवाए। एक इनके पाए-तख़्त ज़़फ़ार में, दूसरा अ़दन, साह़िल-ए-बह़र-ए-ओक़ियानूस में जहाँ रूमी तिजारत की ग़रज़ से आया करते थे। तीसरा फ़रज़ा में जो ख़लीज-ए-अजम के दहाना पर वाक़अ है। इसके बाद ईसाइयों के लिए एक रईस मुक़र्रर करके ये वफ़द कामयाब वापस गया।

      अल्लामा मुस्तशरिक़ सिन्योर्क रूसनी ने भी इस वफ़द का ज़िक्र किया है, लेकिन वो कहता है कि ये वफ़द सिर्फ़ मज़हब की तब्लीग़ की ग़रज़ से नहीं भेजा गया था ताकि समुंदर के रास्ते से यमन के साथ तिजारत का रास्ता खुल जाए। (Boletín d. Real Academia April 1911, p. 116).

      अफ़सोस है कि मोअर्रिख़ फ़ीलुस्तुरजियूस ने यमन के इस बादशाह का नाम हमें नहीं बतलाया जो ताओफ़ील के हाथ पर मसीही हो गया था। मुमकिन है ये बादशाह अ़ब्द-कुलाल हो, क्योंकि ख़याल किया जाता है कि इसकी बादशाहत 330 ईस्वी ता 350 ईस्वी तक थी। और यही वफ़द जाने का ज़माना था। सआलबी ने 'तबक़ात-उल-मुलूक' में इसके हिल्म, मिस्कीन-नवाज़ी, ग़रीब-परवरी, अ़क़्लमंदी, चश्म-पोशी और रवादारी को बहुत कुछ सराहा है। बा’ज़़ों का ख़याल है कि शायद वलीअह बिन मुर्तद हो जो अव्वल बहुत ही मुतअ़स्स़िब यहूदी बन गया था और फिर मसीही हुआ था।

      फ़िरोज़ आबादी के क़ौल से भी इस की तस्दीक़ होती है कि, “ان کثیراً من ملوک والیمن الحیرة تنصرواً” यानी यमन और हीरा के बहुत से बादशाह मसीही हो गए थे।

       बहुत से मुअर्रिख़ीन का ये ख़याल है कि वह बिशप जिसने नीकिया (Nicaea) के जल्सा-ए-आम में अपना दस्तख़त किया था कि “यूहन्ना उस्क़ुफ़-उल-हिंद”, वह यमन ही का बिशप था। क्योंकि इस ज़माने में यमन ही को हिंद कहते थे।

       बुज़ुर्ग समान अमूदी की सवानिह-ए-उमरी में, जिसको तादोवरीतस ने 5वीं सदी में लिखा था, एक से ज़्यादा बार उस का ज़िक्र मिलता है कि हिमयर अरब कसरत के साथ बपतिस्मा लेने के लिए बुज़ुर्ग सम’आन के पास आते थे। और तादोवरीतस ने इन को ब-चश्म-ए-ख़ुद बपतिस्मा लेते देखा था। चुनाँचे वह कहता है कि न सिर्फ़ हमारे हम-वतन सम’आन के पास बपतिस्मा लेने आते थे, बल्कि इस्माईली, अजमी, अर्मनी और हिमयर कसरत के साथ आते थे (Migne, Petralogie Grecque LXV 104)। इसी तरह इन के शागिर्द अन्तोनियोस लिखता है कि “सम’आन अमूदी ने शरक़ैन (सरास्ता) और वा’ज़ व अमन के ज़रिए हिमयर और दीगर क़बाइल में से बहुत से लोगों को बपतिस्मा दिया।

      क़दरिन्यूस लिखता है कि “ज़ौ-क़बाइल” से मुराद हिमयरी हैं।

       अहल-ए-कलदान का ये दावा है कि हुज़ूर मसीह के हवारी अद्मी व मारी, जो उन के पास भेजे गए थे, वही अरब के ख़ैमा-नशीन क़बाइल और अहल-ए-नजरान और जज़ायर-ए-बहर-ए-यमन में भी गए थे।

       चुनाँचे मुसहफ़-ए-नामूसी में लिखा है कि मुक़द्दस मारी, जो हुज़ूर मसीह के 70 शागिर्दों में से थे, जज़ीरा-ए-यमन और मूसल में और अर्ज़-ए-सवाद और इस की मुलहक़ा एतराफ़ में, मसलन तमाम तैमन में और अरब ख़ैमा-नशीन में और नजरान के एतराफ़ में और उन जज़ाइर में जो बहर-ए-यमन में हैं, तबलीग़ का काम किया। (सफ़ा 18)

       इसी बश़ारत की तरफ़ बुज़ुर्ग अफ़राम (400 ई॰) अपने एक मीमरा में इश़ारा करते हैं कि, “मलिका-ए-तैमन (सबा) सुलेमान के पास आ गई। उन के नूरानी शुअले से मुनव्वर हो गई। और इस श़ुअले की एक चिंगारी राख के नीचे दबी रह गई, यहाँ तक कि अ़दालत का आफ़्ताब (यानी हुज़ूर मसीह) त़ालिअ़ हो गया और ये चिंगारी भड़क उठी और चमकते हुए तारे की तरह इस की तमाम एतराफ़ को मुनव्वर कर दिया।"

       इस से इंकार नहीं किया जा सकता है कि मसीहियों के दीगर फ़िर्क़ों के दोश-ब-दोश नस्तूरी फ़िर्क़े ने भी अरबिस्तान के मुख़्तलिफ़ अक़्ताअ में बश़ारत का काम ख़ूब किया और मुतअ़द्दिद कलीस़ियाएँ क़ायम कीं और उन के बहुत से बिशप थे, जो जासलीक़-ए-मशरिक़ की तरफ़ से मुख़्तलिफ़ अक़्ताअ के कुर्सी-नशीन थे, जिनका असर इस्लाम के बाद एक मुद्दत तक क़ायम रहा। अल्लामा दीसासी अपने एक मक़ाले में लिखते हैं कि:

“श़ुमाल के मसीही, ख़ास कर अहले-इराक़, अक्सर अहले-यमन के साथ आमद-ओ-रफ़्त रखते थे। इन्होंने ही ख़त-ए-मसनद के एवज़ में सुरयानी ख़त को अपने दीनी भाइयों के दरम्यान रवाज दिया।" (Miemoires des Inscript et Behis Letter I 30 p.266)

      मुअर्रिख़ समा’अनी मकतबा अल शरक़ियह (Semani B.O. / 111 / 603) में लिखता है कि सुर्यानी ज़बान यमन के मुख़्तलिफ़ अज़ला में दाख़िल हो गई थी। इसी तरह मुअर्रिख़ फ़ैलस्तर ज्यूस लिखता है कि ‘अफ़्रीक़ा के सवाहिल यमन के बिल मुक़ाबिल बहुत सी नई आबादियाँ क़ायम हो चुकी थीं, जिनकी ज़बान सुर्यानी थी।’ किताब कश्फ़ उल इसरार फ़ी क़वाइद ए इक़लाम ए कूफियह में है कि इन अल क़लिमा अल कूफ़ी का बदई बाल सूरी, यानी कूफ़ी ख़त, को सूरी ख़त कहते थे। ग़ालिबन उसका मतलब ये है कि ख़त ए कूफ़ी सुर्यानी से ज़्यादा मुमासिल था। इसमें ये भी लिखा है कि “ال طسم وقحطان وحمیر” इसी ख़त में लिखा करते थे।

      यमन में मसीहियत के नुफ़ूज़ का अंदाज़ा मौलवी शिबली नोमानी के इस क़ौल से किसी क़दर हो सकता है कि:

“यमन में इशाअत ए इस्लाम का सब से बड़ा आइक़ ये हो सकता था कि वह पॉलिटिकल हैसियत से ईरानियों का मातहत था, और बाशिंदे मज़हबन अलल उमूम यहूदी या ईसाई थे।” (सीरत उन् नबी, हिस्सा ए अव्वल, मुजल्लद ए दुवम, सफ़्हा 21)

नजरान में मसीहिय्यत

      यमन में मसीहियत के नुफ़ूज़ की दलाइलों में से एक बड़ी दलील वो है, जिसको तबरी ने अपनी तारीख़, जिल्द ए अव्वल, सफ़्हा 918 (मत्बूआ ए लंदन) में, और याक़ूत ने मुअजम उल बुलदान, जिल्द ए चहारुम, सफ़्हा 752 में, और इब्ने ख़लदून ने अपनी तारीख़, जिल्द ए दुवम, सफ़्हा 59 में, और इब्ने हिशाम ने अपनी सीरत उर रसूल, सफ़्हा 20 में, और नीज़ दीगर मुअर्रिख़ीन ए इस्लाम ने बयान किया है कि नजरान, जो यमन के मुअतना बिह इलाक़ों में से एक अहम इलाक़ा है, उसके तमाम रहने वाले ईसाई हो गए थे। उनके ईसाई होने की निस्बत एक तवील रिवायत बयान करते हैं, जिसका ख़ुलासा ये है कि हुज़ूर ए मसीह के हवारियों के शागिर्दों में से एक शख़्स, जिसका नाम फ़ैमून, और बक़ौल ए बा’ज़ क़ीमून, और बा’ज़ के नज़दीक मैमून, था, और जो कि बड़ा आबिद और ख़ुदा शनास शख़्स था, सियाहत करता हुआ और मु’जिज़ात और करामात दिखाता हुआ बिलाद ए ग़स्सान में पहुँच गया। अहले शाम में से एक शख़्स, जिसका नाम सालेह था, उसके साथ हो लिया, और दोनों अरबिस्तान में दाख़िल हो गए; जहाँ एक क़ाफ़िले ने उन्हें गिरफ़्तार किया और नजरान में आकर बेच डाला।


20 फ़तार किताब उल मशरिक, मुसन्निफ़: सुलेमान बिन मारी, सफ़्हा 33 में उसका नाम हय्यान आया है, और लिखा है कि वह नजरान का बाशिंदा था। हीरा में उसके हाथ पर बहुत से हिमयरी और हबशी मसीही हो गए थे।

       उस वक़्त नजरान में बनी हारिस के लोग रहते थे, जो कहलान की शाख़ थे, और उज़्ज़ा को दरख़्त की सूरत में परस्तिश करते थे। फ़ैमून ने अपने मालिक को बुत परस्ती के बुतलान से वाक़िफ़ किया, और ऐन उसी दिन, जब उज़्ज़ा की ईद थी, फ़ैमून ने ख़ुदा से दुआ की; और एक ज़बरदस्त आँधी आई, और उस दरख़्त (उज़्ज़ा) को, जिसकी वे परस्तिश करते थे, जड़ से उखाड़ दिया। तब नजरान के लोगों ने बुत परस्ती से तौबा की और हुज़ूर ए मसीह के हल्क़ा ए बग़ोश में दाख़िल हो गए। तब फ़ैमून ने उनके एक शरीफ़ शख़्स, जिसका नाम अब्दुल्लाह बिन सामिर था, को उन पर अमीर मुक़र्रर किया, और उनके लिए एक बिशप मुक़र्रर किया, जिसका नाम बोलुस (पोलुस) था।

       नजरान में ईसाइय्यत को बारावर देखकर यहूदियों का बादशाह दू नुवास, जो बहुत ही मुतअस्सिब यहूदी था, आग बग़ूला बन कर नजरान जा पहुँचा, और ईसाइयों से कहा: तुम यहूदी बन जाओ। ईसाइयों ने अपने रईस उल हारिस की मातहतता में यहूदियत के क़ुबूल करने से इन्कार किया, और अपने शहर की मुदाफ़अत पर तुल गए। जब ज़ू नुवास ने देखा कि शहर फ़त्ह नहीं हो सकता है, तो मक्कारी से शहर में दाख़िल हो गया; और दाख़िल होते ही शहर में बड़े बड़े गड्ढे बनवाए, और उनमें आग दहकाई, और फ़र्दन फ़र्दन ईसाइयों को बुलवाया। जिसने यहूदियत के क़ुबूल करने से इन्कार किया, उसको आग में डलवाया।

क़ुरआन ए शरीफ़ में अस्हाब उल अख़दूद के नाम से इसी ज़ुल्म की तरफ़ इशारा है कि:

      قُتِلَ أَصْحَابُ الْأُخْدُودِالنَّارِ ذَاتِ الْوَقُودِإِذْ هُمْ عَلَيْهَا قُعُودٌوَهُمْ عَلَى مَا يَفْعَلُونَ بِالْمُؤْمِنِينَ شُهُودٌوَمَا نَقَمُوا مِنْهُمْ إِلَّا أَن يُؤْمِنُوا بِاللَّهِ الْعَزِيزِ الْحَمِيدِ

      तर्जुमा: हलाक हुए गड्ढों वाले, जिनमें आग थी, ईंधन वाली, जब वो कुर्सियों पर बैठे तमाशा देख रहे थे, और मोमिनों पर ज़ुल्म कर रहे थे; इस पर वो ख़ुद गवाह थे। इन मोमिनों का, इसके सिवा, और कुछ क़सूर न था कि वो ग़ालिब और क़ाबिल ए सिताइश ख़ुदा पर ईमान लाए थे।

इब्ने इस्हाक़ बयान करता है कि बीस हज़ार मसीही इस वाक़िये में मारे गए।

       एक शख़्स, जिसका नाम वद स दू सअलबान था, किस तरह जान बचा कर रोम में क़ैसर के दरबार में जा पहुँचा, और तमाम वाक़िआत एक एक करके सुनाए। क़ैसर ने हबश के बादशाह अल सबान को ख़त लिखा कि फ़िल फ़ौर मसीहियों की इमदाद को पहुँचो और ज़ालिमों से इंतिक़ाम लो। चुनाँचे अल सबान ने फ़िल फ़ौर या ताबिरह की मातहती में एक फ़ौज ए ज़फ़र मौज भेज कर हिमयरियों का क़लअ क़मअ किया। ज़ू नुवास ने भाग कर घोड़े को दरिया में डाल दिया, और फ़िरऔन की तरह दरिया ही में डूब मरा। उसका क़ाइम मक़ाम ज़ौ जदन हुआ; उसका भी यही हाल हुआ। फिर ज़ू ल यिनर उठा, लेकिन नाम ओ निशान रह गया। अब ईसाई तन्हा यमन के मालिक बन गए, और निस्फ़ सदी से ज़्यादा तक, यानी 525 ई॰ से 575 ई॰ तक, यमन पर क़ाबिज़ रहे। जिसकी तफ़सील यूँ है कि अरियात की हुकूमत 525 ई॰ से, फिर अब्रहा तुल अशरम की हुकूमत 537 ई॰ से 570 ई॰ तक, फिर उसके बेटे यक़सूम की हुकूमत 570 ई॰ से 572 ई॰ तक, फिर मस्रूक़ की हुकूमत 572 ई॰ से 575 ई॰ तक रही। मौलवी सुलेमान साहिब की तहक़ीक़ के रू से मसीहियों की हुकूमत कामिल बहत्तर बरस तक, यानी 525 ई॰ से 595 ई॰ तक, रही। (अर्ज़ उल क़ुरआन, सफ़्हा 213)

       अब्रहा को जब उधर से इत्मिनान हुआ, तो तमाम मुल्क में हाकिम मुक़र्रर किए। मसीहियत की तरवीज की ग़रज़ से तमाम बड़े बड़े शहरों में कलीसाएँ क़ायम कीं, और अज़ीम उश शान गिरजे बनवाए। सब से बड़ा गिरजा ज़ुनआद में तामीर हुआ, जिसको अरब अल क़ैस कहते हैं, जो कलीसिया की तारीफ़ है।

       हाल ही में अब्रहा के ज़माने का एक बहुत बड़ा और क़ाबिल ए ए’तिना कुत्बा सद ए अरिम की बक़िया दीवार पर मिला है। मालूम होता है कि अब्रहा का इक़्तिदार और हुकूमत न सिर्फ़ यमन और उसके अतराफ़ तक नाफ़िज़ था, बल्कि तहामा, यानी मक्का, भी उसका ज़ेर ए नगीं था। इस कुत्बे के अहम इक़्तिबासात हस्ब ए ज़ैल हैं:

(1)

      “रहमान उर रहीम”, और उसके मसीह और रूह उल क़ुद्स की मेहरबानी से अब्रहा अक्सूमी, हबशियों का रईस, और अहमीस ज़ु यमान, शाह ए हबश का महकूम, शाह ए ज़ू रैदान, और हज़रते यमनात व तहामा व नज्दिया, यादगार क़ायम करता है कि उसने अपने आमिल यज़ीद बिन कबसियह पर फ़त्ह पाई; जिसको उसने किंदह और दई पर हाकिम बनाया था और सिपह सालार मुक़र्रर किया था, और रउसा ए सबा (अक़याल ए सबा) उसके साथ थे। और वो मरह, क़मामा जिन्श, मुरतद, और सनफ़ क़िला दार (ज़ू) ख़लील, और आल ए यज़न—रुसाए (इक़बाल), मअदी कर्ब बिन सुमैफ़, और दहक़ान, और उसके हम बरादर और फ़रज़ंदान असलम थे। बादशाह ने उसके मुक़ाबले में जराह क़िला दार (ज़ू) ज़ंबूर को भेजा। यज़ीद ने उसको मार डाला और क़स्र को कदार को ढहा दिया। और किंदह, हरीब, और हज़रमौत के क़बाइल से उसने जमइयत इकट्ठा की। … बादशाह को ख़बर मिली, तो अपनी हिमयरी (हबशी) फ़ौज, हज़ारों की तादाद में, माह ए ज़ू ल क़बात 657 ई॰, यमनी मुताबिक़ 543 ई॰ में लेकर चला। जब मारिब (सबा) की वादियों में पहुँचा, तो यज़ीद ख़ुद आया, और तमाम सरदारों के सामने उसने इताअत क़ुबूल कर ली। …

(2)

      इसी अस्ना में मारिब के बंद (सद) की दीवार, हौज़ और दरवाज़ों के टूटने की ख़बर माह ए ज़ुल मुदरह 657 ई॰ (यमनी मुताबिक़ 543 ई॰) में आई। क़बाइल को फ़रमान भेजा कि पत्थर, लकड़ी और सीसा बंद के दुरुस्त करने के लिए मुहैया करें। बादशाह पहले मारिब गया, और वहाँ के कनीसा में नमाज़ अदा की; फिर मौक़े पर गया, नींव खोदी गई और तामीर शुरू हुई।

(3)

      बादशाह हस्ब ए ज़ैल उमरा (इक़बाल) से मुआहिदा करके वापस आया: शहज़ादा अक्सूम, क़िला दार मआहिर, फ़रज़ंद ए बादशाह; मरजज़फ़, क़िला दार ज़नाह; आदिल, क़िला दार फ़ानिश; और क़िला दारान शूलमान, शाबान, रईन और हमदान वग़ैरह…

(4)

      रहमान की इनायत से नज्जाशी, क़ैसर ए रूम, मुंज़िर (शाह ए हीरा) और हारिस बिन हैला (शाह ए ग़स्सान), और दूसरे बादशाहों की तरफ़ से सुफ़रा दोस्ती और मुहब्बत के लिए माह ए दुवान 657 ई॰ (यमनी 543 ई॰) में आए…

(5)

      फिर सद ए मारिब की मरम्मत की तरफ़ रुजू करता है कि उसको कारीगरों ने बनाया और कुशादा किया; यहाँ तक कि उसकी दराज़ी 45 ज़िरा’अ और उसकी बुलंदी 35 ज़िरा’अ तक पहुँच गई।

(6)

       आख़िर में अमला ए दफ़अला के अख़राजात और ख़ुराक बयान करता हुआ लिखता है कि “इस काम से ब माह ए ज़ी मआन 658 ई॰ फ़राग़त हासिल हुई।”

       Mardtmann, Himyar Inscription Berlin 1893. Müller v. Schoesser Wien 188 (नीज़ देखो अर्ज़ उल क़ुरआन, सफ़्हा 318, 319)

       चूँकि अबारिफ़ ए माफ़ौक़ में क़लीस का ज़िक्र आ गया है, लिहाज़ा मुनासिब मालूम होता है कि इस अजीब रोज़गार गिरजे का बयान भी लिखा जाए। अगरचे क़लीस का बयान बहुत से मोअर्रिख़ीन ने किया है; मिसाल के तौर पर याक़ूत ने मुअजम उल बुलदान 170/14 माद्दा ए क़लीस में, और तबरी ने 1:934, 935 में, और शैख़ सालेह अरमनी ने अपनी तारीख़ (मत्बूआ ए ऑक्सफ़ोर्ड) सफ़्हा 139 में; लेकिन ब एतिबार ए क़दामत ज़्यादा क़ाबिल ए ग़ौर अबू ल वलिद मुहम्मद बिन अब्दुल्लाह अरज़क़ी का बयान है, जो 300 हि॰ मुताबिक़ 1000 ई॰ का मोअर्रिख़ है। वो अपनी मशहूर ए आफ़ाक़ किताब अख़बार ए मक्का (मत्बूआ ए लाइपज़िग) सफ़्हा 88, 90 में लिखता है कि:

کان القلیس مربعاً منتری التربیع جعل (ابرھة) طولہ فی السماء ۶۰ ذراعاً وکبسة من داخلہ اقھارع فی السماءوکان یصعد الیہ بدرج الرجام وجرلہ سوربینہ دبین القلیس مائنا ذراع یطیف بہ من کل جانب وجعل بین ذالک کلہ حجارة یستھیا اھد الیمن الجروب منقوشة مصابقة لایدخل بین اطبا تھا الابرة مطبقة بہ وجعل طول ما نبی بہ من الجروب ۲۰ ذراعاً الشمارثم فصل مابین حجارة الجروب بجارة مثلثلة تسبة الشرف مداخلة بعضھا ببعض حجرا احضروحجراً احمر وحجراً بیص وحجراً اصغر وحجراً اسود فیما بین کل سافین خشیب ساسمہ مدور الراس غلظ الخشیة حقن الرجل ناتھہ علی البناء ثمہ فصل بافریمہ من الرخام منقوش طولہ فی السماء دراحسان وکان الرخام ناتساء علی البناء درا عامہ ثم فصد فوق الرخام بجارة سود لھا بریق من حجارة نقم جبل سنعاء المشرف علیھا ثم وضع توتھا حجارة صفرثم حجارة بیض لھما بریق فکارن ھذا طاھر حائط القلیس وکان عرض حائط القلیس ستة اذرح وکان لہ باب من نجاس ، اذرع طولا فی ۴ عرضاً وکان مدخل منہ الی بیت فی حونہ طولہ ۸۰ ذراعاً فی ذرا عاً معلق (؟) العصمد بالساج المنقوش و مسامیر الذہب والفضة ثم ید خل من البیت الی ایوان طولہ ۴۰ ذرھاً عن یمینہ وعن یسارة وعقودہ مضروبة بالصیسفا ء مث جعدة بسین اضعا فھا کواکب الذھب ظاھرة ، ثم ید خل من الایوات الی قبة ۳۰ ذراعا ً جدررھا بالفسیغساء وفیھا صلب منقوشة بالغیساء والذھب والصفة رفیھا رخامة مما یلی مطلع الشمس من البلق مربعة ۱۰" ذراع فی اتفشی عین من نظر الیھا من بطن القبة قودی صوا الشمس والقمر یا خل القبة۔ وکان تحت الرخامة معبر من خشب اللبغ وھو عندھم الا نبوس مفصد بالعاج الابیض ودرج المتبر من خشب الساج ملبسہ ذھب وفضة وکان فی الصبة سلاسل فضة ۔۔۔۔۔

       तर्जुमा: अब्रहा ने क़लीस की इमारत को मुरब्बा सूरत पर बनवाया था। इसकी कुल बुलंदी 60 गज़ (ज़िरा) की, और इसके क़ुब्बे की बुलंदी अंदर से 100 गज़ की थी, जिस पर संग ए मरमर की सीढ़ियों से होकर चढ़ते थे। इसकी चारों तरफ़ एक दीवार थी। इसके और क़लीस के दरमियान 200 गज़ का गर्द ओ गिर्द का फ़ासला था, जिसको इस मनक़्क़श पत्थर से फ़र्श कर दिया गया था, जिसको अहले यमन ‘जुरूब’ कहते हैं। ये पत्थर इस तरह पैवस्त कर दिए गए थे कि सुई को भी जगह न मिल सकती थी।

       फिर जुरूब के पत्थरों को सब्ज़, सुर्ख़, सफ़ेद, ज़ोरदार सियाह पत्थरों के मुसल्लस नुमा टुकड़ों से, जो एक दूसरे के साथ जुड़े हुए थे, जुदा कर दिया गया था। हर एक क़तार के बीच में सालिम की लकड़ी के गोल गोल टुकड़े लगा दिए गए थे, ताकि पढ़ने वालों के पाँव फिसलने न पाएँ। फिर रंगारंग नक़्श कारी से मुक़रनस बनाया गया था, जिसकी बुलंदी दो गज़ की थी, और मुतफ़र्रिस एक उभरा हुआ था। फिर संग ए मरमर पर चमकदार संग ए सियाह चुन दिए गए थे, जो ह़ैल ए सिग़ार से खोद कर लाए गए थे। फिर उस पर चमकदार संग ए ज़ोर दो संग ए सफ़ेद यके बाद दीगर लगा दिए गए थे। यहाँ तक क़लीस की दीवार के बाहर की तरफ़ का बयान था।

       क़लीस की दीवार का अर्ज़ 6 गज़ था। इसका एक दरवाज़ा उस घर में खुलता था जो क़लीस के बीच में था, जिसका तूल 80 गज़ और अर्ज़ 40 गज़ था, जिसमें साज और सोने व चाँदी के कीलों से बची कारी की गई थी। फिर उस घर से उस ऐवान में दाख़िल होते थे, जिसका तूल दाएँ बाएँ तरफ़ को 40 गज़ था, जिसकी हर एक क़तार पर क़सीद सा से नक़्श कारी की गई थी, और उसके दरमियान सोने के तार, जो उभरे हुए थे, लगा दिए गए थे। फिर उस दीवान से क़ुब्बे में दाख़िल होते थे, जिसकी हर तरफ़ तीस गज़ की थी। इसकी दीवारें फ़ीफ़्सा से बनी हुई थीं, और उनमें सलीबें थीं जो फ़ीफ़्सा और सोने और चाँदी से मनक़्क़श की गई थीं। इस क़ुब्बे में संग ए रुख़ाम अज़ क़िस्म ए बलक़, का एक टुकड़ा था, जो मुरब्बा था और हर एक तरफ़ से 10 गज़ का था, और मशरिक़ की तरफ़ रखा हुआ था। ये इस क़दर चमकदार और ज़िया पाश था कि देखने वालों की आँखों को ख़ीरा कर देता था, और इसके ज़रिये दिन को आफ़ताब और रात को माहताब की रौशनी अंदर की तरफ़ मुनअक़िस हो जाती थी। इस रुख़ामा के नीचे आबनूस की लकड़ी का मिम्बर बना हुआ था, जिस पर हाथी दाँत की नक़्श कारी की हुई थी। मिम्बर की सीढ़ी साज की लकड़ी की बनी हुई थी, जिस पर सोने और चाँदी का ग़िलाफ़ चढ़ाया हुआ था। और क़ुब्बे में चाँदी की ज़ंजीरें लटकी हुई थीं।


21 आबनूस एक ख़ास क़िस्म का दरख़्त है।
22 फ़ीफ़्सा को काशी कारी समझना चाहिए। दरहक़ीक़त फ़ीफ़्सा वे चंद रंग होते हैं जो सदफ़ से बनाए जाते हैं, और उनसे दीवारों पर नक़्श कारी की जाती है, या कोराइन्ट बना कर दीवार तैयार की जाती है।

       अफ़सोस है कि इस आलीशान गिरजे को अबू जाफ़र मंसूर ने, जो बनी अब्बास के दूसरे ख़लीफ़ा थे, वहब बिन मुनब्बह के किसी लड़के और कीना तोज़ सन’आ के यहूदियों के वरग़लाने से गिरा दिया, और अपनी आक़िबत को ख़राब किया।

       अल मुख़्तसर: जब अहल ए नजरान को ज़ू नुवास के ज़ुल्म ओ सितम से रिहाई मिल गई, तो उन्होंने एक शानदार और अज़ीम उश शान गिरजा, जो हर तरह से आरास्ता व पैरास्ता था, बनाया, जिसका नाम उन्होंने काबा ए नजरान रखा। इसी काबा ए नजरान के मुतअल्लिक़ अ‘शा अपनी ऊँटनी को ख़िताब करके कहता है।

وکعبتہ نجران ختم علیکہ              حتی تنا خی بابوا بھا

نزو ر یزیدا وعبد المسیح              وقیسا ھمود خیر ابا بھا

      तर्जुमा: तुझ पर का’बा ए नजरान तक पहुँचना और उसके दरवाज़ों के आगे बैठना फ़र्ज़ है, ताकि हम यज़ीद और अब्दुल मसीह और क़ैस की ज़ियारत करें, जो सब से बेहतर सरदार हैं।

      अल्लामा अबूल फ़रज इस्फ़हानी लिखते हैं कि:

والکعبة التی عناھا الا عشی ماھنا یقال انھا بیعة بنا ھا بنو عبدالمدان علی بنا الکعبة و عظمرھا مصا ھاة ً للکعبة وسموھا کعبة نجران وکان اذانزل بھا ستجیراجیرد وظائف من امطالب حاجة قضیت اومہ ترفدا عطی ما یریدة

       तर्जुमा: जिस का’बा का ज़िक्र अ‘शा ने किया है, वह वही का’बा है जिसे अब्दुल मदान ने का’बा की बिना पर और उसके मुक़ाबले पर बनाया था। और का’बा के एवज़ में उसकी ताज़ीम करते थे, और उसका नाम उन्होंने का’बा ए नजरान रखा। अगर कोई पनाह लेने आता, तो उसे पनाह दी जाती थी। या अगर कोई ख़ाइफ़ आता, तो वह बे ख़ौफ़ हो जाता। और अगर कोई हाजतमंद आ जाता, तो उसकी हाजत पूरी कर दी जाती। और अगर कोई किसी क़िस्म की मदद चाहता, तो उसे मदद दी जाती थी।” (अग़ानी 10:146)

       इस गिरजे के मुतअल्लिक़ मौलवी शिबली नुमानी लिखते हैं कि नजरान मक्का ए मुअज़्ज़मा से यमन की तरफ़ सात मंज़िल पर एक वसीअ ज़िले का नाम है, जहाँ ईसाई अरब आबाद थे। यहाँ ईसाइयों का एक अज़ीम उश शान कलीसा था, जिसको वे का’बा कहते थे और हरम ए का’बा का जवाब समझते थे। इसमें बड़े बड़े मज़हबी पेशवा रहते थे, जिनका लक़ब सय्यद और आक़िब था। अरब में ईसाइयों का कोई मज़हबी मरकज़ इसका हमसर न था।

       ये का’बा तीन सौ खालों से गुम्बद की शक्ल में बनाया गया था जो शख़्स इस के हुदूद में आ जाता था वो मामून हो जाता था। इस का’बे के औक़ात की आमदनी दो लाख सालाना थी। (सीरत उन्नबी सफ़ा 37, 38)

हज़रमौत, ओमान, यमामा और बहरीन में मसीहियत


       अफ़सोस है कि इन इलाक़ों की मुफ़स्सल तारीख़ हमें दस्तयाब न हो सकी। ताहम, चूँकि ये इलाक़े यमन के अतराफ़ में वाक़ेअ हैं और यमन पर मसीहियत का तसल्लुत हो चुका था, इसलिए मुम्किन नहीं कि मसीही मुबल्लिग़ीन ने इन अतराफ़ को छोड़ दिया हो।

       हज़रमौत यमन के मशरिक़ में वाक़ेअ है, और उसके मशरिक़ में उसका एक टुकड़ा वाक़ेअ है, जिसको महरा कहते हैं। अल्लामा इब्ने ख़लदून ने उन तमाम बादशाहों के नाम गिनाए हैं जो हज़रत ए मसीह के बाद से लेकर हबशी सल्तनत के ज़माने तक हज़रमौत पर हुक्मरान रहे हैं। लेकिन हबशी सल्तनत के बाद किसी और बादशाह का नाम नहीं लिखते और हबशी सल्तनत के साथ इस सिलसिले को ख़त्म करते हैं, जिससे ज़ाहिर है कि हज़रमौत हबशी सल्तनत के मातहत रहा था। (इब्ने ख़लदून, मतबूआ मिस्र, 2:252)

       एक मोअर्रिख़ शायद इससे ये नतीजा निकाले कि उन्हीं हबशी फ़ातेह़ीन के साथ साथ मसीही मज़हब हज़रमौत और उसके मुल्हिक़ा इतराफ़ में दाख़िल हुआ होगा। लेकिन मेरी राय में मसीही मज़हब हबशी सल्तनत से मुद्दतों पहले वहाँ पहुँच चुका था, जिसकी दलील ये है कि क़बीला ए किंदा का एक गिरोह बहुत पहले हज़रमौत में मुक़ीम हो चुका था, और किंदा बिला इत्तिफ़ाक़ मसीही क़बीला था। एक गिरोह हज़रमौत में मुक़ीम हो चुका था। (जिल्द 1, सफ़्हा 1852–1856; 2005–2007)

       दीगर ये कि हज़रमौत के मुतअद्दद साहिली मक़ामात थे, जिनका ज़िक्र बतलीमूस ने अपनी जुग़राफ़िया (क॰ 16, फ़॰ 4) में किया है। इन मक़ामात में तिजारती मंडियाँ लगा करती थीं, जहाँ रोमी और दीगर अक़्वाम के तुज्जार आकर ख़रीद ओ फ़रोख़्त किया करते थे। इन रोमी सौदागरों की रफ़्त ओ आमद और इख़्तिलात ओ इर्तिबात से बहुतों को मसीहियत की रौशनी मिल गई होगी, क्योंकि क़ुरून ए ऊला के मसीहियों की ये आम आदत थी कि जहाँ वे जाते थे, अपना मज़हब साथ ले जाते थे।

       जज़ीरा ए सुक़त्री के मुतअल्लिक़ मसऊदी मुरूज उज़ ज़हब (मतबूआ पेरिस, सफ़्हा 3:38) में लिखता है कि: “وظھمہ المسیح قنصر من فیھا الی ھذا الوقت” यानी जब हज़रत ए मसीह ज़ाहिर हुए, तो यहाँ के सब लोग मसीही हो गए और अब तक मसीही हैं। याक़ूत मुअजम उल बुलदान में लिखता है कि जज़ीरा ए सुक़त्री में क़बाइल ए महरा आबाद थे, और उसमें दस हज़ार लड़ने वाले थे, जो ईसाई थे। (10213) नीज़ देखो: (अंसाब उल अरब, मुसन्निफ़ा सलमा बिन मुस्लिम अल औबती अस सहारी, सफ़्हा 106)

       ओमान: ये हज़रमौत की जानिब शुमाल में बहर ए हिंद और बहर ए अजम के किनारे पर आबाद है। इसका पाय ए तख़्त सहा है। इराक़ के मसीही मुबश्शिरीन ने यहाँ दावत ए हक़ पहुँचाई। नसतूरी फ़िर्क़े की तारीख़ से मालूम होता है कि पाँचवीं सदी ए मसीही से यहाँ तब्लीग़ जारी थी, और उनके कई बिशप यहाँ मुक़ीम थे, जिनके नाम बक़ैद ए तारीख़ हस्ब ए ज़ैल हैं:

      यूहनान (424 ई॰), दाऊद (544 ई॰), शमूईल (576 ई॰) और इस्तीफ़ान (576 ई॰)। जिन बादशाहों की तरफ़ से आँहज़रत ﷺ ने तब्लीग़ी ख़ुतूत भेजे थे, उनमें से एक शाह ए ओमान था, जिसका नाम जैफ़र बिन अल हलबंदी था और वह मसीही था। उसका भाई, जिसे अबा और उबैद कहते थे, मसीही था। बादशाह के मसीही होने से आप नतीजा निकाल सकते हैं कि किस कसरत के साथ वहाँ मसीही होंगे।

      ओमान में मसीहियों का एक आलीशान दैर भी था, जिसका ज़िक्र साहिब ए अग़ानी ने किया है। इब्ने असीर अपनी तारीख़ में क़ैस बिन ज़ुहैर के मुतअल्लिक़ लिखते हैं: “لما تنصرساح فی الارض حتی انتہی الی عماں فترھب بھا” यानी जब वह ईसाई हो गया, तो इधर उधर घूमता हुआ ओमान पहुँच गया और यहीं राहिब बन गया। (1:234)

       बहरीन: ये जज़ीरा ए अरब के शर्क़ और ख़लीज ए अजम के साहिल पर वाक़ेअ है। मोतियों के लिए ये एक मशहूर जगह है। यहाँ के रहने वाले बनी अब्द उल क़ैस थे, जो मसीहियों का एक मशहूर क़बीला था। याक़ूत मुअजम उल बुलदान में लिखता है कि यहाँ के बाशिंदे यहूदी, ईसाई और मजूसी थे।

       बिलाद ए बहरीन में नस्तूरी फ़िर्क़े के बहुत से बिशप थे, ख़ुसूसन क़सर में, जिसको वे बैत ए क़तर आइया कहते थे। उनके एक जलसा ए आम में, जो 585 ई॰ में मुनअक़िद हुआ था, उनका चासलीक़ यशू अबाब अहले बहरीन के मसीहियों को हुक्म देता है कि इतवार के दिन, बजुज़ सख़्त ज़रूरत के, किसी क़िस्म का काम मत करो। नीज़ उनका एक और जलसा ए आम 57 हि॰ मुताबिक़ 676 ई॰ में मुनअक़िद हुआ था, जिसमें मज़हबी मामलात पर ग़ौर किया गया था। इस जलसे से मालूम होता है कि बहरीन गिरजों, ख़ानक़ाहों और मुबल्लिग़ीन से भरा हुआ था। (B, Chabos Synodee Nestorions p. 189 el 442)

       मजर में, जो बिलाद ए बहरीन का एक क़स्बा है, और दो बिशप थे, एक का नाम इस्हाक़ था और दूसरे का नाम फ़ूसी। (देखो: हवाला ए बाला, Ibid 387, 482)

       बहरीन के जज़ीरों में से एक का नाम दारबिन है, जिसको दैरैन भी कहते हैं। यहाँ नसतूरियों के यके बाद दीगर तीन बिशपों के नाम मिलते हैं: (1) पौलूस 410 ई॰, (2) याक़ूब 585 ई॰, (3) यशू इयाब 676 ई॰

       एक और जज़ीरा का नाम समाहीज है; सुर्यानी में मशमीज है। ये ओमान और बहरीन के ऐन दरमियान समुंदर में वाक़ेअ है। (याक़ूत 3:131) यहाँ एक बहुत बड़ा गिरजा था, और मजामे’अ ए नसतूरिया (Chobot, 273, 275) में तीन बिशपों के नाम मज़कूर हैं, जो इस गिरजे के मुतवल्ली थे। उनके नाम ये हैं: बाताई, इलियास, सरकीस, 401 ई॰ से 576 ई॰ तक।

       अहसा के मदीन ए ख़त्ता में, जिसके ख़त्ती नेज़े मशहूर हैं, नसतूरियों के बड़े बड़े गिरजे थे। इसके दो बिशपों के नाम मिलते हैं, जिनमें से एक का नाम इस्हाक़ था, 576 ई॰, और दूसरे का नाम शाहीन था, 676 ई॰ में।

       यमामा: इसका दूसरा नाम अरूज़ और जौबी है, जो अहक़ाफ़ के साथ मुल्हिक़ है; जिसके मुतअल्लिक़ अरबों का ख़याल है कि पहले ज़माने में तस्म और जदीस यहीं रहते थे। क़ुस्तंत़ीन ए आज़म के बाद ही यहाँ मसीहियत पहुँच गई थी। अम्र बिन मत्ती फ़त्तार किताब उल मशरिक़ में लिखता है कि “अब्द यशू ने चौथी सदी के अवाख़िर में यहाँ मसीहियत की तब्लीग़ की।”

       यहाँ के रहने वाले इस्लाम से क़ब्ल अहले यमामा के बनी हनीफ़ा थे, जिन पर तमाम मुसलमान मोअर्रिख़ीन का इत्तिफ़ाक़ है कि ये मसीही थे।

       Arnold (J, M) Islam, his History and Relations to Christinanity p.51

       इस्लाम से कुछ पहले यहाँ का बादशाह हौज़ा बिन अली था, जो मसीही था। उसने बनी तमीम के एक गिरोह को गिरफ़्तार कर लिया था, और ईद ए फ़सह के दिन उनको रिहा कर दिया, जिसकी तारीफ़ में अ‘शा कहता है कि:

بھم یعقرب یوم الفصح ضا حیة
یرجو الالہ بمااسدی وما صنعا

       यानी असीरों (क़ैदियों) को रिहा करके उन्हों ने बड़ी क़ुर्बानी अदा की। क्योंकि ख़ुदा से उन को बड़े अज्र की उम्मीद थी। (इब्ने असीर मत्बूआ मिस्र 1:260)

       अगर आप सफ़हात बाला को बग़ौर मुतालआ करें, तो मालूम हो जाएगा कि अरबिस्तान के ख़ित्ता ख़ित्ता और क़ता क़ता में मसीहिय्यत ने इस तरह नफ़ुज़ किया था कि अरबिस्तान का कोई क़बीला और कोई ज़ाइफ़ा इस इलाही से ख़ाली ना था।


23 Ibid 289,482

इराक़ में मसीहिय्यत


       अगर आप बहरीन से निकल कर अहसा की इतराफ़ से होते हुए जानिब ए शुमाल रवाना हों, तो ऐसे ख़ित्ते में पहुँचेंगे, जिसके शर्क़ में ख़लीज ए फ़ारिस और मग़रिब में लिक दुक़ रेगिस्तान है। लेकिन इसके शुमाल में एक निहायत सरसब्ज़ व शादाब ख़ित्ता है, जिसको दो दरिया, यानी फ़ुरात व दजला, सैराब करते हैं। अपनी ज़रख़ेज़ी और रौनक़ की वजह से गुज़श्ता ज़मानों में बाबिली, क़लदानी और आशूरी जैसी बड़ी बड़ी सल्तनतों का गहवारा रहा है। इस ख़ित्ता ए बे नज़ीर को अरब इराक़ कहते हैं।

       अहले अरब निहायत क़दीम ज़माने से इराक़ पर क़ब्ज़ा करने के ख़्वाहिशमंद थे। चुनाँचे जब कभी उनको हमला करने का मौक़ा मिला, फ़िल फ़ौर उससे फ़ायदा उठाया। इन हमलों का नतीजा ये हुआ कि अरब के जुनूबी क़बाइल ने रफ़्ता रफ़्ता इस पर क़ब्ज़ा कर ही लिया। जिन हमला आवर क़बाइल का मोअर्रिख़ीन ने ज़िक्र किया है, उनमें से एक यमन का क़बीला अज़्द है, जो सद ए माअरिब के इन्फ़िजार की वजह से, या नस्ल के बढ़ जाने की वजह से, या मुल्क गीरी की वजह से यमन से निकल कर दो हिस्सों में मुनक़सिम हुआ। एक हिस्सा जफ़्ना बिन अम्र बिन सअलबा के ज़ेर ए क़ियादत मग़रिब की तरफ़ शाम में जा पहुँचा और ग़स्सानी सल्तनत की बुनियाद डाली, और दूसरा हिस्सा मालिक इब्ने फ़हम के ज़ेर ए क़ियादत शुमाल की तरफ़ इराक़ में जा धमका और दौलत ए मनाज़िरा की बुनियाद डाली, जिनके सब से पहले बादशाह का नाम जज़ीमा तुल अबरश था। जज़ीमा ने दरियाए फ़ुरात की तमाम मग़रिबी अतराफ़ पर क़ब्ज़ा किया और अंबार को अपना पाय ए तख़्त बनाया। लेकिन उसके जानशीनों ने दार उल सल्तनत को हीरा में मुन्तक़िल किया, यहाँ तक कि इस्लाम का ज़ुहूर हो गया, और ख़ालिद इब्ने वलीद ने उनकी आख़िरी बादशाह मुंज़िर नुअमान अबी क़ायूस को 11 हि॰ मुताबिक़ 633 ई॰ में मग़लूब किया।

       शाहान ए हीरा अपनी सल्तनत के इब्तिदाई ज़माने से शाहान ए अजम के हलीफ़ थे, जिस तरह कि शाहान ए ग़स्सान अपने इब्तिदाई ज़माने से शाहान ए रूम के हलीफ़ थे।

       मसीहियत से क़ब्ल अरबिस्तान की और अतराफ़ की तरह यहाँ भी वही मुशरिक बुत परस्ती, क़ौकब परस्ती और आफ़ताब परस्ती जारी थी। लेकिन जब मसीहियत के आफ़ताब की नूरानी किरनें यहाँ पड़ने लगीं, तो इस ख़ित्ते की भी काया पलट गई, और अज्राम ए समावी के एवज़ में ख़ुदा ए वाहिद व बरहक़ की परस्तिश होने लगी।

      क़लदानी मोअर्रिख़ीन का इस पर, जैसा कि अल्लामा समआनी ने अपनी मकतबा ए अशरक़िया (4:5–30) में साबित किया है, पूरा इत्तिफ़ाक़ है कि इराक़, अशूर और बाबिल में सब से अव्वल मुक़द्दस तोमा और बरतलमाउस, और मुक़द्दस अदी या तदाई, जो हुज़ूर ए मसीह के सत्तर (70) शागिर्दों में से एक थे, अपने दो शागिर्दों के साथ, जिनमें से एक का नाम अजी और दूसरे का मारी था, इस ख़ित्ते में ख़ास तौर पर तब्लीग़ का काम किया। लेकिन अक्सर मोअर्रिख़ीन को इस बयान पर शक था, क्योंकि इसका माख़ज़ दसवीं सदी ईस्वी से आगे नहीं मिलता था। लेकिन ज़माना ए हाल के सुर्यानी इक्तिशाफ़ात से बयान ए फ़ौक़ की ऐसी तस्दीक़ हुई कि “किसी को शक ओ शुब्हा करने की गुंजाइश बाक़ी नहीं रही।” क्योंकि ये साबित हो गया कि मुक़द्दस अदी, जिनको कलदानी अपने रसूल तस्लीम करते हैं, दरहक़ीक़त हुज़ूर ए मसीह के शागिर्द थे, और इराक़ में उन्होंने ही तब्लीग़ का काम किया। चुनाँचे कलदानियों की क़दीम तरीन तवारीख़, जो हाल ही में दस्तयाब होकर शाए हो चुकी हैं, मसलन तारीख़ ए बरहद बशाया अरमाया, तारीख़ ए मशीहाज़ख़ाना, और शेर ए नरसाई, जो पाँचवीं सदी का है; और जलसा ए मदाइन, जो क़िसरा के महल में 612 ई॰ में मुनअक़िद हुआ था; और शुहदा की तारीख़; और पुराने मज़हबी दस्तावेज़ात, ये सब शहादत दे रहे हैं कि मुक़द्दस अदी ने यहाँ बशारत का काम किया है, और उन्हीं की सई ए मशकूर से यहाँ मसीहियत फली फूली।

      A Mingana Sources Syria Ques, Ele Khayath Syri Orientales Sinchaldia

      सिर्फ़ यही नहीं कि इन मुक़द्दसीन ने इराक़ पर इक्तिफ़ा किया हो, बल्कि अरब के दीगर अतराफ़ में भी पहुँच गए थे। चुनाँचे साहिब ए किताब नहला, जो सातवीं सदी ईस्वी का मुसन्निफ़ है, लिखता है कि:

“जिन्होंने जज़ीरा ए मौसिल, अर्ज़ ए बाबिल, सवाद ए इराक़, तैमिन, हज़ा और दीगर अतराफ़ ए अरब में तब्लीग़ और दावत का काम किया, वे हुज़ूर ए मसीह के सत्तर शागिर्दों में से अदी व मारी थे, और बारह शागिर्दों में से नाथीनल इब्ने सलमाई (बरतलमाउस) भी आकर उनमें शरीक हुआ। सुलैमान बिन मारी इस रसूल के मुतअल्लिक़ लिखता है कि बरतलमाउस, अदी और मारी की मइयत में नसैबीन, जज़ीरा ए मौसिल, अर्ज़ ए बाबिल, इराक़, बिलाद ए अरब, मशरिक़ और नब्त में बेशुमार लोगों को मसीही किया।”

       बुज़ुर्ग अफ़राम ए आज़म, जो इनसे पहले और चौथी सदी ईस्वी के हैं, अपने इस मिमरा में, जिसमें आपने मदीनत उर रुहा की तारीफ़ की है, फ़रमाते हैं कि मुक़द्दस अदी ने रुहा और मशरिक़ में बशारत दी।

       इब्ने मारी फ़त्तार किताब उल मशरिक़ में लिखता है कि “मुक़द्दस मारी ने बाबिल की जमीअ अतराफ़ में, और इराक़ैन और अहवाज़, और अरब के बादिया नशीं अक़्वाम, और नज्रान, जज़ाइर ए बहरीमन में तब्लीग़ की।”

       अल्लामा अब्द यशू ख़य्यात मुक़द्दस मारी के आमालनामे के दीबाचे में लिखते हैं कि:

“वे ज़ख़ाइर, जो 1879 ई॰ में यशू सुर्यानी के ज़ख़ाइर के साथ, जो छठी सदी ईस्वी के शुहदा में से एक थे, करमलाश (शर्क़ी मौसिल) के क़दीम गिरजे के आसार में मिले हैं, मुक़द्दस मारी की तारीख़ी शख़्सियत की क़तई और हत्मी दलील हैं।” (Acts, S. Marris, 7–8)

       जब मसीहियत ने रोम में बुत परस्ती को शिकस्त दी और क़ुस्तंतीन मसीही हो गया, तो इसका असर इराक़ तक पहुँच गया, और वे लोग जो ईरानी बादशाहों के ज़ुल्म से तंग आ गए थे, लाखों की तादाद में मसीही होने लगे। यहाँ तक कि इराक़ आम तौर पर मसीही मुल्क बन गया, और मजूसियत क़रीबन मिटने लगी, कि साबूर ज़ुल अकताफ़ तख़्त पर बैठ गया, और सब से पहला काम ये किया कि 60000 इक़बाल मसीहियों को क़त्ल किया।

       चौथी सदी ईस्वी में यमन के क़बाइल में से आल ए नस्र बिन रबीअता अल अज़वी में से एक गिरोह ने यमन से निकल कर शुमाल की अतराफ़ में आकर डेरा डाल दिया। मुल्हिक़ा इतराफ़ के और अरबी क़बाइल आ आकर इसके साथ मिलते गए, यहाँ तक कि उन्होंने एक सल्तनत की बुनियाद डाल दी, जिनके सब से पहले बादशाह का नाम इमरउ उल क़ैस बिन अम्र, मअरूफ़ ए अल बद्अ था, और चौथी सदी के वस्त तक बादशाह रहा, और मसीही था।

      चुनाँचे इब्ने ख़लदून लिखता है कि:

ولما ھلکہ عمرو بن عدی ولی بعد ہ علی العرب وسائر من ببادیة العراق والھجاز والجزیرہ امراء القیس بن عمرو ابن عدی ویقال لہ البدء وھو اول من تنصر من ملوک آل نصر وعمال الفرس

यानी जब अम्र बिन अदी मर गया, तो उसके बाद अरब और तमाम बादिया इराक़ और हिजाज़ (सरज़मीन ए मक्का) और जज़ीरा पर इमरउ उल क़ैस बिन अम्र बिन अदी बादशाह बन गया, जिसको अल बद्अ भी कहते हैं। अव्वल लस्र मिन से ये सब से पहला बादशाह था जो मसीही हो गया। (1:263, मत्बूआ मिस्र)

      इराक़ में मसीहियत के फैल जाने की एक वजह ये थी कि वे यमनी क़बाइल, जो वतन से हिजरत करके इराक़ में जाकर मुक़ीम हो गए थे, अक्सर मसीही थे और अपने मज़हब को साथ ले कर गए थे। चुनाँचे यमन के बयान में आप मुफ़स्सल पढ़ चुके हैं। यहाँ दो एक और मुसलमान मोअर्रिख़ीन की रिवायात नक़्ल करते हैं, जिससे हमारी राय की मज़ीद ताईद होती है।

      क़ज़वीनी “अंबिया” के मुतअल्लिक़, जिनको ख़ुदा ने बनी हिमयर की हिदायत के लिए भेजा था, लिखता है कि: “فبعث الله ثلاثہ عشر نبیاً الاھل یمن فکذبوھم” यानी ख़ुदा ने तेरह अंबिया अहले यमन के पास भेजे, लेकिन उन्होंने उनको झुठलाया।

      मसऊदी की इबारत ये है कि:

      فقالو لرسلھم ادعوان الله ان یخلف علینا نعتنا ومرد۔ علینا ماشر ومن اتعامنا وعطیکمہ موثقاً ان لانشر باالله شیئا فسا لت الرسمہ بربھا فاجا بھمہ الی ٰ خاکہ واعطاھم مسلوانا تسعت بالارھمہ واخبصت عما ئر ھمہ الی ارض فلسطین والشام،

      इसके बाद लिखता है कि: “ان فالکہ کان بین مبعث عیسیٰ والنبی” यानी हिज्र के लोगों ने उन रसूलों से कहा कि आप हमारे लिए ख़ुदा से दुआ करें कि वह अपनी साबिक़ा नेमतों और इनआमात से हमें फिर सरफ़राज़ करे, और हम आप से वादा करते हैं कि हरगिज़ शिर्क नहीं करेंगे। जब रसूलों ने ख़ुदा से दुआ की, तो उनकी दुआ मुस्तजाब हुई, और फिर उनको वुसअत और ख़ुशी व मुरफ़्फ़ह हाली नसीब हुई, और फ़िलस्तीन और शाम तक वे फूलते फलते रहे। और ये वाक़िआ हज़रत ईसा और आँहज़रत के मबऊस के दरमियानी ज़माने का है। (3:293)

       ये अंबिया, जिनका ज़िक्र क़ज़वीनी और मसऊदी ने किया है, यक़ीनन मसीही रसूल थे, क्योंकि “नबी” और “रसूल” का इत्लाक़ मसीहियों की इल्हामी कुतुब की रू से, अलावा हुज़ूर के हवारी और शागिर्दों के, मुबल्लिग़ीन और वाइज़ीन और ख़ादिमान ए दीन पर भी होता है, और ये मसीहियों में एक आम इस्तिलाह है।

       क़बाइल ए संबीना का इराक़ में जाकर मसीही होने के मुसलमान मोअर्रिख़ीन भी क़ाइल हैं, जिसका ज़िक्र वे यूँ करते हैं कि क़ुज़ाआ, तैम उल कलात, कल्ब बिन वबरा और अशअरीयीन के क़बाइल ने अज़्द के क़बीले के साथ मिल कर मुवाख़ात पर अहद ओ पैमान किया, जिसके सबब से वे तनूख कहलाए और बहरीन की अतराफ़ में फ़र्दकश हो गए, और फिर वहाँ से इराक़ में हीरा और अंबार के दरमियान मुक़ीम होकर ईसाई हो गए।

      चुनाँचे इब्ने ख़ल्कान, अबुल अला अल मआर्री के बयान में लिखता है कि:

“تنرخ احدی القبالکہ الثلاث الحاھی نصاری العرب وھم بھرا تنوح وتغلب” यानी तनूख अरब के उन तीन ईसाई क़बीलों में से एक है, जिनका नाम बहरा, तग़लिब और तनूख था। और उनके चौथी सदी में ईसाई होने की ये दलील है कि शारदी उल अकताफ़ ने उनमें से बहुतों को महज़ इस लिए क़त्ल किया कि वे ईसाई थे। (अग़ानी 1:162)

       गुमान ए ग़ालिब है कि वे उन दो ख़ानक़ाहों को, जिनमें से एक का नाम वीर ए जमाजिम है, जो कूफ़ा के क़रीब था, और दूसरे का नाम दैर उल हरीक़ है, जो हीरा के क़रीब था, (मुअजम उल बुलदान 2:652, 664), इराक़ के मसीहियों ने उन मसीही शुहदा की यादगार में बनाया होगा, जिनको शाबूर ए मज़कूर ने शहीद किया था। इसी मुअजम उल बुलदान में इब्ने कल्बी से ये भी रिवायत है कि दैर ए जमाजिम को बनी आमिर ने ख़ुदा की शुक्रगुज़ारी के लिए बनाया था कि उसने उन्हें बनी ज़ुबयान और बनी तमीम पर फ़तहमंदी बख़्शी, और दैर उल हरीक़ को उन शहीदों की यादगारी के लिए बनाया, जिनको हीरा में आग में डलवा कर जला दिया गया था।

       तारीख़ के मुतालए से मालूम होता है कि चौथी सदी मसीही से निहायत कसरत के साथ इराक़ की सरज़मीन में ख़ानक़ाहें और गिरजे बनने शुरू हो गए थे। बुज़ुर्ग ओगीन, जिनकी रहबाना ज़िंदगी अर्ज़ ए जज़ीरा और माबैन उल नहरैन में बहुत मशहूर हो चुकी थी, अपने शागिर्दों की एक जमाअत को इस लिए इराक़ की दूर दराज़ अतराफ़ में भेजा, ताकि वहाँ के लोगों को रहबानियत के सुलूक और तरीक़े सिखाएँ।

       मोअर्रिख़ीन ने इस जमाअत के एक शख़्स का ज़िक्र ख़ुसूसियत के साथ किया है, जिसका नाम यूनान (यूनुस) था। उसने एक ख़ानक़ाह अज़ार में बनवाई, जो क़बीला ए लख़्म का पहले पाय ए तख़्त था, और दूसरी नैनवा (मौसिल) के क़रीब। इन दोनों का ज़िक्र याक़ूत ने भी ब नाम दैर ए मा यूनान (मुअजम उल बुलदान 2:1–7) और दैर ए यूनुस में किया है। इस आख़िरी दैर के मुतअल्लिक़ वह लिखता है कि:

“वो दजला की मशरिक़ी जानिब पर मौसिल के बिल मुक़ाबिल वाक़ेअ है; इसमें वह दजला के दरमियान कम ओ बेश दो फ़रसख़ की मसाफ़त है, जहाँ ये बना है, उसको नैनवा कहते हैं।” (2:710)

       कलदानियों की क़दीम तारीख़ में लिखा है कि यूनान मौसूफ़ तमाम इराक़ में हुज़ूर ए मसीह की मुनादी करता फिरा। तारिक उद दुनिया होने से क़ब्ल उलूम ए फ़लसफ़ी और इल्म ए हिकमत की तकमील की थी; इस लिए उन्होंने अरब को इनसे भी मुस्तफ़ीद फ़रमाया। जब उन्होंने अंबार में अपनी ख़ानक़ाह बनाई, तो कसरत के साथ चारों तरफ़ से इल्म ए सुलूक सीखने की ग़रज़ से तलबा उसके पास आते थे।

       इसी चौथी सदी के निस्फ़ सानी में एक और मसीही राहिब पैदा हुआ, जिनका नाम अब्दा था। ख़ानक़ाहों के बनाने का तहय्या कराया। इस मक़सद को पूरा करने के लिए मदाइन के जासलीक़ के पास, जिनका नाम तमूज़िया तूमरसा था, इजाज़त लेने आया, और इजाज़त हासिल करके अपने वतन दैर ए क़नी में एक बड़ी ख़ानक़ाह बनवाई, और उसको मुक़द्दस मारी के नाम से मंसूब किया, और इस रसूल के तमाम मुतबर्रकात को उसमें रखा।

       उनके शागिर्दों में से अब्द यशू ने नहर ए सरसर के किनारे पर एक ख़ानक़ाह बनवाई, और उसका नाम दैर उस सलीब रखा, क्योंकि साबूर ए ज़ुल अकताफ़ के ज़ुल्म के अय्याम में यहाँ पर एक नूरानी सलीब आसमान पर ज़ाहिर हुई थी। उसने एक और ख़ानक़ाह सवाद ए इराक़ के अक्साया में, और तीसरी ख़ानक़ाह दरिया-ए फ़ुरात के किनारे पर बनवाई। मोअर्रिख़ इब्ने मारी लिखता है कि उसने मुतूस, मीतान और यमाना में बहुतों को मसीही बनाया, और नबी ए सअलबा को फिर मसीही ईमान पर लौटा। (सफ़्हा 26) और तूमरसाए ने उनको बिशप बना कर दैर ए महराक़ में मुक़र्रर किया। (मकतबा ए शर्क़िया, समआनी, जि॰ 3, सफ़्हा 198, 218 और सफ़्हा 302) उसके दूसरे शागिर्द ज़ीब लाहाले ने फ़ुरात के आस पास के अरबों को मसीही बनाया, और एक ख़ानक़ाह सवाद ए इराक़ के एक क़ब्ज़े में, और दूसरी फ़ुरात के किनारे पर बनवाई। मोअर्रिख़ीन का बयान है कि उसकी ख़ानक़ाह में चार सौ से ज़्यादा तालिब ए इल्म थे, जो अरबिस्तान और दीगर ममालिक से आए हुए थे।

       इसी अस्ना में एक और राहिब पैदा हुआ, जिसका नाम इस्कंदर था। उसने लाइफ़ा ए शब बेदारान की बुनियाद डाली। ये लोग शब ओ रोज़, बजुज़ इबादत ए इलाही के, और कुछ काम नहीं करते थे। सुलैमान बिन मारी तारीख़ ए फ़त्तार ए कुर्सी उल मशरिक़ (सफ़्हा 21) में, और अम्र बिन मत्ती अल जदल (सफ़्हा 28) में, बहुत सी ऐसी ख़ानक़ाहों का ज़िक्र किया है, जिनकी बुनियाद उन मोअर्रिख़ीन की किताबें हैं, जिनके ज़माने में ये ख़ानक़ाहें बन गई थीं, जिनमें अम्मी ख़ास तौर पर क़ाबिल ए ज़िक्र है। ये शख़्स बुज़ुर्ग अब्दा के शागिर्दों में से एक था, और अपने उस्ताद की सवानिह ए उमरी लिखी थी, और उसके बाद कलदान के रईस उल असाक़िफ़ मुक़र्रर हुआ।

       अल ग़रज़, इराक़ में इस कसरत से मसीही ख़ानक़ाहों का होना साबित करता है कि चौथी सदी मसीही के ख़त्म होने से क़ब्ल इराक़ में मसीहियत का आफ़ताब निस्फ़ उन्नहार तक पहुँच चुका था। ये ख़ानक़ाहें क्या थीं, गोया ज़िंदगी के चश्मे थे, जो इराक़ को एक सिरे से लेकर दूसरे सिरे तक सरसब्ज़ ओ शादाब कर रहे थे, और उन ख़ानक़ाहों के असर से अरबों के दिलों में मसीहियत इस क़दर मुस्तहकम हो चुकी थी कि मसीहियत पर जान देने को सब से बड़ी नेमत समझते थे। चुनाँचे जब 361 ई॰ में ईरान के बादशाह मानूएल (इम्मानूएल), शाइबल और इस्माईल को बतौर सफ़ीर क़ैसर यूलियानूस के पास भेजा, जो ज़ुल्म में बेहद मशहूर था, तो क़ैसर ने उनसे कहा कि बतौर रस्म के मेरे बुतों के सामने सज्दा करो। तो उन्होंने सज्दा करने से इनकार किया, जिस पर क़ैसर ने उनको क़ुस्तंत़ुनिया में शहीद करवाया। उनका पूरा मजमूआ “बुलंदियों” (Acta) में महफ़ूज़ है।

       इनसे क़ब्ल 250 ई॰ में अब्दूदस्तान के साथ ही क़ैसर क़ियूस के ज़माने में ऐसा ही वाक़िआ हुआ था, जिनकी ईद कैथोलिक कलीसाओं में 30 तमूज़ को होती है।

       इन शुहदा के थोड़ी मुद्दत के बाद एक और आरिफ़ बिल्लाह का ज़ुहूर हुआ, जो अपने ज़ुह्द ओ इत्तक़ा, तरतीब ओ तअय्युद, मुअजिज़ात ओ करामात की वजह से मशरिक़ ओ मग़रिब में यकसाँ तौर पर मशहूर हुआ। उनका नाम सिमआन ए अमूदी था, और 360 ई॰ में अंताकिया में पैदा हुआ। ये उस पहाड़ में गोशा नशीं हुआ, जो उनके नाम से जैल ए सिमआन मशहूर है। उनकी सीरत को दो शख़्सों ने लिखा है। एक तो उनका शागिर्द था, जिसका नाम अफ़्तून है, जो आमाल उल आबाद उल लातीनियीन में Migne (P.L.T. 78, p. 329) में शाए हो चुकी है, और दूसरे का नाम तादोरीतुस है, जो उनके मुआसिर थे, और अक्सर उनके पास रफ़्त ओ आमद रखते थे, और सिद्क़ व रिवायत में एक आला पाये के मालिक थे।

       इन किताबों के पढ़ने से इस अम्र का अंदाज़ा बख़ूबी हो सकता है कि इस मर्द ए ख़ुदा के तुफ़ैल से अरबों को किस क़दर रूहानी फ़ायदा पहुँचा। हम इनका ज़िक्र एक से ज़्यादा बार कर चुके हैं कि यमन के हिमयरी और इराक़ी किस कसरत के साथ आपके पास बरकत हासिल करने की ग़रज़ से आते थे। इस मक़ाम पर तादोरीतुस का, जो ख़ुरश के बिशप थे, एक हवाला नक़्ल करना फ़ायदे से ख़ाली न होगा।

“सिमआन का अमूद ये नूर बन कर बनी इस्माईल के हज़ारों के दिलों को मुनव्वर कर दिया। कभी सैकड़ों की तादाद में, और कभी हज़ारों की तादाद में, उनके पास आकर अपने अजदाद की गुमराहियों और बुत परस्तियों से तौबा करते थे, और उनके क़दमों में अपने बुतों को तोड़ डालते थे, और इंजील की पाक तालीम हासिल करके उनको अपने इलाक़ों में फैलाते थे। एक बार तो उनकी कसरत ए इज्तिहाम की वजह से मेरी ज़िंदगी ख़तरे में पड़ गई थी, क्योंकि मुक़द्दस सिमआन ने उनसे ये कहा कि ये बिशप हैं, लिहाज़ा तुमको इनसे बरकत हासिल करनी चाहिए। फिर क्या था, मुझ पर ऐसे टूट पड़े कि अगर सिमआन उनको मना न करता, तो यक़ीनन मैं उनमें फँस कर मर जाता।” (Migne P.O.T. 82, Col. 1474; नीज़ देखो फ़िलौतादुस, बाब 26)

       इस मक़ाम पर तादोरीतुस के साथ मोअर्रिख़ एवाग्रियुस और क़ुरमान भी, जो इनके मुआसिर थे, इनके मुअजिज़ात व करामात का ज़िक्र करते हैं कि एक बार शहर क़ता के एक क़बीले का सरदार इस क़दर बीमार हो गया कि उसको एक तख़्त पर उठा कर इनके पास लाए। सिमआन ने उस पर सलीब का नक़्श खींचा, और फ़िल फ़ौर अपना तख़्त ख़ुद उठाता हुआ और ख़ुदा का शुक्र करता हुआ चला गया। (अल आबाअ उल यूनान, P.G.T. 88, Col. 1477) इसी तरह एक और अमीर को, जो पेट की बीमारी में क़रीब उल मर्ग था, अच्छा किया, और मसीही होकर चला गया। (Migne P.L.T. 73, p. 829)

       इसी ज़माने में एक और आरिफ़ बिल्लाह का ज़ुहूर हुआ, जिनका नाम मारूसा था, और मयारज़ार ए फ़ीन के रईस उल असाक़िफ़ थे। उनके मुअजिज़ात और करामात की वजह से ईरान का बादशाह अर्दशीर ए सानी उनको बहुत इज़्ज़त की निगाह से देखने लगा, क्योंकि उसकी एक लड़की को ख़ुदा ने उनकी दुआ की वजह से एक मुहलिक बीमारी से शिफ़ा दी थी। इस लड़की ने अपने बाप से सिफ़ारिश की कि मसीहियत की तब्लीग़ व इशाअत की आम तौर पर इजाज़त दी जाए। चुनाँचे बादशाह ने इजाज़त दे दी।

       मुख़्तसर ये कि इन बुज़ुर्गों, ख़ुदा शनासों और ज़ाहिदों की पाकीज़ा और मलकी ज़िंदगी की वजह से इराक़ और उसके तमाम अतराफ़ में मसीहियत की ऐसी इशाअत हुई, जिस तरह कि दूसरे ममालिक में हुई थी। इराक़ के कोने कोने में ख़ानक़ाहें और इबादत गाहें बननी शुरू हुईं। हर एक ख़ानक़ाह में हज़ारों तारिक उद दुनिया रहते थे, जो शब ओ रोज़ ज़िक्र ओ अज़कार में मशग़ूल ओ मसरूफ़ रहते थे। अगर आप बकरी की मुअजम ए मा इस्तअजम के (358–381) तक को, और याक़ूत उल हमवी के (2:610, 739) को बग़ौर मुतालआ करें, तो आप ख़ानक़ाहों और इबादत गाहों की कसरत को देखकर मह्व ए हैरत होंगे। हालाँकि ये वही ख़ानक़ाहें और इबादत गाहें हैं, जिनका ज़िक्र अरब के शायरों के अशआर में है।

       मसलन: दैर ए अबलक अहवाज़ में; दैर ए अबी सफ़ मौसिल के ऊपर, बलद के क़रीब; दियारात उल असाक़िफ़ (बिशपों की ख़ानक़ाहें) नजफ़ में; क़सर ए अबी ख़सीब और सदीर के माबैन; वीर ए अल अस्कून हीरा और बासित के क़रीब, जिनमें मज़हबी उलूम की तालीम दी जाती थी; वीर ए शमूनी बग़दाद के क़रीब; दैर ए आला मौसिल में, उस पहाड़ पर जो दजला के किनारे पर है; दैर ए बा शहरा सामर्रा और बग़दाद के माबैन; दैर ए बा अरबा मौसिल और अल हदीसा के दरमियान, दजला के किनारे पर; दैर ए मीख़ाईल और दैर ए अस सआलिब, जिनको बनी सअलबा ने बग़दाद के क़रीब हारिसिया में बनवाया था; दैर ए अल हजरआ हीरा में; दैर ए अल ख़वात अक़बरा में; वीर ए अल ख़नाफ़िस उस पहाड़ की चोटी पर, जो दजला और नैनवा के किनारे पर है; दैर ए दरसा बग़दाद के मग़रिब में; दैर ए दमदा बसरा के पास; दैर ए नरंद और बग़दाद के मशरिक़ में; दैर ए साबूर दजला के मग़रिब में; दैर ए समालू बग़दाद के क़रीब; दैर ए सूसी सतर मन राय (अब सामर्रा) के पास; दैर ए सत्ता कूफ़ा में; दैर ए सबाई तकरीत के मशरिक़ में; दैर ए तुवादिस सामर्रा में; दैर ए आक़ूल मदाइन, क़िसरा और नुअमानिया के दरमियान; दैर ए अल अज्जाज तकरीत और हीत के दरमियान; वीर ए अल अलस और दैर ए फ़ीथून, दोनों सामर्रा में; दैर ए अल क़ुबाब और दैर ए क़ूताद, दोनों बग़दाद की नवाही में; दैर ए अल क़ियारा मौसिल के पास; दैर ए मा फ़ीसून हीरा में, नजफ़ के नीचे; दैर ए मा सरजीन सामर्रा के क़रीब; दैर ए मत्ती नैनवा के क़रीब; दैर ए मदयान करख़ाया, जो दरिया पर बग़दाद के क़रीब है; दैर ए मार जरजीस मज़ाफ़ा में, जो बग़दाद के गाँवों में से एक गाँव है; दैर ए मार मार सामर्रा में; दैर ए मरीहना तकरीत में; वीर ए मल्कीसा व मौसिल के ऊपर; दैर ए हज़क़ील बसरी की अतराफ़ में, वग़ैर ज़ालिक, जिनसे आप मसीहियों की कसरत का अंदाज़ा कर सकते हैं।

       बकरी और याक़ूत ने और भी ख़ानक़ाहों का ज़िक्र किया है। मसलन: वीर ए इब्ने बराक़ हीरा के बाहर; दैर ए इब्ने आमिर; दैर ए इब्ने वसना, जिसका दूसरा नाम दैर ए मा अबदा है; हीरा के क़रीब ज़ात उल अलैरह में, जिसको अबदा इब्ने हनीफ़ बिन वज़्ज़ाह अल लहयानी ने बनवाया था; दैर ए हंज़ला, जिसको हंज़ला बिन अब्द उल मसीह बिन अलक़मा बिन मालिक लहमी ने बनवाया था; दैर ए हन्ना, जो एक क़दीम ख़ानक़ाह है; अकीरआ में एक और दैर ए हन्ना है, जो जलीख़ के पास है; दैर ए ख़ंदफ़; दैर ए सलवा; दैर ए अब्द उल मसीह; दैर ए अल ग़दारी सतर मन राय और ख़तीरा के माबैन, जिसमें सिर्फ़ कुंवारी लड़कियाँ रहती थीं; दैर ए अलक़मा हीरा में; दैर ए क़रह; दैर ए अल लज्ज; दैर ए हिंद उल कुबरा; दैर ए हिंद उस सुग़रा।

       दैर ए हिंद उल कुबरा के मुतअल्लिक़ अबू उबैद उल बकरी मुअजम ए मा इस्तअजम (सफ़्हा 364) में, और याक़ूत मुअजम उल बुलदान (2:9–7) में लिखते हैं कि उसकी पेशानी पर ये इबारत लिखी हुई थी कि:

"وکان فی صدرہ (ای صدر دیرھند) مکتوب بنت ھذہ البعة ھندبنت الحارث بن عمربن حجرہ الملکة بنت الا ملاکہ وام املکہ عمر بن المنذر امتہ المسیح وام عبدہ وابنة عبدہ فی زمن ملک الاملکہ خسرو نواشروان فی زمن افرائیمہ الاسقف ۔ فالالہ الذی بنت لہ ھذا الدیر یعغفر حطیتھا یتر حمہ علیحدہ اوعلی ولدھا ویقبل بھا وبقومھا الی امانة الحق ویکون لا لہ (وریاقوت الله ) معھا ومع ولدھا الدھر الدھر ۔

       यानी इस इबादत गाह को हिंद बिन्त उल हारिस बिन अम्र बिन हिज्र, जो मलिका और बादशाहों की माँ, और मलिक उमर बिन उल मुंदर की माँ, और मसीह की लौंडी, और उनके ग़ुलाम की माँ, और उनके ग़ुलाम की लड़की है, ने शहंशाह नूशीरवान के अहद और बिशप अफ़राइम के ज़माने में बनवाया। पस वह ख़ुदा, जिसके लिए मैंने यह इबादत गाह बनवाई, मेरे क़ुसूरों को माफ़ करे, और मुझ पर, और मेरे वालिद, और मेरी क़ौम पर रहम करे, और इसको क़बूल फ़रमाए, और ख़ुदा हमेशा मेरे और मेरे बेटे के साथ रहे।

       इस इबारत से न सिर्फ़ यह साबित होता है कि उमर बिन हिंद ईसाई था, बल्कि यह भी साबित होता है कि किंदह के तमाम बादशाह ईसाई थे।

      ये तो उन चंद ख़ानक़ाहों का ज़िक्र है, जिनको अरबों ने अपने अशआर में बयान किया है। इसी तरह इबादत गाहों की भी कसरत थी। फ़िरोज़ाबादी लिखता है कि: “وکان فی لحیرة کثیر من الکناس البھیة” यानी हीरा में शानदार गिरजों की कसरत थी।

      ज़बरक़ान बिन बद्र, जो मशहूर मसीही शायर था, और जिसके कलाम की तारीफ़ ख़ुद आँहज़रत ने की थी कि “ان من البیان لسحراً”, जब एक वफ़्द में आँहज़रत के पास आया, तो अपनी क़ौम के गिरजे बनाने पर फ़ख़्रियह यह कहा:

نحن الکرام ولاحی یعاد لنا
منا المولک وفینا تنصب البیع

      यानी हम शरीफ़ हैं; शराफ़त में कोई क़ौम हमारी बराबरी नहीं कर सकती। हमारे कसरत से मुलूक हैं, और हम में कसरत के साथ गिरजे खड़े हैं।

       मुअजम उल बुलदान (2: 703) में लिखा है कि:

کان اھل ثلاث بیوتات تیبارون فی البیع وربھا (کذا ) اھل المنذر بالحیرة وغسان بالشام وبنوالحارث بن کعب بشحران و بنوادیار اتھمہ فی المواضع الترھة الکثیرة الثعبدو الریاض والغدا وان ویجعلون فی حیطا نھا الف نفس وفی سقو فھا الذھب والصور رد کان بنوالحارث بن کعب علی ذالکہ الی ان جاء السلام ۔

       यानी तीन फ़िरक़े थे, जो गिरजे बनाने में एक दूसरे पर सबक़त ले जाना चाहते थे, अहले मुंदर हीरा में, अहले ग़स्सान शाम में, और बनी उल हारिस बिन कअब नज्रान में। ये अपने गिरजों को पुर फ़ज़ा, सरसब्ज़ ओ शादाब जगहों में बनाते थे; उनकी दीवारों को फ़साफ़िस (काशी कारियों) से आरास्ता करते थे, और उनकी छतों को सोने और तस्वीरों से मुज़य्यन करते थे। बनी उल हारिस की इस्लाम के आने तक यही कैफ़ियत थी।

       हमारा इरादा था कि हम उन सरकर्दा पादरियों के नाम भी लिख दें, जो इस पाँचवीं सदी ईस्वी में इन गिरजों और ख़ानक़ाहों की ख़िदमत पर मामूर थे; लेकिन ब ख़ौफ़ ए तवालत, साबिक़ा इशारात और आइंदा मुख़्तसरात पर इक्तिफ़ा करते हैं।

अल जज़ीरा में मसीहियत


      हमने अरबिस्तान के तीन क़ाबिल ए एतिबार और बड़े हिस्सों को ब तफ़सील बयान किया है, जिन पर तीन बड़ी अज़ीम उश शान सल्तनतें, यानी ग़स्सानी, तबाबिआ और मनाज़िरा, हुक्मरानी करती थीं। अब हम उस सरसब्ज़ व शादाब ख़ित्ते का बयान लिखेंगे, जिसको दजला और फ़ुरात और दीगर छोटी बड़ी नहरें सीराब करती हैं। इसी ख़ित्ते को, जो मौसूल की अतराफ़ से लेकर फ़ुरात के मंबा’अ तक, अरमीन और शाम के माबैन वाक़ेअ है, अल जज़ीरा कहते हैं।

      इब्ने हौक़ल इसकी तारीफ़ में लिखते हैं कि:

وکانت ارض الجزیرہ فی غایة الخصب تتخلھا النھیرات الکثیر ہ فضلا عن الانھارالکبیرہ (یعنی دجلہ وفرات) نھمہ الخابور ونھرا لبلیج والزماں الاعلیٰ والاسفل وغيرھا والذالکہ کثرت فیمھا الفعواکہ والمنترھات والخضرة النصرة الی سعة غلات من القمع والشعیر”

       यानी अल जज़ीरा निहायत सरसब्ज़ ओ शादाब ख़ित्ता है, जिसमें दजला और फ़ुरात के अलावा छोटी छोटी नहरें कसरत के साथ बहती हैं; जिनमें से नहर ए ख़ाबूर, नहर उल बलिख, ज़ाबान ए बाला और ज़ाबान ए पायाँ वग़ैरह बहुत मशहूर हैं। इसमें कसरत के साथ तरह तरह के फल पैदा होते हैं; इसमें कसरत के साथ सब्ज़ा ज़ार और बाग़ बाग़ीचे हैं; ग़ल्ले भी, मसलन गेहूँ और जौ, कसरत के साथ पैदा होते हैं। (फ़ामूस उल अम्किना व ल बिक़ाअ, मतबूआ मिस्र, सफ़्हा 83)

      गुज़श्ता ज़माने में यह ख़ित्ता अपनी ज़रख़ेज़ी, सरसब्ज़ी और पैदावार की वजह से निहायत आबाद व मआमूर था, जिसमें कसरत के साथ बड़े बड़े शहर आबाद थे। लेकिन ज़माने की दस्तबुर्द की वजह से अब नज्रान के ख़राबे और खंडरों के सिवा, या उन जदीद शहरों के, जो इन जगहों पर बने हुए हैं, कोई निशान बाक़ी नहीं रहा। मसलन: नसैबीन, दारा, दमीसर आमद, मयाफ़ारिक़ीन, सअरत, मारदीन, रक़्क़ा, रास उल ऐन, क़मर क़मीश, क़रक़ीसिया, अर रुहा, जिन पर अल जज़ीरा का इत्लाक़ होता है, और कोई निशान बाक़ी नहीं है।

      चूँकि यह ख़ित्ता, क्या ब लिहाज़ आब ओ हवा और क्या ब लिहाज़ सरसब्ज़ी व शादाबी, अहले अरब के लिए निहायत मुनासिब और मौज़ूँ था, लिहाज़ा निहायत क़दीम ज़माने से अरब के मुख़्तलिफ़ क़बाइल आकर इसमें बसने लगे। बक्र बिन वाइल ने दजला के मग़रिब, नसैबीन के पहाड़ों से लेकर दजला तक, जिसमें हिस्न, कीफ़ा, आमद, मयाफ़ारिक़ीन शामिल हैं, और इसके आगे सअरत, हिज़ान, हिनी और उनके दरमियानी इलाक़ों तक, क़ब्ज़ा किया।

      रबीआ ने मौसिल से रास उल ऐन, डीनसर, ख़ाबूर और इनके दरमियानी इलाक़ों पर क़ब्ज़ा किया। मुज़र ने फ़ुरात के मशरिक़ी मैदानों पर क़ब्ज़ा किया, जिसमें हर्रान, रक़्क़ा, शमशात, सुरोज, तल ए मौज़ून शामिल हैं। (मुअजम उल बुलदान 2:636, 638)

      अल जज़ीरा की हुदूद और क़बाइल ए अरब के बयान करने के बाद अब मसीहियत के नुफ़ूज़ और इसके इक़्तिदार का बयान लिखना मुनासिब मालूम होता है।

      अल जज़ीरा में मसीहियत के नुफ़ूज़ और इक़्तिदार की पहली दलील वो तारीख़ी आसार, गिरजे और ख़ानक़ाहें हैं, जो चौथी सदी ईस्वी से लेकर आज तक अपनी गुज़श्ता शान ओ शौकत याद दिला रही हैं। नीज़ अक़्ल हरगिज़ बावर नहीं कर सकती कि ख़ुदावंद के वो जाँ निसार रसूल और मुबल्लिग़, जिन्होंने अरबिस्तान के सूखे और दूर दराज़ बियाबानों में एक सिरे से लेकर दूसरे सिरे तक मसीहियत का बीज बोया, अपने क़रीब तरीन और जन्नत नज़ीर मक़ाम को छोड़ दिया हो। अगर आप अल जज़ीरा में जाकर मसीही सवामेअ और मग़ारों को मुलाहिज़ा करें, तो आप यक़ीन करेंगे कि मसीहियत की इब्तिदाई सदियों में यहाँ मसीही मज़हब पहुँच चुका था।

      दूसरी दलील क़दीम तवारीख़ की शहादत है, जिनका मुत्तफ़िक़ा बयान ये है कि जिस तरह जज़ीरत उल अरब के और हिस्सों में रसूलों ने मुनादी की, उसी तरह यहाँ भी की। चुनाँचे अब्द यशू सूबादी अदी रसूलों के बयान में लिखते हैं कि:

“अदी रसूल, जो ख़ुदावंद के सत्तर शागिर्दों में से थे, अर रुहा में, और फिर नसैबीन और तमाम अतराफ़ अल जज़ीरा में मुनादी की और लोगों को मसीही बनाया। बिशप एलिया दमिश्क़ी मुक़द्दस अदी और उनके शागिर्द मुक़द्दस मारी के मुतअल्लिक़ लिखते हैं कि उन्होंने ख़ास तौर पर अल जज़ीरा, मौसिल, अर्ज़ ए बाबिल, सवाद ए इराक़ और अरबिस्तान की दीगर अतराफ़ में मुनादी की और लोगों को मसीही बनाया।” (अल मकतबा ए शर्क़िया, लिस समआनी, 4:5–25)

      मारी बिन सुलैमान लिखते हैं कि:

“आही और मारी (अदी के शागिर्द) ने नसैबीन के लोगों को बपतिस्मा दिया। मारी मशरिक़ की तरफ़ गया, और आही क़र्दी और बाज़बदी की तरफ़, और ख़वाददी, हज़ा, मौसिल और बाज़रमी से मुनादी शुरू की, और अर रुहा को लौट आए। फिर लिखता है कि अदी अपने दो शागिर्दों, आही और मारी, के साथ अर रुहा, मौसिल, बाबिल और अरब के शुमाल और जुनूब में मसीहियत की दावत दी।” (ed. Gismendi, I)

      अख़बार ए फ़त्तार किताब ए कुर्सी उल मशरिक़ में उमर बिन मत्ती अत तैरहानी का क़ौल मज़कूर है कि:

“फिर मारी ने तमाम इतराफ़ ए अरमीन, बाबिल और इराक़ैन, और अहवाज़, और यमन, और जज़ाइर ए बिलाद ए अरब के ख़ैमा नशीं लोगों में, नज्रान और जज़ाइर ए यमन में, मुनादी की और मसीही बनाए।” (ed. Gismendi, I)

      अगर आप हमारे गुज़श्ता शवाहिद और दलाइल पर फिर एक बार नज़र डालें कि किस तरह ख़ुदावंद के रसूलों ने पहली सदी के इख़्तिताम पर अरब में आकर मुनादी की, और किस तरह मुक़द्दस बरतलमाउस ने अरब में मुनादी का आग़ाज़ किया, तो इसमें कुछ शक बाक़ी नहीं रहता कि अल जज़ीरा में भी इब्तिदाई सदी से मसीहियत पहुँच चुकी थी। चुनाँचे मक़रीज़ी भी इसके क़ाइल हैं कि यहूदाह, जो तदाऊस के नाम से मशहूर हैं, ने सूरिया और अल जज़ीरा में मुनादी की। (अल ख़ितत, मतबूआ बुलाक़, 483:12)

      तीसरी दलील यह है कि अगर हम उन आसार और तारीख़ी शवाहिद का तफ़ह्हुस करें, जिनका ताल्लुक़ रसूली ज़माने से लेकर दूसरी सदी और तीसरी सदी मसीही के साथ है, तो बिला शुब्हा तमाम अल जज़ीरा को हम मसीहियों से भरा हुआ पाएँगे। अर रुहा ही में पहली सदी के आख़िर और दूसरी सदी के आग़ाज़ में बाइबल मुक़द्दस का सब से पहला तरजुमा सुर्यानी में हुआ, जिसका नाम “तरजुमा ए बसीतिया” है। (तारीख़ ए आदाब ए सुर्यानिया, अज़रीत, सफ़्हा 3; Wise Man, Horoe Syria, Col. p. 3)

      अर रुहा ही में तूतियानुस, जो शहीद यूस्तीनुस फ़लसफ़ी के शागिर्द थे, दूसरी सदी के निस्फ़ ए आख़िर में अनाजील ए अरबा की तन्सीक़ की, जो “दियातासारून” के नाम से मशहूर है। (अल मशरिक़ 4: 100)

      जिस बादशाह के मुतअल्लिक़ सुर्यानी कलीसाओं में यह मशहूर है कि उसने हुज़ूर ए मसीह को ख़त लिखा कि यहूदी आपको तकलीफ़ दे रहे हैं, आप मेरे पास तशरीफ़ ले आएँ, वो अर रुहा ही का बादशाह था, जिसका नाम अबाजर था, जो मअरूफ़ अदख़ामा था।

      अर रुहा ही में सब से पहले दो जलसा ए आम मुनअक़िद हुए, जिनमें से पहला जलसा 151 ई॰ में हुआ, जिसमें उन्नीस बिशप (प्रेस्बिटर) शरीक हुए, ताकि ईद ए फ़सह की तारीख़ की तअय्युन पर ग़ौर करें। (Mansi, Collectio Conciliorum, I, 719 और 727) और दूसरा जलसा इसकी थोड़ी मुद्दत बाद मुनअक़िद हुआ, जिसमें चौदह बिशप शरीक हुए, ताकि अबीयून, वार ए तैमून और तादूवतस के ख़यालात व अक़ाइद पर ग़ौर करें।

      इन बिशपों की तादाद से इसका अंदाज़ा बख़ूबी हो सकता है कि अल जज़ीरा में किस कसरत के साथ मसीही होंगे।

      चौथी दलील यह है कि जब चौथी सदी और पाँचवीं सदी का ज़माना आ गया, तो यह वह दौर था जिसमें मसीही मज़हब ने रोमी सल्तनत को मग़लूब किया, और मसीहियत अपनी तमाम शान ओ जलालत के साथ अल जज़ीरा में परतो अफ़गन हुई। मसीही राहिबों और आरिफ़ों के क़दम ए मयमनत लुज़ूम के तुफ़ैल अल जज़ीरा एक सिरे से लेकर दूसरे सिरे तक मसीहियत की ज़ियापाशियों से मुनव्वर होता रहा।

      बुज़ुर्ग ओगीन के तुफ़ैल, जो बुज़ुर्ग अंतोनीउस ए कबीर के शागिर्द थे, अल जज़ीरा में रहबानियत और सुलूक की बुनियाद पड़ गई। क़लदान और सुर्यानी के तमाम मोअर्रिख़ीन इस पर मुत्तफ़िक़ हैं कि बुज़ुर्ग ओगीन चौथी सदी के अशर ए दहिम में मिस्र से यहाँ आ गए, और नसैबीन में हैल ए अज़ल में गोशा नशीं हो गए, और नसैबीन में तब्लीग़ का काम शुरू किया; नसैबीन के गवर्नर और उसकी औलाद को बपतिस्मा दिया; और बिलाद ए क़र्दी और बाज़बदी और नसैबीन की दीगर अतराफ़ में गश्त लगाकर बे हिसाब लोगों को बपतिस्मा दिया। और बहुत सी ख़ानक़ाहें बनवाइं, जिनमें वीर ए ज़ाफ़रान, जो आज याक़ूबिया का सदर मक़ाम है, बहुत मशहूर हुआ; और बिल आख़िर नसैबीन में इस दार ए फ़ानी से इंतिक़ाल किया।

      मोअर्रिख़ सोज़मान भी सुर्यानी मोअर्रिख़ीन की याद में अल्फाज़ ताईद करता है कि “बुज़ुर्ग अंतोनीउस के शागिर्द बुज़ुर्ग ओगीन की सई ए मशकूर की वजह से अल जज़ीरा और अजम की सरहदों में रहबानियत के मनासिक और सुलूक जारी हुए।” फिर कहता है कि बुज़ुर्ग ओगीन नसैबीन के फ़ाराना (Phadana) में मुस्किन गुज़ीं थे। फिर उनके शागिर्दों का ज़िक्र करता है, जो उनके हम सीरत थे, मसलन: ह़बल सिंजार में, बाताउस, ओसाबियुस, बर्जिस, कालिस, आबा, लाज़र (जो नसैबीन का बिशप मुक़र्रर हुआ), और अब्दुल्लाह, ज़ैनून, हीलियोदोरुस; और हर्रान में ओसाबियुस अल जैस, पर्तोज़ान जो हर्रान का बिशप हुआ। (तारीख़ ए सोज़मान, किताब शशुम, फ़स्ल 34; Migne, P.G. LXV, A.A.)

      सुर्यानी मोअर्रिख़ीन ने बुज़ुर्ग ओगीन के और शागिर्दों का भी ज़िक्र किया है, मसलन: शलीता अर राब, जिसने बाज़बदी और साबा में मुनादी की और बहुत सी ख़ानक़ाहें बनवाइं; यूहन्ना का भाई, जिसने मसीहियत की तब्लीग़ में बहुत काम किया। (तारीख़ ए मारी बिन सुलैमान, सफ़्हा 26; अल मकतबा ए शर्क़िया, समआनी, 4:865)

      इन कोशिशों से और बहुत से राहिब पैदा हुए, जिनकी जद्द ओ जहद से इस कसरत से अल जज़ीरा में ख़ानक़ाहें बन गईं कि अल जज़ीरा “राहिबों का मालिक” कहलाने लगा। आज भी अल जज़ीरा के पहाड़ों और मग़ारों में उन ख़ानक़ाहों के आसार बाक़ी हैं, जो उन ख़ुदा शनासों की जाँ गुदाज़ियाँ याद दिला रहे हैं।

      इन राहिबों में बड़े बड़े आलिम और वली उल्लाह भी शामिल थे, जिनमें बुज़ुर्ग याक़ूब नसैबीनी, बुज़ुर्ग अफ़राम, बरसीस, ओलोज़ियुस, रबूला, बुलियान साबा बहुत मशहूर हुए। इन आलिमों, ज़ाहिदों और राहिबों के रूहानी असर का ये आलम था कि अल जज़ीरा की अतराफ़ व अकनाफ़ से लोग जौक़ दर जौक़ रूहानी बरकत और फ़ैज़ हासिल करने आते थे; अपने बीमारों को साथ लाते थे कि उनकी दुआओं से उन्हें सेहत मिल जाए। चूँकि उनसे खुले तौर पर मुअजिज़ात ज़ाहिर हुए थे, इसलिए मसीहियत क़बूल करने में उन्हें कोई उज़्र न होता था, और बे धड़क मसीही होते जाते थे। सुर्यानी और यूनानी मोअर्रिख़ीन के बयानों को पढ़कर मोअर्रिख़ समआनी को मजबूरन लिखना पड़ा कि:

“वे अरबी क़बाइल, जो अल जज़ीरा और नवाही ए कलदान और ख़लीज ए अजम के आस पास बस गए थे, 1930 ई॰ से क़ब्ल अर रुहा के बिशपों और रहबानों की कोशिशों के तुफ़ैल सब के सब मसीही हो गए थे।” (अल मकतबा ए शर्क़िया, 4:898)

      अरब उल जज़ीरा के मसीही होने के मुतअल्लिक़ यूनानी मोअर्रिख़ सोज़मान लिखता है कि:

“इन ज़ाहिदों ने तमाम सुर्यानी और कसीर उल तअदाद अरबों और अजमियों को बुत परस्ती से छुड़ा कर मसीही बनाया।” (क॰ 6, फ़॰ 34)

      पाँचवीं दलील यह है कि न सिर्फ़ सुर्यानी और यूनानी मोअर्रिख़ीन अरब उल जज़ीरा के मसीही होने की तस्दीक़ करते हैं, बल्कि मोअर्रिख़ीन ए अरब भी इसकी तस्दीक़ करते हैं। चुनाँचे इब्ने क़ुतैबा अल मआरिफ़ में लिखते हैं: “وکانت النصر انیة فی ربیعة” यानी क़बीला ए रबीआ मसीही था। (सफ़्हा 305, मतबूआ मिस्र)

      सीरत ए हलबिया का मुसन्निफ़ लिखता है: “ومن قبائل العرب المتنصرہ بکرو ثعلب ولخم وبھراء و جذام” यानी बक्र व तग़लब, लख़्म, बहरा और जज़ाम मसीही क़बाइल थे, बल्कि उनमें बड़े बड़े बिशप भी थे।”

       चुनाँचे बुज़ुर्ग मारूसा की सवानिह ए उम्री में लिखा है कि उन्होंने तीन बिशप मुक़र्रर किए, ताकि वे अरबी क़बाइल की निगरानी करें। वे (बिशप) “बैत रज़ीक़”, “बनी जर्म” और “बनी सअलबा” के बिशप थे। (अल मकतबा अश शर्किया, समआनी 2:410) इसी तरह बनी मअद, तनूख़ और उक़ील के भी बिशप थे। (आसार उल मसरियाना, मजमूआ Land, Anecdota Syriaca I, 4, 7, 50)

       छठी दलील यह कि इन ख़ानक़ाहों की कसरत से, जिनको अरब के मोअर्रिख़ीन ने बयान किया है, साफ़ मालूम होता है कि अल जज़ीरा के तमाम बाशिंदे ईसाई हो गए थे। चुनाँचे मुअजम उल बुलदान में अल जज़ीरा के ज़ैल की ख़ानक़ाहों के नाम मज़कूर हैं।

       वीरा अल अबयज़ अर रुहा के अह्वैशा सअरत में, जिसमें चार सौ राहिब थे। दैर बाथाओ (जज़ीरा इब्ने उमर के क़रीब), दैर बा अरबा मौसिल व अल हदसिया के माबैन, दैर बा ग़ौत मौसिल व जज़ीरा इब्ने उमर के माबैन, दैर माता मौसिल व तक्रित के दरमियान, दैर मीख़ाइल मौसिल के ऊपर, दैर रसाफ़ा रक़्क़ा के क़रीब, वीर ज़रनूक जज़ीरा इब्ने उमर से दो फ़रसख़, वीर ज़अफ़रान (इसका ज़िक्र हो चुका है), दैर ज़की अर रुहा के दरवाज़े पर, दैर सलूबा, जो मौसिल के गाँव में है, दैर अबदून जज़ीरा इब्ने उमर के क़रीब, दैर अल अज़ारी इलाक़ा ए रक़्क़ा में, जो मौसिल व बाज़रमी के दरमियान है, दैर क़न्सीरी फ़ुरात के किनारे पर, दैर बार मिस्र में बंज से चार फ़रसख़ दूर, जिसमें तीन सौ सत्तर राहिब रहते थे, दैर अल कल्ब मौसिल व जज़ीरा इब्ने उमर के दरमियान, इसका नाम “दैर अल कल्ब” इस लिए पड़ गया कि पागल कुत्ता जब किसी को काटता था तो उसको यहाँ लाते थे, और यहाँ के राहिबों की दुआ के तुफ़ैल वह अच्छा हो जाता था।

       दैर लब्बी फ़ुरात के साहिल पर—बनी तग़लब के इलाक़े में, दैर मार सरजेस फ़ुरात के साहिल पर, दैर मती मौसिल के मशरिक़ में, दैर मार तोमा मयाफ़ारिक़ीन में, दैर मार जरजिस जज़ीरा इब्ने उमर और शहर के दरमियान, दैर माऊस फ़ुरात के साहिल पर, दैर मार यूहन्ना तक्रित की तरफ़ दजला पर, दैर मंसूर नहर ए ख़ाबूर पर, दैर यूनुस दजला की तरफ़—मौसिल के बिल मुक़ाबिल।

      इन ख़ानक़ाहों से आप अंदाज़ा कर सकते हैं कि अल जज़ीरा में मसीहियत की कैसी रौनक़ और दबदबा था।

सूरिया के शुमाल में मसीहियत


      सूरिया के शुमाल में बड़े बड़े वसीअ मैदान हैं, जो दमिश्क़ की अतराफ़ से लेकर तदमुर, ह़म्स, ह़मात, ह़लब को घेरे हुए नहर ए फ़ुरात तक फैले हुए हैं। इस्लाम से मुद्दतों पहले अरब के मुख़्तलिफ़ क़बीले इसमें आकर बसे हुए थे। बनी कल्ब फ़ुरात के मुत्तसिल मशरिक़ में उस ख़ित्ते में से थे, जिसको समावा कहते हैं। चुनाँचे हमदानी अपनी किताब फ़ी सिफ़त जज़ीरत उल अरब में लिखते हैं कि:

اما کلبہ فمکسنھا السماؤ والا یخا لطہ نھانی المساوہ احسد ۔ ومن کلب بارض الغوطہ عامر بن الحصبن وابن رباب المعقلی”

       यानी समावा में ख़ास बनी कल्ब रहते थे, जिनके बुतून में कोई और शख़्स दाख़िल नहीं हो सकता था, और ग़ूता में बनी कल्ब में से आमिर बिन अल ह़ुसैन और इब्न रबाब अल मअक़ली सकूनत पज़ीर थे। (सफ़्हा 129)

       इसमें कोई शक नहीं कि उन तमाम अतराफ़ में, जिनमें अरब के क़बाइल बस चुके थे, मसीहियत अपनी तमाम शान में परतो अफ़्गन हो गई थी। अगर हमारे पास कोई और दलील भी न होती, तो सिर्फ़ इतना ही काफ़ी था कि ये ख़ित्ते एक ऐसी जगह में वाक़ेअ है, जिसकी चारों अतराफ़ को मसीहियत ने घेरे लिया था। मसलन फ़िलस्तीन, शाम, अंताकिया, ह़लब, अर रुहा, दमिश्क़, तदमुर और इनके मशरिक़ में अर्ज़ ए इराक़ ऐसे इलाक़े और शहर थे जो सरासर मसीही इलाक़े और शहर थे। इसलिए मुम्किन नहीं कि यह ख़ित्ता मसीहियत से महरूम रहा हो। (Migne, P.G.T. 32, Col. 697)

       इन अतराफ़ में मसीहियत के फ़ुरून ए ऊला में बहुत से करासी ए उसक़ुफ़िया, बिशपी इलाक़े क़ायम हो चुके थे, न सिर्फ़ बड़े बड़े शहरों में, बल्कि छोटे छोटे गाँवों और बस्तियों में भी। चुनाँचे बुज़ुर्ग बासीलियुस के रिसाले से, जो 190 ई॰ में मुफ़्लियोख़ियुस को लिखता है, साबित है।

       दियोनीसियुस ए इसकंदरी ने भी इक़्ताअ ए माफ़ौक़ के मसीही होने की तसरीह की है, चुनाँचे वह पोप इस्तिफ़ानुस को लिखता है कि, “तमाम सूरिया और उसके अतराफ़ के बिलाद ए अरब और बिलाद ए माबैन अश शहरैन आपकी तालीमात की तस्दीक़ करते हैं।” (तारीख़ ए कलीसिया, ओसाबियुस, किताब हफ़्तुम, फ़सल पंजुम)

       मज़ीद बरआँ, मुहक़्क़िक़ीन आसार ए क़दीमा ने सूरिया के शुमाल में बहुत सी ख़ानक़ाहें, गिरजे और मसीही नक़ूश दरयाफ़्त किए, जिनसे साबित होता है कि ये इलाक़े सरासर मसीही इलाक़े थे। (अल मशरिक़ 9:953)

       इन तमाम आसार ए अतीक़ा में सब से ज़्यादा क़ाबिल ए एतिना और मुहतम बिश शान वो कुत्बा है, जिसको एक यूरोपियन मुहक़्क़िक़ ने ज़बद में दरयाफ़्त किया है। ज़बद ह़लब के पास ही वाक़ेअ है। यह कुत्बा यूनानी, सुर्यानी और अरबी, तीनों ज़बानों में लिखा हुआ है। इसकी तारीख़ 823 इसकंदरी है, जो 512 मसीही के मुताबिक़ है। यह सब से पहला कुत्बा है जो अरबी रस्म उल ख़त में हिजरी से 110 साल क़ब्ल लिखा गया है। ये ख़ालिस मसीही कुत्बा है, जो बुज़ुर्ग सरजियुस के मशहद पर बतौर ए यादगार कुंदा किया गया था।

       साविरुस, जो फ़िर्क़ा ए याक़ूबिया के बतरिक़ हैं, लिखते हैं कि जब अहले अरब मसीही होना चाहते हैं, तो बुज़ुर्ग सरजियुस के गिरजे में बपतिस्मा लेने के लिए इसरार करते हैं।

       Btudi Orientals, p. 577, 587

       सूरिया के मसीही होने के तारीखी शवाहिद में से एक शहादत यह है कि मीख़ाइल ए आज़म और इब्ने इब्री इफ़सुस के बिशप, (प्रेस्बिटर) यूहन्ना से रिवायत करते हैं कि मज्मअ ए ख़ल्क़दूनिया के बाद बहुत से मसीही, जो अरबी थे, बादिया ए तदमुर में बनक और क़रतीन और ह़वारिन में जाकर मुक़ीम हुए, और इस्लाम की फ़तह के बाद तक बाक़ी थे।


24 इस कुत्बे का अल्लामा शैख़ू ने अपनी किताब में बअत किया है।

      चुनाँचे याक़ूत अल ह़मवी भी क़रतीन के मुतअल्लिक़ लिखता है कि, “ان اھلھا کلھم نصاریٰ”, यानी क़रतीन के तमाम बाशिंदे मसीही थे।

      याक़ूत के इलावा हमदानी भी अपनी शहरा ए आफ़ाक़ किताब वस्फ़ ए जज़ीरत अल अरब में लिखता है कि उन मैदानों के, जो शाम और ह़लब और फ़ुरात के दरमियान वाक़ेअ हैं, अक्सर बाशिंदे ग़स्सान, तअलब, तनूख़ और बनी कल्ब थे, जो सब के सब मसीही फ़िर्क़े थे। याक़ूत ने अल मुक़्तज़ब के (सफ़्हा 36) में और तारीख़ इब्न ए असाकिर, तर्जुमा ए नाइला में लिखा है कि “तमाम बनी कल्ब मसीही थे। इब्ने ख़लदून ने भी अपनी तारीख़ के (2:219) में इसकी तस्दीक़ की है।

      इब्ने हिशाम लिखता है कि जब इस्लाम ज़ाहिर हुआ, तो बनी किंदा और बनी कल्ब ने अपने दीन, यानी मसीहियत से इंकार नहीं किया। इसी तरह याक़ूत ने अल मुक़्तज़ब में क़बीला ए मुदर, यानी अहले बादिया के मुतअल्लिक़ लिखा है कि, “اسلمت کلب غیر مدرھا کانو نصاریٰ”, यानी बनी कल्ब में से मुदर मुसलमान नहीं हुए, ये मसीही थे। और इनमें से जो मुसलमान हो गए थे, वे भी मसीही आदात और रस्म ओ रिवाज पर क़ायम थे। चुनाँचे इब्ने फ़क़ीह की किताब अल बुलदान (सफ़्हा 315) में यह इबारत है कि, “ انھمہ مسلمون فی اخلاق النصاری”, यानी फ़िर्क़ा हाए माफ़ौक़ अगरचे मुसलमान हो गए हैं, लेकिन मसीहियों की आदात पर हैं। इसी तरह इब्ने क़ुतैबा उयून अल अख़बार के (सफ़्हा 174) में और जाहीज़ अल बयान व अत तबयीन (2:62) में लिखते हैं कि “इनमें से जो मुसलमान हो गए थे, वे नाक़ूस बजाते थे और उन गिरजों में जाते थे, जहाँ उन्होंने बपतिस्मा लिया था।”

       इन अरबी मोअर्रिखीन की इबारात से साफ़ वाज़ेह हो जाता है कि ये भी यूनानी और सुर्यानी मोअर्रिखीन के साथ इस अम्र पर मुत्तफ़िक़ हैं कि वो अरबी क़बाइल जो सूरिया के शुमाल में सुकूनत पज़ीर थे ईसाई थे।

       यूरोप के ज़माना ए हाज़िरा के मुतशरिक़ीन भी इसके क़ायल हैं कि शुमाल ए सूरिया के तमाम बाशिंदे मसीही थे। चुनाँचे मुहक़्क़िक़ दूज़ी (Doozy) लिखता है कि, “सूरिया के अरब सब के सब मसीही थे।” अल्लामा तोलाक, गोल्डज़िहर और लेनोरमान (Lenorman) सब के सब शुमाल ए सूरिया के मसीही होने के क़ायल हैं।

हिजाज़ और नज्द में मसीहियत


      आप ने देख लिया कि हमने अरबिस्तान की तीन अतराफ़ में मसीहियत का इस्तिक़्सा किया, अब इसकी एक तरफ़ बाक़ी है, जिसको हिजाज़ व नज्द कहते हैं। हम इस फ़स्ल में इस ख़ित्ते की सियाहत (सैर) करेंगे, और इस फ़स्ल के साथ इस तारीखी मबहस को भी ख़त्म करेंगे।

       अरब का जो सब से ज़्यादा तवील उल सिलसिला पहाड़ है, उसका नाम जबल अस सराई है, जो यमन से शुरू होकर शाम में जाकर मुन्तही (इंतिहा) होता है। इस पहाड़ ने अरब को मशरिक़ और मग़रिबी दो हिस्सों में मुनक़सिम कर दिया है। मग़रिबी हिस्सा मशरिक़ी हिस्से से बहुत छोटा है, और अरज़न दामन ए कोह से सवाहिल बहर ए अह्मर तक, और तूलन हुदूद ए यमन से हुदूद ए शाम तक फैलता गया है, इसी मग़रिबी हिस्से का नाम हिजाज़ है। हिजाज़ का जुनूबी हिस्सा, चूँकि निस्बतन नशीब और पस्त है, तहामा और ग़ौर कहलाता है। मशरिक़ी हिस्सा, चूँकि बुलंद है और इराक़ तक चला गया है, नज्द कहलाता है। तहामा और नज्द के दरमियानी हिस्से को इस लिए हिजाज़ कहते हैं कि वह दोनों मुल्कों के दरमियान बतौर ए हाजिज़, यानी पर्दे के वाक़े है। हिजाज़ के मशहूर शहरों में मक्का, मदीना, ताइफ़, दूमत उल जंदल शामिल हैं।

      ये ख़ित्ते भी और ख़ित्तों की तरह असनाम परस्ती और अज्राम ए समावी की परस्तारी में मुब्तला था, जिसकी वजह से मसीही मुबल्लिग़ीन ने यहाँ भी मसीहियत की तब्लीग़ और दावत की ज़रूरत महसूस की। चुनाँचे हम गुज़श्ता वरक़ात में बहवाला तारीख़ इब्ने ख़लदून लिख आए हैं कि सरज़मीन ए हिजाज़ में सब से पहले मुक़द्दस बरतलमई, जो हुज़ूर मसीह के रसूल थे, ने मुनादी की। (इब्ने ख़लदून 2, 15) अल्लामा तबरी भी यही शहादत देता है कि, “ وکان ممن توجہ من الحوارمین ۔ابن تلما الی العربیہ وحی ارض الحجاز”, यानी हुज़ूर ए मसीह के ह़वारियीन में से बरतलमाउस ने अरब, यानी हिजाज़ में मसीहियत की तब्लीग़ की। (तबरी, मतबूआ लंदन 1:738)

      इब्ने हिशाम भी सीरत उर रसूल में यही लिखता है कि, “ وبعث من الخواربین ۔۔۔۔این تلما الی الاعربیہ وھی ارض الحجاز”, यानी ह़वारियीन में से बरतलमाई को सरज़मीन ए हिजाज़ की तरफ़ भेज दिए गये। मुक़द्दस याक़ूब की सवानिह ए उम्री में, जो यरूशलिम के (प्रेस्बिटर), बिशप थे, लिखा हुआ है कि “उन्होंने फ़िलस्तीन और उसकी अतराफ़, अम्स और क़सारिया और सामिरा और बादिया ए हिजाज़ के लोगों तक मसीहियत का पैग़ाम पहुँचाया।” (17)

      यहाँ तक तो आम तौर पर हमने हिजाज़ का ज़िक्र किया है, जिसमें किसी हिस्से की तख़सीस नहीं। लिहाज़ा मुनासिब मालूम होता है कि हिजाज़ के उन ख़ास ख़ास हिस्सों का ज़िक्र किया जाए, जहाँ मसीहियत का नुफ़ूज़ और इक़्तिदार उरूज पर था। शुमाल ए मग़रिब में, जहाँ हिजाज़ की हद ख़त्म होती है, वह ऐला है, लिहाज़ा हम ऐला से शुरू करेंगे, और बिल तरतीब मक्का और उसकी दीगर अतराफ़ की तरफ़ बढ़ते आएँगे।

       ऐला, हिजाज़ की वह आख़िरी सरहद है, जहाँ से शाम की सरहद शुरू होती है। यहाँ के बाशिंदे ईसाई थे, और कुछ कुछ यहूदी भी रहते थे। इस्लाम के आग़ाज़ में इसका हाकिम एक ईसाई था, जिसका नाम यूहन्ना बिन रूबा था। उसने आँहज़रत के साथ सालाना तीन सौ दीनार पर सुल्ह कर ली थी। किताब ए वुफ़ूदात अल अरब में इब्ने सअद लिखता है कि:

وقدم یحنہ بن روبہ علی النبی وکان ملک ایلہ ومعہ اھل جریاء اوذرج فاتو وفصا لحم وقطع علیھمہ جریة معلومتہ ۔۔۔۔اجز عبدالرحمنٰ بن جابر عن ابیہ

قال: آیت علی یخہ بن روبہ یوم اتی النبی صلیبا من ذھب وھو معقود الناصیة فلماء رائ رسول الله کفر وامابراسہ فاوما الیہ النبی ان ارفع راسلہ مصالحہ یوملن وکسا ہ رسول الله برھ یمفتہ

      यानी यूहन्ना बिन रूबा ऐला का हाकिम था। जब यह आँहज़रत के पास आया, तो इसके साथ जुरैया और अज़्रह के लोग भी थे। आँहज़रत ने इनके साथ सालाना जिज़्या पर सुल्ह कर ली। अब्द उर रहमान बिन जाबिर अपने वालिद से रिवायत करता है कि जब यूहन्ना बिन रूबा आँहज़रत के पास आया, तो उसके गले में सोने की सलीब लटकी हुई थी, और उसका चेहरा ग़ज़ब से भरा हुआ था। जब उसने आँहज़रत को देखा, तो इज़हार ए अज्ज़ किया और अपना सर झुका लिया। तब आँहज़रत ने कहा, अपना सर उठा लो, और उसके साथ सुल्ह कर ली, और उसे चादर पहनाई।

      मसऊदी किताब अत तनबीह व अल इशराक़ में लिखता है कि, “ ان یحنہ ابن روبتہ کان اسقف ایلہ دانہ قدم علی محمد ۹ للھجری وھوفی تبوک فصالحہ علی ان لکل حالمہ بھاد دینار افی السنة

       यानी यूहन्ना बिन रूबा, जो ऐला का बिशप था, 9 हिजरी में तबूक में आँहज़रत के पास आया, और आँहज़रत ने इस शर्त पर सुल्ह कर ली कि तुम में से हर एक बालिग़ शख़्स सालाना एक दीनार देगा। (मतबूआ लंदन, सफ़्हा 273)

       दूमत उल जंदल, मदीना और दमिश्क़ के दरमियान एक बहुत मशहूर क़िला था, जो दमिश्क़ से सात मंज़िल, और बक़ौल बा’ज़ सात दिन की, और मदीना से पंद्रह दिन, और बक़ौल बा’ज़ तेरह दिन की मसाफ़त पर वाक़ेअ है। चूँकि यह क़िला मज़बूत पत्थरों से बना था, इस लिए इसका नाम दूमत उल जंदल रखा गया था। इसकी चारों तरफ़ शहरी आबादी थी, और शहर के चारों तरफ़ शहर पनाह थी। ये शहर भी ज़ुहूर ए इस्लाम के वक़्त एक ईसाई शहर था। यहाँ एक बिशप, यानी प्रेस्बिटर रहा करता था, जो शहर ए दमिश्क़ के मातहत था, इसका हाकिम, जिसका नाम उकैद था, ईसाई था। आँहज़रत ने 5 हिजरी, रबीउल अव्वल में ख़ालिद बिन वलीद को इस पर चढ़ाई का हुक्म दिया। ख़ालिद ने इसे गिरफ़्तार किया।

       दूमत उल जंदल पर मुसलमानों ने कई बार चढ़ाई की है, जिनमें से एक वो है जिसका ज़िक्र तारीख़ ए ख़मीस (1102) में है कि अब्द उर रहमान बिन औफ़ ने उकैदर को, जो ईसाई हाकिम था, शिकस्त दी, लेकिन रोमियों ने फिर इस पर क़ब्ज़ा कर लिया।

      मसऊदी किताब अत तनबीह व अल इशराक़ में आँहज़रत की लड़ाई के मुतअल्लिक़ लिखता है कि:

وفیھا (ای السنة الخامسة لا محرة ) کانت غزوة رومة الجندل وھی اول غزوة النبی للررم وم کان صاحبھا ای اکید ربن عبدالملک الکندی یدین بالنصرانیة وھوفی طاعة ہرقل ملک الروم وکان یعنرض سفر المدینة وتجارھم (قال)قلبع اکیدرً اسیرہ فھرب و تفرق اھل رومة وصارا الیھا فلم یجد بھا احداً فاقام یاماً وعاد الی المدینہ ثم الیہ خالد اً السنة التاسعة للھجرة فاخذہ اسیراً وفتح الله علیہ ومتہ

      यानी 5 हिजरी में दूमत उल जंदल की लड़ाई हुई, और यह आँहज़रत की पहली लड़ाई थी जो रोमियों के साथ हुई। दूमत उल जंदल का हाकिम उकैदर बिन अब्द अल मलिक अल किंदी था, जो ईसाई था और हरक़ल के मातहत था। यह शख़्स मदीना के मुसाफ़िरों और सौदागरों के साथ मुदाख़िलत करता था। जब उकैदर को इस हमले की ख़बर पहुँची, तो वो ख़ुद भाग गया, और उसके बाशिंदे इधर उधर रूपोश हो गए। जब आँहज़रत वहाँ पहुँचे, तो शहर को सुनसान पाया, और चंद दिन क़ियाम करके वहाँ से वापस मदीना आए, और फिर 9 हिजरी में ख़ालिद को भेजा, जिसने दूमत उल जंदल को फ़तह किया और उकैदर को गिरफ़्तार किया। (648)

      इब्ने सअद किताब ए वुफ़ूदात अल अरब में यूहन्ना बिन रूबा, हाकिम ए ऐला के ज़िक्र के बाद लिखता है कि, “ قال ورائت اکیدر حین قدم بہ خالد وعلیہ صلیب من ذھب وعلیہ الدیباج ظاھل ً”, यानी “उसने कहा कि मैंने उकैदर को देखा कि जब ख़ालिद उसे आँहज़रत के पास लाया, तो उसकी गर्दन पर सोने की सलीब लटकी हुई थी, और वह दीबाज का कपड़ा पहने हुए था।” (सफ़्हा 27)

      याक़ूत मुअजम अल बुलदान में लिखता है कि, “ثم ان النبی صالح اکیدرعلی دومتہ دامنہ وقرر علیہ علی اھلہ الجزیة وکان نصرانیاً”, यानी “फिर आँहज़रत ने उकैदर के साथ सुल्ह कर ली, और उसे अमान दी, और उस पर और उसकी रिआया पर जिज़्या मुक़र्रर किया। उकैदर ईसाई था। (2:626)

       दूमत उल जंदल के बाशिंदे बनी इस्कून थे, जो बनी किंदा की एक शाख़ थे, और एक मशहूर मसीही फ़िर्क़ा थे। इसके अलावा दूमत उल जंदल में बनी कल्ब के कुछ लोग भी रहते थे, जिनकी मसीहियत पर हम पहले बहस कर चुके हैं।

       वादी अल क़ुरा, ये वादी शाम और मदीना के दरमियान वाक़ेअ है। इसे वादी अल क़ुरा इस लिए कहते हैं कि इसमें कसरत से क़ुरबे, सब्ज़ा ज़ार और शादाब जगहें हैं। सब से पहले यहूदी यहाँ आकर बसे थे। उनके बाद क़ुज़ाअह, जो ईसाइयत में ज़्यादा रासिख़ थे, आकर बसे। बनी सलीख़ भी, जिनकी नसरानियत के तमाम मोअर्रिखीन क़ायल हैं, इसी फ़िर्क़ा ए बनी क़ुज़ाअह में से हैं। यह वादी उन ख़ास मक़ामात में से एक है, जहाँ मसीही रहबान कसरत के साथ उज़्लत गुज़ीनी में ज़िंदगी बसर करते थे। शुअरा ए अरब में उनका ज़िक्र कसरत के साथ आता है। चुनाँचे जाफ़र बिन सराक़ा कहता है कि

ونحن منعنا دالقریٰ من عدونا
وعذرة اذنکقی یھوداً وبعثرا
منعتاہ من علیا معدو انتمہ
سفا سیف روایج بین قرخٍ وخیبرا
فریقان رھبان باسفل ذی القری
وبا لشاھر عرافون فیمن تنصرا

       तर्जुमा हम ही हैं जिन्होंने ज़ाल क़रमली की दुश्मनों से हिफ़ाज़त की, जबकि यहूदी और नबी बअसर से लड़ते थे। हमने उसकी हिफ़ाज़त बनी सअद के टीलों में से की। तुम तो हवा के झोंकों की तरह क़रह और ख़ैबर के दरमियान इधर उधर फिरते हो। ज़ी अल क़ुरा के अस्फ़ल में रहबान रहते हैं, और शाम में मसीही अतिब्बा रहते हैं।

       तैमा यह हिजाज़ में शाम और वादी अल क़ुरा के दरमियान वाक़ेअ है। इसी जगह समूएल, मशहूर शायर का मशहूर क़िला, ब नाम अबलक़ था। लोगों में यह मशहूर है कि समूएल यहूदी था, हालाँकि वो ईसाई था, लेकिन यहूदी माइल ईसाई (Judeo Christian) था। अल्लामा शैख़ो ने अल मशरिक़ 1909, सफ़्हा 162, जिल्द 12 में ज़बरदस्त दलीलों से साबित किया है कि वो यहूदी माइल ईसाई था। चुनाँचे उनके ज़ैल के शेअर से भी साबित होता है कि वह ईसाई था।

وفی آخر الزمان جاء مسیحنا              فاھد بنی الدنیا سلام التکامل

       तर्जुमा: आख़िरी ज़मानों में हमारे मसीह आ गए, और दुनिया के लोगों ने उन्हें कामिल सलाम पेश किया।

       अगर समूएल ईसाई न होता, तो हरगिज़ ये न कहता कि, “हमारे मसीह आख़िरी ज़मानों में आ गए”, क्योंकि यहूदी ये नहीं कह सकते कि मसीह आ गए, बल्कि उनका ख़याल ये है कि मसीह आएँगे। नीज़ क़बीला ए कल्ब के ईसाई भी तैमा में रहते थे।

       Arnold, Islam History and Relations with Christianity, p. 34

       तबूक ये वादी अल क़ुरा और शाम में अल हिज्र से चार मंज़िलों पर एक मज़बूत जगह है, जिसमें नख़लिस्तान और चश्मा भी था। मुसलमानों ने इसे 9 हिजरी में रोमियों के साथ जंग करके फ़तह किया। इस लड़ाई में ईसाइयों के फ़िर्क़े आमिला, लख़्म और जुज़ाम भी रोमियों के साथ बतौर मददगार शरीक थे। इसके रहने वाले बनी क़ुज़ाअह के ईसाई थे। चुनाँचे इब्ने ख़लदून लिखते हैं कि, “दूमत उल जंदल और तबूक के लोग सब के सब ईसाई हो गए थे।” (2:249)

       मआन: इसके रहने वाले भी ईसाई थे, और रोम के तहत इस्लाम के ज़ुहूर के वक़्त इसका हाकिम एक ईसाई था, जिसका नाम फ़रवा बिन बनी आमिर था, और बनी जुज़ाम के ईसाई फ़िर्क़े का शैख़ था। मआन के क़रीब ही मूतह में 8 हिजरी में मुसलमानों और रोमियों के दरमियान एक मशहूर लड़ाई हुई। मुसलमानों का लश्कर ज़ैद बिन हारिसा, जाफ़र बिन अबी तालिब, अब्दुल्लाह बिन रवाहा की क़ियादत में था, और रोमियों का लश्कर ताओदोरुस, अल मअरूफ़ ब नाइब, की क़ियादत में था। मोअर्रिखीन ए अरब का बयान है कि इस लड़ाई में रोमी फ़ौज में एक लाख रोमी और एक लाख अरब के मसीही थे। मुसलमानों को इस लड़ाई में शिकस्त हुई, और उनके सरदार मारे गए, लेकिन एक साल के बाद फिर मुसलमानों ने हमला किया, और रोमियों को शिकस्त देकर मआन और जिहात ए बल्क़ा पर क़ब्ज़ा किया। (तारीख़ ए याक़ूबी 2:66, और मुअजम अल बुलदान 4:88, 571)

       मदीना: इस का असली नाम अपने बानी के नाम पर यसरिब था। यसरिब में सब से पहले अमालिक़ा आकर बस गए। फिर यहूद मुख़्तलिफ़ ज़मानों में आए, मिसाल के तौर पर हज़रत मूसा और यशूअ बिन नून के ज़माने में, हज़रत दाऊद के ज़माने में, और उस वक़्त जब अशूरियों ने यरूशलम और उस की हैकल को मिसमार कर दिया। फिर हुज़ूर ए मसीह के बाद, जब रोमियों ने यरूशलम को फ़तह किया, मसीही आकर यसरिब में बसते गए। बनी क़ुरैज़ा, अल मुनज़िर, बहदल, बतहान और महज़ूर की वादी में आकर सुकूनत पज़ीर हुए, जहाँ उन्होंने मज़बूत क़िले बनाए। (किताब अल अग़ानी 19:95, और रिवायात अल अग़ानी 2:1–5, और मज़ल्ला दरासात ए यहूदिया, Revue des Études Juives VII, 167, और X, 10)

       मसीहियत से क़ब्ल यसरिब का मज़हब यहूदियत था। लेकिन जब मसीहियत हुज़ूर ए मसीह के सऊद के बाद ही यसरिब में दाख़िल हुई, तो यसरिब का मज़हब यहूदियत और मसीहियत में मुनक़सिम हो गया। मसीहियत को यसरिब में ऐसी तरक़्क़ी हासिल हुई कि मसीहियत के मुख़्तलिफ़ फ़िर्क़े निहायत कसरत के साथ यसरिब में ज़ाहिर हो गए। मिसाल के तौर पर फ़िर्क़ा ए यहूदी माइल मसीही (Judeo Christians), फ़िर्क़ा ए नासिरीयीन (Nazarenes), अबीयूनीयीन (Ebionites), कस्साईयीन (Elkesaites)। इन्हीं फ़िर्क़ों में से एक और फ़िर्क़ा था, जिस को फ़ताइरियीन (Collyridians) कहते थे। ये फ़िर्क़ा मरियम ए मुक़द्दसा की बे हद इज़्ज़त और ताज़ीम करता था। तरह तरह की क़ुर्बानियाँ अदा करता था, जिन में से फ़तीर की क़ुर्बानी बे हद मशहूर है, इसी लिए इस का नाम फ़ताइर पड़ गया। इन का ज़िक्र बुज़ुर्ग अबीफ़ानियूस ने भी अपनी किताब अल अहरातिक़ात में तफ़सील के साथ किया। इब्ने बतरीक़ इन को मरियमिया और बरबरानिया के नाम से याद करता है, और कहता है कि इन का अक़ीदा ये था कि, “ख़ुदा के अलावा मसीह और उस की माँ ख़ुदा थे।” सूरह अल माइदा में इसी फ़िर्क़े की तरफ़ इशारा है, “اتخذونی والی الھینٰ

       यसरिब में ये मसीही फ़िर्क़े अपने अपने ख़यालात की तरवीज में हम्मा तन मुनहमिक थे, कि यमन से सैल ए अरिम या किसी और वजह से चंद और मसीही फ़िर्क़े, मिसाल के तौर पर अल हारिस बिन बहश्ता, और फ़िर्क़ा ए ग़स्सान में से बनी शनतिया, और अज़्द में से बनी अल अदस, और ख़ज़राज, यसरिब में आ गए, और यहीं मुक़ीम हो गए। लेकिन निहायत तंगी और इफ़लास की हालत में इन का तमाम तर गुज़ारा ज़िराअत पर था, क्योंकि बाक़ी तमाम उमूर और सरमायादारी यहूदियों के हाथ में थी। (अग़ानी 19:95)

       जब मसीहियों ने कोई और चारा न देखा, तो छठी सदी ईसवी में इन का एक सरदार, जिस का नाम मालिक बिन अजलान था, एक वफ़्द ले कर शाम के बादशाह अबू हबीला ग़स्सानी के पास गया, ताकि वो यहूदियों के बरख़िलाफ़ इन की इमदाद करे। चुनाँचे उस ने यहूदियों के बरख़िलाफ़ इन की इमदाद की, और यहूदियों को बुरी तरह दबाया। यहाँ तक कि यसरिब के सफ़ेद व सियाह के मालिक औस और ख़ज़रज हो गए, और ज़ुहूर ए इस्लाम तक यसरिब में इन्हीं की रियासत रही।

       यसरिब वालों का मज़हब यहूदियों को छोड़ कर शिर्क और बुत परस्ती था। इन का ख़ास बुत मनात था। (मिलल व निहल, शाहरिस्तानी, सफ़्हा 434, मतबूआ लंदन) लेकिन जब मसीहियत यहाँ दाख़िल हुई, तो मसीहियत को ग़लबा हासिल हो गया, और सब मसीही हो गए। अब यसरिब में बज़ुज़ यहूदी और मसीही मज़हब के और कोई मज़हब बाक़ी न रहा।

       यसरिब में मसीहियत के ग़लबे और अक़्सरियत के लिए दलीलें काफ़ी हैं।

      (1) हम इस समरा के शुरू में लिख आए हैं कि मसीहियत के ऐन आग़ाज़ में मसीही मुबल्लिग़ीन सरज़मीन ए हिजाज़ में मसीहियत की तब्लीग़ में हम्मा तन कोशाँ थे, और इन को ख़ास कामयाबी हासिल हुई।

       (2) हम सुतूर ए माफ़ौक़ में औस और ख़ज़रज का ज़िक्र कर चुके हैं। ये दोनों फ़िर्क़े ईसाई थे। अव्वल तो इस लिए कि ये ग़स्सानी शाख़ थे, और फ़िर्क़ा ए ग़स्सान के ईसाई होने में कोई कलाम नहीं। दूसरे ये कि अगर ये दोनों फ़िर्क़े ईसाई न होते, तो अबू हबीला, शाम का बादशाह, जो ख़ुद ईसाई था, हरगिज़ इन की मदद न करता।

      (3) क़ुरआन शरीफ़ में अहल ए किताब का इतलाक़ अक्सर बाशिंदगान ए मदीना पर हुआ है, और उम्मी का इतलाक़ मुशरिकीन ए मक्का पर। चुनाँचे शाहरिस्तानी मिलल व निहल में लिखता है कि, “الفرقتان متقا بلتان قبل المبعث ھم اھل الکتاب والا میون والامی من لایعرف الکتابة فکانت الیہود والنصاری بالمدینة والا لمیون بمکة ” (सफ़्हा 62, मतबूआ लंदन) शाहरिस्तानी की इबारत से मालूम होता है कि मदीना के बाशिंदे दो फ़रीक़ों में मुनक़सिम थे। बनी क़ुरैज़ा और बनी नज़ीर यहूदी थे, और औस, ख़ज़रज और क़ुज़ाअह ईसाई थे। इमाम क़स्तलानी तो यहाँ तक कहते हैं कि अहले किताब का अक्सर इतलाक़ ईसाइयों पर ही हुआ है।

       (4) अहले मदीना के ईसाई होने की एक और ज़बरदस्त दलील ये है कि मदीना के क़रीब ही एक पहाड़ पर एक ख़ानक़ाह थी, जिस का नाम “दैर ए सलअ” था। ये ख़ानक़ाह किसी तरह यहूदियों के क़ब्ज़े में आ गई, जिस को उन्होंने क़ब्रिस्तान में तब्दील कर दिया, और उसी क़ब्रिस्तान में हज़रत उस्मान शहीद होने के बाद दफ़्न किए गए। (तबरी 1, सफ़्हा 347)

       (5) कलदानी कलीसिया की तक़वीम ए क़दीम में, जिस को ख़ूरी पतरस साहब ने 1909 में शाए किया है, मज़कूर है कि नस्तूरियों की तरफ़ से यसरिब में एक मत्रोपोलितन रहा करता था, और उस में तीन गिरजे थे, जो इब्राहीम, अय्यूब और मूसा के नाम पर नामज़द थे।

       अल मुख़्तसर, मदीना का मसीहियों का घर होने में, बज़ुज़ उस शख़्स के जिस का दिल लूत और तअस्सुब से सियाह हो चुका हो, और कोई शख़्स इन्कार नहीं कर सकता।

       मदीना में यहूदी और ईसाई तो हुज़ूर ए अकरम की वफ़ात के बाद हज़रत उमर के ज़माने तक मौजूद थे। चुनाँचे हज़रत हस्सान, हुज़ूर ए अकरम के मर्सिये में कहते हैं कि

فرحت نصاری یثرب یہودھا              لماتواری فی الضریح المحذا

      यानी जब आँहज़रत फ़ौत हो कर दफ़न हुए तो मदीना की यहूदी और ईसाई ख़ुश हुए।

      मक्का: ख़ित्त ए हिजाज़ का पाए तख़्त और तमाम क़बाइल ए अरब का मरजअ और ज़ियारतगाह था, और अब तमाम दुनिया ए इस्लाम की ज़ियारतगाह और मुक़द्दस शहर है। हम सफ़हात ए माफ़ौक़ में मोअर्रिखीन ए अरब के हवारियों की बिना पर बयान कर चुके हैं कि ऐन ए रसूली ज़माने में हुज़ूर ए मसीह के रसूलों ने यहाँ आकर मसीहियत की तब्लीग़ की थी। चुनाँचे मोअर्रिखीन ए अरब इस पर मुत्तफ़िक़ हैं कि जुरहुम ए सानी के अहद में मसीही मज़हब हिजाज़ में दाख़िल हुआ। अगरचे जुरहुम ए सानी के ज़माने में मोअर्रिखीन को इख़्तिलाफ़ है, लेकिन यूरोप के मुहक़्क़िक़ीन इस पर मुत्तफ़िक़ हैं कि जुरहुम ए सानी का ज़माना तारीख़ ए मीलाद (मसीह की पैदाइश) से कुछ ही पहले है। अजीब तर ये कि मोअर्रिखीन ए अरब, मसलन इब्ने असीर, इब्ने ख़लदून और अबू अल फ़िदा वग़ैरह, बयान करते हैं कि मुलूक ए जुरहुम के छठे बादशाह का नाम अब्द अल मसीह था। और सर सैयद मरहूम लिखते हैं कि, “नाम से बिलारेब साबित होता है कि वो ईसाई था।” (ख़ुत्बात ए अहमदिया) इस बयान से साबित होता है कि मसीही मज़हब हुज़ूर ए मसीह के सऊद के थोड़े दिनों बाद मक्का में दाख़िल हुआ।

      अबू अल फ़रज अल इस्फ़हानी किताब अल अग़ानी में लिखते हैं कि ख़ाना ए काबा में बनी जुरहुम के ज़माने में “اسغزا لنة وھی بئرفی بطنہ ویلقیٰ فیہ الحلی والمتاع الذی یھدی لہ وھو یومذ لاسقف علیہ” यानी एक ख़ज़ाना था जो कुएँ की सूरत में था। लोग उस में ज़ेवरात और दीगर अश्या बतौर ए हदिया डालते रहते थे, और उन दिनों वो एक उस्क़ुफ़ (बिशप) के हाथ में था। (13:109) उस्क़ुफ़ियत ख़ास मसीहियों का मज़हबी ओहदा है, जिस से साफ़ साबित होता है कि उस ज़माने में मक्का ए मुअज़्ज़मा सरासर मसीहियों का शहर और उन्हीं के इख़्तियार में था। और हुज़ूर ए मसीह की तस्वीर का ख़ाना ए काबा में आवेज़ाँ होना इस क़दर मशहूर है कि जिस के इआदे की ज़रूरत नहीं। (अख़बार ए अज़्रक़ी, मतबूआ लाइपज़िग, सफ़्हा 110, 112)

      याक़ूबी अपनी तारीख़ में लिखता है कि, “ اما من تنصر من احیاء العرب فقوم من قریش من بنی اسد بن عبدالغریٰ منھم عثمان الحویرث بن اسدوورقہ بن نوفل بن اسد” यानी, “अरब के उन क़बीलों में से जो मसीही हो गए, क़ुरैश का एक फ़िर्क़ा असद बिन अब्दुल उज़्ज़ा में से भी मसीही हो गया था, जिन में उस्मान बिन अल हुवैरिस और वरक़ा बिन नौफ़ल थे।” (मतबूआ लीडन 1, 298)

      शायद यही वजह है कि मसीही शुअरा की निगाह में का’बे की बहुत बड़ी इज़्ज़त थी। चुनाँचे वो जब क़सम खाते थे, तो का’बा को सलीब के साथ मिलाते थे। चुनाँचे अदी बिन ज़ैद कहता है कि:

سحی الا عداء لایالون شراً
علیکہ ورب مکة والصلیب

      आशी कहता है कि:

حلفت بثوبی راھب الدیروالتی
بنا ھا قصی والمضاض بن جرھم

      मक्का में मसीहियत के आसार इस्लाम के बाद भी बहुत दिनों तक मौजूद थे। चुनाँचे ताज अल अरूस में लिखा है कि मक्का के क़रीब ही एक जगह है, जिस का नाम मौक़िफ़ ए नसरानी है। अज़्रक़ी अख़बार ए मक्का में लिखता है कि:

مقبرة النصاری دبرالمقلع علی طریق بئر وعنبة بذی طوی۔

       यानी “सरअंबा के रास्ते पर कोह ए मक़लअ के पीछे ज़ी तुवा में मसीहियों का क़ब्रिस्तान था।”

       मुक़द्दसी अपने जुग़राफ़िया में लिखता है कि, “मक्का के क़रीब ही में एक जगह थी, जिस का नाम मस्जिद ए मरियम था।” (सफ़्हा 77)

       दीगर ये कि आँ हुज़ूर के ज़माने में हुनफ़ा का उरूज करना भी मक्का में मसीहियत की दलील है, क्योंकि उस ज़माने में हनीफ़ मसीही का नाम था। चुनाँचे हुज़ैल का एक शायर कहता है कि…

کان توالیہ بالمئلا
فصاری یسا قون لاقوا حنیفاً

       यानी “जिस तरह ईसाई अपने राहिब हनीफ़ की ज़ियारत के लिए जाते थे, उसी तरह उस के पास लोग जाते थे।

       यमन बिन ज़रीह अशा रब्बानी के शेरा अंगूर की तारीफ़ मैं कहता है कि:

وصھبا ء جرجانیة لم لطیف بھا
حنیف ولم تنغربھا ساعة قدر
ولمہ یشھد القس الیمن نارھا
طروقاولا صلی علی طبخھا حبر

      इस शेअर में भी “हनीफ़” राहिब के म’अनों में है, क्योंकि दूसरे शेअर में क़सीस (पादरी) और जिर्र (आलिम ए मज़हब) का ज़िक्र किया है। हुनफ़ा के ज़िक्र में इतनी बात याद रखनी चाहिए कि ये लोग मसीही तो थे, लेकिन ख़ालिस नहीं, बल्कि इन के अक़ाइद में कुछ आमेज़िश भी थी।

      मक्का में मसीहियों की कसरत होने के सबब से बड़ी दलील ये है कि किताब अल ख़राज में लिखा है कि, “ عزب الرسول ﷺ نصرانی بمکہ دینارًا کل سنة” यानी आँ हुज़ूर ने मक्का के ईसाइयों पर सालाना एक दीनार ख़राज लगाया। अगर ईसाई आँ हुज़ूर के ज़माने में मक्का में न होते, तो उन पर ख़राज लगाना क्या म’अने रखता है?

       उकाज़: जिस में मशहूर बाज़ार लगता था और जिस में बड़े बड़े शायर आकर अपने अशआर कहते थे, एक मसीही जगह थी। चुनाँचे तक़वीम ए नस्तूरी में, जिस को ख़ूरी पतरस साहब ने 1909 में शाए किया है, साफ़ तौर पर बताया गया है कि उकाज़ में बहुत से नस्तूरी मसीही रहते थे और उन के गिरजे थे। (सफ़्हा 8)

       ताइफ़: मक्का से एक दिन की मसाफ़त पर वाक़ेअ है। इस के मसीही होने की एक वाज़ेह दलील ये है कि उमय्या बिन अबी सल्त जैसे मसीही शायर यहीं के रहने वाले थे, जिन्होंने तक़रीबन बाइबिल मुक़द्दस के तमाम बयानों को अरबी अशआर में अरबों में राइज किया।

       नज्द: जज़ीरा ए अरब के वस्त में वाक़ेअ है। यहाँ की आब ओ हवा और फ़साहत व बलाग़त बे हद मशहूर है। नज्द में बहुत से मसीही क़बाइल सुकूनत रखते थे। मसलन तैय्य, सक़ज़न, व सकासिक, किंदा वग़ैरह। इमर उल क़ैस मशहूर मसीही शायर इसी ख़ित्ते का रहने वाला और शाहज़ादा था। यहाँ भी मसीहियों की ख़ानक़ाहें थीं, मसलन दैर ए सअद, ग़तफ़ान में, और दैर ए उमर व जिबाल ए तैय्य के क़रीब। हम मुलूक ए किंदा का एक कुत्बा कहीं नक़्ल कर चुके हैं, जिस से बिल वुज़ूह मुलूक ए किंदा का मसीही होना साबित होता है।

      मुनासिब मालूम होता है कि मैं इस हिस्से को ज़माना ए हाज़िरा के एक बहुत बड़े मिस्री मुसलमान मुहक़्क़िक़ के क़ौल के साथ ख़त्म करूँ कि “ تغلغلت النصرانیہ اذن کما تغلعلت الیھود فی بلاد العرب ، واکبر ظن ان الاسلام اولمہ بظاہر الانتھی الامر الی عتناق احدی ہاتین الدیا نیتن،” यानी, “जिस तरह यहूदियत बिलाद ए अरब में घुस आई, उसी तरह मसीहियत भी घुस गई, ग़ालिब गुमान है कि अगर इस्लाम ज़ाहिर न होता, तो तमाम अरब इन्हीं दो मज़हबों के हल्क़ा ए बग़ोश हो जाते।” (अदब अल जाहिलिय्या, अज़ डॉ. ताहा हुसैन, सफ़्हा 155, मतबूआ मिस्र)

अरबिस्तान में मसीहियत के फ़ुयूज़ हिस्सा दोम

      इस मुक़द्दमे के हिस्सा ए अव्वल में मसीहियत के इंतिशार के तारीख़ी सुबूत का बयान था कि मसीहियत ने अपने आग़ाज़ के इब्तिदाई दौर में अरबिस्तान के तूल व अर्ज़ में हमागीर नुफ़ूज़ व इक़्तिदार हासिल कर लिया। हत्ता कि अरबिस्तान में कोई फ़िर्क़ा क़बीला ऐसा न था जो मसीही या मसीहियत के ज़ेर ए असर न हो। इस हिस्से में, मैं इस पर बहस करूँगा कि मसीहियत के तुफ़ैल अरबिस्तान को क्या फ़ुयूज़ पहुँचे और मसीहियों ने अपने मुल्क और क़ौम की क्या ख़िदमत अंजाम दी। मैं इन फ़ुयूज़ को जुदागाना उनवानात के मातहत हदिया ए नाज़िरीन करता रहूँगा। जो यक़ीन है कि क़ारिईन ए किराम बे हद दिलचस्पी के साथ पढ़ेंगे। और साथ ही ये अर्ज़ करूँगा कि इस के जुमला हुक़ूक़ सिर्फ़ मेरे लिए महफ़ूज़ हैं। कोई साहिब इस अख़लाक़ी जुर्म के मुर्तकिब न हों।

फ़ैज़ ए अव्वल — फ़न ए किताबत


      बा’ज़ लोगों का, जिन को अरबिस्तान की तारीख़ पर कामिल उबूर हासिल नहीं है, ये ख़याल है कि अरबिस्तान में फ़न ए किताबत का आग़ाज़ इस्लाम के ज़ुहूर या इस से कुछ ही क़ब्ल हुआ है, जो सरासर ग़लत है। हक़ीक़त ये है कि इस जज़ीरे में एक रस्म उल ख़त कभी भी जारी नहीं था, बल्कि इस के मुख़्तलिफ़ अक़्ताअ व अज़लाअ में मुख़्तलिफ़ रस्म उल ख़त जारी थे। और ऐसे इलाक़े भी थे जिन में मुतलक़ किताबत जारी नहीं थी। यमन के इलाक़े में बनी हिमयर के दरमियान एक किताबत जारी थी जिस को मुसनद कहते थे। इस ख़त में और हबशी ख़त के बहुत से हुरूफ़ में कामिल मुशाबहत है। यूरोप के मुफ़त्तिशीन आसार ए क़दीमा को, मसलन, अरनो, हालवी और ग्लाज़र को इस ख़त के हज़ारहा कुत्बे मिले हैं, जिन में से बा’ज़ की तारीख़ मसीही सन से भी चार या पाँच सौ साल पहले की है और बा’ज़ की तारीख़ छठी सदी मसीही तक है। जब ये कुत्बे पढ़े गए और इन के असरार व रुमूज़ की तहक़ीक़ की गई, तो मालूम हुआ कि जैसे दाव़ा किया जाता है, अरबियत से इस का कुछ ताल्लुक़ नहीं है। पस अल्लामा इब्ने ख़लदून का ये कहना कि: “ومن حمیر تعلمت مضرالکتایت العربیة” (मुक़द्दिमा ए इब्ने ख़लदून 2:341, मतबूआ पेरिस) सेहत से ख़ाली है।

       जज़ीरा ए अरब के गोशा शुमाली और ग़र्बी में एक और ख़त जारी था, जिस को नबती कहते थे, इस की दो सूरतें थीं, एक के हुरूफ़ मुरब्बअ शक्ल के थे, जिस को अक्सर नक़ूद और बिनाओं में इस्तेमाल करते थे। नबती ख़त की ये सूरत आरामी ख़त से बहुत ही मिलती जुलती है। इस ख़त की दूसरी सूरत ये थी कि इस के हुरूफ़ मुस्तदीर (गोल) थे और अक्सर लकड़ी पर कंदा किए जाते थे और सुकूक़ (चेक) और दीगर मुआमलात में इस्तेमाल करते थे। हम आगे चल कर साबित करेंगे कि यही नबती ख़त अपनी दोनों सूरतों के साथ, जिस को अरबों ने अपने हमसाया ईसाई भाइयों से हासिल किया है।

       मुसलमानों ने तमाम क़ाबिल ए एतिमाद मोअर्रिख़ीन और यूरोप के माया नाज़ मुस्तशरिक़ीन व आसारियात इस पर मुत्तफ़िक़ हैं कि अरबिस्तान में फ़न ए किताबत मसीहियों के तुफ़ैल जारी हुआ, जिस को वो क़बीला ए तेय के (जो मशहूर मसीही क़बीला था) चंद अफ़राद की तरफ़ मंसूब करते हैं। चुनाँचे अल्लामा स्यूती अपनी मशहूर किताब अल मुज़हिर में लिखते हैं:

ان اول من کتب نجطنا ھذا وھوالجزم مرامر بن مرة واسلم بن سدرة وعامر بن جاررة وھمہ من عرب طی ۔۔۔۔۔۔ علموہ اھد الاتبار ومنھمہ انتشرت اکلتابة فی العراف والحیرة وغیرھا فتعلمھا بشر بن عبد الملک اوکان لا رصاحبة بحرب بن امیہ لتجارة ۔ عند ھم فتعلم حرب منہ الکتابت ، ثم سافر معہ الی مکة فتعلمہ منہ جماعة من قریش قبل اسلام

       तर्जुमा: जिन्होंने अव्वल हमारे इस ख़त के साथ, जो जज़्म कहलाता है, किताबत की, वो मरामिर बिन मर्रा, अस्लम बिन सदरा और आमिर बिन जदरा थे, और ये क़बीला तेय के लोग थे… उन्होंने ये ख़त अहले अंबार को सिखाया और यहीं से फ़न ए किताबत इराक़, हीरा वग़ैरह इलाक़ों में फैल गया। फिर बिश्र बिन अब्द अल मलिक ने इस को सीखा। चूँकि तिजारत की वजह से हर्ब बिन उमय्या के साथ उस का मेल जोल था, लिहाज़ा हर्ब ने उस से किताबत सीखी। फिर बिश्र उस के साथ मक्का आया और क़ुरैश की एक जमाअत ने इस्लाम से क़ब्ल उस से ये ख़त सीखा।” (1:390)

       इसी तरह मुसन्निफ़ अल फ़ेहरिस्त इब्ने अब्बास से रिवायत करता है कि:

اول من کتب بالعربیة ثلثة رجال من بولان وھی قبیلة سکنوالا نبار وانھمہ اجتمعوا فو ضعوا حروفاً مقطلعہ وموصولة وھمہ مرامر بن مرة (ویقال مروة) واسلمہ بن سدرة وعامر بن جدرة (ویقال جدالت) ناما مرامر فوضع الصور واما اسلمہ فضصل ووصد ل واما عامر فوضع الاعجام وسئکہ اھل الحیرہ ممن اخذ الحظ العربی فقالو ا امن اھل الانبار"


25 एक मसीही क़बीला था, मुलाहिज़ा हो हिस्सा ए अव्वल, मिन्हु।

      तर्जुमा: सब से अव्वल बोलान के तीन शख़्सों ने किताबत की। बोलान एक क़बीला था, जो अंबार में सुकूनत पज़ीर था। उन्होंने मिल कर हुरूफ़ ए मुक़त्तअह और मौसूलह वज़अ किए। ये तीन शख़्स मरामिर बिन मर्रा, अस्लम बिन सदरा और आमिर बिन जदरत थे। मरामिर ने शक्लें वज़अ कीं, और अस्लम ने बा’ज़ को मिला लिया और बा’ज़ को जुदा किया, और आमिर ने नुक़्ते लगाए। अहले हीरा से सवाल किया गया कि ये तुम ने किस से सीखा, तो कहा अहले अंबार से। (सफ़्हा 4)

      इब्ने अब्द रब्बिह अल अक़्द अल फ़रीद में लिखता है कि:

"رحکوان ثلاث نضر من طی اجتمعوا ببعقة وھمہ مرامر بن مرة واسلمہ بن سد رة وعامر بن جدرة فوضعوالخط وقا سوا ھجاء العربیة علی ہجاء ۔ الله یریانیة فتعلمہ قوم من الانبار وجاء السلام ولیس الحد کتب بالعربیة غیر بضعة عشر افساناً”

       तर्जुमा: बयान करते हैं कि क़बीला तेय के तीन शख़्स, यानी मरामिर बिन मर्रा, अस्लम बिन सदरा और आमिर बिन जदरा, बक़अह में जमा हो गए और इस ख़त को वज़अ किया और अरबी हुरूफ़ ए तहज्जी को सुरयानी हुरूफ़ ए तहज्जी पर क़ियास किया, और अहले अंबार ने इस को सीखा। जब इस्लाम आया, तो बज़ुज़ चंद लोगों के और कोई इस ख़त को नहीं जानता था। (2:205)

       बलाज़ुरी ने फ़ुतूह उल बुलदान में भी यही लिखा है। लेकिन बलाज़ुरी ने बुक़अह के एवज़ में बुक़्ता लिखा है, जो सही है। बुक़्ता अंबार के क़रीब एक शहर का नाम है। नीज़ बिश्र के मुतअल्लिक़ क़द्रे तफ़्सील के साथ लिखा है, जिस की इबारत ये है कि:

"وکان بشر بن عبدالمالک احوا کیدر بن عبداملک بن عبد الجن الکندی ثمہ السکونی صاحب دومتہ الجندل یاتی الحیرة فیقیم بھا الحین وکان نصرانیاً فتعلمہ بشرا الخط العربی من اھل الحیرة ثمہ اتی مکة فی بعضہ ستانہ فراء سفین بن امیة بن عبد شمس وابو قیس بن مناف بن زھرہ بن کلاب یکتب فسالا ان یعلھما الخط فعلمھا الھجاء ثمہ ارھما الخط فکتبا ثمہ ان بشراً واسفین وابا قیس اتوا لطائف فی تجارت وصجھم عیلان بن سلمہ القفی معلمہ الخط منھم وفار قھم بشر ومضی الی دیار مضر فتعلمہ الخط منہ عمر وبن زوارة بن عدس فسمتی عمرا لکاتب ثمہ اتی بشر الشام فتعلمہ الخط منہ اناس ھناک وتعلمہ الخط من الثلثة ، مطائین ایضاً رجل من طانجة کلب فعلمہ رجلاً من اہل وادی القری فاقی الودای یترد فاقام بھا وعلم الخط قوماً من اھلما۔"


26 ये भी मसीही क़बीला था, मुलाहिज़ा हो हिस्सा ए अव्वल। (मिन्हु)

      तर्जुमा: बिश्र बिन अब्द अल मालिक, उक़ैदर बिन अब्द अल मालिक बिन अब्द अल जिन्न किंदी, सुम्मा सकूनी, हाकिम ए दूमत उल जंदल का भाई, हीरा आया और एक मुद्दत तक वहीं रहा। ये शख़्स ईसाई था। बिश्र ने अरबी ख़त्त अहले हीरा से सीखा। फिर किसी वजह से मक्का आया। तब सुफ़यान बिन उमय्या बिन अब्द शम्स और अबू क़ैस बिन मनाफ़ बिन ज़ुहरा बिन किलाब ने उसे लिखते देखा और उस से कहा कि हमें भी सिखा दो। चुनाँचे उसने उन दोनों को हुरूफ़ ए तहज्जी सिखाए और फिर ख़त लिखना सिखाया। फिर बिश्र, सुफ़यान और अबू क़ैस तिजारत की ग़र्ज़ से ताइफ़ आ गए और ग़ैलान बिन सलमा उनकी सोहबत में रहा और उन से ये ख़त सीखा। तब बिश्र उन से जुदा होकर मिस्र (दियार ए मुदर) के इतराफ़ में गया और उमर बिन ज़ुवारा बिन अदस ने उस से ये ख़त्त सीखा और उमर अल कातिब कहलाया। फिर बिश्र शाम आया। यहाँ भी बहुत से लोगों ने उस से ये ख़त सीखा। इसी तरह क़लब के एक शख़्स ने तेय के तीनों शख़्सों से सीखा और उसने वादी अल क़ुरा के एक शख़्स को सिखाया, जिसने अपनी क़ौम को सिखा दिया। (सफ़्हा 471)

      शरह‑अल‑अक़ीला और इश्तिक़ाक़ इब्ने‑दरीद और उसी के अमाली में आया है कि:

      “बिश्र बिन अब्द‑अल‑किंदी ने सब से अव्वल ख़त‑ए‑अरबी को, जो जज़्म कहलाता है, अंबार में मरामिर और अस्लम से सीखा, जो तेयी थे। और फिर बिश्र मक्का में आ गया और हर्ब बिन उमय्या की लड़की से शादी की, जिस का नाम सहबा था। और सुफ़यान बिन हर्ब को यह ख़त सिखाया। और हज़रत मुआविया ने अपने चाचा सुफ़यान से सीखा। और इस तरह मक्का में क़ुरैश के बहुत से लोगों ने यह ख़त सीखा।”

फ़ैज़‑ए‑अव्वल

      एक किंदी शायर, बाशिंदा दूमत‑उल‑जंदल, क़ुरैश को ख़िताब करके बिश्र के इस बहुत से बड़े एहसान को याद दिलाता हुआ कहता है कि:

لا تجعد وانعماء بشر علیکمہ
فقد کان میمون التقبة ازھرا
اتا کمہ بخط الجزم حتی حفظتم
من المال ماقد کان شتی مبثرا
وا تقنتم ما کان بالمال مھملاً
وطا منتم مان کان منہ منفرا
فاجرتیم الاقلام عوداً وبداہً
وضا اھیتم کتاب کسری وقیصرا
واغیتم من مسند القوم حمیر
وماد برت فی الکتب اقبال حمیرا

       यानी “ऐ क़ुरैश की औलाद! बिश्र ने जो तुझ पर एहसान किया है, उस से इन्कार मत करो। वो तो मुबारक तबीयत वाला शख़्स तुम्हारे पास ख़त ए जज़्म ले कर आया, जिस की वजह से तुम इस क़ाबिल हो गए कि अपने परागंदा माल की हिफ़ाज़त करो।

       तुम ने अपने माल के कम और ज़्यादा को मुस्तहकम किया। तुम ने क़लम रानी सीख कर किसरा और क़ैसर के कातिबों की बराबरी की। इसी तरह तुम हिमयर के ख़त ए मुसनद और उनके शाहाना ख़त ओ किताबत से मुस्तग़नी हो गए।”

       मुसन्निफ़ अल अग़ानी लिखते हैं कि “मरक़ुस अकबर और उस के भाई हरमला को उन के भाई ने हीरा के एक ईसाई के पास भेजा, ताकि उस से ख़त ओ किताब की तालीम हासिल करें।” (5:191)

       सब से बड़ी दलील इस अम्र पर कि अरबी रस्म अल ख़त्त के मोजिद मसीही हैं, ये है कि अरबी के दो कुतबे जो इस वक़्त तक दरयाफ़्त हुए हैं, दोनों ख़ालिस मसीही कुतबे हैं। इन में से एक तो वही ख़त है, जिस का मुफ़स्सल बयान हम हिस्सा अव्वल के “सूरिया के शुमाल में मसीहियत” के उनवान के तहत कर चुके हैं। ये सब से पहला कुतबा है, जो अरबी रस्म अल ख़त में हिजरत से 11 साल पेशतर लिखा गया था, और ख़ालिस मसीही कुतबा है। और दूसरा कुतबा वो है जो हर्रान में दरयाफ़्त हुआ है, और यूनानी और अरबी रस्म उल ख़त में है। इस की तारीख़ 568 ईस्वी है, यानी हिजरत से 54 साल पेशतर की है। यह कुतबा हज़रत यूहन्ना (यह्या) की मशहद पर लिखा हुआ था, जिस की अरबी इबारत अज़ क़रार ए ज़ैल है:

      “अना शरजील बर (बिन) तलमूद (ज़ालिम) बनैत ज़ाल मरताल (मशहद) 463 ईस्वी …”


27 यानी “मैं शरजील बिन तलमू ने इस मशहद को 463 ईस्वी में बनवाया।” (मिन्हु)

       ग़रज़ कि इन्हीं असरी दरयाफ़्तों और तारीख़ी वाक़िआत ने मुस्तशरिक़ीन ए यूरोप को भी मजबूर कर दिया कि वे अरबी रस्म अल ख़त को मसीहियों की इजाद समझें। चुनाँचे सब से अव्वल जिस ने इस मबहस पर क़लम उठाया, वो मशहूर मुस्तशरिक़ दी सासी है। चुनाँचे वो लिखता है कि अरबों ने इराक़ के मसीहियों और माबैन अल नहरैन के मसीहियों से फ़न ए किताबत सीखा।” (मजल्ला एशियात, जिल्द दहुम, सफ़्हा 210–211)

       मिस्टर फ़िलिप प्रेगर, जो एक मशहूर मुस्तशरिक़ हैं, अपनी मशहूर किताब उसूल अल किताबत में लिखते हैं कि अरबी ख़त आँहज़रत से क़ब्ल मौजूद था, और यह ख़ालिस मसीही ख़त था, जिस को इस्लामी बनाया गया।

       Hiecire de Ecriture i A uiuquite 2 de et 287

       इसी तरह अल्लामा वेलहाउज़न लिखते हैं कि “अरबी रस्म अल ख़त्त अव्वलन ईसाइयों में जारी हुआ, ख़ुसूसन हीरा और अंबार के फ़िर्क़ा ए इबादियों में।”

       J Wellhauisen Renv Arab Heidentums p. 232

       इसी तरह जर्मनी के मशहूर फ़ाज़िल रोथस्टाइन और प्रोफ़ेसर गोल्डज़ीहर भी इस के क़ायल हैं कि अरबी रस्म अल ख़त्त के मोजिद मसीही थे।

       अल मुख़्तसर, अरबी ख़त के इजाद का सेहरा मसीहियों के सर पर है, और उनके इस एहसान और अज़ीम उश शान इजाद पर जिस क़दर भी फ़ख़्र किया जाए, कम है।

       इन तारीख़ी और असरी शवाहिद व इक्तिशाफ़ात के अलावा, अगर आप ज़माना ए जाहिलियत के अशआर का इस्तिक़्सा करें, तो आप यह देख कर मुतअज्जिब होंगे कि किताबत के तमाम मुतअल्लिक़ात और अदवात का ज़िक्र बेशतर, बल्कि तमाम तर उन शुअरा के अशआर में आया है, जो मसीही थे या मसीहियों के ज़ेर ए असर और मुक़ल्लिद थे, और जिन का ज़माना आँहज़रत के ज़माने से बहुत पहले का है। चुनाँचे ज़ैल में हम उन अशआर को लिखेंगे, जिन में किताबत और उस के मुतअल्लिक़ात का बयान है।


28 G. Rothstein, Die Dynastie der Lakhmiden in al Hira, p. 26

क़लम

      मुआविया अल जाफ़री कहता है:

فان لھا منازل خادیات
علی نملی وقفت بھا الرکابا
من الاجزاع اسفل من نیل
کمارجعت بالقلمہ لکتاب

      (मोअज्जम अल-बकरी सफ़्हा 586)

      कअब बिन ज़ुबैर कहता है:

اتعرف وسماً بین زھمان فالرقم
الی ذی ھراھیط کما خطہ بالقلمہ

      (अल-बकरी सफ़ा 441)

      लबीद कहता है:

وجلا السیول عن انطلال کانھا
زیر تجد متونھا اقلا مھا


29 जब मैं नमल पहुँच कर अपनी सवारी खड़ी कर देता हूँ, तो क्या देखता हूँ कि मेरी महबूबा की मंज़िलें, जो नमल और उस के इंतिहाई नुकड़ों में वाक़ेअ हैं, बिल्कुल वीरान पड़ी हुई हैं। उन के खंडर ऐसे मालूम होते हैं कि गोया किसी ने क़लम के साथ दोबारा किताब की किताबत सुधारी है।
30 और क्या तू उन अलामतों को पहचानता है, जो ज़हमान और अर रक़म से ले कर ज़ी मराहीत तक फैली हुई हैं, और जो यूँ मालूम होती हैं कि किसी ने दोबारा क़लम से लिखा है।
31 सैलाबों ने मेरी महबूबा के मकान के खंडरों को उसी तरह ज़ाहिर कर दिया है, जिस तरह क़लम किताब के मत्न को फिर दोबारा लिख कर रोशन करता है।

      (मुअल्लक़ा लबीद)

      उस ज़माने में, चूँकि क़ाग़ज़ इजाद नहीं हुआ था, इस लिए खालों और दरख़्तों की छालों, लंबी चौड़ी हड्डियों और सीसे के तख़्तों पर लिखा करते थे। इन में से बा’ज़ का ज़िक्र अशआर ए ज़ैल में मौजूद है।

      ओवीम (खाल)

      सरक़श कहता है कि:

الدار قضر والرسوم کما رقش فی ظھر الادیم قلمہ

      तर्जुमा: घर ख़ाली पड़ा हुआ है और उस के निशान ऐसे हैं, गोया किसी ने खाल पर क़लम से नक़्श किया है।

वरक़

      क़ाग़ज़ के इजाद से क़ब्ल अहले अरब उन बारीक खालों को, जिन पर लिखा करते थे, वरक़ कहते थे, क्योंकि उन में और दरख़्त के पत्तों में हमवारी के लिह़ाज़ से मुशाबहत है।

      अबी ज़ियाद कलाबी कहता है:

اشا قتکہ الدیار بھضب حرض              کحظ ۔ معلمہ ورقاً بنقس

      (याक़ूत 4:5, 9)

      तर्जुमा: क्या हरज़ के टीले पर जो घर हैं, उन्होंने तुम्हें मुश्ताक़ कर दिया है, जो ऐसे हैं गोया किसी उस्ताद ने वरक़ पर स्याही से लिखा है।

रक़ (खाल)

      ख़ालिद बिन वलीद अल मख़ज़ूमी कहता है कि:

ھل تعرف الدار افحت آیھا عجبا              کالر ق اجری علیھا احاذق قلما

      (अल अग़ानी 3:112)

      तर्जुमा: क्या तू उस घर को पहचानता है, जिस की निशानियाँ ऐसी हो गई हैं कि गोया किसी अक़्लमंद ने रक़ पर क़लम चलाया है।

मुहरक़

      सग़ानी कहता है कि:

“المھرق ثوب حریر بیض لسیقی الصمع ویصقل ثم یکتب فیہ والکلمہ قدیمة ”

       यानी: मुहरक़ एक रेशमी सफ़ेद कपड़ा है, जिस को गोंद में तर करके सैक़ल करते थे और फिर उस पर लिखते थे, और यह एक क़दीम लफ़्ज़ है।

       हारिस बिन हिल्ज़ा अपने मुअल्लक़ा में कहता है:

وذاکر احلف ذی المحازوما
قدم فیہ العھود والکفلاء
حذر الجود والتعدی وھل
نیقض مافی المھارق الاھواء

      तर्जुमा: ज़ी अल महाज़ के अहद ओ पैमान को याद करो और ज़ुल्म व जौर से डरो। क्या किताबों में लिखी हुई बातों को ख़्वाहिशें मिटा सकती हैं?

ईब (खजूर के दरख़्त की छाल)

      इम्र-उल क़ैस कहता है कि:

لمن طلل الصیرتہ فشجانی
کحظ زبور فی عیلب بمانی

      तर्जुमा: यह खंडर किस के हैं, जिन्हें देख कर मुझे तकलीफ़ होती है, और जो ऐसे मालूम होते हैं कि गोया यमनी जरीदा ए नख़्ल पर किताबत की हुई है।

अर रक़ीम (सीसे की तख़्ती)

      उमय्या बिन अबी सुल्त उस लौह के मुतअल्लिक़ कहता है, जो असहाब ए कहफ़ के ग़ार के दरवाज़े पर चस्पाँ था कि:

ولیس بھا الا الرقیم مجاوراً
وصید ھمہ والقوم فی الکہف ھجد

      तर्जुमा: वहाँ पर सीसे की तख़्ती के सिवा, जो उस के दरवाज़े पर थी, और कोई चीज़ नहीं थी, और वे लोग ख़ुद ग़ार के अंदर सोए हुए थे।

किताब

      ज़ुहैर अपने मुअल्लक़ा में कहता है कि:

یوخر فیو ضع فی کتاب فیدخر
یوم الحساب اویحعل فینقم

       तर्जुमा: ख़ुदा अगर सज़ा में ताख़ीर करता है, तो उन्हें किताब में क़ियामत के लिए लिख छोड़ता है; वरना जल्दी इसी दुनिया में सज़ा देता है।

       अदी बिन ज़ैद इंजील ए जलील के मुतअल्लिक़ कहता है कि:

ناشد تنا بکتاب الله حرتمنا
ولم تکن بکتاب الله ترقفع

      तर्जुमा: तूने ख़ुदा की किताब की वजह से हमारी बे इज़्ज़ती की है, हालाँकि ख़ुदा की किताब की वजह से हमारी बे इज़्ज़ती नहीं होती।

क़त (वो किताब जिस पर लिखा करते थे)

      उमय्या अपनी क़ौम बनी आयाद के मुतअल्लिक़ कहता है कि:

قوم لھم ساحة العراق اذا
سارو اجمیعا والقط والقلم

      तर्जुमा: ये वो क़ौम है जिन के लिए इराक़ का मैदान मख़्सूस है; जब ये लोग वहाँ से चल देते हैं, तो किताब और क़लम उनके साथ रवाना हो जाते हैं।

सहीफ़ा

      लक़ीत अल अयादी कहता है कि:

سلام فی الصحیفة من لقیط
الی من بالجزیرہ من ایاد

      (तारीख़ इब्ने असीर 1:157)

      तर्जुमा: जज़ीरा के रहने वाले आयाद को लक़ीत की तरफ़ से इस सहीफ़े के ज़रिये सलाम पहुँचे।

मुस्हफ़

      इम्र-उल क़ैस कहता है कि:

قفا نبکی من ذکری حبیب ٍ وعرفان
ورسم عفت آیاتہ منذازمان
اتت جحج بعدی علیھا فاصبحت
کحظ زبورٍ فی مصاحف رھبان

      तर्जुमा: ठहरो कि अपने दोस्त व अहबाब को याद करके रोएँ, और उन घरों को जिन को गुज़रता हुआ ज़माना मिटा रहा है। मेरे बाद बहुत सालों के गुज़र जाने की वजह से ये निशानियाँ ऐसी हो गई हैं, गोया रहबानों की किताब के ख़ुतूत हों।

मजल्ला

      मजल्ला के मुतअल्लिक़ इब्ने दरीद लिखता है कि:

المجلة الصحیفة یکتب فیھا شئی من الحکمة

      यानी: मजल्ला उस सहीफ़े को कहते हैं, जिस में हिकमत की बातें लिखी जाएँ। (अल इश्तिक़ाक़, सफ़्हा 192)

مجلتھم ذات الالہ ودینھم
قوم فما یرجون غیر العواقب

      इस का तर्जुमा हिस्सा ए अव्वल में देखो।

क़मतर (जिस में किताब रखी जाती है — लिफ़ाफ़ा)

لیس بعلمہ مایعی قمطر ماالعملہ الا مادعاہ الصدر

      (अत ताज 3: 206)

       तर्जुमा: इल्म वह नहीं जो ग़िलाफ़ों (लिफ़ाफ़ों) में हो, बल्कि इल्म वो है जो सीनों में हो।

सत्र

      शमाख़ कहता है कि:

کما خط عبرانیة بیمینہ
بتیما ء حبر ثم عرض اسطراً

      (अल लिसान 5:229)

       तर्जुमा: तैमा में उसके दाहिने हाथ में गोया इब्रानी ख़त्त खींचा गया है, जिस पर स्याही से ख़ुतूत लगाए गए हैं।

उनवान

      अबू दाऊद अल अयादी कहता है कि:

لمن طلل کمعنوان الکتاب

      (अत ताज 9:276)

       तर्जुमा: ये खंडर किस के हैं, जो किताब के सरनामे की तरह हैं।

तनमीक़ (उनवान को आरास्ता करना)

       अलक़मा बिन अब्दह कहता है कि:

       व ज़क्करैन्हा बाद मा क़द नसीतुहा दियार अलाईहा वाबिल मुतबह़िक़ बा कनात शमाफ़िन कान रसूमुहा क़दीम सिना’इन फ़ी अदीम मुमक्क़

وذکرینھا بعد ماقد نسیتھا
دیار علاھا وابل متبحق
باکنات شمافٍ کان رسومھا
قضیم صناع ٍ فی ادیم ممق

       तर्जुमा: फिर उन मकानों ने, जो शाम की अतराफ़ में थे और जिन पर कसरत से बारिश बरसी थी, उनके आसार ऐसे मालूम होते थे, जिस तरह कातिब ने सफ़ेद चमड़े पर नक़्श व निगार किया हो।

       रूबता इंजील ए जलील के मुतअल्लिक़ कहता है कि:

انجیل احبارٍ وحی منھنہ
ماخط فیہ بالمداد قلمہ

      तर्जुमा: इंजील ख़ुदा की वह्य से आरास्ता की गई है; स्याही के क़लम से उसमें ख़ुतूत नहीं खींचे गए हैं।

मिदाद (स्याही)

      अल मुतलिमिस उस ख़त के मुतअल्लिक़ कहता है, जिसे अम्र बिन हिंद ने बहरीन के गवर्नर के नाम लिख कर दिया था कि जब मुतलिमिस पहुँचे तो उसे क़त्ल कर दो:

والقیتہ بالثنی من بطن کافر
کذالکہ افنی کل قط مضلل
رضیت بھا لمارای مدادھا
یجول بھا التیار فی کل جدول

      (याक़ूत 4:228)

       तर्जुमा: जब मैंने उस स्याही को देखा, जो जदवलों में मौज मार रही थी, तो उसके तलफ़ करने पर ख़ुश हुआ, क्योंकि गुमराह कुन ख़त के साथ ऐसा ही सुलूक़ मुनासिब है।

दवात

      सलामा बिन जुंदल कहता है कि:

لمن طلل مثل الکتاب المنمق
خلا عھدہ بین الصلیب فمطرق
اکب علیہ کاتب بدواتہ
وحادثہ فی العین حدة محرق

      तर्जुमा: वो खंडर किस के हैं, जो सलीब और मुतर्रक़ के मक़ाम पर अरसे से पड़े हुए हैं, और यूँ मालूम होता है कि कातिब अपनी दवात ले कर उस पर औंधा पड़ा हुआ है, और चमक की वजह से आँखों में सुमार (चुभन पैदा हो रही) है।

फ़ैज़ ए दुवम: इलाहियात

       मक़ाम ए गुज़श्ता में हम ने ये साबित किया कि अरबी किताबत के इजाद का फ़ख़्र मसीहियों को हासिल है। इस मक़ाले में हम यह साबित करेंगे कि ख़ुदा और उस की सिफ़ात, फ़रिश्ते, जन्नत, दोज़ख़ और इस क़िस्म के दीगर उमूर का इल्म सिर्फ़ मसीहियों के तुफ़ैल से अरबों को हासिल हुआ। अगरचे यहूदियों से भी अरबों को बहुत कुछ फ़ैज़ पहुँचा, जिस से इन्कार नहीं हो सकता, लेकिन वह फ़ैज़ सिर्फ़ उन्हीं इलाक़ों तक महदूद था, जहाँ जहाँ यहूदी मुस्किन गुज़ीं हुए थे। बरख़िलाफ़ इस के, मसीहियों का फ़ैज़ान किसी ख़ास इलाक़े तक महदूद न था, बल्कि अरबिस्तान के तमाम हिस्सों पर शामिल था, क्योंकि मसीही, जैसा कि हम हिस्सा ए अव्वल में साबित कर चुके हैं, अरबिस्तान के तूल व अर्ज़ में फैले हुए थे।

      अगर आप इस मुक़द्दमे का हिस्सा ए अव्वल के इब्तिदाई हिस्से को फिर एक बार पढ़ें, तो आप देखेंगे कि मसीहियत से पहले अरबिस्तान के तमाम फ़िर्क़े और क़बीले असनाम परस्ती, कुफ़्र और शिर्क, ज़लालत और बे दीनी में इस क़दर मुब्तला थे कि उनके ख़याल में भी यह बात नहीं आ सकती थी कि कोई हक़ीक़ी ख़ुदा भी है, जो मुस्तजमिअ ए जमीअ सिफ़ात ए कमाल हो। अब सवाल यह पैदा होता है कि फिर अरब जैसे बुत परस्त और मुशरिक लोग को हक़ीक़ी ख़ुदा का और उस की सिफ़ात और उस के दीगर मुतअल्लिक़ात का इल्म कहाँ से हासिल हुआ है? हमारा जवाब यह है कि अहले किताब और बिल ख़ुसूस मसीहियों के तुफ़ैल हासिल हुआ, क्योंकि उन से क़ब्ल और कोई ख़ुदा परस्त फ़िर्क़ा तो अरबिस्तान में मौजूद न था।

       अल मुख़्तसर, आप शुअरा ए जाहिलियत के अशआर का ततब्बुअ करें और मसीहियों के अशआर को पढ़ें, तो आप को मालूम हो जाएगा कि इलाहियात के तमाम शोबे कसरत के साथ उनके कलाम में मौजूद हैं, और आँहज़रत से मुद्दतों पहले अहले अरब उन से वाक़िफ़ हो चुके थे। चुनाँचे हम ज़ैल में मसीही शुअरा का कलाम हदिया ए नाज़िरीन करते हैं।

अल्लाह


       लफ़्ज़ अल्लाह की अस्ल में बहुत कुछ इख़्तिलाफ़ है। बा’ज़ कहते हैं कि इस की अस्ल अला है; शुरू में से हम्ज़ा हज़्फ़ कर दिया गया और उस की जगह अलिफ़ लाम (अल) बढ़ा दिया गया, तो अल्लाह हुआ। बा’ज़ कहते हैं कि इस की अस्ल अ ल ह है, जिस के म’अनी तहेय्युर के हैं, क्योंकि जब इंसान ख़ुदा की ज़ात में ग़ौर ओ फ़िक्र करता है, तो हैरत में आ जाता है। बा’ज़ कहते हैं कि इस की अस्ल इला है; वाव हम्ज़ा के साथ बदल गया, लाह हुआ, जिस के म’अनी वालिह शैदा होने के हैं। चूँकि तमाम मख़लूक़ात ख़ुदा की वालिह व शैदा हैं, इस लिए इस नाम से नामज़द हुआ। बा’ज़ कहते हैं कि इस की अस्ल ला ह यलूह से है, जिस के मआनी पोशीदा के हैं। चूँकि ख़ुदा सब की नज़रों से पोशीदा है, इस लिए उस का नाम अल्लाह हुआ। और इस की जमा इलाह आती है।

       लफ़्ज़ इलाह का इस्तेमाल मा’बूद ए हक़ीक़ी (ख़ुदा) और मा’बूद ए ग़ैर हक़ीक़ी (बुत वग़ैरह) दोनों पर होता है। लेकिन मा’बूद ए हक़ीक़ी के लिए अलिफ़ लाम के साथ (अल्लाह) आता है, और ग़ैर हक़ीक़ी के लिए अलिफ़ लाम के बग़ैर आता है, यानी इलाह। (तफ़्सीर कबीर, जिल्द अव्वल, सफ़्हा 18; तफ़्सीर बैज़ावी, जिल्द अव्वल, सफ़्हा 15; मुफ़रदात ए राग़िब इस्फ़हानी)

       उलमा ए इस्लाम को लफ़्ज़ अल्लाह के माद्दा को ढूँढने में इस क़दर परेशानी न होती, अगर वे उस के माद्दा को इब्रानी ज़बान, बिल ख़ुसूस कुतुब ए मुक़द्दसा (बाइबिल) में तलाश करते, क्योंकि ये लफ़्ज़ दर हक़ीक़त अरबी लफ़्ज़ नहीं है, बल्कि इब्रानी लफ़्ज़ है, और कुतुब ए मुक़द्दसा में निहायत कसरत के साथ इस्तेमाल हुआ है। लफ़्ज़ इलाह का माद्दा इब्रानी में अलह है, जिस के मआनी अब्दा (इबादत) के हैं, लेकिन यह लफ़्ज़ बहैसियत ए माद्दा कुतुब ए मुक़द्दसा में इस्तेमाल नहीं हुआ है। अलबत्ता इलोह, जो लफ़्ज़ अल्लाह की अस्ल है, उस से मुश्तक़ हुआ है, और कुतुब ए मुक़द्दसा में कसरत के साथ इस्तेमाल हुआ है, और मा’बूद ए हक़ीक़ी और मा’बूद ए ग़ैर हक़ीक़ी दोनों पर उस का इतलाक़ होता है।

       इलोह या अल्लाह ब म’अनी मा’बूद ए हक़ीक़ी: नहमियाह 9:17; ज़बूर 50:22; दानियाल 11:22। इलोह या अल्लाह ब म’अना मा’बूद ए बातिल: दानियाल 11:37, 38; तवारीख़ 32:15; हबक़ूक़ 1:11; अय्यूब 12:6। और इस की जमा इलोह़ीम और इलाहीन दोनों तरह आती है। (पैदाइश 1:1; दानियाल 1:3, 5; 11:23)

       मसीही शुअरा के कलाम में यह लफ़्ज़ अपनी दोनों (अल्लाह और इलाह) हैयतों के साथ आता है। ज़ैद बिन अम्र कहता है कि:

الی الله اھدیٰ مدحتی وثنائیا
وقولا رضینا لاینی الدھر باقیا
الی الملک الاعلی الذی لیس فوقہ
الہ ولا رب یکون مدانیا
رضیت بک اللھم رباً ولن اری
ادین الھاً غیرک الله ثانیا

       तर्जुमा: मैं ख़ुदा के हुज़ूर मदह व सना का तोहफ़ा पेश करता हूँ, और ये कि ज़माना बाक़ी रहने वाला नहीं। मैं उस मालिक के हुज़ूर मदह व सना का तोहफ़ा पेश करता हूँ, जिस पर कोई फ़रमाँ रवा नहीं, और न कोई और रब उस से ज़्यादा क़रीब है। ऐ रब! मैं तेरी रुबूबियत पर ख़ुश हूँ, और तेरे सिवा किसी और ख़ुदा की परस्तिश करने को मुनासिब नहीं समझता। (इब्ने हिशाम, सफ़्हा 159)

       अ’अशी कहता है कि:

وذا النصب المنصوب لا تسکننہ
ولا تعبد الاوثان والله ناعبدا

       तर्जुमा: गड़े हुए बुतों की इबादत मत करो; सिर्फ़ ख़ुदा की इबादत करो।

       बनी आयाद का एक शायर कहता है कि:

نحن ایاد عبید الالہ              ذرھط مناجیہ فی السلمہ

       (किताब उल बयान लिल जाहिज़ 1:19)

       तर्जुमा: हम बनी आयाद हैं, ख़ुदा के बंदे और उस के कलीम की क़ौम हैं।

       उमय्या बिन अबी सुल्त कहता है कि:

الہ العالمین وکل ارض              ورب الراسیات من الجبال

       तर्जुमा: ख़ुदा तमाम मख़्लूक़ात, ज़मीन और पहाड़ों का रब है।

       बिन औस बिन हिज्र कहता है कि:

اطعنا ربنا وعصاہ قوم              فذ قنا اطعم طاعتنا وذقوا

      तर्जुमा: हमने ख़ुदा की इताअत की और दूसरों ने सरकशी की; हमने इताअत का मज़ा पाया और दूसरों ने सरकशी का मज़ा चखा।

अस्मा ए हुस्ना


       मुसलमानों के उलमा अस्मा ए हुस्ना से वे सिफ़ात मुराद लेते हैं, जो ख़ुदा के मख़्सूस तरीन कमालात और औसाफ़ को ज़ाहिर करती हैं। इस क़िस्म के अस्मा की तादाद, जिन को उन्होंने क़ुरआन शरीफ़ की बा’ज़ आयतों से इस्तिख़राज़ किया है, निन्यानवे (99) है।

       मैं ने अपनी तस्नीफ़ “हमारा क़ुरआन” में इस मौज़ू पर मुफ़स्सल बहस की है, और बाइबिल मुक़द्दस की आयतों को लफ़्ज़ ब लफ़्ज़ क़ुरआन शरीफ़ की आयतों के मुक़ाबिल रख कर बतलाया है कि ये तमाम सिफ़ात लफ़्ज़ ब लफ़्ज़ बाइबिल ए मुक़द्दस से मुस्तआर हैं। यहाँ ये दिखाना मक़सूद है कि अरबिस्तान में जब बुत परस्ती के मुक़ाबिल मसीहियत को फ़तह व उरूज हासिल हुआ, तो मसीहियों के तुफ़ैल से आँहज़रत से मुद्दतों पहले अरबों को ख़ुदा की सहीह सिफ़ात का इल्म हासिल हो चुका था। उन्हीं सिफ़ात को, जिन को मसीहियों ने अरबिस्तान के तूल ओ अर्ज़ में पहुँचाया था, क़ुरआन शरीफ़ ने लफ़्ज़ ब लफ़्ज़ इख़्तियार किया और अपना बनाया। ज़ैल में हम मसीही शुअरा के उन अशआर को हदिया ए नाज़िरीन करते हैं, जिन में ख़ुदा की सिफ़ात बयान हुई हैं।

       उमय्या बिन अबी सुल्त, जो बाइबिल मुक़द्दस के हक़ाइक़ ओ मआरिफ़ बयान करते हैं, एक ख़ुदादाद मलका रखते हैं, कहते हैं कि:

لک الحمد والنعماء والملکہ ربنا
فلاشی اعلیٰ منکہ مجداً وامجد
ملیک علی عرش السماء مھیمن
لعزتہ تعوالوجرہ وتسجد
علیہ حجاب النور والنور حولہ
وانھار نورٍ حولہ تتو قد
فلا بشر یسموعلیہ بطر فیہ
ودون حجاب النور خلق موید

      तर्जुमा: ऐ हमारे रब! हम्द ओ निअमतों और मुल्क का सिर्फ़ तू ही सज़ावार है। कोई चीज़ तुझ पर बुज़ुर्गी और अज़मत में फ़ौक़ियत नहीं रखती। तू आसमानी अर्श का मालिक और मुहाफ़िज़ है। तेरी इज़्ज़त के आगे तमाम चेहरे आज़िज़ और झुके हुए हैं। तू नूर के हिजाब में नूर है, जिस की चारों तरफ़ नूर ही नूर के दरिया बह रहे हैं। कोई इंसान तेरी तरफ़ नज़र उठा कर नहीं देख सकता, और पर्दा ए नूर की मावरा ताईद याफ़्ता ख़ल्क़ बस्ती है। (फ़रिश्ते)

      फिर कहता है कि:

فسجان من لایعرف الخلق قدرہ
ومن ھوفوق العرش فرد موحد
ومن لمہ تنازعہ الخلائق ملکہ
وان لمہ تفردہ العبا قمفرد
ملیک السماوات الشد ادوارضھا
ولیس لشئی عن قضاہ تاود

      तर्जुमा: वो ख़ुदा पाक है, जिस की क़ुदरत को कोई पहचान नहीं सकता। वही ख़ुदा है जो अर्श पर फ़र्द और वाहिद है। वही ख़ुदा है जो बिला शरीक तमाम मख़्लूक़ात का मालिक है। अगरचे बा’ज़ बंदे उसे फ़र्द नहीं मानते, लेकिन हक़ीक़त में वह यकता (फ़र्द) है। वही ज़मीन और आसमान का मालिक है, और कोई चीज़ उस की क़ज़ा से सरकशी नहीं कर सकती।

      वरक़ा बिन नौफ़ल कहता है कि:

سبحان ذی العرش سبحاناً یعادلہ
رب البریة فرد واحد صمد
مسخہ کل ماتحت السماء لہ
لا ینبخی ان ینادی ملکہ احد
لاشئی ممانری تبقی بشاشتہ
یبقی الالہ ویودی المال والولد

      तर्जुमा: ऐ ख़ुदा, जो साहिब ए अर्श और बे मिस्ल है, पाक है। वो मख़्लूक़ात का रब है, यकता है, वाहिद है और समद है। आसमान के नीचे की हर चीज़ उस के मातहत है, और किसी को ये जुरअत नहीं कि उस के मुल्क का दावेदार बने। ख़ुदा के सिवा न माल बाक़ी रह सकता है, न बेटा और न कोई और चीज़। (अल अग़ानी 3:14)

      ज़ैद बिन अम्र कहता है कि:

فکل معمرلا بدیوماً
وذی الدنیا بصیرالی الزوال
ویفنی بعد جدتہ ویبلی سوی الباقی المقدس ذی الجلال

      तर्जुमा: एक न एक दिन दुनिया के उम्र याफ़्ता और हर एक चीज़ पोशीदा हो जाएगी और मिट जाएगी, बजुज़ ख़ुदा ए बाक़ी, मुक़द्दस और ज़ुल जलाल के।

       फिर कहता है कि:

ان الالہ عزیز واسع حکما
بکفہ الضروالبا ساء والنعم

      तर्जुमा: ख़ुदा अज़ीज़ है, वासिअ है, हिक्मत वाला है; वही मुनइम है और वही मुज़िल्ल है। (इत्क़ान, सफ़्हा 154)

      उमय्या बिन सुल्त कहता है कि:

ھو الله باری الخلق والخلق کلھم
اماء لہ طوعاً جمعیاً واعبد
وانی یکون الخلق کا لخالق الذی
یدوم ویبقی والخیقة تنفد

      तर्जुमा: वही ख़ुदा है जिसने तमाम मख़्लूक़ात को ख़ल्क़ किया, और सब के सब उसके फ़रमाँबरदार हैं। मैं उसी की परस्तिश करता हूँ। मख़्लूक़ात को ख़ालिक़ से क्या निस्बत है, वे सब फ़ना होंगी और ख़ुदा हमेशा बाक़ी रहेगा।

      फिर कहता है कि:

ونفنی ولا یبقی سوی الواحد الذی
یمیت ویحیی دائباً لیس یھمد

      तर्जुमा: हम सब फ़ना होने वाले हैं, बजुज़ ख़ुदा के, जो मुही और मुमीत है और हमेशा रहने वाला है; कोई और चीज़ बाक़ी नहीं रहेगी।

      क़ुस बिन साअिद कहता है कि:

الحمد الله الذی لمہ یخلق الخلق عبث

      तर्जुमा: उस ख़ुदा की तारीफ़ हो, जिसने मख़्लूक़ात को बे फ़ायदा ख़ल्क़ नहीं किया।

      अदी बिन ज़ैद कहता है कि:

لیس شئی علی المنون بباق
غیر وجہ المسج الخلاق

      तर्जुमा: ख़ुदा की ज़ात के सिवा, जो मसीह और ख़ल्लाक़ है, और कोई चीज़ बाक़ी नहीं रह सकती।

      उमय्या बिन अबी सुल्त कहता है कि:

اذا قیل من رب ھذی المساء
فلیس سواہ لہ یضطرب
ولو قیل رب ہوی ربنا
لقال العباد جمیعاً کذب

      तर्जुमा: जब कहा जाए कि इस आसमान का रब कौन है, तो बजुज़ ख़ुदा के और किसी तरफ़ नज़र नहीं उठती। और अगर कोई ये कहे कि हमारे रब के सिवा कोई और रब है, तो सब लोग कहेंगे कि यह झूठ है।

      फिर कहता है कि:

مجدد والله وھو للجداہل
ربنا فی السماء امسی کبیرا
ذالک المنشی الحجارة المو
تی واحیا ھمہ وکان قدیرا

      तर्जुमा: ख़ुदा की तम्जीद करो, क्योंकि वह इस का अहल है। हमारा ख़ुदा वही है जो आसमान पर बुज़ुर्ग (कबीर) है। ख़ुदा ही पत्थरों और मौत का ख़ालिक़ है, और वही उन्हें ज़िंदगी बख़्शता है, क्योंकि वह क़दीर है।

      फिर कहता है कि:

ان الا نام رعایا الله کلھم
ان السلیطط فوق الارض مقتدر

      तर्जुमा: तमाम मख़्लूक़ात ख़ुदा की रइयत हैं। वो ज़मीन पर मुसल्लत है और मुक़्तदिर है।

      फिर कहता है कि:

ثم یجلو النھار رب کریم
بمھاةٍ شعا عھا منشور

      तर्जुमा: ख़ुदा-ए-करीम ने दिन को आफ़ताब की रौशनी से रौशन कर दिया।

       ज़ुहैर बिन अबी सुल्मा अपने मुअल्लक़ा में कहता है कि:

فلا تکمتن الله ممافی صدورکم
یخفی ومھما یکتم الله یعلمہ
یوخر فیوضع فی کتاب فیدخر
لیوم الحساب والیعجل فینقمہ

      तर्जुमा: जो तुम्हारे दिलों में है, उसे ख़ुदा से मत छुपाओ, क्योंकि जो कुछ तुम छुपाओगे, ख़ुदा उन सब को जानता है। अगर अज़ाब देने में ताख़ीर करे, तो उसे किताब में जमा करेगा क़ियामत के लिए, और अगर जल्दी करे, तो यहीं तुम्हें सज़ा देगा।

      उमय्या बिन अबी सुल्त कहता है कि:

لک الحمد والمن رب العبا
دانت الملیکہ دانت الحکمہ

      तर्जुमा: ऐ रब्ब उल इबाद! तारीफ़ और एहसान तेरे ही लिए मख़्सूस है। तू मलीक है और हाकिम है।

       फिर कहता है कि:

واشھد ان الله شئی بعدہ
علیاً وامسی ذکرہ متعالیا

      तर्जुमा: मैं गवाही देता हूँ कि ख़ुदा के सिवा कोई और बुलंद (अली) नहीं, और उसी का ज़िक्र बुलंद (मुतआली) है।

       अ’अशा कहता है कि:

فلئن ربک من رحمتہ
کشف الفیقة عنا وفسح

      तर्जुमा: अगर तेरा ख़ुदा अपनी रहमत से हमारी तंगी दूर कर दे और वुसअत दे।

       मुशक़ब अल अबदी कहता है कि:

لحی الرحمان اقواماً اضا عو
علی الوعواع افراسی وعیسی

      तर्जुमा: ख़ुदा, जो रहमान है, उन अक़्वाम को हलाक करे जिन्होंने मेरे घोड़ों और ऊँटों को ज़ाया कर दिया है।

       सलामा बिन जुंदल कहता है कि:

عجلتمہ علینا حجتین علیکمہ
وما یشا الرحمان یعقد ویطلق
ھو الجابر العظم الکسیر ماشا
من الامر یجمع بینہ ویفرق

      तर्जुमा: तुम ने नाहक़ हम पर जल्दी की। रहमान ख़ुदा जिस अम्र को चाहता है बाँध देता है और खोल देता है। वही टूटी हुई हड्डियों को जोड़ देता है, और जिस अम्र को जमा करना चाहता है जमा करता है, और जिसे जुदा करना चाहता है जुदा करता है।

       ज़ैद बिन अम्र कहता है कि:

ارباً واحداً ام الف ربٍ
ادین اذا تقسمت الامور
ولکن اعبدالرحمان ربی
لیغفرذنبی الرب الغفور

      तर्जुमा: क्या मैं एक ख़ुदा की परस्तिश करूँ या हज़ारों की, जबकि उमूर बँट चुके हैं? मैं तो अपने रब रहमान की परस्तिश करूँगा, ताकि वह मेरे गुनाह बख़्श दे, क्योंकि वो ग़फ़ूर है।

       वरक़ा बिन नौफ़ल कहता है कि:

ادین لرب یستجیب ولا اری
ادین لمن لا یسمع الدھر داعیا
اقول اذا صلیت فی کل بیعة
تبارکت قد اکثرت باسمک داعیا

      तर्जुमा: मैं उस ख़ुदा की परस्तिश करूँगा जो दुआओं का जवाब देता है। मैं हरगिज़ उस की परस्तिश नहीं करूँगा जो कभी सुन ही नहीं सकता है।

       जब मैं गिरजों में इबादत करता हूँ, तो कहता हूँ कि ऐ इलाही! तू मुबारक है; तेरे नाम पर कसरत के साथ लोग दुआ माँगते हैं।

       ख़ुदा के ये अस्मा न सिर्फ़ शुअरा ए नसारा के कलाम में पाए जाते हैं, बल्कि मसीहियों के यादगारी कुत्बों में भी मिलते हैं। चुनाँचे हम ने इस मुक़द्दमे के हिस्सा ए अव्वल में अब्रहा के एक कुत्बे की इबारत नक़्ल की है, जिस में लफ़्ज़ रहमान रहीम मुक़र्रर आया है, जिस की मुतअल्लिक़ इबारत यह है कि: “रहमान उर रहीम और उस के मसीह और रूह उल क़ुदुस की मेहरबानी से।” फिर उसी कुत्बे में है कि रहमान की इनायत है।

       इन्हीं वुजूहात से मजबूर होकर मौलवी सुलैमान साहब नदवी को भी इक़रार करना पड़ा कि “रहमान का नाम यहूद ओ नसारा के साथ मख़्सूस था।” चुनाँचे आप मसीहियत के उरूज के मुतअल्लिक़ लिखते हैं कि:

“सितारा परस्ती ने तो शिकस्त खाई; गो सितारों के हैकल अब भी वीरान न थे, ताहम अब ‘शम्स’, ‘मुक़ह’ और ‘इश्तार’ के पहलू ब पहलू रहमान का नाम भी आने लगा, जो क़ब्ल ए इस्लाम यहूद ओ नसारा के साथ मख़्सूस था।” (अर्ज़ उल क़ुरआन, हिस्सा ए अव्वल, सफ़्हा 299)

       अल मुख़्तसर, अस्मा ए हुस्ना के मुतअल्लिक़ जितने मसीहाना अशआर हम ने सुतूर ए बाला में नक़्ल किए हैं, उन में ख़ुदा के बहुत से नाम मज़कूर हैं; मिसाल के तौर पर: अल्लाह, अर रब्ब, अल वाहिद, अल अहद, अल फ़र्द, अस समद, अल अव्वल, अल आख़िर, अल बाक़ी, अल अज़ीज़, अल अज़ीम, अल कबीर, अल अली, अल मुतआली, अल माजिद, अल मजीद, अल क़ादिर, अल क़वी, अल क़ह्हार, अल मुक़्तदिर, अल मलिक, मालिक, मुल्क, रब्ब उल अर्श, ज़ील जलाल, अल क़ुद्दूस, अस सुब्हान, अल हक़्क़, अल अलीम, अल हकीम, अल ग़नी, अल ख़ालिक़, अन नूर, अल आदिल, अल मुही, अल मुहीत, अल मुअज़्ज़, अल मुज़िल्ल, अल मुहीन, अल मह्मूद, अल वासिअ, अल मुनइम, अस सुल्तान, अल करीम, अर रहमान, अर रहीम, अल जाबिर, अस समीह, अर रज़्ज़ाक़ वग़ैरह ज़ालिक।

       अब सवाल ये है कि मसीहियों को इन सिफ़ात ए इलाहिया का इल्म कहाँ से हुआ? सहुफ़ ए मुतह्हरा, यानी बाइबिल ए मुक़द्दस से, जिस पर हम ने “हमारा क़ुरआन” में मुफ़स्सल बहस की है और ख़ुदा के उन निन्यानवे अस्मा को, जो क़ुरआन शरीफ़ में मज़कूर हैं, बाइबिल ए मुक़द्दस से माख़ूज़ साबित किया है।

मलाइका — फ़रिश्ते


       जिस तरह ख़ुदा और उस की सिफ़ात का इल्म सहुफ़ ए मुतह्हरा (बाइबिल) की वसातत से अरबों को हासिल हुआ, उसी तरह फ़रिश्तों का इल्म भी आँहज़रत की बअसत से मुद्दतों पेश्तर अहले किताब, बिल ख़ुसूस मसीहियत के वसीले से अरबों को हासिल हुआ। चुनाँचे अशआर ए ज़ैल से हमारे दावे की तस्दीक़ होती है।

       उमय्या बिन अबी सुल्त कहता है कि:

ملائکہ اقدام مھم تحت عرشہ
بکفیہ لولا الله کلووا بلدوا
قیام علی الاقدام عانین تحتہ
فرائصھم من شدہ الخوف ترعد
وسبط صفوف ینظرون قضاء
یصینحون بالا سماع للوی رکد

       तर्जुमा: ख़ुदा के अर्श के चारों तरफ़ फ़रिश्ते खड़े हैं। अगर ख़ुदा न होता, तो वे थक कर रह जाते। और आँखे नीचे किये हुए खड़े हैं और ख़ुदा के ख़ौफ़ की वजह से काँप रहे हैं। ये वे हैं जो सफ़ दर सफ़ खड़े हैं, ख़ुदा के अहकाम के मुंतज़िर हैं और उस की वह्य पर कान लगाए हुए हैं।

       फिर यही शायर फ़रिश्तों के मुख़्तलिफ़ तबक़ात, उनके मुतअल्लिक़ अहकाम, उनके दर्जों और उन में से बा’ज़ के नामों का बयान करता है कि:

امین لوحی القدس جبریل فیھم
ومیکال ذوالروح القوی المسلد
وحرا س ابواب السماوات دونھم
قیام علیھا بالمقالید رصد
فنعمہ العباد المصطفون لا مرہ
ومن دونھم جند کثیف مجند
ملائکة لا یفترون عبادةً
کروبیة منھم رکوع وسجد
فساجد ھمہ لایرفع الدھر راسہ
یعظم رباً فوقہ ویحجد
وارکھمہ یحنولہ الدھر خاشعاً
یدردوالاء لہ ویحمد
ومنھم ملف فی الجنا حین راسہ
بکار لذکری ربہ تیفصد
من الخوف لا ذوما مة بعبادة
ولاھو من طول التعبد یجھد
ودون کثیف الماء فی غامض الھوا
ملائکة تخط قیہ وتعصد
وبین طباق الارض تحت بطونھا
ملائکة بالا مرنیھا تردد

      तर्जुमा: उन फ़रिश्तों में जिब्रील है, जो ख़ुदा की वह्य का अमानतदार है, और मीकाईल है, जो साहिब ए क़ुव्वत है। इनके अलावा आसमान के दरवाज़ों के दरबान हैं, जो कुंजियाँ लिए खड़े हैं। ये ख़ुदा के कितने अच्छे बंदे हैं, उसके हुक्म के बजा लाने पर मुक़र्रर हैं। और इनके अलावा फ़रिश्तों की और बे शुमार फ़ौजें हैं। ये वे फ़रिश्ते हैं जो ख़ुदा की इबादत से कभी नहीं थकते। और करूबीन हमेशा रुकूअ और सुजूद में पड़े रहते हैं। उनमें से जो सुजूद में हैं, वे कभी अपने सर नहीं उठाते, और हमेशा ख़ुदा की उम्दा तमजीद में मशग़ूल रहते हैं। और जो रुकूअ में हैं, वे हमेशा ख़ुदा के हुज़ूर ख़ुशूअ और ख़ुज़ूअ में रहते हैं, घुटने टेके हुए, और ख़ुदा की नेमतों की शुकर गुज़ारी करते रहते हैं। और फ़रिश्ते ऐसे भी हैं जो अपने सरों को अपने परों में छुपाए हुए हैं, और क़रीब है कि ख़ुदा के ज़िक्र में पिघल जाएँ। ये ख़ौफ़ ए इलाही की वजह से है, न कि इबादत से थक जाने की वजह से, और न ज़्यादा इबादत की वजह से वे इन्कार करते हैं। आसमान के दरमियान भी बहुत से फ़रिश्ते ऐसे हैं जो नीचे और ऊपर आते जाते रहते हैं। इसी तरह ज़मीन और उसके इंतिहाई तबक़ों में भी ऐसे फ़रिश्ते हैं जो ख़ुदा के अहकाम के मुताबिक़ गर्दिश करते रहते हैं।

       अब्दुल क़ैस का एक शायर नुअमान की तारीफ़ में कहता है कि:

تعالیت ان تعزی الی الانس خلة
ولانس من یعزول فھو کذوب
فلست لاء نسیٍ ولکن لملاک
تنزل من جو اسماء یصوب

      तर्जुमा: तू इससे बहुत बुलंद है कि तेरी आदतों को इंसानों से निस्बत दी जाए। और जो शख़्स इंसानों की तरफ़ निस्बत देता है, वह झूठा है। तू इंसान नहीं, बल्कि फ़रिश्ता है, जो आसमान से उतर आया है। (शरह क़सीदा “बानत सुआद” अज़ हिशाम)

       वरक़ा बिन नौफ़ल कहता है कि:

وجبریل یایتہ ومیکال معھما
من الله وحی بشرح صدر منزل

      तर्जुमा: जिब्रील और मीकाईल ख़ुदा की वह्य लेकर शरह ए सद्र के लिए उतरते हैं।

       एक और शायर कहता है कि:

حبس السرافیل الصوافی تحتہ
لاواھن منھم والا مستوغد

      तर्जुमा: इसराफ़ील (साराफ़ीम) उसके तख़्त के नीचे खड़े हैं, जिनमें से कोई इबादत में सुस्ती या काहिली (सुस्ती) नहीं करता। (किताब अल बद्अ लिल मक़दसी, सफ़्हा 1:168; व अजाइब उल मख़्लूक़ात लि तफ़रदीनी)

       अगर आप अशआर ए बाला को क़ुरआन शरीफ़ की आयात से मुक़ाबला करें, तो अजीब लफ़्ज़ी और मआनवी मुताबक़त पाएँगे।

आसमान


      जिस तरह अरबों ने ख़ुदा की ज़ात और उसकी सिफ़ात का इल्म मसीहियों से हासिल किया, उसी तरह आसमान, जन्नत, दोज़ख़ और शयातीन का इल्म भी उन्हीं से हासिल किया। चुनाँचे अशआर ए ज़ैल से ज़ाहिर है।

       उमय्या बिन अबी सुल्त कहता है कि:

فاتمہ ستاً فاستوت اطباتھا
واتی بسا بعةٍ فانی تورد

      तर्जुमा: ख़ुदा ने आसमान के छह तबक़ों को मुकम्मल करके सातवाँ बनाया।

       फिर यही शायर कहता है कि:

وکان بررقع اوالمالک حرھا              سلا تواکلة قسوائم اجرد

      तर्जुमा: गोया आसमान सिद्रह का दरख़्त है, जिसकी चारों तरफ़ फ़रिश्ते उसी तरह खड़े हैं, जिस तरह कम मूँह घोड़े बेरी के दरख़्त के चारों तरफ़ खड़े रहते हैं।

       फिर कहता है कि:

لمہ یخلق السماء والنجوم
والمشس معھا قمر یقوم
قدرہ المھیمن القیوم
والحش والجنة والنعیم
الا لا مرشانہ عظیمہ

      तर्जुमा: मुहैमिन और क़य्यूम ख़ुदा ने आसमान, तारों, शम्स और क़मर, जन्नत और उसकी नेमतों को एक अज़ीम उश शान मक़सद के लिए बनाया है।

       फिर कहता है कि:

ملک علی عرش السما محیمن
تعنو لعزتہ الوجوہ وتسجد

      तर्जुमा: ख़ुदा आसमान के अर्श का मालिक है, जिसके आगे तमाम चेहरे सज्दे में हैं।

       वरक़ा बिन नौफ़ल कहता है कि:

سبحان ذی العرش سبحاناً یعادلہ
رب البریة فرمہ واحد صمد

      तर्जुमा: ख़ुदा सुब्हान है, साहिब ए अर्श और बे अदील है। वह मख़्लूक़ात का मालिक, वाहिद और समद है। (अल अग़ानी 3:14)

       फिर उमय्या बिन अबी सुल्त कहता है कि:

مجدد والله فھو للجد اہل        ربنا فی السماء امسی کبیر
با لبنا ء الا علی الذی سبق الخلق وسوی فوق السماء سریرا شرجعاً ماینا لہ بصرا لعین تری دونہ الملائک صورا۔

      तर्जुमा: ख़ुदा, जो आसमान पर सबसे बड़ा है, उसी की तमजीद करो, क्योंकि वही इसका अहल है। वही ख़ुदा है जिसने बुलंद आसमान बनाया और आसमान के ऊपर तख़्त बिछाया। ये वो तख़्त है जिसे आँख नहीं देख सकती, और जिसके चारों तरफ़ फ़रिश्ते हैं। (किताब अल बद्अ व अत तारीख़ लिल मक़दसी 1:165)

जन्नत


      उमय्या बिन अबी सुल्त कहता है कि:

ربی لا تخر مننی جنة الخلد
رکن ربی بی رود فا حفیا

      तर्जुमा: ऐ ख़ुदा! तू मुझे जन्नत उल ख़ुल्द से महरूम न कर और मुझ पर बेहद मेहरबान हो।

       हकीम बिन क़बीसा अपने बेटे बिश्र को ख़िताब करता है कि:

فما جنتہ الفردوس ہاجرت تتبغی
ولکن دعاک الخبروالتمر احسب

      तर्जुमा: तू जन्नत अल फ़िरदौस की ख़्वाहिश की वजह से जुदा नहीं हुआ, बल्कि रोटी और खजूर की ख़्वाहिश ने तुझे जुदाई पर आमादा किया।

       नाबिग़ा कहता है कि:

فسلام الا لہ یغد وعلیھم
وفیو الفردوس ذات الظلال

      तर्जुमा: जन्नतियों पर ख़ुदा की तरफ़ से सलामती होगी, और वे जन्नत उल फ़िरदौस के सायों में रहेंगे। (अल मुख़स्सस 9:6)

       उमय्या बिन अबी सुल्त कहता है कि:

وحل المتقون بدارصدقٍ
وعیش ناعم تحت الظلال
لھم مایشتھون وما تمنو
من الافراح فیھا وار لکمال

      तर्जुमा: मुत्तक़ी दार ए सिद्क़ (जन्नत) में ऐश ओ इशरत के साथ उसके सायों में उतरेंगे। जो कुछ वे वहाँ चाहेंगे, ख़ुशी के एतिबार से उन्हें पूरे तौर पर मिलेगा।

दोज़ख़ — शयातीन


      कअब बिन मालिक कहता है कि:

تلظی علیھم حین ان شد حمیھا
بزبرا الحدید والمحارة ساجر

      तर्जुमा: दोज़ख़ की हरारत उन लोहे के टुकड़ों और पत्थरों से, जो उसमें भर दिए गए हैं, शिद्दत के साथ उन पर भड़केगी। (इत्क़ान 1:158)

       उमय्या बिन अबी सुल्त कहता है कि:

فار کسوا فی حمیم النار انھمہ
کانو اعتاتاً یقولون الکذب والزورا۔

      तर्जुमा: उन्हें दोज़ख़ की आग में सर निगूं (औंधा) डाल दिये जाएंगे, क्योंकि वे सरकश और झूठे हैं।

       फिर वही कहता है कि:

وسیق المجرمون وھم عراة
الی ذات لقامع والنکال
فنا دوا ویلنا ویلاً طویلاً
وتجوافی سلا سلھا الطوال
فلیسوا امیتین فیستر یحوا
وکلھم بجرا لنار صال

      तर्जुमा: गुनहगारों को नंगे बदन ज़िल्लत और अज़ाब की जगह की तरफ़ हंकाले जाएंगे। तब वो वहाँ ज़ंजीरों से बँधे हुए “अफ़सोस! अफ़सोस!” करते हुए चिल्लाएँगे। वो मरते नहीं कि अज़ाब से राहत पाएँ, बल्कि सब के सब आग के दरिया में बहते रहेंगे।

       फिर कहता है कि:

فھم یطفون کالا قذاء فیھا
لئن لمہ یغفر الرب الرحیم

      तर्जुमा: वे ख़स व ख़ाशाक की तरह दोज़ख़ में तैरते फिरेंगे, अगर रहीम ख़ुदा उन्हें न बख़्श दे।

       नाबिग़ा जअदी गुनहगारी के तौर पर कहता है कि:

اطرح بالکا فرین فی الدرک
الا سفل یارب اصطلی الضرما

      तर्जुमा: ऐ ख़ुदा! अगर तू मेरे गुनाह माफ़ न कर दे, तो मैं काफ़िरों के साथ सबसे निचले तबक़े में जलता रहूँगा। (ख़ज़ानत उल अदब 4:4)

       उमय्या बिन अबी सुल्त कहता है कि:

فمتھم فرح راض بمبعثہ
واخرون عصواما واھم السقر
یقول خزانھا ما کان عندکم
المہ یکن جاء کم من ربکم نذر
قالو ابلی فتبعنا فتیة بطروا
وغر ناطول ھذا العیش والعمر
قالو امکتوا فی عذاب الله مالکم
الا سلاس والا غلال والسعر

      तर्जुमा: क़ियामत में दो क़िस्म के लोग होंगे, एक तो वो होंगे जो जी उठने से ख़ुश होंगे, और दूसरे वो लोग होंगे जिनका ठिकाना सक़र होगा।

       दोज़ख़ के दरोगे उनसे कहेंगे: “तुम्हें क्या हो गया था? क्या तुम्हारे पास ख़ुदा की तरफ़ से डराने वाले नहीं आए थे?”

       गुनहगार कहेंगे: “हाँ, आए थे, लेकिन हमने सरकशों की पैरवी की, और दुनिया की ऐश ओ इशरत ने हमें धोखा दिया।” तब दोज़ख़ के दरोगे कहेंगे: “कि पास ख़ुदा के अज़ाब में ज़ंजीरों में बँधे पड़े रहो।” (किताब अल बद्अ 2:146)

       फिर कहता है कि:

ایما شاطن عصاہ عکاہ
ثم یلقن فی السجن والا غلال

      तर्जुमा: जब कोई शैतान ख़ुदा की नाफ़रमानी करता है, तो ख़ुदा उसे ज़ंजीर से बाँधकर क़ैद (दोज़ख़) में डाल देता है।

       अदी बिन ज़ैद कहता है कि:

وھبط الله ابلیسا ً واو وعدہ
ناراً تلھب بالاء سعار والشرر

      तर्जुमा: ख़ुदा ने इब्लीस को नीचे गिरा कर दोज़ख़ की भड़कती हुई आग से उस को डराया।

हश्र नश्र — हिसाब किताब


      इलाहियात के शुअबों में सबसे अहम शुअबा क़ियामत और उसके मुतअल्लिक़ात की तालीम है। मसीहियत ने जिस ज़ोर-शोर के साथ अरबिस्तान में इस तालीम को जारी किया है, उसका अंदाज़ा अशआर ए ज़ैल से हो सकता है।

یانا عی الموت والا موات فی جدث
علیھم من بقایا یا خزھم خرق
رعھم فان لھم یوماً یصاح بھم
فھم اذا انبتھوا من فومھم فرق
حتی یعود وابحال غیر حالھمہ
خلقاً جدید اکمامن قبلھا خلقوا
منھم عراة وموتی فی ثیا بھم
منھا الجدید ومنھا الا ورق الخق

       तर्जुमा: ऐ मौत की ख़बर लाने वाले! मुर्दे तू अपनी क़ब्रों में अपने फटे कपड़ों (कफ़न) में बोसीदा पड़े हुए हैं। उनको उनकी हालत पर छोड़ दे, क्योंकि एक दिन (क़ियामत) आने वाला है जब वो जगाए जाएँगे और डरते हुए उठेंगे। वो एक नई हालत में उठेंगे, जिस तरह पहले नई हालत में पैदा किए गए थे। उनमें से बहुत से उरयां होंगे, बहुत से जदीद लिबास (नई इंसानियत) में होंगे, और बहुत से परेशान हाल होंगे।

       (अश शरीशी 2:275; मुहाज़रात इब्नुल अरबी 2:67; किताब अल मुअम्मरीन लि अबि हातिम सिज्ज़ाली, सफ़्हा 72)

       इलाहियात के माहिर और अरब के उस्ताद उमय्या बिन अबी सुल्त कहते हैं कि:

الوارث الباعث الاموت قد ضمنت
ایاھم الارض فی مھر الدھاریر

      तर्जुमा: ख़ुदा उन मुर्दों को उठा खड़ा करने वाला है, जिन को ज़मीन ने मुद्दतों से अपने घर के अंदर छुपाए रखा है।

       फिर कहते हैं कि:

ویوم موعد ھمہ ان یحشر وازمراً
یوم التغابن اذلا ینفع الحذر
مستو سقین مع الداعی کا نھم
رجل الجراد رقتہ الریح تناشرا
وابر زوا الصعید مستوٍ حرزٍ
وانزل العرش والمیزان والذبر
وحو سبوا بالذی لمہ یحصہ احد
منھم وفی مثل ذالک الیوم معتبر

      तर्जुमा: ख़ुदा का वादा है कि वो सब के सब उठाए जाएँगे। यह वह दिन होगा जिसमें डर से कुछ भी फ़ायदा न होगा। वो पुकारने वाले की आवाज़ पर इस तरह उठेंगे जैसे टिड्डियों का झुंड हो जो हवा के झोंके के साथ बिखर रहे हो। वो एक सुनसान और सफाचट मैदान में ज़ाहिर होंगे, जहाँ ख़ुदा का अर्श, और मीज़ान और किताबें (आमालनामे) होंगी। उस दिन वे सब अपने आमाल का हिसाब देंगे। (किताब‑अल‑बद्अ 2:146)

       फिर कहते हैं कि:

ان یوم الحساب یوم عظیم
شاب فیہ الصغیر شیباً طویلاً
لیتنی کنُت قبل ماقد بدالی
فی قلال الجبال ارعی الوعرلا
کل عیش دان تطاؤں دھرا
منتھی امرہ الی ان یادلا
واجعل الموت تصب عینک ذاحذر
غولة الدھر ان للموت غولا

      तर्जुमा: हिसाब का दिन वो अजीम शान दिन है, जिस में बच्चे बुड्ढे बन जाएंगे। काश कि इस हकीकत के जाहिर होने से क़बल मैं पहाड़ों की चोटियों पर बजां कोही चराता फिरता यानी जाहिल होता। दुनिया की जिंदगी कितनी लंबी क्यों न हो, उस की इंतिहा जवाल है। पस हमेशा मौत को मद्दे नजर रख कर और उस दिन से डरता रह।

       फिर कहते हैं कि:

لا تخلطن خبیثاتٍ بطیبة
واخلع ثیابک مھا وانج عریانا
اوسیا مدیتا کاقدی دانا

      तर्जुमा: खबरदार, नेकी को बुराई से आलूदा मत कर और अपने आप को बुराई से पाक रख। हर शख्स को उसकी नेकी और बदी का कर्ज अदा किया जाएगा, और उसके साथ वही किया जाएगा जो उसने किया है। (खजानत-उल-अरब 4:7)

      फिर कहते हैं कि:

ولا یوم الحساب وکان یوماً
عبوساً فی الشدائد قمطر یرا

      तर्जुमा: यौम-उल-हिसाब को मामूली दिन मत समझो; वो बहुत सख्त और खतरनाक दिन होगा। (इत्तिक़ान 1:158)

      लबीद कहता है कि:

وکل امری یوما ً سیعلمہ سعیہ
اذا کشفت عندالا لہ المحاصل

      तर्जुमा: हर शख्स अपनी कोशिश के नतीजे को जान लेगा, जब खुदा के पास आमालनामे खोले जाएंगे।

      (लबीद का दीवान सफहा 28)

      फिर उमय्या बिन अबी सुल्त कहते हैं कि:

یوقف الناس للحساب جمعیاً
فشقی معذب وسعید

      तर्जुमा: सब लोग हिसाब के लिये खड़े होंगे। उन में से बा’ज नेक बख्त होंगे और बा’ज बदबख्त काबिल-ए-अज़ाब।

      ज़ुबैर बिन सलमी अपने मुअल्लक़ा में कहता है कि:

فلا تکتمن الله مافی صدور کم
لیخفی ومھما یکتمہ الله یعلمہ
یوخر فیوضع فی کتاب فیدخر
لیوم الحساب اویجمل فینقم

फ़ैज़‑ए‑दुवम - इलाहियात

वह्य - इलाही किताबें


       मज़हब की दो क़िस्में हैं, जिनको फ़ितरी और वज़ई कहते हैं। फ़ितरी मज़हब का तमाम‑तर दारोमदार अक़्ली उमूर पर है; इस लिए वो इस्बात और नफ़ी में हमेशा दायर रहता है और क़ल्बी इत्मिनान का बाइस नहीं हो सकता। इसके बरख़िलाफ़ वज़ई मज़हब का वाज़ेअ यानी बानी‑ए‑मबानी ख़ुद ख़ुदा है, जो अपनी मर्ज़ी को अपने अंबिया की वसातत से ब‑ज़रिये वह्य (इल्हाम) ज़ाहिर करता है, जिससे उसके बंदों को इत्मिनान‑ए‑क़ल्बी नसीब होता है। पस ख़ुदा की तरफ़ से जो बातें इल्क़ा होती हैं, वो वह्य व इल्हाम कहलाती हैं; और जिन मुक़द्दसीन के क़ुलूब में इल्क़ा होती हैं, वे नबी या रसूल कहलाते हैं। और ये इल्हामी बातें जब जमा की जाती हैं, तो इल्हामी किताबें कहलाती हैं।

       हम इस किताब में एक से ज़्यादा बार लिख चुके हैं कि अहले‑किताब की आमद से क़ब्ल अरब के लोग किसी वज़ई मज़हब की पैरवी नहीं करते थे, बल्कि अपने फ़ितरी मज़हब को भी अस्नाम‑परस्ती और दीगर उमूर‑ए‑क़बीहा से तब्दील कर चुके थे। लिहाज़ा वे इलाहियात के दीगर शोबों की तरह इल्हाम, इल्हामी किताब और पैग़म्बर के अल्फ़ाज़ से भी बे‑ख़बर और ना‑आश्ना थे। लेकिन अहले‑किताब की आमद के बाद और इस्लाम के आग़ाज़ से क़ब्ल के ज़माने में, उन अशआर के अशआर में, जो इस दरमियानी ज़माने से ताल्लुक़ रखते हैं, इलाहियात के तमाम उसूल का ज़िक्र निहायत तफ़्सील के साथ पाया जाता है, जिनसे हमारे नाज़िरीन वाक़िफ़ हो चुके हैं। इस बहस में हम साबित करेंगे कि अरब क़ब्ल‑ए‑इस्लाम मसीहियत के तुफ़ैल इल्हाम, इल्हामी किताबें और अंबिया से भी दीगर उमूर की तरह ख़ूब वाक़िफ़ हो चुके थे। ज़ैल के अशआर मुलाहिज़ा हों।

वह्य


      वरक़ा बिन नौफ़ल, जो मशहूर ईसाई राहिब और बीबी ख़दीजा का क़रीबी रिश्तेदार था, कहता है कि:

وجبر یل یاتیہ ومیکال معھما
من الله وحی یشرح الصدر منزل


32 जिन अशआर के तर्जुमे न हों, तो आप समझ लें कि गुज़श्ता अबवाब में कहीं उनके तर्जुमे हो चुके हैं।

      उमय्या बिन अबी सुल्त कहता है कि:

وسبط صفوف ینظرون قضا ئہ
یصیخون بالا سماع للوحی رکد
امیں لوحی القداس جبریل فیھم
ومیکال ذوالروح القوی المسدد

      लबीद अपने मुअल्लक़ा में कहता है कि:

فمد افع الریان عری رسمھا
خلقا کما ضمن الوحی سلامھا

      तर्जुमा: रय्यान पहाड़ के नालों के निशान बूसिदा होने की वजह से मिट चुके हैं; सिर्फ़ उसी क़दर बाक़ी हैं, जिस क़दर पत्थर की सख़्त सिलाख़ों पर किताबत बाक़ी रहती है।

       ज़ुहैर बिन अबी सल्मी अल‑मुज़नी कहता है कि:

لمن طلل کا لوحی صاف منازلہ

      तर्जुमा: ये अलामतें किन घरों की हैं, जो उस किताब की तरह बाक़ी हैं, जो चट्टानों में कंदा की गई हो। (शुअरा‑ए‑नसरानिय्या, सफ़हा 575)

इल्हामी किताब


जिस तरह अशआर‑ए‑बाला के दो आख़िरी शेअरों में वह्य का इत्लाक़ मजाज़न इल्हामी किताब पर किया गया है, उसी तरह अहले‑किताब ने अपनी इल्हामी किताबों को और नाम भी दिए हैं; मिसाल के तौर पर: सफ़र, किताबुल्लाह, मुसहफ़, मुजल्लद वग़ैरह ज़ालिक।

       सफ़र दर‑हक़ीक़त इब्रानी (ס פ ר) लफ़्ज़ है, जिसके म’अनी किताब के हैं; लेकिन अहले‑किताब की इस्तिलाह में इसका इत्लाक़ सिर्फ़ आसमानी किताबों पर होता है। चुनांचे इब्न वरीद अपनी किताब ‘इश्तिक़ाक़’ में लिखता है कि: “السفر الکتاب من التوراة والانجیل وما اشبھما”, यानी तौरात और इंजील की किताबों को, और उनकी मानिंद दीगर किताबों को सफ़र कहा जाता है। (सफ़हा 103) क़ुरआन शरीफ़ की सूरह अल‑जुमआ में भी यही लफ़्ज़ इन्हीं म’अनों में आया है।


33 यहाँ वह्य को मज़ाज़न किताब के म’अनी में इस्तेमाल किया है। मसीही अरबों का यह क़ायदा था कि चट्टानों पर या बड़े‑बड़े पत्थर के सिल्लों पर कुतुब‑ए‑मुक़द्दसा में से कोई न कोई रीत कंदा कर दिया करते थे, जो रफ़्ता‑रफ़्ता किताबत और किताब के म’अनों में इस्तेमाल होने लगी।

      किताबुल्लाह: अदी बिन ज़ैद कहता है कि:

      ناشد تنا بکتاب الله حرمتنا ولم تکن بکتاب الله ترتفع

      मुसहफ़: इमरउल‑क़ैस कहता है कि:

قفا بتک من ذکری حبیب وعرفان
ورسم عفت آیاتہ منذاز مان
اتت جحج بعدی علیہ فاصبحت
کخط زبوانی مصاحف رھبان

      मुजल्लद: नाबिग़ा बनी ग़स्सान की तारीफ़ में यह कहता है कि:

مجتھم ذات الالہ ودینھمہ
قویم فما یرجون غیر العواقب

      सूरह भी अहल‑ए‑किताब की इस्तिलाह है और इब्रानी (ש ררר) लफ़्ज़ है, जिसके म’अनी दीवारों की ईंट या गाड़ी की क़तार के हैं, और मज़ाज़न किताब के किसी हिस्से को कहते हैं। नाबिग़ा नुअमान की तारीफ़ में कहता है कि:

الم تران الله اعطاک سورة

      तर्जुमा: क्या तू नहीं देखता कि ख़ुदा ने तुझको तमाम बादशाहों पर ग़लबा और शर्फ़ बख़्शा है।

इल्हाम - इल्हामी किताबें


      अरब क़ब्ल‑अज़‑इस्लाम में सिर्फ़ तीन किताबें, यानी तौरैत, ज़बूर और इंजील, इल्हामी किताबें समझी जाती थीं, और इस क़दर मशहूर हो गई थीं कि उस ज़माने के शुअरा के अशआर उनके ज़िक्र से भरे हुए हैं। मिसाल के तौर पर, सिमूईल कहता है कि:

وبقایا الاسباط یعقوب
دراس التورات والتابوت

      तर्जुमा: याक़ूब के बेटों, असबात, के बाक़ियात हैं, जो तौरैत और ताबूत‑ए‑सकीना के दर्स देने वाले हैं। (दीवान सिमूईल, मतबूआ बेरूत, सफ़हा 12)

      बा’ज़ लुग़त‑दान मुसलमानों ने तौरेत के इश्तिक़ाक़ में अजीब ख़यालात का इज़हार किया है। एक गिरोह ये कहता है कि यह मसदर है। अरब के लोग “وری الزنا ناد توریة”उस वक़्त कहते हैं, जब चमक़ाक़ से आग निकलती है। और बा’ज़ कहते हैं कि तौरैत नबी‑ए‑तय्य की लुग़त है, और दोनों सूरतों में इसके म’अनी ज़िया यानी रौशनी के हैं। अल‑मुफ़ज़्ज़लियात का शारिह कहता है कि तौरेत दर‑असल “दौवारा” थी; पहली वाव छोटी हे से तब्दील होकर तौराह हो गई। लेकिन साहिब‑ए‑ताज ने ज़ज्जाज से जो रिवायत लिखी है, कि “लफ़्ज़ ग़ैर‑अरबी बल्कि इब्रानी है”, इत्तिफ़ाक़न दुरुस्त और सही है; क्योंकि ये इब्रानी (חדדח) “तोराह” है, जिसके म’अनी इल्म और हिकमत के हैं।

      अरब क़ब्ल‑अज़‑इस्लाम के अशआर में ज़बूर इस कसरत के साथ इस्तेमाल हुआ है कि अगर उन सब अशआर को, जिनमें ज़बूर आया है, जमा किया जाए, तो एक ज़खीम रिसाला बन जाएगा।

      मरक़िश अकबर कहता है कि:

وکذالک لا خیر ولا              شر علی احد بدائمہ
قد خطذ الک فی الزبور              رالا ولیات القدائمہ

      तर्जुमा: ज़बूर की किताब में ये बात लिखी हुई है कि तुम में से किसी पर न तो ऐश व राहत बाक़ी रहेगी और न रंज व कुल्फ़त।

       इमरउल‑क़ैस कहता है कि:

لمن طلل البصرتہ فشجانی
کخط زبور فی عسیب یمانی


34 यानी तौराह अरबी लफ़्ज़ नहीं है, बल्कि बिला‑इत्तिफ़ाक़ इब्रानी लफ़्ज़ है।

      एक जगह और कहता है कि:

اتت جحج بعدی علیھانا تاصحبت کحظ زبور فی مصاحف رھبان

      ज़बूर की जमा “ज़ुबर” भी इस्तेमाल हुई है। चुनांचे मरार बिन मुनक़िज़ एक घर के मुतअल्लिक़ कहता है कि:

وتری منھا رسوماً قد عفت
مثل خط الکلام فی وحی الذبر

      तर्जुमा: क्या तू देखता है कि उसके घर के खंडहर उसी तरह मिट चुके हैं, जिस तरह लाम की कशिश ज़बूर की किताब में।

      उमय्या बिन अबी सुल्त कहता है कि:

وابرزوبصعید              مستوٍجرزٍ
وانزل العرش والمیزان والزبر

      ज़बूर के इश्तिक़ाक़ में भी मुसलमान लुग़त‑दानों ने ख़ूब जिद्दत दिखाई है। बा’ज़ कहते हैं कि यह “ज़बर अल‑किताब” से मुश्तक़ है, जिसके म’अनी लिखने के हैं। साहिब‑ए‑ताज इसके माद्दा “ज़बर” में लिखता है कि अज़हरी कहता है: “اعرفہ النقش فی الحجارة”,यानी ज़बूर की मशहूर क़िस्म पत्थर पर कंदा करने की है। और बा’ज़ कहते हैं कि अच्छी तरह लिखने को ज़बूर कहते हैं। चुनांचे अरब कहते हैं: “زبرت ا لکتاب اذاتقنن کتابت”

      असल ज़बूर इब्रानी लफ़्ज़ “ज़मर” से माख़ूज़ है। ज़मर की मीम बे के साथ इसी तरह तब्दील होगी, जिस तरह ज़बन एक सुरयानी लफ़्ज़ है और अरबी में ज़मन यानी ज़माना हो गया। पस मज़मूर दर‑हक़ीक़त (ם ד ת דד) है।

      इसी तरह इंजील‑ए‑मुक़द्दस का भी कसरत के साथ ज़िक्र मिलता है। चुनांचे अदी बिन ज़ैद कहता है कि:

واوتیا الملک والانجیل نقراة
تشفی بحکمة احلامنا علکا
من غیرما حاجة لیجلعتا
فوق البریہ اربا با کما فعلا

      तर्जुमा: ख़ुदा ने उनको सल्तनत दी और इंजील, जिसे हम पढ़ते हैं और जिसकी हिकमत से हम अपनी अक़्लों को सक़्म से दुरुस्त करते हैं। इसकी और कोई ज़रूरत न थी, सिवाय इसके कि उसने हमें तमाम दुनिया पर फ़ौक़ियत दी। (किताब अल‑हयवान, अल‑जाहिज़, मतबूआ मिस्र 4:66)

       एक और शायर, जिसका नाम मालूम नहीं, एक राहिब की, जो रहबानियत को छोड़कर दुनिया‑परस्ती की तरफ़ माइल हो गया था, हज्व में लिखता है कि:

ھجر الانجیل حبا للصبی              واری الدنیا غروراً فرکن

      तर्जुमा: नफ़्सानी ख़्वाहिश की वजह से इंजील को छोड़कर दुनिया की तरफ़, जिसे वो चंद रोज़ समझता था, माइल हो गया। (मुअजम मा इस्तुहिम लिल‑कुबरा, सफ़हा 361)

      इसी तरह एक और लड़के के मुतअल्लिक़ कहता है, जो इंजील को ख़ुश‑आवाज़ी के साथ पढ़ता था, कि:

اذراجع الانجیل واھتز مائلا
تذکر مخزون الفوادغریب

      तर्जुमा: जब वह इंजील को ख़ुश‑आवाज़ी के साथ झूम‑झूम कर पढ़ता है, तो उस वक़्त एक ग़मज़दा मुसाफ़िर अपना गुज़रा हुआ ज़माना याद करता है।

      रुवैया कहता है कि:

انجیل احبار وحی منمنہ              ماحط فیہ بالمداد کلمہ

       इंजील एक यूनानी लफ़्ज़ है, जिसके म’अनी ख़ुशख़बरी के हैं, और सुरयानी ज़बान की वसातत से अरबी ज़बान में मुन्तक़िल हो गया।

      गुज़श्ता औराक़ में मैंने निहायत इख़्तिसार के साथ बाइबिल मुक़द्दस के नश्रो‑इशाअत पर बहस करके अशआर‑ए‑अरब से यह साबित किया था कि बाइबिल‑ए‑मुक़द्दस आँ-हज़रत से बहुत पेशतर जज़ीरा‑ए‑अरब में पूरी तरह शाए और राइज हो चुकी थी। इन औराक़ में अब मैं उन इक़्तिबासात को नक़्ल करूँगा, जो सिर्फ़ आँ-हज़रत की अहादीस की ज़ीनत बने हुए हैं।

      इस बहस को मुकम्मल करने के लिए मैं अल्लामा सियूती का बे‑हद मुतशक्किर हूँ, जिनकी किताब “कुनूज़ अल‑हक़ाइक़” और “जामेअ अस‑सग़ीर” और उसकी शरह “मनादी” से मैंने बहुत फ़ायदा उठाया है।

बाइबिल‑ए‑मुक़द्दस आँ-हज़रत की अहादीस की ज़ीनत


      अहादीस ज़ैल में—नाज़िरीन मुख़्तसरात‑ए‑ज़ैल को मल्हूज़ रखें।

      (ख) बुख़ारी, (म) मुस्लिम, (त) तिर्मिज़ी, (न) नसाई, (ह) इब्ने‑माजा, (जस) जामेअ अस्सग़ीर, (मन) मनादी, ये सब इनके इख़्तिसार हैं।

सहुफ़‑ए‑मुतह्हरा

पैदाइश की किताब अहादीस
1. और ख़ुदा ने आदम को अपनी सूरत पर पैदा किया। ख़ुदा की सूरत पर उसको पैदा किया। (1:27) 1. जस 204, क़लमी नुस्ख़ा; मन 193
خلق الله آدم علی صورتہ لا تقجوا الوجہ فان الله خلقہ علیٰ صورة الرحمان
तर्जुमा: ख़ुदा ने आदम को अपनी सूरत पर पैदा किया। चेहरे को बुरा मत कहो, क्योंकि ख़ुदा ने उसे रहमान की सूरत पर पैदा किया।
2. और ख़ुदा‑ए‑बरतर ने ज़मीन की मिट्टी से इंसान को पैदा किया। 2. मन 193
خلق آدم من تواب
तर्जुमा: ख़ुदा ने आदम को मिट्टी से पैदा किया। (जस 72)
3. और ख़ुदा‑ए‑बरतर ने मशरिक़ की तरफ़ अदन में एक बाग़ लगाया। (2:8) 3. जस
ان الله نبا جنات عدن بیدہ
तर्जुमा: ख़ुदा ने बाग़‑ए‑अदन को अपने हाथ से बनाया। (जस 32)
4. और ख़ुदा ने उन सब पर, जो उसने बनाया, नज़र की और देखा कि बहुत अच्छा है। (1:31) 4. जस 113
کل خلق الله حسن
तर्जुमा: ख़ुदा की हर मख़लूक़ अच्छी है। (जस 113)
5. और नूह पाँच सौ बरस का था, जब उससे साम, हाम और याफ़िस पैदा हुए। (5:32) 5. जस 178
ولد نوح ثلاثة سام وحام یافث
तर्जुमा: नूह से तीन बेटे पैदा हुए, साम, हाम और याफ़िस। (जस 178)
6. ये उस ज़ियात की तरफ़ इशारा है, जिसका ज़िक्र 18वें बाब में है। 6. जस 112
کان اول من اضاف الضیف ابراہیم
तर्जुमा: इब्राहीम ने सबसे पहले मेहमान‑नवाज़ी की। (जस 112)
ख़ुरूज की किताब अहादीस
1. तू अपने बाप और अपनी माँ की इज़्ज़त कर, ताकि तेरी उम्र उस सरज़मीन पर, जो ख़ुदा‑ए‑बरतर तुझे देता है, दराज़ हो। (20:12) 1. जस 100, जस 150, जस 18
ان الله تعالیٰ یذید فی عمر الرجل یبرو الدیہ (جص ۱۰۰) من بروالدیہ طوبی لة راد الله فی عمرہ جس ۱۵۰) طع ایاک (جص ۱۸)
तर्जुमा: ख़ुदा उस शख़्स की उम्र को दराज़ करता है, जो अपने वालिदैन से नेकी करता है। (जस 100)

मुबारक है वो, जिसने अपने वालिदैन से नेकी की; ख़ुदा उसकी उम्र को दराज़ करता है। (जस 150)

अपने बाप की फ़रमाबरदारी कर। (जस 18)
2. और जो कोई अपने बाप या अपनी माँ को मारे, अलबत्ता जान से मारा जाए। (21:15) 2. जस 154
من حزب والدیہ فاقتلوہ
तर्जुमा: जो अपने माँ‑बाप को मारे, उसको क़त्ल करो। (जस 154)
अहबार की किताब अहादीस
1. मज़दूर की मज़दूरी तेरे पास सारी रात सुबह तक रहने न पाए। (19:13)
नीज़ देखो, किताब‑ए‑तूबिया 4:15
1. जस 61; मन 19; मन 50
اعطوا لا جبیرا جرتہ قبل ان یجف عرقہ (جص ۶۱ من ۱۹ ) اوفوالا جیرا جرہ(من ۵۰)۔
तर्जुमा: मज़दूर की मज़दूरी और मदद, उसका पसीना सूखने से पहले, दे दो। (जस 61; मन 19)
मज़दूर की मज़दूरी पूरी दिया करो। (मन 50)
2. और अगर कोई मर्द किसी जानवर से जिमा करे, तो वह ज़रूर जान से मारा जाए; और तुम उस जानवर को भी मार डालो। (20:15) 2. जस 146
من اتی ٰ بھیمة فاقتلوہ واقتلوھا معہ
तर्जुमा: जो चौपाए से बद‑फ़िअली करे, उसे और उस चौपाए को क़त्ल करो। (जस 146)
इस्तिस्ना की किताब अहादीस
1. ताकि तुम जानो कि ख़ुदावंद ही ख़ुदा है, और उसके सिवा और कोई ख़ुदा नहीं। (4:35; नीज़ 39) 1. जस 180, मन 87
لا الہ الا الله ھی الموجبة
(جص ۱۸۰) السید ھو الله (من ۸۷ )۔

तर्जुमा: ख़ुदा के सिवा कोई और ख़ुदा नहीं। (जस 180)
ख़ुदा ही हक़ीक़ी आक़ा है। (मन 87)
2. लानत है उस पर, जो अंधे को गुमराह करे; और सब लोग कहें, आमीन। (27:18) 2. जस 130
الاعمی عن السبیل
तर्जुमा: ख़ुदा की लानत है उस पर, जो अंधे को गुमराह करे। (जस 130)
3. लानत है उस पर, जो अपने बाप या माँ को हक़ीर समझे। (27:16) 3. मन 404
ملعون من سب اباہ ملعون من سب امہ
तर्जुमा: लानत है उस पर, जो अपने बाप को और अपनी माँ को गाली दे। (मन 404)
यशूअ की किताब अहादीस
1. यशूअ ने ख़ुदावंद के हुज़ूर बनी‑इस्राईल के सामने यह कहा: ऐ सूरज, तू हय्यून पर ठहर जा; और ऐ चाँद, तू वादी‑ए‑अय्यालोन पर ठहर रह। और सूरज ठहर गया और चाँद थमा रहा। (10:12–13) 1. सन 309
صاحبست المشس علی البشر قط الاعلی یشوع بن نون (سن ۳۰۹)
तर्जुमा: आफ़्ताब किसी के लिए नहीं ठहरा, मगर यशूअ बिन नून के लिए। (मन 389)
सामूएल की किताब अहादीस
1. क्योंकि ख़ुदावंद इंसान की नज़र नहीं करता; इसलिए कि इंसान ज़ाहिरी सूरत को देखता है, लेकिन ख़ुदा दिल पर नज़र करता है। (16:7) 1. (जस 97)
ان الله لا ینظر الی صور کمہ واموالکمہ انما ینظر الی قلو بکمہ واعمالکمہ (جص ۹۷)۔
तर्जुमा: ख़ुदा तुम्हारी सूरत और माल पर नज़र नहीं करता, बल्कि तुम्हारे दिल और आमाल पर नज़र करता है। (जस 97)
तवारीख़ की दूसरी किताब अहादीस
1. क्योंकि फ़क़त तू ही बनी‑आदम के दिलों को जानता है। (6:30)
علم الباطن سرمن اسرارہ عزوجل وحکمہ من احکامہ (من ۲۷۹)
2. तू तो आसमान पर से सुनकर अमल करता है और अपने बंदों का इंसाफ़ करके बदकार को सज़ा देता है, ताकि उसके आमाल को उसी के सर डाल दे; और सादिक़ को रास्त ठहराता है, ताकि उसकी सदाक़त के मुताबिक़ उसे अज्र दे। (6:23) 2. ख 3:19
ان الله لا یضبع اجر المحصنین
तर्जुमा: ख़ुदा नेकी करने वालों का अज्र ज़ाया नहीं करता। (ख 3:19)
तूबिया की किताब (यह अपॉक्रिफ़ल किताब है) अहादीस
1. सदक़ा हर ख़ता से बचाता है। (4:11) 1. जस 83
الزکاة طھور من الذنوب
तर्जुमा: ज़कात गुनाहों से पाक करती है। (जस 83)
2. जो गुनाह करते हैं, वे आप ही अपने दुश्मन हैं। (12:10) 2. मज़ 45
انما المجنون المقیم علی معصیہ الله
तर्जुमा: पागल वही है जो गुनाहों पर क़ायम रहता है। (मज़ 45)
अय्यूब की किताब अहादीस
1. जो गुनाह को जोतते और दुख बोते हैं, वही उसको काटते हैं। (4:8) नीज़ देखो: अम्साल 22:8, इरमिया 12:3 1. हस 107
قال داؤد یازارع السیئات انت لحصد شوکھا وحسکھا (حص ۱۰۷)
तर्जुमा: दाऊद ने कहा: ऐ बुराइयों के बोने वाले, तू उनके काँटे ही काटेगा।
2. कोई मुनाफ़िक़ ख़ुदा के हुज़ूर नहीं आ सकता। (13:16) 2. ख व म
ذوالوجھین لایکون عندالله وجیھاً (خ وم )۔
तर्जुमा: दो‑रुख़ा शख्स ख़ुदा का मंज़ूर‑ए‑नज़र न होगा। (ख व म)


35 इस मक़ूले को दाऊद की तरफ़ मंसूब किया है, लेकिन ज़बूर में कोई ऐसा मक़ूला नहीं है। (मिन्हु)


मज़ामीर अहादीस
1. बदी से भाग और नेकी कर। (37:27) 1. जस
ایت المعروف واجتنب المنکر (جص)
तर्जुमा: नेकी कर और बदी से किनारा कर। (जस)
2. ऐ ख़ुदावंद, मुझ को अपनी राह बता और मेरे दुश्मनों के सबब मुझे उस राह पर, जो बराबर है, ले चल। (27:11) 2. मन
رب اغفروارحم واھدنی للسبیل القویم (من)۔
तर्जुमा: ऐ ख़ुदा, मुझे बख़्श दे और मुझ पर रहम कर, और सीधे रास्ते पर चला। (मन 8)
3. ख़ुदावंद का मुन्तज़िर रह और उसकी राह याद रख; वो तुझे ज़मीन का वारिस करके सरफ़राज़ी बख़्शेगा। (37:34) 3. जस 48; मन 114
اذکر الله فانہ عون لک علی ماتطلب (جص ۴۸ من ۱۱۴)۔
तर्जुमा: ख़ुदा को याद कर, क्योंकि वो तेरे मतलब तक पहुँचाने का मददगार है। (जस 48; मन 14)
4. ऐ ख़ुदावंद, अगर तू बदकारी को हिसाब में लाएगा, तो ऐ ख़ुदावंद, कौन क़ायम रह सकेगा? (130:4) 4. जस 161
من نوقش المحاسبة ھلک (جص ۱۶۱)
तर्जुमा: जो हिसाब में मुनाक़शत करेगा, वो हलाक हो जाएगा। (जस 161)
5. एक दिन, जो तेरी बारगाहों में कटे, एक हज़ार से बेहतर है। (84:10) 5. जस 227
رباط یوم فی سبیل الله خیر من الف یوم فیما سواہ (جص ۲۲۷)۔
तर्जुमा: ख़ुदा के रास्ते में एक दिन रहना हज़ार और दिनों से बेहतर है। (जस 227)
6. ख़ुदा का ख़ौफ़ दानाई का शुरु है। (18:10) 6. जस 203, अल‑मसऊदी 4:168, जस 79,
ة الله راس کل حکمة (جص ۲۰۳) راس الحکمة مخافة الله (المسعودی ۴: ۱۶۸) راس الحکمہ تو معرفة الله (جص ۷۹)۔
तर्जुमा: ख़ुदा का ख़ौफ़ दानाई का शुरु है। (जस 203)

दानाई का शुरु ख़ुदा का ख़ौफ़ है। (मसऊदी 4:168)

हिकमत का शुरु ख़ुदा की पहचान है। (जस 79)
7. ऐ ख़ुदावंद, तेरे ख़ैमे में कौन रहेगा? वो जो सीधी चाल चलता है और सदाक़त का काम करता है, और अपने दिल से सच बोलता है; वो जो अपनी ज़बान से चुग़ली नहीं खाता, और अपने हमसाये से बदी नहीं करता, और अपने पड़ोसी पर ऐब नहीं लगाता। (15:1–5) 7. जस 311
قد افلح من اخلص قلبلہ الایمان وجعل قلبلہ سلیماً ولسانہ صادقاً ونفسہ مطمنة (جص ۳۱۱)۔
तर्जुमा: जिसने अपने दिल में ख़ालिस ईमान रखा, और अपने दिल को सलामत रखा, और अपनी ज़बान को बचाए रखा, और उसका दिल मुतमइन है, वो रिहाई पाएगा। (जस 311)
8. ख़ुदावंद रहीम और करीम है; क़हर करने में धीमा और शफ़क़त करने में बढ़कर है। (103:8–9) 8. जस 277
عفو الله اکبر من ذنوبکمہ (جص ۲۷۷)۔
तर्जुमा: ख़ुदा की अफू (माफ़ी) तुम्हारे गुनाहों से बड़ी है। (जस 277)
9. हमारी उम्र की मियाद सत्तर बरस है; और अगर क़ुव्वत हो, तो अस्सी बरस। (90:10) 9. ख
اعمارامتی بین الستین والسبعین (خ)۔
तर्जुमा: मेरी उम्मत की उम्र साठ और सत्तर के दरमियान है। (ख
अम्साल की किताब अहादीस
1. जो मिस्कीन पर रहम करता है, ख़ुदावंद को क़र्ज़ देता है; और वो अपनी नेकी का बदला पाएगा। (19:17) 1. जस 37
ان الصدقة تقع فی یدالله (جص ۳۷)۔
तर्जुमा: सदक़ा ख़ुदा के पास पहुँचता है। (जस 37)
2. ऐ काहिल, चींटी के पास जा; उसकी रविशों पर ग़ौर कर और दानिशमंद बन।... वो गर्मी के मौसम में, अपनी ख़ुराक मुहैया करती है। (6:6, 8) 2. जस 143
مثل المومن کمثل النملة تجمع فی صیفھا لشتا ئھا (جص ۱۴۳)۔
तर्जुमा: मोमिन चींटी की तरह है, जो गर्मी में सर्दी के लिए जमा करती है। (जस 143)
3. वो जो दानाओं के साथ चलता है, दाना होगा; पर अहमक़ों का साथी हलाक किया जाएगा। (13:20) 3. जस 152
ایاک وقرین السوع فانک بہ تعرف (جص ۱۵۲)۔
तर्जुमा: बुरों की सोहबत से बचो, क्योंकि तू उसी से पहचाना जाएगा। (जस 152)
4. जो क़हर में धीमा है, वो पहलवान से बेहतर है; और वो जो अपने नफ़्स पर क़ाबिज़ है, उससे, जो शहर को फ़तह करता है, बेहतर है। (16:32) 4. ख; मन
الشد ید بالصرعة انما الشدید من یملک نفسہ (خ من)
तर्जुमा: पहलवान वो नहीं जो दूसरों को पछाड़ता, बल्कि पहलवान वो है जो अपने नफ़्स पर ग़ालिब आता है। (ख; मन)
5. मौत और ज़िंदगी ज़बान के क़ाबू में हैं। (18:21) 5. जस 168
البلاء موکل بالمنطق (جص ۱۶۸)۔
तर्जुमा: तकलीफ़ ज़बान से वाबस्ता है। (जस 168)
6. फ़रमाबरदार आदमी फ़तह की बात करेगा। (21:28) 6. मन 148
من اطاع الله فازمن ۱۴۸)۔
तर्जुमा: जो शख़्स ख़ुदा की इताअत करता है, कामयाब होता है। (मन 148)
7. भाई, जिसकी* (ये तर्जुमा रोमन कैथोलिक तर्जुमा है, जो निहायत सही है; हमारे मुतर्जिमीन ने इस आयत को एक चीस्तान बना दिया है), का भाई मदद करे, हसीन शहर की मानिंद है; और उनके फ़ैसले क़िले की सलाख़ों की तरह हैं। (18:19) 7. जस 110
ان المر کثیر باخیہ (جص ۱۱۰)۔
तर्जुमा: इंसान अपने भाई की वजह से ग़लबा पाता है। (जस 110)
8. जिस तरह कुत्ता अपनी क़ै को फिर खाता है, उसी तरह अहमक़ अपनी हिमाक़त को दोहराता है। (26:11) 8. ख 2:123
العائد فی صدقہ کا لکلب یعود الی قیئہ (خ ۲: ۱۲۳)۔
तर्जुमा: जो अपनी ख़ैरात की तरफ़ लौटता है, वह उस कुत्ते की तरह है जो अपनी क़ै की तरफ़ लौटता है। (ख 2:123)
9. जिसको नेक‑बख़्त बीवी मिली, उसने तोहफ़ा पाया; और उस पर ख़ुदा का फ़ज़्ल हुआ। (18:22) 9. जस 313
زوجة صالحة خیرما کنزالناس (جص ۳۱۳)۔
तर्जुमा: नेक‑बख़्त बीवी उन तमाम ख़ज़ानों से बेहतर है जिन को इंसान जमा करता है। (जस 313)
वाइज़ की किताब अहादीस
1. मैंने ये मालूम किया कि रास्तबाज़ और दानिशमंद, और उनके काम ख़ुदा के हाथ में हैं; यहाँ तक कि आदमी नहीं जानते कि वे मुहब्बत या नफ़रत के लायक़ हैं। (9:1) 1. जस 275
عجبت لطالب دنیا۔۔۔۔ وھولایدری ارضی عنہ اوسخط (جص ۲۷۵)۔
तर्जुमा: तालिब‑ए‑दुनिया पर तअज्जुब है, क्योंकि वो नहीं जानता कि उससे ख़ुश हुआ जाएगा या नाख़ुश। (जस 275)
2. क्योंकि ख़ुदा सब कामों को अदालत में लाएगा, ताकि हर एक पोशीदा बात का, जो नेकी या बदी की थी, बदला दे। (12:14) 2. ख 3:199
من یعمل مثقال ذرة خیراً یرہ ومن یعمل مثقال درہ شراً (خ ۳: ۱۹۹)۔
तर्जुमा: जो ज़र्रा भर नेकी करेगा, उसका बदला उसे मिलेगा; और जो ज़र्रा भर बदी करेगा, उसकी सज़ा उसे मिलेगी। (क़ुरआन शरीफ़; ख 3:199)
3. हर चीज़ का एक मौक़ा है, और हर काम, जो आसमान के नीचे होता है, का एक वक़्त है। (3:1) 3. सन 158
کل شئی میقاتہ (سن ۱۵۸) نہ مثلہ للشاعر
ورکلا مور مواقیت مقدرہ وکل امرلة حدود میزان وقال ایضاً فاذ ا لشی ۔ اتی فی وقتہ زاد فی العین جماًل لجمال۔

तर्जुमा: हर एक चीज़ का एक वक़्त है। (मन 158)

एक शायर कहता है:

कामों के लिए औक़ात मुक़र्रर हैं, और हर एक काम के लिए एक हद और मीज़ान है।

एक और शायर कहता है:

जब काम अपने वक़्त पर होता है, तो उसकी रौनक़ और ख़ूबसूरती ज़्यादा नुमायाँ होती है।
हिकमत की किताब अहादीस
1. जो छोटा है, वह रहमत के लायक़ है; मगर साहिबान‑ए‑क़ुव्वत का इम्तिहान सख़्ती से किया जाएगा। (6:4,7) 1. जस 155
اشد الناس عذاباً للناس فی الدنیا اشد الناس عذاباً باعند الله یوم القیامة ۔
तर्जुमा: जो शख़्स दुनिया में सब से ज़्यादा तकलीफ़‑रसाँ है, वह क़ियामत के दिन ख़ुदा के नज़दीक सब से ज़्यादा तकलीफ़ पाएगा। (जस 55)
2. लेकिन सादिक़ों की अरवाह ख़ुदा के हाथ में हैं; अज़ाब उन्हें न छुएगा। और जाहिलों के गुमान में वे मर गए, और उनका गुज़र जाना बद‑बख़्ती समझा गया, और उनका चला जाना हम से हलाकत था; लेकिन वे सलामती में हैं। और गो आदमियों की आँखों में उन्होंने दुख उठाया, मगर उनकी उम्मीद बक़ा से मामूर है। और तादीब के बाद उन्हें बड़ा सवाब हासिल होगा; क्योंकि ख़ुदा ने उन्हें आज़माया और अपने लायक़ पाया। (3:1,6) 2. फ़ी सूरह आल‑ए‑इमरान (3:133):
لا تحسین الذین قتلوا فی سبیل الله امواتاً بد احیاءً ولاھم یحزنون۔
तर्जुमा: ये मत समझो कि ख़ुदा की राह में क़त्ल किए हुए लोग मरे हुए हैं; बल्कि वे ज़िंदा हैं… और न उन पर कोई तकलीफ़ है। (सूरह आल‑ए‑इमरान 3:133)
3. उसने उनको (सादिक़ों को), सोने की तरह भट्टी में तपाया, और उनको सोख़्तनी क़ुर्बानी की तरह क़बूल किया; और वक़्त पर इज़्ज़त पाएँगे। सादिक़ लोग चमकेंगे और चिंगारियों की मानिंद सरकंडों के दरमियान दौड़ेंगे। (3:6,9) 3. जस 135
مثل المومن حین یصیبہ البلاء کمثل الحدیدة تاخل النارفیذ ھب خبشھا ویبقی طیبھا (جص ۱۳۵)۔
तर्जुमा: मोमिन की मिसाल तकलीफ़ों में लोहे की मिसाल है; जब उसे आग में डाला जाता है, तो उसकी ख़बासत जाती रहती है और उसका अच्छा हिस्सा बाक़ी रह जाता है। (जस 135)



36 यह एक अपॉक्रिफ़ल किताब है। (मिन्हु)


ग़ज़ल‑उल‑ग़ज़लात की किताब अहादीस
1. मैं सोती हूँ, मेरा दिल जागता है। (5:2) 1. हस 175
تنام عینای ولا ینام قلمی (حبص ۱۷۵)
तर्जुमा: मेरी आँखें सोती हैं और मेरा दिल जागता है। (हस 175)
यशूअ बिन सीराख़ अहादीस
1. ऐ मेरे बेटे, अपनी जवानी के शुरू ही से तादीब हासिल कर, तो तू हिकमत को बुढ़ापे में पाएगा। पस तू उसे जलाली पोशाक की तरह पहनेगा और ख़ुशी के ताज की मानिंद अपने सर पर रखेगा। (6:18,32) 1. जस 98
ان الله یجب الشاب الذی یغنی شبابہ فی طاعة الله (جص ۹۸)۔
तर्जुमा: ख़ुदा उस जवान को दोस्त रखता है जिसने अपनी जवानी को ख़ुदा की फ़रमाबरदारी में सर्फ़ (ख़र्च) की है। (जस 98)
2. अपने आप को औरत के सुपुर्द न कर, ता न हो कि वो तेरी ताक़त पर ग़ालिब आ जाए। (9:2) 2. जस 94
طاعة المراة امة (جص ۹۴)۔
तर्जुमा: औरत की फ़रमाबरदारी नदामत है। (जस 94)
3. अपने दुश्मन की मौत पर ख़ुश मत हो; याद रख कि हम सब के सब मर जाएँगे। (8:8) 3. जस 191
لا تظھر المشماتة باخیک فیر حمہ الله وبیتبلیک
तर्जुमा: अपने भाई की मुसीबत पर ख़ुश मत हो, क्योंकि ख़ुदा उस पर रहम करेगा और तुझे उसी में मुब्तला करेगा। (जस 191)
اگر بمرد عدوجائے شادمانی نیست کہ زندگانی مانیز جداوانی نیست (سعدی)
(सअदी)
4. पानी भड़कती हुई आग को बुझा देता है, और ख़ैरात गुनाहों से छुटकारा दिलाती है। (3:33) 4. जस 92, जस 32
الصدقة تطفی الخطیة کما یطفی الماء النار (جص ۹۲ ) تصدقوا فان الصدقة فکا ککم من النار (جص ۳۲)۔
तर्जुमा: सदक़ा दो, क्योंकि सदक़ा तुम्हें आग से छुड़ाएगा। (हस 32)
5. अपने सारे कामों में अपने आख़िरी अंजाम को याद रख, तो तू अबद तक हरगिज़ गुनाह न करेगा। (7:4) 5. जस 213, जस 71
اکثر ذکر الموت یسلک عماسواہ (جص ۲۱۳) اکثر واذکر الموت فانہ یحض الذنوب و یزھد فی الدنیا (جص ۷۱)
तर्जुमा: मौत को ज़्यादा याद करना बुराई से बचाता है। (जस 213)

अक्सर मौत को याद किया करो, क्योंकि वह गुनाह को दूर करता है और दुनिया से बेपरवाह बना देता है। (जस 71)
6. ख़ुदावंद को सब नापाकी से नफ़रत है। (15:13) 6. मन 34
ان الله ینبغض الفاحش البذی (من ۳۴)۔
ترجمہ: ہرگناہ اور بدکاری پر خدا غصہ ہوتا(من ۳۴)۔

तर्जुमा: हर गुनाह और बदकारी पर ख़ुदा ग़ुस्सा होता है। (मन 34)
7. नज़राने और रिश्वत दानिशमंद आँखों को अंधा कर देते हैं, और मुँह में लगाम की तरह उसकी धमकियों को रोकते हैं। (20:31) 7. जस 176
الھدیة تعور عین الحکیم ۔ الھدایا لکامراء غلول الھدیة تذھب بالسمع و القلب والبصر (جص ۱۷۶)۔
तर्जुमा: हदिया दाना की आँखों को अंधा करता है। हदिये अमीरों के तौक़‑ए‑गर्दन हैं। हदिया कान, दिल और बसीरत को बेकार करता है। (हस 176)
8. वक़्त को जल्दी ला और मौत को याद कर, कि तुझे अजाइबात की ख़बर दी जाती है। (36:10) 8. जस 20
اغنتمنوا العل وبادر وا الاجل۔ (جص ۲۰)
तर्जुमा: काम करने को ग़नीमत जानो और मौत की तैयारी करो। (जस 20)
9. और ग़मगिनी वक़्त से पहले बुढ़ापा ला देती है। (30:26) 9. जस 176
الھم نصف الھرم ۔ (جص ۱۷۶) وقال المتنبی فی ھذا المعنی۔ والھم یخترم الجیم مخافة ویشیب ناصیہ الصبی فیھرم ۔
तर्जुमा: ग़म आधा बुढ़ापा है। (जस 176)

मुतनब्बी ने क्या ख़ूब कहा है कि:

ग़म जिस्म को काटता है और बच्चे को क़ब्ल-अज़-वक़्त बूढ़ा बना देता है।
अशअया नबी की किताब अहादीस
1. ख़ुदावंद ने फ़रमाया: जा, उन लोगों से कह कि तुम सुना करो पर समझो नहीं; तुम देखते रहो पर बूझो नहीं। (6:9) 1. मन 230, सूरह अल‑आ‘राफ़ (7:197)
یدعوالله المنافق فلا یسمع ینظر ولا یبصر (من ۲۳۰)۔ وفی سورة الاعراف (۷: ۱۹۷) وان تدعو ھم الی الھدی الا یسمعوا وتراھیم ینظرون الیک وھمہ لا یبصرون ۔
तर्जुमा: ख़ुदा मुनाफ़िक़ को पुकारता है, लेकिन वो नहीं सुनता; आँख रखता है, मगर देखता नहीं। (मन 230; सूरह अल‑आ‘राफ़ 7:197)
2. ख़ुदावंद फ़रमाता है: ये लोग ज़बान से तो मेरी नज़दीकी चाहते हैं और होंठों से मेरी ताज़ीम करते हैं, लेकिन उनके दिल मुझ से दूर हैं। (29:13) 2. जस 178
ویل لمن یذکر الله بلسانہ ویعصی الله فی عملہ (جص ۱۷۸)۔
तर्जुमा: अफ़सोस है उस पर जो ज़बान से ख़ुदा को याद करता है, लेकिन अमल में ख़ुदा की नाफ़रमानी करता है। (जस 178)
3. यहोवा मैं हूँ; यही मेरा नाम है। मैं अपना जलाल किसी दूसरे के लिए और अपनी हम्द खोदी हुई मूरतों के लिए रवा ना न रखूँगा। (42:8) 3. हस 306
قال الله الکبیر ردائی والعظمة ازراری فمن نازعنی واحداً منھما قذفتہ فی النار (جص ۳۰۶)۔
तर्जुमा: ख़ुदा कहता है: किब्रियाई मेरा लिबास है और अज़मत मेरी पोशाक; जो इन दोनों में से किसी एक में भी मुझ से झगड़ेगा, मैं उसे आग में डालूँगा। (हस 306)
यिर्मियाह नबी की किताब अहादीस
1. ख़ुदावंद यूँ फ़रमाता है कि मलऊन है वो आदमी जो इंसान पर तवक्कुल करता है और इंसान को अपना बाज़ू समझता है, और जिसका दिल ख़ुदावंद से बरगश्ता हो जाता है। (17:5) 1. जस 155
من سعی الی الناس فھو لغیر رشدہ (جص ۱۵۵) ۔
तर्जुमा: जो इंसानों के पास दौड़‑दौड़ कर जाता है, वो गुमराह है। (जस 155)
हिज़्क़ीएल नबी की किताब अहादीस
1. लेकिन अगर शरीर अपने गुनाहों से, जो उसने किए हैं, बाज़ आ जाए और मेरे तमाम क़वानीन पर चलकर जायज़ और रवाँ काम करे, तो वो यक़ीनन ज़िंदा रहेगा; वो न मरेगा। वो सब जो उसने किए हैं, उसके ख़िलाफ़ महसूब न होंगे। (18:21, 22) 1. जस 177
التائب من الذنب کمن لا ذنب لہ (جص ۱۷۷)۔
तर्जुमा: गुनाह से तौबा करने वाला ऐसा है कि गोया उसका कोई गुनाह ही नहीं। (जस 177)
दानियाल नबी की किताब अहादीस
1. और अहले‑दानिश आफ़ताब की तरह चमकेंगे, और जिनकी कोशिश से बहुत से सादिक़ हो गए, सितारों की मानिंद अबद-उल‑आबाद तक चमकेंगे। (12:3) 1. जस 127
ان مثل العلماء فی الارض کمثل النجوم فی السماء یھتدی بھا ( جص ۱۲۷)
तर्जुमा: ज़मीन पर उलमा की मिसाल आसमान के तारों की मिसाल है, जिनको देखकर लोग चलते हैं। (जस 127)
ज़करियाह नबी की किताब अहादीस
1. ऐ बिन्त‑ए‑सिय्योन, तू निहायत शादमान हो; और ऐ दुख़्तर‑ए‑यरूशलेम, ख़ूब ललकार। क्योंकि देख, तेरा बादशाह आता है; वो सादिक़ है और निजात उसके हाथ में है, और हलीम है, और गधे पर, बल्कि जवान गधे पर, सवार है। (9:9) 1. 5:96,
قال فی لسان العرب (۵: ۹۶) فی حدیث عطا ابشری اوری شلمہ براکب الحماء قال یرید بیت الله المقدس)
तर्जुमा: लिसान‑उल‑अरब (5:96) में लिखा है कि अ़ता की हदीस में आया है:

ऐ यरूशलेम, गधे के सवार पर ख़ुशी कर।
अनाजील मुक़द्दसह अहादीस
1. तू औरतों में मुबारक है, और तेरे पेट का फल मुबारक है। (लूक़ा 1:42) 1. 319
کل بنی آدم یمسہ الشیطان یوم ولدتہ امہ الامریم و ابنھا (۳۱۹) ۔
तर्जुमा: हर एक इंसान को जिस दिन वो पैदा होता है, शैतान छू लेता है, मगर मरयम और उसके बेटे को नहीं छुआ। (जस 319)
2. और जो नहीं, एलिशबा ने मरियम का सलाम सुना, तो ऐसा हुआ कि बच्चा (यह्या) उसके पेट में उछल पड़ा, और एलिशबा रूहुल‑क़ुद्स से भर गई। (लूक़ा 1:41) 2. जस 205
خلق الله یحی بن زکریا فی بطن امہ مومنا (جص ۲۰۵)۔
तर्जुमा: ख़ुदा ने यह्या ज़करिया के बेटे को उसकी माँ के पेट में ईमानदार पाया। (जस 205)
3. ख़ुदा से सब कुछ हो सकता है। (मरक़ुस 10:27)

क्योंकि कोई बात ख़ुदा के नज़दीक नामुमकिन नहीं। (लूक़ा 1:37)
3. जस 25
اذا اراد الله خلق شئی لم یمنعہ شئی (جص ۲۵)۔
तर्जुमा: ख़ुदा जब किसी चीज़ के पैदा करने का इरादा करता है, तो कोई चीज़ उसको नहीं रोक सकती। (जस 25)
4. अफ़सोस तुम पर जो दौलतमंद हो। (लूक़ा 6:24) 4. जस 455
ویل لکا عنیاء من الفقرا ء(جص ۴۵۵)۔
तर्जुमा: अफ़सोस है दौलतमंदों पर। (जस 455)
5. मुबारक हैं वह जो दिल के ग़रीब हैं, क्योंकि आसमान 5. जस 166, 314
نعم الشئی الفقر (جص ۱۶۶) قمت علی باب الجنة فاذا عامة من دخلھا المساکین (جص ۳۱۴)۔
तर्जुमा: ग़रीबी अच्छी चीज़ है। (जस 166)

मैं जन्नत के दरवाज़े पर खड़ा रहा, तो क्या देखता हूँ कि दाख़िल होने वालों में उमूमन ग़रीब थे। (जस 314)
6. तुम दुनिया के नूर हो… इसी तरह तुम्हारी रौशनी आदमियों के सामने चमके, ताकि वो तुम्हारे नेक कामों को देखकर तुम्हारे बाप की, जो आसमान पर है, बड़ाई करें। (मत्ती 15:14, 16) 6. जस 10
اتبعوا العلماء فانھم سرج الدنیا ومصابیح الاخرة (جص ۱۰)۔
तर्जुमा: उलमा की पैरवी करो, क्योंकि वे दुनिया के और आख़िरत के चराग़ हैं। (जस 10)
अनाजील मुक़द्दसह अहादीस
7. तुम ज़मीन के नमक हो। अगर नमक का मज़ा जाता है, तो वो किस चीज़ से नमकीन किया जाएगा। (मत्ती 5:13) 7. जस 402, स 6,
مثل اصحابی کا لملح لا یصلح الطعام الا بہ (جص ۴۰۲) الا یجازو والا عجاز للثعالی (ص ۶)
ومثلہ للشاعر
بالملح تصلح ماتخشی تغیر فیکیف بالملح ان حلت بہ الغیر۔

तर्जुमा: मेरे अस्हाब नमक की तरह हैं, जिसके बिना खाना अच्छा नहीं हो सकता। (जस 402)

एक शाइर कहता है कि:

जिस चीज़ के बिगड़ जाने का ख़ौफ़ हो, वो नमक से अच्छी हो सकती है, लेकिन अगर ख़ुद नमक बिगड़ जाए, तो फिर किस चीज़ से अच्छी हो सकेगी।
8. कबूतरों की मानिंद भोले बनो। (मत्ती 10:16) 8. जस 217
کونوا بلھاً کالحمام (احیاء علوم الدین للغزالی۔ دخلت الجنة فاذا اکثر اھلھا البلہ (جص ۲۱۷) ۔
तर्जुमा: कबूतर की तरह भोले बनो।

इह्या-उलूमुद्दीन ग़ज़ाली में है कि: मैं जन्नत में दाख़िल हुआ, तो जन्नत के अकसर रहने वाले भोले थे। (जस 217)
9. ऐब‑जोई न करो कि तुम्हारी भी ऐब‑जोई न की जाए। क्योंकि जिस तरह तुम ऐब‑जोई करते हो, उसी तरह तुम्हारी भी ऐब‑जोई की जाएगी। और जिस पैमाने से तुम नापते हो, उसी से तुम्हारे लिए नापा जाएगा। (मत्ती 7:1,2) 9. जस 404
مکتوب فی الانجیل کما تدین تدان وبا لکیل الذی تکمیل تکتال ( جص ۴۰۴)۔
तर्जुमा: इंजील में लिखा है कि:

जिस तरह तुम दूसरों के साथ करोगे, उसी तरह तुम्हारे साथ किया जाएगा, और जिस पैमाने से तुम नापते हो, उसी से तुम्हारे वास्ते नापा जाएगा। (जस 4:4)
10. मुबारक हैं वे जो रहम‑दिल हैं, क्योंकि उन पर रहम किया जाएगा। (मत्ती 5:7)

जैसा तुम्हारा बाप रहीम है, तुम भी रहम‑दिल हो। (लूक़ा 6:36)
10. जस 162, मन 115
من یرحمہ الناس یرحمہ الله ومن لا یرحمہ الناس لایرحمہ الله (جص ۱۶۲) کونوا رحما فان الله رحیم یحب کل رحیم (من ۱۱۵)۔
तर्जुमा: जो लोगों पर रहम करता है, ख़ुदा उस पर रहम करता है, और जो लोगों पर रहम नहीं करता, ख़ुदा उस पर रहम नहीं करता। (जस 162)

तुम मेहरबान बन जाओ, क्योंकि ख़ुदा मेहरबान है और वो मेहरबान को प्यार करता है। (मन 115)
11. इसी तरह तुम्हारे साथ मेरा आसमानी बाप भी करेगा, अगर तुम में से हर एक अपने भाई को दिल से माफ़ न करे। (मत्ती 18:35) 11. जस 55, जस 436
اسمحوا یسمع لکمہ (جص ۵۵) من لا یغفر لا یغفر لہ (جص ۴۳۶)۔
तर्जुमा: दरगुज़र करो तो दरगुज़र किए जाओगे। (जस 55) जो माफ़ नहीं करता है, माफ़ नहीं किया जाएगा। (हस 436)
12. ऐ बाप, इन्हें माफ़ कर, क्योंकि ये जानते नहीं कि क्या करते हैं। (लूक़ा 23:34) 12. मन 25
اللھم اغفر مقوی فانھم لایعلمون (من ۲۵)۔
तर्जुमा: इलाही, मेरी क़ौम को बख़्श दे, क्योंकि वे नहीं जानते हैं। (मन 25)
13. पस जो कुछ तुम चाहते हो कि लोग तुम्हारे साथ करें, वही तुम भी उनके साथ करो। (मत्ती 7:12, व लूक़ा 6:31) 13. जस 16, अल‑अग़ानी 19:55, मन 186
احبب للناس ماتحبہ نفسک (جص ۱۶ الاغافی ۱۹: ۵۵) لا یومن احد کم حتی یحب لاخیہ مایحبہ نفسہ من (۱۸۶) ونظمہ الشاعر فقال:

واضع الی الناس کمثل الذی تختاران یصنعہ الناس بد ۔

तर्जुमा: जो अपने लिए पसंद करता है, लोगों के लिए भी वही पसंद कर। (जस 16)

अल‑अग़ानी (19:55) तुम में से कोई ईमानदार नहीं बनता, जब तक वो जो अपने लिए पसंद करता है, वो अपने भाई के लिए पसंद न करे। (मन 186)

एक शाइर कहता है कि:

तू लोगों के साथ वही कर, जो तू चाहता है कि लोग तेरे साथ करें।
14. इब्ने‑आदम इस लिए नहीं आया कि लोगों को हलाक करे, बल्कि इस लिए कि लोगों को बचाए। (लूक़ा 9:52) 14. जस 135
انما بعثت رحمة ولم ابعث عذاباً (جص ۱۳۵)۔
तर्जुमा: मैं रह़मत बनाकर भेजा गया हूँ, न कि अ़ज़ाब। (जस 135)
15. तू क्यों अपने भाई की आँख के तिनके को देखता है और अपनी आँख के शहतीर पर ग़ौर नहीं करता है। ऐ रियाकार, पहले अपनी आँख में से तो शहतीर निकाल, फिर अपने भाई की आँख में से तिनके को अच्छी तरह देखकर निकाल सकेगा। (मत्ती 7:3, 5) 15. जस 26, 14:170, जस 467
اذا ردت ان تذکر عیوب غیک فاذکر عیوب نفسک (جص ۲۶)روی فی الاغانی لسکنیة بنت الحسین بن علی (۱۴: ۱۷)افی والله وایاک کالذی یری الشعرة فی عین صاحبہ والایری الخشبة فی عینہ ۔ یبصرا احد کم القدی فی عین اخیہ وینسی الجذع فی عینہ (جص ۴۶۷)۔
तर्जुमा: जब तू दूसरों की ऐब‑जोई करना चाहे, तो बेहतर है कि तू अपनी ऐब‑जोई करे। (जस 26) अल‑अग़ानी (14:170) में बीबी सकिनह बिन्त हज़रत इमाम हुसैन के मुतअ़ल्लिक़ रिवायत है कि:

क़सम ख़ुदा की, मैं और तुम उस शख़्स की तरह हैं जो अपने भाई की आँख में छोटा‑सा बाल देखता है, लेकिन अपनी आँख की लकड़ी नहीं देखता।

तुम में से हर एक अपने भाई की आँख का तिनका देखता है, लेकिन अपनी आँख का शहतीर नहीं देखता। (जस 467)
16. तुम सब भाई हो। (मत्ती 23:8) 16. जस 440
المسلمہ اخو المسلمہ (جص ۴۴۰)
तर्जुमा: मुसलमान मुसलमान का भाई है। (जस 440)
17. मैं तुम से कहता हूँ कि अपने दुश्मनों से मुहब्बत रखो। अपने सताने वालों के लिए दुआ माँगो। (मत्ती 5:44, लूक़ा 11:37)

क्योंकि तुम अगर अपने मुहब्बत रखने वालों ही से मुहब्बत रखो, तो तुम्हारे लिए क्या अज्र है। महसूल लेने वाले भी ऐसा नहीं करते। (मत्ती 5:46)
17. जस 256, जस 66, 303
صل من قطعک واحسن الی من اساء الیک (جص ۲۵۶) الفضل فی ان تصل من قطعک وتعفو عمن ظلمک (جص ۶۶، ۳۰۳)۔
तर्जुमा: उस से ताल्लुक़ पैदा करो जो तुझ से क़तअ़‑ए‑ताल्लुक़ करता है। उस के साथ नेकी कर जो तुझ से बदी करता है। (जस 256)

फ़ज़ीलत इस में है कि तू उस से ताल्लुक़ पैदा करे जो तुझ से अलैहदा होना चाहता है, और उस को माफ़ करे जो तुझ पर ज़ुल्म करता है। (जस 66, 303)
18. आदमी के दुश्मन उसके घर ही के लोग होंगे। (मत्ती 10:36) 18. जस 60
اعدی عدوک زوجتک وما ملکت یمینک (جص ۶۰)۔
तर्जुमा: तेरा सब से बड़ा दुश्मन तेरी बीवी और दीगर मुतअ़ल्लिक़ीन हैं। (जस 60)
19. उस वक़्त पतरस ने पास आकर उस से कहा, ऐ ख़ुदावंद, अगर मेरा भाई गुनाह करे, तो मैं कितनी दफ़ा उसे माफ़ करूँ… बल्कि सात दफ़ा के सत्तर गुनाह तक। (मत्ती 18:21, 22) 19. मन 19
اعف عن الخادم کل یوم سبعین مرة ( من ۱۹)۔
तर्जुमा: अपने ख़ादिम को हर रोज़ सत्तर बार माफ़ कर। (मन 19)
20. और यूहन्ना बपतिस्मा देने के दिनों से अब तक आसमान की बादशाहत पर ज़ोर होता रहा है, और ज़ोर‑आवर उसे छीन लेते हैं। (मत्ती 11:12) 20. मन 69, ख 3:191, जस 113
حفت الجنة بالمکارہ الثعابی المحاضرة والتمثیل من نسخنا وفی الایجا بز والا عجازلہ ص ۶: ۷ من ۶۹) ان ابواب الجنة تحت اظلال السیوف (خ ۳: ۱۹ حص ۱۱۳)۔
तर्जुमा: जन्नत तकलीफ़ों से घिरी होती है। (मन 69)

जन्नत के दरवाज़े शमशीरों के साए के नीचे हैं। (ख 3:191, जस 113)
21. जो कोई बाप या माँ को मुझ से ज़्यादा अज़ीज़ रखता है, वो मेरे लायक़ नहीं। और जो कोई बेटे या बेटी को मुझ से ज़्यादा अज़ीज़ रखता है, वह मेरे लायक़ नहीं। (मत्ती 10:37) 21. ख 1:9
لایومن احدکم حتی اکون حب الیہ من ولد وہ ولد ہ والناس اجمعین ۔ (۱: ۹)۔
तर्जुमा: तुम में से कोई ईमानदार नहीं हो सकता जब तक वो मुझ को अपने बाप और बेटे और तमाम लोगों से ज़्यादा प्यार न करे। (ख 1:9)
22. यसू ने उस से कहा, तू, तो मुझे देखकर ईमान लाया है। मुबारक वो हैं जो बग़ैर देखे ईमान लाए। (यूहन्ना 20:29) 22. जस 271
طوبی لمن رآنی وآمن بی طوبی لمن آمن بی ولمہ یرنی (جص ۲۷۱)۔
तर्जुमा: मुबारक है वो शख़्स जिसने मुझे देखा और ईमान लाया, और मुबारक है वो शख़्स जिसने मुझे नहीं देखा और ईमान लाया। (जस 271)
23. फ़क़ीह और फ़रीसी… जो कुछ तुम्हें बताएँ, वो सब करो और मानो, लेकिन उनके से काम न करो। (मत्ती 23:2,3) 23. जस 143
انظرو اقریشا فخدوا من قولھم وذرو۔ افعلم (جص ۱۴۳)۔
तर्जुमा: क़ुरैश जो कहें वह करो, लेकिन उनके अफ़आल से बचो। (जस 143)
24. जो क़ैसर का है, वो क़ैसर को और जो ख़ुदा का है, वो ख़ुदा को अदा करो। (मत्ती 22:20) 24. रिवायत इह़्या-उलूमुद्दीन लिल‑ग़ज़ाली
ادو الکامراء حقھم واسا لو الله حقکمہ (روایة احیاء علوم الدین للغزالی)
तर्जुमा: अमीरों का ह़क़ अदा करो, और ख़ुदा से अपना ह़क़ तलब करो। (इह़्या इमाम ग़ज़ाली)
25. उस वक़्त रास्तबाज़ अपने बाप की बादशाहत में आफ़ताब की मानिंद चमकेंगे। (मत्ती 13:43) 25. जस 116
ان اھد علیین یشرف احد ھم علی اھل الجنة فیضی وجھہ لاھد الجنة کما یضی القمر لیلة البدر لاھل الدنیا (جص ۱۱۶)۔
तर्जुमा: अह़ले‑इलिय्यीन में से एक अह़ले ‑जन्नत पर ज़ाहिर होगा। उस वक़्त उसका चेहरा जन्नत वालों पर ऐसा चमकेगा, जिस तरह पूरा चाँद दुनिया वालों पर चमकता है। (जस 116)
26. झूठे नबियों से ख़बरदार रहो, जो तुम्हारे पास भेड़ों के भेस में आते हैं, मगर बातिन में फाड़ने वाले भेड़िए। (मत्ती 7:15) 26. सहीह मुस्लिमह 6:4
ان بین یدی الساعة کذا بین فاحذروھم (صحیح مسلمہ ۶: ۴)۔

ومثلہ للشاعر

وذا الذئاب استنحجت لک مرہ فحذار منھا ان تعود ذما با لذئب اخبت مایکون اذا بدا متبساً بین النعاج اھا با۔

तर्जुमा: क़ियामत के नज़दीक बहुत झूठे पैदा होंगे, उनसे डरो। (म 6:4)

एक शाइर कहता है कि:

जब भेड़िए बकरी के लिबास में ज़ाहिर हों, तो उनसे डरो, क्योंकि वो फिर भेड़िया ही बनेगा। सबसे ख़बीस भेड़िया वही है जो बकरियों की खाल में ज़ाहिर हो।
27. माँगो तो तुम्हें दिया जाएगा। ढूँढो तो पाओगे। दरवाज़ा खटखटाओ तो तुम्हारे लिए खोला जाएगा। (मत्ती 7:3) 27. मन 130, जस 85,
من طلب شیئاً وجد وجد من قرع الباب ولج ولج (من ۱۳۰) سل تعط (جص ۸۵)۔
तर्जुमा: जो माँगता है और कोशिश करता है, जो खटखटाता और इसरार करता है, दाख़िल होता है। (मन 130)

माँग कि तुझे दिया जाएगा। (जस 85)
28. हवा के परिंदों को देखो कि न बोते हैं, न काटते, न कोठियों में जमा करते हैं, तो भी तुम्हारा आसमानी बाप उन्हें खिलाता है। (मत्ती 6:26) 28. जस 368
دوانکمہ تتو کلون علی الله حق توکلہ لرز قکمہ کما ترزق الطیر تغد وخما صاً وتروح بطانا (جص ۳۶۸)۔
तर्जुमा: अगर तुम ख़ुदा पर कामिल भरोसा करो, तो वो तुम को ऐसा ही रिज़्क़ पहुँचाएगा, जिस तरह परिंदों को पहुँचाता है, कि वे सुबह भूखे उठते हैं और शाम को सेर हो जाते हैं। (जस 368)
29. जब दुआ माँगो तो इस तरह माँगो कि ऐ हमारे बाप जो आसमान पर है, तेरा नाम पाक माना जाए। तेरी बादशाही आए। तेरी मर्ज़ी जैसी आसमान पर होती है, ज़मीन पर भी हो। (मत्ती 6:9,10) 29. ह़दीस अबी दाऊद 1:101
اذاتا لمہ احداو تالمہ خوہ فلیقل ربنا انت فی السماء لتیقد س اسمک لیکن ملکو تک فی السماء والا رض۔ (حدیث ابی داؤد ۱: ۱۰۱)۔
तर्जुमा: जब कोई शख़्स या उसका भाई तकलीफ़ में हो, तो कहे: “ऐ हमारे रब, तू जो आसमान पर है, तेरा नाम पाक माना जाए, तेरी बादशाही आसमान और ज़मीन पर क़ायम हो जाए।” (अबू दाऊद 1:101)
30. जब तू ख़ैरात करे, तो तेरा दहना हाथ करता है, उसे तेरा बायाँ हाथ न जाने। इस सूरत में तेरा बाप जो पोशीदगी में देखता है, तुझे बदला देगा। (मत्ती 6:4) 30. ख 1:71
فی صحیح البخاری (۱: ۷۱) یمدالله یوم الدین من عمل الصدقة سراً بحیث لاتعلمہ یدہ الشمال مافعلة یمینہ۔
तर्जुमा: क़ियामत के दिन ख़ुदा उस शख़्स को बढ़ाएगा, जिसने इस तरह पोशीदा ख़ैरात दी हो कि उसके बाएँ हाथ को इल्म न हो कि उसके दाएँ हाथ ने क्या किया। (ख 1:71)
31. और जिस किसी ने घरों या भाइयों या बहनों या बाप या माँ या बच्चों या खेतों को मेरे नाम की ख़ातिर छोड़ दिया है, उस को सौ गुना मिलेगा, और हमेशा की ज़िंदगी का वारिस होगा। (मत्ती 19:29) 31. जस 96
ان الله تعالیٰ لا یظلمہ المومن حسنة یعطلی علیھا فی الدنیا ویثاب علیھا فی الاخرة (جص ۹۶) ۔
तर्जुमा: ख़ुदा मोमिन की नेकी को कम नहीं करेगा। दुनिया में उसको उसका बदला मिलेगा, और क़ियामत में सवाब। (जस 96)
32. और जो कोई शागिर्द के नाम से इन छोटों में से किसी को सिर्फ़ एक प्याला ठंडा पानी ही पिलाएगा, मैं तुम से सच कहता हूँ कि वो अपना अज्र हरगिज़ न खोएगा। (मत्ती 10:42) 32. मन 104
من سقی عطشاناً ً فار واہ فتح لہ باب الجنة (من ۱۰۴) ۔
तर्जुमा: जो शख़्स किसी प्यासे को पेट भर पानी पिलाएगा, उसके लिए जन्नत का दरवाज़ा खोला जाएगा। (मन 104)
33. क्योंकि जो कोई अपने आप को बड़ा बनाएगा, वो छोटा किया जाएगा, और जो अपने आप को छोटा बनाएगा, वो बड़ा किया जाएगा। (लूक़ा 14:11) 33. मन 151, जस 414
من تکبر وضعہ الله (من ۱۵۱) من تواضع الله رفعہ ومن تجبر قمعہ (جص ۴۱۴)۔
तर्जुमा: जो तकब्बुर करता है, ख़ुदा उसको नीचा दिखाएगा। (मन 151) जो तवाज़ुअ़ करता है, ख़ुदा उसको सरबलंद करता है। जो ज़ुल्म करता है, ख़ुदा उसको बरबाद करेगा। (जस 414)
34. जब कोई तुझे बुलाए, तो सद्र जगह पर न बैठ, बल्कि सब से नीची जगह पर बैठ। (लूक़ा 14:7, 11) 34. जस 410
ان من التواضع الرضی بالدون من شرف المجالس (جص ۴۱۰)۔
तर्जुमा: तवाज़ुअ़ ये है कि मजलिस में सब से पायें पर राज़ी हो जाए। (जस 42)
35. जो तुम में बड़ा होना चाहिए, वो तुम्हारा ख़ादिम बने, और जो तुम में अव्वल होना चाहे, वो सब का ग़ुलाम बने। (मरक़ुस 10:43, 44) 35. जस 244, मन 86
سید القوم خادمھم (جص ۲۴۴ من ۸۶)۔
तर्जुमा: क़ौम का ख़ादिम उनका सरदार है। (जस 244, मन 86)
36. ऊँट का सुई के नाके में से निकल जाना, उस से आसान है कि दौलतमंद का ख़ुदा की बादशाहत में दाख़िल हो जाना। (मत्ती 19:24) 36. जस 301, व सूरह अ़राफ़ 38
فی اصحابی اثنا عشر منافقاً منھم ثمانیة لایدخلون الجنہ حتی یلج الجمل فی سم لایرة (جص ۳۰۱وسورہ اعراف ۳۸)۔
तर्जुमा: मेरे अस्हाब में 12 मुनाफ़िक़ हैं। उन में आठ ऐसे हैं कि जन्नत में दाख़िल न होंगे, जब तक ऊँट सुई के नाके में दाख़िल न हो। (जस 301, सूरह अ़राफ़ 38)
37. पाक चीज़ को कुत्तों को न दो, और अपने मोती सुअरों के आगे न डालो। (मत्ती 7:6) 37. जस 461, मन 192
لا تطر حوالدر فی افواہ الکلاب (جص ۴۶۱) لا نظر حوالدار تحت ارجد الخنا زیر (من ۱۹۲) وتمثیل تعالبی۔
तर्जुमा: मोती को कुत्तों के मुँह में मत फेंको। (जस 461)

मोती को सुअरों के पाँवों के नीचे मत फेंको। (मन 192) व तम्सील तआ़लबी।
38. जो अपनी जान को अज़ीज़ रखता है, वो उसको खो देता है, और जो दुनिया में अपनी जान से अदावत रखता है, वो उसे हमेशा की ज़िंदगी के लिए महफ़ूज़ रखेगा। (यूहन्ना 2:25) 38. जस 408
من احب دنیاہ اضربآخرتہ من احب آخرة اضربار نیا فآ اثرو اما بقی علی مایفنی (جص ۴۰۸)۔
तर्जुमा: जो शख़्स दुनिया को प्यार करता है, वो अपनी आख़िरत का नुक़सान करता है। पस तुम फ़ानी चीज़ के बदले बाक़ी रहने वाली चीज़ को इख़्तियार करो। (जस 408)
39. अपने लिए आसमान पर माल जमा करो। (मत्ती 6:20) 39. जस 436
من یتنرو ودفی الدنیا نیفعہ فی آلاخرة (جص ۴۳۶)۔
तर्जुमा: जो शख़्स दुनिया में ज़ाद‑ए‑आख़िरत तैयार करता है, उसको आख़िरत में फ़ायदा देगा। (जस 436)
40. देखो लूक़ा की इंजील (15:4, 10) में लिखा है कि:

इसी तरह एक तौबा करने वाले गुनहगार की बाबत ख़ुदा के फ़रिश्तों के सामने ख़ुशी होगी।
40. जस 357
الله افرح تبوبة عبدہ من العقیم اوالدین ومن انصال الواجد ومن الظلسمآن الوارد (جص ۳۵۷)۔
तर्जुमा: ख़ुदा अपने बन्दे की तौबा पर उस से ज़्यादा ख़ुश होता है जितना बाँझ के बच्चा पैदा होने पर, और खोई हुई चीज़ के मिल जाने पर, और प्यासे को पानी मिल जाने पर ख़ुशी होती है। (जस 357)
41. अफ़सोस तुम पर जो हँसते हो, क्योंकि तुम मातम करोगे और रोओगे। (लूक़ा 6:25) 41. जस 410
من اذنب وھو یضحک دخل النارہ وھویبکی ۔(جص ۴۱۰)۔
तर्जुमा: जो गुनाह करता है और हँसता है, आग में दाख़िल होगा और रोएगा। (जस 410)
42. मगर जो आख़िर तक बरदाश्त करेगा, वही निजात पाएगा। (मत्ती 10:26) 42. जस 444
النصرح مع الصبر والفر ج الکرب وان من العسر لیراً (جص ۴۴۴)۔
तर्जुमा: फ़तह़मंदी सब्र के साथ, राहत तकलीफ़ के साथ जुड़ी है, और तंगदस्ती दौलतमंदी के साथ। (जस 444)
43. अच्छा आदमी अच्छे ख़ज़ाने से अच्छी चीज़ें निकालता है, और बुरा आदमी बुरे ख़ज़ाने से बुरी चीज़ें निकालता है। (मत्ती 12:35) 43. जस 232
الرجل اصالح یاتی بالخبر الصالح والر جل السویاقی۔بالخبر السوء (جص ۲۳۲)۔
तर्जुमा: नेक शख़्स नेक और बराबरी ख़बर लाता है। (जस 232)
44. जिस किसी ने बुरी ख़्वाहिश से किसी औरत पर निगाह की, वो अपने दिल में उसके साथ ज़िना कर चुका। (मत्ती 5:28) 44. जस 234
زنا العینین النظر (جص ۲۳۴)۔
तर्जुमा: आँखों का ज़िना बुरी निगाह है। (जस 234)
45. ऐ रियाकार फ़क़ीहों और फ़रीसियों, तुम पर अफ़सोस कि नबियों की क़ब्रें बनाते और रास्तबाज़ों के मक़बरे आरास्ता करते हो। (मत्ती 23:29) 45. ख 2:83
لعن الله لیھود ۔ اتحذ واقبور انبیاء ئھم مساجد (خ ۲: ۸۳)۔
तर्जुमा: ख़ुदा यहूद पर लअ़नत करे, जिन्होंने अपने अंबिया की क़ब्रों को मस्जिद बनाया। (ख 2:83)
46. ऐ रियाकार फ़क़ीहों और फ़रीसियों, तुम पर अफ़सोस कि तुम सफ़ेदी फिरी हुई क़ब्रों की मानिंद हो, जो ऊपर से तो ख़ूबसूरत। 46. जस 104
مثل الفاجر کمثل القبر المشرف المجصص یعجب من راہ وجونہ ممتلی نتنا (جص ۱۰۴)۔
तर्जुमा: बदकार शख़्स उस क़ब्र की तरह है जो ऊपर से चूने से पकी और ख़ूबसूरत हो, लेकिन उसके अंदर बदबू से भरी हुई हो। (जस 401)
47. अगर तू ज़िंदगी में दाख़िल होना चाहे, तो हुक्मों पर अमल करो। (मत्ती 19:17) 47. जस 148
من اشتاق الی الجنة سابق الی الخیرات (جص ۱۴۸) ۔
तर्जुमा: वो नेकी में सबक़त करे। (जस 148)
48. इन सब को निकाल दिया जो हैकल (बैतुल्लाह) में ख़रीद व फ़रोख़्त कर रहे थे। (मत्ती 21:12) 48. जस 445
نھی عن الشری والببع فی المسجد (جص ۴۴۵)۔
तर्जुमा: मस्जिद में ख़रीद‑ओ‑फ़रोख़्त से मना किया गया है। (जस 445)
49. वो वक़्त आता है कि जितने क़ब्रों में हैं, उसकी आवाज़ सुन कर निकलेंगे। जिन्होंने नेकी की है, ज़िंदगी की क़ियामत के वास्ते, और जिन्होंने बदी की है, सज़ा की क़ियामत के वास्ते। (यूहन्ना 5:28, 29) 49. सूरह अल‑हज्ज 7, 55
ان الساعة آتیة لا ریب فیھا وان الله یبعث من فی القبورا ملک یومذ الله یحکم بینھم فالذین آمنوا وعملوا الصالحاف فی جنات النعیم والذین کفرو ۔۔۔۔ فاولک لھم عذاب مھین (سورة الحج ۷، ۵۵)۔
तर्जुमा: इसमें कोई शक नहीं कि क़ियामत आने वाली है और ख़ुदा उन सब को ज़िंदा करेगा जो क़ब्रों में हैं। उस दिन ख़ुदा की बादशाहत होगी और ख़ुदा हुकूमत करेगा। पस जिन्होंने अच्छे काम किए, वे जन्नत में होंगे, और जिन्होंने बुरे काम किए, वे दोज़ख़ में जाएँगे। (सूरह हज्ज 7, 55)
50. बल्कि उसने अदालत का सारा काम बेटे के सुपुर्द कर दिया है। (यूहन्ना 5:22) 50. जस 382
لیھبطن ۔ عیسی بن مریم حکماً واما ماً مقسطاً (جص ۳۸۲)۔
तर्जुमा: ज़रूर ईसा इब्न मरियम हाकिम और इमाम और आदिल होकर उतरेंगे। (जस 382)
51. फिर उसने उन से कहा, क़ौम पर क़ौम, बादशाहत पर बादशाहत चढ़ाई करेगी, और बड़े‑बड़े भोंचाल आएँगे, और जा‑ब‑जा काल और मरी पड़ेगी, और आसमान पर बड़ी‑बड़ी दहशतनाक बातें और निशानियाँ ज़ाहिर होंगी। (लूक़ा 20:10,11) 51. सहीह़ अल‑बुख़ारी 2:21,
فی صحیح البخاری (۲:۲۱)۔

لا تقوم الساعة حتی یقبض العملہ وتکثر الذلازل ویتقارب الزمان وتظھر الفتن ویکثر الھرج ۔

तर्जुमा: क़ियामत न होगी जब तक इल्म न उठ जाए, कसरत से ज़लज़ले आएँगे, और शोर शर पैदा होंगे। (ख 2:21)
52. आदमियों के हुक्म की निस्बत ख़ुदा का हुक्म मानना ज़्यादा फ़र्ज़ है। (आमाल 5:29) 52. मन 184
لا طاعة لمخلوق فی معیصة الخالق ( من ۱۸۴)۔
तर्जुमा: मख़्लूक़ की फ़रमाँबरदारी ख़ुदा की नाफ़रमानी में जायज़ नहीं। (मन 184)
53. क्या तुम नहीं जानते कि बदकार ख़ुदा की बादशाहत के वारिस न होंगे। (1 कुरिन्थियों 6:9) 53. मन 36
ان الجنہ لا تحل لعاصٍ (من ۳۶)
तर्जुमा: किसी गुनाहगार के लिए जन्नत हलाल नहीं। (मन 36)
54. रास्तबाज़ों के लिए ईमान लाना दिल से होता है, और निजात के लिए इक़रार मुँह से किया जाता है। (रोमियों 10:10) 54. जस 163
الایمان اقرار باللسان وتصدق بالقلب عمل بالا رکان ۔(جص ۱۶۳)۔
तर्जुमा: ईमान ज़बान से इक़रार करना, दिल से तस़्दीक़ करना, और अ़ज़ा से अ़मल करना है। (जस 163)
55. हर एक आदमी झूठा है। (रोमियों 3:4) 55. जस 114
کل ابن آدم خطاء (جص ۱۱۴)۔
तर्जुमा: हर बनी‑आदम ख़ताकार है। (जस 114)
56. दीनदारी के लिए रियाज़त कर, दीनदारी सब बातों के लिए फ़ायदे‑मंद है। आइंदा ज़िंदगी का भी उसी के लिए वादा है। (1 तिमुथियुस 4:7, 8) 56. जस 280, मन 98
علیک بتقوی الله فانھا جماع کل خیر ( جص ۲۸۰ من ۹۸)۔
तर्जुमा: ख़ुदा से डरना हर नेकी का जामेअ़ है। (जस 280, मन 98)
57. हर शख़्स आ’ला हिकमतों के ताबेदार रहे, क्योंकि कोई हुकूमत ऐसी नहीं जो ख़ुदा की तरफ़ से न हो। पस जो कोई हुकूमत का सामना करता है, वो ख़ुदा के इंतज़ाम का मुख़ालिफ़ है, और जो मुख़ालिफ़ है, वो सज़ा पाएँगे। (रोमियों 3:1, 2) 57. जस 247
السلطان ظل الله فی لارض فمن اکرمہ کرمہ الله ومن اھانہ اھانہ الله (جص ۲۴۷)۔
तर्जुमा: बादशाह ज़मीन पर ख़ुदा का साया है। जो उसकी तकरीम करता है, ख़ुदा उसकी तकरीम करता है, और जो उसकी तौहीन करता है, ख़ुदा उसकी तौहीन करता है। (जस 247)
58. जो चीज़ें न आँखों ने देखीं, न कानों ने सुनीं। (1 कुरिन्थियों 2:9) 58. जस 120
ان فی الجنة ما لاعین رات ولا اذن سمعت ولا خطر علی قلب احد (جص ۱۲۰) ۔
तर्जुमा: जन्नत में वह है जिसे न आँख ने देखा है, न कान ने सुना है, और न किसी के दिल में गुज़रा है। (जस 120)
59. पस वो जिस पर चाहता है रहम करता है, और जिसे चाहता है सख़्त करता है। (रोमियों 9:18) 59. सूरह 34 अल‑मुद्दस्सिर
یضل الله من یشباء ویھدی من یشاء (سورة ۳۴ المدثر )۔ ۔
तर्जुमा: ख़ुदा जिस को चाहता है गुमराह करता है और जिस को चाहता है हिदायत देता है। (सूरह मुद्दस्सिर 34)
60. बिदअ़ती शख़्स से किनारा कर। (तीतुस 3:10) 60. इरशादुत‑तालिबीन 8
ایاکم ومحد ثات الامور فان کل محدثة بدعة وکلب بدعة ضالال، (ارشاد الطالبین ۸)۔
तर्जुमा: नई बातों से बचो, क्योंकि हर नई चीज़ बिदअ़त है और हर बिदअ़त गुमराही है। (इरशादुत‑तालिबीन, सफ़्हा 8)
61. किसी तरह से किसी के फ़रेब में न आना, क्योंकि वो दिन नहीं आएगा, जब तक कि पहले बरगश्तगी न हो और वो गुनाह का शख़्स यानी हलाकत का फ़र्ज़न्द ज़ाहिर न हो, जो मुख़ालफ़त करता है और हर एक से जो ख़ुदा या मअबूद कहलाता है, अपने आप को बड़ा ठहराता है… जिसे ख़ुदावन्द यसू अपने मुँह की फूँक से हलाक करेगा। (2 थिस्सलुनीकियों 2:3, 4) 61. जस 365, जस 381
لم یسلط علی الدحال الاعیسی بن مریم (جص ۳۶۵)۔ لیقتلین ابن مریم الدجال بباب لد (جص ۳۸۱)۔
तर्जुमा: बजुज़ ईसा इब्ने मरयम कोई दज्जाल पर ग़ालिब नहीं आ सकता है। (जस 365)

इब्ने मरयम दज्जाल को बाब‑ए‑लुद्द में ज़रूर क़त्ल करेंगे। (जस 381)
62. ईमान भी अगर उसके साथ आमाल न हों, तो अपनी ज़ात से मुर्दा है। (याक़ूब 2:15, 16) 62. जस 56,
الایمان قول وعمل (جص ۵۶)
तर्जुमा: ईमान क़ौल व अ़मल का नाम है। (जस 56)
63. याक़ूब का ख़त (3:2, 5-6)

देखो हम अपने क़ाबू में करने के लिए घोड़ों के मुँह में लगाम देते हैं तो उनके सारे बदन को भी घुमा सकते हैं।.... इसी तरह ज़बान भी एक छोटा सा 'उज़्व है और बड़ी शेख़ी मारती है। देखो थोड़ी सी आग से कितने बड़े जंगल में आग लग जाती है। 6ज़बान भी एक आग है ज़बान हमारे आज़ा में शरारत का एक आ'लम है और सारे जिस्म को दाग़ लगाती है और दाइरा दुनिया को आग लगा देती है और जहन्नुम की आग से जलती रहती है।
63. जस 70, जस 15, मन 6
اکثر الناس ننزباً یوم القیامة اکثر خطایا ابن آدم فی لسانہ (جص ۷۰)حب الاعمال الی الله حفظ للسان (جص ۱۵: من ۶)۔
तर्जुमा: क़ियामत के दिन वही ज़्यादा गुनहगार साबित होगा जिसने ज़्यादा कलाम किया है। बनी‑आदम की ख़ताएँ अक्सर उनकी ज़बान में हैं। (जस 70)

ख़ुदा के नज़दीक सबसे प्यारा काम ज़बान की निगहदाश्त है। (जस 15, मन 6)
64. दुनिया से दोस्ती करना ख़ुदा से दुश्मनी करना है। (याक़ूब 4:4) 64. जस 196, मन 68, जस 110
حب الدنیا راس کل خطیة (جص ۱۹۶۔ من ۶۸) ۔
तर्जुमा: दुनिया की मुहब्बत तमाम ख़ताओं की चोटी है। (जस 192, मन 68)
65. जो दुआ ईमान के साथ होगी, उसके बाइस बीमार बच जाएगा। (याक़ूब 5:15) 65. जस 110
قم فصل ان فی الصلاة شفاء(جص ۱۱۰)۔
तर्जुमा: उठ, इबादत कर, इबादत में शिफ़ा है। (जस 110)
66. ख़ुदावन्द से डरो, बादशाह की इज़्ज़त करो। (1 पतरस 2:17, 18) 66. मन 56
یجلو المشائح (من ۵۶) ۔
तर्जुमा: बुज़ुर्गों की इज़्ज़त करो। (मन 56)
67. क्योंकि उसको (ख़ुदा को) वैसा ही देखेंगे जैसा वो है। (1 यूहन्ना 3:2) 67. मन 145
انکمہ سترون ربکمہ یوم القیامة عماناً ۔ (من ۱۴۵) ۔
तर्जुमा: तुम ख़ुदा को क़ियामत के दिन खुले तौर पर देखोगे। (मन 45)
68. मैं जिन‑जिन को अज़ीज़ रखता हूँ, उन सब को मलामत और तंबीह करता हूँ। (मुकाशफ़ात 3:19) 68. जस 23
اذا احب الله عبداً ابتلاہ (جص ۲۳)۔
तर्जुमा: जब ख़ुदा किसी को प्यार करता है, तो उसको इब्तिला में डालता है। (जस 23)
69. और उसमें (आसमान की बादशाहत में) कोई नापाक चीज़, कोई शख़्स जो घिनौने काम करता है, झूटी बातें गढ़ता है, हरगिज़ दाख़िल न होगा। (मुकाशफ़ात 22:27) 69. जस 102, 162
تنظفوا فانہ لابدخل الجنة الا نطیف (جص ۱۰۲ و۱۶۲)۔
तर्जुमा: पाक हो जाओ, क्योंकि जन्नत में पाक के सिवा और कोई दाख़िल न होगा। (जस 102, 212)
70. मैं अल्फ़ा और ओमेगा, यानी इब्तिदा और इंतिहा हूँ। (मुकाशफ़ात 21:6) 70. जस 134
انما بعثت فاتحا ً وخاتماً (جص ۱۳۴)۔
तर्जुमा: मैं इब्तिदा और इंतिहा में भेजा गया हूँ। (जस 134)

फ़ैज़‑ए‑सोम

अंबिया


      गुज़श्ता अबवाब में हम ने ये बतलाया कि किस तरह अहले‑अरब ने इस्लाम से क़ब्ल अहले‑किताब से इल्म‑ए‑इलाहियात का इक्तिसाब किया। इस बाब में हम उन तारीख़ी मआरिफ़ का ज़िक्र करेंगे, जिन का तअ़ल्लुक़ क़िससुल‑अंबिया के साथ है। और यह इलाहियात की आख़िरी बहस है। क़िससुल‑अंबिया का सिलसिला हज़रत आदम अ़लैहिस्सलाम से शुरू होता है। लेकिन हज़रत आदम का क़िस्सा उस वक़्त तक मुकम्मल नहीं समझा जा सकता, जब तक तख़्लीक़ का ज़िक्र न किया जाए। इस लिए हम अव्वल किताब‑ए‑पैदाइश के पहले बाब से उसके तीसरे बाब की 21वीं आयत तक नक़्ल करेंगे, जिन से मालूम होता है कि किस तरह ख़ुदा ने अव्वल आसमान फिर ज़मीन और फिर नबातात और फिर हैवानात और आख़िर में इंसान को ख़ल्क़ किया, और फिर हम बतलाएँगे कि किस तरह ये बातें अरबों में फैल गईं।

तख़्लीक़‑ए‑आलम अज़ किताब‑ए‑पैदाइश


      ख़ुदा ने इब्तिदा में ज़मीन व आसमान को पैदा किया, और ज़मीन वीरान और सुनसान थी, और गहराव के ऊपर अंधेरा था, और ख़ुदा की रूह पानी की सतह पर जुम्बिश करती थी।

       और ख़ुदा ने कहा कि रौशनी हो जा, और रौशनी हो गई। और ख़ुदा ने देखा कि रौशनी अच्छी है। और ख़ुदा ने रौशनी को तारीकी से जुदा किया। और ख़ुदा ने रौशनी को तो दिन कहा, और तारीकी को रात। और शाम हुई और सुबह हुई, सो पहला दिन हुआ।

      और ख़ुदा ने कहा कि पानीयों के दरमियान फ़ज़ा हो, ताकि पानी पानी से जुदा हो जाए। पस ख़ुदा ने फ़ज़ा को बनाया, और फ़ज़ा के नीचे के पानी को फ़ज़ा के ऊपर के पानी से जुदा किया, और ऐसा ही हुआ। और ख़ुदा ने फ़ज़ा को आसमान कहा। और शाम हुई और सुबह हुई, सो दूसरा दिन हुआ।

      और ख़ुदा ने कहा कि आसमान के नीचे का पानी एक जगह जमा हो कि ख़ुश्क़ी नज़र आए, और ऐसा ही हुआ। और ख़ुदा ने ख़ुश्क़ी को ज़मीन कहा, और जो पानी जमा हो गया था, उसको समुंदर। और ख़ुदा ने देखा कि अच्छा है। और ख़ुदा ने कहा कि ज़मीन घास और बीज‑दार बूटियों को और फल‑दार दरख़्तों को, जो अपनी‑अपनी जिन्स के मुताबिक़ फलें और जो ज़मीन पर अपने आप ही में बीज रखें, उगाए, और ऐसा ही हुआ। तब ज़मीन ने घास और बूटियों को, जो अपनी‑अपनी जिन्स के मुताबिक़ उनमें हैं, उगाया, और ख़ुदा ने देखा कि अच्छा है। और शाम हुई और सुबह हुई, सो तीसरा दिन हुआ।

       और ख़ुदा ने कहा कि फ़लक़ पर नय्यर हों कि दिन को रात से अलग करें, और वे निशानियों और ज़मानों और दिनों और बरसों के इम्तियाज़ के लिए हों, और वे फ़लक़ पर अनवार के लिए हों कि ज़मीन पर रौशनी डालें, और ऐसा ही हुआ। सो ख़ुदा ने दो बड़े नय्यर बनाए, एक नय्यर‑ए‑अकबर कि दिन पर हुक्म करे, और एक नय्यर‑ए‑अस्ग़र कि रात पर हुक्म करे, और उसने सितारों को भी बनाया। और ख़ुदा ने उनको फ़लक़ पर रखा कि ज़मीन पर रौशनी डालें, और दिन पर और रात पर हुक्म करें, और उजाले को अंधेरे से जुदा करें। और ख़ुदा ने देखा कि अच्छा है। और शाम हुई और सुबह हुई, सो चौथा दिन हुआ।

       और ख़ुदा ने कहा कि पानी जानदारों को कसरत से पैदा करे, और परिंदे ज़मीन के ऊपर फ़ज़ा में उड़ें। और ख़ुदा ने बड़े‑बड़े दरियाई जानवरों को और हर क़िस्म के जानदार को, जो पानी से ब‑कसरत पैदा होते हैं, उनकी जिन्स के मुताबिक़, और हर क़िस्म के परिंदों को उनकी जिन्स के मुताबिक़ पैदा किया। और ख़ुदा ने देखा कि अच्छा है। और ख़ुदा ने उनको ये कह कर बरकत दी कि फलो और बढ़ो और समुंदरों के पानी को भर दो, और परिंदे ज़मीन पर बहुत बढ़ जाएँ। और शाम हुई और सुबह हुई, सो पाँचवाँ दिन हुआ।

       और ख़ुदा ने कहा कि ज़मीन जानदारों को उनकी जिन्स के मुवाफिक़ चौपाए और रेंगने वाले जानदार और जंगली जानवर उनकी जिन्स के मुवाफिक़ पैदा करे, और ऐसा ही हुआ। और ख़ुदा ने जंगली जानवरों और चौपायों को उनकी जिन्स के मुताबिक़ बनाया, और ख़ुदा ने देखा कि अच्छा है। फिर ख़ुदा ने कहा कि हम इंसान को अपनी सूरत पर अपनी शबीह की मानिंद बनाएँ, और वो समुंदर की मछलियों और आसमान के परिंदों और चौपायों और तमाम ज़मीन और सब जानदारों पर जो ज़मीन पर रेंगते हैं इख़्तियार रखें। और ख़ुदा ने इंसान को अपनी सूरत पर पैदा किया। ख़ुदा की सूरत पर उसको पैदा किया। नर व नारी उनको पैदा किया। और ख़ुदा ने उनको बरकत दी और कहा कि फलो और बढ़ो और ज़मीन को मामूर व महकूम करो। और समुंदर की मछलियों और हवा के परिंदों और कुल जानवरों पर जो ज़मीन पर चलते हैं इख़्तियार रखो। और ख़ुदा ने कहा कि देखो, मैं तमाम रू‑ए‑ज़मीन की कुल बीज‑दार सब्ज़ी और हर दरख़्त जिसमें उसका बीज‑दार फल हो, तुम को देता हूँ। ये तुम्हारे खाने को हों। और ज़मीन के कुल जानवरों के लिए और हवा के कुल परिंदों के लिए और उन सब के लिए जो ज़मीन पर रेंगने वाले हैं, जिन में ज़िंदगी का दम है, कुल हरी बूटियाँ खाने को देता हूँ। और ऐसा ही हुआ। और ख़ुदा ने सब पर जो उसने बनाया था नज़र की और देखा कि बहुत अच्छा है। और शाम हुई और सुबह हुई, सो छठा दिन हुआ। (पैदाइश 1:1, 31)

      सो आसमान और ज़मीन और उनके कुल लशकर का बनाना ख़त्म हुआ। और ख़ुदा ने अपने काम को जिसे वो करता था सातवें दिन ख़त्म किया, और अपने सारे काम से जिसे वो कर रहा था सातवें दिन फ़ारिग़ हुआ। और ख़ुदा ने सातवें दिन को बरकत दी और उसे मुक़द्दस ठहराया, क्योंकि उसमें ख़ुदा सारी काइनात से जिसे उसने पैदा किया और बनाया फ़ारिग़ हुआ।

      ये है आसमान और ज़मीन की पैदाइश, जब वे ख़ल्क़ हुए। जिस दिन ख़ुदावन्द ख़ुदा ने ज़मीन और आसमान को बनाया। और ज़मीन पर अब तक खेत का कोई पौधा न था, और न मैदान की कोई सब्ज़ी अब तक उगी थी, क्योंकि ख़ुदावन्द ख़ुदा ने ज़मीन पर पानी नहीं बरसाया था, और न ज़मीन जोतने को कोई इंसान था। बल्कि ज़मीन से कहर उठती थी और तमाम रू‑ए‑ज़मीन को सेराब करती थी। और ख़ुदावन्द ख़ुदा ने ज़मीन की मिट्टी से इंसान को बनाया, और उसके नथनों में ज़िंदगी का दम फूँका, तो इंसान जीता‑जान हुआ।

       और ख़ुदावन्द ने मशरिक़ की तरफ़ अदन में एक बाग़ लगाया, और इंसान को जिसे उसने बनाया था वहाँ रखा। और ख़ुदावन्द ख़ुदा ने हर दरख़्त को जो देखने में ख़ुशनुमा और खाने के लिए अच्छा था ज़मीन से उगाया, और बाग़ के बीच में हयात का दरख़्त और नेक व बद की पहचान का दरख़्त भी लगाया। और अदन से एक दरिया बाग़ को सेराब करने को निकला, और वहाँ से चार नदियों में तक़सीम हुआ। पहली का नाम फ़ीसोन है, और जो हवीलह की सारी ज़मीन को जहाँ सोना होता है घेरे हुए है। और उस ज़मीन का सोना चौखा है, और वहाँ मोती और संग‑ए‑सुलेमानी भी हैं। और दूसरी नदी का नाम जीहोन है, जो कूश की सारी ज़मीन को घेरे हुए है। और तीसरी नदी का नाम दजला है, और जो अश्शूर के मशरिक़ को जाती है। और चौथी नदी का नाम फ़ुरात है।

      और ख़ुदावन्द ख़ुदा ने आदम को लेकर बाग़‑ए‑अदन में रखा कि उसकी बाग़बानी और निगहबानी करे। और ख़ुदावन्द ख़ुदा ने आदम को हुक्म दिया और कहा कि तू बाग़ के हर दरख़्त का फल बे‑रोक‑टोक खा सकता है, लेकिन नेक व बद की पहचान के दरख़्त का कभी न खाना, क्योंकि जिस रोज़ तूने उसमें से खाया, तू मरेगा।

      और ख़ुदावन्द ख़ुदा ने कहा कि आदम का अकेला रहना अच्छा नहीं, मैं उसके लिए एक मददगार उसकी मानिंद बनाऊँगा। और ख़ुदावन्द ख़ुदा ने कुल दश्ती जानवर और हवा के कुल परिंदे मिट्टी से बनाए, और उनको आदम के पास लाया कि देखे कि वो उनके क्या नाम रखता है। और आदम ने जिस जानवर को जो नाम दिया, वही उसका नाम ठहरा। और आदम ने कुल चौपायों और हवा के परिंदों और कुल दश्ती जानवरों के नाम रखे, पर आदम के लिए कोई मददगार उसकी मानिंद न मिला। और ख़ुदावन्द ख़ुदा ने आदम पर गहरी नींद भेजी, और वो सो गया, और उसने उसकी पसलियों में से एक को निकाल लिया, और उसकी जगह गोश्त भर दिया। और ख़ुदावन्द ख़ुदा ने उस पसली में से जो उसने आदम में से निकाली थी एक औरत बनाकर उसे आदम के पास लाया। और आदम ने कहा, ये तो अब मेरी हड्डियों में से हड्डी और मेरे गोश्त में से गोश्त है; इसलिए वो नारी कहलाएगी, क्योंकि वो नर से निकाली गई। इस वास्ते मर्द अपने माँ‑बाप को छोड़ेगा और अपनी बीवी से मिला रहेगा, और वे एक तन होंगे। और आदम और उसकी बीवी दोनों नंगे थे, और शर्माते न थे। (पैदाइश 2:1, 25)

       और साँप कुल दश्ती जानवरों से, जिन को ख़ुदावन्द ख़ुदा ने बनाया था, चालाक था। और उसने औरत से कहा, क्या वाक़ई ख़ुदा ने कहा है कि बाग़ के किसी दरख़्त का फल तुम न खाना? औरत ने साँप से कहा कि बाग़ के दरख़्तों का फल तो हम खाते हैं, पर जो दरख़्त बाग़ के बीच में है, उसकी बाबत ख़ुदा ने कहा है कि तुम न तो उसे खाना और न छूना, वरना मर जाओगे। तब साँप ने औरत से कहा कि तुम हरगिज़ न मरोगे, बल्कि ख़ुदा जानता है कि जिस दिन तुम उसे खाओगे, तुम्हारी आँखें खुल जाएँगी और तुम ख़ुदा की मानिंद नेक व बद के जानने वाले बन जाओगे। औरत ने जो देखा कि वो दरख़्त खाने के लिए अच्छा है और आँखों को ख़ुशनुमा मालूम होता है और अ़क़्ल बख़्शने के लिए ख़ूब है, तो उसके फल में से लिया और खाया, और अपने शौहर को भी दिया और उसने खाया। तब दोनों की आँखें खुल गईं और उनको मालूम हुआ कि वे नंगे हैं, और उन्होंने अंजीर के पत्तों को सी कर अपने लिए लुंगियाँ बनाई। और उन्होंने ख़ुदावन्द ख़ुदा की आवाज़, जो ठंडे वक़्त बाग़ में फिरता था, सुनी, और आदम और उसकी बीवी ने अपने आप को ख़ुदावन्द ख़ुदा के हुज़ूर से बाग़ के दरख़्तों में छुपाया। तब ख़ुदावन्द ख़ुदा ने आदम को पुकारा और उससे कहा, तू कहाँ है? उसने कहा, मैंने बाग़ में तेरी आवाज़ सुनी और मैं डरा, क्योंकि मैं नंगा था, और मैंने अपने आप को छुपाया। उसने कहा, तुझे किस ने बताया कि तू नंगा है? क्या तूने उस दरख़्त का फल खाया, जिसकी बाबत मैंने तुझ को हुक्म दिया था कि उसे न खाना? आदम ने कहा, जिस औरत को तूने मेरे साथ किया है, उसने मुझे उस दरख़्त का फल दिया और मैंने खाया। तब ख़ुदावन्द ने औरत से कहा, तूने यह क्या किया? औरत ने कहा, साँप ने मुझे बहकाया, तो मैंने खाया।

       और ख़ुदावन्द ख़ुदा ने साँप से कहा, इस लिए कि तूने ये किया, तू सब चौपायों और दश्ती जानवरों में मलऊन ठहरा। तू अपने पेट के बल चलेगा और अपनी उम्र भर ख़ाक चाटेगा। और मैं तेरे और औरत के दरमियान, और तेरी नस्ल और औरत की नस्ल के दरमियान अदावत डालूँगा। वो तेरे सर को कुचलेगा और तू उसकी एड़ी पर काटेगा। फिर उसने औरत से कहा कि मैं दर्द‑ए‑हमल को बहुत बढ़ाऊँगा; तू दर्द के साथ बच्चे जनेगी, और तेरी रग़बत अपने शौहर की तरफ़ होगी, और वो तुझ पर हुकूमत करेगा। और आदम से उसने कहा कि चूँकि तूने अपनी बीवी की बात मानी और उस दरख़्त का फल खाया, जिसकी बाबत मैंने तुझे हुक्म दिया था कि उसे न खाना, इस लिए ज़मीन तेरे सबब मलऊन हुई। मशक़्क़त के साथ तू अपनी उम्र भर उसकी पैदावार खाएगा। और वो तेरे लिए काँटे और ऊँट‑कटारे उगाएगी, और तू खेत की सब्ज़ी खाएगा। तू अपने मुँह के पसीने की रोटी खाएगा, जब तक कि ज़मीन में फिर लौट न जाए, इस लिए कि तू उससे निकाला गया है; क्योंकि तू ख़ाक है और ख़ाक में फिर लौट जाएगा। और आदम ने अपनी बीवी का नाम हव्वा रखा, इस लिए कि वो ज़िंदों की माँ है। और ख़ुदावन्द ख़ुदा ने आदम और उसकी बीवी के वास्ते चमड़े के कुर्ते बना कर उनको पहनाए। (पैदाइश 3:1, 21)

      बाइबल मुक़द्दस के अबवाब‑ए‑बाला को मद्द‑ए‑नज़र रख कर ज़ैल के अशआर मुलाहिज़ा करें और उन लोगों की फ़हम व फ़िरासत की दाद दें, जो ये कहते हैं कि बाइबल मुक़द्दस का अरबी ज़बान में उस वक़्त तर्जुमा नहीं हुआ था।

      अल‑मक़दसी किताब अल‑बद्र 1:15, 15 में अशआर ज़ैल को नक़्ल करते हुए लिखता है कि:

وقد ذکرت حکماء العرب ومن کان یدین الله منھم بدین الانبیاء فی اشعار ھا وضبھا کیف کان مبدا لخلق فمنہ قول عدی بن زید وکان نصرانیاً یقراالکتب

      यानी “अरब के हुकमा और वो लोग जो ख़ुदा की परस्तिश अंबिया के मज़हब पर करते थे, अपने अशआर और ख़ुतबों में इस बात का ज़िक्र करते हैं कि किस तरह ख़ल्क़त की इब्तिदा हुई। उनमें से एक अ़दी बिन ज़ैद है, जो ईसाई था और कुतुब‑ए‑मुक़द्दसा को पढ़ा हुआ था। उसके अशआर अज़‑क़रार ज़ैल हैं:”

اسمع حدیثاً لکی یوماً تجاربہ
عن ظھر غیب اذا ما سائل سالا
ان کیف ابدی الہ الخلق نعمة
فینا وعرفنا آیاتہ الاولا
کانت ریاحاً وماءً ذا عرانیة
وظلمة لم یدع فتقاً والا خللا
فآ مرا لظلمة السوادء فانکشفت
وعزل الماء عما کان قد شغلا
وبسطا لارض بسطا ثم قدرھا
تحت السماء سواءً مثل فعلا
وجعل المشس مصراً لا خفاء بہ
بین النھار وبین اللیل قد فصلا
قفی لستة ایام خلائقہ
وکان آخر شی صور الرجلا

      तर्जुमा: ये बात सुन ले, ताकि अगर कोई तुझ से ग़ैब की बातों के मुतअ़ल्लिक़ सवाल करे, तो तू उसका जवाब दे सके कि किस तरह ख़ुदा ने ख़ल्क़ किया और अपनी नेमतों से हमें सरफ़राज़ किया और अपनी निशानियों से हमें आगाह किया। ख़ुदा ने दुनिया को जब पैदा किया, तो उस वक़्त शिद्दत की हवा थी और सरासर पानी था, और रू‑ए‑ज़मीन पर सरासर अंधेरा था। ख़ुदा ने अंधेरे को हुक्म दिया और वो दूर हो गया, और पानी ने अपना शुग़्ल छोड़ दिया, यानी सिमट गया, और ज़मीन आसमान के नीचे फैलायी गई। और आफ़ताब को दिन‑रात के दरमियान हद‑ए‑फ़ासिल ठहराया। ख़ुदा ने ख़ल्क़त का काम छह दिनों में पूरा किया और सब से आख़िर इंसान को पैदा किया।

आदम


      हज़रत आदम (अलै॰) का क़िस्सा आँहज़रत ﷺ के मबऊस होने और क़ुरआन शरीफ़ के नाज़िल होने से मुद्दतों पहले अहले‑किताब और बिल‑ख़ुसूस मसीही शुअरा की वसातत से ख़ूब फैल चुका था। मसीही शुअरा ने इस क़िस्से को किताब‑ए‑पैदाइश से लिया और अपने ख़यालात का जामा पहना कर अरब के तूल व अ़र्ज़ में पहुँचाया। इन शुअरा में उमय्या बिन अबी सुल्त और अ़दी बिन ज़ैद बहुत ही मशहूर हैं। हम हज़रत आदम का क़िस्सा अ़दी बिन ज़ैद के कलाम में से पेश करते हैं, जिन के मुतअ़ल्लिक़ जाहिज़ कहते हैं कि:

“ سانشد ک لعدی بن زیدو ۔ کان نصرانیاً دیاناً وترجماناً وصاحب کتاب ومن دھاة ذالک الدھر”

      यानी मैं अ़दी बिन ज़ैद के अशआर तुझे सुनाता हूँ, जो एक मसीही दीन‑परवर, मुतरजिम और साहिब‑ए‑किताब और उस ज़माने के होशियार लोगों में से था। (किताब‑उल‑हयवान, मतबूआ मिस्र, जिल्द 3, सफ़्हा 65)

       अ़दी बिन ज़ैद कहता है कि:

قضی لستتہ ایام خلائقہ
وکان آخر ھا ان صور الرجلاً
دعاہ آدم صوتاً فاستجاب لہ
بنفختہ الروح فی الجسم الذی حیلا

      तर्जुमा: ख़ुदा ने छह दिनों में अपनी मख़्लूक़ात को पैदा किया, जिस के आख़िर में इंसान को सूरत बख़्शी। ख़ुदा ने उसको आदम के नाम से पुकारा, जिस का जवाब हमें उस रूह के तुफ़ैल से दिया जो उसमें फूँकी गई थी।

       इस के बाद वो हज़रत आदम की पसली से बीबी हव्वा के पैदा हो जाने और दोनों को जन्नत में दाख़िल होने और शैतान से आज़माए जाने और फिर जन्नत से निकाले जाने का बयान करता है कि:

ثمت اورثہ الفردوس یعمرھا
وزوجة ً صنعةً من ضلعہ جعلا
لم ینھہ ربہ عن غیر واحدة
من شجرٍ طیبٍ ان شم اوا کلا
نعمدً اللتی من اکلھاً نھیا
باھر حواء لمہ تا خذ لہ الدغلا
کلا ھما خاط اذبر لبو سھما
من ورق التین ثوباً لم یکن غزلا
فکانت الحیة الرقشاء اذ خلقت
کماتریٰ ناقةً فی الخلق اوجملا
فلا طھما الله اذا غوت خلیفة
طول اللیائی لم یجعل لھا اجلا
تمثی علی بطنھا فی الدھر ماعمرت
لا لترب تاکلہ حزناً وان سھلا
فا تعبا ابوانا فی حیا تھما
دوجدا الجوع ولا وصاب والعلا

       तर्जुमा: फिर ख़ुदा ने आदम को जन्नत में दाख़िल किया, ताकि वो उसे आबाद करे, और उसकी पसली से उसकी बीवी बनाई। ख़ुदा ने आदम को जन्नत के किसी अच्छे दरख़्त के खाने और सूँघने से मना नहीं किया, सिवाए एक दरख़्त के। दोनों ने उसी शजर‑ए‑ममनूअ़ का क़स्दन इरादा किया। ये हव्वा के सबब से हुआ, जो शैतान के फ़रेब को न ताड़ सकी। दोनों ख़ाती (खातागार) हुए, और ख़ुदा ने अंजीर के पत्तों से उनके लिए बगैर बुना लिबास बनाया।

      नक़्श‑दार साँप जब पैदा किया गया था, ऊँट की तरह चार पाँव वाला था। जब उसने बग़ावत की और उसके ख़लीफ़ा को फ़रेब दिया, तो हमेशा के लिए ख़ुदा ने उसके पाँव को निस्त कर दिया, ताकि अपने पेट पर चल कर ज़मीन की मिट्टी खाता रहे।

      ख़ुदा ने हमारे वालिदैन को ये सज़ा दी कि अपनी ज़िंदगी में तकालीफ़, भूख और मसाइब झेलते रहें। (हयात‑उल‑हयवान, जाहिज़, सफ़्हा 66, जिल्द 4, मतबूआ मिस्र)

      इस्सामी ने अपनी किताब बस्ता‑अन‑नुजूम‑अल‑अवाली फ़ी अबना‑इल‑अवाइल वत‑तवाली (नुस्ख़ा: मक्तबा‑ए‑शर्क़िया, सफ़्हा 19) में अ़दी के और अशआर नक़्ल किए हैं कि किस तरह शैतान ने बीबी हव्वा को बहकाया और किस तरह ख़ुदा ने साँप और ताऊस को सज़ा दी। वो अशआर यह हैं:

سعی الرجیم الی حوا بوسوسہ
غوت بھا وغدی معھا ابوالبشر
خلقان من مارج انشاء خلیفتہ
وآخر من تراب الارض المدلہ
انشا ھما لیطیعا فخا لفہ
ابلیس من امرہ للحین والقدر
فابلس الله ابلیساً واسکنہ
داراً من الخلد بین الروض والشجر
فاغتا ابلیس من بغی ومن حسد
فاختال للحیة الرقطاء والطیر
فاد خلاہ بایمان موکدة
اعطما ھما بیمین کاذب غدر
مناک سار الی حوا بوسوسة
العت بغراتھا معھا ابا البشر
فاھبطو من معا صیھم وکلھم
نائی المحل فقید العین والا ثر
واھبط الله ابلیسا وا وعدہ
ناراً تلھب با لسمار والشر ر
وانزل الله منفادوس رخمتہ
من صوتہ وبرھی رجلیہ بالنکر
واعقب الحیة الحسنا ء حین عفت
مسخ القوائم بحد المسعی کا لبقر
واعقب الله حوا بالذی فعلت
بالطمث والطلق والا حران والفکر

      तर्जुमा: शैतान‑ए‑रजीम (राँदा शुदा) ने हव्वा के दिल में वसवसा डाला, जिस की वजह से उसने और अबुल‑बशर (हज़रत आदम) को गुमराह किया।

      ख़ुदा ने अपनी मख़्लूक़ात को दो क़िस्म पर बनाया, एक को भड़कती हुई आग से और दूसरी को मिट्टी और ढेले से। ख़ुदा ने इन दोनों को इस लिए पैदा किया कि उसकी इताअत करें, लेकिन इब्लीस ने हलाक होने के लिए उसकी मुख़ालफ़त की।

      पस ख़ुदा ने इब्लीस को मायूस किया और हज़रत आदम को जन्नत के गन्जान (घने) दरख़्तों में रखा। इस लिए शैतान गुमराही और हसद के मारे ग़ुस्सा हुआ और साँप और ताऊस के पास हीलाह ढूँढने लगा।

      इन दोनों ने शैतान के इसरार और झूठी क़समों में आकर उसे जन्नत में पहुँचा दिया। वहाँ उसने हव्वा को वसवसा दिया और उसे और आदम को फ़रेब दिया।

      पस वो अपनी नाफ़रमानी की वजह से जन्नत से निकाल दिए गए, ऐसी हालत में कि अपने महल से दूर थे और क़िस्म‑परसी की हालत में मारे‑मारे फिरते थे। और ताऊस की आवाज़ को कमज़ोर और उसके पाँव को बद‑शक्ल कर दिया, और शैतान के पाँव को भी मस्ख़ कर दिया, हालाँकि वो गाय की तरह पाँव पर चलता था। और हव्वा को उसकी ख़ता की वजह से ये सज़ा दी गई कि वो तम्स, दुख, तलाक़ और फ़िक्रों में मुब्तला रहे।

नूह और तूफ़ान


      हज़रत अंबिया आदम की तख़्लीक़ के बाद सहुफ़‑ए‑मुतह्हरा में किसी और वाक़िये का बयान इस एहतेमाम के साथ नहीं हुआ है, जो हज़रत नूह और उनके ज़माने के तूफ़ान का हुआ है। अरब‑ए‑जाहिलियत ने इस वाक़िआ‑ए‑फ़ाजिआ को अहले‑किताब से लिया, और उनके शायरों ने अक्सा‑ए‑अरब तक पहुँचाया। चुनाँचे इब्न अबी सुल्त इस वाक़िये को यूँ नज़्म में बयान करता है कि:

الحان یفوت المرء رحمة ربنر
وان کان تحت الارض سبعون وادیا
کرحمة نوح یوم حل سفینہ
مشیعة کانوا جمیعاً ثمانیاً
فلما استنار الله تنور ارضہ
ففار وکان الماء فی الارض ساحیا
ترفع فی جری کان اطیطہ
مریف مجال یستعید الدوالیا
علی ظھر جون لم یعد لراکب
سراہ وغیم البس الماء واجیا
فصارت بھا ایا مھا ثتم سبعة
وست لیال دائبات عواطیا
تشق بھمہ تھوی باحسن امرة
کان علیھا ھادیاً وفواتیاً
وکان لھا الجودی نھیا دغایة
واصبح عنھا موجة متواخیا

      तर्जुमा: यहाँ तक कि ख़ुदा की रहमत इंसान पर सबक़त करती है, अगरचे ज़मीन के इंतिहाई तबक़ों के अंदर हो। जिस तरह नूह को उसकी रहमत ने घेर लिया, जबकि वो कश्ती में अपने आठ मुतअ़ल्लिक़ीन के साथ दाख़िल हुआ। जब ख़ुदा ने चाहा तो ज़मीन के तनूर को हुक्म दिया, और वो खुल गया, और उससे ज़मीन पर पानी उमड़ आया। पानी ज़मीन पर बढ़ता गया, और उससे ज़ोर‑ओ‑शोर की आवाज़ निकलती थी, और चारों तरफ़ बादलों की वजह से अंधेरा ही अंधेरा छाया हुआ था। इसी हालत में नूह की कश्ती को सात दिन और छह रात तक उठाए हुए चलती रही। कश्ती पानी को चीरते हुए फ़रमाबरदारी के साथ जा रही थी, गोया कि उसको एक रहबर और मल्लाह ले जा रहा है। उस कश्ती का इंतिहा‑ए‑गर्दिश जूदी पहाड़ पर ख़त्म हुआ, और वहीं जाकर मौजों ने उसे छोड़ दिया।

      (किताब‑उल‑हयवान लिल‑जाहिज़ 2:118, व किताब‑उल‑बदअ़ लिल‑मक़दिसी 3:24)

      फिर कहता है कि:

فار تنورہ وجاش بماً
طم فوق الجبال حتی علاھا
قیل للعبد سرفسار وبا الله
علی الھول سیرھا وسرا ھا
قیل فا ھبط تناھت بل الفلسک
راس شاھق مرسا ھا

      तर्जुमा: ज़मीन का तनूर जोश मारने लगा, और इस कसरत से पानी बहने लगा कि बड़े‑बड़े पहाड़ों के ऊपर चला गया। ख़ुदा के बन्दे नूह से कहा गया कि कश्ती लेकर चल। चुनाँचे वो इस ख़ौफ़नाक हालत में ख़ुदा के भरोसे पर चल निकला। फिर उससे (नूह से) कहा गया कि कश्ती से निकल आ। एक ऊँचे पहाड़ की चोटी पर तेरी कश्ती ठहरी हुई है। (किताब‑उल‑बदअ़ 3:24)

      फिर कहता है कि:

عرفت ان لن یفوت الله ذوقدم
وانہ من امیر السو ینقم
المسیح الخشب فوق الماء سخرھا
خلال جریتھا کانما عوم
تجری سفینة نوح فی جوانیہ
بکل موج مع ا لاروح تقتم
مشحونة ودخان الموج یرفعھا
ملای وقد صرعت من حولھا الاصم
حتی تسوت علی الجودی راسیة
بکل ما استو دعت کا انھا اطم

      तर्जुमा: मैंने जान लिया है कि कोई क़दीम चीज़ ख़ुदा की रहमत से महरूम नहीं रही है, और न ख़ुदा उमीरा‑ए‑सू को इन्तिक़ाम लिए बग़ैर छोड़ देता है। हमारा ख़ुदा वो ख़ुदा है जो लकड़ी (कश्ती) को पानी पर चलाता है, और वो पानी पर ऐसी कुलोलें मारती हुई चलती है कि गोया पानी उसके क़ब्ज़े में है। नूह की कश्ती को उस वक़्त पानी पर चलाया गया, जबकि उसकी चारों तरफ़ पानी ठाठें मारता हुआ जारी था। पानी का तमव्वुज उसे ऊपर उठाए लिए जा रहा था, और वो भरी हुई थी, और उसकी चारों तरफ़ बे‑दीन अक़वाम की लाशें तैर रही थीं। यहाँ तक कि कश्ती अपनी अमानतों समेत जूदी पहाड़ पर एक क़िले की तरह आकर ठहर गई।

      (ख़ज़ानतुल‑अदब व लुबाब लिसानुल‑अरब 404)

      फिर यही बाख़ुदा शायर ये बतलाता है कि हज़रत नूह की कश्ती में हैवानों में से क्या‑क्या थे।

تصریح الطیر والبریة فیھا
مع قوی السباع والا فیال
مرفیھا من کل ما عاش زوج
بین ظھری غوارب کا لجیال

      तर्जुमा: अज़‑क़िस्म परिंदा व चरिंदा व दरिंदा, और हाथी, दर‑परदा‑दार न कोहान वाला वग़ैरह ज़ालिक, एक‑एक जोड़ा उसमें मौजूद था।

      फिर यही शायर उस कबूतर के मुतअ़ल्लिक़ बयान करता है, जिसको नूह ने कश्ती से ख़ुश्क़ी दरयाफ़्त करने के लिए भेजा था।

دارسلت الحمامة بعد سبع
تدل علی الحالک لا تھاب
تلمس ھل تری فی لا رض عیناً
وعائنة بھا الماء العباب
فجاء بعد ما رکضت بقطفٍ
علیہ الثاط والطین الکیاب

      तर्जुमा: फिर सात दिनों के बाद कबूतर को भेजा गया, ताकि पानी का तमव्वुज और उसके महालिक़ दरयाफ़्त कर आए। वो कबूतर एक डाली मुँह में लेकर आया, जिस पर चिकनी मिट्टी लगी हुई थी।

इब्राहीम, इस्हाक़, लूत


      इब्राहीम का नाम अरब‑ए‑जाहिलियत में इब्राहीम भी आया है और अबराहम और अब्रह़ीम भी। और आप का लक़ब “ख़लीलुल्लाह” भी मज़कूर है। चुनाँचे अब्दुल‑मुत्तलिब, आँहज़रत ﷺ के जद्द‑ए‑अमजद, काबा की बिनाअ़ को हज़रत इब्राहीम की तरफ़ मंसूब करते हुए फ़रमाते हैं कि:

عذت لماء عاذبہ ابرھم              مستقبل القبلة وھوقائم
انی للک اللھم عان راغم

      तर्जुमा: मैं उस ख़ुदा की पनाह में आया हूँ, जिस की पनाह में अबरहम, इब्राहीम, क़िब्ला‑रुख़ होकर कहता था कि ऐ ख़ुदा, मैं निहायत अ़जुज़ व इन्किसारी के साथ तेरे हुज़ूर खड़ा हूँ। (अल‑मुअ़र्रब लिल‑जवालीक़ी, सफ़्हा 9; लिसानुल‑अरब 14:314)

      फिर आप फ़रमाते हैं कि:

نحن آل الله فی کعبة لم یزل ذالک علی عھد ابراھم

      तर्जुमा: हम ख़ुदा की औलाद हैं जो उसके का’बे में रहते हैं, और अबरहम (इब्राहीम) के ज़माने से ये सिलसिला जारी है।

فاصحبت فی دار کریم مقامھا
تعللک فیھا بالکرامتہ لاھیا
تلاقی خلیل الله فیھا ولمہ تکن
من الناس جباراً الی النار ھاویا

      तर्जुमा: तू एक ऐसी मुतबर्रक जगह में मुक़ीम हो गया है, जिस की क़ुर्बत ढूँढने वाला हमेशा इज़्ज़त के साथ रहता है। तू उसमें ख़लील से मुलाक़ात करेगा, पस तू लोगों में सरकश और लोगों को आग में डालने वाला मत बन। (शुअरा‑ए‑नस्रानिय्या, सफ़्हा 618)

      उमय्या बिन अबी सुल्त हज़रत अबरह़म के उस ज़बिह‑ए‑अज़ीम (यानी हज़रत इस्हाक़ की क़ुर्बानी गर्दाने) का ज़िक्र करता है, जिस का मुफ़स्सल बयान तौरात‑ए‑मुक़द्दस में मौजूद है कि:

سبحو! للملیک کل صباح
طلعت شمسہ وکل ھلال
ولا براہیمہ الموفی بالنذر
احتساباً وحامل الا جذال
بکرہ لمہ لیکن لیصبروعنہ لو
راہ فی معشرٍ اقتال
ولہ مدیہ تخایل فی للحم
حذام حیتة کا اھلال
ابنی انی نذرتک الله
شحیطاً فاصبر فدیً للک حالی
فاجاب الغلام ان قال فیہ
کل شی الله غیر انتحال
ابتی اننی جزیتک باالله
تقیاً بہ علی کل حالب
فاقض ماقدندرت الله واکفف
عن دمی ان یمسہ سربالی
واشدد الصفد لا حید سکمن
حید الا سیر ذی الا غلال
اننی آلمہ المحز وانی
لا امں الا ذقان ذات التبال
جعد الله حیدہ من نحاس ٍ
اذرآہ زولاً من الازوال
بینما یخلع السرابیل عنہ
فکہ ربہ بکبش جلال
قال خذہ وار رسل ابندافی
الذی فد فعلمتا غیر قال
والد یتقی وآخر مولود
قطار اعنہ بسمع معال
ربما تجزع النفوس من الامر
لہ فرجة کحل العقال

      तर्जुमा: ख़ुदा की तस्बीह करो हर सुबह को आफ़ताब के निकलते वक़्त और हर चाँद के तुलूअ़ होने के वक़्त, यानी सुबह व शाम।

      और इब्राहीम की तारीफ़ करो, जिसने अपनी नज़्र पूरी अदा की, और जो लकड़ियों का गट्ठा उठाने वाला था, ताकि अपने लड़के को, जिस से वो ग़ैरों से लड़ते वक़्त एक लम्हा भी सब्र नहीं कर सकता था, बतौर सोख़्तनी क़ुर्बानी गुज़ारने।

      इब्राहीम के हाथ में एक तेज़ और ख़मीदा (हिलाली शक्ल) छुरा था, जो काटने की नुमायाँ सिफ़त रखता था। उस वक़्त आपने अपने बेटे से कहा कि:

      ऐ प्यारे बेटे, मैंने मन्नत मानी है कि तुझ को आलूदा ख़ून ख़ुदा की नज़्र गुज़ारूँ, इस लिए तू सब्र कर।

      तब बेटे ने जवाब दिया कि अब्बा‑जान, मेरी क्या हक़ीक़त है; सब कुछ ख़ुदा का ही है। मैं ख़ुदा के नाम पर हर एक हालत में आपकी फ़रमाबरदारी करूँगा। जो नज़्र आपने मानी है, उसके अदा करने में ताख़ीर न कीजिए। सिर्फ़ ये कीजिए कि मेरे ख़ून से मेरे कपड़े को बचाइए।

      मुझ को ख़ूब मज़बूत बाँध दीजिए, ताकि मैं न इधर‑उधर हिल सकूँ और न ही आपको रोक सकूँ।

      जब ख़ुदा ने उस लड़के की बहादुरी देखी, तो उसकी गर्दन को ताँबे जैसा सख़्त कर दिया, और जब उसके वालिद ने उसके कपड़े उतारे, तो ख़ुदा ने उसके एवज़ में एक मेंढा भेज दिया और कहा, इस को लेकर ज़बह करो। और जो कुछ तुम दोनों ने किया, मैं उससे राज़ी हूँ।

      बाप और बेटे की इस ख़ुदा‑तरसी की वजह से उनकी शोहरत तमाम दुनिया में फैल गई। अक्सर इंसान ऐसे काम से घबराता है, जिसका अंजाम नेक होता है।

      (ख़ज़ानतुल‑अदब 2:543, तारीख़‑ए‑तबरी 1:308, किताब‑उल‑बदअ़ 3:65)

      फिर यही शायर हज़रत लूत और सदूम की बरबादी और तबाही के मुतअ़ल्लिक़ कहता है कि:

ثم لوط اخوسدوم اتاھا
اذاتا ھا برشدھاً وھداھا
راودوہ عن صیفہ ثم قالوا
فد نھیناک ان تقیم قراھا
عرض الشیخ عندذالک بناتٍ
کظباء باجرح ترعا ھا۔
غضب القوم عند ذالک وقالوا
ایھا الشیخ خطبة نا باھا
اجمع القوم امرھمہ وعجور
خیب الله سعیھا ولحا ھا
ارسل الله عندذالک عذاباً
جعل الارض سفلھا اعلاھا
ورما ھا بحا صب ثم طینٍ
ذی جروف مسومٍ اذرما ھا

      तर्जुमा: अब लूत का क़िस्सा सुनो, जो अहले‑सदूम की हिदायत और रहबरी के लिए आया था। सदूम वालों ने लूत के मेहमानों के साथ नामुनासिब हरकत करनी चाही और कहा कि हम उनको तुम्हारे यहाँ ठहरने नहीं देंगे। तब लूत ने ख़ूबसूरत लड़कियाँ उनके आगे कर दीं। लूत की क़ौम ये देख कर बहुत नाराज़ हुई और एक बुढ़िया औरत की वसातत से अपना मतलब पूरा करना चाहा। लेकिन ख़ुदा ने उनकी सअ़ई और कोशिश को ख़ाक में मिला दिया और उन पर ऐसा अ़ज़ाब नाज़िल किया, जिस की वजह से ज़मीन तह‑ओ‑बाला हो गई, और उन पर आतिश‑आमेज़ ख़ाक और संगरेज़े बरसाए, जिन से वे सरासर तबाह हो गए।

       (मुअ़जमुल‑बुलदान याक़ूत 3:59, किताब‑उल‑बदअ़ 3:58, आसारुल‑बिलाद)

हज़रत याक़ूब और यूसुफ़


      हज़रत याक़ूब का नाम अरब‑ए‑जाहिलियत में इस्राईन (लिसानुल‑अरब 17:35; अल‑क़ल्ब वल‑इबदाल लि‑इब्न सिक्कीत, सफ़्हा 29) और इस्राएल भी आया है। चुनाँचे उमय्या बिन अबी सुल्त कहता है कि:

مااری من یغیثنی فی حیاتی
غیر نفسی الا نبی اسرال

      तर्जुमा: ज़िंदगी भर मैं किसी को अपना फ़रियादरस नहीं देखता, बजुज़ अपनी ज़ात के और बनी‑इस्राएल के।

       जाहिज़ ने अल‑बयान वत‑तिब्यान 1:19 में ईसाइयों के एक फ़िर्क़े बनी‑इयाद के एक शायर का एक शेअर नक़्ल किया है, जो हज़रत याक़ूब की उस रोया का ज़िक्र करता है, जिसका बयान किताब‑ए‑पैदाइश 28:12 में है। चुनाँचे वो कहता है कि:

ونحن ایاک عبید الالہ
ورھط مناجیہ فی السلمہ

      तर्जुमा: हम इयाद ख़ुदा के बन्दे हैं और उसकी क़ौम हैं, जिसने उसके साथ सीढ़ी में बात‑चीत की।

       सेमूएल, जो एक यहूदी और वफ़ादारी में मशहूर शायर था, कहता है कि:

وبقایا الاسباط اسباط یعقو
ب دراس التوراة والتابوت

      तर्जुमा: असबात के बक़ाया याक़ूब की औलाद हैं, जो तौरात के पढ़ने वाले और ताबूत के उठाने वाले हैं। (दीवान‑ए‑सेमूएल, सफ़्हा 12)

       फिर यही शायर हज़रत याक़ूब और हज़रत यूसुफ़ के मुतअ़ल्लिक़ कहता है कि:

وھذا ریئس مجبتی ثم صفوہ
وسماہ اسرائیل بکرا لا وائل
ومن نسلہ السامی ابوالفضل یوسف
الذی اشبع لا سباط قمع السنا بل
وصار بمصر ٍ بعد فرعون امرہ
بتبیر احلامٍ لحل المشاکل
ومن بعد احقاب ٍ نسوامااتی لھم
من الخیر والنصر العظیم الفواصل

      तर्जुमा: ये ख़ुदा का वह बरगुज़ीदा सरदार है, जिसको उसने इस्राएल कहा, और उसकी नस्ल में बुलंद‑मरतबा यूसुफ़ है, जो साहिब‑ए‑फ़ज़ीलत है और बनी‑इस्राएल को अनाज से सेर करने वाला है। फ़िरऔन के बाद मिस्र में उसी का हुक्म नाफ़िज़ था। इस मुश्किल ख़्वाब की ताबीर की वजह से बहुत सालों के गुज़र जाने पर उन्होंने उस ख़ैर व फ़तह‑ए‑अ़ज़ीम और फ़ज़ाइल को भुल गए, जो उन पर नाज़िल हुई थीं।

मूसा


      मूसा का ज़िक्र अरब क़ब्ल‑ए‑इस्लाम में कसरत के साथ पाया जाता है। मिन्जुम्ला ज़ैद बिन अ़म्र बिन नुफ़ैल का एक मशहूर क़सीदा है, जिस में हज़रत मूसा और हज़रत हारून और बनी‑इस्राईल के मुतअ़ल्लिक़ मशहूर वाक़िआत का बयान किया है। चुनाँचे कहता है कि:

رضیت بک اللھم رباً فلن اری
ادین الھا غیرک الله ثانیاً
وانت الذی من فضل من ورحمة
بعثت الی موسی رسولا منادیا
وقلت لہ فاذھب وہارون فادعوا
الی الله فرعون الذی کان طاغیا
وقولالہ ا انت سویت ھذا
بلا وتد حتی اطمانت کماھیا
وقولا لہ انت رفعت ھذہ
بلا عمدٍ ارفق اذابک بانیا
وقولا لہ انت سویت وسطھا
منیرا انا جا جنہ اللیل ساریا
وقولا لہ من یرسل الشمس غدوة
فیصبح مامست من الارض صاحیا
وقولا لہ من انبتا الحب فی الثری
فاصبح منہ البقل یھتزر ابیا
ویخرج منہ حبة فی روسہ
وفی ذاک آیات لمن کان واعیا ۔

      तर्जुमा: तेरे साथ, ऐ मेरे अल्लाह, मैं राज़ी हूँ। पस मैं नहीं देखता हूँ सिवा तेरे कोई और दूसरा माबूद, जिस का दीन इख़्तियार करूँ।

      और तू वो ज़ात‑ए‑पाक है कि तूने अपने फ़ज़्ल और रहमत से मूसाٰ की तरफ़ अपना पैग़म्बर जिब्राईल को भेजा, जिसने मूसाٰ के साथ बात‑चीत की।

      फिर तूने मूसाٰ को हुक्म दिया कि तू और हारून दोनों फ़िरऔन के पास जाओ और ख़ुदा की तरफ़ से उसको बुलाओ, क्योंकि वो सरकश हो गया है।

      और तुम उससे कहो कि क्या तूने ज़मीन को बग़ैर किसी मेख़ के बिछा दिया है, कि इस तरह साबित है कि हिलती तक नहीं।

      और उससे कहो कि क्या तूने इन आसमानों को इस तरह बग़ैर सुतून के बुलंद कर दिया है, तो तू बड़ा बनाने वाला है, अगर तूने ऐसी‑ऐसी चीज़ें बनाई हैं।

      और कहो कि क्या तूने ही आसमान के बीच में चाँद बनाया है; जब अँधेरी रात होती है, तो वो लोगों को रस्ता दिखाता है।

      और उससे कहो कि कौन है जो सुबह के वक़्त सूरज को भेजता है; ज़मीन पर जहाँ तक उसकी रौशनी पहुँचती है, रौशन हो जाती है।

      और उससे कहो कि कौन है जो दाना को ज़मीन में उगाता है, कि फिर उससे साग़ वग़ैरह हरा‑भरा लहलहाने लगता है।

      और फिर उसमें से उसके सिरों में दाने निकलते हैं, और इन चीज़ों में उस शख़्स के वास्ते निशानियाँ हैं, जो इन को दिल से समझ कर याद रखे।

       (किताब‑उल‑बदअ़ 1:75; इब्न हिशाम, सफ़्हा 45; ख़ज़ानतुल‑अदब 1:119 व 4:243 फ़िल‑हाशिया)

      सेमूएल, मशहूर यहूदी शायर, जो कि वफ़ादारी में ज़र्ब‑उल‑मसल है, कहता है कि:

واخر جہ الباری الی الشعب کی یری
اعاجیبہ مع جودہ المتواصل
وکیما یفوزو ابا لغنیمة اھلھا
ومن الذھب الا بریز فوق الحمائل
السنا بنی القدس الذی نصب لھم
غمام یقیھم فی جمیع المراحل
من الشمس والا مطار کانت صیانة
تجیر نواد یھمہ نزول الغوائل
السنا بنی السلوی مع المن والذی
لھمہ فجر الصوان عذب المناھل
علی عدد الاسباط تجری عیونھا
فراتاز لا لا طعمہ غیر حائل
وقد مکشوافی البرعمرا محددا
یغذ یھم العالی بخیر ا لمآ کل
فلمہ یبل ثوب من لباس علیھم
ولمہ یحرجوا المنعل کل المنازل
وارسل نوراً کالعمود امامھمہ
ینیرا الدی کالصبح غیر مزابل
السنا بنی الطور المقدس والذی
تدخدخ للجبار یوم الزلازل
ومن ھیبة الرحمان دک تذلا
فشر فہ الباری علی کل طائل
ونا جی علیہ عبدہ وکلیمہ              فقد سنا للرب یوم التباھل

      तर्जुमा: ख़ुदा ने बनी‑इस्राईल को बियाबान में इस लिए निकाला, ताकि अपने अ़जाइबात और मुसलसल बख़्शिशें उनको दिखाए, और ताकि ख़ालिस सोने के ज़ेवरात माल‑ए‑ग़नीमत की तरह लेकर रवाना हों। क्या हम उस मुक़द्दस के बेटे नहीं हैं, जिन पर तमाम मंज़िलों में बादल साया‑अफ़गन रहा, ताकि आफ़ताब की तमाज़त और दीगर मसाइब के नुज़ूल से उनकी हिफ़ाज़त हो। क्या हम मन्न‑ओ‑सल्वा के खाने वालों के बेटे नहीं, जिन के लिए सख़्त चट्टान से आब‑ए‑शीरीं के बारह चश्मे, जो कभी बद‑मज़ा न होते, फूट निकले। एक मुद्दत तक वो बियाबान में फिरते रहे, और ख़ुदा उनको बेहतरीन ख़ुराक़ से सेर करता रहा। उनका न तो लिबास पुराना हुआ और न ही उनको पापोशों की ज़रूरत हुई। नूर का सुतून उनके आगे‑आगे जाता था, ताकि अँधेरी रात उनके लिए दिन की तरह रौशन हो जाए।

       क्या हम मुक़द्दस तूर‑ए‑सीना के बेटे नहीं हैं, जो ख़ुदा के आगे पाश‑पाश हो गया था, चुनाँचे वो ख़ुदा की हैबत और जिरौत की वजह से मुत-ज़लज़िल हो गया था, इस लिए ख़ुदा ने उसको दीगर पहाड़ों पर बुज़ुर्गी बख़्शी।

       इसी पहाड़ पर ख़ुदा ने अपने कलीम के साथ गुफ़्तगू की, और इसी रोज़ हमें ख़ुदा के हुज़ूर तक़द्दुस हासिल हुआ। (दीवान‑ए‑सेमूएल, सफ़्हा 31)

हज़रत दाऊद, सुलैमान


      ज़रत दाऊद का अरब क़ब्ल‑ए‑इस्लाम में ज़्यादा तर ज़िक्र या तो उनकी किताब ज़बूर के साथ होता है या कामिलुस‑सना ज़िरह के साथ होता है। अम्र‑ए‑अव्वल के मुफ़स्सल शवाहिद हम अल्हामी कुतुब के तहत बयान कर चुके हैं। अम्र‑ए‑दुवम के मुतअ़ल्लिक़ दो‑एक शवाहिद पर इक्तिफ़ा करते हैं, क्योंकि अगर हम उन तमाम शवाहिद का, जिन का तअ़ल्लुक़ अम्र‑ए‑दुव्वम के साथ है, यगाना‑यगाना ज़िक्र करें, तो ये मुख़्तसर किताब उसकी गराँ‑बारी की मुतहम्मिल न हो सकेगी।

       हुसैन बिन अल‑हाम अल‑मुर्री उस फ़ौज की तौसीफ़ में कहता है, जिस का क़ाइद हीरा के बादशाह अ़म्र बिन अल‑हिंद अल‑मुलक़्क़ब ब‑मुहर्रिक़ था, कि:

علیھن فتیان کساھم محرق
وکان اف ایسکوا جادواکرما
صفائح بصریٰ اخلصتھا قیونھا
ومطردامن نسج داؤد مبھا ً

      तर्जुमा: उन घोड़ों पर वे शहसुजवान सवार हैं, जिन को मुहर्रिक़ ने बुस्रा की ख़ालिस और आबदार शमशीरें और हज़रत दाऊद की बनाई हुई ज़रीं, जिन के हल्क़े पियुस्त और मज़बूत हैं, पहनाई थीं, और मुहर्रिक़ की यह आदत थी कि जब वो पहनाता था, तो मुकम्मल तौर पर पहनाता था। (दीवान‑ए‑हमासा, अबी तमाम, बाब हमासा)

       हुसैल बिन सुजैअ़ अज़‑ज़ुबी अपनी ज़िरह की तारीफ़ में कहता है कि:

وبیضا ء من نسج ابن داؤد نشرہ
تخیر تھا یوم اللقا ء ملا بساً

      तर्जुमा: मैं हज़रत दाऊद की बनाई हुई और चमकती हुई ज़िरह जंग के दिन पहनता हूँ।

ومرا للیائی کل وقتٍ وساعة
یزھزعن للکا اوبیا عدن دانیا
وردن علی داود حتی ابدنہ
وکان یغادی العیش احضر صافیا

      तर्जुमा: ज़माने के हादसे, जो हर वक़्त नाज़िल होते रहते हैं, बादशाह को तख़्त से गिरा देते हैं और क़रीब‑तरीन मतलूब को दूर कर देते हैं। जब हज़रत दाऊद पर, जिन की ज़िंदगी ऐश‑ओ‑इशरत के साथ गुज़रती थी, ये मसाइब नाज़िल हुए, तो उन्होंने उन्हें बरबाद कर दिया। (दीवान‑ए‑हमासा, हब्तरी)

       हज़रत सुलैमान का भी कसरत के साथ ज़िक्र आया है, अ़लल‑ख़ुसूस उनकी दानाई, हुक्मरानी और अ़जीब‑ओ‑ग़रीब इमारात‑साज़ी और जिन्नात की ताबेदारी का ख़ूब बयान हुआ है। चुनाँचे नाबिगा अपने एक मशहूर क़सीदे में, जो लअ़मात की तारीफ़ में है, नुअ़मान को हज़रत सुलैमान की पैरवी की तरग़ीब देकर कहता है कि किस तरह जिन्नात को हज़रत सुलैमान ने मुसख़्ख़र किया और उनसे शहर‑ए‑तदमुर को बनवाया।

ولا اری فاعلاً فی الناس یشبھہ
ولا احاشی من الا قوام من احد
الا سلیمان اذقال الالہ لہ
قم فی البریة فاحدد ھان عن الفند
وخیس الجن انی قداذنت لھم
یبنون تد مریا الصفاح والعمد
فمن اطا عک فانفعہ بطاعتہ
کما اطا عک واد الله علی الرشد
ومن عصا ک فعاقبہ معاقبہ
تنھی الظلوم ولا تعقد علی ضمد

      तर्जुमा: मैं ममदूह की मानिंद किसी क़ौम में कोई ऐसा शख़्स नहीं देखता, जो ममदूह की हमसरी का दावेदार हो, बजुज़ सुलैमान के, जिस को ख़ुदा ने ये हुक्म दिया कि उठ और बर्रियह में जा और लोगों को उनकी ख़ता पर क़ौबीख़ कर, और जिन्नात को अपने ताबेअ़ बना। क्योंकि मैंने उनको हुक्म दिया है कि वो तदमुर को बड़े‑बड़े पत्थरों और सुतूनों के साथ बनाएँ। जो तेरी फ़रमाबरदारी करे, उसको उसकी ताबेदारी का फ़ायदा पहुँचा, और जो सरकशी करे, उसको सरकशी की सज़ा दे। ज़ालिमों को ज़ुल्म करने से रोक, और तू ख़ुद ज़ुल्म से दूर रह। (दीवान‑ए‑नाबिगा व अ़क़्द‑ए‑समीन में सफ़्हा 7)

       अ़ईशी कहता है कि अबलक़ फ़र्द को भी सुलैमान ने बनवाया था। चुनाँचे क़दीम बादशाहों की हलाकत व तबाही के बाद कहता है कि:

ولا عادیا لمہ یمنع الموت مالہ
ودیتما الیھودی ابلق
نباہ سلمان بن داؤد د حقبہ
لہ ازج عال وطی موثق
یوازی کبیداء السماء ودونہ
بلاط ودارت وکاس وخندق

      तर्जुमा: न तो आद को उसकी माल‑ओ‑दौलत मौत से बचा सकी, और न तैमा का क़स्र‑ए‑अबलक़, जिस को सुलैमान बिन दाऊद ने कई सालों में बनवाया था, जो बहुत बुलंद और मज़बूत था, जिसकी बुलंदी आसमान तक पहुँचती थी, और जिसमें शाही महल था, और जिसके कंगरे थे, और जिसकी चारों तरफ़ ख़ंदक़ थे।

      (मुअ़जमुल‑बुलदान 1:93, शुअरा‑ए‑नस्रानिय्या, सफ़्हा 375)

हज़रत यूनुस


      अशआर‑ए‑अरब क़ब्ल‑ए‑इस्लाम में मुझे अंबिया‑ए‑असग़र में से बजुज़ हज़रत यूनुस के और किसी का कोई मशहूर वाक़िआ न मिल सका। इस लिए हज़रत यूनुस के ज़िक्र के साथ अ़ह्द‑ए‑अ़तीक़ के वाक़िआत ख़त्म हो जाते हैं, और आइंदा हम अ़ह्द‑ए‑जदीद के वाक़िआत का ज़िक्र करेंगे। उमय्या बिन अबी सुल्त हज़रत यूनुस के उस मशहूर वाक़िए के मुतअ़ल्लिक़ कहता है कि किस तरह मछली ने हज़रत यूनुस को निगल लिया, और फिर वो किस तरह सही व सलामत बाहर निकल आए। चुनाँचे वह कहता है कि:

واتت بفضل منک نجیت یونسا
وقد بات فی اضعاف حوت لیا لیا

      तर्जुमा: ऐ ख़ुदा, तूने अपने फ़ज़्ल से यूनुस को नजात दी, जबकि उसने मछली के पेट में चंद रातें बसर कीं। (सीरत‑ए‑इब्न हिशाम, सफ़्हा 146)

      हज़रत यूनुस का यह वाक़िआ मौलवियों में बतौर ज़र्ब‑उल‑मसल मशहूर हो गया था। चुनाँचे वे किसी ज़्यादा खाने वाले और पेटू के मुतअ़ल्लिक़ कहते थे कि: آکل من ، حوت یونس,यानी यूनुस की मछली से ज़्यादा खाने वाला, औरانھم من حوت یونسयानी यूनुस की मछली से ज़्यादा पेटू।

      पेरिस के कुतुब‑ख़ाने में अरबी कुतुब के क़लमी नुस्ख़ों में एक किताब है, जिस का नाम “किताब‑ए‑तारीख़‑ए‑लिल‑हयवान वन्नबात वल‑जमाद” है। इस में उमय्या का एक शेअर है, उस में उस कद्दू के बेल का ज़िक्र है, जिस को ख़ुदा ने उगाया था कि हज़रत यूनुस पर साया करे। चुनाँचे वो कहता है कि:

فانبت یقطینا علیہ برحمة
من الله لولا الله مابقی صاحبا

      तर्जुमा: ख़ुदा ने अपनी रहमत से यूनुस पर कद्दू का बेल उगाया। अगर ख़ुदा ऐसा न करता, तो वो सलामत न बचता।

हज़ूर‑ए‑मसीह और उनकी वालिदा‑ए‑मुतह्हरा


      हज़ूर‑ए‑मसीह को अहले‑अरब “ईसा” के नाम से याद करते हैं, जिस का इश्तिक़ाक़ एक मुअम्मा‑सा बन गया है। ताजुल‑अ़रूस, जो एक मशहूर लुग़त की किताब है (4:20), जौहरी से ये रिवायत करता है कि ईसा इब्रानी और सुरयानी है, यानी लफ़्ज़ ईसा इब्रानी है या सुरयानी है। लैस कहता है कि:

ھومعدول عن الیشوع کذ ایقول اھل السر بانیہ

       यानी ईसा, यशूअ़ से बरख़िलाफ़ क़वानीन‑ए‑सरफ़ बन गया है, और सुरयानी लोग भी यही कहते हैं।

       मसीही उ़लमा ये कहते हैं कि ईसा ईसू से बन गया है, जो हज़रत याक़ूब के भाई का नाम था। चूँकि यहूदियों को हज़रत ईसू से नफ़रत थी, इस लिए उन्होंने मसीहियों के साथ बुग़्ज़‑ओ‑अ़दावत रखने की वजह से यशूअ़ को ईसू कहने लगे, और रफ़्ता‑रफ़्ता ईसू से ईसा बन गया।

       मगर मेरे नज़दीक सही ये है कि लफ़्ज़ यशूअ़ का तलफ़्फ़ुज़ अरबों के लिए बेहद मुश्किल था, क्योंकि इब्रानी ज़बान में कोई लफ़्ज़ ऐसा नहीं है, जिस के शुरू में याए‑मकसूर हो। यही वजह है कि जब मुसलमान मोअर्रिख़ीन व मुफ़स्सिरीन हुज़ूर का सही नाम लिखते हैं, तो यशूअ़ के शुरू में अलिफ़ ज़्यादा करके ईशूअ़ लिख देते हैं, ताकि तलफ़्फ़ुज़ की दुश्वारी दूर हो। लिहाज़ा अहले‑ज़बान ने इश्तिक़ाक़‑ए‑मक़लूब के तरीक़ पर यशूअ़ को ईशू कर दिया, और चूँकि सरफ़ क़ानून के रू से वाव तीसरी जगह से चौथी जगह में आ गया, लिहाज़ा उस को या से तब्दील कर दिया, और या को अलिफ़ से ईशाٰ बना दिया, और कसरत‑ए‑इस्तेमाल की वजह से शीन सीन से बदल कर ईसा बन गया। वल्लाहु अ़लम मा अस्सवाब।

       हुज़ूर‑ए‑मसीह का एक और नाम भी अहले‑अरब में बेहद मशहूर है, और वो मसीह है, जो मोशीह़ से बन गया है, जिस के म’अनी कहानत और बादशाहत के तेल से मस्ह किया गया है। जैसा कि बनी‑इस्राईल में दस्तूर था कि वे अपने अहबार और बादशाहों के सर तेल से मस्ह किया करते थे। ताजुल‑अ़रूस में समर से मनक़ूल है कि:

ان المسیح دعی بذاک لبرکتہ ای لا نہ مسح بابرکتہ

      मसीह को इस लिए मसीह कहते हैं कि वह ख़ुदा की बरकत से मस्ह किया गया।

       राग़िब अपने मुफ़रदात में लिखते हैं कि:

سمی عیسیٰ بالمسیح لانہ مسحت عنہ القوة الذمیمة من الجھل والشرہ الحرص وسائر الاخلاق الذمیمة

       यानी हज़रत ईसा को इस लिए मसीह कहते हैं कि उनसे तमाम क़वा‑ए‑ज़मीमा, मसलन जहालत, शहवत, हिर्स और दीगर अख़लाक़‑ए‑रज़ीला दूर कर दिए गए थे।

       ये तमाम क़ियास‑आराइयाँ हैं। हक़ीक़त वही है जो हम ने बयान की है कि ये इब्रानी लफ़्ज़ है, जिस के म’अनी कहानत और बादशाहत के तेल से मस्ह किया हुआ हैं।

       अहले‑अरब हुज़ूर‑ए‑मसीह को अबील‑उल‑अबीलैन भी कहते हैं। अबील के म’अनी हैं ज़ाहिद, और अबील‑उल‑अबीलैन के म’अनी हैं ज़ाहिदों का सरदार। चुनाँचे एक शायर कहता है कि:

وما قدس الرھبان فی کل ہیکل
ابیل الا بیلین المسیح بن مریما

      अहले‑अरब में उस रात को बड़ी इज़्ज़त दी जाती थी, जिस में हुज़ूर पैदा हुए थे। और उस रात को “लैल‑उत‑तमाम” कहते थे। चुनाँचे लिसानुल‑अरब (14:334) माद्दा “तम” में मज़कूर है कि क़ाल अ़म्र बिन शुमैल:


37 इस शेअर में इख़्तिलाफ़ है। बा’ज़ कहते हैं कि अ़ईशी का है, और बा’ज़ कहते हैं कि अख़्तल का है। और बा’ज़ कहते हैं कि इब्न अब्दुल‑जिन्न का है, और बा’ज़ कहते हैं कि अ़म्र बिन अब्दुल‑हक़ का है।

قال عمرو بن شمیل لیل التمام حتی تطلع فیہ النجوم کلھا وھی لیلة میلاد عیسیٰ۔۔۔۔ والنصاری تعظمھا وتقوم فیھا

       यानी अ़म्र बिन शुमैल कहता है कि लैल‑उत‑तमाम तमाम रातों से ज़्यादा लम्बी रात होती है, जिस में सब तारे तुलूअ़ करते हैं, और ये हज़रत ईसा की पैदाइश की रात है। नसारा इस को तअ़ज़ीम करते और जागते रहते हैं।

       अरब क़ब्ल‑ए‑इस्लाम में सिर्फ़ हुज़ूर‑ए‑मसीह की शोहरत न थी, बल्कि आप की वालिदा‑ए‑मुतह्हरा की भी बहुत शोहरत थी, चुनाँचे उमय्या बिन अबी सुल्त कहता है कि:

وفی دینکمہ من رب مریم آیة
منبئة بالعبد عیسی بن مریم
انا بت لوجہ الله ثم تبتلت
فسج عنھا لومة المتلوم
فلا بھی ہمت بالنکاح ولانت
الی بشر منھا بفرج ولافم
والطت حجاب البیت من دون اھلھا
تغیب عنھم فی صحاری رمرم
یحاربھا الساری اذا لیلہ
ولیس وان کان النھار بعملہ
تدلی علیھا بعد ما نام اعلھا
رسول فلمہ یحصر ولم یترمرم
فقال الا تجزعی وتکذبی
ملائکة من رب عاد وجرھم
اینبی واعطی ماسئلت فاننی
رسول من الرحمان یاتیک بانہم
فقالت لہ انی یکون ولمہ اکن
بغیاولا حبلی ولاذات قیم
ااحرج بالرحمان ان کنت مومنا
کلامی فاقعد ماید الک اوقم
فسج ثم اعترھا فا لقتت بہ
غلاما سوی الخلق لیس بتوام
نفختہ فی الصدرامن جیب درعھا
وما یصرم الرحمنٰ مل امریصرم
فلما اتمتمہ وجاءت لوضعہ
فادی لھم من لومھم والتندم
وقال لھا من حولھا جئت منکرا
فحق بان تلحی علیہ وترجمی
فادرکھا من ربھا ثم رحمة
بصدق حدیث من بنی مکلم
فقال لھا انی الله آیة
وعلمنی وا لله خیر معلمہ
وارسلت لم ارسل غویا ولم اکن
شقیاً ولمہ ابعث بفحش وما ثم

       तर्जुमा: तुम्हारे दीन में मरियम के रब की तरफ़ से एक निशानी है, जो ईसा बिन मरियम की ख़बर दे रही है।

       मरियम ने ख़ुदा के लिए तज़रूअ और गोशा‑नशीनी इख़्तियार की। इस लिए ख़ुदा ने उनसे मलामत करने वालों की मलामत को दूर कर दिया।

       न तो उसने निकाह का इरादा किया और न कोई बशर उनके नज़दीक हुआ।

       मरियम दरवाज़ा बंद करके सहरा‑ए‑रमरम की तरफ़ रवाना हुईं, जहाँ रात को ख़ुदा के फ़रिश्ते ने उनको निहायत वज़ाहत के साथ कहा कि:

      आद और जुरहम के ख़ुदा के फ़रिश्ते की बात सच मान कि मैं ख़ुदा की तरफ़ से तुझे एक बेटे की बशारत देने आया हूँ, और ख़ुदा की मर्ज़ी पर ख़ुश रह। मरियम ने कहा कि किस तरह मेरा बेटा होगा, जबकि मैं ज़ानिया नहीं, न हामिला हूँ और न शौहर वाली हूँ। फ़रिश्ते ने कहा, क्या मैं ख़ुदा के हुज़ूर झूठ बोल सकता हूँ। अगर मेरी बात की तस्दीक़ करती है तो ख़ैर, वरना जो जी चाहे वही कर। फिर फ़रिश्ते ने उसके गरेबान में फूँक दिया और एक ख़ूबसूरत लड़के को, जो तवाम न था, इल्क़ा किया।

       जब वक़्त पूरा हो गया तो लोग उनको मलामत करने लगे। उनके आस‑पास के लोगों ने उनसे कहा कि ऐ मरियम, तूने बहुत बुरा किया और संगसार होने के क़ाबिल है। तब ख़ुदा ने अपनी रहमत से उनकी बरीयत इस तरह कराई कि ख़ुद मसीह ने लोगों के साथ कलाम किया और कहा कि मैं ख़ुदा की तरफ़ से एक निशान होकर आया हूँ, और सब कुछ ख़ुदा ने मुझे तालीम दी है। मैं रसूल होकर आया हूँ, न बदकिरदार और गुनहगार और फ़ह्श को।

       अशआर‑ए‑बाला में इस अम्र का ख़याल रखना चाहिए कि इसमें चंद ऐसी बातें हैं, जो ग़ैर‑क़ानूनी (ग़ैर‑मुस्तनद) किताबों से माख़ूज़ हैं, जो ब‑ज़रीये तक़लीद (क़िस्से‑कहानी) अरब में राइज हो चुकी थीं। मसलन मरियम मुक़द्दसा का सहरा में निकलना, यहूदियों का बुरा‑भला कहना, हुज़ूर का बचपन में कलाम करना, ये ऐसी बातें हैं, जिन की तस्दीक़ अनाजील‑ए‑मुक़द्दसा से नहीं होती।

हज़रत यूहन्ना (यह्याٰ) और हुज़ूर‑ए‑मसीह के हवारीय्यीन


       हज़रत यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले को अरब क़ब्ल‑ए‑इस्लाम में जो शोहरत हासिल थी, वो इस से ज़ाहिर है कि हौरान में एक मशहूर इबादत‑गाह आप के नाम पर बनाई गई थी, जिस का मुफ़स्सल बयान हम जिल्द‑ए‑अव्वल में कर चुके हैं।

      अहल‑ए‑अरब हज़रत यूहन्ना को यह्याٰ के नाम से पुकारते थे। लुग़त‑दानों के नज़दीक इस नाम की तब्दीली भी कुछ कम दिक़्क़तें नहीं हैं। यूहन्ना एक इब्रानी लफ़्ज़ है, जो दो कलिमों से मुरक्कब है (यहूहनन), जिस के म’अनी ख़ुदा का तरह़्हुम हैं। अल्लामा शैख़ू के नज़दीक रस्म‑उल‑ख़त की वजह से इस में तब्दीली हुई। यानी दरअस्ल ये लफ़्ज़ यह्ना लिखा जाता था, लेकिन बा’ज़ औक़ात मशहूर अस्मा में नुक़ात व हरकात नहीं लगाई जाती थीं, इस लिए युह्ना लिखा जाता था। अरबों ने इस को यह्याٰ पढ़ा और यही सूरत उन में मशहूर हुई।

      अहले‑अरब हुज़ूर‑ए‑मसीह के रसूलों को हवारी कहते हैं, और इस के मुख़्तलिफ़ म’अनी करते हैं। चुनाँचे बा’ज़ कहते हैं कि इस के म’अनी की कुछ अस्लीयत नहीं, क्योंकि हुज़ूर के शागिर्दों में से कोई धोबी न था। बा’ज़ कहते हैं कि यह हूर से बना है, जिस के म’अनी आँख का शिद्दत के साथ सफ़ेद और सियाह होने के हैं, और इस से मुराद उन की सफ़ाई‑ए‑बातिन है, या इस लिए कि वो बरगुज़ीदा अंबिया थे (लिसानुल‑अरब, माद्दा हावा)। इस म’अनी के लिहाज़ से ये लफ़्ज़ सुरयानी है, क्योंकि सुरयानी ज़बान में ज़ा के म’अनी साफ़, शफ़्फ़ाफ़ और सफ़ेद के हैं। लेकिन दरअस्ल ये लफ़्ज़ हबशी (हवारी) है, जिस के म’अनी रसूल के हैं। ये लफ़्ज़ भी इस्लाम से पहले राइज हो चुका था, और अस्मइय्यात में हनाबी बिन हारिस बिन अर्क़ात अल‑बर्जमी के एक क़सीदे में ये लफ़्ज़ मौजूद है। चुनाँचे ये शायर हवारीय्यीन के शौक़‑ए‑शहादत का ज़िक्र करता हुआ लिखता है कि:

وکر کما کر الحواری ینبغی
الی الله زلفی ا ن یکر فیقتلد

       यानी जिस तरह हवारीय्यीन शौक़‑ए‑शहादत और तक़र्रुब‑इलल्लाह की वजह से लोगों के सामने बार‑बार वाअ़ज़ करते थे और नसीहत फ़रमाते थे, उसी तरह ममदूह बार‑बार हमला करता है।

       समूएल मशहूर शायर कहता है कि:

وسلیمان الحواری یحیٰ
ومتی یوسف کائی ولیت

       इस शेअर में हज़रत यूहन्ना ख़ुदावंद के प्यारे शागिर्द और हज़रत मत्ती और उनके वालिद का ज़िक्र है।

       जाहिज़ ने उमय्या बिन अबी सुल्त का एक शेअर (किताब‑उल‑हयवान 7:17) में नक़्ल किया है, जिस में हज़रत हिज़क़ियाल नबी की उस मशहूर व मअरूफ़ रुया को, जिस का तअ़ल्लुक़ हुज़ूर‑ए‑मसीह के चार इंजील‑नवीस रसूलों के साथ है, बयान किया है। चुनाँचे वो कहता है कि:

رجل وثور تحت رجل یمینہ
والنسر لا خری ولیث موصد

       इस शेअर में इंसान (रजल) से मुराद हज़रत मत्ती व बील है, और (सौर) से मुराद हज़रत लूक़ा, उ़क़ाब (नसर) से मुराद हज़रत यूहन्ना और शेर (लबस) से मुराद हज़रत मरक़ुस है।

       ख़ुदा का लाख‑लाख शुक्र है कि यहाँ हम क़िसस‑उल‑अंबिया से फ़ारिग़ हुए।

फ़ैज़‑ए‑चहारुम

वज़ाइफ़‑ए‑दीनीया


      अरब‑ए‑जाहिलियत और अवाइल‑ए‑इस्लाम में ऐसे मज़हबी मरासिम जारी थे, जिन की तौजीह बजुज़ इस के और कुछ नहीं हो सकती कि ये मज़हबी मरासिम मसीहियों को वसातत से अरबिस्तान में राइज हो चुके थे। इन मरासिम में से बा’ज़ ख़ालिस मज़हबी हैं, और बा’ज़ क़ानूनी हैं, और बा’ज़ मदनी व इज्तिमाई हैं, जिन में से हम बिल‑फ़ेअ़ल मज़हबी उमूर पर बहस करेंगे।

नमाज़


      नमाज़ मज़हबी अर्कान में सब से ज़्यादा ज़रूरी और लाज़िमी रुक्न समझी जाती है। नमाज़ वो चीज़ है, जिस के अदा करने में इंसान आलम‑ए‑हयूलानी (मादी) के अस्फ़ल तबक़ात से आलम‑ए‑लाहूती (आलम‑ए‑बाला) के आला तबक़ात की तरफ़ तरक़्क़ी कर सकता है। अपने इज़हार‑ए‑उबूदियत व अ़जज़ व इन्किसारी की वजह से मुक़र्रबान‑ए‑इलाहीٰ में शामिल हो सकता है। लेकिन बा‑ऐन‑हमा जज़ीरा‑नुमा‑ए‑अरब के बाशिंदे इस अ़ज़ीम‑उश‑शान और क़ाबिल‑ए‑इअ़तिना फ़र्ज़ से उस वक़्त तक वाक़िफ़ न हो सके, जब तक मसीहियत ने उनको इस की अस्लीयत से आगाह न किया। जब मसीहियत अरबिस्तान में दाख़िल हुई और अहले‑अरब मसीही होने लगे, तो उन्होंने अरबिस्तान के तूल‑ओ‑अ़र्ज़ में बे‑हिसाब सवामेअ़ व कनाइस बनाए (देखो जिल्द‑ए‑अव्वल)। शबाना‑रोज़ इबादत‑ए‑इलाहीٰ में मशग़ूल रहा करते थे। उन की इबादात के ख़ास‑ख़ास औक़ात मुक़र्रर थे। उन्हीं मुक़र्ररा औक़ात में से पाँच वक़्त की नमाज़ भी थी, जिस का वो ख़ास तौर पर लिहाज़ रखते थे। चुनाँचे फ़रज़क़, जो मशहूर शायर और मुसलमान था, एक मसीही औरत के मुतअ़ल्लिक़, जो उस के बाप ग़ालिब का वसीला दे रही थी, कहता है कि:

عجوز تصلی الخمس عانت بغالب
فلادا الذی عادت بہ الا اضیرما

       तर्जुमा: एक बुढ़िया जो पाँच वक़्त की नमाज़ पढ़ती है, ग़ालिब की पनाह लिए है। जिस ने ग़ालिब की पनाह ली है, उस को नुक़सान नहीं पहुँच सकता। (नक़ाइज़‑ए‑जरीर व फ़रज़क़, सफ़्हा 525)

       क़ुरआन शरीफ़ में इन पंजगाना नमाज़ों में से सुबह व शाम की नमाज़ों पर ख़ास तौर पर ताकीद है (सूरह हूद रुकूअ 112 व सूरह रूम 117), जो मसीही रहबानों की ख़ास तक़लीद है। क्योंकि मसीही रहबान भी इन्हीं दो वक़्तों की नमाज़ पर बहुत ताकीद किया करते थे। चुनाँचे मजनून‑ए‑लैलाٰ कहता है कि:

کانہ راھب فی راس صومعة
یتلو الزبورونجم الصبح ماطلعا

      तर्जुमा: गोया कि वो राहिब है, जो सवमअ की चोटी पर ज़बूर पढ़ रहा है, हालाँकि सुबह का तारा त़ुलूअ़ नहीं हुआ है। (दीवान‑ए‑मजनून)

      एक और कहता है कि:

عن راھب متبتل متقھل
صادی النھار للملہ متھجد

      तर्जुमा: परहेज़गार और ज़ईफ़ राहिब, जो सुबह व शाम को इबादत में सर्फ़ करता है।

वुज़ू


       इस्लाम में नमाज़ के लिए वुज़ू करना बेहद ज़रूरी है। चुनाँचे मशरिक़ी मसीहियों का भी यही दस्तूर था कि वह नमाज़ से पहले वुज़ू कर लिया करते थे।

       चुनाँचे किताब‑उल‑ऐथीक़ून (यानी अल‑आदाब ल-इलल‑फ़र्ज इब्न इब्री) में वुज़ू के लिए एक ख़ास बाब है, जिस में बिल‑तफ़सील उन के अहकाम बयान किए गए हैं। हज़रत ख़ूरी इब्राहीम हरफ़ूश ने रिसाला‑ए‑मशरिक़ (6:116, 123) बाबत (1903 ई॰) में वीरमार शलीता के पुराने मक्तूबात में से एक मक्तूब का ज़िक्र किया है, जिस में नमाज़ और उस की शराइत पर बहस है, जिस की इबारत ये है कि:

فاما حدودھا (ای الصلاة) وشر وطھا فانھا تحتاج فی اول شئی الی الطھارة وھوا لا عنتال بالماء فی اثر الحدث فان لم یجد الماء فلیجمر بثلاثة حجار ومازا د علیھا حتی ینفسی اثرا النجوی ۔ ثم غسل الیدین بالتسمیة وغسل الوجہ برسمہ الصلیب المحی ویسحب ایضاً غسل الرجلین فی کل غداة فاما من لمہ یحدث فلا یحتاج الی الا ستنجاء بل یستحب منہ غسل الیدین والوجہ وعایة الغسل ان یعمہ الماء الضوا الذی یغسلہ وعوماً کلا ملاً الخ

      तर्जुमा: नमाज़ की हुदूद और शराइत ये हैं कि नमाज़ के लिए तहारत बेहद ज़रूरी है। तहारत का मतलब ये है कि नजासत के ज़ाइल करने के लिए पानी से ग़ुस्ल किया जाए। अगर पानी न मिल सके तो तीन या उस से ज़्यादा कुलूख़ (ढेले) से मस किया जाए, ताकि नजासत का असर बिल्कुल ज़ाइल हो। फिर दोनों हाथों का धोना तस्मिया (बाप, बेटे, रूह‑उल‑क़ुद्स के नाम) के साथ, और फिर चेहरे का धोना सलीबी निशान के साथ। नीज़ हर सुबह को दोनों पाँव का धोना मुस्तहब है। धोने के म’अनी ये हैं कि जिस उ़ज़्व को धोया जाए, उस पर अच्छी तरह से पानी बहाया जाए।

क़िब्ला


      इस्लाम में नमाज़ के शराइत में से एक शर्त क़िब्ला‑रुख़ होना है। ये भी अरबिस्तान के क़दीम मसीहियों से मुस्तआर है। ये लोग नमाज़ के वक़्त मशरिक़ की तरफ़ रुख़ करते थे, और आफ़ताब को हुज़ूर‑ए‑मसीह का, जो अ़दल‑ओ‑इंसाफ़ के हक़ीक़ी आफ़ताब थे, नमूना समझते थे। चुनाँचे इब्ने अनस, जो इस्लाम से क़ब्ल का शायर है, मसीहियों का मशरिक़ की तरफ़ रुख़ करके नमाज़ पढ़ने का यूँ ज़िक्र करता है कि:

ولہ شمس النصاری وقا موا
کل عید لھم وکل احتفال

      तर्जुमा: मसीह हर ईद और हर महफ़िल में खड़े होकर मसीह को आफ़ताब‑ए‑सदाक़त समझ कर अपनी नमाज़ पढ़ते हैं। (किताब‑उल‑बदा 1:76) इस्लाम ने भी उन की तक़लीद में अव्वल बैत‑उल‑मुक़द्दस को और फिर ख़ाना‑ए‑काबा को अपना क़िब्ला ठहराया।

क़ियाम, सजूद, रुकूअ़


      इस्लाम में नमाज़ के अर्कान में क़ियाम, सज्दा, रुकूअ़ दाख़िल हैं। और ये वो बातें हैं जो मसीहियों की नमाज़ से माख़ूज़ हैं। चुनाँचे बुऐस मसीही राहिबों के क़ियाम का यूँ ज़िक्र करता है कि:

رجال یتلون الصلواة قیام

       तर्जुमा: ये वो लोग हैं जो खड़े होकर नमाज़ पढ़ते हैं।

       एक और शायर एक मसीही राहिब की तारीफ़ में कहता है कि:

داشعث عنوان بہ من سجودہ
کرکبة عنر من عنوز یہی صخر

       तर्जुमा: वो एक झुलसा हुआ राहिब है, जिस की पेशानी पर कसरत‑ए‑सज्दे की वजह से ऐसा निशान पड़ा हुआ है, जिस तरह बनी सख़्र के बकरों के घुटनों पर निशान होता है। (अल‑मुफ़ज़्ज़लिय्यात)

       नाबिग़ा ज़िब्यानी एक राहिब के मुतअ़ल्लिक़ कहता है कि:

سبیغ عذر اً اونجلحا من امری
الی ربہ رب البریة راکع

      तर्जुमा: अ़नक़रीब एक रुकूअ़ करने वाले राहिब की तरफ़ से ख़ुदा के हुज़ूर सब्र व मअ़ज़िरत पहुँचा दी जाएगी।

नमाज़ के बाद तस्बीह का इस्तेमाल


      अक्सर मुसलमान नमाज़ के बाद तस्बीह का इस्तेमाल करते हैं, जो मसीहियों की नुमायाँ तक़लीद है। चुनाँचे मुहम्मद रशीद रज़ा, जो मिस्र का एक बुलंद‑पाया आलिम और अल‑मिनार का जो बेहद मशहूर व मअरूफ़ अख़बार है, एडिटर है, लिखता है कि:

کناتری ھذہ السبح فی ایدی القسسین من النصاری والرھبان والرھبات ونسمع انھا ماخوذ ة عن البرا ھمہ والظا ھران السملین اخذوھا اولاً عن النصاری فکانو فی مھد الا سلام عند ظھور ہ فی جزو برة العرب ونی البلاد المجاورة لھا لاشام ومصر فلابد ان یکونو اقدا اخز وا المسحة عنھم فیما اخذ ومن اللباس والعادات ، والا مر فی السجة ینبعی ان یکون اشد من اخد غیرھا عنھم لانھا تد خد فی العبادة وتعد شعارً فالسجة من البلاع الداخلة فی العبادة (کذا)

      तर्जुमा: हम मसीही पादरियों और रहबानों और ज़ाहिदा औरतों के हाथों में अपनी आँखों से तस्बीह देखते हैं, जिस के मुतअ़ल्लिक़ हम ये सुनते थे कि ये ब्राह्मणों से माख़ूज़ है… हक़ीक़त ये है कि तस्बीह को मुसलमानों ने अव्वल ईसाइयों से लिया। क्योंकि मसीही मज़हब इस्लाम की इब्तिदा और उस के ज़ुहूर के वक़्त जज़ीरा‑ए‑अरब और उस के मुत्तसिला इलाक़ों, मसलन शाम और मिस्र में फैला हुआ था। जिस तरह मुसलमानों ने मसीहियों के लिबास और आदात को जज़्ब कर लिया, उसी तरह तस्बीह को भी मुस्तआर लिया। चूँकि तस्बीह का तअ़ल्लुक़ इबादत के साथ है, लिहाज़ा उस को निहायत एहतिमाम के साथ लिया गया… पस तस्बीह एक नई चीज़ है, जो इबादत में दाख़िल हुई है। (15:822)

मज़हबी रसूम

रोज़ा


      रोज़ा भी अर्कान‑ए‑इस्लाम में से एक रुक्न है। ज़माना‑ए‑जाहिलियत के मुशरिकों और बुत‑परस्तों को इस का इल्म मुतलक़ न था। अलबत्ता जब मसीही अरबिस्तान में दाख़िल हुए और उन का नुफ़ूज़ बढ़ता गया, तो अहले‑अरब को रोज़ा और उस के फ़वाइद व फ़राइज़ का इल्म हुआ। चुनाँचे उमय्या बिन अबी सुल्त मसीही रोज़ा‑दारों के जन्नत में दाख़िल होने और अज्र हासिल करने के मुतअ़ल्लिक़ कहता है कि:

اذا بلخہ التی اجرو الیھا
قصبلھم وھلد من یصوم

      मसीही यौम‑उल‑फ़सह के रोज़े को ज़्यादा अहमियत देते हैं। चुनाँचे ग़ैर बिन तौलिब कहता है कि:

درت کماصد حما لا یحل لہ
ساقی نصاریٰ قبیل الفصح سوام

       यानी जिस तरह कि एक मसीही रोज़ा‑दार उन चीज़ों से परहेज़ करता है, जो फ़सह है, रोज़े में हलाल नहीं हैं, उसी तरह मेरी महबूबा ने मुझ से परहेज़ (रूगरदानी) किया। अरब के मसीही रज्जब के महीने को रोज़े के लिए मख़्सूस समझते थे, और ये तीस दिन के रोज़े होते थे। लेकिन बा’ज़ कलीसाओं में तीस दिन से ज़्यादा रोज़े रखते थे।

       मसीही भी मुसलमानों की तरह शाम के वक़्त ग़ुरूब‑ए‑आफ़ताब के रोज़ा इफ़्तार किया करते थे। मुसलमानों के इफ़्तार और मसीहियों के इफ़्तार में ये फ़र्क़ है कि मुसलमान रात भर जितनी मर्तबा चाहें खा सकते हैं, लेकिन मसीही बजुज़ इफ़्तारी के वक़्त और किसी वक़्त नहीं खा सकते थे। मसीही रोज़ों के अय्याम में बजुज़ सब्ज़ी और फल के गोश्त और चरबी नहीं खा सकते थे। लेकिन मुसलमान के लिए गोश्त का खाना भी जायज़ रखा गया। अल्लामा टॉमस पीटरिक ह्यूज़ (Patrikognes) डिक्शनरी ऑफ़ इस्लाम सफ़्हा 534 में लिखते हैं कि “हमारे नज़दीक क़ौल‑ए‑राजिह ये है कि आँहज़रत ने तीस दिन के रोज़ों का उसूल मसीहियों से लिया है। मसीहियों का रोज़ा रात‑दिन का था, लेकिन आँहज़रत ने इस में तख़्फ़ीफ़ करके सिर्फ़ दिन के रोज़े को बरक़रार रखा। चुनाँचे सूरह बक़रा रुकूअ़ 171 में है कि:

یرید الله بکمہ الیسرولا یرید بکم العسر

      इसी तरह ख़त‑उल‑अबीज़ व ख़त‑उल‑असवद भी, जिस का ज़िक्र इसी सूरह के रुकूअ़ 183 में है, मसीहियों से माख़ूज़ है। चुनाँचे उमय्या बिन अबी सुल्त कहता है कि:

الخط الابیض ضوء الصبح منفلق
والخط الاسودلون اللیل مرکرم

       यानी ख़त‑ए‑अबीज़ (सफ़ेद ख़त) सुबह की रौशनी के ज़ाहिर होने को और ख़त‑ए‑असवद (ख़त सियाह) रात के अँधेरे के ज़ाहिर होने को कहते हैं।

       (ताज‑उल‑अ़रूस 5:137)

ज़कात


      ज़कात भी मुसलमानी अर्कान में से एक रुक्न है, जिस के इस्तिलाही म’अनी ये हैं कि चालीस हिस्सों में से एक हिस्सा ख़ुदा के लिए और ग़ुरबा व मसाकीन के लिए अ़लैहदा करना। शारिअ़ आम ने इस को भी यहूदी और मसीहियों की इलाही किताबों से लिया है। फ़र्क़ ये है कि अहले‑किताब के नज़दीक दीहकी (अ़शर, दसवा हिस्सा) फ़र्ज़ है और मुसलमानों के लिए चहेल‑यकी फ़र्ज़ है।

हज


       हज भी एक रुक्न‑ए‑मुसलमानी है। दरहक़ीक़त ये भी अरबिस्तान के मसीहियों की आदात व रस्म व रिवाज से माख़ूज़ है, क्योंकि इस्लाम से क़ब्ल मसीही मुख़्तलिफ़ मक़ामात में बतौर हज के जाया करते थे। ख़ास कर बैत‑उल‑मुक़द्दस का तो हर साल हज किया करते थे। चुनाँचे मुक़द्दस ऐरूनिमोस ने (400 ई की आख़िर, 500 ई॰ के शुरू) अपने एक रिसाले में उन मसीही अरबों का ज़िक्र किया है, जो बैत‑उल‑मुक़द्दस हज करने की ग़रज़ से गए थे। (Migne p. Lxx 11489870)

       इसी तरह अरबिस्तान के मसीही उस गिरजा के हज को जाया करते थे, जिस का नाम क़ैस था और जिस को अब्रहा ने फ़त्ह‑ए‑यमन के बाद सनआ में बनवाया था। (देखो इस मुक़द्दमा की जिल्द‑ए‑अव्वल)

       इसी तरह मसीहियों के बहुत से गिरजे थे, जिन का नाम का’बा था, जिन का ज़िक्र हम मुफ़स्सल तौर पर जिल्द अव्वल में कर चुके हैं।

       मसीही बा’ज़ गिरजों की चारों तरफ़ उसी तरह तवाफ़ करते थे, जिस तरह के मुसलमान ख़ाना‑ए‑काबा के चारों तरफ़ तवाफ़ करते हैं। चुनाँचे एक शायर कहता है कि:

یطوف العفاة بابوابہ
کطوف النصاری ییت الوشن

       यानी साइलीन उस के दरवाज़े का ऐसा ही तवाफ़ करते हैं, जिस तरह नसारा अपने सलीब‑ख़ाने के चारों तरफ़ तवाफ़ करते हैं। (लिसान‑उल‑अरब 17:334)

       एक और शायर, जिस का नाम अ़ंतरा (और बक़ौल बा’ज़ अब्द क़ैस बरहमी है), कहता है कि:

تمشی النعام بہ خلاء حولہ
مشی النصاری حول بیت الھیکل

       यानी जिस तरह नसारा हैकल के चारों तरफ़ फिरते हैं, उसी तरह शुतुर‑मुर्ग़ बाफ़राग़त उस के (महबूबा के घर के) चारों तरफ़ फिर रहे हैं। आग़ानी 7:148)

       मज़ीद ताईद के लिए सर सैयद मरहूम की एक किताब से ज़ैल इक़्तिबास पेश करते हैं:

       इस से ये सवाल पैदा होता है कि मज़हब‑ए‑इस्लाम क्या है। हम जवाब देते हैं कि मज़हब‑ए‑इस्लाम साइबी मज़हब के इलाही उसूल और अहकाम और मसाइल की तकमील, और इब्राहीमी मज़हब और अरब के दीगर इलाही मज़हबों के उसूल और अहकाम और मसाइल की तकमील और तरतीब, और यहूदी मज़हब के इलाही उसूल और अहकाम और मसाइल की क़रार‑वाक़ई तकमील, और अल्लाह जल्ल शानहु की वहदानियत की ऐसे आला दर्जा पर तौज़ीह, जो किसी और मज़हब में इस तकमील से नहीं थी, और जिस को हम वहदत‑फ़ी‑ज़ात और वहदत‑फ़ी‑सिफ़ात और वहदत‑फ़ी‑इबाद से ताबीर करते हैं, और अख़लाक़ के उन उसूलों की, जिन की हज़रत ईसा ने दरअस्ल तल्क़ीन की थी, तकमील है। और इन तमाम मज़हबों के इलाही उसूल और अहकाम और मसाइल की तकमील और इज्तिमाअ़ का नाम इस्लाम है। हम अपने इस जवाब को बा’ज़ मिसालों के हवाले से मुशर्रह करते हैं।

       मज़हब‑ए‑इस्लाम में दूसरे मअबूद की परस्तिश का इम्तिनाअ़ और बुत‑परस्ती का इस्तिसाल यहूदियों के मज़हब के उसूल के बिल्कुल मुमासिल है। तौरेत में लिखा है कि:

درحضور من تراز خدایان غیر باشند"( سفر خروج باب ۲۰ درس ۳)۔ بہرچہ شمارا مامورداشتم رعایت ناید واسم خدایان بجہت خود صورت تراشیدہ وہیچ شکل از چیز ہائیکہ درآسمان است دربالا ویا اور زمین است در پائیں ویا ور آب ہائے کہ درزیر زمیں است مساز۔ آنہارا سجدہ نہ نمودہ ایشاں راعبادت منما یرا کہ من خداوند خدائے توام (سفر خروج باب ۲۰ درس ۴، ۵) بہ بتہا توجہ منمائد وخدایان ریختہ شارہ از رائے خود مسازید خداوند خدائے شما منم" (سفر لویان باب ۱۹ درس ۴)۔ازبرائے خودتاں برتاں واصنام تراشیدہ شدہ مسازید نصب شدہا از برائے خود تاں برپائے منمائید ودرزمین خود تاں تصویر ہائے سنگے جہت سجدہ نمودتش مگذارید۔ زیرا کہ خداوند خدائے شمامنم "(سفر لویاں باب ۲۶ درس ۱)۔ خدا یان ایشاں راسجدہ نہ نمود بآنہا عبادت مکن موافق اعمال ایشاں عمل بلکہ ایشاں رابا لکل منہدم ساختہ وبت ہائے ایشاں بالتمام بشکن ۔"( سفر خروج باب ۲۲درس ۲۴)۔

      सब से बेहतर और आला अहकाम यहूदी मज़हब में ये हैं, जो ज़ैल में लिखे जाते हैं। इस्लाम में यही अहकाम बजिन्सह मौजूद हैं:

پدردمادر خود احترام نما ، قتل ، مکن ، زنا ، منما، درزی مکن، برہمسایہ ات شہادت دروغ مدہ۔ بخانہ ہمسایہ ات طور مورز" (سفر خروج باب ۲۰ درس ۱۲، ۱۷)۔

औक़ात‑ए‑नमाज़ जो इस्लाम में मुक़र्रर


       औक़ात‑ए‑नमाज़ जो इस्लाम में मुक़र्रर हैं और जिन की तादाद सात या पाँच या तीन हैं, मज़हब‑ए‑साइबी और मज़हब‑ए‑यहूद की औक़ात‑ए‑नमाज़ से बहुत मुशाबेह हैं।

       इस्लाम में नमाज़ पढ़ने का जो तरीक़ा है, वह साइबी मज़हब और यहूद के मज़हब के तरीक़े से निहायत मुमासिल है। नमाज़ दिल की सफ़ाई के लिए थी, और यही अस्ल मंशा नमाज़ के मुक़र्रर करने का था, और जिस्म और पोशाक वग़ैरह की सफ़ाई, जिस के वास्ते शरअ़‑ए‑इस्लाम में हुक्म है, साइबियों और यहूदियों की इस क़िस्म की रसूमात से बहुत कुछ मुशाबहत रखते हैं। तौरैत में ख़ुदा तआला ने मूसा से कहा कि:

نزد قوم روانہ شدہ ایشاں راامر وز فر د تقدیس نمائے تاکہ جامہ ہائے خود راسشست وشونمایند ۔"( سفر خروج باب ۱۹ درس ۱۰)۔

       پس موسیٰ ہارون وپسرانش رانزدیک آوردہ ایشاں رابہ آب شست وشوداد"(سفر لویان با ب ۸، ۶)۔

      मज़हबी उमूर में सिर्फ़ एक ही बात इस्लाम में नई है, जो किसी और मज़हब में नहीं पाई जाती, यानी नमाज़ के बुलाने के लिए यहूदियों की क़रनाए बजाने और ईसाइयों के घंटा बजाने के बदले अज़ान मुक़र्रर की गई है। इस निरालेपन की निस्बत एक ईसाई मुसन्निफ़ इस तरह पर लिखता है कि:

“मुख़्तलिफ़ औक़ात‑ए‑नमाज़ की इत्तिला मुअज़्ज़िन मस्जिदों की मीनारों या माज़नों पर खड़े होकर अज़ान देने से करते हैं। उन का लह्न, जो एक बहुत सादा मगर संजीदा लहजे में बुलंद होता है, शहरों की दूसरी दोंद‑पुकार में मस्जिद की बुलंदी से दिलचस्प़ और ख़ुश‑आवाज़ मालूम होता है। लेकिन सुनसान रात में इस का असर और भी अजीब तौर से शाइराना मालूम होता है। यहाँ तक कि अक्सर फ़िरंगियों की ज़बान से भी पैग़म्बर साहब की तारीफ़ निकल गई है कि यहूदियों के मअबद की क़रनाए और कलीसियाए नसारा के घंटों की आवाज़ के मुक़ाबले में इंसानी आवाज़ को पसंद किया।”

       तमाम क़ुर्बानियाँ, जो मज़हब‑ए‑इस्लाम में जायज़ हैं, मज़हब‑ए‑यहूद की क़ुर्बानियों के मुशाबेह हैं। गोया ये क़ुर्बानियाँ शारिअ़ इस्लाम ने मज़हब‑ए‑यहूद की बे‑शुमार क़ुर्बानियों से मुन्तख़ब कर ली हैं, और जो ताकीद हुक्म मज़हब‑ए‑यहूद में इन क़ुर्बानियों के करने की निस्बत था, उस को निहायत ख़फ़ीफ़ बल्कि इख़्तियारी कर दिया है।

       मज़हब‑ए‑इस्लाम में जो रोज़े मुक़र्रर हैं, वो भी मज़हब‑ए‑यहूद और मज़हब‑ए‑साइबी के रोज़ों से मुशाबेह हैं, बल्कि साइबी मज़हब के रोज़ों से ब‑निस्बत यहूदी मज़हब के रोज़ों के ज़्यादा मुशाबहत रखते हैं।

       हफ़्ते के एक मुअ़य्यन दिन में नमाज़ और दीगर रसूम मज़हबी के मुक़र्ररा वक़्त पर लोगों को कारहाए‑दुनियवी से मना करना यहूदियों की इसी क़िस्म की रस्म से मुताबक़त रखता है। लेकिन हज़रत इब्राहीम के ज़माने से अहले‑अरब जुमा को मुतबर्रक दिन समझते आए हैं।

ख़तना और दीगर मसअले


      ख़तना भी वही, जिस का यहूद और पैरोकार हज़रत इब्राहीम के यहाँ दस्तूर था। निकाह और तलाक़ भी क़रीब‑क़रीब वैसा ही क़ायदा है, जैसा कि और मज़ाहिब‑ए‑इलाही में था। तौरैत में लिखा है कि:

اگر کسے زنے اگرفتہ بہ نکاح خود درآور دوواقع شود کہ بہ سبب چر کینے کہ دریافت شددر نظرش التفات نہ یا بد آنگاہ طلاق نامہ نوشتہ بدستش بدہد اور ازخانہ اش رخصت وہد" (سفر توریہ مثنی باب ۲۴ درس ۱)۔

       बा’ज़ औरतों से निकाह करने के जवाज़ में जो अहकाम मज़हब‑ए‑इस्लाम में हैं, वो अक्सर बातों में यहूदियों के मज़हब के अहकाम से मुशाबेह हैं।

       जब मर्द और औरत को मस्जिद में जाने या क़ुरआन मजीद छूने का इम्तिनाअ़, उन ही दस्तूरों से मुशाबहत रखता है, जो मज़हब‑ए‑यहूद में जारी हैं। मगर फ़र्क़ इतना है कि मज़हब‑ए‑इस्लाम में ब‑निस्बत मज़हब‑ए‑यहूद के ये इम्तिनाअ़ कम सख़्ती से है।

       सुअर के गोश्त खाने की मुमानअ़त मज़हब‑ए‑इस्लाम में वैसी ही है, जैसी कि बनी‑इस्राईल के मज़हब में थी। तौरैत में लिखा है:

دخوک باوجود یکہ ذی سم چاک وتمام شگاف است امانوش خوارنمی کنداں برائے شما ناپاک است ( سفر لویان باب ۱۱ درس ۷)۔

       जानवरों के हलाल या हराम होने और मरे हुए जानवर का गोश्त न खाने की निस्बत जो अहकाम मज़हब‑ए‑इस्लाम में हैं, वो मूसवी शरीअ़त के निहायत ही मुशाबेह हैं, बल्कि उ़लमा‑ए‑इस्लाम ने वो तमाम मसाइल मूसवी शरीअ़त से मुस्तन्बत किए हैं।

       शराब‑ख़ोरी और दीगर मुस्किरात का इम्तिनाअ़ भी मूसवी शरीअ़त के मुशाबेह है। तौरैत में है कि:

(ہنگام درآمد ن شمابہ خیمہ شراب ومسکرات رامخورید " سفر لویان باب ۱۰ درس ۹

       मगर मज़हब‑ए‑इस्लाम ने उस ख़राबी की, जो शराब से होती है, पूरी बंदिश कर दी है, यानी शराब को बिलकुल हराम कर दिया है और किसी वक़्त पीने की इजाज़त नहीं है।

       मज़हब‑ए‑इस्लाम में मुख़्तलिफ़ जराइम और तअ़ज़ीरात की निस्बत जो सजाएँ मुक़र्रर हैं, वो भी उन सजाओं से, जो मूसवी शरीअ़त में हैं, निहायत दर्जा मुशाबहत रखती हैं। ज़िना की सज़ा सौ कोड़े मारना मज़हब‑ए‑इस्लाम में है। ये सज़ा यहूदियों के क़ानून से मुख़्तलिफ़ है। लेकिन जो उ़लमा‑ए‑इस्लाम ये समझते हैं कि मज़हब‑ए‑इस्लाम में भी ज़िना की सज़ा संगसार करना है, तो ये सज़ा यहूदियों के मज़हब से बिलकुल मुमासिलत रखती है। (अल‑ख़ुत्बात अल-अहमदिया, सफ़्हा 144 ता 147)

استلام الحجر الاسود
حجر اسود کاچومنا

      मुसलमान जब हज करने जाते हैं, ख़ाना‑ए‑का’बा का तवाफ़ करते हैं और हज्र‑ए‑असवद देते हैं, जो एक लाज़िमी अम्र है। हज़रत उमर जब हज्र‑ए‑असवद के पास आए तो आप ने उस को बोसा देकर कहा कि: انی اعنمہ انک حجرہ تفرولا تنفع ولولا انی رائت رسول الله صلعمہ یقبلک ما قبلک यानी मैं जानता हूँ कि तू सिर्फ़ एक पत्थर है, जो किसी को नुक़सान और नफ़अ़ नहीं पहुँचा सकता है। अगर मैं रसूलल्लाह ﷺ को तुझे बोसा देते न देखता तो मैं तुझे हरगिज़ बोसा न देता। (बुख़ारी 2:147)

      कुछ बईद नहीं कि ये रस्म भी अरबिस्तान के उन मसीहियों की तक़लीद हो, जो कुतुब‑ए‑मुक़द्दसा के उसूल से नावाक़िफ़ थे। क्योंकि ये लोग जब बैत‑उल‑मुक़द्दस की ज़ियारत को जाते थे तो उस क़ब्र को, जिस में हुज़ूर (मसीह) की लाश सलीब के बाद रखी गई थी और जिस से हुज़ूर ज़िंदा होकर निकले थे, बोसा देते और उस रिवायती पत्थर को, जिस के मुतअ़ल्लिक़ यह बयान किया जाता है कि हुज़ूर (मसीह) उसी पत्थर पर से आसमान की तरफ़ चले गए और जिस पर आप का नक़्श‑ए‑क़दम चस्पाँ है, बोसा दिया करते थे।

नज़र‑ओ‑नियाज़


       अबू‑वलिद अज़‑ज़रक़ी अपनी किताब अख़बार‑ए‑मक्का (सफ़्हा 128 व 129) में लिखते हैं कि अख़ज़म बिन आस जुरहमी की बीवी बाँझ थी। उस ने ये मन्नत मानी कि अगर ख़ुदा मुझे लड़का इनायत करे तो उस को मैं ख़ाना‑ए‑का’बा की ख़िदमत के लिए वक़्फ़ कर दूँगी। चुनाँचे अख़ज़म की सुल्ब से ग़ौस पैदा हुआ, जिस को उस ने ख़ाना‑ए‑का’बा की ख़िदमत‑गुज़ारी के लिए मख़्सूस किया।

       जिस ने कुतुब‑ए‑मुक़द्दसा का ब‑ग़ौर मुतालआ किया है, वो जानता है कि इस क़िस्म की नज़्र अहले‑किताब के साथ मख़्सूस थी और उन्हीं में जारी थी। चुनाँचे हन्ना ने बहालत‑ए‑अ़क़्र यही नज़्र मानी थी, और जब हज़रत समूएल पैदा हुए तो उन को हैकल की ख़िदमत के लिए वक़्फ़ किया। नीज़ ख़ुद क़ुरआन‑ शरीफ़ में मरयम सिद्दीक़ा की नज़र का मुफ़स्सल बयान है।

मसाजिद की शक्ल देना


       इस में कोई शक नहीं कि जब मुसलमानों ने मसाजिद के बनाने का इरादा किया, तो इब्तिदा उन्होंने मसीहियों के मआबिद की नक़्ल उतारने पर इक्तिफ़ा किया। और बा’ज़ बड़े‑बड़े मआबिद में बराए‑नाम रद्द‑ओ‑बदल करके उन को मस्जिद में तहवील किया। चुनाँचे जामेअ़ उमवी दमिश्क हैं, जामेअ़ अक़्सा बैत‑उल‑मुक़द्दस में, हमात व हल्ब के जवामेअ़ और क़ुस्तुन्तनिया के अबू‑सोफ़िया इस पर शाहिद हैं।

       मरहूम वान‑बरकम (Vanbrchom Vonbirchom) बहुत से जवामेअ़ के सहन, रिवाक़, उ़मूद, सक़्फ़, मिहराब, मिम्बर, मक़्सूरा, मीनारे को मसीहियों के मुख़्तलिफ़ मआबिद की इन्हीं अश्या से मुक़ाबला करके कहता है कि “इन जवामेअ़ की शक्ल और हैइयत मसीहियों के मआबिद से कामिल तौर पर मुशाबेह हैं।” (इंसाइक्लोपीडिया ऑफ़ इस्लाम, सफ़्हा 428)

      नीज़ ज़ैल की कुतुब मुलाहिज़ा हों:

       1. किताब सलादीन फ़ील‑फ़ुनून‑ए‑इस्लामिया (100701)

       2. किताब तवारीख़‑उल‑इस्लाम अज़‑बरन्स का तीनाई

       3. मज़ल्ला‑ए‑इस्लाम बेकर (111‑993)

       4. किताब अस‑सिनाअ़त‑उल‑अरबिया अज़‑गीत (सफ़्हा 27, 58)

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