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आलमगीर मज़हब

He who falls on this stone will be broken to pieces, but he on whom it falls will be crushed
Matthew 21: 44


The Universal Religion

By

Late Rev P. Kevel Singh Amar Sidhu
American Presbyterian

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अल्लामा पी॰ केवल सिंह अम्र सिद्धू (मर्हूम)

अमरीकन प्रेसबिटेरीन

1925 ई॰

दीबाचा



      मसीही पब्लिक से मख़्फ़ी (छिपा) नहीं कि इस साल के आग़ाज़ में ख़्वाजा कमाल-उद्दीन साहब बी॰ ए॰ एल॰ एल॰ बी॰ ने जो लाहौर के एक ज़ी मर्तबत शख़्स हैं। और बारह साल तक यूरोप में अहमदियत की तब्लीग़ करके और आख़िरकार उस को तिलांजलि (अलविदा) देकर और सुन्नी मुसलमान बनकर हिन्दुस्तान में वापस तशरीफ़ फ़र्मा हुए हैं। मसीहिय्यत के ख़िलाफ़ एक किताब लिखी है जिसका नाम “यनाबीअ-उल-मसीहिय्यत” रखा है यानी “माख़ज़ात-ए-मसीहिय्यत” और यनाबीअ-उल-इस्लाम के जवाब में तैयार की है। मेरी दरख़्वास्त पर ख़्वाजा साहब ने इस किताब की एक जिल्द बड़ी मेहरबानी से मुफ़्त मेरे पास भेज दी। इस के लिए मैं आपका शुक्रगुज़ार हूँ। मैंने इस किताब को बग़ौर ख़ौज़ पढ़ा इस के हर पहलू पर नज़र डाली ये किताब आँजनाब की बारह (12) बरस की महनत-ए-शाक़ा, लगातार मुशाहिदा और तजुर्बा और वसीअ मुतालआ का नतीजा है। मेरे मोहतरम दोस्त ने इस्तिदलाल तशाबुह-बैन-शैईन (मिलती-जुलती खासियतों) से इस अम्र को साबित करने की सख़्त मगर बेफ़ायदा कोशिश की है कि मसीही मज़्हब, नैनवा, बाबिल, मिस्र, यूनान, सरिया, फ़िलिस्तीन वग़ैरह-वग़ैरह तक़रीबन बारह चौदह मुल्कों के बाशिंदों के जो क़दीम ज़माने में और मसीहिय्यत के ज़हूर से सैंकड़ों बरस पेश्तर हो गुज़रे हैं, उन के मज़्हब से, यूनानी और यहूदी फ़ल्सफ़ा से और क़दीम मजूसियों के इल्म नुजूम से माख़ूज़ हैं।

      क़दीम मसीही राहिबों ने मसीही मज़्हब को हर दिल-अज़ीज़ बनाने के लिए उनकी तमाम बातों को मसीह और मसीहिय्यत पर मन व अन (जैसे के तैसे) चस्पाँ कर दिया है। किताब का अस्ल-ए-मुद्दआ और उसके मज़ामीन का लुब्ब-ए-लुबाब (खुलासा) तो यही है। मगर इंग्लिस्तान के चर्च आफ़ इंगलैंड के बा’ज़ बिशपों और पादरी साहिबान के मो’तक़िदात (जो मालूम नहीं कहाँ तक सही बताए गए हैं) और रोमन कैथोलिकों की रसूमात वग़ैरह के बयानात और दीगर उमूर के तकरारात से हुजम किताब का ज़्यादा कर दिया गया है, ताकि किताब की तौक़ीर ज़्यादा हो जाए।

      लिखाई छपाई आला है। काग़ज़ उम्दा लगाया है, ताकि किताब ज़्यादा दिलरुबा बन जाये। अल-ग़र्ज़ किताब को अपने हस्बे मंशा बनाने में कोई बैरूनी (बाहरी) कसर बाक़ी नहीं रखी। अपनी इल्मियत व काफ़ियत और तजुर्बात वग़ैरह से सारा ज़ोर लगा दिया है मगर जो कुछ लिखा है वो सब, मुसन्निफ़ के हक़ीक़ी मक़्सद से ऐसा ही दूर है जैसे मशरिक़ से मग़रिब। बरअक्स इस के इन तमाम बातों से मसीही मज़्हब की असलीब उस का मिंजानिब अल्लाह और आलमगीर होना बख़ूबी साबित होता है या दूसरे अल्फ़ाज़ में मसीहिय्यत की हक़्क़ानियत व क़दामत पर उस की ज़रूरत और आलमगीर मज़्हब होने पर क़दीम क़ौमों के अक़ाइद व फ़ल्सफ़ा और आलम नुजूम की सिगाना (तीन क़िस्म की) शहादत है, गोया मुसन्निफ़ के मंशा के ख़िलाफ़ है। ताहम, जबरन उसके क़लम से नामालूम तौर पर निकल गया। जिससे किसी पहलू से भी मसीहिय्यत की मुख़ालिफ़त नहीं हो सकती। बल्कि बरख़िलाफ़ इस के बड़े ज़ोर के साथ मु’आवनत व मुसाइदत (मदद) होती है। यही अम्र इस किताब के जवाब में मल्हूज़ रखा है। और इस को बख़ूबी साबित किया है। और इसी वजह से इस रिसाले का नाम भी “आलमगीर मज़्हब” रखा है।

      मेरे क़ाबिल ताज़ीम करम फ़र्मा ख़्वाजा कमाल-उद्दीन साहब ने अपनी किताब “यनाबीअ-उल-मसीहिय्यत” में यूरोप के इन बड़े-बड़े मुहक़्क़िक़ीन की किताबों से हवाले दिए हैं :-

      जो मुसन्निफ़ीन ने मज़्कूर बाला क़ौमों के मज़ाहिब की तहक़ीक़ में लिखें और उन का मुक़ाबला मसीही मज़्हब के उमूरात दीनिया से किया है। मगर मैंने इस जवाब के लिखने में उनकी तरफ़ बिल्कुल तवज्जोह नहीं दी और ना ही दीगर कुतुब का मुतालआ किया है। हाँ सिर्फ़ दो तीन किताबों से इस्तिंबात किया है जो मेरी दस्तरस में थीं। बाक़ियों से क़तअन और दीदा-दानिस्ता (जानबूझ कर) इग़्माज़ किया है। क्योंकि मेरी दानिस्त में उनके मुतालए की न सिर्फ ज़रूरत ही ना थी, बल्कि फ़ुज़ूल था। क्योंकि वो सारी बातें ना सिर्फ हमारे बरख़िलाफ़ ही नहीं, बल्कि हमारे इंदिया (नज़रिये) की मूयद (ताईद) हैं। इसलिए कि जो हमारे ख़िलाफ़ नहीं वो हमारी तरफ़ है। और फिर ख़्वाजा कमाल-उद्दीन की किताब “यनाबीअ-उल-मसीहिय्यत में इस क़द्र मवाद भरा पड़ा है, कि हमारे मुद्द’आ और मक़्सद के लिए काफ़ी है गोया, मुद्द’ई ख़ुद अपने मुद्द’आ और दा’वे के ख़िलाफ़ बयान देता और सबूत पेश करता है। ख़्वाजा साहब ने अपने ज़ो’अम (ख़याल) में गोया “पकाई थी खीर मगर, हो गया दलिया” लेकिन मसीहिय्यत के लिए वो वाक़ई ख़ैर साबित हुई है। जैसा कि जवाब हज़ा से ज़ाहिर है।

      आख़िर में शहनशाह दो जहान व ख़ालिक़ कौन-ओ-मकाँ और साहिबे रहमत इमतिनान हमारे आक़ा व मौला सय्यदना ईसा मसीह के ज़रीये हमारे बाप से जो आस्मान पर है इस अहकर-उल-ईबाद की बसदक़ दिल यही दुआ है, कि वो इस नाचीज़ हदिया को अपने नाम की बुज़ुर्गी और जलाल के लिए इस्तिमाल करे यहां तक कि “वो बढ़े और मैं घटूँ”

                        क़सूर ज़िला लाहौर                  राक़िम मसीह का अदना ख़ादिम
                        27 जूलाई 1924 ई॰                  पी॰ के॰ ऐस॰ अमर सिद्धू



तफ़्सीली जवाब: इलाही मज़्हब वाहिद-ए-क़दीम और
आलमगीर है



      ख़्वाजा कमाल-उद्दीन साहब ने अपनी किताब “यनाबीअ-उल-मसीहिय्यत” की इब्तिदा में जिसका ये जवाब है, एक दीबाचा लिखा है जिसका उन्वान है “सदा-ए-सौत मक्का” मुकर्रमा है इस में सबसे पहले ये दिखाया है कि अगर मज़्हब ख़ुदा की तरफ़ से था, तो ज़रूर था कि हर एक क़ौम को एक ही शक्ल में दिया जाता। और कोई क़ौम उस की बरकत से ख़ाली ना रहती।… रब-उल-आलमीन ने जिस्मानी परवरिश के लिए ना तो किसी ख़ास क़ौम की तरफ़दारी की ना किसी से बुख्ल (कंजूसी) किया। जो कुछ एक क़ौम को दिया, वही दुनिया की सब क़ौमों को दिया ऐसे ख़ुदावंद की रबूबियत ताम्मा इस बात की ही मुक़्तज़ी थी, कि उसकी तरफ़ से वो मुबारक चीज़ जिसका नाम मज़्हब है, हर एक इन्सान के हिस्से में यकसाँ आए।... मुख़्तलिफ़ मज़ाहिब के मानने वालों में उखुव्वत व इत्तिफ़ाक पैदा करने के लिए इस से बेहतर और क्या तालीम हो सकती थी, कि दुनिया में हर क़ोम की तरफ़ ख़ुदा के नबी आए। दुनिया के सब मज़ाहिब अपनी असली हेइय्यत व सूरत में एक ही सरचश्मा से निकले, और एक ही तालीम लाए।.... हम सब एक ही मम्बा’अ से निकले हैं। और एक ही सरचश्मा से हमें ज़िंदगी का पानी पिलाया गया है। लेकिन इन्सानों ने इस मुसफ़्फ़ा और पाकीज़ा पानी को, जो वह्यी इलाही की शक्ल में ख़ुदा की तरफ़ से सब के लिए यकसाँ नाज़िल हुआ, मुख़्तलिफ़ आमेज़िशों से गंदला कर दिया, जो इन्सानों में फ़साद और इख़्तिलाफ़ का बाइस हो गया, और इस हक़ीक़त से कोई इन्कार नहीं कर सकता, अगर ख़ुदा सब का ख़ुदा है। और वो बिल-ज़रूर सब का है, तो ये हक़ीक़त बदीही (ज़ाहिर) है, कि सबकी तरफ़ ख़ुदा का एक ही मज़्हब आना चाहिए उस के आगे क़ुर्आन की ये आयत लिखी है।تا اللہ لقد ارسلنا الی امہ من قبلک نزین لھم الشیٰطن اعما لھمہवग़ैरह।

      ख़ुदा ख़्वाजा कमाल-उद्दीन का भला करे कि उसने इब्तिदा ही में ये उसूल क़ायम कर दिया है, कि ख़ुदा का एक ही मज़्हब है जो हर ज़माने और मुल्क की हर क़ौम को बिला-तरफ़दारी और बुख्ल के सब को यकसाँ, दिया गया है। वो अपनी असली हेय्यत व सूरत में एक ही सरचश्मा से निकले और एक ही तालीम लाए। मगर इन्सानों की मुख़्तलिफ़ आमेज़िशों ने उसे गंदला कर दिया।

      शैतान ने उन के आमाल पर मुलम्मह साज़ी (सोने चाँदी का पानी चढ़ाना) करके उन को ख़ूबसूरत कर दिखाया, दर-अस्ल वो सब बातें अस्ल मज़्हब पर रंग साज़ी हैं। जिससे अस्ल मज़्हब ख़राब हो गया। आप एक और जगह लिखते हैं कि “इन्सान की मुश्रिकाना तबीअत ने अल-इलहियात छोड़कर हर एक मज़हर-ए-क़ुद्रत को बुत-परस्ती के रंग में रंग दिया है।” और फिर दूसरी जगह तहरीर फ़र्माते हैं कि “इल्हाम-ए-इलाही इन्सानी हाथों से मग़्शूश (मिलावटी) हो गया।”

      ये सब सच है और हक़ीक़त है। ख़्वाजा साहब से हमको इत्तिफ़ाक़ है। मगर क़ुर्आन को इस बात के ज़ाहिर कर देने पर क्या नाज़ हो सकता है? जबकि इस से बहुत मुद्दत पेश्तर (पहले) कुतुब मुक़द्दसा साबिक़ा में इस हक़ीक़त को इब्तिदा ही से मुन्कशिफ़ (ज़ाहिर) कर दिया गया है कि शैतान ने हव्वा के सामने अस्ल मज़्हब को कैसी सूरत में पेश कर दिया था। ऐसा कि उस की इस जू फ़रोशी और गंदुम नुमाई के असर में आकर वो बोल उठी कि “वो दरख़्त खाने में अच्छा, और देखने में ख़ुशनुमा, और अक़्ल बख़्शने में ख़ूब है” और फिर नूह के ज़माने में ख़ुदा ने नूह से फ़रमाया था कि “ज़मीन बिगड़ गई, क्योंकि हर एक बशर ने अपनी-अपनी तरीक़ को ज़मीन पर बिगाड़ा था।” हज़रत सुलेमान फ़र्माते हैं कि “मैंने सिर्फ इतना पाया कि ख़ुदा ने इन्सान को रास्त बनाया, पर उन्हों ने बहुत सी बंदिशें तज्वीज़ करके बांधी।” और कि, यानी उन बेईमानों के वास्ते जिनकी अक़्लों को “इस जहान के ख़ुदा ने अंधा कर दिया है, ताकि मसीह जो ख़ुदा की सूरत है, उसके जलाल की ख़ुशख़बरी की रोशनी उन पर न पड़े।” और पतरस रसूल फ़रमाता है कि “अब मुझे पूरा यक़ीन हो गया कि ख़ुदा किसी का तरफ़दार नहीं, बल्कि हर क़ोम में जो उस से डरता और रास्तबाज़ी करता है, वो उस को पसंद आता है।” और सय्यदना मसीह ने कड़वे दानों की तम्सील में फ़रमाया है, कि “घर के मालिक ने तो अच्छा बीज बोया था, मगर लोगों के सोते में उस का दुश्मन आया। और गेहूँ में कड़वे दाने भी बो कर चला गया।” इन आयात से साबित है, कि ख़ुदा ने हर क़ोम को एक ही और ख़ालिस मज़्हब अता फ़रमाया था, मगर शैतान की उस पर तम’आ साज़ी और अफसाने की आमेज़िश ने उसको ख्वाब कर दिया। या ख़्वाजा साहब के लफ़्ज़ों में इल्हाम इलाही इन्सानी हाथों से लग़शोश (मिलावटी) हो गया। अगरचे उन्हों ने ख़ुदा को जान तो लिया, मगर उस की ख़ुदाई के लायक़ उस की बड़ाई और शुक्रगुज़ारी ना की, बल्कि बातिल ख़यालात में पड़ गए और उनके बेसमझ दिलों पर अंधेरा छा गया। वो अपने आपको दाना (अक़्लमंद) जता कर बेवक़ूफ़ बन गए, और ग़ैर-फ़ानी ख़ुदा के जलाल को इन्सान, और परिंदों, और चौपायों, और कीड़े-मकोड़ों की सूरत में बदल डाला।”

      नाज़रीन देख सकते हैं कि ख़्वाजा साहब का मक़्सद किताब से तो ये मालूम होता है, कि मसीहिय्यत को दीगर अक़्वाम क़दीमा के मज़ाहिब से निकाला हुआ तो साबित करें, जैसा आगे चल कर ज़ाहिर हो जाएगा। मगर गौर से मुलाहिज़ा फ़रमाएं कि इस उसूल को, जिसको बुनियादी तौर पर ख़्वाजा साहब ने अपने इफ़्तिताही (शुरूआती) मज़्मून में क़ायम किया है, इस का मक़्सूद असली से क्या निस्बत और ताल्लुक़ है? मगर हमारे इस मज़्मून के मज़्कूर उन्वान की इस से बड़ी भारी ताईद होती है, जिसका मतलब ये है कि मसीहिय्यत ही वो वाहिद, क़दीम और आलमगीर मज़्हब है जो हक़ सुब्हानहु ने इब्तिदा ही में हर क़ोम को, हर इन्सान को यकसाँ दिया था, जिसकी मुशाबहत दीगर क़दीम अक़्वाम के अक़ाइद के साथ, जिसका ज़िक्र ख़्वाजा साहब ने अपने मज़्मून “असातीर-उल-अव्वलीन” में किया है, क़रीबी होने के सबब से हमारे दावे की तस्दीक़ होती है, ना कि ख़्वाजा साहब के मुद्द’आ की। साफ़ ज़ाहिर है कि ख़्वाजा साहब अपने मक़्सद आला से किस क़द्र ऐन इब्तिदा ही दूर जा पड़े हैं। इस वक़्त मुझे वही शेअर याद आता है, जो ख़्वाजा साहब ने यनाबिअ-उल-मसीहिय्यत के सफ़्हा 122 पर “मसीही कलीसिया के मुअम्मार” के उन्वान के नीचे लिखा है।

      ख़्वाजा साहब की कुल इमारत “ख़िश्त अव्वल ही” कज रखी गई, जिस पर कि सारी इमारत किसी और तरफ़ झुक गई है। बलआम गया था बनी-इस्राईल पर लानत करने, ख़ुदा ने उसी के मुँह से हमें बरकत दिलाई, क्योंकि बनी-इस्राईल उस की चुनी हुई क़ौम थी। यही हाल ख़्वाजा साहब का मसीहिय्यत के साथ है। ख़्वाजा साहब वकील भी हैं, मगर इस्लाम की वकालत करते हुए अपने बयान में अपने दावे से ऐन शुरू ही में दूर जा पड़े हैं। और सारा बयान हमारे हक़ में है।

      आगे चल कर लिखते हैं कि “ये अम्र भी नामुम्किन है कि ख़ुदा त’आला एक वक़्त इन्सान को सही रास्ता बताए, लेकिन जब इन्सान अपनी ग़लतकारी से वो रास्ता खो बैठे या उस की शक्ल व सूरत बदल दे, तो वो हादी हक़ीक़ी ख़ामोश रहे और इन्सान को ग़लती पर क़ायम रहने दे। इसी तरह ये अम्र भी उस की शान तौहीद से दूर नज़र आता है कि वो पहले तो एक राह हिदायत तज्वीज़ करे, फिर हज़ारों बरस के तजुर्बे के बाद वो राह जब उसे मुफ़ीद नज़र ना आए, तो उस की जगह एक और राह तज्वीज़ करे, जैसा कि कलीसिया की तालीम है। ये तो उस के इल्म अज़ली पर एक बदनुमा धब्बा है। सच है, रब-उल-अफ़्वाज फ़रमाता है, “मैं ख़ुदावंद हूँ, मैं बदलता नहीं।” और बलआम कहता है, “ख़ुदा इन्सान नहीं जो झूट बोले, ना आदमी ज़ाद है कि पशेमान हो।” बेशक ख़ुदा जो है, उसकी राह कामिल है। और जो कुछ वो करता है, अपने मुक़र्ररा इंतिज़ाम और इल्म साबिक़ के मुवाफ़िक़ करता है। मगर ज़हूर उस का बनी नूअ इन्सान के सामने उस की हालत और तबीअत के मुताबिक़, ख़ास-ख़ास मुक़र्ररा वक़्त और सूरत में हुआ करता है।

      उस की राहें कामिल हैं, जिन में किसी क़िस्म का नुक़्स या कमी नहीं है। मज़्हब का इन्कशाफ बतद्रीज होता है। इस दुनिया में पैदाइश, परवरिश, नशो-नुमा में हम तबीअत आलम या सुन्नत-ए-इलाही ये देखते हैं कि उनके हर एक काम तद्रीजी होते हैं, यकलख़्त आन की आन में कोई भी शैय या काम अल्लाह त’आला का ज़हूर में नहीं आता।

      हस्बे मौक़ा और हस्ब ज़रूरत, ख़ुदा के सारे काम बतद्रीज और इंतिज़ाम के साथ होते हैं। ख़ुदा बेइंतिज़ामी का बानी नहीं है। तो क्या मज़्हब के बारे में ये क़ानून उस का नुक़्स साबित करता है? मज़्हब हक़्क़ा की, जो नूह से लेकर बल्कि आदम से लेकर मसीह ख़ुदावंद तक आया, ज़ाहिरी शक्ल और सूरत बतद्रीज नमूदार होती रही, जिसका तकमिला मसीह में हो गया।

      दरख़्त में पहले सिर्फ गोल सी छोटी सी हरे रंग की डोडी होती है, फिर वो रफ़्ता-रफ़्ता कली बन जाती है, फिर फूल बनता है, फूल से फल बनता है, जो इब्तिदा में बहुत छोटा और मामूली शक्ल का और बदमज़ा होता है, मगर थोड़े ही अर्से में जो उस के लिए मुक़र्रर होता है, और जूँ जूँ उस की तरक़्क़ी के सामान मुहय्या होते जाते हैं, वो आख़िरकार पूरा बढ़कर पक जाता है, अपनी परवरिश और शक्ल में ख़ूबसूरत, और ज़ायक़े में मज़ेदार, और खाए जाने के क़ाबिल बन जाता है। मज़्हब के बारे में भी हम यही क़ानून अमल-दर-आमद होता हुआ देखते हैं, जैसा कि किताब-ए-मुक़द्दस के मुताल’ए से ज़ाहिर होता है।

      जो क़वानीन माद्दी आलम में जारी और तारी और सारी हैं, वही रूहानियत में भी क़ायम और ज़ेर-ए-अमल हैं। जब सहीफ़ा फ़ित्रत और सहीफ़ा इल्हाम एक ही मुसन्निफ़ हक़ सुब्हानहु की तस्नीफ़ से हैं, तो क्या वजह है कि एक में तो कुछ और क़ानून पाए जाएं और दूसरे में कुछ और? जब मुक़न्निन (कानून बनाने वाला) एक है, तो उस का क़ानून भी एक है। जब तब’ई मज़्हब एक है, तो अख़्लाक़ी और रुहानी मज़्हब भी एक ही होंगे, अगर एक में तद्रीज और तरक़्क़ी का क़ानून जारी है, तो दूसरे आलम में ये क्यों जायज़ नहीं हो सकता?

      लेकिन ये उस का नुक़्स नहीं, ये क़ानून है, जो राह हम उस की आज देखते हैं, वही हज़ारों बरस पेश्तर और हर क़ौम में देखते हैं, “गो इन्सान अपनी ग़लतकारी से वो रस्ता खो बैठे या उस की शक्ल व सूरत बदल दे।” ताहम मुम्किन है कि वो हादी हक़ीक़ी ख़ामोश रहे और इन्सान को ग़लती पर क़ायम रहने दे। मसीह का भी दुनिया में आना ऐन वक़्त पर हुआ (रोमियों 5:6)

      “चुनान्चे उस ने अपनी मर्ज़ी के भेद को अपने उस नेक इरादे के मुवाफ़िक़ हम पर ज़ाहिर किया, जिसे अपने आप में ठहरा लिया था, ताकि ज़मानों के पूरे होने का ऐसा इंतिज़ाम हो कि मसीह में सब चीज़ों का मजमूआ हो जाए, ख़्वाह वो आस्मान की हों, ख़्वाह ज़मीन की। इसी में हम भी उस के इरादे के मुवाफ़िक़, जो अपनी मर्ज़ी की मस्लिहत से सब कुछ करते है, पेश्तर मुक़र्रर होके मीरास हैं।” (इफ़िसियों 1 बाब 9 से 11 आयत) पस उस हादी हक़ीक़ी ने वही रस्ता मसीह में दिखाया, जो नूह के ज़माने से बल्कि उस के पेश्तर आदम और हव्वा के ज़माने से मुक़र्रर था, और चला आता है, जिसको ख़्वाजा साहब “मज़्हब हक़्क़ा” के नाम से मौसूम करते हैं।

      और ख़्वाजा साहब का ये कहना कि अहले-किताब “किताब-उल्लाह” को मुहर्रफ़ कर चुके थे, ना सिर्फ ख़िलाफ़-ए-वाक़िया और बिला-सबूत है, बल्कि ख़ुद उन के क़ुर्आन के ख़िलाफ़ है, जिसमें उन कुतुब समाविया साबिक़ा (पहले नाजिल हुई आसमानी किताबों) की तस्दीक़ हुई है। अहले-किताब और बिल-ख़ुसूस अहले इंजील को हुक्म हुआ है कि “अगर तुम इंजील को और जो कुछ उसमें लिखा हुआ है, क़ायम ना करो, तो तुम फ़ासिक़ हो।” (माइदा रुकूअ 7) “या अगर तुम तौरेत और इंजील को और जो कुछ उस में दर्ज है, क़ायम ना करो, तो तुम कुछ राह पर नहीं हो।” (माइदा रुकूअ 9) और फिर गोया ख़ुदा हज़रत मुहम्मद साहब को फ़रमाता है, “कि अगर तू शक में है उस से, जो उतारा हमने तुझ पर, तो पूछ अहले-किताब से, जो तुझ से पहले किताब पढ़ते हैं।” (यूनुस 10) और फिर ये भी बताया है कि उन में नूर है, हिदायत है, रहमत है। पस क्या ये सब बातें उन्हीं “मुहर्रफ़” (तहरीफ़-शुदा) किताबों के हक़ में हज़रत मुहम्मद ने फ़रमाईं? क्या ये मुम्किन था कि तौरेत और इंजील को हज़रत मुहम्मद ऐसी ताज़ीम दें, और उनकी अहले-किताब को तल्क़ीन करें, और फिर मुहर्रफ़ (बदली हुई) भी ठहराएँ? हमें ख़्वाजा साहब के साथ इस अम्र में बड़ी हम्दर्दी है कि वो मसीहिय्यत के साथ मुख़ालिफ़त करने की ग़र्ज़ से अपनी किताब से भी बाहर जा रहे हैं, और हक़ पर पर्दा डालने से गुरेज़ नहीं करते।

      क़दीम क़लमी नुस्ख़ों, मुताबिक़ीन के ताईदी और मुख़ालिफ़ीन के तर्दीदी इक़्तिबासात से, जो उन्होंने पहली, दूसरी, तीसरी सदियों में अपनी-अपनी तसानीफ़ में किए हैं, उनका मौजूदा इंजील से मुक़ाबला करने से ज़ाहिर है कि जो उसूल और तालीम और वाक़ि’आत उस वक़्त की मुरव्वजा इंजील में थे, वही आज की मुरव्वजा इंजील में बि-जिंसिही (वैसे की वैसे ही) पाए जाते हैं।

      पुराने अहदनामे की पेशीनगोइयों और नमूनों से बख़ूबी मालूम होता है कि जिन बातों की मसीह के हक़ में उन में पेशख़बरियां दी गई हैं, वो बे-ऐनिही मसीह में पूरी हुईं, और ये उस दावे के ख़िलाफ़ एक दलील है कि इंजील “मुहर्रफ़” (बदल दी गई) है।

      ताज्जुब की बात है और समझ में नहीं आती कि जिन बातों पर सख़्त से सख़्त एतराज़ात हों, और सख़्त से सख़्त हमले हों, उन को तो बिला-तहरीफ़ मसीहियों ने रहने दिया, और बाक़ी उमूर में तहरीफ़ कर दी, हालाँकि मुख़ालिफ़ ये भी नहीं बताते कि तहरीफ़ किन-किन बातों में हुई और तहरीफ़ करने से मसीहियों को फ़ायदा क्या हुआ।

      ख़ैर, हमारी दिली दुआ है कि और बग़ाइयत आरज़ू है कि ख़ुदा ख़्वाजा साहब को सीधी राह दिखाए, और उस के क़दमों पर लाए, जो फ़रमाता है कि, “राह, हक़ और ज़िंदगी मैं हूँ, कोई मेरे वसीले बग़ैर बाप के पास नहीं जा सकता।”

      दूसरा अम्र क़ाबिल-ए-ग़ौर है। वो ये कि जो मज़्हब उस वक़्त कुतुब मुक़द्दसा साबिक़ा में मौजूद था, वो बिगड़ा हुआ ना था। और वही आज उनमें मौजूद है। उस के मानने वाले उस पर अमल ना करते या उस के ख़िलाफ़ चलते थे, तो ये क़सूर उनका था, ना कि मज़्हब में फ़ुतूर था। जैसा कि ख़्वाजा कमाल-उद्दीन का ख़याल था। ये तो हम पर और कुतुब मुक़द्दस पर, जिनकी की तस्दीक़ और तारीफ़ आपके क़ुर्आन में आई, बोहतान और इफ़्तिरा (इल्ज़ाम) है। क़ुर्आन से जो आयत पेश गई है, यानी:


قُلْ يَا أَهْلَ الْكِتَابِ تَعَالَوْاْ إِلَى كَلَمَةٍ سَوَاء بَيْنَنَا وَبَيْنَكُمْ أَلاَّ نَعْبُدَ إِلاَّ اللّهَ وَلاَ نُشْرِكَ بِهِ شَيْئًا وَلاَ يَتَّخِذَ بَعْضُنَا بَعْضاً أَرْبَابًا مِّن دُونِ اللّهِ

      तर्जुमा: “ऐ अहले-किताब! आ जाओ उस कलिमे की तरफ़ जो हमारे और तुम्हारे दर्मियान बराबर है।” और अल्लाह के सिवा किसी की इबादत ना करो। और किसी चीज़ को उस के साथ शरीक ना करो। और सिवाए अल्लाह के किसी को अपना रब ना बनाओ। (सूरह आले-इमरान आयत 64)

      इस आयत में भी क़ुर्आन के मुसन्निफ़ ने मसीही अक़ीदे के समझने में ग़लती खाई। इसी तरह दीगर मुक़ामात में भी जो इसी क़बील (मज़मून) की हैं, ग़लत मसीही अक़ीदा ज़ाहिर करके मसीहियों को मतऊन (ताना) किया गया है। इंजील में ईसा इब्ने मर्यम को आदमी यानी कामिल इन्सान कहा गया है, कामिल इन्सान, यानी मसीह के पूरे क़द्र का अंदाज़ (इफ़िसियों 4:13) यानी जिस्मानियत व अख्लाक़ियात और रूहानियत का आला तसव्वुर “ख़ुदा एक है और ख़ुदा और इन्सानों के बीच में दर्मियानी भी एक, यानी मसीह येसू जो इन्सान है।” (1 तीमुथियुस 2:5) मगर कलिमतुल्लाह (کلمتہ اللہ) होने के एतबार से वो मज़हर अल्लाह है, और कलाम मुजस्सम हुआ, और फ़ज़्ल और सच्चाई से मामूर हो कर, हमारे दर्मियान रहा। और हम ने उस का ऐसा जलाल देखा, जैसा बाप के इकलौते का जलाल।” (यूहन्ना 1:14) “क्योंकि बाप को ये पसंद आया कि सारी मामूरी उसी में सुकूनत करे।” (कुलस्सियों 1:19) कलिमतुल्लाह (کلمتہ اللہ) होने के सबब से मसीह ख़ुदावंद ने फ़रमाया कि “मैं और बाप एक हैं।” (यूहन्ना 10:30) और कि “मैं बाप में हूँ और बाप मुझमें है।” पस “जिसने मुझे देखा उस ने बाप को देखा” (यूहन्ना 14:9)

      मगर इन्सानियत के एतबार से और इस एतबार से कि “भेजने वाला भेजे हुए से बड़ा है” (यूहन्ना 14:28) लेकिन चूँकि “उस ने अपने आपको ख़ाली कर दिया और ख़ादिम की सूरत इख़्तियार की।” (फिलिप्पियों 2:6 से 8) इसलिए वो ख़ुदा का “ख़ादिम” है (आमाल 3:13) इसी तरह मत्ती 12:18 में भी उस को “ख़ादिम” कहा है। (जहां यसायाह 42:1 से इक़्तिबास है। जहां इब्रानी में ख़ुदा त’आला मसीह को “अब्द” (बंदा) कहता है और या क़ुर्आन की ज़बान में “अब्दुल्लाह” (अल्लाह का बंदा) है और इसी एतबार से ख़ुदावंद मसीह ख़ुदा को अपना ख़ुदा कहता है। (यूहन्ना 20:17)

      ख़्वाजा साहब के क़ौल के मुताबिक़, “कुल तनाज़’आत तो उनकी ज़ात के मुताल्लिक़ हैं।” (सफ़्हा 11) और हम में और मुसलमानों में ये एक ऐसा कलमा है, जो (जैसा कि इख़्तिसारन बता दिया गया, और इस से ज़्यादा भी बताया जा सकता है) हमारे और तुम्हारे दर्मियान बराबर है। मगर ताज्जुब है कि “कुल तनाज़’आत तो उनकी ज़ात के मुताल्लिक़ हैं”, और “ज़ात” को छोड़कर उनकी असली हैसियत की बाबत फ़ैसला चाहते हैं। मसीह की ज़ात की बाबत फ़ैसला करने से अम्दन (जानबूझ कर) गुरेज़ करते हैं। मगर हम ख़्वाजा साहब की इबारत में सिर्फ अल्फ़ाज़ आगे-पीछे रखकर, ख़्वाजा साहब ही के अल्फ़ाज़ में तमाम मुसलमान भाईयों को यूं मुख़ातिब करते हैं:

      “दोनों की मुहब्बत का नस्ब-उल-ऐन (मक़्सद) एक ही है, तो फिर क्यों हम में फ़साद हो? कुल तनाज़’आत तो उनकी ज़ात और असली हैसियत के मुताल्लिक़ हैं। क्यों न आशीती (सलामती) और मुहब्बत से अपने महबूब की असली ज़ात और हैसियत को मुतहक़्क़िक़ कर लिया जाये?”

      हम ख़ुदावंद मसीह को ब-एतबार “कलिमतुल्लाह”(کلمتہ اللہ)होने के ज़ात-ए-इलाही मानते हैं। क्योंकि “कलिमतुल्लाह”(کلمتہ اللہ)मख़्लूक़ नहीं, और “ख़ल्क़ करने” और “ग़ैब की” सिफ़त क़ुर्आन में मसीह से मन्सूब की गई है (जिन उमूर का ज़िक्र यहाँ बाइस-ए-तवालत और बे-महल होने के क़लम-अन्दाज़ किया जाता है)। लिहाज़ा हम मसीह को ना तो “مِّن دُونِ اللّهِ”(अल्लाह के सिवा) रब मानते हैं, और ना हम उसको “ग़ैर-उल्लाह” (अल्लाह का ग़ैर) समझकर रब के साथ उस का शरीक करते हैं। हम इस को शिर्क और कुफ़्र समझते हैं। पस वो ग़ैर-उल्लाह (अल्लाह के सिवा) या मख़्लूक़-इलाह (या पैदा कर्दा मख्लूक़) नहीं। वो “शैय” (चीज़, मख्लूक़) नहीं, बल्कि (यूहन्ना 1:1) के मुताबिक़, “इब्तिदा में कलमा था, और कलमा ख़ुदा के साथ था, और कलमा ख़ुदा था।”

      यूनानी लफ़्ज़ “लोगास” के म’अनी “कलमा” हैं, जिसके म’अनी “कलमा” हैं, जिसका मुरादिफ़ लफ़्ज़ “कलाम” इंजील के उर्दू तर्जुमा में मुस्तअमल (इस्तिमाल हुआ) है। पस मसीह की अस्ल ज़ात “कलिमतुल्लाह”(کلمتہ اللہ)और अस्ल हैसियत “रसूल-अल्लाह” या “अब्दुल्लाह” है। क्या ये उमूर كَلَمَةٍ سَوَاء بَيْنَنَا وَبَيْنَكُمْनहीं हैं? क्या ये हम में और आप में “मुफ़ाहमत के मवाद” नहीं हैं?”

      फिर सफ़्हा 2 से 10 तक में ख़्वाजा साहब ने जो कुछ मज़्हब हक़्क़ा.... या इस्लाम की बाबत तहरीर किया है, उस को मैं आँजनाब ही के अल्फ़ाज़ में, मगर इख़्तिसार के साथ यहां दर्ज करता हूँ। वो हुवा हाज़ा:

      “मज़्हब हक़्क़ा... जो इस से पहले नूह से लेकर सय्यदना मसीह तक हर क़ोम व मिल्लत को दिया गया।” (सफ़्हा 5)

      “जिस्मानियातत में साईंस ने हमें उन क़वानीन का पता दिया, जो ख़ुदा त’आला ने निज़ाम-ए-आलम को चलाने के लिए बनाए। हम मजबूरन उन क़वानीन पर चलते हैं। उन क़वानीन पर चलने का नाम इस्लाम है... साईंस ने अपनी हर शाख़ में इसी अम्र पर मुहर-ए-सदाक़त सब्त की है। हर शो’बा-ए-ज़िंदगी में इन्सान का यही मज़्हब है। जिस्मानियत में या ज़हनियात में अगर इन क़वानीन को इन्सानी मुशाहिदे और तजुर्बे ने दर्याफ़्त कर लिया है, तो अख़्लाक़ियात और रूहानियत में इल्हाम-ए-इलाही ने क़वानीन-ए-इलाहियह की तरफ़ इन्सान की रहनुमाई की। इन क़वानीन पर चलने का नाम, ख़्वाह जिस्मानियात में हो या रूहानियात में, अरबी ज़बान ने “इस्लाम” तज्वीज़ किया है। क्या हम इस तरीक़ से इन्हिराफ़ (ना-फ़र्मानी) कर सकते हैं? हमारा इन म’अनों में इस्लाम से मुनहरिफ़ होना तबाही और हलाकत को ख़रीदना है।”

      इस के साथ क़ुर्आन की ये आयत दर्ज की है:

أَفَغَيْرَ دِينِ اللّهِ يَبْغُونَ وَلَهُ أَسْلَمَ مَن فِي السَّمَاوَاتِ وَالأَرْضِ طَوْعًا وَكَرْهًا وَإِلَيْهِ يُرْجَعُونَ،،،، وَمَن يَبْتَغِ غَيْرَ الإِسْلاَمِ دِينًا فَلَن يُقْبَلَ مِنْهُ وَهُوَ فِي الآخِرَةِ مِنَ الْخَاسِرِينَ

      (सूरह आले-इमरान, आयत 83 और 85)

      तर्जुमा: दीन-ए-अल्लाह के सिवा वो किस दीन की तलाश करते हैं? देखते नहीं कि ज़मीन और आस्मान में जो कुछ है, वो तौअन व करहन (खुशी से या नाखुशी से) उसकी इताअत कर रहे हैं। ख़ुदा के नज़्दीक तो दीन इस्लाम है। और जो शख़्स इस्लाम के सिवा किसी और दीन की तलाश करे, वो उस से हरगिज़ मक़्बूल ना होगा, और वो आख़िरत में नुक़्सान उठाने वालों में होगा।

      “कोई है जो इस सदाक़त से अमलन इन्कार करे, और आन-ए-वाहिद में उसकी ज़िंदगी का ख़ातिमा ना हो। यही मज़्हब, यही बात ख़ुदा के कुल नबियों ने तल्क़ीन की। “ला इलाह इल्लल्लाह”(لا اللہ الا اللہ)की यही हक़ीक़त है। अहले-किताब को इसी हक़ीक़त की तरफ़ बुलाया गया है।”

      इस तमाम इक़्तिबास में ख़्वाजा कमाल-उद्दीन साहब ने ये बताया है कि क़वानीन-ए-तबई के मुताबिक़ चलना इस्लाम है, यानी इस्लाम दीन-ए-फ़ित्री का नाम है, और इसका ताल्लुक़ जिस्मानियात या ज़हनियात से है। और तमाम आलम में, यानी आस्मान और ज़मीन और उनकी तमाम अश्या पर, जिसमें ख़ुद इंसान भी शामिल है, जारी और सारी है। और जबरी तौर पर सब को तौअन व करहन (खशी या नाखुशी से) मानना पड़ता है। इन में किसी को चारा नहीं।

      और “जो इस सदाक़त से इन्कार करे, यानी उसकी फ़रमांबर्दारी से इन्कार करे, तो आन-वाहिद में उसकी ज़िंदगी का ख़ातिमा हो जाता है। इन क़वानीन को इंसान ने “मुशाहिदे और तजुर्बे” से दर्याफ़्त कर लिया है, ये क़वानीन लातब्दील हैं।

      दूसरी तरफ़ आप कहते हैं कि:

      “अख़्लाक़ियात और रूहानियत में इल्हाम-ए-इलाही ने क़वानीन-ए-इलाहिया की तरफ़ इंसान की राहनुमाई की।” मतलब साफ़ है, इन दोनों में इफ़्तिराक़ ज़ाहिर है। “इल्हाम-ए-इलाही” का ताल्लुक़ अख़्लाक़ियात और रूहानियत से है, मगर फ़ित्री क़वानीन जिस्मानियात और ज़हनियात से इलाक़ा रखते हैं। एक की इताअत इंसान पर जबरी है, दूसरे पर इख्तियारी। जैसा कि तजुर्बे और मुशाहिदे से नज़र आता है। एक की ख़िलाफ़-वर्ज़ी से “आन-वाहिद में ज़िंदगी का ख़ातिमा” हो जाता है, मगर दूसरे क़वानीन में ऐसा नहीं।

      पहली क़िस्म के क़वानीन का पता तो हमें “साईंस” ने दिया है, मगर दूसरे का पता इल्हाम-ए-इलाही ने दिया है। क़वानीन-ए-फ़ित्री का पता “निज़ाम-ए-आलम” की तल्क़ीन है, “मगर इल्हाम-ए-इलाही” की तल्क़ीन ख़ुदा के नबियों ने की। जिस अम्र की तल्क़ीन अम्बिया ने की, वो “ला इलाह इल्लल्लाह” (لا الہ الاللہ)है। मगर क़वानीन-ए-फ़ित्री का कोई “कलमा” बयान नहीं किया गया।

      पस ज़ाहिर है कि आपका ये फ़रमाना कि “इन क़वानीन पर चलने का नाम, ख़्वाह जिस्मानियात में हो या रूहानियात में, अरबी ज़बान ने इस्लाम तज्वीज़ किया है”, कहाँ तक दुरुस्त और मौज़ूं हो सकता है? क़वानीन-ए-तबई की ख़िलाफ़-वर्ज़ी की ना तो तौबा हो सकती है, ना माफ़ी। इनके लिए न किसी नबी की ज़रूरत है, ना किसी हादी की। लेकिन अख़्लाक़ी और रुहानी क़वानीन में तौबा भी है, अम्बिया की तल्क़ीन भी है, उनकी ख़िलाफ़-वर्ज़ी भी हो सकती है, और हो रही है। उनका असर फ़ौरी नहीं होता, बल्कि दरंग (देर) के साथ होता है, हत्ता कि क़ियामत में उनका असर मुकम्मल तौर पर होगा।

      पस देखो, क़वानीन-ए-फ़ित्री (जिसे ख़्वाजा साहब इस्लाम के नाम से मौसूम करते हैं) और क़वानीन-ए-इल्हाम-ए-इलाही में कैसा आस्मान-ज़मीन का फ़र्क़ है। एक और बात क़ाबिल-ए-ग़ौर है। वो ये कि ख़्वाजा साहब ने मुहम्मदी “कलिमा-ए-तय़्यिब” में “मुहम्मदुर-रसूलुल्लाह” को ख़ारिज करके सिर्फ “ला इलाह इल्लल्लाह” (لا الہ الاللہ)ही को इस्लाम में शामिल किया है। और बात भी दुरुस्त है, क्योंकि जिस अम्र की ख़ुदा के कुल नबियों ने तल्क़ीन की, वो “ला इलाह इल्लल्लाह”(لا الہ الاللہ)है, ना कि उस के साथ “मुहम्मदुर-रसूलुल्लाह”(محمد الرسول اللہ)भी। भला इस से किस अहले-किताब को इन्कार है? ये तो ख़्वाजा साहब के कहने के मुताबिक़ “मज़्हब-ए-हक़्क़ा” है—और यही मज़्हब नूह से लेकर मसीह तक हर क़ौम व मिल्लत को दिया गया। इस अम्र में तो हमारे और तुम्हारे दर्मियान इख़्तिलाफ़ ही नहीं। अगर इख़्तिलाफ़ है तो ये कि “मुहम्मदुर-रसूलुल्लाह”(محمد الرسول اللہ)तुम उसके साथ क्यों लगाते हो, जिसकी ख़ुदा के किसी नबी ने तल्क़ीन नहीं की। बस मुसलमान तो मसीही हैं, क्योंकि वो इस्लाम ला इलाह इल्लल्लाह (لا الہ الاللہ)की पैरवी करते हैं, और तुम मुसलमान नहीं, क्योंकि अस्ल कलिमा-ए-तय्यिब में हज़रत मुहम्मद साहब को, जो बशर (इंसान) हैं और मख़्लूक़ हैं, उस में शरीक करते हो।

      यहाँ तो मुहम्मदियत के पाँचों अरकान भी ख़्वाजा साहब ने इस्लाम से ख़ारिज कर दिए। ख़ुदा ख़्वाजा साहब का भला करे जिसने इस्लाम की सही तश्रीह कर दी। जनाब-ए-मन! जब इस्लाम यही है, जैसा कि ऊपर ज़िक्र हो चुका है, तो फिर इसके क्या म’अनी कि “अगर इस्लाम और ईसाइय्यत में एक क़िस्म का मुफ़ाहमा (समझौता) हो जाए?” इस्लाम और ईसाइय्यत में तो फ़र्क़ ही ना रहा।

      क़ुर्आन तो सय्यदना ईसा के बारे में यूँ कहता है कि “وجہیا فی الدنیا والاخرتہ ک”—कलिमतुल्लाह, रूहुल्लाह।” यही ख़ुदा के कुल नबियों ने भी तल्क़ीन की है। ये तमाम उमूर इस्लामिया में से चंद उमूर हैं। इस्लाम और ईसाइय्यत तो एक ही बात है।

      फिर इस्लाम और ईसाइय्यत में एक क़िस्म का बिरादराना मुफ़ाहमा कैसा? हाँ, अलबत्ता ईसाइय्यत या इस्लाम में और मुहम्मदियत में अगर किसी क़िस्म के बिरादराना मुफ़ाहमा (समझौते) की ज़रूरत कहो तो ये और बात है, मगर उनमें मुफ़ाहमा के लिए किसी क़िस्म का मवाद मौजूद नहीं। लिहाज़ा मुफ़ाहमा (समझौते) का मुतालिबा भी फ़ुज़ूल है।

      हम तो पेश्तर (पहले) ही ख़ुदावंद मसीह को दुनिया और आख़िरत में “वजीहा” (وجیہ)जानते और मानते हैं। लफ़्ज़ “वजीहा”(وجیہ)सिफ़त-ए-शुब्बह है, ब-रौज़न “समीअ”(سمیع),और जिसका माद्दा “वजह”(وجہ)है, ब-म’अनी “चेहरा”, और मफ़हूम उसका वो शख़्स है जिसमें हर दो जहान में लोगों की तवज्जोह को अपनी तरफ़ फेर लेने की दाइमी सिफ़त पाई जाती है। जिस तरह ख़ूबसूरत, शकील जवान को “वजीह” इसलिए कहते हैं कि उसकी जिस्मी बनावट में ऐसे ख़वास पाए जाते हैं जिनसे देखने वालों की नज़र और तबीअत उसकी तरफ़ फिर जाती है और उस को देखकर दिली इत्मीनान और मसर्रत हासिल करते रहते हैं।

      इसी तरह सय्यदना ईसा मसीह में ऐसे ख़वास दाइमी मौजूद हैं कि हर दो जहान में नाज़िरीन की तवज्जोह को अपनी तरफ़ खींचने के क़ाबिल हैं, और लोग उसी की तरफ़ तवज्जोह करने से “फ़लाह-ए-दारेन” हासिल कर सकते हैं। मसीह के सिवा कोई भी “وجہیاً فی الدنیا والاآخرت”नहीं है। और उसकी रिसालत में, दीगर अम्बिया से बढ़कर—माद्दा-ए-फ़ज़ीलत ये है कि:

      अव्वल, वो “कलिमतुल्लाह” है, जो मरियम की तरफ़ डाला गया, यानी उसके बतन-ए-अज़हर से “कलिमतुल्लाह” ने जिस्म-ए-इंसानी इख़्तियार किया। फिर ये कि, (जैसा कि सय्यदना मसीह ने फ़रमाया है) “इब्ने-आदम इसलिए नहीं आया कि ख़िदमत ले, बल्कि ख़िदमत करे, और अपनी जान बहुतेरों के बदले फ़िद्या में दे।” (मत्ती 20:28)

      यानी अपनी मुआवज़ाना क़ुर्बानी से ईमानदार को ख़ुदा के क़रीब ले आए। ख़ुदा के क़ुर्ब में इंसान को लाने के लिए जो मूसवी शरीअत में और दीगर अक़्वाम में जानवर ज़बह किया जाता था, उसको “क़ुर्बान”, यानी “ख़ुदा के क़ुर्ब में लाने वाला”, कहते थे। और यही म’अनी लफ़्ज़ “क़ुर्बानी” के है, और उसका मफ़हूम, अब भी मुरव्वज है।

      एक और माद्दा ये है कि वो ख़ुदा का बनी-नूअ इंसान पर अपने में ज़ाहिर करता है। चुनान्चे उसने ख़ुद फ़रमाया: “जिसने मुझे देखा, उसने बाप को देखा”, “क्योंकि मैं और बाप एक हैं।” और भी बहुत उमूर इसमें शामिल हैं।

      क़ुर्आन ने मसीह को “वजीहुन फ़िल-दुनिया वल-आख़िरह” (وَجِيهًا فِي الدُّنْيَا وَالآخِرَةِ)मगर ये न बताया कि वो ऐसा किन उमूर में है। और यही इस्लाम है, जिसका क़ुर्आन ने इशारा तो किया, मगर साफ़ न बताया, क्योंकि उसको भी इन उमूर का पूरा पता नहीं लगा। मगर ख़ुदा के कुल नबियों ने “इसी इस्लाम की तल्क़ीन की है।” मिसाल के तौर पर देखो, यसायाह नबी की किताब (बाब 53) और दानीएल नबी की किताब (9:24–27)।

      हमें अफ़सोस है कि ख़्वाजा साहब ने सय्यदना ईसा मसीह को “वजीहुन फ़िल-दुनिया वल-आख़िरह”(وَجِيهًا فِي الدُّنْيَا وَالآخِرَةِ)कलिमतुल्लाह, रूहुल्लाह तो कह दिया और तस्लीम कर लिया, मगर ऐसा कहने की कोई वजह बयान नहीं की, जिसकी तल्क़ीन अम्बिया किराम ने भी की हो, ताकि वो इस्लाम में शामिल हो जाए। बल्कि सिर्फ़ ये कहकर ग़ुज़र गए कि “हम बलिहाज़-ए-मन्सब नबुव्वत, आप में और अपने नबी में कोई फ़र्क़ नहीं करते।” हालाँकि क़ुर्आन ने मज़्कूर-बाला अल्फ़ाज़ सय्यदना मसीह की शान में कहकर, दीगर अम्बिया और मसीह में फ़र्क़ कर दिया। मसीह के अलावा क़ुर्आन में ये शान किसी नबी की नहीं आई। वो तो “ایتہ للناس ورحمتہ سناد کان امر امقضیاً”है... वग़ैरह वग़ैरह। इस तरह मसीह को सबसे ज़्यादा मुमताज़ कर दिया। और “ولقدس فقلنا بعض النبین علی بعض”,कह कर हज़रत मुहम्मद पर, और सब अम्बिया पर भी फ़ज़ीलत दी। जब क़ुर्आन शरीफ़ ही ने फ़र्क़ कर दिया, तो फिर आप न करें, ये आपका इख़्तियार है।

      मन्सब के बारे में तो इतना कह दिया, मगर मसीह की ज़ात और काम के बारे में, जो नीज़ इस्लाम है और ख़ुदा के कुल नबियों ने जिसकी तल्क़ीन की है, बिना तहक़ीक़ किए दरगुज़र कर जाना, मेरी दानिस्त में कुछ अहमीय्यत रखता है। और वो ये कि ख़्वाजा साहब दिल में तो सब बातों के क़ाइल हैं और मानते हैं, मगर ज़बान पर लाने से डरते हैं। ये तो फ़रमा दिया कि “इस्लाम में ऐसे मुफ़ाहमा (समझौते) के लिए बहुत मवाद मौजूद है”, मगर वो मवाद न बताए।

      जनाब-ए-मन—वो मवाद मैं बताए देता हूँ, जो क़ुर्आन में मौजूद है, जिनकी तल्क़ीन तमाम अम्बिया सलफ़ ने की, और जो उन अक़्वाम में भी मौजूद है, जिनको “पैगन-इज़म” या “कुफ़्र-ए-इल्हाद” (बेदीन, मुल्हिद) से याद किया जाता है। इसका ज़िक्र मैं आगे चलकर करूँगा। आख़िर में, मैं “आयत-ए-क़ुरआनी” में “या अहले-किताब” की बजाए “या अहले-कुरआन” इस्तिमाल करके आप से यूँ मुख़ातिब होता हूँ:

یا اھل القران تعالو الی کلمتہ سواء بینا وبیکم

      जनाब-ए-मन—क़ुरआन आप लोगों को मसीह तक पहुँचाने के लिए उस्ताद है।

      आईए, क़ुरआन की मानिए, और मसीह पर ईमान लाकर इस्लाम में दाख़िल हो जाइए, और मुसलमान कहलाइए, जैसे कि क़दीम अम्बिया और मसीह के हवारी “मुस्लिम” कहलाते रहे, और हम भी मुस्लिम हैं।

      सफ़्हा 10 पर आप लिखते हैं कि:

      “अगर ये तस्लीम कर लिया जाये कि मसीह ख़ुदा ना थे, और आज ईसाई दुनिया भी ये मानने को तैयार हो गई है, तो बहुत सा झगड़ा तै हो जाता है।”

      मेहरबान मन, ये तो इस्लाम का एक जुज़्व (हिस्सा) है, जिसको क़ुर्आन ने तै कर दिया, अम्बिया ने इसकी तल्क़ीन की। यही बुनियादी बात है। आप मसीह की ज़ात और अस्ल हैसियत का तो ज़िक्र करते हैं, मगर तहक़ीक़ात के मैदान से झट बाहर निकल जाते हैं, और मसीह की आम नब्वी हैसियत का दो-चार लफ़्ज़ों में बयान करके अस्ल मवाद को छेड़ते ही नहीं। तो भला हम क़ुर्आन की इस तालीम को और अम्बिया की तल्क़ीन को आपके कहने के मुताबिक़ छोड़कर कहाँ जाएं? क्या आप चाहते हैं कि हम इस्लाम की बातें छोड़कर काफ़िर हो जाएं?

      जैसे आप लोगों ने इस्लाम की बातें छोड़ दीं। सुनिए, अब तो मुसलमान भी, जिनको मुसलमान नहीं, मुहम्मद कहना चाहिए, मसीह को ख़ुदा मानने लग पड़े हैं। चुनान्चे मौलवी सय्यद वहीद उद्दीन ख़ान आज़ाद अपनी किताब “हद तहक़ीक़ बह मुशर्रफ़ सुन्नी” की फ़स्ल 3, सफ़्हा 4 में अपना एतिक़ाद सय्यदना मसीह के बारे में यूं बयान करते हैं:

      “मुख़्तसरन अपना एतिक़ाद हम ये लिखते हैं कि किताब बाइबल यानी मजमूआ तौरेत व इंजील वग़ैरह का बहुत हक़ है, और सिलसिला अम्बिया बनी-इस्राईल में ख़ुसूसन ज़ात हज़रत मसीह अलैहिस्सलाम की ऐसी मलकी सिफ़ात आम, ज़ाहिर न क़ुव्वत बशरी से बहुत ज़ाइद हैं। और सिवाए इसके चारा नहीं कि उनको हम एक आदमी मए-अल्लाह तस्लीम कर लें। और क़ुर्आन शरीफ़ में जो ज़िक्र उनका बलफ़ाज़ ‘कलिमतुल्लाह’ (کلمتہ اللہ)व ‘रूह अल्लाह’(روح اللہ)के है, सो इस से ज़्यादा हम क्या कह सकते हैं? और तौरेत और ज़बूर वग़ैरह में पेशीनगोईयाँ निस्बत उनकी इस कस्रत से हैं कि क़ौम यहूद को ख़ुद इंतिज़ार एक मसीह का है।”

      मुझे अफ़्सोस है कि जिन बातों को ख़ुदा के “कुल अम्बिया” मान और बता रहे हैं, और क़ुर्आन उ किताबों की तस्दीक़ करता है, और ख़ुद इन बातों की तल्क़ीन करता है, और आँजनाब ख़ुद भी दिल में क़ाइल हैं, जैसा आपकी ख़ामोशी और गुरेज़ बयान से अयाँ है, और फिर उनको ऐसी “क़दीमी रिवायत” से मन्सूब करना, “जिनका ताल्लुक़ पुराने कुफ़्र व इल्हाद (बेदीन, मुल्हिद) से था, और जो मसीह से हज़ारों बरस पहले ईरान, यूनान, बाबिल, नैनवा, कार्थेज, सिरिया, मिस्र, रूमा, मैक्सीको की क़िस्से-कहानियों में दायरो-सायर थीं, वो हमारे प्यारे मसीह के नाम से मन्सूब कर दी गई हैं।” क्या बे-बुनियाद और बे-सनद मक़ूला नहीं है, जैसा मैं आगे चल कर मुफ़स्सिल ज़िक्र करूँगा? और क्या इन कुतुब मुक़द्दसा साबिक़ा को और ख़ुद क़ुर्आन को झूटा और ग़ैर-मुस्तनद क़रार देना नहीं है? क्या ये इख़्तिलाफ़ मह्ज़ मुहब्बत और इख़्लास की बिना पर है? वाह साहब! हो तो इख़्तिलाफ़, और बिना उसकी मुहब्बत और इख़्लास, और फिर उसी इख़्तिलाफ़ को “तनाज़आत” और फ़साद कहना, सोने पर सुहागा, नहीं तो और क्या कहीं?

      ख़्वाजा साहब! मुझे तो आप की नेक नीयती और सादलोही पर बड़ा तरस आता है। मैं आप को किस तरह बताऊं! आप तो अस्ल बातों का इक़रार भी करते चले जाते हैं, और उन से तरह भी दे जाते हैं। आप ये भी कह रहे हैं, और बार-बार कह रहे हैं कि “इस्लाम और ईसाइय्यत में एक क़िस्म का मुफ़ाहमा (समझौता) हो जाए, और इस्लाम में ऐसे मुफ़ाहमे के लिए बहुत कुछ मवाद मौजूद है।” और उन मवाद में से चंद एक का सरसरी ज़िक्र भी किये जाते हैं, मगर साथ ही इग़माज़ भी कर जाते हैं।

      एक तरफ़ आपका ये कहना कि “ऐसी क़दीमी रिवायतें जिनका ताल्लुक़ पुराने कुफ़्र व इलहाद से था, वो हमारे प्यारे मसीह के नाम से मन्सूब कर दी गई हैं।” और इस के मुक़ाबले में दूसरी जगह ये फ़रमाना कि “मसीह की तालीम का जो नक़्शा क़ुर्आन शरीफ़ पेश करता है, अनाजील-ए-अरबा भी क़रीब-क़रीब उसी की मुसद्दिक़ (सच्ची बताने वाली) हैं, वो तो इस्लाम की एक शक्ल है।” कहाँ तक ज़ेब देता है?

      एक जगह तो आप सय्यदना मसीह के हक़ में फ़र्माते हैं कि “कुल तनाज़आत तो उनकी ज़ात के मुताल्लिक़ हैं।” मगर मुतालिबा करते हैं उनकी असली हैसियत के मुताल्लिक़ फ़ैसला कर लिए जाने का। क्यों नहीं उनकी ज़ात और हैसियत, दोनों को मुतहक़्क़िक़ कर लेते, और उनकी ज़ात के मुताल्लिक़ फ़ैसला करने से क्यों जी चुराते हो?

      और हम ने तो क़ुर्आन से, और एक सय्यद आलिम की ज़बान से फ़ैसला कर दिखाया। मानें ना मानें, आपका इख़्तियार है। ख़ैर, ख़ुदा त’आला की बारगाह में हमारी यही दरख़्वास्त है कि वो अपने नूर को मसीह के चेहरे’ से मुनअकिस करके ख़्वाजा कमाल-उद्दीन के दिल पर डाले, ता वो भी मुनव्वर हो कर हक़ीक़ी मज़्हब को, जो इस्लाम है और क़दीम से है और आलमगीर है, क़ुबूल करके फ़लाह-ए-दारैन हाल करे।




असातीर-उल-अव्वलीन


      इस मज़्मून में ख़्वाजा कमाल-उद्दीन साहब ने दलील तशाबिह-बयना-अल-शैईन (यानी दो चीजों में एक जैसी बात देखना) का इस्तिमाल करके, यानी दो चीज़ों पेगनइज़्म और मसीहिय्यत में बाहमी मुशाबहत बताकर, अपने इस मज़’ऊमा (गुमान, तसव्वुर) के साबित करने की कोशिश की है कि मसीहिय्यत का सब का सब कुफ़्र इल्हाद (बेदीन, मुल्हिद) की क़दीम रिवायत और दास्तानों से अख़ज़ किया हुआ है। दूसरे, ये कि सूरज की मुख़्तलिफ़ कैफ़ियात को मसीही मज़्हब के तमाम मसाइल और वाक़ि’आत पर मुंतबिक़ (चस्पा) करके ये बताया है कि:

“ज़रूरत-ए-वक़्त और ईसाई मज़्हब को हर दिल-अज़ीज़ बनाने के ख़याल ने क़दीमी राहिबों को इस पर मज्बूर कर दिया कि वो क़दीमी मज़ाहिब कुफ़्र व इल्हाद (बेदीन, मुल्हिद) की रिवायत को जनाब मसीह और उन की वालिदा पर जूँ की तूँ चस्पाँ करके लोगों को कह दें कि जनाब मसीह में उन के क़दीमी ख़ुदाओं ने ज़हूर किया। और इस तरह उस वक़्त के ग़ैर-मसीही लोगों को यक़ीन दिला दें कि ये कोई नया मज़्हब नहीं, ये उनका ही क़दीमी मज़्हब है, उनका ही ख़ुदा एक दूसरी शक्ल में आता है। चुनान्चे उसके कुल के कुल हालात भी वही हैं।” (सफ़्हा 54)

      मगर 55 वीं सफ़्हा के इन अल्फ़ाज़ का कि “मुअर्रिख़ गिब्बन की भी ये राय है।” इस गुज़श्ता इबारत मज़्कूर के साथ मुक़ाबला करने से मालूम होता है कि आपके ख़याल और राय की अस्ल बुनियाद मुअर्रिख़ गिब्बन की राय है। और इस पर आपकी हाशिया-आराई है, हालाँकि इस अम्र का आपने कहीं तारीख़ी सबूत नहीं दिया कि राहिबों ने ज़रूरत-ए-वक़्त के तक़ाज़े से ऐसा किया, और ग़ैर-मसीही लोगों को ये यक़ीन दिला दिया कि ये कोई नया मज़्हब नहीं है वग़ैरह।

      इंजील नवीसों ने ऐसा अहले-यहूद के साथ तो किया और बताया कि मसीही मज़्हब और मसीह वही है जो तुम्हारी तौरेत और नबियों के सहीफ़ों और मज़ामीर (ज़बूर) में बतौर पेशीनगोई मज़्कूर हुआ है। तुम्हारे ही अम्बिया की पेशीनगोइयों का तक्मिला मसीह और उस का मज़्हब है। उन्होंने इस बात के सबब से अहले-यहूद के हाथों बड़ी-बड़ी तकालीफ़ और मसाइब भी बर्दाश्त कीं, मगर ऐसा कहने से बाज़ ना आए। बरअक्स इस के, आपके मज़’ऊम (तसव्वुर, गुमान) का तो उनकी किताबों में शाइबा (इशारा तक) भी पाया नहीं जाता। क्या आप किसी राहिब का, जिसने इंजीलें लिखी हैं, इस क़िस्म का कोई क़ौल पेश कर सकते हैं?

      बाद के मसीही मुनादों ने भी अहले-यहूद के दर्मियान वा’ज़ करते हुए हर वक़्त कहा कि ये वही मसीह है जिसका तुम्हारी कुतुब-ए-मुक़द्दसा में ज़िक्र है। और अब भी वो यहूद में ऐसा करते हैं। मगर यूनानियों और रोमियों और दीगर अक़्वाम में वा’ज़ करते हुए उन्होंने कभी आपके ख़याल-ए-मुहाल का इशारा भी नहीं किया।

      तारीख़ से भी आपने कोई हवाला नहीं दिया। जैसा मुअर्रिख़ गिब्बन की ख़्याली राय थी, वैसा ही आपने भी बे सोचे-समझे वो कुछ कह दिया जो ख़ुद कहना ना चाहिए था। क्योंकि आपका तो ये ख़याल है कि ये बातें “चौथी सदी में, जब मसीहिय्यत और शम्स-परस्ती का तसादुम हुआ, ईसाई मज़्हब में दाख़िल हुईं।” (सफ़्हा 84)

      हालाँकि इस बात का भी कोई तारीख़ी सबूत नहीं दिया गया। फिर भी इस बयान से ये तो ख़्वाजा साहब की ज़बानी साबित हो गया कि चौथी सदी से पहले ये मिलावट ना थी। यानी उस वक़्त पहले का मसीही मज़्हब बिल्कुल ख़ालिस था, जो इंजील में मौजूद है। और जो आपके बयान के मुताबिक़ क़रीब-क़रीब क़ुर्आन ही का नक़्शा है।

      और सफ़्हा 102 पर जो आप ने अपना यक़ीन ज़ाहिर किया है, उस से भी आपके मज़्कूर बाला ज़ो’अम (तसव्वुर, गुमान) की तर्दीद होती है। कमाल-उद्दीन साहब लिखते हैं:

“इस में क्या शक है कि जनाब मसीह ख़ुदा के प्यारे नबी थे। ऐन ज़रूरत के वक़्त हज़रत मर्यम सिद्दीक़ा के बतन से पैदा हो कर यहूदियों की इस्लाह के लिए आए। ज़रूरत-ए-वक़्त के लिहाज़ से बेहतर से बेहतर हिदायात दिए गए। आज भी उनकी बातें क़ाबिल-ए-इज़्ज़त हैं।”उन के वक़्त के यहूदी उलमा रियाकारी और मुनाफ़क़त का मुजस्समा थे। उन के निफ़ाक़ को आप ने तश्त-अज़-बाम किया। जनाब मसीह के रब्बानी इल्म के मुक़ाबिल उनके इल्म का बाज़ार ठंडा पड़ गया। इन बातों से उलमा-ए-वक़्त आपके दुश्मन हो गए। उन्होंने आपकी तक़्ज़ीब व तकफ़ीर की, तरह-तरह की अज़ीयतें पहुँचाईं। लेकिन जब वो ख़ुदा का नबी अपने फ़र्ज़-ए-मन्सबी से ना रुका तो उन पर सडीशन का इल्ज़ाम लगाकर अदालत में खींचा गया। उन पर मौत का फ़त्वा हासिल करके उनको सलीब तक पहुँचाया गया। अल्लाह त’आला की हिक्मत-ए-बालिग़ा ने आपको इस लानती मौत से बचा कर आख़िरकार रिफ़अत-ए-रूहानी अता फ़रमाई। ये सब सही है, इस पर हम ईमान रखते हैं।”

      इस से क्या मुतरश्शेह होता है? ये कि ख़्वाजा साहब मसीह सय्यदना ईसा के तमाम वाक़ि’आत और रब्बानी तालीमात को हक़ और क़ाबिल-ए-इज़्ज़त समझते हैं। सिवाए इस एक अम्र के कि मसीह मस्लूब हो कर फ़ौत हो गए, दफ़न किए गए, और तीसरे दिन मुर्दों में से ज़िंदा हो गए, आस्मान पर सऊद फ़र्मा गए, और फिर क़ियामत में अदालत करने और सज़ा व जज़ा देने के लिए तशरीफ़ फ़रमाएँगे।

      एक मुसलमान जो क़ुर्आन की तालीम से बख़ूबी वाक़िफ़ ना हो, या ख़्वाजा साहब जैसा, हक़ाइक़ से आगाह हो कर भी उन से बे-एतिनाई और इग़्माज़ कर जाए, इस से ज़्यादा और क्या अक़ीदा रख सकता है? मगर क्या वो इन तमाम उमूर को, जो इंजील शरीफ़ में आज मौजूद हैं, और जिनका मुख़्तसर तरीन ख़ाका ऊपर की इबारत में ख़्वाजा साहब ने खींच दिया है, और जिनकी तफ़्सील इंजील में मौजूद है, कुफ़्र व इल्हाद (बेदीन, मुल्हिद) से मन्सूब करने की जसारत कर सकता है, तावक़्ते के वो तास्सुब के मर्ज़-ए-नुज़ूल, अलमा से, बीमार ना हो?

      ख़ुदा रहम फ़रमाए और ख़्वाजा साहब को सीधी राह की तरफ़ रहनुमाई करे! फिर, उसी इक़्तिबास में जो इस मज़्मून के सदर में उन की किताब के सफ़्हा 54 से किया गया है।

      ख़्वाजा साहब ने तो ये कह दिया कि ज़रूरत-ए-वक़्त और ईसाई मज़्हब को हर दिल अज़ीज़ बनाने के ख़याल ने क़दीमी राहिबों को इस पर मज्बूर कर दिया कि वो क़दीमी मज़ाहिब, कुफ़्र व इल्हाद (बेदीन, मुल्हिद) की रिवायत को जनाब मसीह और उनकी वालिदा पर जूँ की तूँ चस्पाँ करके लोगों को कह दें...... कि ये उनका ही क़दीमी मज़्हब है।…….. वग़ैरह मगर ये ना बताया कि वो “ज़रूरत-ए-वक़्त” क्या थी, और किस-किस राहिब ने किन-किन लोगों को ये कह दिया कि “ये उनका ही क़दीमी मज़्हब है!”

      क्या ख़्वाजा साहब बता सकते हैं कि राहिबों के ऐसा करने से मसीही मज़्हब अवाम में हर दिल अज़ीज़ बन गया था? अगर बन गया था, तो सवा तीन सदियों तक ग़ैर-मसीहियों, ख़ुसूसन पेगनइज़्म, की तरफ़ से मसीहियों पर सख़्त से सख़्त ईज़ा-रसानियाँ क्यों रवा रखी गईं? क्या दूसरी-तीसरी सदी के मसीही उज़्र-ख़्वाहों ने ग़ैर-मसीहियों के मज़ालिम के मुक़ाबले में कभी कहा कि “ये कोई नया मज़्हब नहीं, ये उन्ही का क़दीमी मज़्हब है, उनका ही ख़ुदा एक दूसरी शक्ल में आता है,” और इस बिना पर उन्होंने अपने माअज़िरत-नामों में ग़ैर-मसीहियों से अपील की हो कि “ईज़ा-रसानियाँ ना करो, बाज़ आओ, हम तुम एक हैं?”

      क्या राहिबों की इस चालबाज़ी से ग़ैर-मसीहियों ने उनकी बातों का यक़ीन कर लिया था कि “हाँ, ये तो कोई नया मज़्हब नहीं, ये उनका ही क़दीमी मज़्हब है, उनका ही ख़ुदा एक दूसरी शक्ल में आया है?” और क्या वो ग़ैर-मसीही लोग ये बातें सुनकर और मानकर मसीहियों को अज़ीयतें पहुँचाने से बाज़ आ गए थे?

      हमें अफ़्सोस आता है कि ख़्वाजा साहब ग़लत मुक़द्दमात जमाते जाते हैं और उन से सही नतीजा निकालने की कोशिश करते हैं। मगर सही नतीजा बरामद नहीं होता। फिर क्या, जब राहिबों ने ईसाई मज़्हब को इस तरह हर दिल अज़ीज़ बना दिया, तो क्या उनकी इस से ये ग़र्ज़ थी कि वो अपने मज़्हब को इस बिना पर छोड़कर मसीही हो जाएं? बल्कि इसके ख़िलाफ़ तो नतीजा ये निकला कि जब वो लोग अपने मज़्हब को छोड़कर मसीही हो जाते थे, तो वो शेर के मुँह में पड़ जाते थे, और उनकी जान व माल ख़तरे में पड़ जाती थीं, जिसको वो बख़ूबी गवारा करते थे और हर क़िस्म की अज़ियतों के मुतहम्मिल (बर्दाश्त करने वाले) होते थे।

      राहिबों की तो ये भी मुराद बर न आई। भला उनको और क्या फ़ायदा हुआ और कौन-सी ज़रूरत पड़ी? अगर ये ज़रूरतें ना थीं और ना पूरी हुईं, तो ख़्वाजा साहब ज़रा सँभल के तो बात करते, अपनी बात के लिए कोई बुनियाद व तो रख लेते। रेत पर घर बनाइए, आपको क्या फ़ायदा पहुँचा?

      मज़्कूर बाला इक़्तिबासात में जो कुछ ख़्वाजा साहब ने लिखा है, इस का ताल्लुक़ ज़हनियात से नहीं बल्कि वाक़ि’आत से है, या दूसरे लफ़्ज़ों में तारीख़ से है। और तारीख़ी उमूर के लिए तारीख़ी इस्बात होने चाहिएं। ये नहीं हो सकता कि तारीख़ी बयान को तारीख़ से तो साबित ना करें और राय ही उसके सबूत में पेश करें।

      आखिर राय-ज़नी के लिए भी तो बुनियाद कमोबेश तारीख़ी होनी लाज़िमी है, ताकि राय सिक़ा (सही सनद) हो। जब किसी अम्र का तारीख़ी सबूत ही मादूम (ग़ायब) है, तो राय खुद ही बे-नुमूद बे-सबूत ठहरी। लिहाज़ा बे-बुनियाद राय क़ाबिल-ए-एतिबार व पज़ीराई नहीं।

      अगर ये फ़र्ज़ कर लिया जाये, जैसा कि ख़्वाजा साहब ने दिखाया है कि मसीहिय्यत और पेगनइज़्म में मुशाबहत-ए-कसीर पाई जाती है, तो इस से कोई और नताइज तो बरामद हो सकते हैं, मगर यह नतीजा किसी नहज से बरामद नहीं हो सकता कि ज़रूरत-ए-वक़्त के लिहाज़ से राहिबों ने वो सब वाक़ि’आत मसीह और उनकी वालिदा पर चस्पाँ कर दिए।

      कुछ तो पहले मज़्मून में क़ब्लअज़ीं बयान कर दिया गया है, बाक़ी हस्बे-मौक़ा आगे चल कर बयान किया जाएगा। हम ख़्वाजा साहब से दर्याफ़्त करते हैं कि क्या मसीह का कुँवारी मर्यम से पैदा होना, और बे-बाप पैदा होना, मसीह का बेगुनाह होना, मसीह का कलिमतुल्लाह (ख़ुदा का कलाम) और रूह-अल्लाह होना, ऐसे मो’जिज़ात करना जिनका ज़िक्र क़ुर्आन और इंजील हर दो में मज़्कूर है, मसीह का मस्लूब होना, और ज़िंदा होना, और सऊद-ए-समावी (आसमान पर उठाया जाना) वग़ैरह उमूर मुन्दरिज़ा इंजील व क़ुर्आन हर दो, कुफ़्र व इल्हाद (बेदीन, मुल्हिद) से अख़ज़ किए हुए हैं? तो फिर क़ुर्आन का बयान भी कुफ़्र व इल्हाद से हुआ? जिसको आप हरगिज़ तस्लीम करने को तैयार ना होंगे और ना ही हम ऐसा मानते हैं।

      मज़्कूर बाला इक़्तिबास में, सिवाए मसीह के मस्लूब होने और तीसरे दिन ज़िंदा होने और आस्मान पर चले जाने के, बाक़ी की तमाम इंजीली बातों को आप ने तस्लीम कर लिया और कह दिया है कि “ये सब सही है, इस पर हम ईमान रखते हैं।” लेकिन वही बातें कुफ़्र व इल्हाद (बेदीन, मुल्हिद) में भी हैं। तो आप उन पर भी ईमान रखते हैं?

      जो बातें आज इंजील-ए-मुक़द्दस में हैं, वही हज़रत मुहम्मद के ज़माने में भी इसमें थीं। वही पहली, दूसरी, तीसरी, चौथी सदी के इंजीली क़लमी नुस्ख़ों में मौजूद थीं। पस जब क़ुर्आन ने इंजील की तस्दीक़ की, तो ये उसी इंजील की तस्दीक़ हुई जो उस वक़्त अहले-इंजील के हाथों में थी, और जिसमें वही बातें थीं जो आज की इंजीलों में मौजूद हैं, और कुफ़्र व इल्हाद (बेदीन, मुल्हिद) से भी मिलती हैं।

      पस क़ुर्आन ने उसी इंजील की तस्दीक़ की जिसे आप मुत्तहिम (बदनाम) करते हैं। कैसे अफ़्सोस की बात है कि ख़्वाजा साहब ने ज़रा दूर-अंदेशी से और नेक-नियती से काम नहीं लिया, और बिला-दलील व सबूत अपने मज़ऊमात (तसव्वुर) को मुरत्तिब करते चले गए और अस्ल व सही नतीजे की कुछ परवा ना की।

      यनाबीअ-उल-मसीहिय्यत के पढ़ने से, ख़ासकर इस ज़ेर-ए-ग़ौर मज़्मून से, बिल्कुल वाज़ेह होता है कि जो कुछ ख़्वाजा कमाल-उद्दीन ने मुख़ालिफ़त की है, वो कलीसी मज़्हब की खासतौर पर है, ना कि इंजीली मसीहिय्यत की मुख़ालिफ़त। चुनान्चे इस मज़्मून की दूसरी सुर्ख़ी भी “मसीही कलीसिया के माख़ज़ है”, ना कि इंजीली मसीहिय्यत के माख़ज़। और बार-बार फ़िक़्रह “कलीसी मज़्हब” इस्तिमाल किया है, और उमूमन उन्हीं उमूर पर तन्क़ीद की है जो कलीसिया में माने जाते हैं, हालाँकि इंजील जलील में उनके मानने या ना मानने के बारे में कोई हुक्म नहीं और ना ही वो मसीही मज़्हब की बुनियाद हैं, और ना ही उनका मानना हर मसीही को नजात के लिए ज़रूरी है।

      मसलन, मसीह की पैदाइश, जी उठने और सबूत के दिन की बाबत बह्स की है, हालाँकि इंजील ने ये नहीं बताया कि मसीह किस महीने की किस तारीख़ को पैदा हुआ था या किस तारीख़ को आस्मान पर गया। मगर ये तो बताया है कि मसीह फ़िल-हक़ीक़त सलीब पर मर गया और तीसरे दिन जी उठा और आस्मान पर सऊद फ़रमाया गया। पस यही मानना काफ़ी और ज़रूरी है और इसी ईमान पर नजात का इन्हिसार है।

      फिर सलीब के निशान की कलीसिया में तज़वीज के बारे में बहुत कुछ लिखा है कि फ़ुलाँ सदी से पेश्तर कलीसिया-ए-लिट्रेचर में ये निशान और इसका इस्तिमाल नहीं मिलता। ये चौथी ही सदी की ईजाद है, या बपतिस्मा के वक़्त मशरिक़ की जानिब मुँह करके खड़ा होना, या मग़रिब से मशरिक़ की तरफ़ रुख़ करना, या रोमन कैथोलिक गिरजे में आल्टर का गोशा मशरिक़ में होना, या मनकों (राहिबों) और ननों (राहबात) का होना, या कैथोलिक पादरी की चांद में गोल टिकिया का होना, ईस्टर के दिन के तोहफ़ों में अंडों और “क्रॉस” केक यानी ऐसी रोटी जिन पर सलीब का निशान होता है, या ईसाइयों की क़ब्रों पर सलीब की बजाए मछली की तस्वीर का होना, या आयरलैंड के खंडरों में से जो सलीब बरामद हुई है, उस पर एक शख़्स का फांसी पर जड़ा हुआ नज़र आना और उसके सर पर कांटों के ताज का नहीं बल्कि ईरानी ताज का होना, वग़ैरह-वग़ैरह उमूर ऐसे वहमी और फ़ुज़ूल हैं जिनकी कुछ वक़अत नहीं।

      इंजील जलील में ऐसी बातों की जानिब इशारा तक नहीं, वो ईमानी उमूर में दाख़िल भी नहीं। तो फिर उन को मसीही मज़्हब के सर मुँढना और मसीही मज़्हब पर त’अन करना, फ़ुज़ूलियात में से नहीं तो और क्या है?

      ऐसा मालूम होता है कि ख़्वाजा साहब के पास लोहे के तेज़ और ज़बरदस्त हथियार नहीं, बल्कि लकड़ी के हल्के हथियार हैं जिनसे आप मसीहिय्यत और मसीहियों पर हमला कर रहे हैं, जो नबर्द-आज़्मूदा (जंग के लड़ाको) के नहीं बल्कि बच्चों के खेलने के हथियार हैं। और ख़्वाजा साहब यही हथियार लेकर मैदान में निकले हैं और नहीं जानते कि जिन हथियारों को इस्तिमाल करके कलीसिया ख़राब हो गई “और उस ने अलल-ऐलान कह दिया कि कलीसिया उस वक़्त नफ़रतअंगेज़ है”, उन्हीं को आप ख़ुद इस्तिमाल करके नफ़रतअंगेज़ बन रहे हैं।

      मैं ऐसी बातों को मसीही मज़्हब के हक़ में बिल्कुल बे-असर और फ़ुज़ूल समझ कर, इनकी बह्स में पड़ना नहीं चाहता और अपना क़ीमती वक़्त और मेहनत इन में सर्फ़ करने से ना तो ख़ुश हूँ और ना माइल। हाँ, अलबत्ता इन दो बातों की तरफ़, कि अव्वल, मसीहिय्यत के वाक़ि’आत और पेगनइज़्म में भी पाए जाते हैं और वहीं से अख़ज़ किए गए हैं; दोम, कि मसीहिय्यत में सूरज की मुख़्तलिफ़ कैफ़ियात ही का नक़्शा पेश किया गया है, अपनी तवज्जोह लगाना, उन पर गौर व ख़ौज़ करना, और अपना क़ीमती वक़्त और मेहनत सर्फ़ करना अपना फ़र्ज़ समझता हूँ।

      पस पहले मैं मसीहिय्यत और पेगनइज़्म यानी कुफ़्र व इल्हाद (बेदीन, मुल्हिद) का मुक़ाबला ख़्वाजा साहब की अपनी ही इबारत में, मगर मुख़्तसरन, हदिया-ए-नाज़रीन करूंगा, और जो नतीजा उन्होंने इस से निकाला है, नाज़रीन के सामने रखूंगा, और फिर सारे बयान पर तन्क़ीदी नज़र डालूँगा। आप लिखते हैं कि, “देखो, सफ़्हा 68 वग़ैरह, “बाबिल की एक तारीख़ का वर्क़”

“बाबिल के खंडरात तो आए दिन दुनिया को हैरान कर रहे हैं, लेकिन 1903 से 1904 में शहर काला शेरकट के खंडरात से कुछ सिलें बरामद हुई हैं जिन पर हुरूफ़ कुंदा हैं। ये वही मुक़ाम है जहां क़दीमी शहर असूर वाक़ेअ था। ये सिलें कुतुब-ख़ाना असूर में से हैं, जो मसीह से नौ सौ बर्स पहले क़ायम हुआ था। लेकिन ये कुतबे उन से भी बहुत क़दीमी, बाबिली कतबात की नक़्ल हैं। इन कतबात के मज़ामीन ने मग़रिबी दुनिया को हैरान कर दिया। ये तो सही है कि मसीह के लिए दुश्मनों ने सलीब तज्वीज़ की, आख़िर दो क़ोमें इसकी रावी हैं। लेकिन जो दास्तान-ए-सलीब बाइबल पेश करती है, इन कतबात से मुश्तबह हो जाती है।

“मैं यहां उन कतबात की इबारात-ए-मुताल्लिक़ा को दर्ज कर देता हूँ और इसके मुक़ाबिल इंजीली दास्तान के वाक़ि’आत दर्ज कर देता हूँ। अलबत्ता इस मौज़ू पर मिस्टर मेड का मुफ़स्सिल और दिलचस्प आर्टीकल, जो रिसाला “कोलेस्ट” लंडन के जनवरी नम्बर 1922 ई॰ में छपा है, वो देखने के क़ाबिल है।”


बाबिल की दास्तान-ए-सलीब इंजील की दास्तान-ए-सलीब
1. बा’अल गिरफ़्तार होता है। 1. मसीह गिरफ़्तार होता है।
2. बा’अल का मुक़द्दमा पहाड़ी वाले घर (कमरा) अदालत में होता है। 2. मसीह का मुक़द्दमा बड़े रब्बी के घर में और फिर पिलातूस की अदालत में होता है।
3. बा’अल को मारते और ज़ख़्मी करते हैं। 3. मसीह को कोड़े लगाए जाते हैं।
4. बा’अल के साथ दो मुजरिम होते हैं, जिनमें से एक को सज़ा-ए-मौत दी जाती है और एक मुजरिम को छोड़ दिया जाता है। उसको बा’अल के साथ सज़ा को नहीं ले जाते। 4. मसीह के साथ तीन मुजरिम थे, जिनमें से दो को सज़ा-ए-मौत दी गई और एक मुजरिम बरअब्बा नाम छोड़ दिया गया। और वो मसीह के साथ ना गया।
5. बा’अल को पहाड़ी की तरफ़ (मारने के लिए) ले गए। 5. मसीह को सलीब देने के लिए गलगता (पहाड़ी) पर ले गए।
6. बा’अल के पहाड़ी की तरफ़ जाने पर शहर में शोर व फ़साद शुरू हो गया और लड़ाई हुई। 6. मसीह की मौत के बाद हैकल का पर्दा फट गया, ज़लज़ला आया, चट्टानें फट गईं, क़ब्रें शक़ हो गईं, वग़ैरह-वग़ैरह।
7. बा’अल के कपड़े ले लिए गए। 7. मसीह का लिबास सिपाहियों में तक़्सीम हुआ।
8. बा’अल के जिस्म में एक आला छूने से ख़ून उस के दिल से निकला। उस को एक औरत ने पोछा। 8. मसीह के पहलू में (दिल के क़रीब) भाले का लगना, ख़ून पानी का निकलना, फिर औरतों का (जिस्म धो कर) मुश्क इत्र लगाना।
9. बा’अल पहाड़ी की तह में चला जाता है, जहां सूरज और रोशनी नहीं। वो ज़िंदगी से ग़ायब हो जाता है। 9. मसीह चट्टानी क़ब्र में डाला जाता है, और वहाँ से वो आलम-ए-अम्वात में चला जाता है।
10. बा’अल को पहाड़ी क़िले में बंद कर के, उस पर पहरा रखा गया। 10. मसीह की क़ब्र पर पहरा रखा गया
11. एक देवी बा’अल के पास बैठती है। 11. मर्यम मग्दलीनी और दूसरी मर्यम क़ब्र के सामने बैठती हैं।
12. बा’अल को जिस जगह रखा गया था, वहां उसकी तलाश करते हैं। ख़ासकर एक औरत रोती हुई क़ब्रिस्तान के दरवाज़ा पर उसकी तलाश करती है और रोते हुए कहती है, “मेरे भाई, मेरे भाई!” 12. मरियम मग्दलीनी क़ब्र पर मसीह की तलाश में आती है। क़ब्र को ख़ाली देखकर, रोते हुए कहती है, “मेरे ख़ुदावंद, को ले गए!”
13. बा’अल फिर ज़िंदा होता है और पहाड़ से निकलता है। 13. मसीह ज़िंदा हो कर क़ब्र से निकलता है।
14. इस वाक़िया की तक़रीब पर बाबिल में मार्च के आख़िरी अय्याम में धूम-धाम से जलसा होता है, ख़ुसूसन इस अम्र के लिए कि बा’अल ज़ुलमाती ताक़त पर ग़ालिब आया!! 14. ईस्वी दुनिया में उन्हीं दिनों अय्याम-ए-ईस्टर, जो ख़ुशी का तहवार मनाया जाता है, उसका भी मक़्सद यही है कि मसीह उस दिन ज़ुल्माती ताक़त पर ग़ालिब आया!!


“अब एक मुहक़्क़िक़ अगर इंजीली दास्तान के वाक़ि’आत को बहुत हद तक बाबिली दास्तान से लिया हुआ ना समझे तो क्या कहे। बीस साल से ये बाबिली कहानी रोशनी में आ चुकी है, फ़ज़ला-ए-मसीहिय्यत इसे देख और सुन चुके हैं। इस पर कोई मुख़ालिफ़ाना तन्क़ीद नहीं की गई। बिलफ़र्ज़ अगर ये दो वाक़ि’आत अम्र-ए-सलीब में मुतशाबेह होतीं तो तारीख़ तो बा’ज़ वाक़ि’आत दुहराया ही करती है। लेकिन यहां तो तारीख़ वही है, क़रीब-क़रीब कहानी वही है। फ़र्क़ है तो नाम और मुक़ाम का। फिर मौत और मौत से जी उठने की ग़र्ज़ एक ही है, यानी ज़ुल्माती ताक़तें ख़ुदा के नूर पर ग़ालिब आना चाहती हैं और कुछ वक़्त के लिए उस पर ग़ालिब भी आ जाती हैं, हत्ता कि वो मिट जाता है और मिटने के बाद फिर ज़ुल्माती ताक़तों पर ग़ालिब आ जाता है।”

“ये अम्र मुहक़्क़िक़ हो चुका है कि बाबिल के लोग आफ़ताब-परस्त (सूरज की इबादत करने वाले) थे, और बा’अल उस क़ौम का सूरज देवता था। वो लोग अय्याम-ए-बहार में ठीक उस दिन, जब दिन रात बराबर हो कर दिन बढ़ने लगता है, ये रस्म अदा करते थे, और यह सब कुछ थिएटर के रंग में होता था। बुख़्तनसर के अय्याम-ए-हुकूमत में भी ये थिएटर हुआ करते थे, जो यहूदियों को क़ैद करके बाबिल में ले गया था, जहां इस्राईली असीर (क़ैदी) कई नस्ल तक ग़ुलामाना हैसियत में रहे। इन थिएटरों को देखते रहे और वापसी पर इन क़िस्सों को साथ लाए। इस वाक़िये के अलावा तौरेत और इस्राईली शिआर में जो बीसियों और बातें भी आफ़ताब-परस्ती की शामिल हो गई हैं, मग़रिबी तहक़ीक़ ने उन सब को इसी वाक़िये, बुख़्तनसर और क़ैद-ए-इस्राईल, की तरफ़ मन्सूब किया है। किताब पैदाइश के वाक़ि’आत वग़ैरह सब के सब बाबिल से निकल आए।”

“अब ईसाई दोस्तो, अज़-रुए-इंसाफ़ आप ख़ुद ही बतलाओ कि हम इंजीली वाक़ि’आत पर क्या राय-ज़नी करें। काश बाबिल के इस सूरज देवता के क़दीमी मज़्हब, कुफ़्र व इल्हाद (पेगनइज़्म) में यही एक कहानी होती, मगर हम देखते हैं कि ज़हूर-ए-मसीह के वक़्त ईरान, बाबिल, नैनवा, कार्थेज, सिरिया, यूनान, रूमा, मिस्र, दीगर यूरोपियन ममालिक, ख़ुसूसन आयरलैंड और समुंद्रों पार मैक्सीको, सब जगह आफ़्ताब-परस्ती होती थी। हिन्दुस्तान भी इस से ख़ाली ना था। इन सब ममालिक में अपने-अपने हाँ (यहाँ) एक ना एक सूरज देवता था। उनके नाम, जैसा मैं पहले लिख चुका हूँ, हस्बे-ज़ैल थे, मथुरा (ईरान), बा’अल (बाबिल), आतीस (सरिया), इस्टार्टी (कार्थेज सरिया), एडोनिस (सीरिया), बेकस (यूनान व रोमा), हरक्युस (यूनान व रोम), होरस (मिस्र), ओसीरस (मिस्र), कटीज़ल-क्वटल (मैक्सीको), अपालो (रूमा)। फिर या कि इन में से अक्सर बाकिरा (कुँवारी) के ही पेट से पैदा हुए हैं। तारीख़-ए-विलादत भी इन में से अक्सर की वही 25 से लेकर 27 दिसंबर तक की है, जिसे सूरज की कैफ़ियत से ताल्लुक़ है (जिसको मैं आगे चलकर बयान करूंगा)। फिर सब से बढ़कर इस बात को हम क्या करें कि इन में से बा’ज़ की मौत भी मसीह की मौत से मिलती-जुलती है। इन सब के मुताल्लिक़ भी यही अक़ीदा है कि वो नस्ल-ए-इन्सानी की नजात के लिए मरे। वो सब के सब अपने परस्तारों में नस्ल-ए-इन्सानी के नजात-दहिंदा और शफ़ी कहलाए। मसीह की तरह नस्ल-ए-इन्सानी की तालीम के लिए अक्सर सफ़र में रहे (ख़ुद लफ़्ज़ “मसीह” के एक म’अनी बहुत सफ़र करने वाला भी है)। इन की विलादत भी गार या किसी तहख़ाने में हुई। इन पर ज़ुल्माती क़ुव्वतें ग़ालिब आईं। वो मरे। दोज़ख़ या तहत-अल-शुरा में उतरे। मुर्दों में से जी उठे। वो अपनी जमाअत में मुरीदों को बपतिस्मा के ज़रीये दाख़िल करते थे। उन में से बा’ज़ के शागिर्द भी बारह ही थे। उनकी याद में एक क़िस्म की अशा-ए-रब्बानी भी होती थी।” सफ़्हा 73 के हाशिया में मस्तूर है।

“नस्ल-ए-इन्सानी को मुसीबत और गुनाह की सज़ा से बचने के लिए ख़ुदा या ख़ुदा के बेटे का इन्सानी शक्ल इख़्तियार करना और अपनी क़ुर्बानी से नस्ल-ए-इन्सानी को नजात देना एक आम अक़ीदा मसीह से पहले हर-जगह मौजूद था, ख़ुसूसन उन मज़ाहिब में जिसे आज ईसाई पेगनइज़्म कहते हैं। अतीस दरख़्त से बंधा हुआ है और उसके जिस्म में मेख़ें चुभी नज़र आती हैं। दरख़्त के नीचे एक बछड़ा दिखाया जाता है। (डेवपेस सफ़्हा 255) एडोनिस की मौत के मुख़्तलिफ़ (पहलु) बयान दिए गए हैं, लेकिन एक मुजस्समा में वो बतौर मस्लूब नजात-दहिंदा दिखाया गया है। उसकी मौत की याद में जो दिन मनाया जाता था, उसमें एक मुजस्समा को कफ़न में लपेटकर रोते-पीटते थे और वही बातें करते थे जो आज रोमन कैथोलिक गुड फ्राइडे के दिन करते हैं। परवीथीन नस्ल-ए-इन्सानी के लिए कोह-ए-क़ाफ़ के दामन में पहाड़ से बाँधा जाता है। नाराज़-शुदा ख़ुदा के कारकुन उसके हाथ-पांव में कीलें ठोंकते हैं। वहां वो सलीब की तरह हाथ फैलाए नज़र आता है और कहता है, “उस की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ मुझे कोई नहीं बचा सकता।” (इस्कानीलस बेकस)। इब्ने ज्युपीटर (ख़ुदा) भी इन्सानों की नजात के लिए मक़्तूल होता है। सुरापीज़, मिस्र, के इब्ने-अल्लाह के मंदिर के खंडरात में एक सलीब पाई गई है। असीर (क़ैदी) क़त्ल होता है और उसके आज़ा-व-जवारिह अलग किए जाते हैं। फ़िल-जुम्ला देवताओं का नस्ल-ए-इन्सानी के लिए मस्लूब होना और सलीब का निशान नजात ठहराना मसीह के वक़्त और उसके बाद दो तीन सदियों तक ऐसा आम था कि राहिब मीनोस फ्लिप अपनी किताब “ओक्टोईस” में पेगन (मुश्रिक) लोगों को मुख़ातिब करके कहता है कि “हम लोग तो सलीब के परस्तार नहीं, ये तो तुम उसकी परस्तिश करते हो। तुम्हारे अलमों (झंडों) और हर एक बात पर सलीब का निशान है।” ख़ुद टरटोलेन ने भी इस अम्र को तस्लीम किया है। वो अपालोज़िया में पेगन (मुश्रिक) को मुख़ातिब करके कहता है कि “तुम्हारे सब ख़ुदा, तुम्हारे सब ख़ुदाओं की तस्वीरें, सलीबों पर नज़र आती हैं। तुम्हारे सब अलमों (झंडों) पर सलीबें या मस्लूबों की शक्लें हैं।” कटीज़ल-क्वटल की तस्वीरें भी मस्लूब ही नज़र आती हैं। और वो मौत नस्ल-ए-इन्सानी के गुनाह का कफ़्फ़ारा भी मानी जाती है। (किंग्ज़ सफ़्हा 166, 167)”

      मैंने ख़्वाजा साहब की किताब से इस क़द्र तवील इक़्तिबास किए हैं, सो इसकी वजह ये है कि क़ारईन-ए-किराम इस बात को बख़ूबी समझ लें कि पेगनइज़्म और मसीहिय्यत में मुशाबहत कहाँ तक है, और कि वो इस नतीजे पर जल्द पहुंच सकें जो मैं उनके रूबरू पेश करता हूँ। इस से अगले सफ़्हात में ख़्वाजा साहब ने इन्हीं उमूर पर मज़ीद तश्रीह की है और हर एक मज़्कूर-बाला देवता का मुख़्तसर साल हाल बयान किया है जो क़रीब-क़रीब सब यकसाँ है। इक़्तिबास की ज़रूरत नहीं।

      लेकिन अगर ख़्वाजा साहब का वो बयान, जिसका इक़्तिबास मैंने “असातीर-उल-अव्वलीन” के शुरू में किया है, मद्द-ए-नज़र रखा जाये, और आपके इस क़ौल को कुछ वक़अत दी जाये कि:

“मसीह की तालीम का जो नक़्शा क़ुर्आन शरीफ़ पेश करता है, अनाजील-ए-अर्बा भी क़रीब-क़रीब जिसकी मुसद्दिक़ हैं, वो तो इस्लाम की एक शक्ल है।” (देखो यनाबीअ-उल-मसीहिय्यत सफ़्हा 14)

      तो एक मुंसिफ़-मिज़ाज मुक़ाबला-ए-मज़ाहिब करने वाले को इस अम्र से इन्कार करने की कोई गुंजाइश नहीं रहेगी कि जिस इस्लाम को मसीहिय्यत पेश करती है, वही इस से पहले बाबिल की दास्तान में मौजूद है, मगर “मुश्रिकाना तबीअत” और “मुश्रिकाना रंग” में है।

      और फिर उसके बाद क़ुर्आन की दास्तान में भी है, मगर यहां “इल्हाम-ए-इलाही इन्सानी हाथों से मग़शूश-शुदा (मिलावटी) है”, और ऐसा मग़शूश (मिलावट) हुआ हो कि इसे होश में लाना बहुत मुश्किल काम है। एक तरफ़ बाबिली दास्तान में मसीहिय्यत बहुत साफ़-साफ़ नज़र आती है, मगर क़ुरआनी दास्तान में जो मसीहिय्यत पाई जाती है, उस को इन्सानों ने, उस मुसफ़्फ़ा और पाकीज़ा पानी को, जो वह्यी इलाही की शक्ल में ख़ुदा की तरफ़ से सब के लिए यकसाँ नाज़िल हुआ, मुख़्तलिफ़ आमेज़िशों से गदला कर दिया।” (सफ़्हा 3)

      ये वही “मज़्हब-ए-हक़्क़ा” है जो ख़्वाजा साहब के क़ौल के मुताबिक़ “नूह से लेकर सय्यदना मसीह तक हर क़ौम व मिल्लत को दिया गया” और सब से पहले उन क़ौमों को मज़्हब की तरफ़ दावत दी, जिन्हें एक ना एक वक़्त ख़ुदा की तरफ़ से कोई किताब पहुंच चुकी थी (सफ़्हा 5)। हर क़ौम व मिल्लत में बाबिल, मिस्र, यूनान वग़ैरह सब शामिल हैं। उन से ज़ाहिर होता है कि कल माक़ब्ल और माबा’अ के मज़ाहिब का मर्कज़ मसीहिय्यत है, जो इंजील में है। मगर उस से ये साबित नहीं होता कि मसीहिय्यत ने उन क़दीम अक़ाइद से लिया है। बिलफ़र्ज़ अगर आप की दलील तश्बीह को वैसा ही मान लिया जाये जैसा आपने मसीहिय्यत के बारे में पाया है, तो साथ ही ये मानना पड़ेगा (आप ही की दलील की बिना पर) कि क़ुर्आन में जो मसीहिय्यत है, वो अनाजील-ए-अर्बा से ली गई है, क्योंकि इन दोनों बयानात में बहुत मशाबहत पाई जाती है।

      और जैसे बाबिल वग़ैरह ममालिक की दास्तानें मसीहिय्यत से हज़ारों बरस पहले की हैं, वैसे ही मसीहिय्यत क़ुर्आन से भी सैंकड़ों बरस पहले की है। क़ुर्आन के बारे में तो बहुत ही इस्बात-ए-तारीख़ी पाए जाते हैं, जैसा कि यनाबीअ-उल-इस्लाम में मुन्दरज है। मगर मसीहिय्यत के बारे में तो कोई तारीख़ी सबूत पेश नहीं किया गया जिससे आपकी दलील-ए-तश्बीह को ज़ोर हो सके। बल्कि तारीख़ी सबूत के बग़ैर तो दलील-ए-तश्बीह से ये नतीजा निकालना ही मह्ज़ क़ियास और नामुम्किन मालूम होता है कि एक मज़्हब दूसरे से, जो उस से पहले निकला है, लिया गया हो।

      बरअक्स इस के, मसीहिय्यत के बारे में कि इस के तमाम वाक़ि’आत बाबिली दास्तान से सैकड़ों बरस बाद, बजिन्सा, ख़ास मुल्क और ज़माने में मा’रज़-ए-ज़हूर में आए, तारीख़ी शहादात ग़ैर-मसीहियों की बहुत-सी मौजूद हैं। चुनान्चे मशहूर व मारूफ़ यहूदी मुअर्रिख़ फिल्यूस यूसुफ़ीस, जो 37 ई॰ में यरूशलेम में पैदा हुआ था और 100 ई॰ तक मौजूद था, अपनी किताब “Jewish Antiquities” की अठारहवीं किताब के तीसरे बाब की तीसरी फ़स्ल में सय्यदना मसीह के बारे में इस तरह लिखता है:

“अब क़रीब इसी वक़्त, येसू नामी एक दाना आदमी था, बशर्ते कि उसको आदमी कहना जायज़ हो, क्योंकि वो अजीब कलाम करने वाला था, ऐसे लोगों का उस्ताद जो ख़ुशी से सच्चाई क़ुबूल करते हैं। उस ने यहूदियों और ग़ैर-क़ौमों हर दो में से बहुतों को अपने पास खींचा। वो अल-मसीह (अलिफ़-लाम ख़ुतूत-ए-वहदानी में) था। और जब पिलातूस ने हमारे सरबरा-वरदा शख़्स की तहरीक व तज्वीज़ से उस पर सलीब का फ़त्वा लगा दिया था, जो लोग उसे पहले से प्यार करते थे, उन्होंने उसको ना छोड़ा। क्योंकि वो तीसरे दिन फिर ज़िंदा उन पर ज़ाहिर हुआ, जैसा कि इलाही अम्बिया ने उसकी बाबत ये और हज़ारों और अजीब बातें पेशीनगोई के तौर पर कही थीं। और मसीहियों का फ़िर्क़ा, जो उस से मौसूम है, आज मादूम नहीं है।”

      इस के अलावा इसके बयान से ज़ाहिर होता है कि जो हालात और वाक़ि’आत, और यहूदी और रोमी अफ़िसरों के हालात, जो इंजीलों और आमाल की किताब में मुन्दरज हैं, वो फ़िल-हक़ीक़त तारीख़ी हैं, ना कि जैसा ग़ैर-मसीही मुख़ालिफ़ीन कहते हैं कि पेगनइज़्म की दास्तानें और बनावटी क़िस्से कहानियां। (देखो Jewish Antiquities, किताबें 13 से 20)

      अगर वो अपनी इस किताब के इन मुक़ामात में मसीह का नाम नहीं लेता या उसके पैरवान (मानने वालों) में से किसी का नाम साफ़ नहीं लेता, तो भी इस से ज़ाहिर है कि ये हिस्सा उसकी किताब का एक ग़ैर-मसीही क़दीमी मुअर्रिख़ की शहादत है कि जिन रोमी हुक्काम और यहूदी सरदार-काहिनों का ज़िक्र इंजील-नवीसों ने किया है, वो तारीख़ी तौर पर वही हैं, जिन्हों ने मसीह की तारीख़ में बड़ा हिस्सा लिया।

      मसलन, मासूम बच्चों का क़त्ल-ए-आम, हेरोदेस बादशाह की वफ़ात के बाद अज़-खिलाउस का यहूदिया में बादशाह हो कर आना, हेरोदेस इंटेपास का अपने भाई फ़ेलबोस की बीवी हीरोदियास से शादी कर लेना फ़ेलबोस की हयाते-हीने (जीते-जी) ही में, और इस बात से यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले से मलामत उठाकर उसको मुख़य्यरस के क़िले में क़ैद कर देना और बाद में वहीं क़त्ल करवा डालना, फ़रीसियों और सदूक़ियों का हाल, यहूदी मुरव्वजा रीत व रसूम और ईदों वग़ैरह का ज़िक्र, जो वो मुफस्सिल तौर पर करता है और जिनका बयान हमारी मौजूदा इंजील में पाया जाता है, वग़ैरह, ऐसे उमूर हैं, जो ख़ुद और अपने मुताल्लिक़ा उमूर मुतज़क्किरा अनाजील व आमाल में तारीख़ी हैसियत रखते हैं। और बाहम ऐसी मुताबिक़त रखते हैं, कि तमाम इंजीली बयानात के अफ़सानवी होने और बाबिली क़दीमी दास्तान होने के सख़्त माने (रुकावट) हैं।

      और इंजीली तारीख़ी उमूर की फ़िल-हक़ीक़त किसी ग़ैर-दास्तान या रिवायत से बिल्कुल आज़ाद और बेताल्लुक़ करते हैं, और अफ़साना नहीं, बल्कि हक़ीक़ी तारीख़ी उमूर होने का तारीख़ी सबूत है। अभी जो हवाला इस मुअर्रिख़ से ऊपर दिया गया है। इससे मसीह की उलूहियत इशारतन उस के मोअजज़ात, पिलातूस के अय्याम में मस्लूब हो कर मरने और तीसरे दिन ज़िंदा होने, और अपने शागिर्दों को नज़र आने का सरीह बयान पाया जाता है। यूसुफ़ीस के एतिक़ाद के मुताबिक़ ये सब बातें मसीह के हक़ में जो पूरी हुईं, वो थीं, “जो इलाही अम्बिया ने उसकी बाबत ये और हज़ारों अजीब बातें पेशीनगोई के तौर पर कही थीं।” मसीह और मसीहियों का मुफ़स्सिल बयान जो इस मुअर्रिख़ ने नहीं दिया, इसकी वजह ये थी कि अगरचे सैंकड़ों बरस तक मसीही मज़्हब रोमी और यूनानी तौजिहात को अपनी तरफ़ खींचता रहा, तो भी जो यहूदियों के आम दस्तूर के मुवाफ़िक़ उस ने भी उन मुताल्लिक़ा वाक़ि’आत का ज़िक्र निहायत बुख़्ल (कंजूसी) के साथ किया।

      तासतस नामी एक रोमी मुअर्रिख़, जो 78 ई॰ में रोमी शहनशाह वापशीन के अय्याम-ए-हुकूमत में उस का मशहूर मारूफ़ जरनैल था, रोमा की आतिशज़दगी की बाबत ज़िक्र करते हुए, और कि किस तरह क़ैसरो नीरू ने 64 ई॰ में इस आतिशज़दगी का इल्ज़ाम अपने ऊपर से उतारने के लिए मसीहियों के क़त्ल का हुक्म दिया था। उनका इस तरह बयान करना है, “इस तरह रिपोर्ट को ज़ाईल करने की ग़र्ज़ से नीरू ने उन लोगों को, जिन्हें अवामुन्नास उनके मख़्फ़ी (छिपी) जराइम की वजह से नफ़रत की निगाहों से देखते थे, अपने ही महल में मुजरिमों की तरह रखा और हर क़िस्म के नए से नए मज़ालिम से सज़ा दी। वो उन को मसीही कहा करते थे।” मसीह जिसके नाम से मौसूम थे, तिबरियास के अहद में प्रोकियारेटर पिंतुस पिलातूस के ज़रीये मार डाला गया था, और वबाई वस्वसा थोड़े अर्से के लिए दब गया था। बाद ये ना सिर्फ यहूदिया ही में फूटने लगी, जहां ये शरारत पहले शुरू हुई, बल्कि रोमा में भी।

      जहां तमाम अक़्साम (मुख्तलिफ़ क़िस्में) की ख़ूँ-रेज़ियाँ और गंदी, शर्मनाक बातें बाहम मिलतीं और फ़ैशनेबल बन जाती हैं। तब सबसे पहले किसी को गिरफ़्तार किया और इक़रार करवाया जाता है। फिर उसकी इत्तिला पर एक जम्म-ए-ग़फ़ीर (बड़ी भीड़) ठहराई जाती थी। आतिशज़दगी के जुर्म में इस क़द्र नहीं, जिस क़द्र कि बनी नूअ इन्सान के नफ़रत के जुर्म में। और ना सिर्फ़ उन को मार ही डाला जाता था, बल्कि बड़ी बेइज़्ज़ती से मार डाला जाता था। या आग से जलाए जाने के लिए सलीबों पर बांध दिए जाते थे। और जब शाम हो जाती थी, तो रात को रोशन करने के लिए उन्हें जलाया जाता था। इस मुक़ाम में रोमी मुअर्रिख़ तासतस हस्बे-ज़ैल उमूर की ख़बर देता है, (1) तिबरियास की हुकूमत में पिंतुस पिलातूस नामी एक रोमी प्रोकियारेटर था, (2) उसके हाथों मसीह मार डाला गया था, (3) ये मसीह मसीही फ़िर्क़ा का बानी था, (4) मसीहियों का आग़ाज़ यहूदिया में हुआ, (5) ये फ़िर्क़ा बहुत जल्द रोमा तक फैल गया, (6) लोग इस फ़िर्क़े में इस सरअत के साथ शामिल होते थे कि रोमा की आतिशज़दगी के वक़्त मसीही जमाअत का हिस्सा, जो इस शहर में गिरफ़्तार हुआ था, उसे एक जम्म-ए-ग़फ़ीर (बड़ी भीड़) कह सकते थे।

      फिर एक और रोमी मुअर्रिख़ और इलाक़ा बथोनियाह का गवर्नर, जो रोमी शहनशाह तिराजान के अह्दे हुकूमत में ज़िंदा था, जिसका नाम छोटा पलीती था, इस शहनशाह को एक ख़त लिखता है, जिसमें वो मसीहियों के साथ सुलूक किए जाने के बारे में उस से मश्वरा तलब करता है। ये शख़्स 113 ई॰ के क़रीब फ़ौत हो गया था। ख़त का वो हिस्सा जो हमारे मतलब का है, हस्बे-ज़ैल है:

“ऐ शहनशाह, मेरा ये दस्तूर रहा है कि वो तमाम बातें तुझसे पूछ लिया करता हूँ जिनमें मुझे कुछ शक पड़ जाया करता है। जब मेरे सामने कोई रोक आ जाए तो कौन मेरा बेहतर हादी हो सके, या जब मैं नावाक़िफ़ हूँ तो कौन मुझे रोशन कर सके? मसीहियों की तहक़ीक़ात में मैंने कभी हिस्सा नहीं लिया। लिहाज़ा मैं नहीं जानता कि वो क्या जराइम हैं जिनकी उनको उमूमन सज़ा दी जाती है, या तहक़ीक़ात कैसे जाती है, या कौन-कौन सी रिआयतें की जाती हैं। पस मुझे ख़फ़ीफ़ से ख़फ़ीफ़ इल्म भी ना हुआ करता था कि आया उम्र का कोई इम्तियाज़ है या नहीं, या निहायत ख़फ़ीफ़ मुजरिमों को ऐसी सज़ाएं दी जाती थीं जैसी ज़्यादा सख़्त मुजरिमों को हुआ करती थीं। जो लोग तौबा करते थे, उन को माफ़ किया जाता था या कि नहीं, या किसी शख़्स को जो पहले मसीही था, मगर बाद में मसीही ना रहा, उस को कुछ फ़ायदा भी पहुँचता था या नहीं। आया सज़ा सिर्फ़ नाम ही के सबब से दी जाती, मगर मख़्फ़ी (छिपी) जुर्म कोई ना होता, या उन मख्फी (छिपे) जराइम की सज़ा दी जाती थी जो उस के नाम से मुताल्लिक़ होते थे। इस असना (वक़्त) में उन लोगों के साथ, जो बतौर मसीही मुजरिम होकर मेरे रूबरू आते थे, मेरा यही तरीक़ा रहा, मैं उन्हीं की ज़बान से पूछ लिया करता था कि “क्या तुम मसीही हो? अगर वो इक़रार करते, तो मैं सज़ा का डर दोहरा कर दूसरी और तीसरी बार पूछ लिया करता था। अगर वो उसी पर अड़े रहते, तो मैं उनके क़त्ल का हुक्म दे देता था। क्योंकि मैं उन से कभी नहीं पूछता था कि जिसका तुम इक़रार करते हो, वो बात क्या है। बहर-सूरत, ग़र्दनकशी और ना झुकने वाली शरारत मुस्तौजिब सज़ा हैं। इसी क़िस्म की दीवानगी के और लोग भी थे, लेकिन चूँकि ये रोमी शहरी थे, इसलिए मैं उनको नोट कर लिया करता था कि उन्हें रोमा को भेज दूँ, उन्हें कार्यवाईयों के सिलसिले में, जैसा कि अक्सर हुआ करता है। ये जुर्म जिसका नोटिस लिया जाता था, आम हो गया था, और मुत’अद्दद अलग-अलग मुक़द्दमात बरपा हो जाया करते थे। एक का उज़्र पेश किया जाता था, जिसमें बहुत से नाम हुआ करते थे, मगर दस्तख़त कोई ना होता था। और जबकि वो मेरे पीछे-पीछे देवताओं से दुआ माँग लेते और ख़ुशबू और शराब आपके बुत पर नज़्र गुज़ार कर उस से मिन्नत व समाजत करते, जिसको मैं देवताओं की मूरतों के साथ इसी मक़्सद से अदालत में मंगवा लिया करता था, और कि वो मसीह के पर लानत कर दें। हालाँकि जिन बातों में से एक भी (ऐसा ही ये कहा जाता है) वो नहीं कर सकते थे जो सच-मुच मसीही थे। तो मैं ख़याल करता था कि उनको छोड़ देना दुरुस्त है। दीगर अशख़ास, जिसका नाम मुख़्बिर बताता था, कहते थे कि हम मसीही थे, मगर उस वक़्त उस से इंकारी हो जाते थे। और यह बयान देते थे कि हम मसीही तो थे, मगर अब नहीं हैं। बा’ज़ कहते थे कि इस बात को तीन साल का अर्सा गुज़र चुका है। बा’ज़ कि ख़ासे बरस गुज़र चुके हैं। मगर मादूद-ए-चंद ऐसे थे जो कहते हैं कि हमें मसीहिय्यत को छोड़े बीस बरस गुज़र चुके हैं। ये सब लोग आपकी बुत की और देवताओं की मूरतों की ना सिर्फ परस्तिश ही किया करते थे, बल्कि मसीह पर लानत भी किया करते थे। मगर वो मसरूर होते थे कि हमारा क़सूर या ग़लती यह है कि उनकी यह आदत है कि एक मुक़र्ररा दिन पर रोशनी निकलने से पहले वे जमा होते और बारी-बारी मसीह का ऐसा गीत गाते कि वो ख़ुदा का दिया एक ख़ुदा है। और क़सम खाकर आपस में इक़रार करते कि हम कोई हल्लाफ़ काम नहीं करेंगे, मगर चोरी, क़ज़्ज़ाक़ी (लूटमार) या हरामकारी से परहेज़ करेंगे, और जब कोई अमानत वापस लेने आए तो देने से इन्कार नहीं करेंगे। जब ये कर चुकते तो अपने दस्तूर के मुताबिक़ वे रवाना हो जाते। और फिर आम और पाक खाना खाने के लिए फ़राहम हो जाते थे और (उन्होंने कहा) कि उन्होंने मेरे फ़र्मान के जारी होने के बाद ऐसा करना तर्क कर दिया है, जिसमें आपके हुक्मों के मुताबिक़ जारी करके मज्लिसों की मुमानियत कर दी थी। इस बात पर मैंने दो ज़नाना मुलाज़िमों से (जो ख़ादिमा कहलाती थीं) अज़ीयत के साथ दर्याफ़्त करना ज़रूरी समझा कि ये मुआमला कहाँ तक सच है, मगर मुझे यही मालूम हुआ कि ये उल्टी-पुल्टी बातें और फ़ज़ूल वस्वसा के सिवा और कुछ नहीं है। पस मैंने मुक़दमा को मुल्तवी कर दिया। और आप से ये मश्वरा करने में शताबी की मैं समझा कि इस मुआमले में मश्वरा लेना ही ज़रूरी है, खासकर उनकी तादाद की वजह से जो खतरे में हैं। क्योंकि हर उम्र और हर मर्तबा और मज़ीद बरां मर्दो-ज़न हर दो में से बहुत से अभी बुलाए गए हैं और बुलाए जाएंगे कि मुक़दमे की जवाबदेही करें। क्योंकि ये वस्वसा न सिर्फ़ शहर में बल्कि दिहात और इलाक़े में भी फैल गया है। तिस पर भी इसको रोक देना और दुरुस्त कर देना मुमकिन मालूम होता है। बहरनहज ये यक़ीनी अम्र है कि करीबन सब के सब उजड़े हुए मंदिर बहाल हुए और मज़हब की रीत व रसूम जो मुद्दत से ग़ैर-मुस्तअमल थीं, अब बहाल होने लगी हैं और कि बाज़ार में क़ुर्बानी के जानवरों के लिए चारा तो है। मगर ख़रीदने वाले अभी तक बहुत कम हैं। इससे ये बात ब-आसानी समझी जा सकती है कि आदमियों की किस क़द्र भारी जमाअत की इस्लाह हो सकती है अगर उन्हें तौबा का मौका दिया जाए।”

      पालीनी की इस शाहादत (गवाही) से ये उमूर सादिर होते हैं:

      (अ) मसीही लोग मसीह की बतौर ख़ुदा परस्तिश किया करते थे और दूसरे देवताओं की इबादत करने से इन्कार करते थे। इस तरह वो ये ज़ाहिर करते थे कि सिर्फ़ वही परस्तिश के लायक़ है।

      (ब) अगरचे नाफ़र्मानी की सज़ा बार-बार मौत की धमकी से दी जाती थी, तो भी रोमी शहरियों और दीगर लोगों की बड़ी तादाद मसीह का इन्कार और देवताओं की इबादत करने से मुन्किर थी। पालीनी उन से तीन बार मुतवातिर सवाल करने से उनको ख़ासा वक़्त दे देता था कि वो अपनी जान बचा लें। और जब वो उनकी झुकने वाली शरारत पर ग़ालिब ना आ सकता, तो उन के मार डाले जाने का हुक्म दे देता था।

      (ज) उनकी रीत व रसूम की बाबत हम ये सुनते हैं कि वो एक मुक़र्ररा दिन पर आम इबादत किया करते थे। सुबह की इबादत में वो मसीह को ख़ुदा जान कर हम-नवाज़ी के साथ उसके गीत गाते थे और कलाम और काम में हर क़िस्म की नापाकी और बद-दियानती से बचने के लिए आपस में अहद किया करते थे। दिन में मिलकर खाना खाने के लिए फिर इखट्टे हुआ करते थे।

      (द) यहां से ये मालूम होता है कि मसीही पिंतुस और बथोनिया में सुरअत के साथ फैल गए थे। इस मज़्हब के बानी की वफ़ात को बमुश्किल पछहत्तर (75) बरस गुज़रे थे कि मसीही मज़्हब ने इन सूबों पर ऐसा क़ब्ज़ा कर लिया था कि मंदिर उजड़ गए थे और क़ुर्बानियां तक़रीबन मौक़ूफ़ (ख़त्म) हो गई थीं। ये मज़्हब किसी एक जमाअत या मुक़ाम ही में महदूद ना था, बल्कि शहरों और दिहात में घुस गया था, हत्ता कि ख़ूब फैले हुए और आबाद इलाक़े में फैल गया था। ऐसा कि रोमी शहरियों और रोमी रिआया, मर्द व ज़न और हर मर्तबे के लोग इस मज़्हब के पैरौओं (मानने वालों) में शामिल थे, जिनमें से बा’ज़ बीस-बीस बरस के मसीही थे। (देखो शमुएल ई॰ स्टोक्स साहब की किताब “दी गॉस्पल अकोर्डिंग टू दी ज्युज़ एंड पेगीन्ज़) वग़ैरह।

      इन रोमी मोअर्रिखों और अहकाम के मज़्कूर-बाला बयानात से अनाजील-अरबा और आमाल-उर-रसुल के बड़े-बड़े बयानात की कमा-यनग़बी तस्दीक़ होती है। और यह ज़ाहिर होता है कि इंजील अस्ल और ऐन पहली सदी मसीही में ही मौजूदा थी। इसके बयानात कहीं से लिए हुए नहीं हैं। मसीह के बारे में अक़ीदा भी वही होता है जो आज अह्दे-जदीद में मौजूद है। और बावजूद हुक्काम और अवाम की तरफ़ से सख़्त मुख़ालिफ़त के, वो अपने अक़ीदे से मुन्किर ना हुए। इंजीली बयानात तारीख़ी हैं, अफ़सानवी नहीं। जो कुछ उन्होंने सुना और अपनी आँखों से देखा, बल्कि ग़ौर से देखा और अपने हाथों से छुआ। ऐसा कि किसी क़िस्म के शक-ओ-शुब्हा की गुंजाइश ना रही। उन्होंने इसकी गवाही दी। (1 यूहन्ना 1:1-2)

      उन्हों ने मह्ज़ ख़याल से या किसी तक़्लीद से इंजील नहीं लिखी। किसी दुनियावी ग़र्ज़ से या लोगों को दुनियावी लालच के या मसर्रत-बख़्श अफ़साने बनाकर या हर दिल अज़ीज़ बनाकर इंजील नहीं लिखी। अगर इंजील-नवीस इस ग़र्ज़ से इंजील लिखते कि उस वक़्त के ग़ैर-मसीही लोगों को यक़ीन दिलाएँ कि ये कोई नया मज़्हब नहीं, ये उनका ही क़दीम मज़्हब है, उनका ही ख़ुदा एक दूसरी शक्ल में आता है।” (यनाबीअ-उल-मसीहिय्यत, सफ़्हा 54) तो बिल-ज़रूर उस वक़्त के मसीही कुछ ऐसे ही अल्फ़ाज़ कह कर हुक्काम और रिआया से अपील करते और जान-ओ-माल के ख़तरे से बच जाते, देवताओं की इबादत करने से कभी इन्कार ना करते, और ग़ैर-मसीही भी इस अम्र को बसरो-चश्म तस्लीम कर लेते। और यूं बाहमी निफ़ाक़ और इज़ार-सानी से बाज़ आकर इत्तिहाद और अमन-चैन हासिल कर लेते। ज़माने की ज़रूरत तो रफ़ा ना हुई, बल्कि मसीही मज़्हब की इशाअत से तो बाहमी जुदाई और फ़साद बढ़ गया, और सय्यदना मसीह के क़ौल के मुवाफ़िक़ “तल्वार चल गई”, और आदमी के दुश्मन उसके घर ही के लोग हो गए। उस वक़्त की तारीख़ में ख़्वाजा साहब के ख़याल का ख़याल भी नहीं पाया जाता।

ऐं ख़याल अस्त वो महाल वजनों

      ये तो उन रोमी हुक्काम और मोअर्रिखों की तारीख़ी शहादत में से मुश्ते-नमूना अज़ ख़रवारे (ढेर में से चंद मिसाल) हदिया नाज़रीन कर दिया गया है। लेकिन अब मसीही मज़्हब के सबसे क़दीम ग़ैर-मसीही मुख़ालिफ़ों की मुख़ालिफ़त और मसीहिय्यत पर सख़्त तरीन हमला कुनुन्दगान में से सिर्फ़ एक का ज़िक्र किया जाएगा। और जिन उमूर पर उस ने हमला किया है, वो मुख़्तसर तौर पर और बा’ज़ औक़ात उसी के लफ़्ज़ों में यहां दर्ज करते हैं। सो वाज़ेह रहे कि सल्स नामी एक अफ़कूरी फ़िर्क़ा का यूनानी फ़ैलसूफ़ और आलिम, फ़ाज़िल मसीहिय्यत का निहायत ख़ौफ़नाक मुख़ालिफ़ दूसरी सदी में गुज़रा है। उसकी इस मुख़ालिफ़ाना किताब का नाम “सच्चा मुनाज़रा” है।

      ये किताब उस वक़्त मादूम (गुम) थी और अब भी दस्तियाब नहीं हुई। मगर तीसरी सदी मसीही के एक निहायत आलिम, फ़ाज़िल बुज़ुर्ग ओरेजन नामी के इस जवाब से पता लगता है जो उसने सल्स की इस किताब का लिखा है। लेकिन चूँकि ओरेजन बुज़ुर्ग अपने मुख़ालिफ़ के अल्फ़ाज़ इक़्तिबास करता है और हर बात का बतद्रीज जवाब देता है, तो उसके जवाब से सल्स की अस्ल किताब तक़रीबन पूरी की पूरी निकाली जा सकती है।

      यहां सल्स की किताब ओरेजन के जवाब से तक़रीबन अस्सी बरस पेश्तर, या क़रीब 170 ई॰ में लिखी गई थी। चुनान्चे सल्स मसीह के बारे में कहता है कि “वो जो हाल ही में लोगों के दर्मियान ज़ाहिर हुआ” (8:12)। वो मसीह के बारे में कहता है कि “थोड़ा ही अर्सा गुज़रा है कि उस ने अपनी इस तालीम की तल्क़ीन शुरू की, और मसीही उस को ख़ुदा का बेटा तसव्वुर करते थे” (1:26)। सल्स बताता है कि “जिन तालीमात पर मैं हमला करता हूँ, वो मसीहियों की किताबों में पाई जाती हैं” (2:74)। वो तजस्सुम की तालीम पर एतराज़ करता है (4:2 से 30)। वो यूसुफ़ को नज्जार कहता है (5:52)। वो मजूसियों का भी ज़िक्र करता है जो मसीह की बतौर ख़ुदा परस्तिश करने आए थे (1:58)। वो मसीह के मिस्र को भाग जाने का भी ज़िक्र करता है (1:66; 5:52)। हेरोदेस के ज़रीये बच्चों के क़त्ल-ए-आम किए जाने की तरफ़ इशारा करता है (1:58)।

      मसीह के बपतिस्मा के वक़्त जो उस पर कबूतर की शक्ल में रूह-उल-क़ुद्स नाज़िल हुआ था, उस पर हमला करता है (1:41) और बताता है कि उस वक़्त आस्मान से एक आवाज़ आई थी, जो या कहती थी कि मसीह ख़ुदा का बेटा है (1:72)। और मसीहियों के इस अक़ीदे पर एतराज़ करता है कि वो मसीह को ख़ुदा का बेटा मानते हैं (2 का पहला निस्फ़, 6:72, 74, 8:14 वग़ैरह)। मसीह की तालीमात का बयान करके वो कहता है कि “नासरत के आदमी ने इन (यानी मूसा की शरीअतों) के ऐन ख़िलाफ़ अपने क़वानीन की तशहीर की, ये कहते हुए कि कोई शख़्स बाप के पास नहीं आ सकता। जो क़ुद्रत या दौलत या इज़्ज़त को प्यार करता है, कि इन्सान को लाज़िम नहीं कि वो कव्वों से बढ़कर अपनी ख़ुराक की फ़िक्र करें। कि उन को अपनी पोशाक की बाबत सोसनों से भी कम परवाह करनी चाहिए। कि जिसने उन को एक मुक्का मारा है वो उस को दूसरा भी मार लेने दें” (7:18)। वो इस आयत का इक़्तिबास करता है कि “जो तेरी एक की गाल पर तमांचा मारे, दूसरा भी उस की तरफ़ फेर दे” (7:58)। मसीह के पैरौओं की बाबत कहता है कि वो महसूल लेने वाले और मल्लाह थे (1:62), और कहता है कि “उन्होंने उस को छोड़ दिया और गिरफ़्तार करवा दिया, जो उसके हम-मज्लिस थे और तमाम चीज़ों में शरीक थे, और उस को अपना उस्ताद समझते थे और बचाने वाला और ख़ुदा-ए-अकबर का बेटा तसव्वुर करते थे” (2:9)।

      मसीह की जान-कनी की तरफ़ हिक़ारत इशारा करता है, और उसकी इस बात का इक़्तिबास करता है कि “ऐ बाप, अगर मुम्किन है तो ये पियाला मुझसे गुज़र जाये” (2:24)। मसीह को “येसू मस्लूब” कहता है (2:36)। जिन लोगों ने उसे मस्लूब किया, वो कहता है कि “ये वो लोग थे जिन्होंने तुम्हारे ख़ुदा को सलीब दी” (8:41)। मसीहियों के इस अक़ीदे पर एतराज़ करता है कि “मसीह ने बनी-नूअ इन्सान के फ़ायदे के लिए ये मुसीबतें सहीं” (2:38)। मसीह के मुर्दों में से जी उठने की हक़ीक़त की तर्दीद करने की कोशिश करता है (2:59, 70)। उन फ़रिश्तों की तरफ़ इशारा करता है, जिन्होंने क़ब्र पर से पत्थर ढलकाया था (5:52), और जिसके जी उठने की बाबत जो मसीहियों का अक़ीदा है, उसकी बेवक़ूफ़ी ज़ाहिर करने की सई (कोशिश) करता है (4:14)। मसीहियों के इस कहने पर तम्सख़र (हँसी) उड़ाता है कि “दुनिया मेरे लिए मस्लूब हुई और मैं दुनिया के लिए” (5:64)।

      मसीहियों का मसीहिय्यत से इन्कार करने की निस्बत निहायत सब्र और जोश के साथ मौत का मुक़ाबला करने का इशारा करके (8:48) सल्स कहता है कि “अलावा इसके, तुममें क्या ये एक बहूदा और बे-रब्त बात नहीं है कि एक तरफ़ तो तुम जिस्म को इस क़दर बड़ा समझते हो, ये तवक़्क़ो करते हो कि यही जिस्म फिर जी उठेगा, गोया कि तुम्हारा निहायत ही उम्दा और बेश-क़ीमत हिस्सा है। और फिर दूसरी तरफ़ उस को ऐसी अज़ीयतों के हवाले करते हो, गोया वो किसी काम का नहीं है” (8:49)।

      मसीहियों के सताए जाने की तरफ़ इशारा करके सल्स कहता है, “जनाब-ए-मन, आप ये नहीं देखते कि ना सिर्फ़ तुम्हारे ख़ुदा को (मुराद मसीह है) बुरा कहा जाता है, बल्कि हर बहरूबर से जिलावतन किया जाता है। और तुम ख़ुद, जो कि गोया एक बुत हो, जो उसके लिए मख़्सूस किए गए हो, बांध दिए जाते हो और सज़ा-याबी के लिए ले जाए जाते हो, और लकड़ी से बांधे जाते हो, जबकि तुम्हारा ख़ुदा, या जैसा कि तुम उसे कहते हो, ख़ुदा का बेटा, बदकार से उसका बदला नहीं लेता?” (8:35)।

      (देखो स्टोक्स साहब की किताब महूला बाला, सफ़्हा 46 से 49)

      सल्स के इन इक़्तिबासात से जो पहली बात ज़हन के सामने आती है, वो यही कि जो तारीख़ी और तालीमी उमूर और अक़ाइद मसीहियों की उस वक़्त की मसीही मुक़द्दस किताबों, यानी इंजील, में मौजूद थे, यानी 170 ई॰ में और उस से पहले, वही आज इस इंजील में पाए जाते हैं जो हमारे हाथों में है। सल्स मसीहिय्यत के आग़ाज़ से बहुत ही नज़्दीक का और उसी मुल्क का, जिसमें मसीहिय्यत ने जन्म लिया, निहायत ही आलिम, फ़ाज़िल और वाक़िफ़-कार मुख़ालिफ़ मसीहिय्यत का था, और ख़ुद भी बुत-परस्तों में से था। उस को तो ये भी ना सूझी कि मसीहिय्यत का सरचश्मा पेगनइज़्म है, और कि “ज़रूरत-ए-वक़्त और ईसाई मज़्हब को हर-दिल-अज़ीज़ बनाने के ख़याल ने क़दीमी राहिबों को इस बात पर मजबूर कर दिया कि वो क़दीमी मज़ाहिब-ए-कुफ़्र व इलहाद की रिवायत को जनाब मसीह और उनकी वालिदा पर ज्यों की त्यों चस्पाँ करके लोगों को यह कह दें”... वग़ैरह।

      मगर हमारे मेहरबान और “मह्ज़ मुहब्बत और इख़्लास की बिना पर हमसे इख़्तिलाफ़ रखने वाले” ख़्वाजा कमाल-उद्दीन को, जो मसीहिय्यत से क़रीब दो हज़ार बरस का और सैंकड़ों मीलों का और हर क़िस्म का बाद रखते हैं, बहुत दूर की सूझी। भला ख़्वाजा साहब करते तो इस से ज़्यादा क्या कर सकते थे कि यूरोप के मुहक़्क़िक़ीन की तहक़ीक़ात का, जैसे कि उन्होंने ग़लत नतीजा निकाला, मुतनब्बाह (आगाह किया) करते हुए ये ग़लत नतीजा निकालते कि “बहुत-सी ऐसी क़दीमी रिवायतें, जिनका ताल्लुक़ पुराने कुफ़्र व इलहाद से था... वो हमारे प्यारे मसीह के नाम से मन्सूब कर दी गई हैं।” और तुर्रा ये कि अपने इस दावे के लिए कोई तारीख़ी सबूत नहीं देते। और भला बेचारे बता भी क्या सकते थे, जब ख़ुद उन्हीं को मालूम नहीं जिनकी अंधी तक़्लीद आप ख़ुद कर रहे हैं। पस जिसकी बुनियाद ग़लत, तो उसी का मुतनब्बी भी ग़लत।

      देखिए साहब, ख़्वाजा साहब का इल्म-ए-बलीग़ कहाँ तक बढ़ा हुआ है, जबकि वो फ़र्माते हैं कि:

“इंजील तौरेत के सिवा किसी और किताब में मसीह का पता नहीं चलता। हाँ, मूदी मुअर्रिख़ यूसुफ़ीस की तारीख़ में एक-आध वर्क़ मसीह के हालात की तरफ़ इशारा करता है, लेकिन वो वर्क़ आज ख़ुद अरकान-ए-कलीसिया के नज़्दीक भी जाली साबित हो चुका है।” (यनाबीअ-उल-मसीहिय्यत, सफ़्हा 23)

      इस किताब का हवाला भी मैं क़ब्ल-अज़ीं दे चुका हूँ, जिसमें मसीह का ज़िक्र आया है। और अगरचे ख़्वाजा साहब ने अल्फ़ाज़ तहत-उल-ख़त में मह्ज़ अरकान-ए-कलीसिया के बिला-सबूत इस कहने की तक़्लीद करके यूसुफ़ीस मुअर्रिख़ के बयान को ग़ैर-मोअतबर ठहराने की कोशिश बेफ़ाइदा की, लेकिन अगर हम बफ़र्ज़-ए-मुहाल आपकी इस तक़रीर को मान भी लें, तो क्या रोमी मोअतबर और मुअज़्ज़िज़ अहकाम की उन किताबों में, जिनका मैंने ऊपर ज़िक्र किया है, मसीह का ज़िक्र नहीं है? क्या सल्स की सख़्त मुख़ालिफ़ाना किताब में मसीह का और मसीहियों और उनके अक़ाइद का मुफस्सिल ज़िक्र नहीं है?

      जनाब-ए-मन! वो तो आपसे भी ज़्यादा झुर्फ़ (गहराई), निगाह और नुक्ता-चीं और वाक़िफ़-कार आलिम था। उस ने तक़रीबन मसीह और उसकी तालीमात और मसीहियों और उनके मो’तक़िदात का वही पूरा-पूरा और मुकम्मल नक़्शा खींचा है, जो आज हमारे पास इंजीलों में मौजूद है, जो मैंने ऊपर पेश कर दिया।

      इस के अलावा इसी ज़माने के चंद एक और भी यहूदी और ग़ैर-मसीही मुसन्निफ़ों की किताबें हैं, जिनसे मसीह का वही नक़्शा खींच सकते हैं जो इंजील में है। मसलन स्वामोसाटा का बाशिंदा लोशीन, जो 100 ई॰ में पैदा हुआ था, उसकी किताब “प्रेग्रेन्स की वफ़ात”, एल्यूस लम्बरेड्युस, जिसने 310 ई॰ में अपनी तारीख़ लिखी, शहनशाह बेडीन का वो ख़त जो उसने सिरोयानिस को लिखा था (115 ई॰ से 138॰), दूसरी सदी के नए अफ़लातूनी फ़ल्सफ़े के फ़ैलसूफ़ पारफ़्री ने मसीही मज़्हब के ख़िलाफ़ पंद्रह हिस्सों में लिखी... वग़ैरह। बखौफ़ तवालत उन सब का ज़िक्र छोड़ा जाता है।

      अब मैं थोड़ा सा ज़िक्र रसूली बुज़ुर्गों की तस्नीफ़ात का करूंगा, जो पहली सदी मसीही के निस्फ़ (बीच) में मौजूद थे और जिन की तस्नीफ़ात तक़रीबन 50 ई॰ से लेकर ज़्यादा से ज़्यादा 150 ई॰ तक के दर्मियानी अर्से में लिखी गईं। यानी रोमी क्लेमन्स का ख़त कुरंथ की कलीसिया को (98 ई॰ या 99 ई॰), अग़नातियुस के ख़ुतूत (107 ई॰), पोलोकॉर्प की तस्नीफ़ात (108 ई॰), पोलोकॉर्प का शहादत-नामा (155 ई॰ या 156 ई॰ के बाद), ही तालीम-उर-रसुल (70 ई॰ से पहले), बर्नबास का ख़त (70 ई॰ के आख़िर या 71 ई॰ के आग़ाज़ में), शबान बरमिस (92 ई॰), व्याग़ीतस का ख़त (150 ई॰ से पहले), पापियास की तस्नीफ़ (पहली सदी के निस्फ़ में)। ये सब वो क़दीम मसीही ईमानदार आलिम और बुज़ुर्ग हैं जिनको रसूली बुज़ुर्ग के नाम से मौसूम किया जाता है।

      यानी वो बुज़ुर्ग जो रसूलों के हम-अस्र थे, जिन्होंने उनको देखा और उनसे बातें कीं और उनकी बातें सुनीं, या उनके ताबईन, के तब-ए-ताबईन थे। और यह सब के सब 150 ई॰ से पहले-पहले गुज़र चुके हैं। उन्होंने किताबें लिखीं जो आज हमारे हाथों में हैं और जिन को “रसूली बुज़ुर्गों की तस्नीफ़ात” कहते हैं।

      इन तस्नीफ़ात में नए और पुराने अहदनामों से बहुत से इक़्तिबासात और उनकी तरफ़ इशारे, मसीही पूरी-पूरी तालीमात का ज़िक्र और तश्रीह बईना वैसी पाई जाती हैं जैसी मौजूदा अनाजील में हैं। मसीह की उलूहियत, कफ़्फ़ारा, मसीह की पैदाइश, मरना, जी उठना, आस्मान पर चढ़ जाना, क़ियामत वग़ैरह-वग़ैरह, क़रीब-क़रीब सारी तालीमात का मुख़्तसर बयान मिलता है। मसलन रोमी क्लिमंस का ख़त कुरिन्थियों के नाम है, कुरिन्थियों का पहला ख़त वाज़ेह और एलानिया तौर पर पौलूस रसूल से मन्सूब हुआ है।

      और हमारे ख़ुदावंद के अल्फ़ाज़ जो मत्ती, मर्क़ुस, लूक़ा की अनाजील में हैं, साफ़ तौर पर इस ख़त में मिलते हैं, मगर इंजील-नवीसों का नाम नहीं दिया गया। यह रसूली बुज़ुर्गों की आदत है। नीज़ रसूलों के आमाल, रोमियों के ख़त, कुरिन्थियों के हर दो ख़त, ग़लतियों, इफ़िसियों और कुलुस्सियों के ख़त, थिस्सलुनीकियों का पहला ख़त, तीमुथियुस के हर दो ख़त, तितुस के और इब्रानियों के ख़त, याक़ूब के ख़त और 1, 2 पतरस से कम व बेश इक़्तिबास व इशारत पाए जाते हैं।

      मगर बिला-मुसन्निफ़ के नाम व इक़्तिबासी निशान के, ये शहादत जो नए अहदनामे की किताबों की क़दामत और सेहत और सनद के बारे में इस ख़त के अंदर दी गई है, वो न सिर्फ़ क्लिमेन्स की तसव्वुर की जाती है, बल्कि ख़ुद रोमा की कलीसिया की, लिहाज़ा क़तई और क़ाबिल-ए-एतबार है (देखो रसूली बुज़ुर्ग, सफ़्हा 13)। फिर यह भी साबित है कि वो रोमा की कलीसिया का उस्क़ुफ़ (बिशप) था, और कि उस ने पौलूस और पतरस और ग़ालिबन यूहन्ना और दीगर रसूलों को भी देखा और उनसे गुफ़्तगु की और तालीम पाई (ईज़न, सफ़्हा 8)। इन उमूर के साथ मसीह की विलादत (पैदाइश) और काम और सलीबी मौत और मुर्दों में से ज़िंदा होना वग़ैरह उमूर को “तारीख़ी हैसियत” से बयान किया गया है, ना कि “पुरानी कहानी” के तौर पर, जैसा ख़्वाजा साहब का ज़ोअम (ख़याल) है (देखो यनाबीअ-उल-मसीहिय्यत, सफ़्हा 90)।

      मगर ख़्वाजा साहब का ऐसा कह देना कोई वक़अत अपने अंदर नहीं रखता। जब इस क़द्र रोमी और यहूदी और मसीही हुक्काम और मोअर्रिखों और मुख़ालिफ़ों और मुआविनों की क़दीम-तरीन शहादतें मसीह और उसके कामों और तालीम की बाबत मौजूद हैं, तो किसी का तारीख़ से इन्कार करना ऐसा ही नाक़ाबिल-ए-एतबार और लचर (कमज़ोर) है, जैसा कोई दिन को रात कहे।

      याद रहे कि क़ियास बुरहानी यक़ीनियात से मुरक्कब होता है। और यक़ीनियात के उसूल औलियात और मुशाहदात और तजुर्बियात और हदसियात और मुतवातिर और फ़ितरियात हैं। और मुतवातिरात वो वाक़ि’आत हैं जिनके यक़ीन करने के लिए इतने लोगों की रिवायत दरकार होती है जिनका झूट पर इत्तिफ़ाक़ कर लेना अक़्लन मुहाल हो। मगर ये शर्त नहीं कि उनकी तादाद ख़ास हो, बल्कि शर्त ये है कि रावी थोड़े हों या ज़्यादा हों, वो इतने हों कि उनके झूट पर मुत्तफ़िक़ होने को अक़्ल मुहाल जाने। यानी उनकी ख़बर से यक़ीन हासिल हो जाए।

      यक़ीनियात का ये उसूल तारीख़ को ख़ास है। तारीख़ का यक़ीन मोअर्रिखों की सदाक़त पर मुन्हसिर है। यानी उनका किसी तारीख़ी अम्र को बयान करने में झूट पर इत्तिफ़ाक़ कर लेना अक़्लन मुहाल है। पस इस दलील के मुताबिक़ मज़्कूर-बाला, अहकाम की जो रोमी थे, दुश्मनों की जो मसीही ना थे, मुआविनों की जो मसीही थे, और तुर्रा इस पर ये कि वो सब मुतवातिर हैं।

      बा’ज़ उन में से ख़ुद चश्मदीद शाहिद हैं, बा’ज़ चश्मदीद शाहिदों (आँखों देखे गवाहों) के नाज़िर और सामे’अ (सुनने वाले) हैं, या उनसे उन्होंने कलाम किया। बा’ज़ों ने मसीहियों की मुक़द्दस किताब इंजील से बराह-ए-रास्त इक़्तिबास किया और उन पर मुख़ालिफ़ाना नज़र डाली, वग़ैरह। इन सब की शहादत (गवाही) मसीह के और उसके मज़्हब के तारीख़ी होने पर ऐसी यक़ीनी है कि उनका झूट पर इत्तिफ़ाक़ कर लेना अक़्लन मुहाल है। अगर बफ़र्ज़-ए-मुहाल दोस्तों की शहादत पर शक किया जाये, तो उनका उस मज़्हब के सबब दुख उठाना या मारे जाना, उस में शक को बिल्कुल रफ़ा कर देता है। (किसी मज़्हब का मिन-जानिब-अल्लाह होना या ना होना, या झूटा-सच्चा होना, तारीख़ी उमूर के यक़ीनात से होने पर कुछ असर नहीं रखता। ये अम्र ही ग़ैर मुताल्लिक़ा है।)

      और जब मुआविनों के तारीख़ी बयानात की तस्दीक़ उनके मज़्हबी मुख़ालिफ़ों से हो जाती है, तो उनकी शहादत, उनकी शहादत के लिए सोने पर सुहागे का काम कर जाती है। और ख़्वाजा साहब के क़िले के लिए डायना-मइट का काम देती है। एक-एक इंजील की सेहत और मो’तबरी बयान करना हमारे मबहस से बिल्कुल अलग है और ना ही यहां उसकी गुंजाइश है। और उनका वो मक़ूला, यनाबीअ-उल-मसीहिय्यत के सफ़्हा 54 पर, “ईसाई मज़्हब को हर-दिल-अज़ीज़ बनाने का ख़याल गधे की सिर पर से सींगों का उड़ जाने का मिस्दाक़ हो जाता है।”

      फिर आपका ये कहना भी तारीख़ी हैसियत से कैसा ग़लत साबित होता है कि:

“ये सब कुछ, “यानी बाबिल की बा’अल-परस्ती”, थिएटर के रंग में होता था। बुख़्तनसर के अय्याम-ए-हुकूमत में भी ये थिएटर हुआ करते थे, जो यहूदियों को क़ैद करके बाबिल में ले गया था, जहां इस्राईली असीर (क़ैदी) कई नस्ल तक ग़ुलामाना हैसियत में रहे, उन थिएटरों को देखते रहे, और वापसी पर इन क़िस्सों को साथ लाए। इस वाक़िये के अलावा तौरेत और इस्राईली शिआर में जो बीसियों और बातें भी आफ़्ताब-परस्ती की शामिल हो गई हैं, मग़रिबी तहक़ीक़ ने उन सब को इसी वाक़िया, बुख़्तनसर और क़ैद-ए-इस्राईल, की तरफ़ मन्सूब किया है। “किताब पैदाइश के वाक़ि’आत वग़ैरह सब के सब बाबिल से निकल आए।” (ईज़न, सफ़्हा 72)

      मुझे ख़्वाजा कमाल-उद्दीन पर इस क़द्र अफ़्सूं (अफ़सोस) नहीं आता, जिस क़द्र उन यूरोपियन मुहक़्क़िक़ीन पर आता है जिनकी अंधी तक़्लीद ख़्वाजा साहब और उनके हमनवा करते हैं। यूरोपियन मुहक़्क़िक़ीन की तहक़ीक़ात का एक उसूल ये है कि जिन दो उमूर में, जिनमें से एक मुक़द्दम और दूसरा मोअख्खर हो, या दोनों हम-अस्र (एक ही जमाने के) हों, और उनमें बाहमी मुशाबहत और मुवाफ़िक़त ज़्यादा पाई जाये और मुनाफ़क़त कम पाई जाये, तो फ़ौरन नतीजा निकाल लेते हैं कि मोअख्खर, मुक़द्दम से अख़ज़ हुआ है।

      या अगर कोई मसअला जो किसी किताब में है, और वो उनकी अक़्ल और तहक़ीक़ात में दुरुस्त ना आए, या उसकी मुख़ालिफ़त मंज़ूर न हो, तो झट कह देते हैं कि फ़लाँ किताब तारीख़ी पाया से गिरी हुई है, या ये कि वो मुक़ाम जिसमें वो मसअला दर्ज है, मुहर्रफ़ है, मगर उसके लिए कोई तारीख़ी सबूत नहीं मिलता। यही हाल ख़्वाजा साहब का भी है।

      चुनान्चे आप यनाबीअ-उल-मसीहिय्यत सफ़्हा 94, 95 में मसीह के बा’ज़ अक़्वाल को सूरज की कैफ़ियत पर तत्बीक़ देकर यूहन्ना की इंजील के बारे में ये राय क़ायम करते हैं कि:

“ख़ुसूसन इंजील यूहन्ना में, जिसकी तस्नीफ़ के मुताल्लिक़ ये अम्र मुतहक़्क़िक़ है कि वो मसीह से कई सदियों बाद हुई और सिकंदरिया के मज़्हब-ए-फ़ल्सफ़ा के तास्सुरात से ख़ाली नहीं।”

      और कि:

“क़दीमी राहिबों ने, जिनमें से एक इंजील-ए-यूहन्ना का मुसन्निफ़ भी था, मसीह को शम्स-परस्तों के सामने क़दीमी सूरज देवताओं का एक मुक़ाम पेश किया।”

      इन दोनों में कैसा तज़ाद (टकराव) पाया जाता है! एक में तो यूहन्ना की इंजील का मुसन्निफ़ मसीह से कई सदियों बाद मौजूद बताया जाता है, ख़्वाजा साहब के ख़याल के मुताबिक़ “चौथी सदी में, जब मसीहिय्यत और शम्स-परस्ती का तसादुम (आमना-सामना) हुआ।” (सफ़्हा 84)

      दूसरे मुक़ाम में इस को “क़दीमी राहिबों” में शुमार किया है। अब भला बताओ, दोनों बातों में से किस बात को सच माना जाए? साफ़ ज़ाहिर है कि जिस ख़याल की बुनियाद ग़लत हो, तो वो ख़याल ख़ुद खलत-मलत होता है। इसी लिए कलाम में तज़ाद पैदा हो जाता है, क्योंकि अपनी राय की तस्दीक़ के लिए, ख़्वाह वो सच्ची हो, ख़्वाह झूटी, हस्बे-मौक़ा व महल बुनियाद बनानी ही पड़ती है, जैसे यहां किया गया है। और यही सूरत उस इस्तिदलाल की भी है जो 72 ई॰ सफ़्हा पर किया गया है (और जिसका इक़्तिबास ऊपर किया गया है) कि “बाबिल के यहूदी असीर (क़ैदी) बा’अल-परस्ती के अक़ीदे को और उसके मुताल्लिक़ क़िस्सों को वापसी पर साथ लाए।”

      मगर इसका क्या सबूत है कि वो इन क़िस्सों को अपने साथ लाए, और कि उन्होंने इंजीली वाक़ि’आत और तालीमात पर वो बा’अल-परस्ती का रंग चढ़ा दिया? हालाँकि ये अम्र बिल-तहक़ीक़ पाया-सबूत को पहुँच चुका है कि बाबिल की असीरी (गुलामी) से क़ब्ल तो वो बुत-परस्ती या सूरज-परस्ती की तरफ़ अक्सर मर्तबा राग़िब और मुनहमिक हो जाया करते, और ख़ुदा के अम्बिया बार-बार ख़ुदा की तरफ़ से उनको समझाते और शरीअत के अहकाम याद दिलाते, और कि ख़ुदा को तुम्हारी इस बुत-परस्ती से सख़्त नफ़रत और तुम से इसी वजह से सख़्त नाराज़गी है। और जब वो उनका कहना ना मानते तो ख़ुदा से सज़ा पाते थे। इसी गुनाह के सबब से ख़ुदा ने उन को आख़िरकार बुख़्तनसर के ज़रीये से असीर (क़ैदी) करवाकर बाबिल में भेज दिया था, जहां वो सत्तर बरस तक असीर (क़ैदी) रहे। मगर जब वो पछताए तो ख़ुदा ने उन को वहां से रिहाई दिलाकर फिर यरूशलेम में पहुँचाया, और यरूशलेम और वहां की हैकल बहाल हुई।

      और बुत-परस्ती का रंग तो क्या, इसका शाइबा भी उस वक़्त से आज तक उनके तरीक़-ए-इबादत में नहीं पाया जाता। हत्ता कि असीरी (गुलामी) के बाद किसी ज़माने में भी बुत-परस्ती का सुराग़ उनमें नहीं मिलता। बुत-परस्ती उनमें से उस वक़्त से बिल्कुल मादूम (गायब) हो गई, और यह असीरी के बाद के इस्राईलियों के ख़वास में से एक ख़ास्सा है।

      जनाब-ए-मन, उन की असीरी (गुलामी) में उनकी ख़ुदा-परस्ती का और बा’अल-परस्ती से नफ़रत का वो आलम था, जो मलाक़ के ज़बूरों में से एक, यानी 137-वीं ज़बूर में मुन्दरज है:

“बाबिल की नहरों पर, वहां हम बैठे और सीहोन को याद करके रोये। हमने अपनी बरबतें बेद के दरख़्तों में, जो उसके बीच में थे, टाँग दीं।” क्योंकि वहां उन्होंने, जो हमें असीर (क़ैदी) करके ले गए थे, हमसे दरख़्वास्त की कि हम कुछ गाएँ, और वे जो हमारे सताने वाले थे, चाहते थे कि हम ख़ुशी मनाएँ, ये कहकर, “सीहोन के गीतों में से हमारे लिए एक गीत गाओ। हम क्योंकर अजनबी की सर-ज़मीन में ख़ुदावंद के गीत गाएँ? ऐ यरूशलेम, मैं तुझको भूल जाऊँ तो मेरा दहिना हाथ अपना हुनर भूले। अगर मैं तुझको याद न रखूँ और अगर मैं यरूशलेम को अपनी अव्वल ख़ुशी से ज़्यादा तरजीह जानूँ तो मेरी ज़बान तालू से लग जाए।”

      बुत-परस्ती के ख़यालात और क़िस्सों को अपनी वापसी पर लाना तो दरकिनार रहा, वो तो बुत-परस्त मुल्क को भी ऐसा पलीद और नजिस (नापाक) समझते थे कि उसमें रहकर ख़ुदावंद के गीत गाना भी नामुनासिब और इलाही नाम को बे-इज़्ज़ती करना समझते थे। वो तो “सीहोन को याद करके रोये थे।” उनका नस्ब-उल-ऐन और मुतम्मा-नज़र यरूशलेम और उसकी हैकल और उनका ख़ुदा था। क़दीम दुनिया को और बनी-इस्राईल की तारीख़ के इब्तिदाई मदारिज में उनके मिलानात को मद्द-ए-नज़र रखते हुए ये अम्र निहायत ही ज़रूरी मालूम होता है कि वो बिल्कुल अलग-थलग रहें, ताकि अह्द-ए-अतीक़ का मज़्हब उन पर देसी अनासिर की आमेज़िश से महफ़ूज़ रहे।

      जो उसकी हस्ती के लिए ब-आसानी मोहलिक (नुक़सान देने वाले) साबित होते। और अगर बाबिल में उनकी सत्तर बरस की असीरी (गुलामी) के बाद उस ख़तरे का मंबा मस्दूद हो गया था, तो इस क़ौम के बड़े हिस्से का उन क़ौमों में, जिनके दस्तुरात और तहज़ीब का असर उन पर बज़रूर पड़ता, मुंतशिर हो जाने के माक़ब्ल की बनिस्बत इस अम्र को बहुत ही लाज़िमी क़रार दे दिया था। इस ग़र्ज़ के लिए अहादीस भी बड़ी मुफ़ीद और मौज़ूं साबित हुई हैं, गोया कि वो शरीअत के गर्दोबान हैं, जिससे उसकी ख़िलाफ़वर्ज़ी और तब्दीली नामुम्किन हो गई थी।

      The Life and Times of Jesus the Messiah vol. 1 p. 3 जिससे ज़ाहिर होता है कि अगरचे यहूद बाबिल की असीरी में सत्तर बरस तक रहे और हर क़िस्म के तास्सुरात के अंदर थे, तो भी ऐसे अलग-थलग रहे थे कि मज़्हबी नुक़्ता-ए-ख़याल किया, तहज़ीब के नुक़्ता-ए-ख़याल से भी ख़ालिस और बेलौस रहे थे। साथ ही उनकी शरीअत भी हर क़िस्म की तब्दीली व तग़य्युर से महफ़ूज़ रही।

      ख़ुदावंद मसीह ने उन को इसलिए तो कई मर्तबा मलामत की थी कि वो अपनी रिवायतों से ख़ुदा की शरीअत के अहकाम को टाल देते थे, और यह भी कहा कि बेहतर तो था कि उस को भी ना टालते और उस को भी माने। मगर कभी इस बात का इल्ज़ाम उन पर नहीं लगाया कि ग़ैर मज़ाहिब या बाबिली क़िस्सा-कहानियों का, जिनको तुम अपने साथ लाए हो, तुम पर बड़ा असर है और तुम उनकी तामीर करते हो।

      अगर उन पर बाबिली रंगत छाई हुई थी, तो ज़रूर था कि पहले यहूदियत पर होता और फिर ईसाइय्यत पर। और जब वो ख़ुद कहते हैं कि पेगनइज़्म की रंगत पांचवीं सदी में मसीहिय्यत पर चढ़ी, तो ज़ाहिर है कि पहली, दूसरी, तीसरी सदियों में मसीहिय्यत बिल्कुल ख़ालिस और ग़ैर-मुलव्वस थी। लेकिन जो मसीहिय्यत आज हमारी मुरव्वजा इंजील में पाई जाती है, वही वो है जो इब्तिदाई सदियों में मौजूद थी। पस ख़्वाजा साहब का ये नतीजा निकालना कि इंजील बयान बाबिली दास्तानों से माख़ूज़ है, बिल्कुल ग़लत है।

      नीज़, आँजनाब ने दस–बारह ममालिक के देवताओं का ज़िक्र किया है, जिनके परस्तारों के अक़ाइद और वाक़ि’आत आपस में मिलते-जुलते हैं। मगर ये बिल-तहक़ीक़ व बिला-इम्तियाज़ नहीं बताया कि उन राहिबों ने किस मुल्क के देवता के वाक़ि’आत और उसके मुताल्लिक़ लोगों के मो’तक़िदात की तत्बीक़ मसीह और उनके वाक़ि’आत के साथ की और उसके अक़ाइद को अपना अक़ाइद-नामा क़रार दिया। या सबों के वाक़ि’आत और अक़ाइद का मजमुआ करके मसीहिय्यत पर चस्पाँ कर दिया। आया किसी राहिब ने ये कहा, या बहुतों ने फ़राहम होकर और इत्तिफ़ाक़ करके ये नया मज़्हब बना दिया, इन तमाम उमूर का मुफ़स्सिल और तारीख़ी बयान ख़्वाजा कमाल-उद्दीन साहब के ज़िम्मे है। क़ियास बे-असास से काम लेना उलमा का काम नहीं है।

      यहूदियों की नफ़रत और अलैहदगी बुत-परस्तों से, जो वो असीरी (गुलामी) के बाद से ख़ुदावंद मसीह के ज़माने तक और माबाअ्द रखते थे, इस तरह ज़ाहिर है कि यहूदियों की ग़ैर-इल्हामी कुतुब के मुताबिक़ उनका ख़याल ये हो गया था कि बुत-परस्तों का बच्चा भी ऐन अपनी पैदाइश ही के वक़्त से नापाक और पलीद होता है। जो लोग पहाड़ों, पहाड़ियों और झाड़ियों वग़ैरह की परस्तिश करते हैं, अल-मुख़्तसर बदतरीन क़िस्म के बुत-परस्तों को तलवार से क़त्ल कर डालना चाहिए। उस वक़्त के रब्बियों ने बड़ी-बड़ी तदबीरें कर छोड़ी थीं ताकि यहूदी क़ौम फिर बुत-परस्ती में न पड़ जाए।

      मसलन, बुत-परस्तों से किसी क़िस्म की शराकत या रब्त-ज़ब्त न रखना चाहिए, कोई ऐसा काम न किया जाए जिससे बुत-परस्तों को उनकी इबादत में मदद मिल सके, न तो उनको किसी क़िस्म की राहत या मदद पहुंचाई जाए, हत्ता कि माँओं को उनकी अशद ज़रूरत के वक़्त या अपने शीर-ख़ार (दूध पीते) बच्चों की परवरिश करने में हरगिज़ मदद न देना चाहिए, ताकि बुत-परस्ती के लिए कहीं बच्चा न पैदा होए।

      सिर्फ़ इसी पर ही बस नहीं, बल्कि ये कि अगरचे बुत-परस्तों को ख़तरे में ढकेलना अच्छा नहीं, तो भी अगर वो ख़तरे में पड़ जाएँ, तो उनको उस से निकालना भी न चाहिए। रब्बियों का हुक्म था कि “बुत-परस्तों में से बेहतरीन को भी क़त्ल कर दो, और साँपों में जो सबसे अच्छा साँप है उसके सर को कुचल डालो।” अल-ग़र्ज़ जो शख़्स ऐसों की इमदाद (मदद) करता या उनसे रब्त-ज़ब्त (मिलना-जुलना) रखता है वो उनमें से एक हो जाने के ख़तरे में है। बुत-परस्तों से यहूदियों की सख़्त नफ़रत और परहेज़ का अंदाज़ा कुछ इस तरह से हो सकता है कि उनको हुक्म था कि अपने मवेशी (पालतू जानवर) भी चरवाहे या परवरिश के लिए उनके सुपुर्द न करो, अपने बच्चों की निगरानी और ख़िदमत भी उन से मत करवाओ। अपनी बीमारी पर भी उनके अतिब्बा (हकीम) को ईलाज मुआलिज़ा (बीमार) के लिए हरगिज़ न बुलाओ। जहां तक मुम्किन हो, हर वक़्त और हर तरह से उनसे किनारा-कशी करो। वो और उनकी चीज़ें नापाक हैं, और उनके घर पलीद, क्योंकि उनमें बुत होते हैं, और वे चीज़ें जो उनके लिए मख़्सूस होती हैं, ईज़न, ईज़न वग़ैरह। और बहुत-सी बातें हैं जिनसे ज़ाहिर होता है कि यहूद में सिर्फ़ बुत-परस्ती ही न थी, बल्कि बुत-परस्ती के ख़यालात भी मादूम (लापता) थे। उनकी (मुशरिकों की) हर तरफ़ हर एक चीज़ से उनको नफ़रत होती थी, हत्ता कि उनका साया भी उनको पलीद कर देता था। (मर्क़ुस 7:3, 4)

      अब मैं ये बताना चाहता हूँ कि मसीहिय्यत पुराने अहदनामे की पेशीनगोइयों के मुताबिक़ मा’रिज़-ए-ज़हूर में आई, और वो उनका तकमिला है। चुनान्चे सय्यदना मसीह ने ख़ुद फ़रमाया है कि “ज़रूर है कि जितनी बातें मूसा की तौरेत और नबियों के सहीफ़ों और ज़बूर में मेरी बाबत लिखी हैं, पूरी हों। फिर उस ने उनका ज़ेहन खोला ताकि किताब-ए-मुक़द्दस को समझें, और उनसे कहा, “यूँ लिखा है कि मसीह दुख उठाएगा और तीसरे दिन मुर्दों में से जी उट्ठेगा।” (लूक़ा 38:44 से 46)

      ना कि कोई इत्तिफ़ाक़ी वाक़िया या क़दीमी कुफ़्र व इलहाद का अफ़साना, फ़िल-हक़ीक़त सब कुछ सच-मुच ज़हूर में आया। और जो तालीमात इंजील में पाई जाती हैं, वो किसी की नक़्ल नहीं, वो सच-मुच की तल्क़ीन की हुई हैं। चुनान्चे…

       1. कि वो कुँवारी से पैदा होगा: “देखो, कुँवारी हामिला होगी और बेटा जनेगी, और उसका नाम इम्मानुएल रखेगी।” (यसायाह 7:14, मुक़ाबला करो मत्ती 1:23)
        2. वो शहर बैत-उल-लहम में पैदा होगा: “ऐ बैत-उल-लहम अफ़राताह, हर चंद कि तू यहूदाह के हज़ारों में शामिल होने के लिए छोटा है, तो भी तुझ में से वो शख़्स निकलकर मुझ पास आएगा जो इस्राईल में हाकिम होगा, और उसका निकलना क़दीम अय्याम, अज़ल से है।” (मीकाह 5:2, मत्ती 2:6)
        3. मजूसियों का आना: “वो सब जो सुबह के हैं आएंगे, वो सोना और लोबान लाएंगे और ख़ुदावंद की तारीफ़ की बशारतें सुनाएँगे।” (यसायाह 60:6, मत्ती 2:11)
        4. मिस्र को भाग जाना: “मैंने अपने बेटे को मिस्र से बुलाया।” (होसेअ 11:1, मत्ती 4:15)
        5. मासूमों का क़त्ल-ए-आम: “रामा में एक आवाज़ सुनी गई है, नोहा और ज़ार-ज़ार रोने की। राखिल अपने लड़कों पर रोती है और अपने लड़कों की बाबत तसल्ली नहीं चाहती, क्योंकि वो नहीं हैं।” (यर्मियाह 31:15, मत्ती 2:17, 18)
        6. कौमें उस से बरकत पाएँगी: “और दुनिया के सब घराने तुझ से बरकत पाएँगे… और सारी कौमें उसके पास इकट्ठी होंगी।” (पैदाइश 12:6, 49:10, आमाल 3:25, लूक़ा 2:30, 31, 32)
        7. गलील में मसीह का काम: “आख़िरी ज़माने में ग़ैर-क़ौमों के जलील में, दरिया की सिम्त, यरदन के पार बुज़ुर्गी देगा। उन लोगों ने, जो तारीकी में चलते थे, बड़ी रोशनी देखी, और उन पर जो मौत के साए के मुल्क में रहते थे, नूर चमका।” (यसायाह 9:1, 2, मत्ती 4:16)
        8. यहूदियों और ग़ैर-क़ौमों से रद्द किया जाना: “क़ुव्वतें किस लिए जोश में हैं और लोग बातिल ख़याल करते हैं। ज़मीन के बादशाह सामना करते हैं और सरदार आपस में ख़ुदावंद के और उसके मसीह के मुख़ालिफ़ मंसूबे बाँधते हैं।” (ज़बूर 2:1, 3, आमाल 4:25, 26, लूक़ा 19:4, नीज़ देखो यसायाह 6:9, 10, 8:14)
        9. गिरफ़्तार होना अपने ही रफ़ीक़ के हाथों: “मेरे हम दम ने भी, जिस पर मुझे भरोसा था और जो मेरे साथ रोटी खाता था, मुझ पर लात उठाई।” (ज़बूर 41:9, यूहन्ना 13:18, ज़क्रियाह 13:6)
       10. तीस रूपये पर फ़रोख़्त होना: “उन्होंने मेरे मोल की बाबत तीस रूपये तौल के दिये। उन तीस रूपयों को लिया और ख़ुदावंद के घर में कुम्हार के लिए फेंक दिया।” (ज़क्रियाह 11:12, 13, 14; मत्ती 26:15; 27:9, 10)
       11. शागिर्दों से तर्क किया जाना: “ऐ तलवार, तू मेरे चरवाहे पर, उस इन्सान पर जो मेरा हमता है, बेदार हो। रब-उल-अफ़्वाज फ़रमाता है। उस चरवाहे को मार कि गल्ला परागंदा हो जाए, पर मैं अपना हाथ छोटों पर चलाऊंगा।” (ज़क्रियाह 13:7, मत्ती 26:31, मर्क़ुस 14:27)
       12. झूटे गवाहों की शहादत: “झूटे गवाह उठे हैं, वो मुझ से वो सवालात करते हैं जिन से मैं आगाह नहीं।” (ज़बूर 35:11, 70:12)
       13. अज़ीयतों के नीचे ख़ामोशी: “वो तो निहायत सताया गया और ग़म-ज़दा हुआ, तो भी उस ने अपना मुँह न खोला। वो जैसे बर्रा जिसे ज़ब्ह करने के लिए ले जाते हैं और जैसे भेड़ अपने बाल कतरने वालों के आगे बेज़बान है, उसी तरह उस ने अपना मुँह न खोला।” (यसायाह 53:7, 9; मत्ती 26:63, 27:12, 14)
       14. मस्लूब होना, और उस वक़्त की हालत: मैं पानी की तरह बहा जाता हूँ और मेरे बंद-बंद अलग हो चले हैं। मेरा दिल मोम की तरह मेरे सीने में पिघल गया… क्योंकि कुत्ते मुझे घेरते हैं, शरीरों की गिरोह मेरा अहाता करती है। वो मेरे हाथ और मेरे पांव छेदते हैं। मैं अपनी सब हड्डियों को गिन सकता हूँ। वो मुझे ताकते हैं और घूरते हैं। वो मेरे कपड़े आपस में बाँटते हैं और मेरे लिबास पर क़ुरआ डालते हैं।” (ज़बूर 22:14–18; लूक़ा 23:33, मत्ती 27:35, लूक़ा 23:27, 35, 24)
       15. पित्त और सिरके का देना: “उन्होंने मुझे खाने के एवज़ (बदले) पित्त दिया और मेरी प्यास बुझाने को सिरका पिलाया।” (ज़बूर 69:21, यूहन्ना 19:29, मर्क़ुस 15:23)
       16. उसकी कोई हड्डी न तोड़ी जाएगी: “वो उसकी सारी हड्डियों का निगहबान है, उन में से एक भी टूटने नहीं पाती।” (ज़बूर 34:20, यूहन्ना 19:36)
       17. उसका छेदा जाना: “वो मुझ पर, जिसे उन्होंने छेदा है, नज़र करेंगे।” (ज़क्रियाह 12:10, यूहन्ना 19:35, 37)
       18. ब-रज़ा व रगबत वफ़ात पाना: “ज़बीहा और हदिये को तूने नहीं चाहा, तूने मेरे कान खोले। सोख़्तनी क़ुर्बानी और खता की क़ुर्बानी का तू तालिब नहीं। तब मैंने कहा, देख, आता हूँ, किताब के दफ़्तर में मेरे हक़ में लिखा है। ऐ मेरे ख़ुदा, मैं तेरी मर्ज़ी बजा लाने पर ख़ुश हूँ।” (ज़बूर 40:6 से 8, मर्क़ुस 14:36, यूहन्ना 4:34)
       19. हमारे गुनाहों के लिए मुआ: “यक़ीनन उसने हमारी मशक्कतें उठा लीं और हमारे ग़मों का बोझ अपने ऊपर चढ़ाया, पर हम ने उस का यह हाल समझा कि वो ख़ुदावंद का मारा, कूटा और सताया हुआ है। पर वो हमारे गुनाहों के सबब घायल किया गया और हमारी बदकारियों के बाइस कुचला गया। हमारी ही सलामती के लिए उस पर सियासत हुई ताकि उसके मार खाने से हम चंगे हों।” (यसायाह 53:4 से 6)

      “उस ने अपनी जान मौत के लिए उंडेल दी और वो गुनहगारों के दर्मियान शुमार किया गया, और उसने बहुतों के गुनाह उठा लिए और गुनहगारों की शफ़ाअत की।” (यसायाह 53:12)

      “और बासठ हफ़्तों के बाद मसीह क़त्ल किया जाएगा, पर न अपने लिए।” (दानीयेल 9:26, मत्ती 20:28, यूहन्ना 10:15)

      20. वो ज़िंदा हो जाएगा: “इसी सबब से मेरा दिल ख़ुश है और मेरी शौकत शाद, मेरा जिस्म भी उम्मीद में चैन करेगा कि तू मेरी जान को क़ब्र में रहने न देगा और तू अपने क़ुद्दूस को सड़ने न देगा।” (ज़बूर 16:9, 10)

      “वो दो दिन बाद हमें हयात-ए-ताज़ा बख़्शेगा, तीसरे दिन में वो हम को उठा खड़ा करेगा और हम उसके हुज़ूर में ज़िंदा रहेंगे।” (होसेअ 6:2, मर्क़ुस 16:9, लूक़ा 24:6, 7, नीज़ देखो ज़बूर 30:3)

      21. आस्मान पर सऊद फ़रमाना: “तू ऊँचे चढ़ा, तूने असीर (क़ैदी) किया, तूने लोगों के बल्कि सरकशों के दर्मियान हदिये लिए।” (ज़बूर 68:18)

      “ख़ुदावंद ने मेरे ख़ुदावंद को फ़रमाया, तू मेरे दहने हाथ बैठ जब तक कि मैं तेरे दुश्मनों को तेरे पांव तले की चौकी बनाऊँ।” (ज़बूर 110:1, मर्क़ुस 16:19, लूक़ा 24:51, यूहन्ना 20:17)

      22. दुबारा आएगा: “क्योंकि ख़ुदावंद मेरा ख़ुदा आएगा, और सारे कुद्दूसी तेरे साथ।” (ज़करियाह 14:5)

      “एक शख़्स आदमज़ाद की मानिंद आस्मान के बादलों के साथ आया और क़दीम-उल-अय्याम तक पहुँचा। वो उसे उसके आगे लाए और तसल्लुत व हश्मत और सल्तनत उसे दी गई कि सब कौमें और उम्मतें और मुख़्तलिफ़ ज़बान बोलने वाले उसकी ख़िदमतगुज़ारी करें। उसकी सल्तनत अबदी सल्तनत है जो जाती न रहेगी और उसकी ममलकत ऐसी कि ज़ाइल न होगी।” (दानीएल 7:13, 14, आमाल 1:10, 11)

      पुराने अहदनामा में से ये बड़ी-बड़ी बातें जो क़ब्ल-अज़-मसीह पेशीनगोई के तौर पर सैंकड़ों बरस पेश्तर वार हो चुकी हैं, हदिया नाज़रीन कर दी हैं। मगर अलावा-अज़ीं क़ुर्बानियों, रीत-रसूम, नमूनों और अलामतों से मसीह के और उसके मुताल्लिक़ बहुत से उमूर दर्ज हैं, जिनका यहाँ ज़िक्र करना मुहाल है, और जो मसीह में बईनह पूरी होती हैं, और उन सब का तकमिला मसीह में होता है और सिवाए मसीह के किसी और पर पूरी ही नहीं होतीं।

      मसीह के बारे में जो कुछ अह्दे-जदीद में मज़्कूर है वो पुराने अहदनामे की तस्दीक़ करता है, और पुराने अहदनामे की बातें नए अहदनामे की मुसद्दिक़ हैं। ये जानबीनी तस्दीक़ एक दूसरे को आपस में अलग होने नहीं देती, और साथ ही इस अम्र की माने’अ् (रोक) नहीं है कि इंजीली दास्तान के वाक़ि’आत को बहुत हद तक बाबिली दास्तान से लिया हुआ है या ज़रूरत-ए-वक़्त और ईसाई मज़्हब को हर दिल अज़ीज़ बनाने के ख़याल ने क़दीमी राहिबों को इस बात पर मज्बूर कर दिया कि “ये उनका ही क़दीमी मज़्हब है, उनका ही ख़ुदा एक दूसरी शक्ल में आता है।” इंजील शरीफ़ में कोई ऐसा बयान या इबारत या फ़िक़्रह या लफ़्ज़ पाया नहीं जाता जिससे इस ख़ाम-ख़याली का शाइबा या एहतिमाल पाया जाए।

      रही ये बात कि फिर उस मुशाबहत का हल किस तरह हो? वाज़ेह रहे कि इस मुशाबहत से (अगर इस क़िस्म की मुशाबहत फ़िलवाक़े कहीं पाई जाती हो जिसका ज़िक्र ख़्वाजा साहब ने किया है, क्योंकि वो किताबें हमारे पास नहीं जिन से उन्होंने इस्तिफ़ादा किया है) ये तो नतीजा किसी सूरत से मुस्तंबित नहीं हो सकता जो यनाबीअ-उल-मसीहिय्यत में निकाला गया है।

      ये तो वही बात होगी कि कोई कहे कि सुल्तान सुबकतगीन का हिरनी और उसके बच्चे वाला क़िस्सा जो तारीख़ हिंद में दर्ज है, हज़रत मूसा के उस क़िस्से से लिया हुआ है (जो कि तल्मूद में इस तरह मज़्कूर है कि मूसा जब ब्याबान में अपने सुसर के रेवड़ चरा रहा था, तो एक बर्रा रेवड़ छोड़कर चला गया। उस मेहरबान पासबान ने उसका तआक़ुब किया और सड़क के किनारे एक चश्मे पर पानी पीते उसे पाया। मूसा बोला, बेचारा बर्रा, मैंने न जाना कि तू प्यासा था। और जब बर्रा पानी पी चुका तो उसने उसको बड़ी सहूलियत के साथ अपनी गोद में उठा लिया और रेवड़ के पास ले आया। तब ख़ुदा ने फ़रमाया, मूसा, ऐ रहम-दिल मूसा, अगर तेरी मुहब्बत और ख़बरीगीरी और एक जानवर के लिए ऐसी बड़ी है तू मेरी क़ौम इस्राईल की रहनुमाई करेगा।)

      गो इन दोनों बयानात में बहुत-सी बाहमी मुशाबहत है और मौक़ा और महल भी क़रीबन यकसाँ हैं, ख़ुदा का फ़र्मूदा भी यकसाँ है।

      और ये भी बदीही (साबित-शुदा) अम्र है कि सुबकतगीन वाला क़िस्सा मूसा के इस क़िस्से से बहुत देर बाद का है, ताहम क्या उससे ये इस्तिदलाल करना दुरुस्त है, सिर्फ़ मुशाबहत की बिना पर, कि माबाअ्द का क़िस्सा अपने माक़ब्ल क़िस्से से माख़ूज़ किया गया है, और मुक़ामी रंग चढ़ा कि ज़रूरत-ए-वक़्त और सुबकतगीन को हर दिल अज़ीज़ बनाने की ग़र्ज़ से मूसा ही की बातें उस पर चस्पाँ कर दी हैं?

      क्या ऐसा कहने वाला आज दुनिया के सामने मज़हका-अंगेज़ (मज़ाक़) न बनेगा, या कोई ऐसे इस्तिदलाल की क़द्र करेगा? यही हाल हमारे ख़्वाजा कमाल-उद्दीन साहब के कमाल का है। क्या यह कहना दुरुस्त होगा कि उमर और बक्र आपस में मुशाबेह बसूरत व रंग हैं, हत्ता कि उनका मिज़ाज और तबइयत भी मिलती-जुलती है, इसलिए साबित होता है कि बक्र उमर का बेटा है या उस से पैदा हुआ है?

      हाँ, अलबत्ता जो नतीजा निकलता है और ज़रूर ऐसा ही मुस्तंबित होना चाहिए, तो वो वही है जिसका मैंने “इलाही मज़्हब वाहिद, क़दीम और आलमगीर है” के उन्वान के नीचे पहले ही सफ़्हा पर ख़्वाजा साहब के अल्फ़ाज़ में लिख दिया है। वहाँ देख लो, दोहराने की ज़रूरत नहीं। आँजनाब ने कम-अज़-कम दस मुतफ़र्रिक़ ममालिक के देवताओं और उनकी बाबत वहाँ के लोगों के अक़ाइद का बयान किया है, जो क़रीब-क़रीब सब यकसाँ हैं, और वो सब मसीहिय्यत के साथ मुशाबहत रखते हैं, और सब के सब मसीहिय्यत से बहुत क़दीम हैं। तो ज़ाहिर है कि मसीहिय्यत ही वो वाहिद मज़्हब है जो ख़ुदा की तरफ़ से है, और “हर एक इन्सान के हिस्से में यकसाँ आया है।”

      जो निस्बत इस्राईली मज़्हब को मसीहिय्यत के साथ है, वही पेगनइज़्म को भी है। और नतीजा सरीह ये सादिर होता है कि मसीही मज़्हब ही वो वाहिद मज़्हब है जो क़दीम से है और आलमगीर है। मसीही मज़्हब ही सारे मज़ाहिब का मरज’अ और मुतम्मा’अ् नज़र है। क़ौमों की मरग़ूब चीज़ यही है जिसका ज़िक्र हज्जी नबी की किताब 2:7 में आया है और तरह-तरह से किताब-ए-मुक़द्दस के दीगर मुक़ामात में भी आया है, जैसा कि मैं क़ब्ल-अज़ीं बयान कर चुका हूँ।

      इस मज़्मून के मुताल्लिक़ जो दूसरी ख़ास और बड़ी बात है, और जिस के और मसीहिय्यत के दर्मियान मुशाबहत बताकर ख़्वाजा कमाल-उद्दीन ने ये साबित करने की कोशिश की है कि मसीहिय्यत क़दीम सूरज-परस्ती ही का मज़्हब है, इसको आफ़्ताब की सालाना कैफ़ियात-ए-मुख़्तलिफ़ा पर मुंतबिक़ करके दिखाया है कि शमासी तबइयत मसीहियों ने मसीही रिवायत के ख़िलाफ़, लेकिन शमासी रिवायत के इत्तिबा में यही सब कुछ किया है। इख़्तिसारन इसका भी ख़ाका ज़ेल में दर्ज करके उस पर तब्सिरा किया जाएगा। वहुवा हाज़ा।

“सूरज अपनी सालाना कैफ़ियात-ए-मुख़्तलिफ़ा में मुख़्तलिफ़ तासीरें ज़मीन पर डालता है। उसकी तमाज़त और उसकी रोशनी ही इन्सान की ज़िंदगी और राहत है। उसका छिप जाना या उसका हमारी आँखों के सामने कमोबेश वक़्त के लिए आना हमारी उम्मीद व बीम का बाइस होता है। मौसम-ए-ख़ज़ाँ, जो ज़मीन पर एक मौत ले आती है, और मौसम-ए-बहार, जिसके आने पर ज़मीन दुबारा ज़िंदा हो जाती है, ये भी दरअस्ल आफ़्ताब की ही मुख़्तलिफ़ कैफ़ियात हैं। अब अगर हम उस ज़माने को अपने सामने रखें जब रिवायत और क़िस्सा-कहानियों में मज़्हब की तालीम दी जाती थी, जब हर एक मज़हर-ए-क़ुद्रत के साथ एक ना एक देवी-देवता वाबस्ता कर दिया जाता था और उन मज़ाहिर-ए-क़ुद्रत को इन्सानी ख़त व ख़ाल से आरास्ता किया जाता था, उनकी पैदाइश और उनकी ज़िंदगी के बाद वाक़ि’आत के दिन मुक़र्रर करके तहवार मनाए जाते थे, ये वाक़ि’आत और ये पैदाइश और मौत के दिन दरअस्ल इन मज़ाहिर-ए-क़ुद्रत की कैफ़ियात से ही अख़ज़ होते थे।”

“हिन्दुस्तान के लोग इन बातों को आसानी से समझ सकते हैं। दीवाली, बैसाखी, बसंत, लोहड़ी वग़ैरह मुख़्तलिफ़ मौसमों की ही कैफ़ियतें हैं। आज तक कुसूफ़ व ख़सुफ़ के मुताल्लिक़ पुरानी रिवायतें यूँ ही चली आती हैं कि चन्द्रमा और सूरज देवता किसी-किसी देव के क़ब्ज़े में आ गए हैं, उनमें और शैतान में जंग है जिस के पंजे से वो आख़िर नजात पाते हैं। इसी तरह सूरज की मुख़्तलिफ़ कैफ़ियात भी मुख़्तलिफ़ दास्तानों का मूजिब हो गईं। वजूह-ए-बाला से ये अम्र मुस्तबइद नज़र नहीं आता कि एक वक़्त दुनिया के बहुत से हिस्से के लोग क्यों सूरज-परस्त न हों। चुनान्चे जनाब मसीह की पैदाइश से पहले और उनकी पैदाइश से तीन-चार सदियाँ तक जिन ममालिक का इस किताब में सूरज-परस्ती के मुताल्लिक़ ज़िक्र आया है, वो सब के सब कुर्राह-ए-ज़मीन के शुमाली हिस्से में थे। इसलिए जिन आफ़ताबी कैफ़ियात से उन ममालिक में मुख़्तलिफ़ मज़्हबी रिवायतें पैदा हुईं, वो एक ही नौईय्यत और एक ही वक़्त पर पैदा होती थीं। इन रिवायतों में दो तारीख़ें मुतमय्यिज़ हैं। एक वो दिन, जिस वक़्त शुमाली कुर्राह-ए-ज़मीन में सूरज अपनी तमाज़त और रोशनी में बढ़ने लगता या अल्फ़ाज़-ए-दीगर, दिन बड़ा होने लगता है। यह वही 25 दिसंबर का दिन है जिसका आग़ाज़ 24 दिसंबर के बाद की निस्फ़ रात से शुरू होता है।”

“वही वक़्त मथुरा और दीगर सूरज देवताओं की पैदाइश का दिन है। यही वो वक़्त है जब उफ़ुक़-ए-मशरिक़ पर एक तरफ उन सितारों का झुण्ड (ख़ोशा-ए-परदीन) नज़र आता है, जो बुर्ज संबला या बुर्ज कन्या से वाबस्ता हैं। यही वो वक़्त है जब सूरज की पैदाइश का दिन मनाया जाता है, और बा’ज़ शमासी क़ौमों के परस्तार बोल उठते थे कि “कुँवारी ने बच्चा जना।” ये बातें मसीह से पहले दुनिया में मौजूद थीं। मैं ऊपर लिख आया हूँ कि मिस्री नक़्शा-बुरूज में संबला या कन्या के ख़ाने में एक कुँवारी बच्चे को गोद में लिए हुए खड़ी दिखाई देती है। बा’ज़ मिस्री नक़्शाजात में बाकिरा (कुँवारी) आईसिस को दिखलाया गया, जो होरस को लिये खड़ी है। मैं ये दिखला चुका हूँ कि मरियम और बच्चे वाला बुत आईसिस और होरस की ही नक़्ल है।”

“दूसरी तरफ़ जनाब मसीह की पैदाइश का दिन 25 दिसंबर किसी तरह साबित नहीं होता। अब अगर एक शख़्स इस बात के मानने पर मजबूर हो जाये कि विलादत-ए-मसीह के वाक़ि’आत कोई तारीख़ी हैसियत अपने अंदर नहीं रखते, बल्कि वही पुरानी कहानी है, तो क्या करें, ख़ुसूसन जब विलादतगाह-ए-मसीह का तवीला बक़ौल शहीद जस्टिन वही ओजीस का अस्तबल है। इस के मुताल्लिक़ मंजमाना तहक़ीक़ ये है कि शम्स-परस्ती के क़दीमी अय्याम में पैदाइश-ए-सूरज के दिन ऐन ज़मीन के नीचे बुर्ज जौज़ा वाले सितारे नज़र आते थे। बुर्ज जौज़ा का नाम अस्तबल-ए-ओजीस ही था।” (किताब आवर सन गॉड सफ़्हा 148)

“बुर्ज जौज़ा की पेटी के सितारे भी अदद में तीन ही हैं। इन तीन सितारों का नाम पुरानी किताबों में “तीन बादशाह” रखा गया है। (ईज़न सफ़्हा 150) अल-ग़र्ज़ सूरज और मसीह की पैदाइश के वक़्त शम्स-परस्तों के ज़ेहन में कुँवारी का ख़याल तो बुर्ज संबला ने दिया और वलाह-निगाह का ख़याल बुर्ज जौज़ा ने, जिसके हमराह तीन बादशाह 25 दिसंबर की सुबह को नज़र आते हैं। ईसाई अस्हाब जो पसंद फ़रमा दें, तश्रीह कर लें।”

“सूरज की दूसरी कैफ़ियत-ए-तमईज़ा वो है जो मौसम-ए-बहार में पैदा होती है। 25 दिसंबर से चलकर 23 मार्च तक सूरज अपनी ताक़त, यानी रोशनी और हरारत में बढ़ता जाता है। इस बात को कैसे लतीफ़ शाएराना पैराया में सूरज देवता अपालो के मुताल्लिक़ ज़ाहिर किया गया है। अपालो जब 25 दिसंबर को पैदा हुआ तो उसके सर पर एक ही बाल था, यानी एक ही शुआ। 23 मार्च को सूरज अपने बैज़वी दायरे में घूमता हुआ ख़त-ए-इस्तिवा पर आ जाता है, जिस वक़्त दिन-रात बराबर होते हैं। दो दिन तक उसकी यही कैफ़ियत रहती है। इन कैफ़ियात-ए-आफ़ताबी के मुताल्लिक़ जो 25 दिसंबर से 23 मार्च तक पैदा होती हैं, पुरानी शमासी रिवायतें ये थीं कि ज़ुल्मत का देव जो आफ़्ताब का दुश्मन है और जिस के पंजे से 25 दिसंबर को सूरज निकला है, उस में और सूरज महाराज में एक मुस्तक़िल जंग शुरू हो जाती है। ये जंग रोज़ाना होती है और हर रोज़ सूरज थोड़ा-थोड़ा देव-ए-ज़ुल्मत पर ग़ालिब ही आता है, यानी दिन बढ़ता जाता है। 23 मार्च तक तो यही कैफ़ियत रहती है, लेकिन इसके दो दिन तक सूरज कोई तरक़्क़ी नहीं करता और एक ही जगह पर खड़ा रहता हुआ नज़र आता है। गोया ख़ुदा-ए-नूर और ख़ुदा-ए-ज़ुल्मत में ये एक आख़िरी जंग है जिसमें वो ख़ुदा-ए-नूर, यानी आफ़्ताब, जो हर रोज़ थोड़ा-बहुत देव-ए-ज़ुल्मत पर ग़ालिब ही आता था, अब कुछ ऐसा उसके पंजा में आ गया कि उसकी रफ़्तार रुक गई। वो बज़ाहिर मर गया। लेकिन दो दिन के बाद सूरज उसी बढ़ने वाली ताक़त के साथ नमूदार हो गया। इसी तरह देव के चंगुल से ये निकल कर आज़ाद हो गया। ये वो वक़्त है जब सूरज का बैज़वी दायरा ख़त-ए-इस्तिवा पर गुज़र कर सलीबी शक्ल पैदा कर देता है। यही वो वक़्त है जब सूरज बुर्ज हमल में दाख़िल होता है जिसकी शक्ल फ़लकियात में मीग, यानी बछड़े की, दिखलाई गई है। ये वो बछड़ा है जो हर 23 दिसंबर को सलीब मज़्कूर-बाला पर चढ़ता है। चूँकि इस बछड़े के मस्लूब होने के दो दिन बाद ही सूरज आब-ओ-ताब से निकलता है, यही वो वक़्त है जब सूरज की ये नई रोज़-अफ़्ज़ूँ कैफ़ियत बहार लाकर मुर्दा ज़मीन को अज़सर-ए-न ज़िंदा करती है।”

“इसलिए मसीह से पहले ही सलीब और बछड़ा नई ज़िंदगी का निशान समझा गया जो दो दिन के बाद आब-ओ-ताब से निकलता है। अगर कोई इन बातों को एक तकल्लुफ़ाना तश्रीह कहे तो कह भी सकता है, लेकिन इस बात का क्या जवाब है कि मसीह की पैदाइश से बहुत पहले बछड़ा और उसकी क़ुर्बानी का ताल्लुक़ मथुरा, बेकस और अपालो के साथ मुसल्लम है। सलीब-परस्ती भी क़दीम से है। सलीब क़दीम से ही निशान-ए-ज़िंदगी तो मानी गई है। और यह ज़िंदगी तो मौसम-ए-बहार पर पैदा होती है जिसकी तारीख़ फिर वही आख़िर मार्च है। क्रास-केक और अंडे इस मौक़े पर पहले भी खाए जाते थे।”

“सूरज की तीसरी कैफ़ियत 23, 24 जून को पैदा होती है, जिस दिन सूरज अपने कमाल को पहुँच कर घटना शुरू होता है। बाज़ क़दीमी शमासियों ने उसे सूरज की मौत का दिन भी तसव्वुर किया है। चुनान्चे उसी तारीख़ को सूरज देवता एडोनिस क़त्ल होता है और मौसम-ए-बहार में दुबारा ज़िंदा होता है। ईसाई रिवायत में इस तारीख़ को यूहन्ना इस्तिबाग़ी की तारीख़-ए-विलादत ठहराया गया है। तारीख़न इसका कोई सबूत नहीं, लेकिन इंजील यूहन्ना बाब 3 आयत 3 से इस बात की तश्रीह हो जाती है, जहाँ यूहन्ना मसीह की तरफ़ इशारा करके कहता है कि “वो तो बढ़ेगा और मैं घटूँगा।” अब अगर मसीह की पैदाइश 25 दिसंबर को हो और यूहन्ना की 25 जून को, तो ये अम्र भी साफ़ हो गया, क्योंकि 25 दिसंबर के बाद सूरज बढ़ता है और 24, 25 जून के बाद घटता है।”

“यानी 25 दिसंबर को वो पैदा होता है जिसने बढ़ना है और 25 जून को वो जिसे घटना है। ये कोई तकल्लुफाना तश्रीह नहीं, जबकि इंजील की बहुत-सी आयात सूरज की मुख़्तलिफ़ कैफ़ियात की तरफ़ ही इशारा करती हैं। चुनान्चे ज़ेल में मैं चंद आयात देता हूँ। आज ये अम्र मुसल्लम हो गया है कि इंजीलें बहुत बाद में लिखी गईं, जब उस वक़्त के मुअल्लिमान-ए-मसीहिय्यत अपने मज़्हब को हर दिल अज़ीज़ बनाने के लिए शमासी रिवायत और पेगनइज़्म की दूसरी रिवायत को लगातर अपने मज़्हब में दाख़िल कर रहे थे। इंजीलों के और बहुत से फ़िक़्रे भी उसी तरफ़ इशारा करते हैं। यूहन्ना बाब 3 आयत 13 में जनाब मसीह फ़रमाते हैं कि “आस्मान पर कोई नहीं चढ़ा सिवाय उसके जो आस्मान से उतरा है, इब्ने-आदम, जो आस्मान में है।” ये फ़िक़्रह मसीह के मुँह से नहीं निकल सकता। वो यहूदी थे, और उनसे पहले दो बुज़ुर्ग जो आस्मान से तो नहीं उतरे थे लेकिन आस्मान पर चढ़ गए थे। एक एलियाह दूसरा इदरीस या हनोक। अलावा अज़ीं उस वक़्त तक मसीह आस्मान पर नहीं चढ़े थे, फिर वो तो ज़मीन पर थे। वो कैसे कह सकते हैं “इब्ने-आदम जो आस्मान में है।” अलबत्ता शमासी रिवायत को सामने रखें तो लफ़्ज़-ब-लफ़्ज़ इस आयत का हल हो जाता है। सूरज आस्मान से उतरकर 25 दिसंबर को पैदा होता है, वही आस्मान पर चढ़ता है, वही आठवाँ पहर आस्मान पर है।”

“इस के अलावा ज़ेल की आयात भी ग़ौर के क़ाबिल हैं। यूहन्ना बाब 8 आयत 21, “और दुनिया का नूर मैं हूँ, जो मेरी पैरवी करेगा वो अंधेरे में न चलेगा बल्कि ज़िंदगी का नूर पाएगा।” दो हज़ार बरस से तो आज तक मसीही नूर हर जगह नहीं पहुँच सका, लेकिन सूरज पर ये फ़िक़्रह लफ़्ज़न व म’आनन पूरा होता है। फिर यूहन्ना बाब 9 आयत 4, 5 हस्बे-ज़ैल है, “जिसने मुझे भेजा है, उसका काम मुझे जब तक दिन रहे कर लेना है। रात जब आती है तो कोई काम नहीं कर सकता। जब तक मैं दुनिया में हूँ, दुनिया का नूर हूँ।” यहां भी ये बातें सूरज पर ही मुतहक़्क़िक़ होती हैं। मसीह तो दिन-रात अपनी तब्लीग़ में मसरूफ़ थे, अलबत्ता आफ़्ताब के काम के वक़्त मुईन हैं।”

“इसी क़िस्म के और भी फ़िक़्रात इंजील में हैं, ख़ुसूसन इंजील यूहन्ना में, जिसकी तस्नीफ़ के मुताल्लिक़ ये अम्र मुतहक़्क़िक़ है कि वो मसीह से कई सदियों बाद हुई। और सिकंदरिया के मज़्हब के फ़ल्सफ़े के तास्सुरात से ख़ाली नहीं। लेकिन यहाँ मैं एक ज़ेल का भी हवाला देता हूँ, यानी यूहन्ना 1 बाब 9, 10 “हक़ीक़ी नूर जो हर एक आदमी को रोशन करता है, दुनिया में आने को था। वो दुनिया में था, और दुनिया उसके वसीले से पैदा हुई।” ख़ुश-एतिक़ादी को छोड़ कर इन अल्फ़ाज़ पर ग़ौर करो। ये लफ़्ज़न व म’आनन सूरज और उसके अमल को ज़ाहिर नहीं करते तो और किस चीज़ को ज़ाहिर करते हैं? सूरज ही आठों पहर दुनिया में है। सूरज से ही ज़मीन निकली, और ज़मीन से इंसान। न सिर्फ सूरज आदमी को रोशन करता है, बल्कि इंसान के अंदर जो कुछ भी है, उस का गोश्त-पोस्त, दिल-ओ-दिमाग, सब का सब सूरज ही के वसीले से है। ये एक इल्मी हक़ीक़त है जिससे किसी को इन्कार नहीं हो सकता। इस हक़ीक़त की रोशनी में यूहन्ना के इन अल्फ़ाज़ को पढ़ो, तो फिर ये अल्फ़ाज़ सूरज पर ही चस्पाँ होते हैं। हाँ, अगर इस नज़रिये को सामने रखा जाये जिसे इन औराक़ ने मुबर्हन कर दिया है, और वो ये है कि क़दीमी राहिबों ने, जिन में से एक इंजील यूहन्ना का मुसन्निफ़ भी था, मसीह को शम्स-परस्तों के सामने क़दीमी सूरज देवताओं का एक क़ायम-मक़ाम पेश किया, और उसके मुताल्लिक़ वही बातें लिखीं जो शम्स-परस्तों में दायर और सायर थीं।”

“सूरज की चौथी कैफ़ियत 23 सितंबर को वाक़िआ होती है, जिसके बाद सूरज बिल्कुल ही कमज़ोर हो जाता है। दिन घटने लगता है और एक माह बाद, यानी 23 अक्तूबर को सर्मा आ जाती है। हिन्दुस्तान से किसी क़द्र और शुमाल में अगर इन दिनों जाकर देखा जाये तो दिन भी चंदाँ रोशन नज़र नहीं आता। हत्ता कि ईरान के शुमाल में नौ घंटे तक दिन आ जाता है। ये कैफ़ियत उसी वक़्त शुरू होती है जब आफ़्ताब बुर्ज-ए-अक़्रब में आ जाता है। सूरज देवता के दुश्मन की तस्वीर जो सूरज-परस्तों ने खींची है, वो अक़्रब की है जिसकी दुम ख़ारदार है। मसीही तहरीरों में शैतान या देव-ए-ज़ुल्मत को बेशक साँप से निस्बत दी गई है, लेकिन जहाँ शैतान को इंसान की शक्ल में दिखलाते हैं, वहाँ उसकी दुम ख़ारदारी दिखलाई जाती है। वो लंबा कोट पहने हुए तो नज़र आता है, लेकिन ख़ारदार दुम को नहीं छिपा सकता। ये माना कि साँप का तसव्वुर तो क़िस्सा-ए-आदम से ले गया हो, लेकिन दुनिया में वो कौन सा साँप है जिसकी दुम ख़ारदार हो? अब अगर मसीह आफ़्ताब सदाक़त है, तो फिर उस आफ़्ताब पर देव-ए-ज़ुल्मत उसी वक़्त ग़ालिब आता है जब वो बुर्ज-ए-अक़्रब में जाता है।...... मसीह के बारह हवारी हों या अपालो के या हरकुलेस के बारह कारनामे, ये वही बारह बुर्ज हैं। आख़िर अपालो या हरकुलेस कोई तारीख़ी हस्तियाँ नहीं, वो तो शमासी तख़ैयुलात (खयालात) की एक तस्वीरें हैं। अगर उनके बारह दोस्त मुसल्लम बारह बुर्ज हैं, तो वही तश्रीह हवारियों की तादाद पर क्यों हावी नहीं? फिर यहूदाह इस्करियोती ही नहीं, इससे पहले भी बारह में से एक पहले सूरज-देवताओं को गिरफ़्तार कराता है। वो बुर्ज-ए-अक़्रब न सही, बुर्ज-ए-क़ौस सही। बारह में से एक बुर्ज में जाकर सूरज बिल्कुल कमज़ोर हो जाता है, अगरचे मुतक़द्दिमीन (पहले ज़माने के लोगों) ने अक़्रब को ही लिया है।” (सफ़्हा 88 से 97)

      ये तवील इक़्तिबास मैंने इसलिए किया कि सूरज की चारों कैफ़ियात-ए-मुतज़क्किरा क़ारिइन-ए-किराम के ज़हन में पूरी तरह आ जाएँ और उन का जिन बातों के साथ मुक़ाबला किया गया है, वो भी उनके पेश-ए-नज़र रहे। इस सारे इक़्तिबास से ज़ाहिर है कि जनाब कमाल-उद्दीन साहब, जो पंजाब हाईकोर्ट के वकील हैं, हमारे ख़िलाफ़ अपने मुवक्किल की, ख़्वाह वो कोई हो, ख़ूब जिरह और बह्स की है, और पब्लिक की अदालत में अपने इस दावे, कि “ज़रूरत-ए-वक़्त और ईसाई मज़्हब को हर दिल अज़ीज़ बनाने के ख़याल ने क़दीमी राहिबों को इस बात पर मज्बूर कर दिया कि वो… लोगों को कह दें कि जनाब मसीह में उनके क़दीमी ख़ुदाओं ने ज़हूर किया… ये उनका ही क़दीमी मज़्हब है… उनका ही ख़ुदा एक दूसरी शक्ल में आता है।” (मैंने इख़्तिसार के लिए नुक़्ते दे दिए हैं, इबारत पूरी मुतसव्वर रहे।) अपने ज़ोअम (ख़याल) में उन्होंने ख़ूब “सबूत” दिया है, और उम्मीद है कि पब्लिक इस बह्स को देखकर अश-अश कर उठेगी। मगर ज़रा ठहरें, हमारा भी तारीख़ी डीफ़ेन्स सुन लें और तब फ़ैसला दें।

      इस पूरे इक़्तिबास में हमारे वकील साहब ने हस्ब-ज़ैल उमूर ज़ाहिर किए हैं:

       (1) 25 दिसंबर को मसीह की पैदाइश के दिन को तारीख़ी तौर पर बिला-सबूत क़रार देकर आफ़्ताब की ख़ास कैफ़ियत का दिन मुईन किया है।
       (2) 25 दिसंबर से 25 मार्च तक आफ़्ताब और ज़ुल्मत के देव के दर्मियान जंग और उस में ख़ुदा-ए-नूर की दूकदू की मग़लूबियत और अज़-सर-नौ ज़िंदा होने को, और उसी वक़्त सूरज के बैज़वी दायरे से ख़त-ए-इस्तिवा पर सलीब की शक्ल का पैदा हो जाने और मीग-बछड़े का 23 दिसंबर को सलीब पर चढ़ने और उसके मस्लूब होने के दो दिन बाद सूरज के आब-ओ-ताब से निकलने को, मसीह का शैतान के साथ जंग करने और सलीब पर मरने और तीसरे दिन ज़िंदा हो जाने पर मुंतबिक़ करके दिखाया है कि मसीहिय्यत और कुछ नहीं, बल्कि शम्स-परस्ती है।
       (3) 23, 24 जून को सूरज का अपने कमाल को पहुँचने के बाद घटना शुरू होने को यूहन्ना के घटने और मसीह के बढ़ने से तश्बीह देकर, यूहन्ना के इस माक़ूले को आफ़्ताब की इस कैफ़ियत पर मुंतबिक़ करके, यूहन्ना की इंजील को ग़लत और शमासी तबीअत के राहिबों में से एक होना साबित किया है, और इसी के ज़िम्न में इंजील की बा’ज़ आयात की तश्रीह की है।
       (4) 23 सितंबर को सूरज की जो हालत होनी शुरू होती है, यानी घटने की, और अक्तूबर को सर्मा (ठण्ड, जाड़ा) का शुरू हो जाना, इसको मसीह और शैतान में जंग और मसीह का मग़्लूब या मस्लूब होकर मर जाना और बारह हवारियों में से एक का मसीह को गिरफ़्तार करवा देना, बारह बुरूज में से एक बुर्ज-ए-अक़्रब में सूरज के दाख़िल होने के साथ तश्बीह दिया है।
       मगर ज़ाहिर है कि पहली दलील तो बिल्कुल ग़लत है, क्योंकि 25 दिसंबर को मसीह की पैदाइश का दिन मानना इंजील शरीफ़ में कहीं मज़्कूर नहीं हुआ, और ना इस दिन को मानने का मसीहियों को इंजील में हुक्म ही है। ना इस दिन के मानने पर इंसान की नजात का इन्हिसार (दारोमदार) है।
       चुनान्चे हमारे वकील साहब भी इसी अम्र को तस्लीम करते हैं कि “जनाब मसीह की पैदाइश का दिन 25 दिसंबर किसी तरह साबित नहीं होता।” (सफ़्हा 90) पस वो इसकी ख़्वाह कैसी ही तश्रीह क्यों न करें, मसीहिय्यत पर उनकी जिरह और बहस से कुछ भी असर नहीं होता, और आपका दावा बेसबूत रहता है। हाँ, अलबत्ता अगर इससे कुछ साबित होता है तो वो यही है कि:
       (अ) मसीह की पैदाइश एक तारीख़ी वाक़िआ है (ख़्वाह वो किसी तारीख़ पर वाक़ेअ हुई हो, वो अम्र दीगर है)।
       (ब) मसीह की पैदाइश और इसके मुतअल्लिक़ा उमूर की तस्दीक़ जैसी तारीख़ से होती है (जिसका ज़िक्र बमए हवालेजात में क़ब्ल-अज़ीं कर आया हूँ), वैसी ही पेगनइज़्म से होती है (इसका भी ज़िक्र हो चुका है), और वैसी ही सूरज की महुव्वला बिला-कैफ़ियत से भी होती है। पस मसीह की पैदाइश एक हक़ीक़त है, ना कि अफ़साना।
       (ज) मसीहिय्यत पर तारीख़, पेगनइज़्म (मज़ाहिब-ए-कुफ़्र व इल्हाद) और इल्म-ए-नुजूम तीन गवाह हैं।
       दूसरे अम्र की बाबत भी हमारे वकील साहब ने कोई तारीख़ी सबूत इसका नहीं दिया कि मसीह का मस्लूब होना, और तीसरे दिन ज़िंदा होना, और बड़े आब-ओ-ताब से ज़ाहिर होना कोई हक़ीक़ी वाक़िआ नहीं, बल्कि मह्ज़ सूरज की कैफ़ियत को शमासी तबीअत-ए-क़दीम राहिबों ने मसीह पर और उसके सलीबी वाक़िआत पर चस्पाँ कर दिया है। हाँ, अलबत्ता इससे अगर कुछ साबित होता है तो वो यही है कि:
       (1) मसीह का मस्लूब होना, तीसरे दिन ज़िंदा होना, और बड़ी आब-ओ-ताब से अपने शागिर्दों पर ज़ाहिर करना, ये सब एक मुसल्लिमा तारीख़ी उमूर हैं।
       (ब) सय्यदना मसीह के मस्लूब होने और ज़िंदा होने के वाक़िआ और मुतअल्लिक़ा उमूर की तस्दीक़ न सिर्फ़ तारीख़ ही से होती है (जैसा कि गुज़रा), बल्कि पेगनइज़्म से भी होती है (ये भी पहले मज़्कूर हो चुका)। और इस पर तीसरा गवाह इल्म-ए-नुजूम का बयान है।
     (च) मसीह से पहले ही सलीब और बछड़ा नई ज़िंदगी का निशान समझा गया है। “सलीब-परस्ती भी क़दीम से है।” गो हम लकड़ी या किसी और चीज़ की सलीब बनाकर उसकी परस्तिश नहीं करते, मगर ये ज़रूर मानते हैं कि ज़िंदगी मसीह की सलीब पर ईमान लाने से ही मिलती है, और ये क़दीम है। यही वो “इस्लाम” या “मज़्हब-ए-हक़” है जो नूह से लेकर सय्यदना मसीह तक हर क़ौम व मिल्लत को यकसाँ दिया गया है। ये मसीहिय्यत की क़दामत और उसके आलमगीर होने का और इस उसूल की क़दामत का भी बयान है कि “बग़ैर खून बहाए गुनाहों की माफ़ी नहीं।” शुरू से इंसानों को इस अम्र की ज़रूरत महसूस हुई, और इसी के वो आरज़ूमंद थे। और क़ौमों की आरज़ू मसीह-ए-मस्लूब में पूरी होती है।

      तीसरे अम्र के बारे में ये अर्ज़ है कि हमारे मुख़ालिफ़ वकील साहब का ये कहना हक़ीक़त के पाया से गिरा हुआ है कि “इंजील की बहुत-सी आयात सूरज की मुख़्तलिफ़ कैफ़ियात की तरफ़ ही इशारा करती हैं।” क्योंकि तारीख़न इसका कोई सबूत नहीं। ये कह तो दिया है कि इंजील यूहन्ना का मुसन्निफ़ भी “क़दीमी राहिबों” ही में से था, मगर सबूत नदारद। महज़ किसी बात का कह देना कोई दलील नहीं होता।

      मैं ख़्वाजा साहब से ये भी दरियाफ़्त करूंगा कि राहिब की अज़-रू-ए-मसीहिय्यत क्या तआरिफ़ है? क्या मसीह के हवारी राहिब थे? ख़ैर, उसको भी जाने दो। आप इतना तो मानते हैं कि यूहन्ना मसीह की तरफ़ इशारा करके कहता है कि “वो तो बढ़ेगा और मैं घटूँगा।” कम-अज़-कम ये तो तारीख़ी अम्र है कि यूहन्ना इस्तिबाग़ी ने मसीह के हक़ में कहा। और इस बात पर पूरा सुकूत करते हैं कि यूहन्ना की ये बात पूरी हुई या नहीं। मगर मैं जनाब को बताए देता हूँ कि ये यूहन्ना ने पेशीनगोई के तौर पर फ़रमाया था और वो ब-ज़िन्‍सा पूरी भी हो गई। यूहन्ना का घटना ज़रूरी था ताकि मसीह बढ़े। चुनान्चे मसीह और उसके शागिर्द बपतिस्मा देते थे और यूहन्ना भी बपतिस्मा देता था, मगर अलग-अलग। इस सबब से यूहन्ना के शागिर्दों ने आकर उससे शिकायत की, मगर यूहन्ना ने जवाब दिया कि “इंसान कुछ नहीं पा सकता जब तक कि उसको आसमान से न दिया जाए। ज़रूर है कि वो बढ़े और मैं घटूँ।” और यह पेशीनगोई पूरी हो गई, जबकि यूहन्ना क़ैद में डाला गया। उसका काम ख़त्म हुआ और मसीह ने काम शुरू कर दिया। और उसका काम बढ़ता गया और उसकी शौहरत तमाम सूर, और गलील, और दक़पलस, और यरूशलेम, और यहूदिया, और यरदन के पार से बड़ी भीड़ उसके पीछे हुई। (मत्ती 4:24, 25)

      सलीब तक बराबर उसका काम और शौहरत बढ़ती रही। उसके काम का एक पहलू सलीब पर ख़त्म हुआ और दूसरा उसके ज़िंदा होने और आसमान पर जाने के बाद शुरू हुआ। और पीन्तीकोस्त से लेकर आज तक बढ़ रहा है। और आसमान में उसकी शफ़ाअत का काम भी बढ़ रहा है। ये दोनों काम क़ियामत तक बढ़ते रहेंगे। मगर जो शरह ख़्वाजा साहब ने की है, वो उनकी कोई तकल्लुफाना तश्रीह नहीं है, क्योंकि इंजील के बयान में दो अश्ख़ास का ज़िक्र है जिनमें से एक घटता और दूसरा बढ़ता है। और घटने-बढ़ने का हर दो जानिब का अमल बराबर आज तक जारी है। मगर आपकी आफ़्ताब-परस्ती में सिर्फ़ सूरज ही है और वही घटता और बढ़ता रहता है।

      वो घटने और बढ़ने के मुदामी आवागमन के चक्कर में फिर रहा है, जिससे उसको कभी रिहाई नहीं। हमारे वकील साहब का कहना शायद उस वक़्त कुछ वक़अत रख सकता था, अगर वो सय्यदना मसीह की विलादत को 25 दिसंबर और यूहन्ना इस्तिबाग़ी की पैदाइश को 25 जून क़रार दे देते और तारीख़न साबित और तस्लीम कर लेते, क्योंकि ये उनके क़ौल के लिए एक बुनियाद हो जाती। लेकिन जब वो इन तारीख़ों पर इन बुज़ुर्गान की पैदाइश ही नहीं मानते, तो फिर ये मुशाबहत पैदा करना, अगर उनके तअस्सुब पर महमूल न किया जाए, तो और क्या कहा जाए?

      फिर अगर अपने मुख़ालिफ़ के वकील की तरफ़ इस बात को रखें कि “इस बात का क्या सबूत है कि वो 25 दिसंबर को पैदा हुआ” (सफ़्हा 85) और “जनाब मसीह की पैदाइश का दिन 25 दिसंबर किसी तरह साबित नहीं होता” (सफ़्हा 90) और कि “ईसाई रिवायत में इस तारीख़ को (यानी 25 जून) यूहन्ना इस्तिबाग़ी की तारीख़े विलादत ठहराया गया है, तारीख़न इसका कोई सबूत नहीं”, और इसके मुक़ाबिल में इस बयान या दावे को रखा जाए कि “अब अगर मसीह की पैदाइश 25 दिसंबर को है और यूहन्ना की 25 जून को”, तो ज़ाहिर है कि वकील साहब के बयान में तज़ाद (टकराव) पाया गया। जिस बात की आप पहले तर्दीद करते हैं, उसी की फिर ताईद करते हैं। और तुर्रा इस पर यह कि इस ग़लत-बयानी की बिना़ पर आप अपने इस दावे को मुब्तनी करते हैं कि “ये अम्र भी साफ़ हो गया, क्योंकि 25 दिसंबर के बाद सूरज बढ़ता है और 24, 25 जून के बाद घटता है, यानी 25 दिसंबर को वो पैदा होता है जिसने बढ़ना है और 25 जून को वो जिसने घटना है।”

      पस जिस अम्र की बिना़ (बुनियाद) ग़लत है, तो खुद वो अम्र भी ग़लत है, या दूसरे लफ़्ज़ों में अगर बिना़ (बुनियाद) ग़लत है, तो उसी का मुब्तनी भी ग़लत है। और हमारे मुहतर्म वकील साहब के इस शेअर की लफ़्ज़न व म’आनन तस्दीक़ हो जाती है कि:

ख़िश्त-ए-अव्वल चुँ नहद मुअम्मार कज

ता सौद (या) मीरौ दीवार कज

      लिहाज़ा वकील साहब का ये दावा बिला-दलील (बगैर दलील) है और फ़ैसला पब्लिक से मतलूब है। अब मैं थोड़ी देर के लिए इंजील जलील व कलाम नबील के उन चंद मुक़ामात पर मुख़्तसर तौर पर तब्सिरा करूंगा, जिनकी बाबत वकील साहब लिखते हैं कि वो आयात सूरज की कैफ़ियात की तरफ़ ही इशारा करती हैं, चुनान्चे...

      यूहन्ना बाब 3 आयत 13, ये आयत किसी तरह भी सूरज की किसी कैफ़ियत की तरफ़ इशारा नहीं करती। इस आयत के सियाक़ व सबाक़ से इस महुव्वा मफ़्हूम को कुछ ताल्लुक़ नहीं है। ये तो पाँचवीं जमाअत के लड़के भी जानते हैं कि सूरज एक ही जगह क़ायम है और ज़मीन उसके गिर्द हरकत करती है। सूरज न तो आसमान पर कभी चढ़ा है, न आसमान से कभी उतरा है। बल्कि आठों पहर आसमान में रहता है। वो माद्दी शै हो कर क़ायम-बिल-मकान है। आन-ए-वाहिद में उसका आसमान से उतरना और आठों पहर वहाँ रहना नामुम्किन है।

      25 दिसंबर को उसका पैदा होना, आसमान से उतरना, आठों पहर आसमान पर रहना, एक दूसरे के मुतज़ाद उमूर हैं। मसीह से पहले, बावजूद हनोक और एलियाह के आसमान पर चढ़ जाने के, बल्कि हज़रत सुलेमान से पहले हनोक आसमान पर चढ़ गए थे। जिस तरह याक़ूब का बेटा आज़ूर, जो यहूदी था, ये कह सका कि “कौन आसमान पर चढ़ता और उस पर से उतरता?” (अम्साल 30:4) उसी तरह सय्यदना मसीह के मुँह से ये कलिमा निकला। उस ने तो, बावजूद हनोक के पहले ही आसमान पर होने के, ये कलिमा इस्तिफ़हाम-ए-इंकारी की सूरत में कहा। मगर सय्यदना मसीह ने बताया कि “सिवा उसके जो आसमान से उतरा, यानी इब्ने-आदम जो आसमान में है”, कोई आसमान पर अपनी मर्ज़ी और ताक़त से नहीं चढ़ा। हनोक की बाबत लिखा है कि “ख़ुदा ने उसे ले लिया।” (पैदाइश 5:24) और एलियाह के बारे में किताब-ए-मुक़द्दस में मज़कूर है कि “ख़ुदावंद ने चाहा कि एलियाह को एक बगोले में उड़ाकर आसमान पर ले जाए।” (2 सलातीन 2:1, 11)


1 तर्जुमा : अगर इमारत बनाने वाला पहली ईंट ही टेढ़ी रख दे, तो फिर दीवारें भी आख़िर तक टेढ़ी ही उठेंगी।

      लेकिन ख़ुदावंद का आस्मान पर से आना और वापस जाना अपनी मर्ज़ी और क़ुद्रत व इख़्तियार से था, जो बाप से उसको मिला था। (यूहन्ना 10:18) पस ऐसे कलमात सिवा मसीह के किसी यहूदी के मुँह से निकल नहीं सकते थे। फिर अगर ऊपर की एक दो आयात पर ग़ौर किया जाये तो ज़ाहिर होता है कि मसीह ने नीकूदीमस को सर-ए-नौ पैदा होने की तालीम दी थी। मगर वो उसको समझ न सका। इस पर मसीह ने उससे फ़रमाया कि “जो हम जानते हैं, वो कहते हैं, और जिसे हमने देखा है, उसकी गवाही देते हैं, और तुम हमारी गवाही क़ुबूल नहीं करते। मैंने तुमसे ज़मीन की बातें कहीं और तुमने यक़ीन नहीं किया, तो अगर मैं तुमसे आस्मान की बातें कहूँ तो क्योंकर यक़ीन करोगे।” “और आस्मान पर कोई नहीं चढ़ा, सिवाए उसके कि जो आस्मान से उतरा”, “जो आस्मान की बातें कहे” या जो आस्मान की बातें जानता और आस्मान और ज़मीन दोनों से रब्त रखता है। या दूसरे अल्फ़ाज़ में, “आस्मान से उतरा और आस्मान में है, यानी इब्ने-आदम”, जिसके सामने माज़ी और हाल यकसाँ हैं। मकानी मुसाफ़त या फ़ासले जिसके लिए कुछ चीज़ नहीं, ज़मान और मकान जिसको घेरते नहीं, चढ़ना और उतरना और आस्मान पर होना उसके लिए यकसाँ है। आस्मानी बातों के बारे में उसका इल्म-ए-लुदनी (यानी वो इल्म जो बग़ैर दुनियावी उस्ताद के खुदा के फैज़ से हासिल हुआ हो) है। इस म’अनी में “आस्मान पर कोई नहीं चढ़ा सिवाए उसके कि जो आस्मान से उतरा”, फ़िक़्रह “आस्मान पर चढ़ा” के म’अनी, वो जो आस्मानी बातों से, या उन बातों से जो सिर्फ़ आस्मान ही में जानी जाती हैं। (यूहन्ना 3:13, रोमियों 10:6, मुक़ाबला करवाओ इस्तिसना 30:12, अम्साल 30:4, देखो एडवर्ड रॉबिनसन साहब डी॰ डी॰ ई॰ एल॰ एल॰ डी॰ के नए अहदनामे की यूनानी और अंग्रेज़ी डिक्शनरी, लफ़्ज़ Ava Barwv, नम्बर 2) फ़िक़्रह “जो आस्मान में है”, “है” फ़े’अल के लिए यूनानी में शुब्हा फ़े’अल है जिसमें फ़ा’इली तसव्वुर को बशक्ल-ए-सिफ़त बयान किया जाता है और न उसमें मुसद्दिर का और न फ़े’अल के हर किसी ज़माने का शाइबा पाया जाता है।

      ये फ़िक्रात कह कर सय्यदना मसीह नीकूदीमस के इस यक़ीन और ईमान की तर्मीम व तस्बीह फ़रमाते हैं, जो वो मसीह की बाबत रखता था कि वो “उस्ताद” है या एक “रब्बी” है, और उसे बताते हैं कि मैं तेरे ज़ो’अम (ख़याल) के मुताबिक़ रब्बी या मामूली उस्ताद नहीं हूँ। मेरा इल्म-ए-लुदुनी (यानी वो इल्म जो बग़ैर दुनियावी उस्ताद के खुदा के फैज़ से हासिल हुआ हो) है। मेरे सामने माज़ी और हाल बराबर हैं। ज़मान और मकान में मैं महदूद नहीं।

      यूहन्ना बाब 8 आयत 12 “और दुनिया का नूर मैं हूँ, जो मेरी पैरवी करेगा वो अंधेरे में न चलेगा, बल्कि ज़िंदगी का नूर पाएगा।” मसीह हक़ीक़त में वो माद्दी सूरज नहीं, जो हमें नज़र आता है, और न उसमें से वो रोशनी निकलती है जो माद्दी हो और माद्दी तारीकी को दूर करे, जैसे कि ये हमारा सूरज करता है। बल्कि यहाँ मसीह ने बतौर इस्तिआरा अख़्लाक़ी और रूहानी नूर अपने आपको क़रार दिया है, और तारीकी या अंधेरे को भी अख़्लाक़ी और रूहानी तारीकी ही से इस्तिआरतन कहा है। और फ़रीसियों ने ऐसा ही समझा। सय्यदना मसीह का मंशा इल्म-ए-अस्ट्रोनॉमी की तालीम देना न थी। जनाब के ज़ेहन में तो “शमासियों” और “सूरज-परस्तों” का ख़याल भरा पड़ा है। भला मसीह की आला और अर्फ़ा रूहानी तालीम की वहाँ क्या गुंजाइश हो सकती है।

      ये तो तारीख़ी हक़ीक़त है कि यूरोप और अमरीका और अफ़्रीक़ा के बाशिंदे, मसीहिय्यत के वहाँ पहुँचने से पेश्तर, वहशी और बुत-परस्त थे। वसावस और वहमियात का शिकार बने हुए थे, क़ज़ाती (लूटना) और ज़ुल्म उनका पेशा था। मगर आज हमारे नजात-दहिंदा की बरकत और इंजील के तुफ़ैल, वही ममालिक आला दर्जे के आलिम व फ़ाज़िल, दाना और ज़ीरक, मुहज़्ज़ब और मुनव्वर बने हुए हैं।

      दूर क्यों जाओ, अपने हिन्दुस्तान ही को देख लो। हिंदू राजाओं और मुसलमान बादशाहों की सल्तनत का मुकाबला आज मसीही सल्तनत से कर लो। बुत-परस्ती, मज़ालिम, जहालत, अस्फ़ल को जा रहे हैं। ख़ुदा-परस्ती, बाहमी हमदर्दी, इल्म व फ़ज़्ल और अख़्लाक़ की रोज़-अफ़्ज़ूँ तरक़्क़ी है। गो रुहानियत की अभी बड़ी कसर है, जिसकी वजह ये है कि हिन्दुस्तान अभी मसीह के क़दमों पर नहीं पड़ा। मगर फिर भी मसीहिय्यत ने हर मज़हब और फ़िर्क़े में ख़मीर का सा अंदर ही अंदर ख़ूब असर किया हुआ है और बराबर असर करता जा रहा है। आज़ादी की सड़क पर हिन्दुस्तान ज़ोर से चल रहा है, क्योंकि हिन्दुस्तान में “ख़ुदावंद का रूह है, वहाँ आज़ादी है।” बेशक रुहानियत की अभी बहुत कसर है, और वजह वही जो ऊपर मज़कूर हुई। मुफ़स्सिल ज़िक्र तवील है।

      “जहान का नूर” मसीह है, जो उसकी पैरवी करेगा वो अंधेरे में न चलेगा, बल्कि ज़िंदगी का नूर पाएगा।” चीन या जापान की रू भी इसी तरफ़ है। बरअक्स इसके उन ममालिक को देखो, जहाँ इंजील नहीं पहुँची और जहाँ के बाशिंदों ने अभी तक मसीह की पैरवी नहीं की। मसलन अफ़्ग़ानिस्तान, बलोचिस्तान, तिब्बत वगैरह।

      यूहन्ना बाब 9 की आयत 4, 5 वगैरह, “जिसने मुझे भेजा है, हमें उसके काम दिन ही दिन में करने ज़रूर हैं। वो रात आने वाली है जिसमें कोई शख़्स काम नहीं कर सकता। जब तक मैं दुनिया में हूँ, दुनिया का नूर हूँ।” यहाँ भी ये बातें सूरज पर मुतहक़्क़िक़ नहीं होतीं। अल्फ़ाज़ “हमें उसके काम करने ज़रूर हैं” और “रात–दिन” के ये म’अनी हैं कि एक वक़्त आ रहा है, यानी मसीह की वफ़ात के बाद, जबकि ऐसा मालूम होगा कि गोया शरारत की ताक़त का ग़लबा है। और यह वही “रात” होगी, जब मसीह का वो काम, जो वो बनी–नूअ–इन्सान की नजात के लिए करने को था, फिर नहीं हो सकेगा। इसी लिए उन्होंने फ़रमाया कि “हमें उसके काम दिन ही दिन में करने ज़रूरी हैं।” चुनाँचे उन्होंने अपने सारे काम पूरे किए, और जान देने से पहले फ़रमाया, “पूरा हुआ।”

      मसीह उस वक़्त मु’अय्यन हैं, जिसको यहाँ “दिन” से ताबीर किया है। अगर वो काम न करते, तो उसी के लिए “वो रात” आ जाती जिसमें कोई शख़्स काम नहीं कर सकता।” जैसा कि लाज़र को मुर्दों में से जिलाने से पहले मसीह ने बताया था कि “क़ियामत और ज़िंदगी मैं हूँ”, वैसा ही वो इस वक़्त फ़रमाते हैं कि “रूहानी नूर का मस्ना और मंबा सरचश्मा मैं हूँ”, जिसका मख़ूज़ और माद्दी अलामत यह सूरज है। क्योंकि रूहानियत को माद्दियत पर तक़द्दुम बिल–ज़ात, तक़द्दुम बिल–ज़मान और तक़द्दुम बिल–असर सभी तरह से हासिल है, न कि बिलअक्स (इसका उलट)।

      जिस तरह माद्दी आलम में “आफ़ताब” दुनिया का नूर है, और इंसान को चाहिए कि दिन ही को अपने काम कर ले, और ऐसा ही होता है, क्योंकि रात के वक़्त कोई काम नहीं कर सकता, क्योंकि जब तक वो दुनिया में है, वो दुनिया का नूर है। उसी तरह जिसने हमें इस दुनिया में भेजा है, “हमें उसके काम इसी ज़िंदगी में, जो “दिन” है, करने ज़रूर हैं। हाँ, वो “रात” आने वाली है”, यानी “मौत आने वाली है”, जिसमें कोई शख़्स काम नहीं कर सकता। जब तक वो इस ज़िंदगी में हमारे साथ है, वो हमारी ज़िंदगी की दुनिया का नूर है।

      मेरे मुअज़्ज़िज़ और मुहतरम दोस्त ख़्वाजा कमाल–उद–दीन साहब! मैं आपसे बिल–ख़ुलूस–ए–क़ल्ब और नेक नीयती से अर्ज़ करता हूँ कि जिसने आपको भेजा है, आपको उसके काम दिन ही दिन में करना ज़रूरी है। वो “रात” यानी “ज़िंदगी का ख़ातिमा, या मौत”, आने वाली है जिसमें कोई काम नहीं कर सकता।” जब तक आप ज़िंदा हैं, आप दुनिया में हैं, और ख़ुदावंद मसीह “दुनिया का नूर” है। आइए, देर न कीजिए। उस नूर से मुनव्वर हो जाइए। आफ़्ताब–ए–सदाक़त के पास तशरीफ़ लाइए। उस सूरज की परस्तिश से, जिसके पीछे आप पड़े हुए हैं और जिसकी वकालत कर रहे हैं, आपको क्या फ़ायदा?

      यूहन्ना 1 बाब आयात 9, 10, “हक़ीक़ी नूर जो हर एक आदमी को रोशन करता है, दुनिया में आने को था। वो दुनिया में था, और दुनिया उसके वसीले से पैदा हुई, और दुनिया ने उसको न पहचाना।” आख़िरी फ़िक़रा जो तह्त-उल-ख़त है, उसको ख़्वाजा साहब ने छोड़ दिया है, शायद इसलिए कि इस फ़िक़रे से आपका मतलब पूरा न होता था। क्योंकि “वो हक़ीक़ी नूर नहीं है, और न ही उसकी बाबत ये कहा जा सकता है कि वो “दुनिया में आने को था”, क्योंकि जैसा आप ख़ुद फ़रमाते हैं और है भी दुरुस्त, सूरज ही आठों पहर दुनिया में है।” और आख़िरी ज़र्ब आप के सूरज पर ये फ़िक़रा है जो आप छोड़ गए कि “और दुनिया ने उसे न पहचाना।” इस माद्दी दुनियावी सूरज को तो दुनिया ने ख़ूब पहचाना। हत्ता कि उसका हुजुम, उसके अज़्ज़ा-ए-तर्कीबी, उसकी आतिश के शोलों की बुलंदी, ज़मीन और दीगर सय्यारों से उसकी दूरी और उन पर तासीरात, उसकी रफ़्तार वग़ैरह-वग़ैरह को ख़ूब जाना है। और उसकी बाबत रोज़-रोज़ तहक़ीक़ात हो रही हैं। आज इल्मी दुनिया में कोई नहीं कह सकता कि “दुनिया ने उसे न पहचाना।”

      मुक़ाम महुव्वला बाला का फ़िक़रा फ़िक़रा सय्यदना मसीह पर सादिक़ आता है, न कि आपके सूरज देवता पर जिसकी आप वकालत कर रहे हैं। मसीह “हक़ीक़ी नूर” है। हर क़िस्म का नूर जो इस माद्दी दुनिया में है, ख़्वाह वो नूर-ए-अक़्ल और नूर-ए-अख़्लाक़ हो, ख़्वाह रुहानी नूर या नूर-ए-मज़्हब हो। ये सब नूर या रौशनी जो दुनिया की ज़ी-अक़्ल और ज़ी-रूह मख़्लूक़ यानी इन्सान को हासिल हैं, ख़्वाह वो नूर हो जो हमारे सूरज में मौजूद है, क्योंकि वो भी “दुनिया” ही में शामिल है। सब के सब नूर उसी “हक़ीक़ी नूर” से अपना नूर हासिल करते हैं, क्योंकि “दुनिया उसके वसीले से पैदा हुई है।” वो नूर दुनिया में था। यानी कोई ऐसा ज़माना नहीं कि ये कहा जा सके कि वो दुनिया में नहीं है। “वो दुनिया में था।” यानी दुनिया के हर मज़्हब में था, कोई मज़्हब उस नूर के नूर से ख़ाली नहीं। मगर “दुनिया ने उसे न पहचाना।” ये दुनिया का क़सूर है, न कि नूर का। मसीहियत क़दीम से आलमगीर है, अगरचे दुनिया ने मसीहिय्यत को जो उसमें थी न पहचाना, जैसे नैनवा, मिस्र, यूनान, हिन्दुस्तान वग़ैरह के मज़ाहिब में है।

      चूँनाँचे ख़्वाजा कमालुद्दीन साहब ने “यनाबिअ-उल-मसीहिय्यत” में मुफ़स्सिल बयान कर दिया है। ख़ुदा उनका भला करे कि ऐसा ख़ज़ाना हमारे हाथों में दे दिया। “वही दुनिया में आने को था।” यानी मुजस्सम होने को था। “वो अपने घर आया और उसके अपनों ने उसे क़ुबूल न किया।” यानी वो दुनिया में आया जो उसका घर है, मगर अफ़सोस कि “उसके अपनों ने उसे क़ुबूल न किया।” मगर ये सब पर सादिक नहीं आता, क्योंकि बहुतों ने उसे क़ुबूल कर लिया। इसी लिए आगे लिखा है कि “लेकिन जितनों ने उसे क़ुबूल किया, उसने उन्हें ख़ुदा के फ़र्ज़न्द बनने का हक़ बख़्शा।” इन्सान मसीह ही को क़ुबूल करके, यानी उस पर दिल से ईमान लाकर, ख़ुदा के फ़र्ज़न्द बनने का हक़ हासिल करता है। यही “सर-ए-नौ” या “ऊपर से पैदा होना” है, जिसके बग़ैर इन्सान “ख़ुदा की “बादशाहत को देख नहीं सकता”, ख़ुदा की बादशाहत में दाख़िल नहीं हो सकता।”

      प्यारे भाई! आइए, तशरीफ़ लाइए। उस हक़ीक़ी नूर को पहचानिए, “जो हर एक आदमी को रोशन करता है”, वो दुनिया में आने को था, और दुनिया उसके वसीले से पैदा हुई, और दुनिया ने उसे नहीं पहचाना।” आज क़रीब दो हज़ार बरस हुए कि वो “मुजस्सम हुआ” और अपनों के पास आया। जो उस पर ईमान लाता है, उसे ख़ुदा के फ़र्ज़न्द होने का हक़ बख़्शा जाता है।

      अब रही चौथी बात, यानी “सूरज की चौथी कैफ़ियत” सो इस की बाबत, इतना कहना काफ़ी होगा कि ये भी सय्यदना मसीह के सलीबी वाक़ि’आत पर निज़ाम-ए-शम्सी की शहादत और तस्दीक़ है:

“आस्मान ख़ुदा का जलाल बयान करते हैं और फ़िज़ा उसकी दस्तकारी दिखाती है। एक दिन दूसरे दिन से बातें करता है, और एक रात दूसरी रात को मारफ़त बख़्शती है। उनकी कोई लुग़त और ज़बान नहीं, उनकी आवाज़ सुनी नहीं जाती। पर सारी ज़मीन में उनकी तार गूँजती है, और दुनिया के किनारों तक उनका कलाम पहुंचता है। उनमें उस ने आफ़्ताब के लिए ख़ेमा खड़ा किया है, जो दूल्हे की मानिंद ख़ल्वत-ख़ाने से निकल आता है और पहलवान की तरह मैदान में दौड़ने से ख़ुश होता है। अफ़्लाक के किनारे से उसकी बरामद है और उसकी गर्दिश उनके दूसरे किनारे तक होती है, उसकी गर्मी से कोई चीज़ छिपी नहीं।” (ज़बूर 19:1–6)

      ये मुक़ाम जहाँ एक तरफ़ नास्तिकों को, जो देखते हैं कि आस्मान हैं, पर ख़ुदा की हस्ती से इन्कार करते हैं,, जो असर के तो क़ाइल हैं मगर उसके सबब के क़ाइल नहीं, ख़ुदा का क़ाइल करता है।

      वहाँ दूसरी तरफ़ बुत-परस्तों की बेवक़ूफ़ी उन पर ज़ाहिर करता और बताता है कि तुम्हारे ख़यालात बातिल हैं, और तुम्हारा सूरज देवता कुछ नहीं, मगर वो भी उसी ज़िंदा और क़ादिर-ए-मुतलक़ का ही जलाल ज़ाहिर करता है। तुम उसे छोड़कर सूरज की परस्तिश करते हो, हालाँकि उसी ख़ुदा ने ही उसको भी और सारे अज्राम-ए-फ़लक़ी को नूर दिया है, वो उसके मुहताज हैं। वहाँ तीसरी तरफ़ शम्स-परस्तों और शमासी तबीअत वालों को ये तालीम देता है कि आफ़्ताब जो बुर्ज अक़्रब में आकर कमज़ोर पड़ जाता है, “यानी आफ़्ताब पर देव-ए-ज़ुल्मत उसी वक़्त ग़ालिब आता है, जब वो बुर्ज-ए-अक़्रब में जाता है”, तो ये उसी आफ़्ताब-ए-सदाक़त के मस्लूब हुए कि वक़्त थोड़े अर्से के लिए जंग करते हुए मग़्लूब होकर फ़त्ह पाकर अज़-सर-ए-नौ अपने पूरे जलाल में ज़ाहिर हो जाने का अक्स-पेशीनी है, जो आसमान में है। उसकी असली सूरत मसीह है, जो सलीब पर मस्लूब हुआ, “ताकि मौत के वसीले से उसको जिसे मौत पर क़ुदरत हासिल थी, यानी इब्लीस, को तबाह कर दे” (इब्रानियों 2:14) और “उसके कामों को मिटाए।” (1 यूहन्ना 3:8)

      फिर सफ़्हा 101 पर ख़्वाजा साहब सूरज-देवता की बाबत लिखते हैं कि “सूरज को ही देख लिया जाये। जिससे हमारे कुल के कुल जिस्मानी मुफ़ाद वाबस्ता हैं। इसकी रोशनी और गर्मी हमारी सब तक्लीफ़ात का इलाज करती है। अब उसका घटना-बढ़ना अगर उसकी तकलीफ़ व राहत समझ लिया जाये, उसका गहन में आ जाना उसकी सुकरात मौत क़रार दी जाये, और उसे ख़ुदा मान लिया जाये, जो इन्सानी जामा में ज़मीन पर आये, तो क्या वो अपनी मौत और तक्लीफ़ को बर्दाश्त करके नस्ल-ए-इन्सानी को नजात नहीं देता।”

      इबारत तह्त-उल-ख़त क़ाबिल-ए-ग़ौर है। इस इबारत के पहले-पहले जो कुछ ख़्वाजा साहब ने कहा है, वो सूरज की बाबत जिस्मानी तौर पर दुरुस्त है। बेशक इन्सान के तमाम जिस्मानी मुफ़ाद का इन्हिसार सूरज की कैफ़ियात-ए-मुख़्तलिफ़ा पर है। “लेकिन क्यों उसे ख़ुदा मान लिया जाये, जो इन्सानी जामा में ज़मीन पर आये?” आखिर उसे ख़ुदा मान लेने की वजह तो होनी चाहिए।

      हाँ, अगर ख़्वाजा साहब शम्स-परस्तों के हम-अक़ीदा होना चाहते हैं और जो ख़ुदा नहीं, उसको ख़ुदा मान लें, तो ये और बात है। हम ख़्वाजा साहब को भी शम्स-परस्तों में शुमार कर लेंगे जिनकी वकालत वो कर रहे हैं। यही और इसी क़िस्म की और बातें भी तो हैं जिनसे “इंसानों ने इस मुसन्नफ़ा और पाकीज़ा पानी को, जो वह्यी इलाही की शक्ल में ख़ुदा की तरफ़ से यकसाँ सब के लिए नाज़िल हुआ, मुख्तलिफ़ आमेज़शों से गदला कर दिया।” यही तो “हक़ीक़ी रास्ते से दूर चले जाना” था। इंसान की मुश्रिकाना तबीअत ने इलाहियात छोड़ कर हर एक मज़हर-ए-क़ुदरत को बुत-परस्ती के रंग में रंग दिया। उन लोगों को अव्वल तो हक़ाइक़ भी मुश्रिकाना रंग में नज़र आ रहे थे। और अगर सफ़ाई दिमाग़ ने हक़ाइक़ को असली रंग में देख भी लिया, तो जिस ज़बान में इज़्हार करना था, वो मुश्रिकाना थी।

      क्या हमारे मु’अज़्ज़िज़ दोस्त भी उन्हीं की पैरवी में तो ये नहीं कह रहे कि “अगर उसे ख़ुदा मान लिया जाये जो इंसानी जामा में ज़मीन पर आए?” जनाब-ए-मन, उन्हों ने हक़ाइक़ को असली रंग में तो देख भी लिया, “मगर उस से दूर चले गए।” अब हमारा काम ये है कि इन “मुख़्तलिफ़ आमेज़िशों”, “मुश्रिकाना रंग”, “मुश्रिकाना तबीअत” को दूर कर दें, “और हक़ाइक़ को असली रंग में” पेश करें। और वो मसीह है, जिस पर सूरज की मुख़्तलिफ़ कैफ़ियात शहादत देती और दलालत करती हैं।

      मुझे तो बहुत ही अफ़सोस आता है कि वकील साहब सूरज-परस्तों की वकालत करते हुए मान रहे हैं कि सूरज ख़ुदा है और कि वो जामा-ए-इंसानी में ज़मीन पर आ गया। हमने देवी-देवताओं के क़िस्से सुने हैं कि फलाँ देवता इंसानी रूप धारण कर ज़मीन पर आ गया, मगर यह कभी नहीं सुना था कि सूरज जामा-ए-इंसानी पहन कर ज़मीन पर आ जाए। ख़ैर, अच्छा है, वो हक़ वकालत तो अदा कर रहे हैं। मंसबी फ़र्ज़ अदा करना भी किसी का काम है। जैसा गुरु वैसा चेला। जब शम्स-परस्तों ने सूरज को ख़ुदा मान लिया, तो अगर आप उनकी वकालत में उसको ख़ुदा न मानें, तो उनकी वकालत ही किस तरह कर सकते हैं? वुक़ला का तो अक्सर काम ही यही है।

      अब मैं सिर्फ़ एक और बात का ज़िक्र करके इन पुरानी कहानियों को ख़त्म करता हूँ। यानी अशा-ए-रब्बानी की बाबत, जो वकील साहब के अल्फ़ाज़ों में यूँ है:

“बहरहाल, अशा-ए-रब्बानी के मुतअल्लिक़ जो अक़ीदा ईसाइयों का है, उस अक़ीदे से पुरानी दुनिया ख़ाली न थी। अशा-ए-रब्बानी की रोटी और शराब गोया जनाब मसीह के जिस्म और ख़ून की यादगार है, जिसे चखकर एक परस्तार का जिस्म और ख़ून मसीह का जिस्म और ख़ून हो जाता है। इसी तरह मसीह के ख़ून से इंसान के गुनाहों का धुल जाना भी एक पुरानी बात है। डायूनीस के ख़ून से भी इंसानों की पाकीज़गी होती थी।” (पेगन ऐंड क्रिस्चन क्रीड, सफ़्हा 65)

“क़दीमी मिस्री ओसीरस के दुबारा ज़िंदा होने पर अशा-ए-रब्बानी की रस्म मनाते थे। मुक़द्दस रोटी खाई जाती थी, जिस पर काहिन पहले तक़्दीस देता था, जिससे वो ओसीरस का गोश्त हो जाती थी।” (The Great Law of Religion Origin, मुसन्निफ़ विलियम्सन, सफ़्हा 175) डॉक्टर फ़ीरनीयर अपनी किताब गोल्डन बाउ में एक अमरीकन का हाल लिखते हुए कहते हैं कि “वो लोग माह दिसंबर में अपने बड़े देवता का एक बुत ख़मीरी आटे से बनाते थे, फ़िर उसे तोड़कर खाते थे। किंग्ज़ बारू ने अपनी किताब के सफ़्हा 230 पर अहले मैक्सिको की अशा-ए-रब्बानी का ज़िक्र करते हुए लिखा है कि “ये लोग रोटी बनाते, फिर उस के टुकड़े करते और फिर उनका मज़्हबी पेशवा उसके छोटे-छोटे टुकड़ों को हर एक परस्तार के मुँह में डालता और उसे समझाता जाता था कि वे अपने ख़ुदा का गोश्त खा रहे हैं। ये तो ख़ैर पुरानी बातें हैं। आज भी चीनी लोग शराब को कन्फ़्यूशस की तीलियों से बने हुए मुजस्समे पर डालते हैं, फिर उस शराब को पीते हैं और ख़याल करते हैं कि कन्फ़्यूशस की बरकत उनमें आ गई। इसी क़िस्म की बातें चीनी तातारियों में आम तौर पर मिलती हैं, जिन्हें आज फ़ादर गॉर्डबर देखकर वही कहता है जो सदियों पहले शहीद जस्टिन ने कहा था: “मैं बड़े ज़ोर से कहता हूँ कि शैतान तातारियों में कैथोलिक कलीसिया की पूरी नक़्ल उतार रहा है।” हालाँकि न वहाँ कोई ईसाई गया न यूरोपियन, लेकिन वो लोग बिल्कुल कैथोलिक कलीसिया की बातें करते हैं। हत्ता कि अशा-ए-रब्बानी भी शराब और रोटी से बनाते हैं। ये बातें मैंने अपनी आँखों से देखी हैं।” (Introduction to the History of Religions, मुसन्निफ़ ज्युन, सफ़्हा 148, 219)

“ये मसअला कि इब्ने-आदम ने आकर नस्ल इन्सानी को गुनाह से नजात दी, कोई नया मसअला नहीं। जिन पेगन (मुश्रिक) देवताओं का मैं ऊपर ज़िक्र कर आया हूँ, मथुरा, होरस, हरकियुलिस, एडोनिस, इन सबकी माएं कुँवारी ही थीं। सब के सब मसीह की सी मौत से मरे या ख़ुद उन्होंने अपनी जान दी। इन सब के ख़ून ने लोगों के गुनाह धोए। ये सब के सब फिर जी उठे। नेपाल और तिब्बत में इंद्र देवता अपने ख़ून से ही इन्सान को नजात देता है। ये ख़ून ही आस्मानी बारिश है जो बारिश के देवता इंद्र के जिस्म से निकलकर ज़मीन के रहने वालों को हर मुसीबत से नजात देता है। दूसरी तरफ़ सूरज देवता के जिस्म से सुर्ख़ शुवाओं की शक्ल में ख़ून उतरकर ज़मीन को नई ज़िंदगी बख़्शता है। इस ज़िंदगी के बख़्शने के अय्याम ईस्टर के दिन से शुरू होते हैं, जिससे दो दिन पहले सूरज देवता बछड़े की शक्ल में यानी बुर्ज हमल में उस सलीब पर चढ़ता है जो उसकी सालाना हरकत का बैज़वी दायरा है और ख़त इस्तिवा पर बनाता है। मसीह ने ही पहले इन्सान के गुनाह सिर पर नहीं उठाए। जनाब बुद्ध ने भी एक मौक़े पर फ़रमाया है: “कुल दुनिया के गुनाह मुझ पर लाद दो ताकि दुनिया नजात पाए।” (तारीख़ संस्कृत लिट्रेचर, मुसन्निफ़ मैक्स म्युलर)

“सेकंडी न्युया का ख़ुदा, जो ख़ुद ही दरख़्त के ज़रिये से फांसी पर चढ़ा, वो कहता है, “मैं जानता हूँ कि मैं ख़ुद ही फांसी पर चढ़ा था। मुझको बिरछी चुभोई गई। मैंने ख़ुद अडन यानी अपने आप से ये कहा था कि मैं ऐसा करूँगा।” कृष्ण जी महाराज कहते हैं, “मैं ख़ुद ही क़ुर्बानी हूँ। ये जो लोग चढ़ावे चढ़ाते हैं, वो मैं ही हूँ।” इंद्र, सो, हरी और दूसरे देवता मुख़्तलिफ़ जानवरों की शक्ल में आकर नस्ल इन्सानी को बचाने के लिए क़ुर्बान होते हैं। शिवजी महाराज कहते हैं, “अस्ल चढ़ावे का जानवर तो मैं हूँ। जिसे तुम मेरे मज़बह पर ज़ब्ह करते हो, वो मैं ही हूँ।” बुध मला आ’ला से इन्सान को अज़ाब से बचाने के लिए दुनिया में जन्म लेता है और ये अल्फ़ाज़ कहता है, “मैं अगर इन्सानी जिस्म इख़्तियार कर रहा हूँ तो इसलिए नहीं कि कोई ऐश व इशरत करूँ, बल्कि इसलिए कि इन्सानों में पैदा होकर जिस्म और गोश्त (इन्सान) को तक्लीफ से बचाऊं, और उनके दुख-दर्द दूर करूँ।”

“चीन का माबूद तीन नाम दुनिया में इसलिए आया कि रास्तबाज़ी को क़ायम करे, नस्ल इन्सानी को बचाने के लिए और दुनिया को मौत से नजात देने के लिए। वो मरता है क्योंकि उसके नज़्दीक ख़ुदावंद के हुज़ूर इससे बेहतर क़ुर्बानी नहीं। (Religious Idea, मुसन्निफ़ प्रेग, जिल्द अव्वल, सफ़्हा 26) एडोनिस की मौत की याद की रस्म में बड़ा काहिन ये अल्फ़ाज़ कहता है, “अपने ख़ुदावंद पर ईमान लाओ, क्योंकि जो कुछ तकालीफ़ उसने सहीं वो हमारी ही नजात के लिए सहीं।” अल-गर्ज़, कुल के कुल ममालिक जो ज़माना-ए-क़दीम में कायनात और अनासिर की मुख़्तलिफ़ हैसियतों के परस्तार थे और उन्होंने कायनाती कैफ़ियात को ख़ुदा और देवते बना रखा था, उनमें से अक्सर सूरज परस्त थे।” (यनाबीअ-उल-मसीहिय्यत, सफ़्हा 98–101)

      मैंने ये तवील इक़्तिबास इसलिए किया है कि हमारे वाइज़ीन के पास क़दीम आलमगीर अक़ाइद का एक ख़ास्सा ज़ख़ीरा रहे, और वो भी मुख़ालिफ़ के क़लम से निकला हुआ। अगर मैं मुख़्तसर अल्फ़ाज़ में इसका ख़ुलासा लिखूँ तो यूँ होगा कि क़दीम ज़माने से दुनिया की तमाम अक़्वाम में गुनाह का एहसास, माफ़ी की ज़रूरत, सज़ा से बचने के लिए क़ुर्बानी की ज़रूरत, अपने आमाल पर नहीं बल्कि बचाने वाले पर ईमान की लज़ूमियत, कफ़्फ़ारे की ज़रूरत वग़ैरह, ये सब अक़ाइद आलमगीर हैं। रंगत मुश्रिकाना है, मगर हक़ीक़त यगाना है।

      और इस मसीही उसूल की उमूमियत की तस्दीक़ और ताईद हर ज़माने और मुल्क में होती है कि “बग़ैर ख़ून बहाए गुनाहों की माफ़ी नहीं।” (इब्रानियों 9:22) कामिल क़ुर्बानी वही है जो कि मरकर जी उठे। अक़ाइद तो ला-रेब (बेशक) तमाम अक़्वाम में क़दीम से चले आते हैं। मगर जिन हस्तियों का वो क़ौमें ज़िक्र करती हैं और जिन के साथ इन अक़ाइद को मन्सूब किया जाता है, वो ख़्वाजा साहब ही के बयान के मुताबिक़ तख़य्युल (ख्यालों) की हस्तियाँ थीं, दरअस्ल कोई तारीख़ी हक़ीक़त न थीं।

      “कायनात और अनासिर की मुख़्तलिफ़ हैसियतों ही के परस्तार थे और… उन्हीं को उन्होंने ख़ुदा और देवते बना रखा था।” तो इससे ये अम्र भी मुबर्हन (ज़ाहिर) होता है कि उनके अफ़आल भी, मसलन “ख़ुद ही दरख़्त के ज़रीये फांसी पर चढ़ना” या “जान दे देना”, (ऐसी बातें इन्हीं खयाली देवताओं से मन्सूब थीं) उन अक़्वाम के वहमियात और ज़हनियात में से थे, दरअस्ल कोई इस क़िस्म का फ़े’अल सादिर नहीं हुआ था। ग़रज़ कि ये काम किसी हस्ती से मा’रिज़-ए-अमल में ना आए थे, तो इस से ये बात भी साफ़ हो जाती है कि उन अक़्वाम के सिर्फ़ इस क़िस्म के अक़ाइद ही थे कि आइन्दा किसी ज़माने में ऐसा-ऐसा ज़हूर में आएगा। तो ये उनका ईमान हुआ जो वो किसी आने वाले नजात-दहिंदे पर रखते थे। तो फिर क्या उन अक़ाइद पर से “मुश्रिकाना रंग” नहीं उतर गया? क्या वो एक नजात-दहिंदे के मुंतज़िर ना थे? क्या ये मसीहिय्यत की क़दामत और उसका आलमगीर और मिंजानिब-अल्लाह होना न होगा? क्या ये कहना जायज़ ना होगा कि ये आरज़ू और उम्मीद का इदराक उनके अंदर ही ख़ुदा ही के इल्क़ा किए (डाले) हुए थे? अगर ना थे तो कहाँ से आए?

      क्यों वकील साहब, अगर वो सब “तख़य्युल की (खयाली) हस्तियाँ” हैं और उनके अफ़आल वहमयात (वहमों) से हैं, तो क्या आपके इस बयान में और इस से पहले की तमाम बयानात में तज़ाद (टकराव) पाया नहीं जाता? जहां आपने उनको ऐसे तौर पर बयान किया है जिससे उनकी तारीख़ी हस्ती का गुमान होता और ख़याल में आता है कि ये सब अफ़आल ज़रूर उनसे सरज़द हुए।

      मेरी दानिस्त में आपने दुरुस्त वकालत नहीं की। आख़िर में सिर्फ़ ये बता देना चाहता हूँ कि आपने जो अशा-ए-रब्बानी की बाबत लिखा है कि “जिसे चख कर एक परस्तार का जिस्म और ख़ून मसीह का जिस्म और ख़ून हो जाता है।” इस के लिए इंजील में से कोई हवाला नहीं दिया जिससे सराहतन या किनायतन आपकी मतलब-बरारी हो जाती। हमारा ना तो ये अक़ीदा है और ना ही कलाम-ए-मुक़द्दस में इस क़िस्म का कोई इशारा ही पाया जाता है। ये मह्ज़ अपनी “ख़ुश-एतिक़ादी” है, लिहाज़ा सदाक़त से मुस्ता’बद (बहुत दूर) है।

      अब आख़िर में मुझे इस बात पर ग़ौर करने की इजाज़त दीजिए कि ये बातें और ऐसे अक़ाइद और रिवायत तमाम मुतफ़र्रिक़ ममालिक में और तमाम मुतफ़र्रिक़ अक़्वाम में, जिनकी बोली अलग, जिनके दस्तुरात अलग, आबो-हवा अलग, मिज़ाज मुतफ़र्रिक़, ऐसे क़दीम ज़माने से लगातार किस तरह चले आए? ये अक़ाइद उनके दिलो-दिमाग में कहाँ से आ गए? सबब और असर का आलमगीर क़ानून तो दुनिया में हर जगह और हर काम में सायर और दायर (जारी) है। तो फिर क्या वजह कि ऐसे असरात तो मौजूद हों, मगर उनके अस्बाब ना हों? उन असली अक़ाइद पर “मुश्रिकाना रंग” और इसका सबब “मुश्रिकाना तबीअत” तो मान लिया, लेकिन उनके अंदर इन मो’तक़िदात का बानी कौन है? यनाबीअ-उल-मसीहिय्यत के मुसन्निफ़ ने इन सवालों के दो जवाब दर्ज किए हैं, एक क़दीम मसीही बुज़ुर्गों का जवाब, दूसरा ख़ुद अपना। पहले मैं क़दीम मसीही बुज़ुर्गों का जवाब वहां से नक़्ल करता हूँ। वो ये है:

“सेंट टरटोलेन लिखते हैं, शैतान का तो काम ही सदाक़त को रोकना है। चुनान्चे अशा-ए-रब्बानी को हूबहू नक़्ल वो अपने बुतों के मुताल्लिक़ कराता है। वो अपने पैरौओं को बपतिस्मा भी देता है, (और) उनसे वा’दा करता है कि मुक़द्दस हौज़ (जिसके पानी से बपतिस्मा दिया जाता है) से ही उन्हें गुनाह की माफ़ी मिलेगी। बपतिस्मा के ज़रीये वो उन्हें मज़्हब मथुरा में दाख़िल करता है। इसी तरह उनकी पेशानी पर निशान करता है। रोटी की तक़्दीस भी करता है। दुबारा जी उठने का भी एक निशान क़ायम करता है, यानी अपने परस्तारों को पानी से बपतिस्मा देकर उन्हें गुनाहों से पाक करता है। वो हुक्म देता है कि उसके बड़े पादरी तो एक शादी करें, लेकिन उसके हाँ कुंवारियां भी हैं और राहिब भी हैं।”

“जस्टिन मार्टर फ़र्माते हैं, “रसूलों ने जो तफ्सीरें लिखीं, जिन्हें हम इंजील कहते हैं और वे हम तक पहुंची हैं। उन में मसीह रसूलों को हुक्म देता है, “फिर उसने (मसीह ने) रोटी ली और ख़ुदा का शुक्र किया और कहा कि “इस बात को मेरी याद में करते रहना, ये मेरा जिस्म है।” फिर उस ने पियाला लिया और शुक्र अदा किया और कहा कि “ये मेरा ख़ून है,” और पियाला उनको दिया। ये सारी बातें ख़बीस रूहों ने मथुरा को सिखा दी हैं और मथुरा की याद में उसकी परस्तिश में हो रही हैं। फिर मसीह की पैदाइश का, जो तवीले में हुई, हवाला देते हुए यही राहिब लिखता है कि “बेशक मसीह की पैदाइश उसी दिन हुई है जिस दिन तवीला औजेन में सूरज पैदा हुआ। बल्कि मसीह की पैदाइश जो तवीले में हुई, तो ये दरअस्ल मथुरा की पैदाइश का नमूना है जो ज़रतशती ग़ार में हुई।” सेंट अगस्टेन किसी क़द्र फ़ख़्र के साथ फ़र्माते हैं, “हम क्रिसमस के दिन को कुफ़्फ़ार की तरह नहीं मनाते, जो उनके हाँ की पैदाइश का दिन है, बल्कि हम तो उसी दिन को इसलिए मनाते हैं कि उस दिन सूरज का पैदा करने वाला पैदा हुआ।” (सफ़्हा 83, 84)

      फिर अपना जवाब यूँ लिखते हैं,

“ऐसी ही और बहुत-सी बातें किस तरह दुनिया में पैदा हो गईं, या ये रिवायत एक ही ख़त-व-ख़ाल में क्यों मुख़्तलिफ़ ममालिक में दायर व सायर (जारी) हो गईं, हालाँकि उनमें मैक्सीको भी है जो दीगर ममालिक से कई समुन्दर पार है। इस पर यूरोपियन मुसन्निफ़ीन ने हैरत भी ज़ाहिर की है, लेकिन ये सब की सब बातें ज़ेल के उमूर मद्द-ए-नज़र रखने से हल हो जाती हैं। आलम-ए-हैवानात में इन्सान ही वो ज़ी-रूह वजूद है जो अपने से बड़ी हस्ती का तब’अन परस्तार है। नफ़ा व नुक़सान या राहत व तकलीफ़ जिसका पेश-अज़-वक़्त एहसास भी इदराक-ए-इन्सानी तक ही मख़सूस है। ये दोनों बातें उसकी गर्दन उन के आगे झुका देती हैं, जिनसे उसे नफ़े की उम्मीद या नुक़सान का ख़तरा हो। बुत-परस्ती की कुल रिवायत को देख लिया जाये, उन सब की तह में यही दो बातें हैं। सरस्वती देवी और काली माई की परस्तिश भी नफ़ा व नुक़सान ही के झगड़े हैं।”

“ख़ुदा त’आला की बनाई हुई चीज़ों में से, चीज़ें इन्सान की सरसरी निगाह ने नफ़ा व राहत का बाइस देखीं, वही ऐसे वक़्तों में जबकि इल्हाम-ए-इलाही इन्सानी हाथों से मग़शूश (मिलावट) हो गया, इन्सान का रब और हादी बन गईं। बिल-मुक़ाबिल वो वजूद या वो वाक़ि’आत जो मुख़िल-ए-नफ़ा व राहत हुए, वही शैतान या उनके ख़ुदाओं के दुश्मन कहलाए। बा’ज़ गर्दनें उनके आगे भी झुक गईं। अब अगर इन तमाम चीज़ों को ख़ुदा की मख़्लूक़ ना माना जाये, और मज़ाहिर-ए-कुदरत को ही मुख़्तलिफ़ ख़ुदा और गिरोह-ए-शयातीन मान लिया जाये, जैसे कि इस्लाम से पहले कुल मज़ाहिब-ए-बातिला ने माना, तो तमाम मज़ाहिब-ए-कुदरत में अगर कोई वजूद व रब बल्कि रब-उल-अर्बाब कहलाने का मुस्तहिक़ है, तो वही नय्यर-ए-आज़म आफ़्ताब है।” (सफ़्हा 86, 87)

      इन हर दो मज़्कूर बाला रायों में से पहली राय मेरी दानिस्त में क़ाबिल पज़ीराई नहीं। क्योंकि जब “शैतान का तो काम ही सदाक़त को रोकना है।” तो किसी मसीही रस्म या अक़ीदे की “हूबहू नक़्ल” करना “उन को रोकना” नहीं हो सकता। बल्कि फैलाना और उन का लोगों के दिलों में यक़ीन जमाना होगा। क्योंकि किसी फ़ेअल बाबत को रोकने के ये म’अनी हैं, कि उस को ना होने देना। या लोगों को उस पर यक़ीन कर लेने और उस की पैरवी करने से बाज़ रखना और उसके ख़िलाफ़ अमल करने पर आमादा करना। क्योंकि शैतान का काम हमेशा ख़ुदा की मुख़ालिफ़त करना है। और लफ़्ज़ शैतान के भी यही म’अनी हैं ये अजीब बात है कि अख़्लाक़ी उमूर में तो वो ख़ुदा के अहकाम की मुख़ालिफ़त करता है उस के अहकाम की लोगों से ख़िलाफ़वर्ज़ी करवाकर। मसलन चोरी ना करना ख़ुदा का हुक्म है। मगर वो जो चोरी की तहरीक देकर और चोरी करवाकर लोगों से उसके हुक्म की ख़िलाफ़वर्ज़ी कराता है। मगर नजात के तमाम सिलसिले की बातों को क़दीम से तमाम अक़्वाम में फैलाते आना। और उन बातों पर उनका यक़ीन क़ायम करते रहना को भी “रोकना” या दूसरे लफ़्ज़ों में मुख़ालिफ़त करना कहा जाये तो उस की बनिस्बत मेरी दानिस्त में अगर ये कहा जाये, कि “शैतान का तो काम ही सदाक़त को फैलाना है।” तो ज़्यादा मौज़ूं होगा। गो उस में उस की ग़र्ज़ दुरुस्त ना हो। लेकिन ये तो अव्वल शैतान की ग़र्ज़ और आदत के ख़िलाफ़ होगा। या दूसरी इबारत में उनका ये मतलब हुआ कि वो अपना मुख़ालिफ़ आप ही है, तो ये भी दुरुस्त नहीं, जैसा कि सय्यदना मसीह ने भी फ़रमाया है, “अगर शैतान अपना ही मुख़ालिफ़ आप ही हो जाए तो उस की बादशाहत किस तरह क़ायम रह सकती है।” फिर अगर ये नहीं तो वो मसीहिय्यत का मुनाद हुआ शैतान ना हुआ। और तरफ़ा ये कि मसीह से पेश्तर का मुनाद और शरीअत की मुनादी से बढ़कर मुनाद, क्योंकि वहां तो पेशीनगोईयां वग़ैरह होती हैं। मगर यहां ऐसे तौर पर कि गोया सब कुछ ज़हूर में आ गया। मगर यह भी दुरुस्त नहीं। लिहाज़ा ये जवाब ही दुरुस्त नहीं।

      इसी तरह मेरी दानिस्त में दूसरी राय या “हल” भी मौज़ूँ और क़रीन-ए-अक़्ल नहीं, क्योंकि वो तमाम उमूर अपने हाँ नफ़ा व नुक़सान या राहत व तकलीफ़ से ताल्लुक़ रखते हैं और जिस्मानी बातें हैं। आइन्दा ज़िंदगी और नई ज़िंदगी या नजात से उनका कुछ ताल्लुक़ नहीं। ऐसा तो जो लोग ख़ुदा-परस्त हैं, वो भी “अपने से बड़ी हस्ती” के आगे अपनी गर्दन झुका देते हैं, मगर यहां तो मुआमला ही उसके बरअक्स दगरगूँ है। यानी आइन्दा ज़िंदगी में इस ज़िंदगी के गुनाह व सवाब का ख़याल, गुनाहों की माफ़ी और नजात की आरज़ू और उनके मुताल्लिक़ा उमूर व वाक़िआत।

      अगर इन बातों का एहसास और इदराक तबअन इन्सान के अंदर पाया जाता है और उन ज़रूरतों को तबअन महसूस करके वो नय्यर-ए-आज़म आफ़्ताब को इन मक़ासिद के लिए अपना रब बना लेते हैं, तो उनसे ये अम्र तंक़ीसी सादिर होता है। यानी ये कि ऐसे ख़यालात और ज़रूरत जो तबअन इन्सान को महसूस हुईं, वो कहाँ से आईं? अगर ये इन्सान की माद्दी तर्कीब के साथ ही और उसी में से पैदा हुईं, जैसे भूक, प्यास और दीगर तमाम माद्दी ताक़तें और ज़रूरतें (यानी खारिज (बाहर) से) उसके अन्दर दाख़िल नहीं हुईं, तो ख़ुदा के सिवा, उनमें इन एहसासात को वदीअत करने वाला और कोई नहीं हो सकता। इस सूरत में उन तमाम बातों की अस्ल, दुनिया की तमाम क़दीम क़ौमों में “इल्हाम-ए-इलाही” से दायर और सायर (जारी) हुईं। मगर वो “इल्हाम-ए-इलाही इन्सानी हाथों से मग़शूश (मिलावट) हो गया।” इस को गश की हालत से सही व सलीम हालत में ले आना भी “इन्सानी हाथों” ही का काम है, मगर ज़रिया और वो ख़ुदा की रूह की मदद और किताब-ए-मुक़द्दस का ख़ुलूस-ए-क़ल्ब से मुतालआ और खोज़ करने ही से हो सकता है। “मुश्रिकाना रंग” उतार दो तो अस्ल इल्हाम-ए-इलाही निकल आएगा, जो सहीफ़ा-ए-फ़ित्रत, ज़मीर-ए-इन्सानी के तक़ाज़े और किताब-ए-मुक़द्दस के मुताबिक़ है।

      सूरज से इस जहान के नफे व ज़रर (नुक़सान) हो सकते हैं और हो भी रहे हैं, मगर इस ज़िंदगी के बाद किसी दूसरी ज़िंदगी में इसका कुछ भी दख़ल या ताल्लुक़ नहीं। ये एक बदीही (साबित) अम्र है। इसलिए उन अक़्वाम का दूसरी ज़िंदगी के मतलब से “नय्यर-ए-आज़म” आफ़्ताब को ख़ुदा या नजात-दहिंदा मानना, बुत-परस्ती या शम्स-परस्ती है। इसी और इसी के मुताल्लिक़ दीगर उमूर वो मुख़्तलिफ़ इन्सानी आमेज़िशें हैं जिन्हों ने “उस मुसफ्फ़ा और पाकीज़ा पानी को, जो वह्यी इलाही की शक्ल में ख़ुदा की तरफ़ से सब के लिए यकसाँ नाज़िल हुआ, गदला कर दिया।”

      ये मेरी यही राय है, जो कलाम-ए-इलाही के मुताबिक़ है और जिसका ज़िक्र मैं पहले मज़्मून में किसी जगह कर आया हूँ। यहां उसको दोहराने की ज़रूरत नहीं। और अगर वो ये सब कुछ जिस्मानी नफ़ा व ज़रर (नुक़सान) के बीम व रजा से किया करते थे, तो वो अक़्ल के और तजुर्बात रोज़मर्रा के ख़िलाफ़ और फ़ुज़ूल था। ये तो एक बदीही (साबित-शुदा) अम्र है कि वो सूरज के रोज़मर्रा के तासिरात से महफ़ूज़ हरगिज़ नहीं रह सकते थे और ना ही उसके तासिरात और अमल की मुख़ालिफ़त ही कर सकते थे। और अगर करते तो फ़ौरन बर्बाद हो जाते। ये तो तक़्दीर-ए-मुबर्रम है, या आपके कहने के मुताबिक़, ये वही “इस्लाम” है जिसकी आस्मान व ज़मीन की हर एक चीज़ तौअन व करहन (ख़ुशी या ना-ख़ुशी) इताअत करती है, जिसकी बाबत आप ख़ुद फ़र्माते हैं कि “कोई है जो इस सदाक़त से अमलन इन्कार करे और आन-ए-वाहिद में उसकी ज़िंदगी का ख़ातिमा ना हो।”

      क़वानीन-ए-तबई की ख़िलाफ़वर्ज़ी की ना तो तौबा है, ना माफ़ी, ना वो किसी के कफ़्फ़ारे से दूर हो सकती है, और ना ख़ुशू’अ् व ख़ज़ू’अ् से। इसके मुताल्लिक़ ना तो ईमान रखने से कुछ फ़ायदा पहुंच सकता है, ना ईमान ना रखने से कुछ ज़रर (नुक़सान) पहुंच सकता है। ये सारी बातें तो रोज़मर्रा के मुशाहदात और तजुर्बात हैं। इन तमाम उमूर की बाबत यक़ीनात रखते हुए उनका ऐसा-ऐसा करना फ़ुज़ूलियात से था जिसकी कुछ वक़अत नहीं। लेकिन अगर ये बातें रूहानियत से थीं, तो आपका ये कहना बिल्कुल दुरुस्त है कि:

“जब अल्लाह त’आला ने एक ही चीज़ से नस्ल-ए-इन्सानी की जिस्मानी परवरिश की, तो ये भी ज़रूरी था कि रूहानी परवरिश भी एक ही तरीक़े से, एक ही चीज़ से हो।” (सफ़्हा 2)

      चुनान्चे ऐसा ही हुआ। जैसा कि आगे चलकर ख़्वाजा साहब ही की तहरीर से दिखाऊँगा कि किस तरह से ख़ुदा ने ईरान, बाबिल, फ़रिहिया या सिरिया, कार्थेज, यूनान, रोमा, मिस्र, मैक्सीको की क़दीम क़ौमों की एक तरफ़ और यहूदी, मसीही और मुहम्मदी क़ौमों की दूसरी तरफ़, रुहानी परवरिश भी एक ही तरीक़े से और एक ही चीज़ से की। हाँ, फ़र्क़ सिर्फ इतना है कि उन क़ौमों ने इस “मुसफ़्फ़ा और पाकीज़ा पानी को… मुख़्तलिफ़ आमेज़िशों (मिलावटों) से गदला कर दिया।” (सफ़्हा 3) और मुहम्मदी क़ौम ने अपने हाथों से उसे मग़शूश (मिलावटी) कर दिया। और यहूदी क़ौम ने आँख रखते हुए भी अभी तक उसे देखा ही नहीं। मगर मसीही मज़्हब ही दुनिया में वो वाहिद मज़्हब, वो मज़्हब-ए-हक़्क़ा है; वो सच्चा इस्लाम है, वो एक ही चीज़ है, वो एक ही तरीक़, जिसके उसूल क़दीम और आलमगीर हैं। जो इन्सान के एहसास-ए-बातिनी और इक़्तज़ा-ए-रुहानी के बिल्कुल पूरा करने वाले हैं, और जिनका ज़हूर हक़ीक़ी तारीख़ी वाक़ियात में इन्सान पर हो गया। मसीही मज़्हब ही वो मेयार है जिसकी रौशनी में वो क़दीम, यगाना, आलमगीर इस्लाम के उसूल की शनाख़्त हो जाती है, जो मज़्कूरा बाला दस और दीगर अक़्वाम के मज़ाहिब में नहीं आ सकती।

मसीही फ़ल्सफ़ा और कलीसी मुस्तलहात


      ख़्वाजा साहब का ये मज़्मून किताब यनाबीअ-उल-मसीहिय्यत में 17 सफ़हात में आया है। मगर सिर्फ दो बातें पेश की हैं, यानी फ़ल्सफ़ा-ए-कलाम और फ़ल्सफ़ा-ए-तस्लीस। एक की बाबत बताया है कि वो हकीम फ़ाईलो से लिया गया है, और दूसरा अफ़लातून का या यूनानी फ़ल्सफ़ा है। और इन हर-दो के फ़ल्सफ़े का कुछ तो मुख़्तसरन इक़्तिबास है और कुछ अपनी इबारत में उनका बयान। तकरार-ए-कलाम और ग़ैर-मुताल्लिक़ा उमूर भी पाए जाते हैं। मैं अपना क़ीमती वक़्त और मेहनत को फुज़ूलियात में सर्फ (खर्च) नहीं करना चाहता, इसलिए सिर्फ इतना ही इक़्तिबास करूंगा जिससे ये दोनों तालीमात बख़ूबी ज़ाहिर हो जाएँ, और फिर सिर्फ ये बताऊंगा कि इंजीली फ़ल्सफ़ा इन दोनों से अलग है। पहले मैं फ़ाईलो हकीम की तालीम का इक़्तिबास करूंगा और उसका मुक़ाबला यूहन्ना के फ़ल्सफ़े से करूंगा। फ़ाईलो की बाबत और उसका फ़ल्सफ़ा हस्ब-ए-ज़ैल है:

      “ये इस्राईली फ़ल्सफ़ी बहुत-सी किताबों का मुसन्निफ़ है। ये अपने वक़्त का एक मुक़्तदिर इन्सान था। बल्कि एक दफ़ा यहूदियान-ए-सिकंदरिया की तरफ़ से सफ़ीर होकर कीली ग्युला क़ैसर-ए-रूम के दरबार में भी गया था। मसीह की पैदाइश से एक ही नस्ल पहले पैदा हुआ था। इसकी तसानीफ़ की चंद किताबों से ज़ेल के इक़्तिबास लेता हूँ।

“ख़ुदा-ए-अबदी का अबदी कलाम ही तमाम चीज़ों की बुनियाद है।” (De Plantatione N.1:331) “कलाम ही ख़ुदा की तस्वीर है। कुल ज़ी-अक़्ल मख़्लूक़ से वही पहले पैदा हुआ। वो ख़ुदा-ए-वाहिद के साथ बग़ैर किसी फ़र्क़ के बैठा हुआ है।” (De Profugis 1:561,16) “वही उसका पहलौठा बेटा है।” (De Agricultura 1:308) “ख़ालिक़-ए-कायनात ने अपने कलाम को, जो आस्मान में सबसे क़दीम व आ’ला है, ये इज़्ज़त दी कि वो ख़ालिक़ व मख़्लूक़ में सिफ़ारशी या शफ़ी ठहरे।” (Quis Rerum Divinarum Heres Sit 1:501) “लिहाज़ा कलाम ही तमाम फ़ानी चीज़ों के लिए (ख़ुदा के आगे) वकील है।” (ibid. 502) “वही कलाम इन्सान का, जो हमेशां गुनाह करता है, शफ़ी है। कलाम ही ख़ुदा का इन्सान की तरफ़, जो उसका मातहत है, रसूल है। वही (कलाम) सब चीज़ों पर हुक्मरान है।” (ibid. 501) “कौन ज़ी-फ़हम इन्सान है जो आम्मतुन्नास (लोगों) के आमाल देखकर ख़ुदा-ए-नजात-दहिंदा को मुख़ातिब करके ये न पुकार उठे कि वही (ख़ुदा) गुनाह के बोझ उठाए और रूह-ए-ख़ाती की क़ीमत या तावान देकर उस रूह-ए-ख़ाती को अज़-सर-ए-नौ असली बेलौस हैसियत तक पहुंचाए।” (De Confusione Linguarum 1:418)

इसलिए ख़ुदावंद हर एक इन्सान को ताकीद करता है कि वो ज़िंदगी की दौड़ में कलाम के मुताबिक़, बिला कम व कास्त (बगैर कमी-बेशी के) अपना रास्ता तज्वीज़ करे। कलाम ही तमाम हिक्मत का सरचश्मा है। इसी मुक़द्दस चश्मे से पानी पीकर इन्सान मौत की जगह हयात-ए-अबदी पाता है। (De Profugis 1:560, 31) हम तस्लीम करते हैं, कि कलाम ही बड़ा काहिन है, वो बिल-इरादा व बिला-इरादा हर क़िस्म के गुनाहों से पाक है, क्योंकि वो आस्मानी पैदाइश है। (ibid. 1:562, 13) ख़ुदा का कलाम तय्यब और तमाम आज़ारों से नजात-दहिंदा है। (De Legum Allegoriæ 1:122, 17) अगरचे हर एक शख़्स ख़ुदा का फ़र्ज़न्द कहलाने के क़ाबिल नहीं, ताहम उसे अपने ख़यालात की ऐसी इस्लाह करनी चाहिए कि ख़ुदावंद के पहलौठे बेटे (कलाम के हालात) के मुताबिक़ उसके हालात हो जाएं। कलाम फ़रिश्तों से भी पहले पैदा हुआ। इसके (कलाम के) बहुत-से नाम हैं, (मसलन) हुक्म-ए-ख़ुदा का नाम, कलाम, इन्सान की तस्वीर। (De Conf. Ling. 1:427) ख़ुदा उसी कलाम के ज़रीये, जिससे उसने हर एक चीज़ को बनाया, नेक इन्सानों को पस्ती से उठाकर अपने क़ुर्ब में ले आएगा। (De Sacrificiis Abelis et Caini 1:165, 5) ख़ुदा के तमाम काम कामिल और ग़लती से मुनज़्ज़ह (पाक) हैं। ख़ुदावंद ने अपने पहलौठे यानी कलाम को इसी तरह अपने मुक़द्दस गल्ले की हिफ़ाज़त के लिये मुक़र्रर किया है जिस तरह कोई ताक़तवर बादशाह अपना नायब मुक़र्रर करता है। (De Agricultura 1:308) मुक़द्दस कलाम, जो बड़ा काहिन और ख़ुदा का पहलौठा हैई (De Somniis 1:653), वही उसके मुक़द्दस गल्ले का गड़ेरिया है। (De Agric. 1:308) वो कलाम इन्सान की शक्ल में (De Confus. Ling. 1:427) ख़ुदा का तर्जुमान है। (De Leg. Alleg. iii,73)

जिस तरह इन्सान सूरज को तो नहीं देख सकता, लेकिन उसके इन’इकास को ही सूरज समझता है, उसी तरह ख़ुदा का कलाम भी, जो उसकी तस्वीर है, ख़ुदा समझा गया। (De Somn. 1:40, 44) रब्बानी कलाम जो सबसे पहले पैदा हुआ, वही आस्मानी ग़िज़ा है। वही रोटी है, यानी रूह-ए-इन्सानी के लिये ख़ुदा की मुक़र्रर-कर्दा ग़िज़ा। (De Quod Deterius Potiori Insidiari Soleat 1:213-45, De Leg. Alleg. 120,34) ख़ुदा की ऊहर-ऊहर दो आ’ला हस्तियाँ हैं जिनकी सिफ़ात नेकी और क़ुद्रत हैं, और उनके दर्मियान उलूहियत है। और वो ख़ुदा उनसे मुत्तहिद है। (De Sacrificiis 1:141, 12) कलाम-ए-मुक़द्दस, बड़ा काहिन, बिला-इरादा या इरादा गुनाहों से पाक है, “इसी लिये उसका सर ममसुह हुआ।” (De Somniis 1:653), यानी और क़ाबिल-ए-एतबार बअस्बातत नेअमत ईमान ही है। (De Abrahamo 11:38) हर एक इन्सान के लिये, जो बाप के अहकाम बजा लाता है, ज़रूर है कि वो उसके बेटे के पास, जो वकील है, जाये ताकि उसके (इन्सान के) गुनाह बख़्शे जाएं, और हर क़िस्म की नेकी हासिल कर सके। (De Exsecrationibus 11:43, 29) इस क़िस्म के इन्सान नजात-दहिंदे और रहीम ख़ुदा से नजात हासिल करेंगे, और कलाम के मुताबिक़ अपने हालात करके निहायत बर्गुज़ीदा और आ’ला फ़ायदा हासिल करेंगे। (ibid. 11:35) कलाम ही दुनिया की रोशनी से है। (De Somniis 106:41) ख़ुदा का क़ाइम-मक़ाम है। (De Leg. Alleg. 1:129,4) और उसका प्यारा बेटा है। (De Somniis 1:656,48)

      (यनाबीअ-उल-मसीहिय्यत सफ़्हा 111 से 115)

फिर हमारे वकील साहब सफ़्हा 6 पर लिखते हैं…

“अल-ग़र्ज़ इस अक़ीदे में एक भी बात नहीं, जो हकीम मौसूफ़ (फ़ाईलो) के मो’तक़िदात में न आ गई हो। अब इस मसीही फ़ल्सफ़े के साथ मसअला कफ़्फ़ारा, यानी ख़ुदा का इन्सानी गुनाहों को उठाने के वास्ते ज़मीन पर आना (और यह बात भी हकीम मौसूफ़ ही की है), और दास्तान-ए-सलीब, फ़र्ज़ी उठने की कहानी, और आस्मान पर चढ़ जाना, वो कौन-सी बात अब बाक़ी रह गयी है जिसे हम इलाही इल्हाम की तरफ़ मन्सूब करें? इसी के साथ मुनासिब मालूम होता है कि यूहन्ना और पौलूस का नज़रिया भी “कलाम” के मुताल्लिक़ दर्ज कर दिया जाये, ताकि फ़ाईलो के और यूहन्ना के और पौलूस के नज़रिया के दर्मियान मुक़ाबला हो जाये। चुनान्चे यूहन्ना का नज़रिया ये है कि…

“इब्तिदा में कलाम था, और कलाम ख़ुदा के साथ था। यही इब्तिदा में ख़ुदा के साथ था। सारी चीज़ें उसके वसीले से पैदा हुईं, और जो कुछ पैदा हुआ है, उसमें से कोई चीज़ भी उसके बग़ैर पैदा नहीं हुई। उसमें ज़िंदगी थी, और वो ज़िंदगी आदमियों का नूर था।” (यूहन्ना 1:1 से 4) “और कलाम मुजस्सम हुआ और फ़ज़्ल और सच्चाई से मामूर होकर हमारे दरमियान रहा, और हमने उसका ऐसा जलाल देखा जैसा बाप के इकलौते का जलाल।” (ईज़न आयत 14) “यह ख़ुदा का बर्रा है जो दुनिया के गुनाह उठा ले जाता है।” (ईज़न आयत 29) “वो ख्रिस्तिस यानी मसीह है।” (ईज़न आयत 41) “इस ज़िंदगी के कलाम की बाबत, जो इब्तिदा से था, और जिसे हमने सुना और अपनी आँखों से देखा, बल्कि ग़ौर से देखा और अपने हाथों से छूआ…” (1 यूहन्ना 1:1–2)“तो ख़ुदा का बेटा तो इस्राईल का बादशाह है।” (ईज़न आयत 49) “इब्ने-आदम है।” (ईज़न आयत 51) “दूल्हा है।” (यूहन्ना 3:29) “जो बेटे पर ईमान लाता है, हमेशा की ज़िंदगी उसकी है।” (3:36) “दुनिया का मुंजी।” (4:42) “ज़िंदगी की रोटी।” (6:35) “जो रोटी आसमान से उतरी।” (6:41) “जो यह रोटी खायेगा, वो अबद तक ज़िंदा रहेगा।” (6:58) “दुनिया का नूर।” (8:12) “भेड़ों का दरवाज़ा।” (10:7) “अच्छा चरवाहा।” (10:11) “अच्छा चरवाहा भेड़ों के लिये अपनी जान देता है।” (आयत 11 ईज़न ईज़न) “वो क़ियामत और ज़िंदगी है।” (11:25) “ख़ुदा का बेटा मसीह।” (11:27) “जो मुझ पर ईमान लाता है, वो मुझ पर नहीं बल्कि मेरे भेजने वाले पर ईमान लाता है, और जो मुझे देखता है, वो मेरे भेजने वाले को देखता है।” (12:44–45)

“अंगूर का हक़ीक़ी दरख़्त है।” (15:1) “हमेशा की ज़िंदगी यह है कि वो तुझे, ख़ुदा-ए-वाहिद और बर-हक़ को, और उस मसीह को जिसे तूने भेजा है, जानें।” (17:3) “राह और हक़ और ज़िंदगी मैं हूँ, कोई मेरे वसीले बग़ैर बाप के पास नहीं आता।” (14:6) “उसके बेटे का ख़ून हमें तमाम गुनाहों से पाक करता है।” (1 यूहन्ना 1:7) “वो मददगार, वकील, शफ़ी है।” (1 यूहन्ना 2:1) “वही हमारे गुनाहों का कफ़्फ़ारा है, और न सिर्फ़ हमारे ही गुनाहों का बल्कि तमाम दुनिया के गुनाहों का भी।” (1 यूहन्ना 2:2) “सच्चा गवाह, और मुर्दों में से जी उठने वालों में पहलौठा, और दुनिया के बादशाहों पर हाकिम।” (मुकाशफ़ा 1:5) “आदमज़ाद सा एक शख़्स…” (मुकाशफ़ा 1:12) “मैं अव्वल और आख़िर और ज़िंदा हूँ, मैं मर गया था और देख, अबद-उल-आबाद ज़िंदा रहूँगा, और मौत और आलम-ए-अर्वाह की कुंजियाँ मेरे पास हैं।” (1:7–8) “जिसके पास ख़ुदा की सात रूहें हैं और सात सितारे।” (3:1) “जो क़ुद्दूस और बरहक़ है, और दाऊद की कुंजी रखता है, जिसके खोले हुए को कोई बंद नहीं करता, और बंद किये हुए को कोई खोलता नहीं।” (3:7) “अमीन और सच्चा, और बरहक़ गवाह, और ख़ुदा की ख़ल्क़त का मबदा।” (3:14) “यहूदाह के क़बीले का बब्बर, जो दाऊद की अस्ल है।” (5:5) “गोया ज़बह किया हुआ एक बर्रा…” (आयत 6) “ज़बह होकर अपने ख़ून से हर एक क़बीले और अहले ज़बान, उम्मत और क़ौम में से ख़ुदा के वास्ते लोगों को ख़रीद लिया।” (5:6) वग़ैरह-वग़ैरह,

“और भी बहुत बयान यूहन्ना की तस्नीफ़ात में पाए जाते हैं, मगर तवालत की वजह से कलम-अंदाज़ किये जाते हैं। लेकिन थोड़ा-सा पौलूस का नज़रिया भी “कलाम” की बाबत दर्ज कर देना ज़रूरी मालूम देता है ताकि फ़ाईलो, यूहन्ना और पौलूस के फ़ल्सफ़ा-ए-कलाम में उमूर-ए-इश्तराक व माबा-उल-फ़िराक़ ज़ाहिर हो जायें।”

      पेश्तर इस से कि मैं फ़ल्सफ़ा-ए-कलाम की बाबत पौलूस रसूल की तालीम का ख़ाका पेश करूँ, यह बता देना ज़रूरी समझता हूँ कि उस ने मसीह के बारे में अगरचे लफ़्ज़ “लोगास” कभी इस्तेमाल नहीं किया, तो भी तसव्वुर वही है जो यूहन्ना रसूल के नज़रिये में पाया जाता है। वजह इसकी गालिबान ये मालूम देती है कि वो अपने क़ारईन व सामिईन (पढ़ने और सुनने वालों) के सामने सिर्फ़ “मसीह-ए-मस्लूब” और उसकी सलीब को पेश करना चाहता है और फ़ल्सफ़ा या लफ़्ज़-ए-दीगर “हिकमत” से बिल्कुल एहतिराज़ करना चाहता है, क्योंकि उसकी नज़र सिर्फ़ मसीह-ए-मस्लूब पर थी और उसी पर वो फ़िदा था। चुनान्चे वो ख़ुद फ़रमाता है:

      “ऐ भाइयो! जब मैं तुम्हारे पास आया और तुम में ख़ुदा के भेद की मुनादी करने लगा, तो आ’ला दर्जे की तक़रीर या हिकमत के साथ नहीं आया। मेरी तक़रीर और मेरी मुनादी में हिकमत की लुभाने वाली बातें न थीं, बल्कि वो रूह और क़ुदरत से साबित होती थीं, ताकि तुम्हारा ईमान इन्सानों की हिकमत पर नहीं बल्कि ख़ुदा की क़ुदरत पर मौक़ूफ़ रहे।” लेकिन साथ यह भी कहता है कि “हम कामिलों में हिकमत की बातें कहते हैं, लेकिन इस जहान की और उस जहान के नेस्त होने वाले सरदारों की हिकमत नहीं, बल्कि हम ख़ुदा की वो पोशीदा हिकमत भेद के तौर पर बयान करते हैं, जो ख़ुदा ने जहान के शुरू से पेश्तर हमारे जलाल के वास्ते मुक़र्रर की थी।” और वो मसीह है, “जो ख़ुदा की क़ुदरत और ख़ुदा की हिकमत है।” (1 कुरिन्थियों 1:24) यानी मसीह में वो दोनों बातें मौजूद हैं, या वो ख़ुद वो दोनों बातें हैं जिनकी तलाश यहूदियों और यूनानियों दोनों क़ौमें कर रही थीं। चुनान्चे फ़रमाता है:

      “यहूदी निशान चाहते हैं और यूनानी हिकमत तलाश करते हैं।” (1 कुरिन्थियों 1:22) पस मसीह-ए-मस्लूब, जो यूहन्ना रसूल के बयान के मुताबिक़ “कलमा-ए-मुजस्सम” है, वो पौलूस रसूल के नज़रिये में ख़ुदा की क़ुदरत और ख़ुदा की हिकमत (साफ़ियान) है। (1 कुरिन्थियों 1:24) “ख़ुदा की तरफ़ से हिकमत ठहरा, यानी रास्तबाज़ी, और पाकीज़गी और मख्लिसी।” (1 कुरिन्थियों 1:30) “वो “ख़ुदा का भेद” है, जिसमें हिकमत और मारिफ़त के सारे ख़ज़ाने छिपे हुए हैं।” (कुलुस्सियों 2:3) “वो अनदेखे ख़ुदा की सूरत और तमाम मख़लूक़ात का पहलौठा है, क्योंकि उसी में सारी चीज़ें पैदा की गईं, आसमान की हों या ज़मीन की, देखी हों या अनदेखी, तख़्त हों या रियासतें या हुकूमतें या इख़्तियारात, सारी चीज़ें उसी के वसीले से और उसी के वास्ते पैदा हुईं। और वो सब चीज़ों से पहले है, और उसी में सारी चीज़ें क़ायम रहती हैं, और वही बदन यानी कलीसिया का सर है।” वही मब्दा है और मुर्दों में से जी उठने वालों में पहलौठा,... बाप को भी पसंद आया कि सारी मामूरी उन में सुकूनत करे। (कुलिस्सियों 1:14 से 19) “जिसे उस ने सारी चीज़ों का वारिस ठहराया और जिसके वसीले से उस ने आलम भी पैदा किए, वो उसका जलाल का पर्तो और उसकी ज़ात का नक़्श हो कर सब चीज़ों को अपनी क़ुद्रत के कलाम से सँभालता है। वो गुनाहों को धोकर आलम-ए-बाला पर किब्रिया की दाहिनी तरफ़ जा बैठा।” (इब्रानी 1:2, 3) “नजात का बानी” है, दुखों के वसीले से कामिल किया गया।” (इब्रानी 2:10) “येसू को कि मौत का दुख सहने के सबब जलाल और इज़्ज़त का ताज उसे पहनाया गया।” (ईज़न आयत 9) “वो ख़ुद भी उन की तरह उन में शरीक हुआ ताकि मौत के वसीले से उसको जिसे मौत पर क़ुद्रत हासिल थी, यानी इब्लीस को तबाह करे।” (आयत 14) “रहमदिल और दयानतदार सरदार काहिन है।” (आयत 17) “रसूल और सरदार काहिन।” (3:1) “बड़ा सरदार काहिन, ख़ुदा का बेटा, बेगुनाह।” (4:14, 15) “मलिकसिदक़ के तरीक़े का अबद तक काहिन है, कामिल है, अपने सब फ़रमांबर्दारों के लिए अबदी नजात का बाइस हुआ।” (5:6, 9) “पर्दे के अंदर… जहां येसू हमेशा के लिए मलिकसिदक़ के तरीक़े का सरदार काहिन बन कर हमारी ख़ातिर पेशरू के तौर पर दाख़िल हुआ।” (6:19) “पाक और बे-रिया और बे-दाग़ और गुनेहगारों से जुदा और आसमानों से बुलंद है।” (7:26) “आइन्दा की अच्छी चीज़ों का सरदार काहिन।” (9:11) वग़ैरह-वग़ैरह।

      “मसीह के ये चंद अस्मा और सिफ़ात पौलूस के ख़तों में से सिर्फ इसलिए बयान कर दिए हैं कि यूहन्ना रसूल और पौलूस में यकसानियत नज़र आ जाए और कि वो दोनों एक ही शख़्स की बाबत बोल रहे हैं। हाँ, फ़र्क़ सिर्फ इस में है कि अव्वल-उल-ज़िक्र उसकी आस्मानी और ज़मीनी हर-दो तारीख़ बयान करता है, मगर मोअख़्खर-उल-ज़िक्र मसीह के अपने काम पूरा करके आस्मान पर चले जाने के बाद उन फ़वाइद का बयान करता है, जो ईमान की शर्त पर उसकी मौत से ईमानदार को हासिल होते हैं, जिनमें से रसूल ख़ुद था। मेरा मतलब सिर्फ ये है कि मैंने मसीह के बारे में यूहन्ना और पौलूस का एक ही नज़रिया दिखा दिया।”

      लेकिन अब मोअतरिज़ के इस बयान या दावे का जवाब देना है जो उस ने दलील तशाबह-बयना-अल-शैईन (दो अलग-अलग चीजों में एक जैसी बाते नज़र आना) की बुनि‍याद पर मसीही फ़ल्सफ़ा-ए-कलाम पर किया है जो उसकी अपनी ज़बान में यूँ है, वो यूनानी इल्मी ख़ज़ानों और सिकंदरिया के इल्मी जवाहर-रेज़ों का ज़िक्र करते हुए कहता है कि:

      “उन के मुतालए ने ईसाई फ़ल्सफ़ा की हैसियत को तिश्त अज़बाम कर दिया। इस सारे फ़ल्सफ़ा-ए-कलाम का माख़ज़ लफ़्ज़न म’अनन, हत्ता कि उन पौलूसी या कलीसी इस्तिलाहात तक का सरचश्मा वो फ़ल्सफ़ा माना गया है जो मसीही इब्तिदाई सदियों में बमुक़ाम सिकंदरिया दायर-ओ-सायर (जारी) था जिसका बानी अफ़लातून था।” (सफ़्हा 111)

      “सो जानना चाहिए कि एक ही शख़्स की ज़िंदगी के हालात चारों इंजील-नवीसियों में से हर एक ने अपने-अपने ख़ास मुद्दआ को मद्द-ए-नज़र रखते हुए अलैहदा-अलैहदा नुक़्ता-ए-ख़याल से लिखे और इब्तिदाअन ख़ास-ख़ास मुख़ातबीन के लिए। चुनान्चे क़दीम तरीन इंजील-ए-मुक़द्दस मर्क़ुस की है जिसने किसी ख़ास जमाअत या शख़्स या क़ौम के लिए नहीं बल्कि सब के लिए यकसाँ लिखी और बताया कि येसू वही मसीह है और बाउज़लत (जल्दी से) एक वाक़िए से दूसरे वाक़िए पर उबूर करता चला जाता है।”

      “दूसरी मुक़द्दस मत्ती की इंजील है जो मर्क़ुस से एक क़दम पीछे को हटता है और ना सिर्फ़ मसीह का नसब-नामा ही दर्ज करता है बल्कि उसकी मो’जिज़ाना पैदाइश का भी बयान करता है, और अगर तावात्तुर हदीस से क़त-ए-नज़र करके देखा जाये तो ज़ाहिर हो जाता है कि उसकी इंजील अपनी वज़ा’अ-ए-क़ता’अ, पुराने अहदनामे से इक़्तिबास करने और अपने तमाम पहलूओं में इब्रानी है, और दानीएल की पेशीनगोइयों को अपने ज़ेर-ए-नज़र रखते हुए वो मसीह को येसू की शख़्सियत में “इब्ने-आदम”, “इब्ने-दाऊद”, “इब्ने-अल्लाह” की हैसियत में पेश करता है।”

      “पुराने अहदनामे की शरीअत और अम्बिया का तकमिला और पुराने अहद के लोगों की ज़िंदगी ईमान और उम्मीद का मरज’आ, येसू मसीह की शख़्सियत में दिखाता है। मुक़द्दस लूक़ा की इंजील जो बलिहाज़-ए-ज़माना तीसरी है, वो मत्ती से एक क़दम और पीछे को जाती है और ना सिर्फ़ विलादत-ए-मसीह की तारीख़ ही का बल्कि उसके पेशरू यूहन्ना का भी ज़िक्र करती है। ये अपने तास्सुरात में पौलूसी है और मसीह की शख़्सियत को पहले यहूदियों के, और फिर यूनानियों के सामने पेश करता है।”

      “मगर चौथी इंजील में जो मुक़द्दस यूहन्ना की लिखी हुई है, उस गहरी और वसीअ ख़लीज पर पुख़्ता पुल बाँध कर दिखाया है जो यहूदियों और यूनानियों के दर्मियान हाइल थी, यानी यूनानियों का फ़ल्सफ़ा और उस का इक़्तिज़ा, और यहूदियों की बाइबल और उस का मरज’आ, येसू मसीह कलिमतुल्लाह (کلمتہ اللہ) है। और जिस तरह कि पौलूस रसूल के ख़तों में यूनानी-माइल यहूदियों और रब्बियों की तालीमात की तरफ़ अक्सर इशारात मिलते हैं, इसी तरह यूहन्ना की इंजील में सिकंदरी यहूदी फ़ल्सफ़ा की जो इफिसुस में उन दिनों राइज था और जहां यूहन्ना रसूल क़ियाम रखता था, ज़ाहिरी सूरत और असरात पाए जाते हैं जिससे इंजील-नवीस का यही मज़्कूर-बाला मुद्दआ नज़र आता है। पस ये चौथी इंजील उन तीनों माक़ब्ल की अनाजील का तकमिला है। जैसी कि ये इंजील अपने तर्ज़-ए-बयान, इशारात, और लब-ओ-लहजे में फ़लस्तीनी है, वैसी कोई और इंजील नहीं है।”

      “ताहम अपनी बैरूनी क़ता’अ व वज़ा’अ में, यानी जिन बातों का वो ज़िक्र करता और जिन को वो हज़फ़ करता है, गरज़ कि वो अपने तमाम मक़्सद और मुद्दआ में यूनानी-माइल यहूदियत के तास्सुरात से भी ख़ाली नहीं, या बइबारत दीगर, यूहन्ना रसूल वस्‍त में है। उस के एक पहलू पर फ़लस्तीनी यहूदियत थी, जिसका मर्कज़ इफ़िसुस था, और दूसरे पहलू पर सिकंदरी यहूदियत थी, और हर-दो जानिब से उस पर असर पड़ रहा था। फ़लस्तीनी तास्सुरात वो थे जो तौरात और नबियों की किताबों और यरूशलेमी तल्मूद और रब्बियों की तालीमात से निकल कर उस पर पड़े थे, और दूसरी तरफ़ सिकंदरी तास्सुरात वो थे, जिन्हों ने फ़ाईलो की तस्नीफ़ात से (जो ख़ुद अफ़लातूनी तास्सुरात में था) निकल कर उस पर असर डाला था। चुनान्चे सिकंदरी और फ़लस्तीनी मक़तज़ियात को, उस ने मसीह येसू की शख़्सियत में ऐसे तौर पर पूरा किया कि दोनों को एक कर लिया, और जुदाई की दीवार जो बीच में थी ढा दिया, “और सलीब पर दुश्मनी को मिटाकर और उस के सबब से दोनों को एक तन बनाकर ख़ुदा से मिला दिया, और अब इसी में हर एक इमारत मिल-मिलाकर ख़ुदावंद में एक पाक मुक़द्दस बनती जाती है।” ख़याल की ये सिकंदरी सूरत बिलख़ुसूस यूहन्ना रसूल के नज़रिया-ए-कलाम में पाई जाती है, “जिसको वो ‘ज़िंदगी’, “नूर” और “सरचश्मा-ए-जहान” के तौर पर ज़ाहिर करता है, मगर उस की अस्लियत और माहियत सिकंदरी सूरत से बिल्कुल दिगरगूँ है, गोया उन ख़ाली सूरतों में ज़िंदा रूह फूँक दी है।”

      “सिकंदरी फ़ल्सफ़े के मुताबिक़ ख़ुदा दुनिया से बिल्कुल अलग-थलग है। इन्सान उस को जान नहीं सकता। उस में कोई गुण नहीं हैं, यानी वो निरगुण है, ना ही कोई उस का नाम है। माद्दा बुरी चीज़ है, ख़ुदा उस से ताल्लुक़ नहीं रख सकता, मगर यूहन्ना रसूल बताता है कि ख़ुदा हम से दूर नहीं है। इन्सान उस को पहचान और जान सकता है। उस में तमाम सिफ़ात-ए-हसना मौजूद हैं और उस का नाम है, और माद्दा से उस का ख़ास ताल्लुक़ है, वो बाप है।”

      “सिकंदरी फ़ल्सफ़ा के मुताबिक़ ख़ुदा दुनिया पर ऐसे तौर पर अपना अक्स डालता है जैसे सहाब (नब्युला) का अक्स पड़ता है। इसके एवज़ में रसूल बताता है कि वो एक शख़्स है, और उस का कलमा (लोगस) भी शख़्सियत रखता है, मगर यह सिकंदरिया कलमा या कलाम (लोगस) नहीं जो नेकी और ताक़त से मुरक्‍कब है, बल्कि फ़ज़्ल और सच्चाई से मामूर है (और जो पौलूस के बयान के मुताबिक़ ख़ुदा की क़ुद्रत है)। ये कलमा लोगस इब्तिदा में था और ख़ुदा के साथ था, मगर उस इब्तिदा से मुराद अज़लियत है, ना ख़ल्क़त की इब्तिदा (पौलूस रसूल के बयान के मुताबिक़)। और ज़माने के लिहाज़ से वो ख़ल्क़त का पहलौठा है, मगर पैदाइश के लिहाज़ से वो ख़ुदा का इकलौता बेटा है। माद्दा अज़ली नहीं है और ना ही वो बुरा है।”

      “लोगस यानी कलाम माद्दा का भी ख़ालिक़ है, क्योंकि “जो कुछ पैदा हुआ है उस में से कोई चीज़ भी उस के बग़ैर पैदा नहीं हुई” और कि “इब्तिदा में कलाम था, और कलाम ख़ुदा के साथ था, और कलाम ख़ुदा था।” उस के बग़ैर कुछ भी दुनिया में मौजूद ना था। यूहन्ना रसूल सिकंदरी तालीम के ख़िलाफ़ फ़रमाता है कि माद्दा में कुछ बुराई नहीं, बल्कि ख़ुदा का उस के साथ ताल्लुक़ है, और कि “वो कलाम मुजस्सम हुआ और फ़ज़्ल और सच्चाई से मामूर हो कर हमारे दर्मियान रहा, और हम ने उस का ऐसा जलाल देखा, जैसा बाप के इकलौते का जलाल।” और फिर उस के ज़मीनी काम का ज़िक्र शुरू करता है, जैसा कि पौलूस रसूल ख़ूदा के सर-ए-अज़ीम का ऐलान करता है, “यानी वो जो जिस्म में ज़ाहिर हुआ, और रूह में रास्तबाज़ ठहरा, और फ़रिश्तों को दिखाई दिया, और ग़ैर-क़ौमों में उस की मुनादी हुई, दुनिया में इस पर ईमान लाए, और जलाल में ऊपर उठाया गया।” (1 तीमुथियुस 3:16)

      फ़ाईलो कहता है कि, “अगरचे हर एक शख़्स ख़ुदा का फ़र्ज़न्द कहलाने के क़ाबिल नहीं, ताहम उस को अपने हालात की ऐसी इस्लाह करनी चाहिए कि ख़ुदावंद के पहलौठे बेटे (कलाम) के हालात के मुताबिक़ उस के हालात हो जाएं।” मगर यूहन्ना रसूल फ़रमाता है कि, “जब तक कोई ऊपर से पैदा ना हो, रूह-उल-क़ुद्स से पैदा ना हो, तब तक वो ख़ुदा की बादशाहत में दाख़िल नहीं हो सकता, उस को देख नहीं सकता। वो इस लोगस को नजात-दहिंदा, वकील, शफ़ी, बड़ा काहिन तो बताता है, मगर यह नहीं बताता कि वो क़ुर्बानी क्या है जो बतौर कफ़्फ़ारा के ख़ुदा के सामने पेश करता, और वह ख़ून किस का ख़ून है जिसके छिड़कने से काहिन पाक करता है, वो बीना (बुनियाद) क्या है जिस पर वह इन्सान की वकालत या शफ़ाअत करता है।

      मगर यूहन्ना रसूल फ़रमाता है कि “अगर कोई गुनाह करे तो बाप के पास हमारा एक मददगार मौजूद है, यानी येसू मसीह रास्तबाज़, और वही हमारे गुनाहों का कफ़्फ़ारा है, और ना सिर्फ़ हमारे ही गुनाहों का, बल्कि तमाम दुनिया के गुनाहों का भी।” (1 यूहन्ना 2:1, 2) वग़ैरह, जिससे ज़ाहिर है कि उस ने उन हक़ाइक़ को बयान किया है, जिन तक ना तो फ़ाईलो पहुँचा और ना यूनानी फ़ैलसूफ़ पहुँचे। बल्कि उस की नज़र में पुराने अहदनामा की वो तमाम रीत व रसूम, और ख़ास कर कफ़्फ़ारे की क़ुर्बानी थी, मूसा की तौरेत और नबियों की पेशख़बरियाँ और नमूने और अलामतें, मसलन ब्याबान में साँप को बुलंदी पर रखना वग़ैरह।

      और अगर हम पुराने अहदनामे पर नज़र दौड़ाएँ तो उसी से मुबर्हन (ज़ाहिर) हो जाएगा कि जिस क़द्र इस्तिलाहात यूहन्ना रसूल और फ़ाईलो यहूदी हकीम ने इस्तिमाल किए हैं, वो सब वहीं से लिए हुए हैं। इन दोनों का मुश्तर्का सरचश्मा वही तौरेत और अम्बिया हैं। चुनान्चे वहाँ भी मसीह को उन्हीं वस्फ़ी नामों से मज़्कूर किया है, मसलन:

      गडरिया या चरवाहा (ज़करियाह 13:7, यसायाह 40:11), ममसूह या मसीह (दानीएल 9:24, 25, ज़बूर 2:2), आस्मानी ग़िज़ा या आस्मानी रोटी (ख़ुरूज 16:12–15), ख़ुदा का नाम (ख़ुरूज 23:21), शफ़ी (यसायाह 53:12), कलमा (होसेअ 14:2), ख़ुदावंद (ज़बूर 110:1), काहिन (ज़बूर 110:4), मुक़द्दस या क़ुद्दूस (ज़बूर 16:10), बेटा या ख़ुदा का बेटा (अम्साल 4, ज़बूर 2:7, 12, दानीएल 3:25), बादशाह (ज़बूर 2:6), दानिश या दानाई (अम्साल 8:11, 14, 22, 23), ईमान (हबक्क़ूक 2:4) वग़ैरह।

      और अगर हम पौलूस रसूल के इस नज़रिये का मुक़ाबला पुराने अहदनामे से करें, तो उस का सरचश्मा भी वही है, बखौफ-ए-तवालत उसे नज़रअंदाज़ किया जाता है। जैसा कि मैं पहले कह आया हूँ, अब भी कहता हूँ कि जिस तरह फ़ाईलो ने अफ़लातूनी तालीम से मुतअस्सिर हो कर ये चाहा कि किताब-ए-मुक़द्दस और यूनानी फ़ल्सफ़े की तालीमों को आपस में मिलाकर यहूदियों और यूनानियों के दरमियान जुदाई की गहरी ख़लीज पर बाँध कर, इन दोनों को बाहम मिला दे, उसी तरह यूहन्ना और पौलूस, हर-दो ने किताब-ए-मुक़द्दस और यूनानी फ़ल्सफ़ा हर दो से मुतअस्सिर हो कर चाहा कि मसीहियों और ग़ैर-मसीहियों की तालीम के ज़रीये से सय्यदना ईसा मसीह में उन को लाकर एक कर दें। ज़बान एक, लब-व-लहजा एक, मगर असली तसव्वुर और हक़ीक़ी मफ़्हूम उन से मुतफ़र्रिक़ (मुख़्तलिफ़), यानी कलमा-ए-मुजस्सम की तारीख़ और काम। या दूसरे अल्फ़ाज़ में यूँ समझो कि ख़ुदा के कलमा या लोगस का एक ज़हनी बयान है और दूसरा तारीख़ी, एक मुजस्सम होने से पहले का नज़रिया, दूसरा मुजस्सम होने और उस के बाद उस के कामों और सिफ़ात का नज़रिया। लेकिन इस से ये नतीजा नहीं निकल सकता कि इन की तालीम ग़ैर-मसीही और अफ़लातूनी है, क्योंकि जिस तरह शरीअत यहूदियों को मसीह तक पहुँचाने को उस्ताद ठहरी…

      इसी तरह पेगनइज़्म (कुफ़्र व इलहाद का मज़्हब) और इल्म-ए-नुजूम और शम्स-परस्ती और यूनानी फ़ल्सफ़ा भी उन उन अक़्वाम को मसीह तक पहुँचाने को उस्ताद ठहरे। मगर फ़ाईलो और पौलूस रसूल में बड़ा फ़र्क़ है। चुनान्चे फ़ाईलो का लोगस साया है, अस्ल में कुछ नहीं, यानी जिस की कोई शख़्सियत नहीं। मगर पौलूस रसूल के नज़्दीक वो एक शख़्स है जो जिस्म में ज़ाहिर हुआ।

      फ़ाईलो के नज़्दीक कफ़्फ़ारे की कोई ज़रूरत नहीं, रसूल के लिए कफ़्फ़ारा एक हक़ीक़त और ज़रूरी अम्र है जो ख़ुदा की तरफ़ से अज़ल से मुक़र्रर हुआ, और वो मसीह है। फ़ाईलो का सरदार काहिन शफ़ाअत या सिफ़ारिश तो करता है, लेकिन शफ़ाअत के लिए बुनियाद कोई नहीं। गुनाहों की माफ़ी और पाकीज़गी का तो फ़ाईलो ज़िक्र करता है, लेकिन वो बर्रा नहीं जिसके ख़ून से गुनाहों की माफ़ी और पाकीज़गी हासिल होती है। पर्दे के परे ख़ुदा की हुज़ूरी में जाने का कोई वसीला नहीं, और ना ही ज़िंदा ख़ुदा की ख़िदमत करने के लिए रूह को मुर्दा कामों से रिहाई मिलती है। अगरचे इब्रानियों का ख़त अपने इस्तिदलाल में सिकंदरिया का फ़ल्सफ़ी रंग रखता है, मगर वो सिकंदरी फ़ल्सफ़ा मग़्लूब (हारा हुआ) है, ना कि ग़ालिब। सिकंदरी फ़ल्सफ़े का तक्मिला पौलूस रसूल ने किया, अव्वल-उल-ज़िक्र में सिर्फ़ सूरत थी, मोअख्ख़र-उल-ज़िक्र में अस्लियत और हक़ीक़त।

      वो बर्तन तो था, मगर ख़ाली। अगरचे दोनों में बज़ाहिर इश्तिराक है, मगर तह में इफ़्तिराक़ है। पस अज़हर-मिन-श्शम्स है कि यूहन्ना और पौलूस के मुस्तलहात गो लफ़्ज़न सिकंदरी हैं, क्योंकि हर-दो यूनानी में लिख रहे हैं, लेकिन म’आनन इनका ताल्लुक़ पुराने अहदनामे से है और वही उनका सरचश्मा है। दोनों ने फ़ाईलो और अफ़लातून के फ़लसफ़ों को मसीह के क़दमों पर लाकर रख दिया है, जिसका सरचश्मा पुराने अहदनामे की पेशीनगोइयाँ और अलामतें और नमूने और रसूमात हैं, जिनका तकमिला नए अहदनामा में हुआ।

      मह्ज़ जानिबैन तशाबुह (मुमासलत) इस अम्र का सबूत नहीं कि “इस सारे फ़ल्सफ़ा-ए-कलाम का माख़ज़ लफ़्ज़न व मा’अनन… वो फ़ल्सफ़ा माना गया है जो मसीही इब्तिदाई सदियों में बमुक़ाम सिकंदरीया दायर व सायर (जारी) था, जिसका बानी अफ़लातून था।” मान लेने के क्या म’अनी? जैसे आपने यूरोपियन मुहक़्क़िक़ीन की अंधी तक़्लीद की है, वैसे ही इनकी यकतरफ़ा तहक़ीक़ थी। शागिर्द के लिए बस है कि वो अपने उस्ताद के बराबर हो।

      फिर ख़्वाजा साहब का ये उसूल कैसा क़ाबिल-ए-तारीफ़ और क़ाबिल-ए-तक़्लीद है कि जो बातें किसी दूसरे मो’तक़िदात (अक़ीदों) में आ गई हों, वो इल्हाम-ए-इलाही से मन्सूब नहीं की जा सकतीं, या दूसरे अल्फ़ाज़ में इल्हाम-ए-इलाही वही होता है जो बहुतों के मो’तक़िदात में यकसाँ (एक जैसा) ना हो। जिन बातों में मुवाफ़िक़त और यकसानियत पाई जाये, वो सब इल्हाम से ख़ारिज हैं।

      क्या ख़्वाजा साहब इसी उसूल को क़ुर्आन के हक़ में इस्तिमाल करके उन बातों को, जो क़ुर्आन में मौजूद हैं मगर उस से पहले किसी और क़ौम के मो’तक़िदात में आ गई हों, उन को क़ुरआनी इल्हाम से ख़ारिज कर देने को तैयार हैं? और अगर क़ुर्आन के हक़ में आप ऐसा नहीं कर सकते, तो औरों के हक़ में ऐसा करने का आपको क्या हक़ हासिल है?

      मेरे क़ाबिल और मुहतरम ख़्वाजा साहब! जिस बात को आप अपने लिए पसंद नहीं करते, उस को दूसरे के लिए भी पसंद ना करने का उसूल हमेशा याद रखें। फिर एक और बात है कि अगर आपके इस उसूल को, जिसका ऊपर ज़िक्र हो चुका, और जो आपकी किताब यनाबीअ-उल-मसीहिय्यत के सफ़्हा 116 पर ऊपर से सातवीं सतर से शुरू करके ग्यारहवीं सतर पर ख़त्म होने वाले बयान से मुस्तंबित होता है, आपके इस बयान से, जो उसी किताब के सफ़्हा 2 में पाया जाता है, मुक़ाबला किया जाये तो साफ़-साफ़ तज़ाद (टकराव) ज़ाहिर होता है, और मैं नहीं समझ सकता कि उनमें किस बात को दुरुस्त समझा जाये और किस को ग़लत।

      “जब दुनिया के सब मज़ाहिब अपनी असली हैबत व सूरत में एक ही सरचश्मा से निकले और एक ही तालीम लाए। जब अल्लाह त’आला ने एक ही चीज़ से नस्ल-ए-इन्सानी की परवरिश की, तो ये भी ज़रूरी था कि रुहानी परवरिश भी एक ही तरीक़ से, एक ही चीज़ से हो।”

      मेरे मुहतरम वकील साहब, बताईए, जब किसी वकील की तक़रीर में, जो वो अदालत में कर रहा हो, अपने दावे के ख़िलाफ़ बयानात हों और उसमें मुतज़ाद बातें पाई जाएं, जैसा आपके बयानात मुन्दरिज़ा यनाबीअ-उल-मसीहिय्यत में पाया जाता है और जिसकी एक मिसाल ऊपर मज़्कूर हुई, तो क्या वो उसके दावे के सबूत हो सकते हैं? क्या अदालत ऐसे बयान को मंज़ूर करके उसके मुवक्किल के हक़ में फ़ैसला देगी? क्या उस ने दानाई और होशियारी से अपने मुवक्किल की वकालत की? मुझे अपने ग़ैबी दोस्त की इस हालत पर ताज्जुब भी आता है और अफ़्सोस भी, कि ऐसे आलिम फ़ाज़िल होकर ऐसी लग़्ज़िशें उनकी तहरीर में क्यों? मुझे तो आपकी ऐसी बातों से आपके ब-तकरार (ये कहने पर कि “ईसाइयों से हमारा इख़्तिलाफ़ मह्ज़ मुहब्बत और इख़्लास की बिना पर है” बड़ा भारी शक पैदा होता है। ख़ैर, ख़ुदा आपकी सिरात-ए-मुस्तक़ीम की तरफ़ रहनुमाई करे।

      दूसरी बात जो हमारे वकील साहब ने बयान फ़रमाई है, वो मसअला तस्लीस है। चुनान्चे सफ़्हा 105 में यूं लिखा है:

“मसअला तस्लीस भी एक पुरानी कहानी है। हिन्दुस्तान पहले से ही ब्रह्मा, विष्णु, महेश का परस्तार था। ये भी नज़ारा कायनात के ही मुख़्तलिफ़ नक़्शे हैं। ज़मीन पर हमेशा पैदाइश, परवरिश और हलाकत का दौर मुस्तक़िल जारी है। इसी हक़ीक़त को शाकतक मत ने ग़लीज़ अल्फ़ाज़ में पारबती, ब्रह्मा, विष्णु, महेश को जमा कर दिया है। वही वक़्त ख़ल्क़ और वही क़ुव्वत नमूदार (परवरिश) और वही क़ुव्वत हालिक़ा और वही ज़मीन जिस पर इन तीनों क़ुव्वतों ने अमल करना है। अगर हिन्दुस्तान में ब्रह्मा, विष्णु, महेश और पारबती है, तो दूसरी जगह बाप, रूह-उल-क़ुद्स, बेटा और मर्यम है। यही तीन में एक और एक में तीन। वहां पर आने तख़य्युल (ख़याल) ने इन हक़ाइक़ को मुश्रिकाना रंग में देखा। हर एक चीज़ को ख़ुदा बनाकर उन्हें इन्सानी जामा में उतारा। यहां ईसाइय्यत ने भी मसीह का हक़ीक़ी मज़्हब छोड़कर इस अम्र में तस्वीर-परस्ती की...

“मसअला तस्लीस के मुताल्लिक़ मैं क़दीमी यूनानियों की एक हकीमाना हक़ीक़त पर रौशनी डालता हूँ। उस ज़माने के लोग हर एक चीज़ में एक और रूह को क़ायम करके उसे अपना मा’बूद ठहराते थे और यूनानी रब-उल-नूअ कहते थे। चुनान्चे बरस का भी एक रब-उल-नूअ था, जिसकी तीन कैफ़ियतें बताई जाती थीं। पहली कैफ़ियत में वो ज़िंदा होता है, दूसरी में वो मरता है, तीसरी में वो फर्जी उठता है और जी उठने के साथ ही कुल दुनिया को नई ज़िंदगी बख़्शता है। इस तीसरी कैफ़ियत को यूनानी अलग मुस्तक़िल वजूद में देखते थे। उसका नाम वो अल-सालूत या नजातदहिंदा रखते थे।”

“मगर फ़ीसा ग़ौरस ने एक और तस्लीस का पता दिया है, जिस को क़दीम से कुल यूनानी हुकमा ने तस्लीम किया हुआ था। इस तस्लीस के तीन उक़नूम थे: (1) ख़ुदा, (2) रूह-ए-कायनात, (3) रूह-ए-इन्सानी। ये भी दरअस्ल इसी मसअला कलाम तालीम दादा अफ़लातून की दूसरी शक्ल है, मगर हक़ीक़त एक ही है और हक़ीक़त हक्क़ है, जिसे मैं आगे चलकर बयान करूंगा। लेकिन मुश्रिकाना फ़ित्रत ने कहीं इसे बुत-परस्ती के रंग में देखा और कहीं इसे मसीहिय्यत की शक्ल दे दी। हकीम प्लोटॉर्क हमें एक और तस्लीस का हवाला देता है जो कहते हैं कि जनाब ज़रतुश्त ने तज्वीज़ की थी। इसके तीन अक़ानीम थे: (1) बाप (एज़द) जिससे कुल दुनिया निकली, (2) मथुरा (सूरज), (3) कायनात। ये बात भी सही है, अगर रुहानी निज़ाम में फ़ल्सफ़ा-ए-कलाम अपने असली म’अनों में, जैसा मैं आगे चलकर बयान करूंगा, सही है, तो जिस्मानी निज़ाम में हज़रत ज़रतुश्त की मुजव्वज़ा तस्लीस भी दुरुस्त है। निज़ाम-ए-शम्सी की कुल कायनात जो इन्सानी निगाह में है, वो सूरज ही से निकली है। गोया सूरज ही वो चीज़ है, जिस को जिस्मानियत में ख़ुदा त’आला ने सबसे अव्वल पैदा किया है। फिर उसी से कुल कायनात थी। लिहाज़ा ब-अल्फ़ाज़-ए-इस्तिआरा, अगर ख़ुदा सब का बाप है, तो उसका पहलौठा बेटा मथुरा (सूरज) है। सारी चीज़ें उसके वसीले से पैदा हुईं, और जो कुछ पैदा हुआ है, उसमें से कोई चीज़ भी उसके बग़ैर पैदा नहीं हुई। ये एक बदीही हक़ीक़त है।”

“अब अगर एक मुश्रिकाना निगाह नय्यर-ए-आज़म (सूरज) ही को अपना ख़ुदा और बाप मान ले, तो कोई अजब बात नहीं। लिहाज़ा इंजील यूहन्ना की पहली चंद आयात मसीह या किसी इन्सान पर तो मुतल्लिक़न नहीं, मगर सूरज पर हर म’अनों में एक मुश्रिकाना ख़याल से सही तौर पर चस्पाँ होती हैं...”

“लफ़्ज़ “लोगस” (कलाम) से उन (फ़ाईलो) की मुराद अक़्ल या इरादा है। ये मसअला दरअस्ल पैदाइश-ए-कायनात के मुताल्लिक़ हकीम अफ़लातून का नज़रिया है, जिसे हुकमा-ए-इस्लाम ने “अक़्ल-ए-अव्वल” से ताबीर किया है। यानी ख़ुदा त’आला का वो इरादा-ए-अज़ली जिसमें कुल कायनात का ज़हूर और उसकी तर्तीब थी, और जिसके मातहत या मुताबिक़ कुल दुनिया पैदा हुई। इस अम्र से किस को इन्कार हो सकता है कि ज़हूर-ए-कायनात से पहले “इरादा-ए-अज़ली” का वजूद होगा। वही इरादा सबसे पहले पैदा हुआ, उसी से हर एक चीज़ पैदा हुई, उस का जलवा ज़र्रे-ज़र्रे में है। इन्सान या कोई मख़्लूक़ जब तक अपने हालात उसी इरादा-ए-अज़ली के मुताबिक़ ना करे, फ़लाह नहीं पा सकता। लिहाज़ा वही अज़ली इरादा ब-अल्फ़ाज़-ए-इस्तिआरा “ख़ुदा का पहलौठा” है। ख़ुदा की तरफ़ से मख़्लूक़ पर हुक्मरान है, उसी से कुल दुनिया बनी, जो कुछ दुनिया में है, उसी के वसीले से है। वही दुनिया की रोशनी है, वही दुनिया का मुंजी है, वही ख़ुदा का तर्जुमान है, यानी ज़ात-ए-अज़ली का मज़हर-ए-अव्वल और मज़हर-ए-कुल।

अल-ग़र्ज़, वो सारी बातें जो हकीम अफ़लातून ने “अक़्ल-ए-अव्वल” के मुताल्लिक़, फ़ाईलो ने “लोगस” के मुताल्लिक़, यूहन्ना ने “कलाम” के मुताल्लिक़ और कलीसिया ने “मसीह” के मुताल्लिक़ कहीं, वो बातें अक़्ल-ए-अव्वल, लोगस, कलाम, मसीह पर मुंतबिक़ (चस्पा) हों या ना हों, लेकिन “इरादा-ए-अज़ली” इन सब पर हावी है। इन हुकमा ने तो इस हक़ीक़त “इरादा-ए-अज़ली” का नाम “पहलौठा बेटा”, “दुनिया की रोशनी”, “मख़्लूक़ का सबब”, “ख़ल्क़”, “अज़ली व अबदी” वग़ैरह-वग़ैरह रखा, जिनसे इनकी मुराद सिर्फ़ इज़्हार-ए-मक़्सद थी। लेकिन अवाम ने इन नज़रियों को इन्सानी लिबास पहनाया—बुत बनाए, मुसव्विरी के तमाम फ़नून ख़र्च कर दिए। एक हद तक ये भी दुरुस्त था, अगर हक़ीक़त सामने रहती और ये तस्वीरें और मुजस्समे फ़क़त तश्रीह समझे जाते। लेकिन आने वाली नस्लें हक़ीक़त से अलग होकर इन मुजस्समों और तस्वीरों की परस्तार हो गईं। हिन्दुस्तान का भी यही हाल हुआ। मग़रिब में इसी मुश्रिकाना फ़ित्रत ने क़दीमी हक़ाइक़-ए-हकीमाना को चौथी पाँचवीं सदी में मसीह की सूरत में पेश किया।” (यनाबीअ-उल-मसीहिय्यत सफ़्हा 116 से 120)

      इस सारे इक़्तिबास को पढ़ने से बिल्कुल सतही तौर पर ये अम्र अज़हर-मिन-श्शम्स (सूरज की तरह रोशन) हो जाता है कि मसअला तस्लीस के बयान करने में हमारे मुहतरम वकील साहब ने अपने मुवक्किल की पैरवी करने की बनिस्बत हमारे हक़ में ये शहादत दे दी कि मसअला तस्लीस वाक़ई क़दीम और आलमगीर और हुकमा के इक़्तिज़ा-ए-फ़ित्री (फित्री ज़रुरत) के मुताबिक़ है और सूरज की हर तीनों कैफ़ियात इसकी मुसद्दिक़ (तस्दीक़ करने वाली) हैं। हत्ता कि (वो) ख़ुद भी अपनी ज़बान से ख़ुदा की एक क़िस्म की तस्लीस के इक़बाली (इक़रारी) हैं।

      मैं कहता हूँ, हम में और आप में और मज़्कूर-बाला हुकमा के ख़यालात में मसअला तस्लीस की नौईय्यत या तश्रीहात में फ़र्क़ है, जैसा कि आपने ख़ुद ज़ाहिर कर दिया है। मगर जनाब के क़ौल के मुताबिक़ “हक़ीक़त एक ही है और हक़ीक़त हक़्क़ा है… लेकिन मुश्रिकाना फ़ित्रत ने कहीं इसे बुत-परस्ती के रंग में देखा।” और आपका ये कहना कि “कहीं इसे मसीहिय्यत की शक्ल दे दी” जिससे आपकी मुराद मग़रिब में वो मुश्रिकाना फ़ित्रत है जिसने क़दीमी हक़ाइक़-ए-हकीमाना को चौथी-पाँचवीं सदी में मसीह की सूरत में पेश किया (सफ़्हा 120), इस तालीम पर कुछ असर नहीं रखता, जो किताब-ए-मुक़द्दस में, और ख़ुसूसन इंजील में मुन्दरज है और जो इंजील में और तमाम इब्तिदाई मसीही बुज़ुर्गों के इलाहियात में मौजूद है, जो चौथी-पाँचवीं सदी से बहुत पहले की है।

      मुझे अफ़्सोस तो ये है कि ख़्वाजा साहब ने अपनी मज़ऊमा (खयाली) तस्लीस को क्यों पेश कर दिया, जिसकी क़ुरआनी तस्लीस के सामने कुछ भी हक़ीक़त और वक़अत नहीं। अगर क़ुरआनी तस्लीस पेश कर देते तो हक़ीक़त ज़ाहिर हो जाती। वही तो इस्लाम है जो इंजील में भी मौजूद है। मैं इस क़ुरआनी तस्लीस को क़ुरआन के अल्फ़ाज़ में निहायत इख़्तिसार के साथ पेश करके इंजील की तस्लीस को इसके मुक़ाबले में रख दूँगा। फिर देखना, हक़ीक़त क्या है, और इस हक़ीक़त पर से मुश्रिकाना फ़ित्रत की बुत-परस्ती का रंग किस तरह उतर जाता है और अस्लियत नुमायाँ हो जाती है। और साथ ही ये भी दिखाऊँगा कि पुराने अहदनामे में भी इस हक़ीक़त का इज़्हार कैसे वाज़ेह और साफ़ अल्फ़ाज़ और म’आनी में किया गया है। मगर ऐसा करने से पेश्तर (पहले) मैं चाहता हूँ कि चंद अल्फ़ाज़ मज़्कूर-बाला अक़्साम (मुख्तलिफ़ क़िस्में) तस्लीस के बारे में लिख दूँ।

      सो वाज़ेह हो कि ये तमाम अक़्साम (मुख्तलिफ़ क़िस्मों) की तस्लीस मह्ज़ ख़्याली मसाइल हैं, मसीही तस्लीस से बिल्कुल मुतफ़र्रिक़ (अलग) बल्कि ख़िलाफ़ हैं। उलूहियत से उनका कुछ लगाओ या मुनासबत नहीं, क्योंकि बा’ज़ तो उनमें से कैफ़-ओ-कम से मुनज़्ज़ह (पाक) नहीं और वे माद्दा की कैफ़ियात हैं जो मख़्लूक़ हैं। ख़ुदा और उनमें ख़ालिक़-मख़्लूक़ का ताल्लुक़ है।

      मसलन बरस की तीन कैफ़ियतें, फ़ीसा ग़ौरत की तस्लीस में एक उक़नूम ख़ुदा है जो वाजिब-उल-वजूद, ख़ालिक़ व मालिक व परवर-दिगार हस्ती है और अज़ल से अबद तक क़ायम व दायम है और तमाम सिफ़ात-ए-इलाही से मुत्तसिफ़ है। मगर वे कायनात और रूह-इन्सानी दूसरे दो उक़नूम (जिन्हें ख़्वाजा साहब ने उक़नूम नहीं कहा), क्योंकि वे लिख भी न सकते थे, इसलिए कि वे उक़नूम हो ही नहीं सकते, मख़्लूक़ हैं, मुरक्कबात में फ़ानी हैं, मुहताज व ताबे हैं और उलूहियत उनमें नहीं है।

      और यही सूरत प्लोटॉर्क वाली तस्लीस की है। ये सब तो ख़ुद ख़्वाजा साहब के क़ौल के मुताबिक़ मुश्रिकाना तबीअत के इक़्तिज़ा हैं और उन लोगों को हक़ाइक़ “मुश्रिकाना रंग में नज़र आ रहे थे।” तो फिर मसीहिय्यत को इन मुश्रिकाना तालीमात के साथ क्या ताल्लुक़ और निस्बत? हाँ, अगर इन अम्सिला से मसीही कुछ इस्तिफ़ादा कर सकते हैं, तो वो ये है कि तस्लीस की तालीम वो इलाही हक़ीक़त है जो क़दीम से तमाम क़ौमों में पाई जाती है, जिसको वे अपनी अक़्ल और हिक्मत से तलाश और तहक़ीक़ करते-करते ऐसे दूर जा पड़े कि उन्होंने ख़ुदा की सच्चाई को बदल कर झूट बना डाला और मख़्लूक़ात की ज़्यादा परस्तिश और इबादत की, निस्बत उस ख़ालिक़ के जो अबद तक महमूद है। (रोमियों 1:25)

      ये सबकी सब बातें तो मुसन्निफ़ यनाबीअ-उल-मसीहिय्यत के क़ौल के मुताबिक़ “हकीमाना हक़ीक़त, नज़ारा-ए-कायनात, पुराने तख़य्युल ने इन हक़ाइक़ को मुश्रिकाना रंग में देखा”, ये तस्लीस “जिस्मानी निज़ाम” में है, न कि इलाही हक़ीक़त या रुहानी नज़ारा या इल्हाम-ए-इलाही से असली रंग में ज़ाहिर की हुई हक़ीक़त, जिसको इंजील ने ज़ाहिर किया है।”

      मसअला तस्लीस के मुताल्लिक़ “अगर एक मुश्रिकाना निगाह नय्यर-ए-आज़म ही को अपना ख़ुदा और रब मान ले तो हमारी बला से हमें क्या? आख़िर है तो यह काम “मुश्रिकाना निगाह” का।” अगर आप भी मान लें, जैसा कि ख़ुद मान ही रहे हैं (क्योंकि मानते न तो मुश्रिकाना निगाह वालों की वकालत किस तरह करते) तो कुछ मज़ाइक़ा नहीं। मसीही तस्लीस तो तमाम मुश्रिकाना और हकीमाना तस्लीसों से बिल्कुल मुतफ़र्रिक़, आ’ला व रफ़ीअ है,

चह निस्बत ख़ाक रा बा आलम-ए-पाक

      आप को हक़ीक़त से क्या वास्ता, जब आप ही के क़ौल से ये बातें सूरज पर हर बयान में एक मुश्रिकाना ख़याल से सही तौर पर चस्पाँ होती हैं। तो ऐसा ही करते चले जाएँ। आपके ही क़ौल के मुताबिक़ वो मसीह पर तो चस्पाँ नहीं होतीं। यही तो हमारा मक़्सद है कि ये सारी तस्लीसें मसीही तस्लीस पर चस्पाँ नहीं हो सकतीं। हमारे मुख़ालिफ़ की दलील ही की ज़बान से हमारा दावा सही हो गया। और उन्हीं के ज़िम्न में आपकी मज़ऊना (ख़याली) तस्लीस भी आ गई, जो ख़ुदा और उसके अज़ली इरादे से बनती है।

      ज़ाहिर है कि ख़्वाजा साहब का ख़ुदा से कुछ झगड़ा नहीं, जिसका इक़रार है, और न ही रूह-उल-क़ुद्स से, जो उनका मअहूद ज़हनी है, लिहाज़ा ख़िलाफ़-अज़-मबहस है। सारा झगड़ा तो मसीह ख़ुदावंद की “असली ज़ात” के बारे में है। “ज़ात-ए-इलाही का मज़हर-अव्वल और मज़हर-ए-कुल, अल्लाह त’आला के इरादा-ए-अज़ली” को तो मानने को तैयार हैं और मान भी लिया है, मगर मसीह को कलिमतुल्लाह (کلمتہ اللہ) का मज़हर मानने के लिए न सिर्फ़ तैयार ही नही, बल्कि सख़्त मुख़ालिफ़ हैं।

      जनाब-ए-मन, इरादा अज़ली हक़ सुब्हानहू की ज़ात का मज़हर है या ख़ुद उसकी एक सिफ़त है, ना कि मज़हर, मज़हर तो कायनात है, जिससे वो अज़ली इरादा ज़ाहिर होता है। और न सिर्फ़ इरादा अज़ली का मज़हर है, बल्कि उसकी दीगर सिफ़ात, मसलन उसकी क़ुद्रत और दानाई वग़ैरह का भी मज़हर है। इस अज़ली इरादे का मुरीद कौन है? क्या वो अल्लाह जल्ले शानहु नहीं? पस वो ज़ात-ए-अल्लाह तो न हुई, बल्कि सिफ़त-ए-अल्लाह है। हमें तो आपका ये फ़ल्सफ़ा भी इसी “मुश्रिकाना रंग” में रंगा हुआ नज़र आता है, जिसमें क़दीम हुकमा का ये फ़ल्सफ़ा आप रंगा हुआ दिखाते हैं। तो आप में और उन में क्या फ़र्क़ रहा? हम तो ऐसे मुश्रिकाना रंग को हक़ीक़त पर से उतारना चाहते हैं, मगर आप उस पर और चढ़ाए जाते हैं।


2 मिट्टी (मामूली चीज़) की उस पाक दुनिया (आ’ला, पाक चीज़) से क्या निस्बत (बराबरी) है?

      प्यारे और मुहतरम दोस्त, ये क़ुरआन के मज़्हब-ए-हक़्क़ा से, जो उसने तस्लीस के बारे में इंजील से लेकर आपको सिखाया है, और बा’ज़ वक़्त आप अपने मबहस से ऐसे दूर चले जाते हैं कि अस्ल मज़्मून को सिर्फ़ एक-दो फ़िक्रों के बाद ही भूल जाते हैं। चुनान्चे तस्लीस का बयान करते-करते फ़ौरन कहते हैं कि “यहाँ ईसाइय्यत ने भी मसीह का हक़ीक़ी मज़्हब छोड़कर इस अम्र में तस्वीर-परस्ती की।”

      वाह साहब! सवाल अज़-आसमां, जवाब अज़-रेसमां। बहस तो तस्लीस पर और आ गिरेमसीहियों की तस्वीर-परस्ती पर। भला तस्लीस को तस्वीर-परस्ती से क्या निस्बत? क्या इंजील में तस्वीर-परस्ती का हुक्म है या जाइज़ ठहराई गई है? क्या आप साबित कर सकते हैं कि मसीही तस्वीरों को मान कर उनकी परस्तिश करते हैं?

      ज़रा रोमन कैथोलिकों ही से, जिनकी तरफ़ आपका ग़ालिबन इशारा है, पूछो, क्या वो कहेंगे कि हाँ, हम ऐसा करते हैं? कुजा मसअला-ए-तस्लीस का मफ़्हूम, और कुजा तस्वीर-परस्ती का मफ़्हूम। इन दोनों मफ़हूमों में तो तबाइन की निस्बत पाई जाती है, यानी इन दोनों मफ़हूमों में कुछ भी ताल्लुक़ नहीं। तो एक मफ़्हूम दूसरे मफ़्हूम पर किस तरह सादिक़ आ सकता है? लिहाज़ा तस्वीर-परस्ती का इल्ज़ाम मसीहियों पर न सिर्फ़ लगाना ही फ़ुज़ूल है, बल्कि मसअला तस्लीस के मबहस में इसे लाना ही फ़ुज़ूल है।

      अब मैं क़ुरआनी तस्लीस हदिया नाज़रीन करता हूँ। लेकिन पहले इस अम्र को मल्हूज़ ख़ातिर रखना ज़रूरी है कि लफ़्ज़ “तस्लीस” या “उक़नूम” मसीही इलाहियात की मुस्तलहात (इस्तिलाहें) हैं, जिनमें से इस मसअला मुन्दरिजा किताब का बयान किया जाता है। ये अल्फ़ाज़ न तो इंजील में पाए जाते हैं और न क़ुरआन में। इसलिए अगर इन मुस्तलहात (इस्तिलाहात) से, जो इंजीली नहीं, थोड़े अरसे के लिए ज़हन को साफ़ रखकर इस मसअले पर क़ुरआन और इंजील की तालीम पर ख़ुलूस-ए-क़ल्ब (साफ़-दिल) से ग़ौर करेंगे तो हक़ीक़त आप पर मुबर्हन (ज़ाहिर) हो जाएगी।

      दूसरी बात ये कि जिस तस्लीस पर क़ुरआन में एतराज़ हुआ है, वो इंजीली तस्लीस नहीं, और न ही मसीही उसको मानते हैं, और न ही मसीह इब्ने-मर्यम को और मर्यम को (अल्लाह के साथ मिला कर) तीन ख़ुदा मानकर मसीह को तीन में का एक मानते हैं। हाँ, अलबत्ता उस कलिमे को, जो इब्ने-मर्यम के जिस्म में मुजस्सम हुआ था, उसको उक़नूम-ए-सानि मानते हैं, जो बाइबल की तालीम है।

      और न ही मियाँ कमालुद्दीन साहब के “तीन में एक और एक में तीन” को हम से कुछ वास्ता है, क्योंकि उसका ताल्लुक़ भी इंजील से कुछ नहीं। हाँ, एक बात का ज़िक्र यहाँ भी ज़्यादा ज़रूरी मालूम देता है, कि अल्फ़ाज़ “बाप, बेटा, पैदा हुआ” ये इंजीली मुस्तलहात हैं, जिनसे जिस्मानियत को बिल्कुल दख़ल नहीं, और उसके मफ़हूमात से बिल्कुल अलैहदा हुआ करते हैं, और उसी इल्म की रोशनी में उनको समझा और इस्तिमाल किया जाता है।

      क़ुरआन में बेशक अल्फ़ाज़ ख़ुदा, मसीह, या कलिमे के हक़ में नहीं आए, बल्कि जिस्मानी नुक़्ता-ए-ख़याल से ख़ुदा और मसीह के बारे में उन पर एतराज़ किया गया, जिसको हम भी तस्लीम करते हैं, क्योंकि वो जिस्मानी तौर पर मुस्तअमल (इस्तिमाल) नहीं हुए, और न ही ख़ुदा और कलिमे के बारे में वो जिस्मानी तौर पर मफ़्हूम होते हैं। पस इन बातों पर ऐसे मौक़े पर ज़रूर लिहाज़ रखना चाहिए ताकि ग़लतफ़हमी वाक़ेअ न हो। ये अम्र रोज़-ए-रोशन की तरह ज़ाहिर है कि ख़ुदा की हस्ती का क़ुरआन में एतराफ़ किया गया है, उसकी जमा (सभी) सिफ़ात का भी ज़िक्र है, और उसको बिल-ख़ुसूस “अल्लाह” के नाम से मौसूम किया गया है। इसके लिए किसी क़ुरआनी सूरह या आयत का हवाला देने की कुछ ज़रूरत नहीं।

      फिर अल्लाह के कलिमे की हस्ती का भी इक़रार है, कि वो “कलिमतुल्लाह” और “रूहु-मिन्हू” है। वो मर्यम मुबारका की तरफ़ डाला गया, और उसके बतन-ए-अतहर से पैदा हुआ, मुजस्सम होकर। उसका रुत्बा रसूल का है, दुनिया और आख़िरत में मर्तबा वाला है, लोगों के लिए निशान है, ख़ुदा की रहमत है, और उसका होना अम्र-ए-मुक़्तजियन है। वो क़ियामत की घड़ी का निशान है। शैतान ने उसको नहीं छुआ, यानी वो हर क़िस्म के गुनाह से पाक और मासूम है, वग़ैरह-वग़ैरह।

      फिर “रूह-उल-क़ुद्स” का भी साफ़-साफ़ ज़िक्र है, कि “हमने ईसा इब्ने-मर्यम को रूह-उल-क़ुद्स से मदद दी।” अहले-किताब के दिलों में उसी रूह से ईमान और इमदाद दी है। क़ुरआन भी रूह-उल-क़ुद्स ही के ज़रीये नाज़िल हुआ, वग़ैरह।

      तमाम बयान से ज़ाहिर है कि “अल्लाह, कलिमतुल्लाह, रूह-उल-क़ुद्स” का ज़िक्र क़ुरआन में बे-ऐनिही, वैसे ही तौर पर आया है। जैसे इंजील में ख़ुदा, कलिमा (लोगस) और रूह-उल-क़ुद्स का है, न क़ुरआन में उन को ख़्वाजा साहब के अल्फ़ाज़ में “तीन में एक और एक में तीन” कहा गया है, न इंजील में, न क़ुरआन में उनको तस्लीस कहा है।

      क़ुरआन के इस बय्यन (खुले) बयान के सामने ख़्वाजा साहब की अज़ली इरादे की तस्लीस की क्या वक़अत और ज़ीनत हो सकती है। ये मसअला तस्लीस मज़्हब, या अस्ल इस्लाम का एक जुज़्व-ए-आज़म है, जो क़दीम से हर ज़माने की क़ौमों के अंदर मौजूद है, गो मुश्रिकाना रंगत से रंगीन है, और ग़लत-बयानी से भरा। क्योंकि ये सिर्फ़ उन की अक़्लों की इख़्तिरा (बनावट) है, न कि इल्हाम-ए-इलाही का मुकाशफ़ा। ताहम इंजील के लोशन से उसको अस्ल हक़ीक़त पर से धोकर साफ़ करना हमारा काम है, ताकि वो राज़-निहानी जो इंजील में मौजूद है, और जिसकी तस्दीक़ क़ुरआन ने भी की है, अपनी पूरी चमक, दमक और क़द्र-मंज़िलत में मुन्कशिफ़ (ज़ाहिर) हो जाए। और इस अम्र में भी हमारे मुख़ालिफ़ ही के वकील की ज़बानी हमारा दावा साबित, और वकील साहब का दावा ख़ारिज हो गया।

      मैं बज़ोर ख़्वाजा साहब को दावत देता हूँ, कि आईए, सच्चे इस्लाम के पैरौ (मानने वाले) हो जाइए, जो आप ही की ज़बानी “नूह से लेकर सय्यदना मसीह तक हर क़ोम व मिल्लत को दिया गया।” और मसीह के पास से वो मुसफ्फ़ा (साफ़) और पाकीज़ा लेकर नोश फ़रमाएँ, जो “जो वह्यी इलाही की शक्ल में” इंजील शरीफ़ में ख़ुदा की तरफ़ से सब के लिए यकसाँ नाज़िल हुआ।” सय्यदना मसीह आप को बदीं (खुले) अल्फ़ाज़ दावत देता है:

“अगर कोई प्यासा हो, तो मेरे पास आकर पिए। जो मुझ पर ईमान लाएगा उसके अंदर से, जैसा कि किताब-ए-मुक़द्दस में आया है, ज़िंदगी के पानी की नदियाँ जारी होंगी।”