रुहानी ऑक्सीजन

Spiritual Oxygen

रुहानी ऑक्सीजन
By

Nasir
नासिर
Published in Nur-i-Afshan Oct 09, 1890

नूर-अफ़्शाँ मत्बूआ 9 अक्टूबर, 1890
ज़माना-ए-हाल में साईंस का चिराग़ घर-घर रोशन है। इल्म तबीअयात के रिसाले मकतबों में पढ़ाए जाते हैं। इसलिए ज़रूर नहीं कि हम अपने नाज़रीन को ऑक्सीजन की निस्बत इब्तिदाई सबक़ सिखाना शुरू करें। हर-चंद इस गैस से हर एक ख़वांदा शख़्स कम व बेश वाक़िफ़ होगा। लेकिन मज़ुकूर-उल-सदर-उन्वान (यहां पर दिया गया उन्वान) बहुतों को हैरत में डालेगा कि रुहानी ऑक्सीजन से हमारी क्या मुराद है?

जिन लोगों से नेचर (कुदरत) के नज़ारों को नज़र ताम्मुक़ (ग़ौर करने) से देखना सीखा है उन पर इस क़द्र रोशन हुआ होगा कि इन नज़ारों की आड़ में कोई आला हक़ायक पोशीदा हैं और जो लोग इल्म-ए-मारिफ़त में परवाज़ करते हैं उन को हर एक बर्ग व गुल में रुहानी आलम की खूबियां नज़र आती हैं।

क्या आलम के उस्ताद-ए-अज़ीम ने जिसने फ़रमाया कि मुझसे सीखो मौजूदा ज़िंदगी की ज़रूरीयात और अश्या को सामने रखकर रुहानी आलम की रास्तीयाँ दुनिया के सामने पेश नहीं कीं? वर्ना नव-ज़ादगी और ज़िंदा रोटी और ज़िंदा पानी जहां का नूर वग़ैरह अल्फ़ाज़ के मअनी हैं? ग़र्ज़ दीदनी अश्या नादीदनी हक़ायक़ का गोया अक्स हैं।

रुहानी ऑक्सीजन से हमारी मुराद है कि आलम माद्दी में ऑक्सीजन गैस अपने बाअज़ सिफ़ात व ख़वास में रूहुल-क़ुद्दुस से मुशाबेह है। अलबत्ता हम अपने नाक़िस इल्म व अक़्ल के मुताबिक़ जो तशबीहात क़ायम करें वो सिवाए मजमूआ चंद ख़यालात होने के क़ाबिल सनद नहीं। जिन मुशाहदात व मालूमात से इस तश्बीह का सलसा राक़िम के दिल में क़ायम हुआ नाज़रीन के पेश किया जाता है।

अव्वलन क़ाबिल-ए-लिहाज़ है कि ज़बान इब्रानी में जो लफ़्ज़ हवा के लिए मुक़र्रर है वही रूह की मअनी में मुस्तअमल होता है। चुनान्चे किताब पैदाईश के पहले बाब की दूसरी आयत में बाअज़ मुफ़स्सिरीन ने “ख़ुदा की रूह” की जगह “ख़ुदा की हवा” बेहतर तर्जुमा समझा है। बाअज़ दीगर मुक़ामात में भी ये लफ़्ज़ इसी तरह इस्तिमाल किया गया है। हमारे ख़ुदावंद ने जब रूहुल-क़ुद्दुस की तासीर का ज़िक्र किया तो हवा की मिसाल पेश की (देखो इंजील यूहन्ना 3:8) जिस जर्मन लफ़्ज़ से गैस मुसतख़रज है उस के असली मअनी भी रूह के हैं।

सानियन ऑक्सीजन के सिफ़ात व ख़वास की किस क़द्र मुताबिक़त।
(1) ऑक्सीजन बेरंग नादीदनी बे-ज़ाइक़ा बेबू है ग़र्ज़ ज़ाहिरी तौर पर नमूदार नहीं तो भी हर जगह मौजूद है वैसा ही रूहुल-क़ुद्दुस भी ज़ाहिरी हवास के ज़रीये तमीज़ नहीं की जा सकती इन्ही सिफ़ात से मालूम होती हैं। (चुनान्चे देखो अय्यूब 23:8, 9 और यर्मियाह 23:24 और रोमीयों 11:33)

(2) ऑक्सीजन गैस हवा में बग़ैर किसी कीमीयाई आमेज़िश के मौजूद है रूहुल-क़ुद्दुस भी आज़ाद है। (देखो ज़बूर 51:12 में आज़ाद रूह का ज़िक्र)

हवा में नाईट्रोजन का होना फ़क़त ऑक्सीजन को पतला करने की ख़ातिर है। अगरचे नाईट्रोजन कई एक अश्या और ख़ुसूसुन इन्सानी जिस्म की तर्कीब के लिए ज़रूर है तो भी हवा में ऑक्सीजन के साथ कीमीयाई तौर से मिली हुई नहीं। चुनान्चे तनफ़्फ़ुस वग़ैरह में इस के नफ़ी सिफ़ात ज़ाहिर हैं क्या यहां गुनाह की हस्ती का इशारा नहीं पाया जाता जो रूहुल-क़ुद्दुस के काम के मुख़ालिफ़ है?

(3) ऑक्सीजन शोला को क़ायम रखने वाली गैस है। रूहुल-क़ुद्दुस भी रुहानी आग को क़ायम रखती है। चुनान्चे 1 थिस्सलुनीकियों 5:19 में है रूह को मत बुझाओ (नीज़ आमाल 2:3 में “आग की सी ज़बानें” और इब्रानियों 1:7 में “ख़ुदा के ख़ादिम आग का शोला।” गौरतलब हैं।)

(4) ऑक्सीजन ज़िंदगी बख़्श गैस है और बज़रीये दौरान-ए-ख़ून के जिस्म के हर हिस्से में बक़द्र ज़रूरत तक़्सीम की जाती है। ख़ुर्द-बीनों के ज़रीये दर्याफ़्त किया गया है कि अक्सर बुख़ारात और मुतअद्दी अमराज़ ख़ून में कई क़िस्म के ख़ुदर व हैवानात के दाख़िल होने से पैदा होते हैं और बाअज़ आलिमों की राय है कि ये हैवानात जिस्म में से ऑक्सीजन खींच लेने से अमराज़ पैदा करते हैं। गोया जिस्म की ज़िंदगी इस में है कि इन ईज़ा रसां हैवानात का मुक़ाबला करे। रूहुल-क़ुद्दुस भी हज़क़ीएल 37:14 में ज़िंदा करने वाली रूह कहलाती है। (किसान की तम्सील में “चिड़ियां” मत्ती 13:14,19 और तारीकी के इक़तिदार वालों से जंग इफ़िसियों 6:12 क़ाबिल-ए-ग़ौर हैं)

(5) ऑक्सीजन ख़ून को साफ़ करके ज़िंदगी को बहाल और क़ायम रखती है जिस वक़्त यसअयाह नबी ने क़ौम बनी-इस्राईल की ख़स्ता-हाली का ज़िक्र किया और मसीह की सल्तनत को पनाह-गाह क़रार दिया वो फ़रमाता है कि “ख़ुदावंद यरूशलीम का लहू उस के दर्मियान रूह अदल और रूह सोज़ां से साफ़ करेगा।” (यसअयाह 4:4)

(6) ऑक्सीजन गैस में ख़फ़ीफ़ शोले की रोशनी भी इस क़द्र तेज़ हो जाती है कि आँखें चिन्ध्याने लगती हैं यानी ऑक्सीजन रोशन करने वाली गैस है। मत्ती 25:3,4 और यूहन्ना 2:20,27 से ज़ाहिर है रूहुल-क़ुद्दुस भी रोशन कनुंदा है। ख़ुरूज 13:21 में “आग का सुतून।” और मुकाशफ़ा 4:5 में “आग का चिराग़” ग़ौर के लायक़ हैं।)

(7) ऑक्सीजन सतह ज़मीन पर हर जगह कस्रत से मौजूद है। उस के हासिल करने में फ़क़त दम को अंदर खींचना काफ़ी है।

इस तरह रूहुल-क़ुद्दुस भी ख़ुदा की बख़्श है और ख़ुदा हर वक़्त उस को देने के लिए तैयार है और वो कस्रत से देता है बशर्ते के कोई उसे ख़ुशी से क़ुबूल करना चाहे। (यसअयाह 55:1, यूहन्ना 3:34)

जब हमारा दम हवा में जा मिलेगा और जिस्म ख़ाक के नीचे पड़ा रहेगा। उस वक़्त हमको ऑक्सीजन दरकार नहीं होगी। लेकिन रूहुल-क़ुद्दुस जो हमारी रुहानी ज़िंदगी को क़ायम रखती हो एक ऐसे आलम में भी अबद-उल-आबाद रोशनी और ख़ुशी बख़्श होगी जहां गुनाह और ज़वाल का साया भी नहीं। क्या ही ख़तरनाक हालत है उन लोगों की जो रूहुल-क़ुद्दुस का सामना करते हैं।

ऐ नाज़रीन क्या आप ख़ुदा के इस मुफ़्त इनाम को क़ुबूल करने के लिए तैयार हैं?

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ख़ुद इन्कारी

Self-Denying

ख़ुद इन्कारी
By

Kidarnath
केदारनाथ
Published in Nur-i-Afshan Dec 18, 1890

नूर-अफ़्शाँ मत्बूआ 18 दिसंबर, 1890 ई॰
पस जब हम ईमान से रास्तबाज़ ठहरे तो ख़ुदा के साथ अपने ख़ुदावंद यसूअ मसीह के वसीले से सुलह रखें। (रोमीयों 5:1)

रोमीयों के ख़त की तफ़्सीर देखने से मालूम होता है कि पौलुस रसूल ने ये ख़त कलीसिया-ए-रोम को लिखा, उस ज़माने में शहर तमाम दीगर शहरों से आला और अफ़्ज़ल है गोया कि मुख़्तलिफ़ अक़्साम (मुख्तलिफ़ क़िस्में) की ग़ैर-अक़्वाम का मर्कज़ बन रहा था रसूल की ग़र्ज़ ये थी कि ऐसे शहर को मसीह की तरफ़ खींचे जाएं। इसी तरह आज ये ख़त बल्कि ये आयत हमारे सब के वास्ते ख़ास हिदायत है जबकि मुख़्तलिफ़ मुक़ामात के मसीहीयों की ताअलीम इल्म इलाही के वास्ते ये मदरिसा मर्कज़ है और यहां से तैयार हो कर हम लोग चारों तरफ़ ख़ुदा के कलाम की ख़िदमत के वास्ते भेजे जाते थे। लिहाज़ा ज़रूर है कि थोड़ी देर के वास्ते इस आयत पर ग़ौर कर के एक दूसरे के लिए कोई ख़ास और मुफ़ीद नसीहत हासिल करें। इस आयत के दो हिस्से हैं। पहला हिस्सा शर्त है और वो सिरा जज़ा यानी जबकि ईमान हाँ सिर्फ़ ईमान ही से रास्तबाज़ी पाई तो नतीजा ये हुआ कि मसीह के वसीले हम में और ख़ुदा में मेल हुआ। पस न हमारी कोशिश से रास्तबाज़ी हमको मिली और ना बग़ैर मसीह के वसीले हम ख़ुदा से मेल (जुड़ना, सुलह होना) पा सकते हैं तो आपका मौज़ूद ख़ुद इन्कारी लेने अपने आप कुछ ना जानना निकलता है। अब सवाल पैदा होता है कि हम क्या करें ताकि ख़ुद इन्कारी के मर्तबे तक पहुंचें। तो जवाब ये होगा कि ना सिर्फ अपने दिलों से बल्कि अपनी रफ़्तार व गुफ़तार से यहां तक कि हर एक काम से ये सीख लें कि फ़क़त ईमान के सबब रास्तबाज़ ठहर कर मसीह के वसीले हम में और ख़ुदा में मेल हुआ। इस वक़्त हम ग़ैर-अक़्वाम के लिए नमूना बन सकते हैं और हम आप ईमान और मसीह से फ़ायदा पा सकते हैं।

मुंदरजा ज़ैल दलाईल से हम अपने ख़ुद इन्कारी के दावे को साबित कर सकते हैं।
अव्वल, कि हम अपनी बुलाहट पर बग़ैर किसी शक व शुब्हा के इस तरह क़ायम और मज़्बूत हों कि उस में किसी सूरत से दो दिलापन ना पाया जाये और ये हमारी दिली हालत पर मौक़ूफ़ है कि जब हम यसूअ मसीह से वाक़िफ़ ना थे और ख़ुदा के कलाम को रद्द करते थे और नफ़्सानी हाँ शैतानी ख़यालात में फंस कर अपने झूटे गंदी धज्जी जैसे नेक-आमाल पर रास्तबाज़ बनना चाहते थे और नापाक वसीलों से ख़ुदा में मेल करना चाहते थे। उस वक़्त रूह पाक के ज़रीये से हमको ईमान इनायत हुआ क्योंकि ईमान भी ख़ुदा ही की बख़्शिश है और यूं रूहुल-क़ुद्दुस की बुलाहट पर हम इन बेहूदा ख़यालात से निकाल कर यसूअ मसीह बुलाए गए और ख़ुदा से मेल हुआ। पस अब हमारे दिल का क्या हाल है क्या हम इस में कोई फ़ख़्र करने का मौक़ा पाते हैं क्या अब भी हम में कोई वो ख़ूबी पाई जाती है जो अपनी कोशिश से हासिल की हो या कोई ऐसी सूरत भी है कि हमारे हज़ार बुरे कामों और ख़यालों को ख़ुदा हमारे किसी नेक काम या अच्छे ख़्याल से बदल डालेगा अगर इन वहमों से निकल गए हैं तो सच-मुच अब्रहाम की मानिंद हम उन में से बुलाए गए और हक़ीक़ी कनआन लेने ईमान के सबब रास्तबाज़ी में पहुंचाए गए।

दोम, जिस तरह हमको यक़ीन है कि रात के बाद सुबह और दिन के बाद शाम ज़रूर होती है या दिन को सूरज और रात को चांद सितारे आस्मान में ज़ाहिर होते हैं या आदमी को मरना ज़रूर है और इस बाबत हमको कभी शक नहीं होता। क्या इसी सूरत हमको ना सिर्फ दिल से बल्कि अपनी रफ़्तार व गुफ़तार और हर एक काम से यक़ीन है कि ख़ुदा ने मह्ज़ अपनी ख़ुशी व मर्ज़ी से बर्गुज़ीदों के वास्ते मसीह के साथ फ़ज़्ल का अहद बाँधा और यसूअ मसीह ने कफ़्फ़ारा देकर अपने बेशक़ीमत लहू से बहिश्त की सारी खोई हुई नेअमतों को हमारे ही वास्ते ख़रीद लिया और वो हमको ज़रूर मिलेंगी और ख़ुदा-ए-सादिक़ जो क़ादिर-ए-मुतलक़ है और अपने वाअदे में सच्चा है और वो जो चाहे सो कर सकता है। अगर यही यक़ीन और इसी के मुताबिक़ हमारा रवय्या है तो सच-मुच हम ईमान के सबब रास्तबाज़ी है।

सोम, जैसे बीमार दवा खा कर बीमारी से चंगा हो जाता है और फिर अपने में मर्ज़ का कुछ आसार नहीं पाता है। क्या वैसे ही हम भी गुनाह की बीमारी में थे और मसीह ने हमको चंगा किया, अब अपने में गुनाह की तासीर नहीं पाते हैं बल्कि गुनाह का नाम सुन कर घबरा जाते हैं और अगर कमज़ोरी से कभी ठोकर खाते हैं तो उसी वक़्त सँभाले जाते हैं और वो सारी पिछली ख़राब आदतें हम में नहीं हैं तो फ़िल-हक़ीक़त मसीह हम में और हम मसीह में हैं और वो हमारा वसीला है।

चहारुम, जिस तरह ख़ुदा अपने सूरज को, नेक व बद दोनों पर उगाता है और अपना मीना (पानी) रास्त व नारास्त पर बरसाता है। क्या इसी तरह हम भी अपने दोस्त व दुश्मन दोनों को प्यार करते हैं उन को अपनी दुआओं में भूल नहीं जाते लानत के बदले बरकत चाहते हैं और ना सिर्फ ज़बानी बल्कि अमली तौर पर भी मुहब्बत बताते हैं अपना आराम छोड़कर उन के दुखों में तक्लीफ़ उठाते हैं हर एक के रंज व राहत में शरीक होते हैं या जहान से कुछ बदला पाने की उम्मीद नहीं वहां भी कुछ कर के दिखाते हैं अगर ये हो तो बेशक ख़ुदा हमारा मेल हो।

हासिल कलाम

इस ज़माने में जबकि अक्सरों के ख़्याल में हिन्दुस्तानी कलीसियाओं में इस्लाह की सख़्त ज़रूरत है और ये हमारे ऊपर मौक़ूफ़ है तो अब क्या देर है कि हम ख़ुद इन्कारी का सबक़ ना सीखें। दरहालिका हम इसी ग़र्ज़ से ताअलीम पाते हैं मिशन हमारी सारी ज़रूरीयात को रफ़ा करती है लाज़िम है कि हम आज ही से बल्कि इसी वक़्त से अपने आपको उम्दा नमूना बना दें। अगर हम में से कोई किसी कलीसिया का पासबान मुक़र्रर हो तो उसे सँभाले या मुनाद हो तो बहुत सी रूहों को बचाने का ज़रीया बने और जिस तरह हम सिर्फ ईमान से रास्तबाज़ ठहरे ना अपने आमाल से और मसीह के वसीले ख़ुदा में मेल पाया, ना अपनी कोशिश से इसी तरह औरों को भी अपने नमूने से ये बेश-बहा नेअमतें जो ख़ुदावंद हम में से हर एक को ऐसा बना दे मसीह की ख़ातिर से। आमीन

मज़्हबी पेशावर

Religious Worker

मज़्हबी पेशावर
By

One Disciple
एक शागिर्द
Published in Nur-i-Afshan Dec 06, 1890

नूर-अफ़्शाँ मत्बूआ 6 नवम्बर, 1890 ई॰
हमारे उन्वान से नाज़रीन मुतअज्जिब होंगे और ख़्याल करेंगे कि मज़्हबी पेशावर कौन होते हैं और उन से क्या मुराद है? बेहतर होगा कि हम इस मतलब को एक हंगामें की कैफ़ीयत का मुख़्तसर बयान करने से जो एशिया के एक मशहूर क़दीम शहर इफ़िसुस में वाक़ेअ हुआ ज़ाहिर व आश्कारा करें। पौलुस रसूल ने जबकि दो बरस तक इस शहर में जो बुत-परस्ती व जादूगरी एक महसूर क़िला था इंजील की मुनादी कर के बहुत लोगों को मसीही दीन का मुअतक़िद (अक़ीदतमंद) बनाया और जादूगरों ने अपनी क़ीमती किताबें जो पचास हज़ार रुपये की थीं लोगों के आगे जला दीं और इस तरह वहां ख़ुदावंद का कलाम निहायत बढ़ गया और ग़ालिब हुआ, तो उस वक़्त वहां इस राह की बाबत बड़ा फ़साद उठा क्योंकि दीमतेरेस नामी एक सुनार जो अर्तमस देवी के पहले मंदिर बनाता था और इस पेशे वालों को बहुत कमवा (फ़ायदा दिलवाना) देता था उस ने उन को और ग़ैरों को जो वैसा (मज़्हबी पेशा) काम करते थे जमा कर के कहा कि ऐ मर्दो तुम जानते हो कि हमारी फ़राग़त इसी काम की बदौलत है और तुम देखते और सुनते हो कि सिर्फ इफ़िसुस में नहीं बल्कि तमाम एशिया के क़रीब में इस पौलुस ने बहुत से लोगों को तर्ग़ीब देकर गुमराह कर दिया है कि कहता है ये जो हाथ के बनाए हैं ख़ुदा नहीं हैं। सो सिर्फ यही ख़तरा नहीं कि हमारा पेशा बेक़दर हो जाये बल्कि बड़ी देवी अर्तमस का मंदिर भी नाचीज़ हो जाएगा और इस की बुजु़र्गी जिसे तमाम एशिया और सारी दुनिया पूजती है जाती रहेगी। जब उन्होंने ये सुना तो ग़ुस्से से भर गए और चिल्ला के कहा कि इफ़िसियों की अर्तमस बड़ी हो। दीमतेरेस सुनार जो इस मुफ़सिदा (झगड़े) का सरग़ना था एक मज़्हबी पेशा-आवर आदमी था। इस क़िस्म के लोग मज़्हब के पर्दे में हमेशा अपनी ज़ाती व जिस्मानी अग़राज़ व फ़वाइद के हुसूल में सरगर्म व मसतग़र्क (मसरूफ़) रहते हैं और हस्बे-ख़वाह (मर्ज़ी के मुताबिक़) मतलब निकालते हैं। वो ख़ूब जानते हैं कि हमारी फ़राग़त इसी काम की बदौलत है और इस के बरख़िलाफ़ ताअलीम देने वाले को अपना क़तई दुश्मन जान कर मक़्दूर (ताक़त) भर उस को ईज़ा पहुंचाने और अपने हम-पेशों को इस की मुख़ालिफ़त पर आमादा करने में बदल व जान सई करते हैं। क्या इस ज़माने में मुल्क हिंद में भी इस क़िस्म के मज़्हबी पेशा-वर पाए जाते हैं? हम यक़ीनन कह सकते हैं कि इंजील की मुख़ालिफ़त करने वाले ज़्यादातर यही लोग इस मुल्क के तमाम बड़े शहरों ख़ुसूसुन तीर्थों ज़्यादा निगाहों और दरगाहों में आजकल बकस्रत मौजूद हैं।

मसीही वाइज़ों ने अक्सर इस बात का तजुर्बा किया होगा, हमको अजमेर दारुल-सल्तनत राजपूताना में बतक़रीब उस सालाना मेला के जो यक्म रज्जब से उस की सात तारीख़ तक ख़्वाजा मुईन-उद्दीन-चिश्ती साहब मशहूर दरगाह की ज़ियारत के लिए फ़राहम होता है जाने और इंजील की मुनादी करने का इत्तिफ़ाक़ पड़ा और अक्सर ये ही देखा कि वहां की दरगाह के ख़ुद्दाम व मुताल्लिक़ीन ज़्यादातर मुख़ालिफ़ थे क्योंकि उन की फ़राग़त इसी कमाई से थी कि लोग बकस्रत हर अतराफ़ व जवानिब हिंद से आकर मिन्नतें गुज़रानते और नज़राने चढ़ाते हैं और मुर्दा के आगे सरबसजूद होते हैं। हमें याद है कि एक मुहम्मदी क़ारी साहब जो अक्सर मसीही वाइज़ों के साथ भी बह्स किया करते ख़्वाजा साहब के ख़ुद्दाम को अक्सर ब-तन्ज़ कहा करते थे कि “तुम्हारा ख़ुदा तो मर गया ख़्वाजा साहब तुम्हारा ख़ुदा है” हमने नाज़रीन से इस दरगाह की सैर कराने का वाअदा किया था देखो नूर-अफ़्शाँ 17 अक्टूबर सफ़ा 5 कालम 3 का फुट नोट। अब नाज़रीन ख़्याल में एक ख़ादिम दरगाह…. के हमराह चलें और बुलंद दरवाज़े से जिसकी सीढ़ीयों और गोखों पर बहुत से हर दर्जे के हम-रकाब चलने को मुस्तइद खड़े हैं दाख़िल हों और बकस्रत सक़ा (मोअतबर) सूरतें नज़र आयेंगी। दरगाह में मक़बरे के निहायत उम्दा व आलीशान दरवाज़े में दाख़िल हो कर इस मज़ार के सामने एक गिरोह जुब्बा और अमामे पहने, तस्बीहें गलों में डाले और हाथों में लिए हुए मोद्दब सफ़ बस्ता खड़े हुए देखेंगे। ये सब मुक़र्रब खुद्दाम हैं और बारी-बारी से ये यहां हाज़िर रहते हैं। जो ख़ादिम शुरू से तुम्हें यहां तक लाया उस के साथ दो-चार उनमें से भी शरीक हो कर मज़ार की ज़ियारत कराने में मदद देते हैं। मज़ार की पायंतीयों (पांव की तरफ़) एक हाथ भर गहरा और गोल छोटा पुख़्ता गढ़ा है जिसमें ज़ाएर (ज़ियारत करने वाले) को कहते हैं कि इस में हाथ डाल के जो कुछ ख़्वाजा साहब की तरफ़ से बख़्शिश हो निकालो। हमने इस में हाथ डाला और निकाल के देखा तो चंद मुरझाए हुए चमेली के फूल थे। सभों ने कहा ये बड़ी बख़्शिश आप को अता हुई है! मज़ार पर कुछ नक़दी व मिठाई वग़ैरह चढ़ाना ज़रूर पड़ता है। अवाम में मशहूर है कि अगर किसी के हाथ में सोने या चांदी का छल्ला अँगूठी हो और इस घड़े में हाथ डाले जो पाइं मज़ार है तो कोई ग़ैबी हाथ उस को पकड़ लेता और जब तक वो छल्ला अँगूठी नज़र ना किया जाये नहीं छोड़ता मगर हमारा हाथ किसी ने ना पकड़ा शायद ये वजह है कि हाथ में कोई अँगूठी छल्ला ना था। मज़ार की ज़ियारत व तवाफ़ के बाद वही ख़ादिम ख़्वाजा साहब के वुज़ू करने नमाज़ पढ़ने चुल्हा खींचने की जगहें दिखाता जहां एक-एक दो-दो हाज़िरबाश मुक़ामी मुजाविर (इबादत-गाह का मुहाफ़िज़) मौजूद हैं और हर जगह कुछ बाक़ी हो किसी ना किसी बहाने से उन लोगों को भेंट चढ़ा दिया जाता है। रोज़मर्रा सदहा वारिद सादिर इस मशहूद दरगाह की ज़ियारत को आते हैं और मेले के अय्याम में हफ़्ते भर तमाम अतराफ़ हिंद के लोगों का यहां बड़ा हुजूम रहता है।

अह्दे-जदीद क्योंकर फ़राहम किया गया?

How did we get the Gospel?

अह्दे-जदीद क्योंकर फ़राहम किया गया?
By

One Disciple
एक शागिर्द
Published in Nur-i-Afshan Dec 18, 1890

नूर-अफ़्शाँ मत्बूआ 18 दिसंबर, 1890 ई॰
वो कौन सी बात है जो इस किताब में और दूसरी किताबों में फ़र्क़ व इम्तियाज़ करती है? ये किस की किताब है? किस ने इस को बनाया? इस अम्र में बेदीन लोगों के अजीब ख़यालात हैं। एक अख़्बार में एक बेदीन शख़्स का लिखा हुआ एक आर्टीकल हमारी नज़र से गुज़रा जिसमें लिखा था कि “325 ई॰ में नाईस (निक़ाया) की कौंसल ने अह्दे जदीद को मुरत्तिब किया। उन लोगों के पास बहुत अनाजील और नामजात (ख़ुतूत) असली और जाली मौजूद थे। जिनमें कोई तफ़रीक़ व तमीज़ ना कर सकता था। पस उन्होंने उन सभों को फ़र्श पर रख दिया और दुआ मांगी कि असली हिस्से की कमियो-नैन-टेबल (जिस मेज़ पर पाक शराकत का सामान रखा जाता है) पर चले जाएं और जाली फ़र्श पर पड़े रहें। ये वो तरीक़ा था जिससे मौजूदा अहदे-जदीद मुरत्तिब किया गया।” ये वो क़िस्म ख़ुराक है जिसको बेदीन लोग निगलते और हज़म करते हैं क्योंकि आजकल अक्सर बेदीन लोगों की तस्नीफ़ात में जिन्हें वो लोग शाएअ करते हैं ये बयान पाया जाता है। राक़िम आर्टीकल कहता है कि ये बयान पापियास की सनद पर क़ायम है जो कि एक क़दीम मसीही बिशप था। लेकिन अगर इस रिवायत को तस्लीम किया जाये तो ये मुश्किल वाक़ेअ होगी कि पापियास ने नाईस (निक़ाया) की कौंसल के इनइक़ाद से एक सौ पचास बरस क़ब्ल वफ़ात पाई और मदफ़ून हुआ। पस बे दीनों ने ये ख़बर बदरूहों से पाई हो तो ताज्जुब नहीं। एच॰ एल॰ हेस्टिंग्स साहब फ़रमाते हैं कि “मेरे पास एक मुख़्तसर लाइब्रेरी है” (ये पच्चीस जिल्दें हैं) जिनमें क़रीब बारह हज़ार सफ़े इन मुख़्तलिफ़ मुसन्निफ़ों की तहरीर हैं जिन्हों ने उनको 325 ई॰ से पेशतर रखा था जबकि नाईस (निक़ाया) की कौंसल फ़राहम हुई। इन किताबों में अक्सर मुक़द्दस नविश्तों के इक़तिबासात भरे हुए हैं। इस से मालूम होता है कि उन मुसन्निफ़ों के पास वो ही किताबें थीं जो अब हमारे पास हैं। उन्होंने वो ही आयात इक़्तिबास कीं जो अब हम किया करते हैं। उन्होंने उन्हीं अनाजील व नामजात (ख़ुतूत) से इक़्तिबास किए जिसने हम इक़्तिबास करते हैं और जिन जिसने नाईस की कौंसल से सौ बरस पेशतर अपनी किताब लिखी उस में अहदे-जदीद की सब किताबों से 7545 हवाले इक़्तिबास किए हैं। टरटोलेन ने 200 ई॰ में अहदे-जदीद की किताबों से 3000 से ज़्यादा इक़्तिबास किए हैं। कलीमनट ने 194 ई॰ में 380 आयतें इक़्तिबास कीं और अरेनीस ने 178 ई॰ में 767 आयात इक़्तिबास कीं। पोलीकॉर्प जो 165 ई॰ में शहीद हुआ और जिसने छयालीस (46) बरस मसीह की ख़िदमत की उस ने एक ख़त में 36 आयात इक़्तिबास कीं। जस्टिन मार्टर ने 140 ई॰ अह्दे-जदीद से इक़्तिबास किए और उन बुत-परस्त बेदीन मुसन्निफ़ों का तो जैसा कि सिल्बीस जो 150 ई॰ में हुआ और पोरफ़्री जो 304 ई॰ में था ज़िक्र किया है जिन्हों ने महीनों वो आयात इक़्तिबास कीं जो हमारे पास के मौजूदा पाक नविश्तों में पाई जाती हैं और उन के हवाले दीए जाते हैं। स्कॉटलैंड के लार्ड-हील्स ने फ़िल-हक़ीक़त उन मसीही फ़ादरों की तस्नीफ़ात को जो आख़िर सदी सियुम तक गुज़रे थे तलाश कर के उन में बजुज़ ग्यारह आयात के कुल अह्दे-जदीद को इक़तिबासात में भरा हुआ पाया जो अब तक जाबजा मुश्तहिर हैं। पस अगर नाईस (निक़ाया) की कौंसल के वक़्त अह्दे-जदीद की तमाम जिल्दें मफ़्क़ूद हो जातीं तो उन क़दीम मसीही फ़ादरों की तस्नीफ़ात में से अह्दे जदीद की किताब अज़सर-ए-नौ तैयार हो सकती थी जिन्हों ने इस से इक़्तिबास किया जैसा कि फ़ी-ज़माना हम इस किताब से आयात इक़्तिबास करते हैं और जो इस पर ऐसा ही ईमान रखते थे जैसा कि हम ईमान रखते हैं। नाईस (निक़ाया) की कौंसल ने अहदे-जदीद में एक नुक़्ता या शोशा की कमी बेशी मुतलक़ नहीं की। ये किताब मसीह के रसूलों से जो उस के लिखने वाले थे तवातिर के साथ मोमिनीन को पहुंची और निहायत हिफ़ाज़त व होशियारी के साथ महफ़ूज़ रखी गई और नाईस (निक़ाया) की कौंसल के इनइक़ाद से पहले अला-उल-उमूम मसीही कलीसियाओं में पढ़ी जाती थी। पस बे दीनों के तोहमात व शकूक उस की असलीयत की सदाक़त के हक़ में ज़र्रा भर वक़अत नहीं रखते और मुतलक़ क़ाबिल-ए-तवज्जोह नहीं हैं।

हाल में एक किताब मौसूम-बह “मसीही शहादतों के मुशाहदात” जनाब पादरी अलेक्ज़ेन्डर मीर डी डी मुक़ीम ऐड नेबर ने ज़बान अंग्रेज़ी में शाएअ की है जिसमें मुसन्निफ़ आली व दिमाग़ ने निहायत दर्जे की तहक़ीक़ व तफ़्तीश के साथ मसीही दीन की सदाक़तों को इल्मी व तवारीख़ी तौर पर साबित किया है और साहब मौसूफ़ की इजाज़त से हमने उस के पाँच बाबों का उर्दू में तर्जुमा और पहला बाब बउनवान “मसीहीय्यत और इल्म तबई” साल-ए-रवां के शुरू में बाद तसीह व नज़रसानी अजमेर मिशन प्रैस से शाएअ हुआ लेकिन बावजाह अरबी टेप में छापे जाने की ज़्यादातर मतबू ख़ास व आम ना हुआ। अब मिशनरी साहिबान राजपूताना ने हमारी दरख़्वास्त पर बाक़ी चार बाबों का तर्जुमा हमारे पास भेज दिया है जिनको हम चाहते हैं कि बज़रीया नूर-अफ़्शां थोड़ा-थोड़ा कर के नंबरवार हद्या नाज़रीन करें और यक़ीन करते हैं कि इस से उर्दू ख़वाँ मसीहीयों को ख़ुसूसुन और ग़ैर-अक़्वाम को उमूमन फ़ायदा कसीर हासिल होगा।

अह्दे-जदीद की सेहत की क़दीम तवारीख़ी गवाही का बयान

मज़्मून ज़ेल का मक़्सद अह्दे-जदीद की सेहत के लिए क़दीम तवारीख़ी गवाही का एक मुख़्तसर और साफ़ बयान करना है कि अह्दे-जदीद की ख़ास किताबों को अस्ल और सही क़ुबूल करने के लिए हम क्या तवारीख़ी शहादत रखते हैं? लिहाज़ा ये मज़्मून अंदरूनी से नहीं लेकिन सिर्फ बैरूनी शहादत से मुताल्लिक़ है। ये मैदान जो हमारे सामने है बड़ा वसीअ है। और सिर्फ एक आम तरीक़े में हमारी मौजूदा हदूद के अंदर इस पर बह्स की जा सकती है। पस ज़रूरी है कि बग़ैर दकी़क़ बातों के मुफ़स्सिल बयान करने के हम ज़ेल के ख़ास दलीलों को मुख़्तसर तौर पर बयान करने पर इक्तिफ़ा करें। दीन ईस्वी मह्ज़ एक अक़्ली मज़्हब नहीं जिसको इन्सानी अक़्ल इन सामानों के जो ख़ल्क़त में इस के सामने पड़े हैं ईजाद कर सके लेकिन बख़िलाफ़ इस के वो एक ऐसा मज़्हब है जो बुलंदतर तब्क़े से ख़ल्क़त के ऊपर उतरता है कि गिरी हुई अबतर ख़ल्क़त की इस्तिलाह करे यानी वो एक फ़ौक़-उल-ख़लक़त इल्हाम है वो इल्हाम जो आस्मानी तब्क़े से उतरता है और इसलिए इस के मज़ामीन सिर्फ किताबों या ज़बानी रिवायत से मालूम हो सकते हैं। अला-उल-ख़ुसूस वो एक ऐसा मज़्हब है जो अपनी बुनियाद बाअज़ बड़ी फ़ौक़-उल-ख़ल्क़त हक़ीक़तों में रखता है जैसे कि मसीह का तजस्सुम ज़िंदगी, अमल, मौत, क़ियामत और सऊद लेकिन ये हक़ीक़तें अगरचे फ़ौक़-उल-ख़लक़त हैं लेकिन इस वजह से कि वो गुज़श्ता माजरे हैं हमको सिर्फ़ किताब या ज़बानी रिवायत से तवारीख़ी शहादत से मालूम हो सकते हैं। हम लोगों को जो इस उन्नीसवीं सदी में हैं वाजिब है कि ज़बानी रिवायत को नजर-अंदाज़ करें और अपनी तवज्जोह किताबों की शहादत पर महदूद करें। लेकिन चूँकि दीन ईस्वी के तवारीख़ी माजरे और ज़ाहिर की हुई सदाक़तें अह्दे-जदीद में मुन्दरज हैं। पस सवाल ये है कि अह्दे-जदीद को हवारियों के ज़माने की अस्ल और सही तस्नीफ़ क़ुबूल करने के लिए हम कौनसी तवारीख़ी शहादत रखते हैं।

ये अम्र ग़ालिब है कि अक्सर मसीही अपने ज़माने की कलीसियाई आम शहादत पर अह्दे-जदीद को सही और मोअतबर क़ुबूल करते हैं वो इधर-उधर देखते और दुनिया में एक जमाअत मौजूद पाते हैं जो ईसाई कलीसिया कहलाती है। वो बहुत से मुल्कों में फैल गई है और वो बहुत मुख़्तलिफ़ यानी प्रोटैस्टैंट, रोमन कैथोलिक, ग्रेग या यूनानी, अरमीनेन्, सीरियन और कोपटक वग़ैरह फ़िर्क़ों में मौजूद है। मगर ये फ़िर्क़े बाहम कैसे ही मुख़्तलिफ़ हों और बाज़-औक़ात उनकी बाहमी मुख़ालिफ़त कैसी ही सख़्त हो लेकिन एक बात में सब मुत्तफ़िक़ हैं यानी वो अह्दे-जदीद को हवारियों और उनके रफ़ीक़ों की अस्ल तस्नीफ़ क़ुबूल करते और अपनी बुनियाद अज़ीम और मुस्तनद अहद जान कर इस पर भरोसा रखते हैं और ये मुत्तहदा शहादत इन तक़सीमों की वजह से जो कलीसिया में मौजूद हैं किसी तौर से कमज़ोर नहीं लेकिन बावजह ग़ैर-तमंदि हरीफ़ों की गवाही होने के वो बहुत ज़्यादा मज़्बूत ठहरती है।

मुतफ़र्रिक़ कलीसियाओं की मुत्तहिद गवाही की आम बुनियाद पर मसीही लोग अक्सर करके अह्दे-जदीद की किताबों को अस्ल और सही क़ुबूल करते हैं। इस सूरत में कोई बात ख़िलाफ़ अक़्ल नहीं है लेकिन निहायत माक़ूल है। ये ठीक वैसी ही बुनियाद है कि जिस बुनियाद पर लोग अक्सर गुज़श्ता तवारीख़ी माजरों और किताबों को जो ज़माना हाय बईद से हम तक पहुंचे हैं क़ुबूल करते हैं अगर हम किसी औसत दर्जे के आदमी से सवाल करें कि तुम ऐसे तवारीख़ी माजरों को जैसा कि मुहारिबा काबुल या जंग प्लासी या सिकंदर-ए-आज़म या लुथर की ज़िंदगी के मुक़द्दम माजरों को किस वास्ते क़ुबूल करते हो? तो ग़ालिबन ये जवाब देगा कि मैं इन बातों को आम मोअर्रिखों की तहरीक की बुनियाद पर क़ुबूल करता हूँ। अगर हम सवाल करें कि तुम किस बिना पर सिकन्दर नामा को निज़ामी की और गुलिस्तान को सअ़दी की और दफ़्तर को अबू-अल-फ़ज़ल की तस्नीफ़ क़ुबूल करते हो तो वो ग़ालिबन ये ही जवाब देगा कि मैं इसलिए क़ुबूल करता हूँ कि उनको अला-उल-उमूम अहले इल्म ने ऐसा क़ुबूल किया है। ये एक माक़ूल जवाब है और सिर्फ ये ही जवाब है जो लोग बकस्रत बल्कि ताअलीम- याफ्ता लोग भी दे सकते हैं पस बतरीक़ ऊला मसीही भी अह्दे-जदीद की किताबों को कलीसिया की मुत्तफ़िक़ गवाही की अला-उल-उमूम बुनियाद पर क़ुबूल करते हैं और ये बुनियाद जहाँ तक कि इस की हद ही बिल्कुल एक माक़ूल बुनियाद है।

जब हम दर्याफ़्त करते हैं कि गवाही की क्या ख़ासीयत है और इस का क्या माक़ूल बयान हो सकता है तो ज़रूर ये जवाब होगा कि वो ख़ुसूसुन तवारीख़ी शहादत का मुक़द्दमा है यानी वो ऐसी क़िस्म की गवाही है जैसी वो कि जिसकी बिना पर हम किसी दूसरी किताब या तवारीख़ी माजरे को जो गुज़श्ता ज़माने से हम तक पहुंचे हैं क़ुबूल करते हैं। इसलिए ये वो मसअला नहीं है जिसके साथ हम तबई कुछ सरोकार रखता हो क्योंकि वो बिल्कुल उसके जायज़ अहाता से बाहर है। मुताबिक़ इन क़ाईदों के जो पहले मुतालआ में बयान किए गए इल्म तबई तवारीख़ी नुक्ता दानी की क़लमरू से ठीक इस क़द्र कम सरोकार रखता है जिस क़द्र कि तवारीख़ी नुक्ता दानी इल्म तबई की क़लमरू से रखती है। इल्म तबई मसलन इल्म तर्कीब ज़मीन ऐसे तवारीख़ी माजरों की निस्बत जैसा कि मुहारिबा काबुल या जंग प्लासी ही कुछ भी नहीं कहता है फिर इल्म तबई मसलन इल्म हईय्यत कुछ मुक़र्रर नहीं करता है कि आया फ़िल-हक़ीक़त सिकन्दर नामा निज़ामी की या गुलिस्तान सअ़दी की और दफ़्तर अबू-अल-फ़ज़ल की तस्नीफ़ात हैं। ऐसे सवालों की निस्बत वो कुछ नहीं ठहराता है क्योंकि वह है बिल्कुल उस के अहाते से बाहर हैं और तवारीख़ी नुक्ता दानी के बाकोल मुख़्तलिफ़ अहाता में हैं। इसी तरीक़े पर इल्म तबई अह्दे-जदीद की किताबों की सेहत व ग़ैर-सेहत के हक़ में कुछ नहीं कहता है। वो एक ऐसी तहक़ीक़ है जो तवारीख़ी नुक्ता दानी और शहादत के सीग़ा से जो बिल्कुल एक मुख़्तलिफ़ सीग़ा है इलाक़ा रखती है।

अह्दे-जदीद की सेहत का बयान

ये एक आसान अम्र तो है कि हम मौजूदा सदी से शुरू करके अपने अह्दे-जदीद का सुराग़ पिछली सदी से सदी तक लगा दें तावक़्ते कि हम क़दीम कलीसिया तक पहुंच जाएं। लेकिन ये एक तक्लीफ़देह और बिल्कुल बिला ज़रूरत काम होगा। पस हम अहदे-जदीद के तीन बहुत पुराने क़लमी नुस्ख़ों की मदद से जो लतीफ़ परवरदिगारी से हमारे ज़माने तक पहुंचे हैं चौदह या पंद्रह सदी के ऊपर एक चौकड़ी भरते हैं। अपनी तहक़ीक़ात की इस मंज़िल पर हम इस से बेहतर नहीं कर सकते कि इन मुअज़्ज़िज़ और लायक़ गवाहों को अदा-ए-शहादत के लिए तलब करें।

इन गवाहों को महकमे में बुलाने से पेशतर ये मुनासिब होगा कि बतौर तुम्हें कुछ बयान करें। फ़िल-हक़ीक़त छापे के फ़न के ईजाद होने से पेशतर और किताबों की मानिंद अह्दे-जदीद सिर्फ़ क़लमी किताबत से नक़्ल किया जाता था। किताबों को क़लम से लिखने का ये काम अगले ज़मानों की तारीकी के अंदर मसीही ज़ाहिदों का एक ख़ास पेशा बन गया था और उनकी सनअत के ख़ूबसूरत और मुज़य्यन नमूने बहिफ़ाज़त हमारे ज़माने तक पहुंचे हैं। वो किताबें जो यूं लिखी जाती थीं क़लमी नुस्खे़ कहलाती हैं। बिल-फ़अल अह्दे-जदीद के क़लमी नुस्ख़ों की बहुत जिल्दें हैं जो बहुत क़दीम ज़मानों से हमारे वक़्त तक पहुंची हैं। ये एक मुसल्लिमा हक़ीक़त है कि क़दीम यूनान की मोअतबर तस्नीफ़ात की बहुत किताबें हमारे ज़माने तक महफ़ूज़ रखी गई हैं जो एक मुख़्तसर कुतुब ख़ाना बनाने के लिए काफ़ी हैं। लेकिन टशनडराफ़ एक जर्मनी आलिम जिसकी वफ़ात के थोड़े दिन गुज़रे और जो बनिस्बत हमारे ज़माने के किसी आदमी के अह्दे-जदीद के पुराने क़लमी नुस्ख़ों का ज़्यादा इल्म रखता था यूं बयान करता है कि मशीयत इलाही ने अह्दे-जदीद के लिए बनिस्बत तमाम यूनानी क़दीम किताबों के बड़ी क़दामत के सबूत ज़्यादा पहुंचाए हैं। फ़िल-वाक़ेअ वो इस मुक़ाम पर क़लमी नुस्ख़ों के इलावा कलीसिया के क़दीम मुसन्निफ़ों के इक़तिबासों और तर्जुमों का इशारा करता है। ये हक़ीक़त जिसका ऐसा पुर-ज़ोर बयान हुआ है एक निहायत आला क़द्र की है और हमारे ईमान को मज़्बूत करने के लिए एक वसीला जान के चाहे कि इस को अपने दिलों पर गहरी नक़्श करें। इस से ज़ाहिर है कि बाइबल के आलिमों के पास ब-इफ़रात सामान है जिससे एक मोअतबर यूनानी अह्दे-जदीद जमा कर सकें।

तीन क़दीम नुस्ख़ों में से पहला जिसको हम गवाह तलब करते हैं वो है जो अलैगज़ेंडरीन कहलाता है उसने ये नाम इस वजह से पाया है कि वो सत्रहवीं सदी में मिस्र के शहर सिकंदरीया से जहां ग़ालिबन वो लिखा गया लाया गया था। वो शहर लंदन के अजाइब ख़ाना में महफ़ूज़ है। वो उम्दा बड़े हुरूफ़ में क़लम से लिखा गया है। आलिमों में से इस पर इत्तिफ़ाक़ है कि वो चौदह सौ बरस का लिखा हुआ है। पस वो एक ही चौकड़ी में हमें क़रीब 450 ई॰ तक वापिस ले जाता है वो बिल्कुल पूरा नहीं है क्योंकि दनी और पुराना होने के बाइस किस क़द्र बिगड़ गया है। लेकिन इस में अह्दे-जदीद की सब किताबो के हिस्से हैं और निहायत साफ़-साफ़ हम पर ज़ाहिर करता है कि 450 ई॰ के क़रीब कलीसिया के साथ में ये ही अह्दे-जदीद था जो अब हमारे हाथ में है।

दूसरा क़दीम क़लमी नुस्ख़ा जिसकी गवाही हम पेश करते हैं वीटीकन नुस्ख़ा है। इस को ये नाम इसलिए दिया गया कि वो शहर रोम में बमुक़ाम विटीकन पोप की लाइब्रेरी में महफ़ूज़ है। अलैगज़ेंडरीन नुस्ख़ा की मानिंद वो बड़े हुरूफ़ में लिखा गया है अगरचे वो हुरूफ़ इस क़द्र ख़ुशख़त नहीं हैं ताहम वो किस क़द्र ज़्यादा पुराना है और पंद्रह सौ बरस से ज़्यादा का है। पस वो फ़ौरन क़रीब 350 ई॰ तक वापिस ले जाता है। लेकिन अफ़्सोस कि वो पूरा नहीं है। मुकाशफ़ात और बाअज़ छोटे ख़ुतूत इस में नहीं हैं लेकिन वो साफ़ इस हक़ीक़त पर गवाही देता है कि उमूमन क़दीम ज़माने का अह्दे-जदीद ऐसा ही था जैसा कि अब हमारे हाथ में मौजूद है।

तीसरा क़लमी नुस्ख़ा जिसको हम गवाह लाते हैं मज़्कूर हर दो नुस्ख़ों से ज़्यादातर मुफ़ीद है। ये वो है जो आलिमों में सीनेटक नुस्खे के नाम से मशहूर है। इस का ये नाम इसलिए दिया गया है कि वो सिना पहाड़ पर सैंट कथरीन की पुरानी ख़ानक़ाह में 1859 ई॰ में दर्याफ़्त हुआ। टशनडराफ़ जर्मनी आलिम जिसका आगे इशारा हो क़लमी नुस्ख़ों की तलाश में मशरिक़ को एक सिफ़ारत पर भेजा गया था जहां उस को परवरदिगारी से इस क़दीम ख़ानक़ाह में इस अनमोल ख़ज़ाने को पाने की नामवरी हासिल हुई। इस के दर्याफ़्त होने के मुताल्लिक़ अजीब बयानात हैं। लेकिन हम उनको फ़िलहाल कलमबंद ना करेंगे। वो इस को हासिल करने में कामयाब हुआ। और अब वो नुस्ख़ा सैंट पटरस बर्ग की शाही लाइब्रेरी में महफ़ूज़ रखा हुआ है। वो तीनों नुस्ख़ों में निहायत ख़ुशख़त है और क़रीब पंद्रह सौ बरस का है और ग़ालिबन 350 ई॰ के क़रीब लिखा गया है। इस में अह्दे-जदीद पूरा है और क्यों हमें निहायत साफ़ गवाही देता है कि इस क़दीम ज़माने का अह्दे-जदीद ठीक ऐसा ही था जैसा कि अब हमारे पास मौजूद है।

हमने इन तीन मुअज़्ज़िज़ गवाहों को ईस्वी ममालिक के तीन दारुल-सल्तनतों से तलब किया है। पहला लंदन से जो प्रोटैस्टैंट ताअलीम का दारुल-सल्तनत है। दूसरा रोम से जो रोमन कैथोलिक ताअलीम का दारुल-सल्तनत है और तीसरा सेंट पीटर्सबर्ग से जो यूनानी कलीसिया का दारुल-सल्तनत है। और हम देखते हैं कि इनकी गवाही निहायत साफ़ है। वो ना सिर्फ साफ़ है बल्कि कामिल इत्तिफ़ाक़ रखती है और दलालत करती है कि 350 ई॰ के क़रीब यानी वफ़ात यूहन्ना के 250 बरस बाद क़दीम कलीसिया के हाथ में ये ही अह्दे-जदीद था जो हमारे हाथ में है।

इख्तिलाफ़ात क़ुरआनी

Contradictions in the Quran

इख्तिलाफ़ात क़ुरआनी
By

Alfred
अल-फ्रेड
Published in Nur-i-Afshan Dec 11, 1890

नूर-अफ़्शाँ मत्बूआ 11 दिसंबर, 1890 ई
नूर-अफ़्शाँ नंबर 39 मत्बूआ 25, सितंबर 1890 ई॰ के सफ़ा 4 में भाई खैरुल्लाह साहब ने इख्तिलाफ़ क़ुरआनी पर हमला किया मुहम्मदी पसपा हुए पर अफ़्सोस कि आपने फ़क़त तीन ही इख्तिलाफ़ दिखाए चाहीए था कि 5 या 6 इख्तिलाफ़ पेश करते ताकि वो फिर सर ना उठा सकते। 2 सलातीन 13 बाब 18, 19 आयत। लिहाज़ा मौक़ा पाकर मैं भी कुछ नज़राना पेश-ए-ख़िदमत नाज़रीन करता हूँ।

1- इख्तिलाफ़। सूरह माइदा रुकूअ 10 आयत 75 “और कुछ नहीं मसीह मर्यम का बेटा मगर रसूल है।” ये आयत मुख़ालिफ़ है बक़रा 33 रुकूअ 253 आयत से कि, “सब रसूल बड़ाई दी हमने उन में एक को एक से कोई है कि कलाम किया उस से अल्लाह ने और बुलंद किए बाज़ों के दर्जे और दीं हमने ईसा मर्यम के बेटे को निशानीयां सरीह (वाज़ेह) और ज़ोर दिया उस को रूह पाक से।” और निसा 23 रुकूअ 171 आयत “मसीह जो है ईसा मर्यम का बेटा रसूल है अल्लाह का और उस का कलाम जो डाल दिया मर्यम की तरफ़ और रूह है उस के यहां की।” और आले-इमरान रुकूअ 5 आयत 45 “जब कहा फ़रिश्तों ने ऐ मरियम अल्लाह तुझको बशारत देता है एक अपने कलिमा की जिसका नाम मसीह ईसा मर्यम का बेटा मर्तबे वाला दुनिया में और आख़िरत में और नज़्दीक वालों में।” पस पहली आयत में लिखा है कि मसीह फ़क़त रसूल है बाक़ी तीन आयतों में है कि ईसा को रूह पाक से ज़ोर मिला और आख़िरत और ख़ुदा की नज़दीकियों में है।”

2- इख्तिलाफ़। सूरह बक़रा 34 रुकूअ 256 आयत “और ज़ोर नहीं दीन की बात में खुल चुकी है ज़लालत और बे राही।” ये आयत मुख़ालिफ़ है सूरह तौबा 10 रुकूअ 73 “ऐ नबी लड़ाई कर काफ़िरों और मुनाफ़िक़ों से और तुंद-ख़ूनी कर उन पर।” और तौबा 16 रुकूअ 123 आयत। “ऐ ईमान वालो लड़ते जाओ अपने नज़्दीक के काफ़िरों से और चाहीए उन पर मालूम हो तुम्हारे बीच में सख़्ती।” और सूरह तहरीम 2 रुकूअ 9 आयत। “ऐ नबी लड़ काफिरों से और दग़ाबाज़ों से सख़्ती कर उन पर।” पहली आयत में दीन की बाबत ज़ोर नहीं चाहीए बाक़ी तीन आयतों में दीन की बाबत काफ़िरों से ज़ोर करना और लड़ना और उन पर सख़्ती करना लिखा है।

3- इख्तिलाफ़। सूरह बक़रह 14 रुकूअ 115 आयत, और अल्लाह की है मशरिक़ व मग़रिब सो जिस तरफ़ तुम मुँह करो वहां ही मुतवज्जोह है अल्लाह “बरअक्स इस के देखो बक़रा रुकूअ 15, 17 आयत 142-151 तक जिसका ख़ुलासा ये कि जिस जगह तुम हो अपना मुँह मस्जिद-उल-हराम की तरफ़ किया करो।” इस में मुख़ालिफ़त साफ़ ज़ाहिर है।

4- इख्तिलाफ़। सूरह बक़रह 27 रुकूअ 217 आयत, “तुझसे पूछते हैं हराम के महीने को उस में लड़ाई करनी तू कह लड़ाई उस में बड़ा गुनाह है।” इस के ख़िलाफ़ देखो सूरह तौबा रुकूअ 5 आयत 36। “बारह महीने में उन में चार हैं अदब के यही है सीधा दीन सो उन में ज़ुल्म ना करो अपने ऊपर और लड़ो मुशरिकों से हर हाल जैसे वो लड़ते हैं तुमसे हाल।” इस में मुख़ालिफ़त साफ़ ज़ाहिर है पहली आयत में हराम के महीने में लड़ाई ममनू हुई और दूसरी आयत में वो रवा ठहरी। वाज़ेह है कि रमज़ान और रज्जब दोनों हराम के महीने हैं पर जंग-बद्र माह रमज़ान की 12-17 तारीख़ तक हुई। और अब्दुल्लाह-बिन बख़्श की लड़ाई दूसरी हिज्री माह-ए-रज्जब में हुई थी। फिर फ़ातेह मक्का भी माह-ए-रमज़ान में हुआ था और बहुतेरे मर्द व औरत क़त्ल हुए थे। 10 रमज़ान को मदीना से चले थे।

5- इख्तिलाफ़। सूरह बक़रह रुकूअ 31 आयत 240 “और जो लोग तुम में मर जाएं और छोड़ जाएं औरतें, वसीयत कर दें अपनी औरतों के वास्ते ख़र्च देना एक बरस तक ना निकाल देना।” इस के मुख़ालिफ़ वही सूरह बक़रह रूकू 30 आयत 234। “और जो लोग मर जाएं तुम में और छोड़ जाएं औरतें, इंतज़ार करवाएं अपने तईं चार महीने और दस दिन” पहली आयत में मुहम्मद साहब ने मुद्दत बेवगी की एक बरस रखी जब देखा कि ये तो मुहम्मदियों पर बड़ा बोझ हुआ तो दूसरी आयत सुनाई कि औरत चार महीने दस दिन तक इंतिज़ार कर ले बाद में फिर निकाह कर सकती है। वाज़ेह हो कि 240 वीं आयत पहले नाज़िल हुई और 234 उस के बाद नाज़िल हुई आयतों की तर्तीब में भी क़ुरआन में बड़ा गढ़-बड़ है।

6- इख्तिलाफ़। सूरह अह्ज़ाब रुकूअ 7 आयत 52 “हलाल नहीं औरतें उस पीछे और ना ये कि इन के बदले और करे औरतें उस पीछे और ना ये कि इन के बदले और करे औरतें अगर ख़ुश लगे तुझको उन की सूरत मगर माल हो तेरे हाथ का।” इस के मुख़ालिफ़ अह्ज़ाब रुकूअ 6 आयत 49 “ऐ नबी हमने हलाल रखी तुझको तेरी औरतें जिनके महर तू दे चुका और माल हो तेरे हाथ का जो पाथ लगा दे तुझको अल्लाह और तेरे चचा की बेटियां और तेरी ख़ालाओं की बेटियां जिन्हों ने वतन छोड़ा तेरे साथ और कोई औरत अगर बख़्शे अपनी जान नबी को चाहे नबी कि उस को निकाह में ले ये नर्मी है तुझ ही को सिवाए मुसलमानों के।” वाज़ेह है कि बैज़ावी और दीगर उलमा इस्लाम कहते हैं कि 49वीं 52वीं आयत के बाद नाज़िल हुई है अगरचे तर्तीब में पहले लिखी है। पस पहले आयत में मौजूदा औरतों और लौंडियों के सिवा और औरतें अगरचे उन की सूरतें मुहम्मद साहब को पसंद भी आएं तो भी निकाह में लाने की मुमानिअत हो। और दूसरी आयत में मौजूदा औरतें और लौंडियों के सिवा मामूं और चचा और फूफियों और ख़ालाओं की बेटियां भी बल्कि वो औरत भी अपना नफ़्स नबी को बख़्श दे निकाह के लिए जायज़ ठहरी। इस में इख्तिलाफ़ साफ़ ज़ाहिर है।

7- इख्तिलाफ़। सूरह अम्बिया रुकूअ 7 आयत 107 “और तुझको जो हमने भेजा सौ महर कर जहां के लोगों पर।” और सूरह फुर्क़ान रुकूअ 5 आयत 58 “और तुझको हमने भेजा यही ख़ुशी और डर सुनाने को।” इन के ख़िलाफ़ देखो सूरह तौबा रुकूअ 10 आयत 74 “ऐ नबी लड़ाई कर काफ़िरों और मुनाफ़िक़ों से तुंद-खोई कर उन पर और ठिकाना दोज़ख़ और बुरी जगह पहुंचने की।” और सूरह तहरीम 9 आयत “ऐ नबी लड़ काफ़िरों और दग़ा-बाज़ों से और सख़्ती कर उन पर और उनका घर दोज़ख़ है।” पहली आयत में महरो ख़ुशी सुनाने को भेजा दूसरी आयात में ज़ुल्म व तअ़दी का हुक्म है (जब तक हज़रत मक्का में थे मेंहर की आयत सुनाते रहे जब मदीना में आए तल्वार की आयत सुनाई) मज़्कूर बाला आयात में इख्तिलाफ़ात ऐसे साफ़ व ज़ाहिर हैं कि तफ़्सीर की हाजत नहीं और ज़िद्दी आदमी भी इन का मुन्किर होगा मैंने थोड़े इख़्तिलाफ़ यहां दिखलाए हैं जो कोई ज़्यादा का ख़्वास्तगार है तो क़ुरआन को और जनाब पादरी इमाद-उद्दीन साहब फ़ाज़िल की किताबें ख़सूसुन तवारीख़ मुहम्मदी और हिदायत-उल-मुस्लिमीन को पढ़े तो सैंकड़ों इख़्तिलाफ़ पाएगा।

ग़र्ज़ कि इख़्तिलाफ़ात कसीरा अस्बाब पर मबनी हैं कि क़ुरआन ख़ुदा का कलाम नहीं है और बमूजब गवाही क़ुरआन के भी क़ुरआन कलाम-ए-इलाही नहीं है (काम वो कीजिए कि दुश्मन भी रज़ामंद रहे) इस सबूत में देखो अव्वल सूरह निसा रुकूअ 11 आयत 82 “क्या ग़ौर नहीं करते क़ुरआन में और ये हो किसी और का सिवाए अल्लाह के तो पाते उस में बहुत इख़्तिलाफ़।”

दोम। इन इख़्तिलाफ़ात कसीरा से बानी क़ुरआन हमा-दान नहीं साबित होता उस की लाइल्मी ज़ाहिर है उस को तगैयुर व तबद्दुल लाज़िम आता है आज का हुक्म और, और कल कुछ और हुक्म सुनाता है। पर ख़ुदा हमा-दान है।

बाक़ी क़ुरआन हमा-दान नहीं।

पस क़ुरआन ख़ुदा से नहीं। यानी क़ुरआन कलाम-ए-ख़ुदा नहीं। कलाम-ए-मुक़द्दस बाइबल के इख्तिलाफ़ निकालने में तो मौलवी रहमतुल्लाह ने बड़े-बड़े ज़ोर मारे पर बावजूद सख़्त मेहनत व तजस्सुस के एक इख़्तिलाफ़ भी दिखा ना सके सिवा और चार ऐसों के जैसे ये है कि एक हवारी लिखता है कि एक अंधा चंगा हुआ और दूसरा लिखता है कि दो अंधे चंगे हुए। पर जब मीज़ान-उल-हक़ और हिदायत-उल-मुस्लिमीन वग़ैरह कुतुब में फाज़िलान-ए-नामदार की तरफ़ से जवाब काफ़ी दीए गए और उन के मअनी समझाए गए तो उन से कुछ ना बन पड़ा बल्कि अपनी ग़लती के क़ाइल हो कर आलम-ए-सुकूत में पनाह ली। ख़ुदावंद यसूअ मसीह फ़रमाता है कि “ऐ रियाकार पहले कांटरी को अपनी आँख से निकाल तब उस तिनके को अपने भाई की आँख से अच्छी तरह देख के निकाल सकेगा।

ऐ मुहम्मदी भाईयो मैं तुम्हारा ख़ैर-ख़्वाह हो कर बमिन्नत कहता हूँ कि ख्व़ाब-ए-ग़फ़लत से बेदार हो कब तक ऐसी बेफ़िक्री में बैठे रहोगे कब तक ऐसी किताब पर तकिया करोगे ज़रा तो अपनी जान पर रहम करो और हक़ की तलाश करो तौबा करो और कलाम-ए-मुक़द्दस इंजील पर ईमान लाओ तब तुम हयात-ए-अबदी के वारिस होगे।

एक मुहम्मदी और ईसाई के सवाल व जवाब

Christian and Muslim Dialog

एक मुहम्मदी और ईसाई के सवाल व जवाब
By

M.D
एम॰ डी॰
Published in Nur-i-Afshan Dec 16, 1890

नूर-अफ़्शाँ मत्बूआ 16 अक्तूबर, 1890 ई॰
मुसलमान : क्यों साहब “आपकी इंजील में लिखा है कि मुबारक वो हैं जो सुलह कराने वाले हैं।” बात तो अच्छी मालूम होती है लेकिन क्या सब जो ईसाई कहलाते हैं ज़रूर सुलह कराने वाले हैं।

ईसाई : नहीं साहब ! मैं अफ़्सोस से कहता हूँ कि बहुत ऐसे हैं जो सिर्फ नाम के ईसाई हैं और उनमें कोई ख़ूबी नहीं पाई जाती जिसके वास्ते हमारे ख़ुदावंद ने मुबारक कहा है।

मुसलमान : तो भला ये बतलाओ फिर फ़र्क़ क्या हुआ इस तरह तो हमारे मुसलमानों में बहुत आदमी बराए-नाम मुसलमान हैं तो फिर वह फ़ज़ीलत दीने-ईस्वी की कहाँ रही जिस पर आप ज़ोर मारते हो?

ईसाई : सुन लीजिए ! दीन की फ़ज़ीलत दीन के मानने वालों पर मुन्हसिर नहीं है बल्कि उस उसूल पर कि जिस पर वो दीन मबनी हो। इन्सान माने या ना माने ये उस की ज़िम्मेदारी है लेकिन उसूल पाक और साफ़ फ़ज़ीलत बख़्श चाहीए। मसलन में अदब और आजिज़ी से और माफ़ी मांग कर अर्ज़ करता हूँ कि अहले-इस्लाम में ये उसूल सुलह कराने वाला जिसको आप भी अच्छा जानते हो पाया नहीं जाता।

मुसलमान : वाह साहब ! आप अजीब क़िस्म के आदमी हो कि “हम-चू मन दीगरे नेस्त” के मसअले पर चलते हो। ये किस तरह साबित कर सकते हो कि इस्लाम में सुलह कराने वाला कोई उसूल नहीं है।

ईसाई : साहब मन ! भला ये बतलाईए कि अगर एक फ़ौज का सिपहसालार एक कमज़ोरी में ख़ुद मुब्तिला हो तो उस की फ़ौज या गिरोह जो उस की पैरवी करता है कब उस की कमज़ोरी पर ग़ालिब हो कर कामयाब होगी।

मुसलमान : बेशक ये तो सच है कि रहबर या सिपहसालार में वो ख़ूबी ज़रूर होनी चाहीए कि जो उस के पैरौं में होना ज़रूरी और मतलूब है।

ईसाई : मर्हबा ! आपके इन्साफ़ पर, लेकिन मैं तो ख़ुद अदब से अर्ज़ करता हूँ। ख़फ़ा ना होना जबकि ख़ुद मुहम्मद साहब में सुलह कराने की रूह ना थी। तो अहले इस्लाम में किस तरह हो सकती है।

मुसलमान : सुनो साहब ! आप फिर ग़ुस्सा दिलाने वाली बात करते हो या तो ये साबित करो वर्ना फिर ऐसी बात अगर मुँह से निकालोगे तो कुछ और सुन लोगे।

ईसाई : भाई साहब ! सुनिए पहले अर्ज़ किया कि दिल दुखाने के वास्ते ये बात नहीं कहता। लो अब साफ़ सुन लो और साबित भी कर लो (ईसाई) क्या ये बात सच नहीं कि जिस आदमी की दो औरतें होती हैं उन हर दो औरतों में सुलह और मेल ग़ैर-मुमकिन हो।

मुसलमान : इस से तो इन्कार नहीं हो सकता क्योंकि हम इस की ख़राबी रोज़ देखते हैं। यहां तक कि रश्क (हसद) के सबब ज़हर खिलाने तक नौबत पहुंची है।

ईसाई : आफ़रीं ! जब दो औरतों की सुलह का ये हाल है तो जहां चार या ग्यारह औरतें हों और वो हिस्सा अपने ख़ावंद की मुहब्बत और इत्तिहाद का जो एक औरत ख़ास अपने वास्ते चाहती है। (और है भी सही क्योंकि ये उस का हक़ है) तो जब वो मुहब्बत या इत्तिहाद या जो कुछ हो चार जगह या ग्यारह जगह तक़्सीम किया जाये तो उन औरतों के गिरोह में सुलह मुम्किन हो? साहब सुनो क्या आँहज़रत के ग्यारह क़बीले नहीं थे और मज़्कूर-बाला बयान के मुताबिक़ उन ग्यारह औरतों में वो सुलह जिसके मअनी आप बख़ूबी समझ सकते हैं क़ायम रह सकती है।

मुसलमान : ख़ामोश।

ईसाई : बस मेरे अज़ीज़ मुसलमान भाई अगर सिपहसालार और रहबर आपका सुलह के उसूल से वाक़िफ़ नहीं बल्कि बरअक्स इस के अपनी ख़ुशी को पूरी करने के वास्ते एक तादाद औरतों में जो ज़ी-रूह थीं निफ़ाक़ और नाराज़गी का बाइस हुए तो ख़ुदा से सुलह इन्सान की किस तरह करा देंगे। तस्लीम। ख़ुदावंद आप पर फ़ज़्ल करे और सुलह का असली मसअला जो यसूअ मसीह के वसीले से दुनिया पर ज़ाहिर हुआ आप पर भी पूरे तौर से ज़ाहिर हो और आपकी सुलह ख़ुदा के साथ इस सच्चे सुलह करने वाले के वसीले से हो। आमीन

अबू सहल मसीही

Abu Sehal

अबू सहल मसीही
3rd Century Christian Scholar

By

Ihsam-U-Din
इह्शाम-उद-दीन
Published in Nur-i-Afshan Dec 04, 1890

नूर-अफ़्शाँ मत्बूआ 4 दिसंबर, 1890 ई
अबू सहल एक निहायत मशहूर मसीही तबीब का लड़का था। हिज्री तीसरी सदी के वस्त में पैदा हुआ। साहब नामा दनशूरान नासरी लिखते हैं कि इस का इल्म व अमल दोनों बराबर और मोअस्सर थे और इन दोनों के लिहाज़ से वो बहुत मशहूर और मारूफ़ था। ग़ालिबन उस के वालदैन की उम्दा ताअलीम और दिलचस्प नमूने का नतीजा होगा। वो सच बात को हाथ से जाने ना देता था वो अख़्लाक़ी और दीनी जज़्बे में आकर सच्ची बहादुरी के मैंबर (पुलपिट) पर खड़ा रहता था और ऐलानीया सच बात का वाअज़ करता था। वो हिक्मत नज़री में युद्द-तोला (یدّ طولی) रखता था। छोटी सी उम्र में इस का नाम मुसल्लम फ़ीलसूफ़ोन की फ़हरिस्त में लिखा गया था। ज़माना मौजूदा में ये बात मशहूर है कि ख़ोशनवीसी से फिलासफर की ज़िद है। हमारे फिलासफर अबू सहल मसीही के दिमाग़ में फ़िलोसफ़ी और खूशनवीसी के दोनों माद्दे मिस्ल-माजून-मुरक्कब (चीज़ों को मिला कर बनाई गई दवाई की तरह) के मिले हुए थे। गो अबू सहल की तालीफ़ात और तस्नीफ़ात से बहुत सी किताबें हैं मगर मशहूर किताबें वो हैं जिनके नाम ज़ेल में दर्ज हैं :-

(1) किताब माया[1]

(2) किताब मुंतख़ब-उल-ईलाज

(3) किताब ख़ुदा की हिक्मत इन्सान के पैदा करने में

(4) इल्म तब्ई में

(5) कुल्लियात तिब्ब

(6) रिसाला दरोबा

(7) ख़ुलासा किताब मुहसबती

(8) किताब [2]दर-रोया

अबू सहल जिस मज़्मून पर किताब लिखना चाहता था उस मज़्मून की बहुत शौक़ और मेहनत, सब्र और इत्मीनान से तलाश और खोज करता था। और सच बात की तहक़ीक़ात करने में कभी तसाहल (सुस्ती) और कमी ना करता था और अपने मज़्मून को आसान बनाता था और उस को दिलकश लफ़्ज़ों और आसान मिसालों में अदा करता था। उस के फ़िक्रात गोया अक़्लीदस के मुसल्लस मसादी अला-ज़िलाअ (مثلث مسادی الاضلاع एक जैसी पैमाइश के) होते थे। और मिस्ल अबू अल-फ़ज़ल के मुबतदा (आग़ाज़) और ख़बर में फ़ासिला ना रखता था और बीच में जुम्ला मोअ़तरज़ात (एतराज़ करने वाला जुम्ला) ना लाता था। उस ने जालीनूस वग़ैरह की किताबों पर बहुत सी नुक्ता-चीनीयां की हैं जिनको मुस्लिम फ़ीलसूफ़ोन (مسلم فیلسوفون) ने शौक़ से तस्लीम कर लिया है, और तज़किरों में उनका बयान किया है। जो किताबें अफ़लातून और जालीनूस (جالینوس) ने लिखी थीं वो अपनी तबीयत के ज़ोर से और तेज़इए फ़हम के सबब उन के मज़्मून की तह तक निहायत सुरअत के साथ पहुंच जाता था और फ़िलासफ़ाना एतराज़ात उन की किताबों पर करता था।

तीसरे नम्बर की किताब पर बहुत से मुस्लिम फिलासफरों की राय तज़किरों और रिजाल की किताबों में दिखाई देती हैं मुअर्रिख़ ख़रज़जी लिखता है कि हमने उस हकीम की किताब को देखा है जो उस के हाथ से लिखी हुई थी। मसीहीयों के नामदार (नामवर) हकीम ने अपनी किताब में परवरदिगार की उस हिक्मत का जो उस ने इन्सान को पैदा करने में ज़ाहिर की है बयान किया है। अल-हक़ उस के फ़सीह लफ़्ज़ और मोअस्सर मअनी इस किताब से अयाँ हो रहे हैं। इस किताब का रुत्बा फ़साहत और अछूते ख़यालात के सबब ज़माना मौजूदा (ख़रज़जी का ज़माना) की तमाम किताबों से बहुत बुलंद और ऊंचा है। बल्कि उस को चंद बातों के सिवा हकीम जालीनूस की किताबों पर फ़ौक़ियत हो।

मुहज़्ज़ब-उद्दीन-अबदुर्रहीम बिन अली जो बड़ा मशहूर मुस्लिम हकीम था उस के इंदीया (राय) में भी अबू सहल मसीही फ़साहत कलाम और जोदत बयान में बेनज़ीर था।

मुअर्रिख़ ख़ज़रजी लिखता है कि, ख़ुद आली दिमाग़ मुसन्निफ़ को अपनी किताब पर फ़ख़्र था। अबू सहल अपनी किताब की निस्बत लिखता है कि गो इस उन्वान पर बहुत से लोगों ने किताबें लिखी हैं। मगर मैंने अपनी किताब में निराला और अछूता ढंग इख़्तियार किया है। हर मुतनफ़्फ़िस को इख़्तियार है कि इस किताब को परखे और अपनी राय लिखे। हमने इस किताब की बुनियाद निहायत तहज़ीब के साथ डाली है। हमने इस किताब की बोल-चाल और इबारत को आम-फहम और आसान बनाया है और तर्तीब ख़यालात और मअनी में बड़ी कोशिश की है। हमने मुख़्तसर अल्फ़ाज़ में मुफ़स्सिला दक़ीक़ नुक्तों को बयान किया है। जो बातें दकी़क़ थीं और फिलासफरों को दिखाई ना दी थीं हमने निहायत जफ़ाकशी से उन को बाहर निकाला है और अपनी किताब के सफ़हात पर चमकाया है।

हमारा दिल चाहता है कि इस जगह पर हमारे ज़माने के मुसल्लिमा अख़्बार और मुसल्लिमा ताअलीम याफ़्तों की रायों को भी याद करें जो मसीहीयों की निस्बत हैं। वो कहते हैं कि मसीही ख़ुश्क-दिमाग़ और भद्दे ख़यालात के थे सिर्फ अहले-इस्लाम की इल्मी शवाओं ने उन के दिमाग़ों को रोशन किया और उलमा और फुज़ला की सफ़ में उन को बिठाया। गो उन्हों ने किसी और इरादे और किसी पहलू से लिखा है मगर साहब नामा दानिश्वरान नासरी लिखता है कि शेख़-उल-रईस अबू अली सीना अबू सहल मसीही का शागिर्द था। गो शेख़ ने बहुत सी किताबें लिखी हैं और उमरा और अपने अहबाब के नाम ख़त्म की हैं मगर इस बावफ़ा शागिर्द ने अपने उस्ताद अबू सहल के नाम लिखे हैं और बतौर तोहफ़े के इस को नज़र किए हैं।

1- रिसाला मसबूती दरअल-हान मौसीक़ी बनाम अबू सहल

2- रिसाला और इल्म दरआये जहत अबू सहल

अबू रिहान बेरूती बड़ा फ़ीलसूफ़ और सीयाख़ मुसन्निफ़ और मूजिद (इजाद करने वाला, बानी) इल्म था। उस ने महमूद ग़ज़नवी के ज़माने में हिन्दुस्तान का सफ़र किया और एक किताब लिखी जिसका नाम किताब-उल-हिंद है। प्रोफ़ैसर शैशव जो जर्मन का एक मशहूर आलिम है जिसकी मसाई से ये किताब लंदन में छपी है और हाल ही में मुंबई में फ़रोख़्त को आई है। अबू रिहान इन पांचों फिलासफरों की सोहबत में रहता था और उन की सोहबत से लुत्फ़ और फ़ायदा उठाता था। नामा दानिश्वरान नासरी मत्बूआ ईरान में लिखा है कि, “अबू रिहान कामिल हफ़्त साल बाअज़ा जाह बाशेख़ अल-रईस अबू अली सीना, अबू अली मशकोयह, अबू सहल मसीही, अबू नस्र इराक़ी, अबू अलख़ैर बिन अलख़मार।

इस हकीम ने एक किताब लिखी और उस का नाम किताब तहारत रखा। हकीम नसीर उद्दीन तूसी ने अरबी से तर्जुमा किया और चंद अबवाब इस में पढ़ा दीए और इस का नाम अख़्लाक़ नासरी रखा। मिन्हु

در سِلک ند مادخاصان خوار زم شاہ منظوم بود

अब्बू-अल-अब्बास मामून बादशाह ख़्वारिज़्म इन पांचों फ़ीलसूफ़ों को फ़िलोसफ़ी के स्टेज पर खड़ा रखता था और इल्मी तमाशा देखता था। गो महमूद ग़ज़नवी बुतों को तोड़ने और काफ़िरों को मुसलमान बनाने में मसरूफ़ रहता था मगर फ़ीलसूफ़ों और आलिमों और शाइरों को भी इल्मी झंडी के नीचे खड़ा रखने को जमा करता था। एलफ़िंस्टन साहब साबिक़ गोहरी लिखते हैं कि गो महमूद की तल्वार इस्लाम बरसता था मगर महमूद का दिल इस्लामी शोर से ख़ाली था उस के तमाम जिहाद सिर्फ पोलीटिकल हिक्मत का नतीजा थे। गो महमूद और अबू-अल-अब्बास इल्म में बहुत नीचे थे मगर दोनों में हर इल्म के माहिर और उस्ताद को इंतिख़ाब करने का मलका उम्दा था।

महमूद ख़्वारिज़्म के फिलासफरों की नुमाइश-गाह को गज़नी में लाना चाहता था मगर तीन फ़ीलसूफ़ों को ख़्वारिज़्म की क़दरो मंजिलत और ख़ूबी ने रोक रखा। अबू सहल और इस के शागिर्द बू-अली-सीना ने ख़्वारिज़्म को ख़ैर बाद कहा और गज़नी को रवाना हुए वो हर मुल्क में अपनी चतुराई (चालाकी) का तमाशा दिखाना चाहते थे इसलिए ख़ाना-बदोश मुसाफ़िरों की मानिंद सफ़र करते थे।

अबू सहल के ज़माने में इस्लामी आफ़्ताब निस्फ़-उन्नहार (दोपहर का वक़्त) पर था। फ़िलोसफ़ी की दिल-कशी बहसों चो तरफ़ इस्लामी उलमा की आवाज़ गूंज रही थी। बू अली सीना की फ़ीलसूफ़ी सर के लिए उलमा के कुफ़्र के फ़तवों का ताज बनाया गया था। अगर हम याद में ग़लती नहीं करते तो अबू सहल के लिए कुफ़्र के फ़तवों का वार एक दो दफ़ाअ चल गया था।

दोनों ख़्वारिज़्म से रवाना हो गए और पंद्रह मील जाकर रास्ता भूल गए और एक ऐसे ब्याबान में जा पड़े जिसमें पानी ना था। अबू सहल तिश्नगी के सबब चालीस बरस की उम्र में जांबहक़ तस्लीम हुआ। मसीही फ़ीलसूफ़ को इस के नामदार (नामवर) शागिर्द ने तिश्ना-लब ब्याबान में मदफ़ून और निहायत रंज और मलाल के साथ याबेअर से होता नीशा पूर चला गया।

[1] इस नादिर किताब पर अमिनुल-दौला ने एक मतूल हाशिया लिखा है। मिन्ह

[2] अब्बू अल-अब्बास मामून ख्वारिज्म शाह के नाम तमाम किया और उस को बतौर तोहफ़ा के नज्र किया। मिन्हु

वह तीसरे दिन मुर्दों में से फिर जी उठा

He was raised on the third day

वह तीसरे दिन मुर्दों में से फिर जी उठा
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Rev,K.C.Chatterji
पादरी के॰ सी॰ चटर्जी,
Published in Nur-i-Afshan May 30, 1889

मत्बूआ 30, मई 1889 ई॰v
बाअज़-बाअज़ मसीह कलीसिया में चंद रोज़ हुए इस्टर की नमाज़ हुई और अब भी इतवार की नमाज़ में इस्टर के ऊपर इशारा होता है ये नमाज़ मसीह के मुर्दों में से जी उठने के यादगार की नमाज़ है। सो मैं नूर-अफ़शाँ के पढ़ने वालों की ख़िदमत में चंद बातें मसीह के जी उठने की बाबत पेश करता हूँ।

इस माजरा का बयाँ चारों इंजील में पाया जाता है। मत्ती रसूल बयान करता है कि ख़ुदावंद यसूअ मसीह मुर्दों में से जी उठ कर पहले ईमानदार औरतों को दिखाई दिया और कहा तुम सब ख़ुश हो। लूक़ा और यूहन्ना बयान करता है कि जब वो जी उठने के बाद ईमानदार मर्दों से पहले मिला तब फ़रमाया तुम पर सलाम इस फ़र्क़ का सबब एक मशहूर मसीही के मुअल्लिम यूं बयान करता है :-

“औरतों का ईमान मज़्बूत था वो सिर्फ़ मसीह के दुख और मौत के सबब से ग़मगीं थीं। और इस वास्ते ख़ुदावंद ने उन को कहा तुम सब ख़ुश हो। मर्दों का ईमान सुत हो गया था वो सोचते थे कि मसीह बनी-इस्राईल को मख़लिसी बख़्शेगा इस वास्ते उस के मर जाने से ना उम्मीद हो कर हैरान होते थे उनका दिल शक व शुब्हा से भर गया था इस वास्ते मसीह ने उन को देखकर कहा तुम्हें सलाम यानी तुम्हारे दिल में सलामती हो मत घबराओ।”

शक शुब्हा को दिल से दूर करो। देखो मैं जीता हूँ ये कलाम सलामती का हमारे लिए भी ज़रूर है। नेचर के क़ाईदों की पाएदारी पर एतिक़ाद इस क़द्र बढ़ गया है और मुख़ालिफ़-ए-दीन मसीही के एतराज़ मसीह के जी उठने पर इस क़द्र ज़ाहिर हो रहा है कि ख़्वाम-ख़्वाह उस की निस्बत दिल में घबराहट पैदा होती है। और उस को मान लेना निहायत मुश्किल मालूम होता है। सलामती तब ही दिल में पैदा हो सकती है। जब उस के जी उठने पर पूरा यक़ीन हो और ये यक़ीन तब ही पूरा हो सकता है जब हम पूरा एतिक़ाद मुंदरजा ज़ैल बातों पर रखें।

अव्वल मसीह की अजीब शख़्सियत पर दोम इन्सान की गवाही की मोअ्तबरी पर।

पहला मसीह के जी उठने के माजरे पर यक़ीन करने के लिए ज़रूरी है कि हम मसीह की अजीब शख़्सियत पर यक़ीन करें कि मसीह की शख़्सियत अजीब थी वो ऐसा एक शख़्स था जिसमें इन्सानियत और उलूहियत इकट्ठी सुकूनत करती थीं वो बेगुनाह इन्सान था और अपने काम-काज से और गुफ़्तगु से और इक़रार से अपनी बेगुनाही ज़ाहिर की उस में उलूहियत का कमाल मौजूद था। उस ने अपने काम और कलाम से ख़ुदा के बराबर होना ज़ाहिर किया। सिवाए उस के हमको याद रखना चाहीए कि मसीह का जी उठना ऐसे एक आदमी का जी उठना है जिसकी मौत फ़ौक़ुल-आदत है उस ने कांटों का ताज पहन लिया लेकिन वो ताज दुनिया का क़हर था जो उस के सर पर रखा गया। वो सलीब पर लटक गया ताकि वो ज़मीन और आस्मान के बीच खड़ा हो वो दो चोरों के बीच में रखा गया ताकि आख़िरी अदालत का निशान हो। उस दिन उस के दाहिने हाथ पर भीड़ होंगी और बाएं हाथ पर बकरीयां जैसे कि ताइब और बे ताइब चोर खड़े किए गए थे आस्मान की हवा उस के मत्थे पर लगी और उस ने आस्मान का दरवाज़ा मग़फ़ूर गुनाहगारों के लिए खोला।

मरना उस के लिए एक फ़ौक़ुल-आदत काम था मशहूद दहरयारोहो ने ठट्ठे से मसीह की मौत की बाबत यूं बयान किया है, कि उस की मौत ख़ुदा की मौत है। अगरचे ये बात उस ने ठट्ठे से कही है तो भी ईसाईयों का अक़ीदा पहले तीन इंजीलों में बयान हुआ है कि मसीह मरने के वक़्त ऊंची आवाज़ से चिल्लाया उस को सुनकर रोमी सूबेदार ने कहा कि ये शख़्स सच-मुच ख़ुदा का बेटा है। इलावा बरीं याद रखना चाहीए कि मसीह ने अपनी जान ख़ुशी से दी उस ने ख़ुद फ़रमाया मैं अपनी जान भेड़ों के लिए देता हूँ मुझे इख़्तियार है कि मैं उसे दे दूं और मुझे इख़्तियार है कि मैं फिर उसे उठा लूं। ये तो सच है कि लोगों ने उसे पकड़ा और रस्सी से बाँधा लेकिन वो बंधा हुआ ज़्यादा अपनी मर्ज़ी और ख़ुशी से था। ख़ुदा की मर्ज़ी और दुनिया की मुहब्बत की डोर उस पर आमादा मज़्बूत थी और उन्हीं के सबब से जैसे भेड़ अपने बाल कतरने वालों के सामने चुप-चाप रहती है इस तरह वो अपने पकड़ने और सताने वालों के सामने चुप-चाप रहा उस की अक़्ल और समझ आख़िर तक क़ायम रही वह मरते वक़्त मग़्लूब ना हुआ बल्कि मौत पर ग़ालिब रहा ये भी याद रखना मुनासिब है कि मसीह का जी उठना पैशन गोइयों की कलाम के मुताबिक़ था। पोलुस रसूल कहता है कि वो गाढ़ा गया, और तीसरे दिन किताबों के मुवाफ़िक़ जी उठा फिर दूसरी जगह इस वाअदे को जो बाप दादों से किया गया था ख़ुदा ने हमारे लिए जो उन की औलाद हैं बिल्कुल पूरा किया कि यसूअ को फिर जिलाया अगर हम ग़ौर से नबुव्वत की किताबें पढ़ें तो अक्सर हम ये देखेंगे कि यसूअ की मौत और दुख का बयान है और बाद उस का जलाल का जिसमें वह जी उठ कर दाख़िल हुआ। पतरस का बयान कि उस को ख़ुदा ने मौत के बंद खोल कर उठाया क्योंकि मुम्किन ना था कि वो उस के क़ब्ज़े में रहे।

दूसरा मसीह के जी उठने का यक़ीन मोअतबर गवाही पर मौक़ूफ़ है। पेशतर कि हम इस गवाही की तरफ़ मुतवज्जा हों हम उन ख़यालों का बयान करेंगे जो मसीह के ज़िंदा होने और आस्मान के चढ़ जाने की बाबत मुम्किन है। पहला ये कि ख़ुदावंद यसूअ मसीह हक़ीक़त में नहीं मरा बल्कि जब सलीब पर उतारा गया था तो हालत ग़शी में था और उस के शागिर्दों ने मुर्दा समझ के यहूदीयों की रस्म के बमूजब उस के बदन पर निकोस बोएँ मलीं और उस को दफ़न किया बाअज़ लोग सोचते हैं कि इन खुशबुओं के मलने और ठंडी हुवा के लगने से जब शागिर्द उस को क़ब्र में रखकर चले गए तो उसी की बे-होशी जाती रही तब वो रफ़्ता-रफ़्ता क़ुव्वत हासिल कर के क़ब्र में से निकल आया और किसी पोशीदा मकान में जाकर छिपा रहा होगा कभी-कभी इस मकान से निकल कर चालीस रोज़ तक शागिर्दों पर ज़ाहिर होता रहा और बाद चालीस रोज़ के बिल्कुल ग़ायब हो गया और शागिर्दों को नज़र ना आया शागिर्द भी समझते रहे कि हमारा ख़ुदावंद जी उठा। आस्मान पर चला गया। इस ख़्याल की निस्बत मेरा जवाब ये है कि ये सिर्फ़ ख़याल ही है कि जिसका कुछ सबूत नहीं। इंजील नवीसों की शहादत के ख़िलाफ़ है कि वह सच-मुच मर गया था इस को क़ुबूल नहीं कर सकते सिवाए उस के ये ख़्याल मेरी नज़र में बिल्कुल नामुम्किन मालूम देता है क्योंकि मसीह ना सिर्फ मस्लूब किया गया था बल्कि भाले से उस का पहलू छेदा गया था। अगर वो ग़शी की हालत में हो कर क़ब्र में ज़िंदा हुआ तो निहायत कमज़ोर होगा। ये मुम्किन नहीं मालूम देता कि ऐसे भारी पत्थर को कि जिसकी निस्बत औरतें ख़्याल करती थीं कि इसे हमारे लिए कौन ढलकाएगा ख़ुद ढलकाकर निकल गया हो। पहरे वालों की आँख बचा कर भाग गया हो और भाग कर कहाँ गया इस ख़्याल के बमूजब शागिर्दों के पास नहीं गया अगर दुश्मनों के पास गया था तो मुम्किन नहीं मालूम देता कि उन्हों ने उस को छुपा रखा हुआ बीच-बीच में चालीस रोज़ तक उस को शागिर्दों पर ज़ाहिर किया हो और बाद उस को इस तरह छिपा लिया हो कि उस की कुछ ख़बर किसी ना मिली और ये सब कुछ इस नीयत से किया हो कि शागिर्दों को ये ख़्याल हो कि हमारा ख़ुदावंद जो मर गया था फिर जी उठा है बल्कि आस्मान पर चढ़ गया मेरी अक़्ल में ये ख़्याल मुहाल है और क़रीन-ए-क़ियास ये है कि अगर दुश्मनों के पास वो जाता तो गिरफ़्तार कर के फिर उसे सलीब पर दुबारा चढ़वाते।

सिवाए इस के ये ख़्याल अख़्लाक़ी क़ायदे से नामुम्किन नज़र आता है क्योंकि इस में मसीह के ज़िम्में में अव्वल दर्जे का दग़ा और फ़रेब समझा जाता है कि वो जब पत्थर ढलका कर अपने शागिर्दों के पास ना गया बल्कि किसी मकान में छिपा रहा। और वक़्तन-फ़-वक़्तन अपने शागिर्दों पर ज़ाहिर होता रहा और बाद चालीस दिन किसी मकान में छिप गया। कि उन को नज़र ना आया और ये सब कुछ इस ख़्याल से करें कि शागिर्दों को फ़रेब देकर समझा दें कि मैं मुर्दों में से जी उठ कर आस्मान पर चढ़ गया। मेरी समझ में ऐसा काम मसीह के ज़िम्में लगाना निहायत नामुम्किन है ख़सूसुन जब हम सोचते हैं और उस की पिछली ज़िंदगी और ताअलीम पर नज़र डालते।

दूसरा ख़्याल ये हो सकता है कि मसीह के शागिर्दों ने उस की लाश को चूरा लिया और झूट से ये मशहूर कर दिया वो मुर्दों में से जी उठा है, बल्कि उस को चालीस दिन तक उन्हों ने वक़्त ब-वक़्त देखा है आख़िर को उन्हीं के सामने वो आस्मान पर चढ़ गया। ये ख़्याल ऐसा ही नामुम्किन है जैसा पहला क्योंकि मसीह की क़ब्र पर ना सिर्फ पत्थर रखा हुआ था बल्कि उस पर मुहर भी कर दी थी और फिर अपने सिपाहीयों को तैनात (मुक़र्रर) कर दिया था। रोमी सिपाहीयों का पहरा उस की निगहबानी कर रहा था मसीह के शागिर्द क़रीब तमाम के कमज़ोर कम हेसीयत और कमक़दर लोग थे वह यहूदीयों के ख़ौफ़ से मसीह के पास से भाग गए थे सिवाए पतरस, यूहन्ना और कई औरतों के और किसी का ज़िक्र उस की मौत के वक़्त नहीं मिलता ये बिल्कुल ना-मुम्किन मालूम देता है। कि ऐसे लोग उस की लाश चूराने के क़ाबिल हों ये बात भी हमारे क़ियास से बाहर है कि सारे शागिर्द मुत्तफ़िक़ हो कर इस झूट को बांध सकें। क्योंकि ये बयान हुआ है कि ग्यारह रसूलों ने उस को देखा और कई औरतों ने और एक मर्तबा जब वो आस्मान पर चढ़ गया बड़ी जमाअत शागिर्दों की वहां मौजूद थी। अख़्लाक़ी क़ायदे से भी ये ख़्याल मुहाल नज़र आता है। क्योंकि शागिर्दों की ख़ासकर रसूलों की ज़िंदगी और ताअलीम पर ग़ौर करने से बख़ूबी ज़ाहिर होता कि ये लोग सच्चे थे और सच्चाई के सिखाने वाले थे और अपनी कलाम और ताअलीम को सच्चाई के वास्ते बड़े दुख और तक्लीफ़ उठाई बल्कि अपनी जान तक भी दरेग़ ना की हम यक़ीन नहीं कर सकते ऐसे लोगों ने ये सब कुछ जान-बूझ कर किया कि उन के पैग़ाम की बुनियाद बिल्कुल झूटी है, उनका पैग़ाम सच्चा हो या झूटा लेकिन वो बेशक उसे सच्चा समझते थे।

बाअज़ लोगों ने नवीसों के बयान में फ़र्क़ और इख़्तिलाफ़ दिखलाया है अगर इख़्तिलाफ़ भी साबित हो तो उन के बयान की सच्चाई पर दाग़ नहीं लगा सकता सिर्फ उन के लफ़्ज़ी इल्हाम पर शक पैदा हो सकता है।

तीसरे ख़्याल को रोया का ख़्याल कहा जाता है और ये ख़्याल आजकल पहले दो ख़यालों से आलिमों के दर्मियान ज़्यादा मशहूर है। क्योंकि एक नामी और आलिम शख़्स रेनान साहब ने इस को दिलचस्प इबारत के साथ बयान किया है वो ख़्याल ये है कि :-

“गुडफ्राईडे के माजरे से मसीह के शागिर्द बहुत दिल-गीर और रंजीदा ख़ातिर हो गये थे यकायक उन में से एक औरत मर्यम मग्दिली जो पुर जोश और गर्म तबीयत की थी। अपने ख़्याल के बस में आकर चिल्ला उठी कि ख़ुदावंद जी उठा है। बिजली की मुवाफ़िक़ ये कलाम शागिर्दों की जमाअत में, फिर कई थी जमाअत उस के असर में आ गई और कहने लगी ख़ुदावंद जी उठा है चंद रोज़ बाद उनमें से एक ने कहा आओ हम गलील को जाएं वहां हमको ख़ुदावंद दिखलाई देगा। जब वो गलील में पहुंच गए और उस झील और उस मकान को देखा, जहां मसीह उन को मिलता था। और उन को ताअलीम देता था और मुहब्बत का कलाम कहता था। तब मसीह की सारी सरगुज़िश्त उन को ताज़ा हो गई और वो ख़्याल करने लगे कि हम ख़ुदावंद को देख रहे हैं। आख़िर को गलील के पहाड़ पर कई शागिर्द मसीह के इकट्ठे हो गए। हवा उस पहाड़ की निहायत लतीफ़ है और तरह-तरह के धोके से भरी हुई है। इस क़िस्म का एक धोका उस के सामने पेश हुआ। वो सोचने लगे कि मसीह की सूरत उन के सामने खड़ी है बल्कि आस्मान की तरफ़ उठ रही है उन्हों ने चिल्ला कर कहा कि ख़ुदावंद आस्मान पर चढ़ गया। और ख़ुदा के दहने हाथ जा बैठा।”

ये ख़्याल ऐसा ही ख़ाम है जैसे पहले दो ये इस्म-बा-मुसम्मा है। यानी रेनान साहब की रोया का नतीजा है क्योंकि इस तरह का रोया सिर्फ तब ही नज़र आता है जब आदमी सारे दिल से इस का मिस्तर और उम्मीदवार हो लेकिन हमको मालूम है कि मर्यम मग्दिली और औरतें जो उस के साथ जाती थीं इस रोया की उम्मीदवार नहीं थीं वो ख़ुशबू तैयार कर के मसीह की लाश पर मलने को गई थीं सिवाए उस के रोया एक तन्हा औरत या मर्द को नज़र आ सकता है। लेकिन इंजील नवीसों का बयान हम पढ़ते हैं कि मसीह कम से कम दस दफ़ाअ अपने शागिर्दों पर ज़ाहिर हुआ। ना सिर्फ तन्हा आदमी को ग़म और अफ़्सोस की हालत में बल्कि एक दफ़ाअ वो दो शागिर्दों को नज़र आया जो अमाउस की बस्ती में जा रहे थे एक दफ़ाअ दस रसूलों फिर ग्यारह को फिर सात शागिर्दों को जब वो दरिया में मछली पकड़ रहे थे और पिछले दिन जब कि वो आस्मान पर सऊद कर गया पाँच सौ आदमी से ज़्यादा शागिर्दों को नज़र आया। इसलिए हम इस को रोया मंज़ूर नहीं कर सकते पर ये भी ग़ौर के लायक़ है कि ये नुमाइश ख्व़ाब के मुवाफ़िक़ नहीं था। मसीह ने अपने हाथ और पहलू शागिर्दों को दिखलाए उन्हों ने भूनी मछली का एक टुकड़ा और शहद का छत्ता उस को दिया उस ने लेकर उन के सामने खाया।

मसीह की नुमाइश बे-माअनी नहीं थीं जैसा उस की ज़िंदगी के सारे काम रुहानी मतलब से भरे हुए थे। इस तरह जी उठने के बाद जो कुछ किया वो भी नसीहत से भरा हुआ है। मसअला उस ने शागिर्दों के साथ दरिया-ए-गलील के किनारे पर रोटी खाई इस से ये ज़ाहिर है कि मेहनत तमाम हुई आस्मानी दरिया के किनारे पर आराम है। कामिल कलीसिया हमेशा की ज़याफ़त में शामिल होती है। इन नुमाइशों में मसीह ने जो कलाम कहा वो अभी तक शागिर्दों के दिलों में जागता है। वो ज़िंदा कलाम है रोशनी और क़ुव्वत से भरा हुआ जो अब तक मसीही मुल्कों में बल्कि कुल दुनिया पर असर कर रहा है। मर्यम मगदलेन के रूबरू मसीह ने रोटी नहीं खाई ना तोमा को पाक नविश्तों की ताअलीम दी जैसे उन शागिर्दों को दी जो अमाउस की बस्ती में जा रहे थे। तोमा की बेईमानी का सबब और था और अमाउस के जाने वालों के बेईमानी का बाइस और था। सिर्फ एक ही नुमाइश में मसीह ने मोअजिज़ा दिखलाया।

और मसीह आस्मान पर चढ़ गया

मरक़ुस की इंजील के सोलहवें बाब और उन्नीसवीं आयत में ये माजरा यूँ मर्क़ूम हुआ है कि ख़ुदावंद आस्मान पर उठाया गया। लूक़ा इस का ज़िक्र इंजील के 24 बाब 51 आयत में यूं करता है तब वो उन्हें वहां से बाहर बैत-अन्याह तक ले गया और अपने हाथ उठा कर उन्हें बरकत दी और ऐसा हुआ कि जब वो उन्हें बरकत दे रहा था उनसे जुदा हुआ और आस्मान पर उठाया गया। मसीह की सऊद का मुफ़स्सिल बयान आमाल के पहले बाब में मिलता है वहां मसीह के शागिर्दों के साथ पिछली गुफ़्तगु के बयान के बाद ये लिखा है। वो ये कह कर उनके देखते हुए ऊपर उठाया गया और बदली ने उसे उनकी नज़रों से छिपा लिया। और उस के जाते हुए जब वो आस्मान की तरफ़, तक रहे थे देखो दो मर्द सफ़ैद पोशाक पहने उनके पास खड़े थे और कहने लगे “ऐ गलीली मर्दों तुम क्यों खड़े आस्मान की तरफ़ देखते हो यही यसूअ जो तुम्हारे पास से आस्मान पर उठाया गया है जिस तरह तुमने उसे आस्मान की तरफ़ जाते देखा फिर आएगा।” इन बयानों से मुंदरजा ज़ैल मतलबों का सबूत है।

(1) मसीह का सऊद उस की कुल शख़्सियत का था यानी ख़ुदावंद यसूअ मसीह ख़ुदा-ए-मुजस्सम का ख़ुदा बेटा साफ़ हक़ीक़ी जिस्म और अक़्ली रूह के साथ आस्मान पर चढ़ गया।

(2) मसीह का सऊद अलानिया था शागिर्दों ने कुल माजरा देखा उन्होंने देखा कि मसीह ज़मीन से आहिस्ता-आहिस्ता ऊपर उठाया गया। ता वक़्त ये कि बदली ने उनकी नज़रों से छिपा लिया।

(3) मसीह का सऊद मकान की तब्दीली है यानी ज़मीन से आस्मान पर उठाया गया इस से मालूम देता है कि आस्मान पर मकान है ख़ल्क़त के कौन से हिस्से में ये मकान मौजूद है मैं बता नहीं सकता। लेकिन बाइबल की ताअलीम से साफ़ मालूम होता है कि ये मकान महदूद है। जहां ख़ुदा का हुज़ूर और जलाल खासतौर पर ज़ाहिर है। और जहां ख़ुदा के फ़रिश्ते जो ग़ैर महदूद नहीं हैं। और मुक़द्दसों की रूहें मौजूद हैं। हम इक़रार करते हैं कि बाइबल में लफ़्ज़ आस्मान और मअनी में भी मुस्तअमल हुआ है। मसलन सबसे नीचे का आस्मान जहां चिड़िया उड़ती बादल फिरते या जहां से पानी बरसता है पोलार के इस हिस्से को भी आस्मान कहा गया है। जिसमें सय्यारे और सितारे चमक रहे हैं। बाइबल में सय्यारों को आस्मानी फ़ौज कहा गया है। तीसरे आस्मान के मअनी वो रुहानी हालत है जिसमें ईमानदार, मसीह पर ईमान लाने के सबब से दाख़िल होते हैं इस मअने में लफ़्ज़ आस्मान ख़ुदा की बादशाहत का मुसावी है। इफ़िसियों के ख़त के दूसरे बाब की 6 आयत में यूं लिखा है “उसने हमको उस के साथ उठाया और आस्मानी मकानों पर बैठाया।” और फिलिप्पियों के तीसरे बाब की 20 आयत में बयान हुआ है, “हमारी ममलकत आस्मान पर है।” और सबसे पिछले मअनी जिस्मानी में बयान हुआ है कि मसीह आस्मान पर चढ़ गया। आस्मान उस जगह का नाम है जहां ख़ुदा बस्ता है। और जहां उस के फ़रिश्ते और मुक़द्दसों की अर्वाह इकट्ठी हैं जहां से ख़ुदावंद यसूअ मसीह आया था और फिर लौट गया है उसने अपने शागिर्दों को फ़रमाया मैं तुम्हारे लिए एक मकान तैयार करने के लिए जाता हूँ। यही मअनी इस लफ़्ज़ के हैं जब हम ख़ुदा को कहते हैं कि हमारा बाप जो आस्मान पर है या आस्मान ख़ुदा का तख़्त है उस की हैकल है उसके रहने की जगह है अगर मसीह के सऊद का बदन है तो ज़रूर उस के लिए एक महदूद जगह की हाजत है और जहां मसीह का बदन है वही ईसाईयों का आस्मान है।

लेकिन सारे ईसाई लोग सऊद की इस तशरीह को क़ुबूल नहीं करते। मसलन लूथरन कलीसिया समझते हैं कि मसीह का सऊद नक़ल-ए-मकान नहीं है। बल्कि तब्दीली हालत की है और इस सऊद में फ़र्क़ है। बाअज़ मसीही मुअल्लिमों ने उस का मुजस्सम हुआ और आस्मान पर चढ़ जाना यूं बयान किया है कि जब मसीह मुजस्सम हुआ तब उसने उस ख़ुदा की सूरत को जो अज़ल से रखता था उतार फेंका और अपने आपको महदूद बना कर इन्सान की शक्ल को इख़्तियार किया ये लोग सऊद की निस्बत यूं कहते हैं कि ज़रूर उस के वसीले से नक़ल-ए-मकान करके दुनिया से आस्मान में दाख़िल हुआ हम ये भी इक़रार करते हैं कि हमारा ख़ुदावंद इन्सानियत की हैसियत में सिर्फ एक ही जगह में मौजूद है। लेकिन उस की हस्ती की सूरत सिर्फ़ इन्सानी है ना कि ईलाही। मशहूर मुफ़स्सिर अब्रॉड साहब ने कहा कि,

“ख़ुदा का इकलौता बेटा इन्सानी रूह बना और अपने वास्ते मर्यम के शिकम में एक जिस्म पैदा किया और उसके शिकम से इन्सान पैदा हुआ इस इन्सानी ज़ात में दो हिस्से थे। पहले वो चीज़ें जो इन्सानियत के लिए ज़रूरी हैं यानी बदन (बग़ैर) उनके इन्सान इन्सान नहीं है। दूसरे वो चीज़ें जो इन्सान में आरिज़ी और मुतग़य्यर (बदला हुआ) हैं मसलन कमज़ोरी मौत और दुख में मुब्तला ये दूसरी ख़ुसूसीयत मसीह ने सऊद के वक़्त बिल्कुल उतार फेंकी और अब आस्मान में मौजूद है बहैसीयत जलाल वाली इन्सानियत के।”

वो कहते हैं कि मसीह ने हमेशा के लिए ख़ुदा की सूरत को उतार फेंका और इन्सान की सूरत इख़्तियार की और इसी इन्सान की सूरत में अब वह आस्मान पर है। और अपनी रूह के वसीले कलीसिया और दुनिया पर हुकूमत करता है मकान की निस्बत वो दुनिया से गैर-हाज़िर है लेकिन क़ुव्वत के वसीले से वो अपने लोगों के नज़्दीक और दर्मियान मौजूद है। मसीह की इन्सानियत की क़ुव्वत से हाज़िरी को हम मानते हैं लेकिन इस बात को नहीं मानते कि उसने ख़ुदा की सूरत को बिल्कुल उतार फेंका और इन्सानी रूह बना और हमेशा को इन्सानियत की हालत में रहेगा। अगर ये सच हो तो मसीह फ़क़त आदमी है और ख़ुदा नहीं। मसलन अगर एक जवान आदमी अपने आपको महदूद और छोटा करता हुआ लड़के की सूरत तक पहुंच जाये और इसी सूरत में हमेशा को क़ायम रहे तो लड़का ही समझा जाएगा ना कि जवान, इसी तरह अगर कोई आदमी अपनी अक़्ल खो बैठे और अक़्ल बे जाये तो वो बेअक़्ल ही कहलाएगा या हैवान बन जाये और फ़क़त हैवान की ताक़त और क़ुव्वत रखे तो उस को हैवान कहेंगे, ना इन्सान इसी तरह अगर ख़ुदा का बेटा इन्सान बन गया है और इन्सानियत में हमेशा को रहता है तो वो इन्सान है ना ख़ुदा।

इंजील के मुताबिक़ मसीह का सऊद एक ज़रूरी अम्र था।

(1) ज़रूर इस वास्ते था कि मसीह आस्मान से आया आस्मान उस का घर था और आस्मान उस की सुकूनत के लायक़ है। इसलिए जब तक ये दुनिया गुनाहों से पाक ना हो जाएगी जब तक नया आस्मान और नई ज़मीन ना बने ये दुनिया उस के रहने के लायक़ नहीं है।

(2) मसीह का सऊद सरदार काहिन के काम के तमाम करने को ज़रूर था कि इस क़ुर्बानी के लहू के साथ आस्मान से गुज़र के ख़ुदा की हुज़ूर हाज़िर हो। ज़रूर था कि वो आस्मान पर जा कर अपनी उम्मतों के वास्ते ख़ुदा के हुज़ूर सिफ़ारिश करे। जैसा वो हमारे गुनाहों के वास्ते मुआ क़ब्र में वैसा हमें रास्तबाज़ ठहराने के लिए फिर जी उठा। ये सब बातें यहूदीयों के बीच में क़ुर्बानी की रस्म से ज़ाहिर थीं उनके बीच में दस्तूर था कि क़ुर्बानी का जानवर हैकल के बाहर ज़ब्ह किया जाता था। सरदार काहिन क़ुर्बानी का लहू और ख़ुशबू लेकर पर्दे के अंदर पाकतरीन जगह पर्दे में दाख़िल होता था और वहां कफ़्फ़ार-गाह में अह्द के संदूक़ पर छिड़क देना था जो काम सरदार काहिन भी इस काम को आस्मानी हैकल में पूरा करे इस मज़्मून का पूरा बयान इब्रानियों के ख़त में किया गया है।

(3) ख़ुदावंद अपने शागिर्दों को फ़रमाता है तुम्हारे लिए मेरा जाना ही फ़ायदा है क्योंकि अगर मैं ना जाऊं तो तसल्ली देने वाला तुम्हारे पास ना आएगा पर अगर मैं जाऊं तो मैं उसे तुम्हारे पास भेज दूँगा। इस वास्ते मसीह का जाना शागिर्दों के लिए ज़रूर था मसीह ने नजात का काम पूरा किया। लेकिन शागिर्दों को इस काम से फ़ायदा तब ही हुआ जब रूहुल-क़ुद्दुस के वसीले से उस पर ईमान लाए ये रूहुल-क़ुद्दुस ही की मदद से है। कि आदमी गुनाहों से मुकर होते हैं अपनी लाचारी को पहचानते हैं और मसीह के पास नजात की तलाश करते हैं मासिवा उस के नबियों ने रूहुल-क़ुद्दुस के नुज़ूल की नबुव्वत की थी उन्होंने बयान किया था कि मसीह के ज़माने की एक ख़ास ख़ुसूसीयत ये होगी। ज़रूर था कि ये नबुव्वतें पूरी हों। रूहुल-क़ुद्दुस की नेअमत हासिल करने के लिए मसीह का आस्मान पर चढ़ जाना ज़रूर था। वो उठाया गया, ताकि रूहुल-क़ुद्दुस के वसीले से लोगों को तौबा और गुनाह की माफ़ी बख़्शे हर ज़माने से और हर कौम से उनको इकट्ठा करे इस काम को पूरा करने के लिए आस्मान का तख़्त सबसे अच्छा था।

(4) मसीह ने अपने ग़मगीं शागिर्दों को फ़रमाया मैं जाता हूँ ताकि तुम्हारे लिए जगह तैयार करूँ और जिस हाल कि मैं जाता और तुम्हारे लिए जगह तैयार करता हूँ तो फिर आऊँगा और तुम्हें अपने साथ लूँगा ताकि जहां मैं हूँ तुम भी हो इस काम को पूरा करने के लिए ज़रूर था कि मसीह आस्मान पर जाये।

क़ुरआन से इंजील की क़दामत

The Reliability of the Gospel from Quran

क़ुरआन से इंजील की क़दामत
By

Kidarnath
केदारनाथ
Published in Nur-i-Afshan April 25, 1889

मत्बूआ 25, अप्रैल 1889 ई॰
वाज़ेह होकर ईसाई उलमा ने कमाल तहक़ीक़ात कर के बख़ूबी साबित कर दिया है कि इंजील मुरव्वजा हाल वही इंजील है जो (96 ई॰) तक तस्नीफ़ हो कर तमाम व कमाल शाएअ हो चुकी थी। चुनान्चे क़दीम तराजुम सरूनी वा अंगलू साक्सन वग़ैरह और पुराने क़लमी नुस्खेजात अलगुज़ नदरीह दोम इस सबूत के वसाइल मौजूद हैं। हाजत नहीं कि मुकर्रर उनकी तकरार की जाये मगर ज़माना-ए-हाल के मुहम्मदी अक्सर ये हीला पेश करते हैं कि ये इंजील वो इंजील नहीं है। जो ज़माना-ए-क़दीम हज़रात हवारियों में थी।

लिहाज़ा अब मैं ख़ास उन्हीं के इत्मीनान के वास्ते चंद सबूत जो कि मेरे ही ज़हन नाक़िस में मुतख़य्युल (ख़्याल किया गया) मैं बयान करता हूँ। याद रखना चाहीए कि मैं अपने दलाईल में सिर्फ उसी पर इक्तिफ़ा करूंगा कि इंजील मौजूद हाल की मौजूदगी ज़माना मुहम्मद में साबित हो जाये और बस। मालूम होना चाहीए कि इंजील क्या है?

इंजील के मअनी लुग़त में ख़ुशी और इस्तिलाह में उस किताब के कहते हैं जो ख़ुदावंद यसूअ मसीह के हालात पर मुश्तमिल है। और वो चार हिस्सों में महदूद हैं।

पहले में चारों अनाजील, दूसरे में आमाल अल-रसुल, तीसरे में ख़ुतूत और चौथे में मुकाशफ़ा है।

मुकाशफ़ा नबुव्वत की किताब है। ख़ुतूत ताअलीमात ईस्वी के मुफ़स्सिर हैं। आमाल में रसूलों की कारगुज़ारी है। इंजीलों में मसीह की सवानिह-ए-उम्री गोया वो बीज जो किश्तज़ार (सरसब्ज़ खेत) इंजील में बोया गया। ये आबयारी आमाल निहाल सरसब्ज़ नज़र आया। ख़ुतूत में उस के फूल ख़ुशबू पुहंचाते हैं। फिर मुकाशफ़ा में फल लगे हुए पाते हैं।

पस इस सिलसिले मतनासबा पर ग़ौर करने से साफ़ मालूम हो सकता है कि हर चार हिस्स (हिस्सा जमा) आपस में कैसा इलाक़ा मुत्तहदा रखते जिसमें ना इफ़रात को दख़ल है और ना तफ़रीत को गुंजाइश जब अल-हुक्म (मुकाशफ़ा 22:18-19)

अब सारी इंजील का लुब्बे-लिबाब जे़ल में दर्ज किया जाता है।

ख़ुदावंद मसीह की मोअजज़ाना पैदाइश, उस की ताअलीमात और मोअजज़ात मौत और जी उठना, आस्मान पर तशरीफ़ ले जाना। वहदत फिल-तस्लिस, इब्नीयत कफ़्फ़ारा, मसीह अदालत करेगा, इसी की क़दामत और असलीयत साबित करना हमारा मुद्दा है।

मुहम्मदी इन तमाम बातों से इनकार नहीं करते सिर्फ तस्लीस और इबनीयत और मसीह की मौत और जी उठने और कफ़्फ़ारा और अदालत से। और इन्हीं बातों को इंजील में पढ़ कर वो घबरा जाते और बेवजह कह बैठते हैं कि जिसकी इंजील पर ईमान लाने को हमें क़ुरआन हुक्म देता है वो इंजील और है और ये और है। और उनका ये दावा वहमी क़ुरआन से इलाक़ा रखता है उन के गुमान में (1300) बरस से है और मुहम्मद के रूबरू लिखा जा चुका था। पस मुझे हक़ पहुंचता है कि अगर मैं आयात मुतनाज़ा-फिया को सिर्फ क़ुरआन से साबित कर दूँ तो मुहम्मदियों से कहूं कि ये वही इंजील है जिसे तुम क़दीमी ख़्याल करते हो।

तस्लीस और मसीह की इब्नीयत के वास्ते

देखो क़ुरआन में सूरह निसा आयत 171

اَہۡلَ الۡکِتٰبِ لَا تَغۡلُوۡا فِیۡ دِیۡنِکُمۡ وَ لَا تَقُوۡلُوۡا عَلَی اللّٰہِ اِلَّا الۡحَقَّ ؕ اِنَّمَا الۡمَسِیۡحُ عِیۡسَی ابۡنُ مَرۡیَمَ رَسُوۡلُ اللّٰہِ وَ کَلِمَتُہٗ ۚ اَلۡقٰہَاۤ اِلٰی مَرۡیَمَ وَ رُوۡحٌ مِّنۡہُ ۫ فَاٰمِنُوۡا بِاللّٰہِ وَ رُسُلِہٖ ۚ۟ وَ لَا تَقُوۡلُوۡا ثَلٰثَۃٌ ؕ اِنۡتَہُوۡا خَیۡرًا لَّکُمۡ ؕ اِنَّمَا اللّٰہُ اِلٰہٌ وَّاحِدٌ ؕ سُبۡحٰنَہٗۤ اَنۡ یَّکُوۡنَ لَہٗ وَلَدٌ

“यानी मसीह ख़ुदा की रूह से तो है मगर बेटा नहीं है। और तीन ना कहो ख़ुदा सिर्फ एक है।”

हम इस आयत पर कुछ एतराज़ नहीं करते हमारा मतलब ये है कि मुहम्मद के ज़माने की इंजील में भी तस्लीस और इब्नीयत दर्ज थी और अब की इंजील में भी दर्ज है। अगर ईसाईयों ने अब दर्ज कर ली होती और क़दीम इंजील में ना होती तो मुहम्मद क्यों पेश अज़वक़्त क़ुरआन में तस्लीस और इब्नीयत से इन्कार करता। पस मालूम हुआ कि मुहम्मद के वक़्त में भी जिसको (1300) बरस गुज़रे यही इंजील थी जो अब है। और ना

सलीब की बाबत

देखो सुरह निसा आयत 157

وَ مَا قَتَلُوۡہُ وَ مَا صَلَبُوۡہُ وَ لٰکِنۡ شُبِّہَ لَہُمۡ

“यानी मस्लूब नहीं हुआ।”

इस नफ़ी से भी इस्बात हासिल होता है कि मुहम्मदी अह्द की इंजील में भी वाक़िया सलीब उसी सूरत से मुंदरज था जिस तरह हाल की इंजीलों में ये हाल लिखा है और जिस शमाउन कुरैनी ने मुहम्मद को शुब्हा में डाला वही शमाउन कुरैनी अब भी मुहम्मदियों को धोके में डालता है बहर-ए-हाल समझ का फेर है अगर अब ईसाईयों ने लिख लिया होता तो मुहम्मद ने क़ब्ल अज़ वक़ूअ किस अम्र की नफ़ी की बेशक वो इंजील इसी इंजील की अस्ल थी। पस साबित हो गया कि ये इंजील पहली इंजील की नक़्ल है।

रूहुल-क़ुद्दुस के हक़ में

देखो क़ुरआन में सुरह अल-सफ़ा आयत 6

وَ اِذۡ قَالَ عِیۡسَی ابۡنُ مَرۡیَمَ یٰبَنِیۡۤ اِسۡرَآءِیۡلَ اِنِّیۡ رَسُوۡلُ اللّٰہِ اِلَیۡکُمۡ مُّصَدِّقًا لِّمَا بَیۡنَ یَدَیَّ مِنَ التَّوۡرٰىۃِ وَ مُبَشِّرًۢا بِرَسُوۡلٍ یَّاۡتِیۡ مِنۡۢ بَعۡدِی اسۡمُہٗۤ اَحۡمَدُ

मालूम होता है कि मुहम्मद ने इस आयत में पहला हिस्सा (मत्ती 5:18) से नक़्ल कर लिया है जिसमें हमारे ख़ुदावंद ने फ़रमाया कि एक नुक़्ता या एक शोशा तौरेत का हरगिज़ ना टलेगा जब तक सब कुछ पूरा ना हो दूसरे हिस्से की निस्बत तमाम मुहम्मदी उलमा मुत्तफ़िक़ हैं कि (यूहन्ना 16:7) से ये नबुव्वत मुहम्मद के हक़ में बज़बान ख़ुदावंद मसीह मन्क़ूल हुई है। अगरचे हमारे ख़ुदावंद की मुराद इस से रूहुल-क़ुद्दुस है। पर तो भी हम मुहम्मद के इस दाअवे बातिला से एक सदाक़त हासिल कर सकते हैं कि गोया मुहम्मदियों ने ख़ुद मान लिया कि वो आयत जिस पर मुहम्मद ने (1300) बरस हुए इशारा किया अब भी तमाम इंजीलों में बजिन्स (ऐसे ही) मौजूद है। यहां इस एक दलील से दो दलीलें हाथ आती हैं। अव्वल ये कि इस आयत की क़दामत 33 ई॰ तक मुंतही है। दोम कि अगर ईसाई मुहम्मद की नबुव्वत पोशीदा करना चाहते, या उन्हें पाक कलाम में कुछ दस्त अंदाज़ी का मौक़ा मिलता तो सबसे पहले वो इसी आयत को निकला डालते और आज मुहम्मदी इतने कहने का मौक़ा ना पाते कि इंजील में मुहम्मद की ख़बर है मगर इस से साबित हो गया कि इंजील नवीसों या ईसाईयों ने कभी ऐसे काफ़िराना काम का इरादा नहीं किया इंजील जैसी की तैसी मौजूद है।

कफ़्फ़ारा की बाबत

सिर्फ यही कहना काफ़ी होगा कि जब वाक़िया सलीब साबित हुआ तो कफ़्फ़ारा इस का ज़रूरी नतीजा ख़ुद बख़ुद है।

मसीह सबकी अदालत करेगा

इस की निस्बत क़ुरआन में ज़ाहिरन किसी ख़ुसूसीयत के साथ से एतराज़ नहीं किया गया इसलिए वो इस अम्र का शाहिद नहीं हो सकता कि मुहम्मदी इस से मुन्किर हैं ताहम माअनवी तौर पर क़ुरआन की आयत जे़ल में ग़ौर करने से ये इक़्तिबास हो सकता है।

देखो सुरह क़लम की ये आयत

یَوۡمَ یُکۡشَفُ عَنۡ سَاقٍ وَّ یُدۡعَوۡنَ اِلَی السُّجُوۡدِ

“यानी ख़ुदा क़ियामत में अपनी पिंडली खोल कर दिखलाएगा।”

इस से ख़ुदा का मुजस्सम होना साबित होता है। दरहक़ीक़त इस आयत को इब्न-ए-आदम से बहुत कुछ इलाक़ा है। दरांहालेका मुहम्मदी ख़ुदा के मुजस्सम होने से सख़्त इन्कार करते हैं तो मालूम होता है कि मुहम्मद ने अगरचे इस क़ियास में धोका खाया और तख़सीस (ख़ुसूसीयत, महफूज़ करना) पिंडली से वो पाक कलाम की ताअलीम से बहुत दूर जा पड़ा। लेकिन इस क़द्र तो ज़रूर साबित होता है कि ख़ुदा के मुजस्सम होने का ख़्याल उस के दिमाग़ में इसी इंजील के मुआइना से आ गया। पस इस से भी साबित हो गया कि ये इंजील उसी इंजील की नक़्ल है जो मुहम्मद के ज़माने में मौजूद थी और जिस का असली मतलब ये है कि :-

“ख़ुदा ने जहान को ऐसा प्यार किया कि उस ने अपना इकलौता बेटा बख़्शा ताकि जो कोई उस पर ईमान लाएगा हलाक ना हो, बल्कि हमेशा की ज़िंदगी पाए।” (यूहन्ना 3:16)

अगर मसीह मुनज्जी नहीं तो और कौन?

If Jesus is not the Savior then who is?

अगर मसीह मुनज्जी नहीं तो और कौन?
By

One Disciple
एक शागिर्द
Published in Nur-i-Afshan March 12, 1889

नूर-अफ़शाँ मत्बूआ 12, मार्च 1889 ई॰
अज़ीज़ एक मज़्मून बउन्वां, मान मसीह को फ़र्ज़ंद ख़ुदा जान इसी पर्चे में शाएअ हुआ था, पढ़ा है तो मालूम होगा कहा इस के अंजाम में एक जुम्ला इस क़िस्म का था कि अगर मसीह की उलूहियत का क़ाइल हुआ चाहे तो ख़ुदा के हुज़ूर गिर कर रूह और रास्ती से यूं दुआ कर कि “ऐ ख़ुदावंद अगरचे ये बात सच है तो मेरे दिल को फेर” उसी तरह मैं अब फिर याद दिलाता हूँ कि अगर तू रास्त पसंद है और तुझे “ख़ुशीयों की सेरी” दरकारी तो सज्दा कर और फिर कह कि “ऐ ख़ुदावंद अगर नजात मसीह से है तो मेरे दिल को फेर।” इस राज़ अमीक़ की तह तक पहुंचने का यही तरीक़ है।

जिन बातों का ज़िक्र इस हदिये में है वह नई तो नहीं बल्कि बहुत पुरानी है। और मुझे यक़ीन है कि अक्सर तेरे मुतालऐ से गुज़र चुकी होंगी या तेरे पुंबा-दर गोश (बे-ख़बर) कानों ने किसी ना किसी मुनाद की ज़बान पर से गुज़रती सुनी होगी। लेकिन क्या मैं ये समझ कर कि ये मज़्मून मज़मूँ कहीं है ख़ामोश बैठा रहूँ और ख्व़ाब रबूदा (ग़फ़लत) को आवाज़ देकर ना जगाऊं कि नसीम (सुबह की ठंडी हवा) जागो कमर बाँधो उठाओ बिस्तर कि रात कम है।

या क्या जब तक हुस्ने लियाक़त और तेज़ी तबाअ दिखाने के लिए मन-खड़त या लोगों के कहने के मुताबिक़ अक़्ली और मंतीक़ी दलाईल नए ढंग और नई तर्ज़ पर तैयार ना कर सकूँ चुप-चाप रहूं। नहीं नहीं मैं ग़ुन्चा नहीं कि लब बंद रहूं पर मैं बुलबुल बन कर उस हमेशा बहार हक़ीक़ी गुल पर जां व दिल निसार करूँगा और जिस तरह बन पड़ेगा जान तोड़-तोड़कर भी उस की मदह-सराई करूँगा। अगरचे मेरे मज़्हब यही दावत तेरे सामने करते-करते आराम से सो गए और तू ने मानना था सो, ना माना तो भी मेरा क़लम ना रुकेगा। और मैं एक या पाँच या दस को काम में लाने से बाज़ ना आऊँगा। शायद तू जाग उठे और पोलुस सिफ़त बने और उम्मीद वासिक़ है कि अगर बरगुज़ीदा है तो एक ना एक दिन बच ही जाएगा अभी शुरू-शुरू में ये क़ुंद ज़हर सा लगता है। लेकिन अंजाम बख़ैर होगा क्योंकि तू जानता है कि कोई साईंस ऐसी नहीं जिसने बचपन के ज़माने में ठोकरें ना खाई हों। कोई ईजाद ऐसा नहीं कि जिसने दिक्कतें ना उठाई हों। उलूम फ़नून अपने-अपने वक़्त पर तेरी मुख़ालिफ़त का निशाना रह चुके हैं और तमाम मज़्हब शुरू-शुरू में बिद्अ़तों की मार सह चुके हैं लेकिन अंजाम का जिनकी तर्दीद व तर्मीम की जाती थी एक मर्तबा वही तस्लीम व तस्दीक़ को पहुंचेंगे गो झूटे थे तो क्या यही मज़्हब जो हक़ीक़त में सच्चा और रास्त है जिसके हक़ में यूं कहा है कि “दोज़ख़ का इख़्तियार इस चलेगा तेरे दिल पर तासीर पज़ीर ना होगा? मतरुक तारीख़ को पढ़ और तेरी आँखें खुल जाएँगी। तास्सुब की चर्बी जो आँखों में छाई हुई है और नुक़्सान व फ़वाइद के सोचने का मौक़ा नहीं देती बिल्कुल उठ जाएगी ये अक़्ल की पैरवी ये लकीर का फ़क़ीर होना जवाब बसीरत दिल के लिए मौत का हुक्म रखता है सरासर दूर हो जाएगा। अब ज़रा पौलुस की सवानिह उम्री पर ग़ौर कर मैं मुख़्तसरन बयान करता हूँ कि वो मसीहीय्यत के क़दीम तरक़्क़ी के सामने कैसी सख़्त सद्द-ए-राह हुआ था। आफ़्ताब सदाक़त की शआओं को लोगों पर गिरने ना देता था। मसीहीय्यत के इस्तीसाल के लिए जगह-जगह शहर-शहर फिरता था। बे-गुनाहों का ख़ून करने की इजाज़त देता था। जब ख़ुद क़ाइल हुआ तो जिसे बुरा जानता था वही भला दिखाई देने लगा। जब हक़ीक़त समझ में आ गई तब उस के मुश्तहर (ऐलान) करने कैसी-कैसी अज़ीयतें सहीं और कैसे-कैसे रंज झेले। मसीह के लिए जान को हथेली पर लिए फिरता रहा। वो ऐसे लोगों को भी ये ख़ुशख़बरी पहुंचाने से बाज़ ना आया जो शरारत और बदकारी की मदमस्ती में नसीहत को मुदाख़िलत बेजा तसव्वुर करते थे जो जवानी के दिलोलों और बेजा उमंकों के जोश से नासेह को जूता पैज़ार करना ज़रा सी तफ़रीह-ए-तबाअ ख़्याल करते थे। मुतअस्सिबों के माबूदों में जा-जा कर इंजील सुनाया, क्या मेरे दिल में यही उम्मीद है कि शायद तुझे जो पीने की मेख़ पर लात मार रहा है वही मोअस्सर सदा दी जाये कि ऐ फ़ुलां पीने की कील पर लात मारना तेरे लिए अच्छा नहीं। ये गुमान ना कर कि मैं तुझे वरग़लाता हूँ। पर मेरे दिल में मुहब्बत जोश मारती है तेरी क़ाबिल-ए-रहम हालत पर बहुत तरस आता है इसलिए जो नेअमत मुझको मुफ़्त मिली जिससे मेरी रूह को मेरी* (तसल्ली*) हासिल हुई तुझे भी दिया चाहता हूँ। मेरा और मेरे हम ख़िदमत भाईयों का हाल बईना वैसा है जैसा उस प्यासे का जिसका मुद्दत के बाद पानी मिले और वो अपने अज़ीज़ों को ख़बर दे। फ़र्ज़ कर कह अरब की रेगिस्तान में ख़त असतवा के क़रीब व जवार में ताजिरों का क़ाफ़िला प्यास के मारे मायूसी की हालत में अल-अतश अल-अतश कह-कह कर चिल्लाता हो और यके बाद दीगरे (एक के बाद एक) गिर-गिर जाता हो एक एक पानी-पानी कह कह कर बेहोशी की हालत में बुराता हो। ऐसे वक़्त में अगर किसी रफ़ीक़ को ताज़गी वो ज़िंदगी बख़्श चशमा मिल जाये तो क्या वो अपने हम राहों को जो नजात का नफ़ा नुक़्सान बे-देखे बे-तोशह बे-ज़ाइर और रहने मुल्क-ए-अदम हो रहें हैं ख़बर ना देगा कि पी लो पी लो चशमा मिल गया।

अगर हम नाक़िस ना होते तो हमारे ख़ालिक़ को हमसे हम-कलाम होने में दरेग़ ना होता लेकिन तो भी वो हम पर अपनी मर्ज़ी ज़ाहिर करता है। लेकिन एक ख़ास तरीक़ से और वो तरीक़ इल्हाम है और इल्हाम बाइबल है। बाइबल के इल्हामी होने के सबूत में तो मैं कुछ कोशिश नहीं करूँगा क्योंकि इन्हीं दिनों और इसी पर्चे में एक मुदल्लिल शख़्स जो मुझसे कहीं ज़बरदस्त[1] लिखने वाला है बाइबल के सबूत में क़लम को काम में ला रहा है उस की तहरीर को पढ़, और उम्मीद है कि ये बात समझ में आ जाएगी। पस मैं बाइबल को इल्हामी क़रार देकर आगे बढ़ता हूँ और तुझे अव्वल से आख़िर तक कहीं-कहीं बाइबल की सैर कराता हूँ। आओ पहले पेशगोई पर ग़ौर करें।

(1)
देखो ये कैसा वसीअ़ मैदान है, कैसा पुर-फ़िज़ा मकान है। सतअ़ ज़मीन पर घास किस अंदाज़ से जमी है और इस पर शबनम के क़तरे कैसे सुहाने दिखाई देते हैं गोया सब्ज़ मख़मल पर होती जड़े हैं। दरख़्त किस तर्ज़ से सर-कशीदा पहलू बह पहलू खड़े हैं। बर्ग व गुल सनअ़त एज़दी का मज़हर और हर बैल-लूटा उस की क़ुदरत कामिला और जिसको नुमाई का मंज़र हुआ है। चहार जानिब से दरिया बहते हैं और चांदी के से पानी से बाग़-ए-बहिश्त निशान को सेराब करते हैं। उन के किनारों पर हैवानात मुतलक़ आराम कर रहे हैं। गर्ग (भेड़ीया) गो सफ़ंद से हमकलाम है। आ हो और पलंग में इत्तिहाद तमाम है। बाज़, चकोर से खेलता है कबूतर खटके गरबा को देखता है। लेकिन एक मख़्लूक़ अजीब शक्ल ग़रीब सूरत नज़र आता है जिसके बशरे के शरफ़ के आसार ज़ाहिर हैं। उस की रफ़्तार गुफ़तार से अबदीयत (बंदगी) के अत्वार साद रहें सर से पांव तक इस में कोई अजीब नहीं कोई नुक़्स नहीं। वो तो ख़ुदा के नाम पर फ़िदा और उस के जलवे का शैदा नज़र आता है इस की और उस की शक्ल में बहुत कुछ मुशाबहत भी पाई जाती है लो देखो ये तो उस के (ख़ुदा के) साथ हमकलाम भी हो रहा है। लेकिन हाय ये क्या ग़ज़ब होने लगा ये क्या आफ़त मचने लगी!

एक दुश्मन पीछे खड़ा गिरा देने की सई कर रहा है पांव तले की मिट्टी निकाल रहा है। वाय क़िस्मत वो गिरा दिया।

(2)
यूं तो ज़िंदगी में तरह-तरह के हादसे वाक़िया होते रहते हैं और क़िस्म क़िस्म की तकलीफ़ें झेलने पड़ते हैं। लेकिन जो ग़म अव्वल-अव्वल अपने ज़ावबोम को छोड़ते वक़्त उठाना पड़ता है वो तल्वार की तरह कांटे और तीर की तरह छेदने वाला होता है। ख़ुसूसुन उस वक़्त जब फिर लौट कर आने अज़ीज़ों को देखने और रफीकों से मिलने की उम्मीद बिल्कुल क़तअ़ हो जाये। हाँ ऐसा ज़ख़्म है जिसका दाग़ हरगिज़ मिट नहीं सकता ये ऐसा कांटा है जो हमेशा खटकता रहता है जिसकी काविश उम्र साथ ही ख़त्म होती है हुब्ब वतन, महर वालदैन, दोस्तों की मेहनत अज़ीज़ों की उल्फ़त आदमी को रस्सी की तरह जकड़ देती है। ज़माने की गर्दिशें सहता है और कुछ पराद नहीं करता। इफ़्लास (ग़रीबी) दतनगी के तूफ़ान आते हैं और आ-आ कर ख़ूब टकराते हैं। दुश्मनों के तानों की बर्दाश्त करता है। हासिदों के हसद को उठाता है। लेकिन देख यहां एक शख़्स है जिसका मन व साल कोई पछत्तर (75) साल का होगा। वो अपनी जोरू अज़ भतीजे को लिए बाक़ी अज़ीज़ व अक़र्बा (रिश्तेदारों) को छोड़े जिस मुल्क में पैदा हुआ जिस शहर में पाला पोसा गया जहां बचपन का ज़माना ख़र्च किया कुछ हिस्सा जवानी का काटा। उस जगह से मुँह मोड़े दूसरे मुल्क को जा रहा है तास्सुफ़ और उदासी के आसार उस की सूरत पुर-अनवार पर ज़रा भी पैदा नहीं किसी तरह का ग़म और किसी क़िस्म का रंज उस के चेहरे से हुवैदा (अयाँ) नहीं। उस के दिल में एक निहायत अजीब तसल्ली है जिसके सबब से उस की सूरत बश्शाश नज़र आती है। ये शख़्स ख़ुदा का फ़रमांबर्दार है। इस का नाम इब्राहिम खलिलुल्लाह है वो तसल्ली जिसकी ख़ुशी की उम्मीद में घर-बार छोड़े जाता है ये है कि दुनिया के सब घराने तुझसे बरकत पाएँगे। क्या इब्राहिम से? नहीं पर उस की नस्ल से। और वो नस्ल मसीह ऐसी है। क्या यही वाअदे का फ़र्ज़ंद है? हाँ ये वही नस्ल है जिसकी बाबत और पढ़ आया है। इब्राहिम नेक आदमी तो था लेकिन बज़ात इस लायक़ ना था कि वह इस क़िस्म की, की बरकत देता कि हम बच जाते। ये ख़ुदावंद मसीह ही है जिसके तुफ़ैल से कौमें बरकत पर बरकत पाई हैं। यही मुबारक नाम जिसकी बरकत से वहशी आदमी, दीवाना होशयार, बेअक़्ल अक़्लमंद हो जाते हैं। ये भूके लिए रोटी, पियासे के लिए पानी, नादाँ के लिए दानाई कौर चशम के लिए बीनाई है। ज़रा लगे हाथ यूरोप और अमरीका के मुल्कों को, एशिया और अफ्रीका के मुल्कों से मुक़ाबला करके देख लें कि क्या फ़र्क़ है।

कि उन क़ौमों को किस क़द्र तरक़्क़ी और बरकत हाथ आई और किस क़द्र अफ़्रीक़ा और एशिया की क़ौमों पर व फ़ौक़ियत पाई। यही अंग्रेज़ जो अब मुल्कों पर हुकमरान हैं। जिनकी उलूम व फ़नून को कौमें आँखों से लगाती हैं। जिनके ईजादों से सद-हा लोग मुस्तफ़ीज़ होते वो मसीह को क़ुबूल करने से पहले क्या थे। अमरीका जो अब से क़रीब चार-सौ साल विवर नामालूम था। जिसमें वहशियों का दौर-दौरा था। जिसमें अंधेरा राज करता था। वही अब ऐसे-ऐसे अजाइबात पैदा कर रहा है जो हमारे बाप दादों ने ना कभी देखे और ना कभी सुने थे। दूर ना जा घर ही में देख कि आज के हिन्दुस्तान और मुसलमानों के ओहदे सल्तनत के हिन्दुस्तान में क्या फ़र्क़ है। आ तू भी इसी चश्मे से और आसूदा हो।

(3)
इन पैशन गोइयों की सदाक़त तब समझ में आती है जब हम ये देखते हैं कि अक्सर उन में से पूरी हो चुकी हैं मसलन याक़ूब जब उस की मुसाफ़िरत के दिन पूरे हो चुके और वो आलम-ए-बक़ा को रहलत करने के नज़्दीक पहुंचा तब अपने बेटों को बरकत देते वक़्त यहूदा की तरफ़ जिसकी नस्ल में मसीह पैदा हुआ मुख़ातब हो कर यूं कहा है तेरे भाई तेरी मदह करेंगे तेरे बाप की औलाद तेरे हुज़ूर झुकेगी यहूदा शेर बब्बर का बच्चा बल्कि पुराने शेर बब्बर की मानिंद झुकता और बैठता है यहूदा से रियासत का असा जुदा ना होगा हाकिम उस के पांव के दर्मियान से जाता ना रहेगा जब तक सैला ना आए और कौमें उस के सामने इकट्ठी होंगी।

अक्सर लोग यहूदा के नाम से वाक़िफ़ भी नहीं मदह-सराई करना बर सिर्फ इस यहूदा से मुराद ख़ुदावंद मसीह है जिसके सामने कौमें सज्दा करती हैं। वो क़ौम जो गैर कोम से नफ़रत करती थी जिसके क़ानून और इंतिज़ाम मुल्की नज़्म व नसक़ दूसरे मुल्कों से कुछ भी मुशाबेह ना थे जो ग़ैरों के साथ कुछ ताल्लुक़ कुछ रिश्ता ना रखती थी। सेला यानी मसीह के आने पर और इस को रद्द करने की एवज़ कैसी तितर-बितर हो गई उनका क़ौमी जत्था टूट गया। मुल़्क उन से छूट गया। लेकिन मसीह के हुज़ूर दुनिया की कौमें सज्दा करती हैं।

(4)
ख़ुदावंद ख़ुदा ख़ुदावंद मसीह की आमद की ख़बर हज़रत मूसा यूं देते हैं, “मैं उन के लिए उन के भाईयों में से तुझ सा एक नबी बरपा करुंगा और अपना कलाम उस के मुँह में डालूँगा और कुछ मैं उसे फ़र्माऊँगा वो सब उन से कहेगा और ऐसा होगा कि जो कोई बातों को जिन्हें वो मेरा नाम लेके कहेगा ना सुनेगा तो मैं उस का हिसाब उस से लूँगा।” ये पैशन गोई भी ख़ुदावंद मसीह के हक़ में है। गोया जिस तरह हज़रत मूसा बनी-इस्राईल को फ़िरऔन की असीरी से निकाल लाए इस तरह ख़ुदावंद मसीह गुनाहगारों को शैतान की क़ैद से रिहाई बख़्शता है। ख़ुदावंद मसीह सिर्फ ख़ास इसी बात में मूसा की तरह है वर्ना पौलुस इल्हाम की हिदायत से यूं कहता है कि मूसा को इख़्तियार कुल ना था पर मसीह को इख़्तियार कुल है। क्योंकि मूसा दयानतदार नौकर था लेकिन मसीह बाप यानी ख़ुदा का बेटा और घर का मालिक है क्या तू इन बातों को जो वो कहता है ना सुनेगा। देख इस का हिसाब तुझसे लिया जाएगा।

(5)
हज़रत दाऊद यूं कहते हैं :-

कौमें किस लिए जोश में हैं और लोग बातिल ख़्याल करते हैं ज़मीन के बादशाह सामना करते हैं और सरदार आपस में ख़ुदावंद के और उस के मसीह के मुख़ालिफ़ मंसूबे बाँधे हैं आओ हम उन के बंद खोल डालें और उन की रस्सी अपने से तोड़ फैंके वो जो आस्मान पर तख़्त नशीन है हँसेगा और ख़ुदावंद उन्हें ठट्ठों में उड़ाएगा तब वो ग़ुस्से में उन से बातें करेगा और निहायत बेज़ार हो के उन्हें परेशानी में डालेगा। “मैंने तो अपने बादशाह को कोहे-मुक़द्दस सीहोन पर बिठाया है मैं हुक्म को आशकार करूँगा कि ख़ुदावंद ने मेरे हक़ में फ़रमाया तू मेरा बेटा है मैं आज के दिन तेरा बाप हुआ। मुझसे मांग कि मैं तुझे क़ौमों का वारिस करूँगा। और मैं सरासर ज़मीन तेरे क़ब्ज़े में कर दूँगा। तू लोहे के असा तोड़ लेगा। कुम्हार के बर्तन कि तरह इन्हें चकना-चूर करिगा। पस अब बादशाह होशयार हो ऐ ज़मीन के अदालत करने वालों तर्बीयत लो। डरते हुए ख़ुदावंद की बंदगी करो और काँपते हुए ख़ुशी करो। बेटे को चूमो ता ना हो कि वो बैज़ार हो और तुम राह में हलाक हो जाओ। जब उस का क़हर यका-य़क भड़के मुबारक वो सब जिसका तवक्कुल उस पर है।” अज़ीज़ो मैं अब बंद करता हूँ। यहां तक हम देख चुके हैं दूसरे पर्चे में यहां से शुरू करेंगे।

[1] ये सिर्फ़ आप का हुस्न जन और आप कि कसिर नफ्सी है। एडीडर