अब्राहाम के दो बेटे

ये लिखा हुआ कि अब्रहाम के दो बेटे थे। एक लौंडी से दूसरा आज़ाद से पर जो लौंडी से था, जिस्म के तौर पर। और जो आज़ाद से था सौ वाअदे के तौर पर पैदा हुआ। (ग़लतीयों 4:22-23) इन बातों का मुफ़स्सिल बयान तालिब हक़ मूसा की किताब अल-मौसुम बह पैदाइश के 16 बाब से 21 बाब तक,

सलीब का पैग़ाम

इन्जील-ए-मुक़द्दस सलीब का कलाम है, जिसमें गुनाहगार बेकस और लाचार बनी-आदम को सलीब के ज़रीये से नजात की फ़हर्त बख्श (ख़ुशी देने वाला) ख़बर दी गई है। शरीअत की उदूल-हुक्मी के सबब से मौत अबदी हलाकत और दोज़ख़ गुनाहगारों का हिस्सा ठहरी है। लेकिन सलीब के सबब से ज़िंदगी अबदी आराम और बहिश्त का दरवाज़ हर एक

ख़ातिरजमा रखो

ये कौन है जिसके मुँह से ऐसी अजीब बात निकली जो दुनिया के शुरू से हरगिज़ किसी ख़ाक के पुतले से सुनने में ना आई? कौन ऐसा हुआ जिसने आप को दुनिया से बेदाग़ बचा रखा और हरचंद इस दुनिया के सरार ने उस की सारी शानो-शौकत और बादशाहतें उस को दिखलाइं और सिर्फ अपने आगे एक लम्हा सर-ए-तस्लीम ख़म (सर झुकाना)

इब्न आदम सरदार काहिनों के हवाले

मसीह का मरना और जी उठना मत्ती की इन्जील से लेकर मुकाशफ़ात की किताब तक ऐसा साफ़ और मुफ़स्सिल बयान है जो कि इन दोनों में ज़र्रा भर शक व शुब्हा को दख़ल और गुंजाइश नहीं है। इस में शक नहीं सिर्फ इन दो बातों पर ही दीन मसीही का सारा दारोमदार रखा गया है। अगर उन में से एक बात वाक़ई और दूसरी ग़ैर-वाक़ई ठहरती तो दीन ईस्वी मुतलक़ किसी

इल्हाम

इस उन्वान का एक मज़्मून अलीगढ़ इंस्टिट्यूट गेज़ेत में और उस से मन्क़ूल औध अख़्बार में शाएअ हुआ है। इल्हाम के इस्तिलाही मअनी और इल्हाम की क़िस्में और उस के नतीजे जो कुछ इस में लिखे हैं। वो सिर्फ़ मुहम्मदी इल्हाम से इलाक़ा रखते हैं। वो सब तख़ैयुलात और तुहमात जो दीवाने-पन से कम नहीं हैं। वो उन्हीं से इलाक़ा रखते हैं।

मौलवियों के सवालात

कुछ महीनों की बात है कि इतवार को शाम की नमाज़ के लिए मैं इंग्लिश चर्च में था कि एक भाई आए और बोले कि मुनादी के वक़्त एक मौलवी साहब पादरी साहब से आन भिड़े हैं। सो पादरी साहब ने आप को याद किया है। मैंने कहा बहुत इस्लाम कहो और ये कि मुझे तो माफ़ फ़रमाएं, मैं तो ऐसी गुफ़्तगुओं में कुछ लुत्फ़ और फ़ायदा नहीं देखता हूँ।

अहले इस्लाम और ज़बीह-उल्लाह

अहले इस्लाम का यह ख़याल कि ज़बीह-उल्लाह होने की इज़्ज़त व फ़ज़ीलत इस्माईल को किसी सूरत से हासिल हो। इस अजीब ख़िताब की क़द्र व मन्ज़िलत को ज़ाहिर करता है। क्योंकि सिर्फ उसी के ज़रीये से अहद-ए-बरकत क़ायम व मुस्तहकम हो सकता है। और वही अकेला इस लायक़ है कि “किताब की मोहरों को तोड़े”

क़ुर्बानी का बर्रा

इब्राहीम ने कहा, कि ऐ मेरे बेटे ख़ुदा आप ही अपने वास्ते सोख़्तनी क़ुर्बानी के लिए बर्रे की तदबीर करेगा। (पैदाइश 12:8) इब्राहीम से उस के बेटे इस्हाक़ का असनाए (दौरान, वक़्फ़ा) राह में ये सवाल करना कि “आग और लकड़ियाँ तोहें पर सोख़्तनी क़ुर्बानी के लिए बर्रा कहाँ” ताज्जुब की बात नहीं लेकिन बाप का ये जवाब देना,

इस्हाक़ या इस्माईल

दो तीन हफ़्तों से नूर-अफ़्शाँ में बह्स हो रही है कि हज़रत इब्राहीम ने इस्हाक़ को क़ुर्बानी गुज़ाराना या इस्माईल को। ये अम्र गो ग़ैर-मुतनाज़ा (लड़ाई के बग़ैर) है कि तौरेत में हज़रत इस्हाक़ के क़ुर्बानी किए जाने का बहुत मुफ़स्सिल (बयान) मज़्कूर है। रहा क़ुरआन का बयान अगर वह मुताबिक़ तौरेत ना होतो उस का नुक़्सान है,

झूटे नबी

सभों को मालूम है कि मिर्ज़ा साहब क़ादियानी मुद्दई मुमासिलत (मिस्ल) मसीह के इल्हाम की तरफ़ से मसीहीयों ने मुतलक़ इल्तिफ़ात (मुतवज्जोह होना, मेहरबानी) ना किया तो भी मालूम नहीं कि हमारे लखनवी हम-अस्र मुहज़्ज़ब ने क्यूँ-कर ऐसा लिखने की जुर्आत की है, कि क़ादियानी साहब के दावे को तस्लीम करने से समझा जाता है, कि ईसाई गवर्मेंट को