अस्बाब-ए-इत्तिहाद

मसीह ख़ुदावंद की बाबत बहुत सी ग़ैर-इंजीली रिवायत में से एक ये भी है जो मुझको बहुत प्यारी मालूम होती है याद नहीं कि इस का ज़िक्र कहाँ है कहते हैं कि रास्ते पर एक कुत्ता मरा पड़ा था राहगीर बच कर निकल जाते। और तरह तरह से उस पर अपनी नफ़रत ज़ाहिर करते थे कोई तो उसकी टेढ़ी दुम पर लतीफ़ा कहता था।

फ़ुर्सत पाकर तुझे फिर बुलाऊंगा

कुछ अर्से बाद हमें फिर फ़ुर्सत हुई है, कि बमईय्यत नाज़रीन (देखने वालों के साथ) नूर-ए-अफ़्शां फेलिक्स बहादुर के इस जवाब पर, जो एक रूमी हाकिम, तजुर्बेकार और बहुत बरसों से केसरिया की अदालत पर मुतमक्किन (जगह पर क़ायम) था और रूमी मज़्हबी व मुल्की क़वानीन के इलावा क़ौमे यहूद के तरीक़ की बातों से भी

हमारी ज़िन्दगी

इंसान की ज़िंदगी में ख़ास तीन हालतें हैं या यूं कहो कि इंसान के आयाम-ए-ज़िंदगी तीन बड़े हिस्सों में मुनक़सिम (तक़्सीम) हैं। बचपन, जवानी, बुढ़ापा। इनमें से उम्र का पहला हिस्सा वालदैन की निगरानी और उस्तादों की सुपुर्दगी (तहवील) में गुज़रता है। और नाबालिग़ होने की सूरत में दूसरों की मर्ज़ी और ख़्वाहिश के मुवाफ़िक़ चलना पड़ता है। बाक़ी उम्र

हज़रत मूसा का जानशीन

जब बनी-इस्राईल मुल्क कन्आन में पहुंच गए। तो वो मन जो वो ब्याबान में खाया करते थे आस्मान से बरसना बंद हो गया। और वो इस मुल्क के उम्दा और नफ़ीस फल और हासिलात (पैदावार) खाने लगे। और आगे बढ़ते बढ़ते यरीहू शहर तक पहुंचे। ये एक बड़ा आलीशान शहर था, जिसकी शहर-पनाह निहायत मज़्बूत थी। ताज्जुब (अजीब) की बात है,

मसीह दाऊद की नस्ल से

इस में शक नहीं, कि यसूअ मसीह जिस्म की निस्बत दाऊद की नस्ल से हुआ। मगर मुक़द्दस रूह की निस्बत क़ुद्रत के साथ अपने जी उठने के बाद ख़ुदा का बेटा साबित हुआ। लेकिन ये अम्र भी क़ाबिल-ए-लिहाज़ और उस की उलुहिय्यत पर दाल (दलालत) है कि वो दाऊद की अस्ल भी है। जैसा कि उस ने ख़ुद फ़रमाया कि “मुझ यसूअ ने

किसी दुसरे से नजात नहीं

उन्नीसवीं सदी होने वाली है कि ये कलाम कहा गया। हज़ारों मील हमसे दूर पतरस हवारी की ज़बानी अहले-यहूद की बड़ी कचहरी में क़ैदी की हालत में उन के बड़े बड़े सरदारोँ और बुज़ुर्गों के रूबरू ये अल्फ़ाज़ कहे गए। ज़मानों को तै कर के ये अल्फ़ाज़ समुंद्र और ख़ुश्की का सफ़र कर के हमारे कानों तक पहुंचे हैं। क्या वजह है कि ये कलाम इस क़द्र मुद्दत-ए-मदीद

हज़रत सुलेमान की ज़िन्दगी

“सो देख मैंने तेरी बातों के मुताबिक़ क्या देखा कि मैंने एक आक़िल और समझदार दिल तुझको बख़्शा ऐसा कि तेरी मानिंद तुझसे आगे ना हुआ और ना तेरे बाद तुझ सा बरपा होगा।” और ख़ुदा ने ना सिर्फ उस के मांगने के मुवाफ़िक़ उसे दिया बल्कि उस से ज़्यादा ये भी बख़्शा कि वो दौलत और इज़्ज़त में भी लासानी (जिस जैसा कोई और ना हो) हुआ।

सलामती तुम लोगों के लिए छोड़े जाता हूँ

इस लफ़्ज़ सलाम या सलामती का तर्जुमा बाअज़ मुतर्जिमों ने सुलह या इत्मिनान किया है लेकिन इस से मतलब में कुछ फ़र्क़ नहीं पड़ता क्योंकि इन लफ़्ज़ों के मअनी क़रीब-क़रीब यकसाँ और एक ही मतलब इन से हासिल होता है, यानी ये कि जनाब-ए-मसीह ने अपने रुसूलों को उन से जुदा होने से पेश्तर अपनी सलामती बख़्शी

ज़ात का बन्धन

हिंदू लोग इस क़द्र ज़ात परस्त हैं कि जिसका कुछ अंदाज़ा नहीं ज़ात का बंधन उन के लिए सबसे बड़ा बंधन है यहां तक कि अगर वो ग़ैर-ज़ात के आदमी के साथ लग जाएं तो फ़ौरन नापाक हो जाते हैं और जब तक कि वो स्नान (नहा) न कर लें नापाक रहते हैं अपने चौके में ग़ैर-ज़ात के आदमी को हर्गिज़ आने नहीं देते कुत्ता,

रूह-उल-क़ुद्दुस

ये जवाब इफिसिस शहर के उन शागिर्दों ने पौलुस रसूल को दिया था जब कि वो ऊपर के एतराफे मुल्क में इन्जील सुना कर इफिसिस में पहुंचा और उस ने पूछा, “क्या तुमने जब ईमान लाए रूह-उल-क़ुद्दुस पाई?” अगर्चे ये लोग कमज़ोर और बग़ैर रूह-उल-क़ुद्दुस पाए हुए इसाई थे तो भी शागिर्द कहलाए, क्योंकि वो मसीह ख़ुदावन्द पर ईमान रखते थे